राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : ‘ब्रांडेड’ बेइंसाफी और कुलीनता का पाखंड
08-Apr-2026 5:58 PM
राजपथ-जनपथ : ‘ब्रांडेड’ बेइंसाफी और कुलीनता का पाखंड

‘ब्रांडेड’ बेइंसाफी और कुलीनता का पाखंड

आज के दौर में ‘नाम’ सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि एक गहरा राजनीतिक विज्ञापन बन चुके हैं। लेकिन विडंबना देखिए, जिस वैश्वीकरण ने हमें दुनिया भर के ब्रांड्स से जोड़ा, उसी ने हमें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के मामले में ‘अंधा’ बना दिया है। रायपुर की सडक़ों से लेकर बोस्टन के आलीशान क्लबों तक, राजनीतिक-सामाजिक बेइंसाफी का एक ऐसा तमाशा चल रहा है, जो अज्ञानता और अहंकार का मिला-जुला रूप है।

सडक़ों पर घूमता ‘नस्लवाद’

अभी कुछ अरसा पहले रायपुर की एक व्यस्त सडक़ पर एक युवक की पीठ पर बड़े अक्षरों में ‘NEGRO’ लिखा देखा गया। यह केवल एक टी-शर्ट का प्रिंट नहीं था, बल्कि हमारी उस संवेदनहीनता का ‘पोस्टर’ था जो दूसरों के सदियों पुराने दर्द को ‘फैशन’ मान बैठी है। ‘निग्रो’ वह शब्द है जिसने अमेरिका और अफ्रीका में करोड़ों इंसानों को बेडिय़ों, कोड़ों और अमानवीयता के अंधेरे में धकेला। आज पश्चिम के सभ्य समाज में इस शब्द को लेना भी ‘सोशल सुसाइड’ माना जाता है। लेकिन हमारे यहाँ? हमारे यहाँ यह केवल एक ‘कूल’ दिखने वाला विदेशी शब्द है। यह अज्ञानता नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक घाव पर नमक छिडक़ने जैसा है जिसे दुनिया अभी भरने की कोशिश कर रही है।

Negro शब्द क्यों अस्वीकार्य है? नस्लवाद का प्रतीक- यह शब्द गुलामी (Slavery) और अलगाववाद (Segregation) के दौर की याद दिलाता है। इसे श्वेत वर्चस्व (White Supremacy) के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आज के दौर में, चाहे वह अमेरिका हो या भारत, इस शब्द का उपयोग करना न केवल असभ्य माना जाता है, बल्कि कई देशों में यह नफरत फैलाने वाली भाषा की श्रेणी में आता है। 1960 के दशक के बाद से, अश्वेत समुदाय ने इस शब्द को पूरी तरह से नकार दिया है। इसकी जगह अब ‘Black’ या "People of Colo" (POC) का सम्मानपूर्वक उपयोग किया जाता है।

‘हिटलर’ का देसी अवतार और जर्मनी का सबक

यही हाल ‘हिटलर’नाम का है। गुजरात से लेकर छत्तीसगढ़ के दुर्ग तक, ‘हिटलर’ नाम की दुकानें शान से चल रही हैं। रायपुर में रविशंकर यूनिवर्सिटी कैंपस की बेंचों पर छात्र इस नस्लवादी जनसंहारी तानाशाह का नाम गर्व से खुरचते हैं। हम जिसे ‘अनुशासन का प्रतीक’ मानकर पूज रहे हैं, वह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा जनसंहारी था।

जर्मनी ने अपने इतिहास से सबक लिया है। वहां के ‘क्रिमिनल कोड’ (Section)(a) के तहत आप अपने बच्चे या कुत्ते का नाम भी ‘हिटलर’ नहीं रख सकते। वहां नाजी सैल्यूट करना आपको सीधे जेल पहुँचा सकता है। लेकिन भारत में, हम इस ‘राक्षस’ को एक ब्रांड बना देते हैं। यह दर्शाता है कि हमारा नैतिक पैमाना कितना टूट चुका है कि हमें ‘शक्ति’ और ‘क्रूरता’ के बीच का फर्क समझ नहीं आता।

‘बोस्टन ब्राह्मण’- कुलीनता की  ‘स्मगलिंग’

पॉलिटिकल इनकरेक्टनेस का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी उदाहरण है—‘बोस्टन ब्राह्मण’। 19वीं सदी में अमेरिकी अभिजात वर्ग (Elite) ने खुद को आम जनता से श्रेष्ठ दिखाने के लिए भारतीय ‘ब्राह्मण’ शब्द को उधार लिया। उन्होंने इसके पीछे के त्याग या पांडित्य को नहीं, बल्कि ‘पदानुक्रमा’ (Hierarchy) और ‘उच्चता’ को अपनाया।

इस शब्द को सबसे पहले 1860 में प्रसिद्ध लेखक और चिकित्सक डॉ. ओलिवर वेंडेल होम्स ने अपने उपन्यास ‘एल्सी वेनर’ में इस्तेमाल किया था। होम्स भारतीय दर्शन और वेदों से काफी प्रभावित थे। उन्होंने देखा कि भारत में  ‘ब्राह्मण’ समाज का वह हिस्सा हैं जो शिक्षित हैं, बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ माने जाते हैं और जिनके पास आध्यात्मिक और सामाजिक सत्ता है। उन्होंने बोस्टन के उन पुराने परिवारों के लिए यह शब्द चुना जो पीढिय़ों से अमीर थे, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़े थे और राजनीति व व्यापार पर जिनका एकाधिकार था। होम्स ने उन्हें "The Brahmin Caste of New England" कहा।

आज अमेरिका में  ‘Brahmin’ नाम का एक नामी ब्रांड है जो लग्जरी लेदर (चमड़े) के बैग बनाता है। यहाँ तक कि ‘Brahmin' नाम से बीयर (शराब) भी बेची जाती है।

विडंबना की पराकाष्ठा देखिए, भारत का जो समुदाय पारंपरिक रूप से चमड़े के काम और मदिरापान को वर्जित मानता रहा, उसी का नाम पश्चिम के बाजार ने  ‘एलीट’ दिखने के लिए ‘लेदर’  और ‘लिकर’ पर चिपका दिया।

चाहे वह ‘निग्रो’ जैकेट पहनकर बाइक दौड़ाना हो, या ‘हिटलर’ के नाम पर धंधा करना—यह सब एक ही मानसिक बीमारी के लक्षण हैं- हमदर्दी की कमी। हम दूसरों की संस्कृति और उनके संघर्षों को ‘लेबल’ बनाकर अपनी पीठ पर लाद रहे हैं।

जब शब्द अपनी गहराई खो देते हैं और केवल ‘ब्रांड’ बन जाते हैं, तो समाज अपना विवेक खोने लगता है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को यही सिखाएंगे कि इतिहास का हर काला अध्याय केवल एक  ‘टी-शर्ट प्रिंट’  है? यह समय अपनी ऐतिहासिक समझ को दुरुस्त करने का है, वरना हम ‘ब्रांडेड’ तो कहलाएंगे, लेकिन ‘सभ्य’ कभी नहीं।

आज भारत में सांप्रदायिक हरकतें करते घूमते नौजवान भगत सिंह की तस्वीर आते टी शर्ट पहनकर घूमते हैं. भगत सिंह पूरी, छोटी सी, जिंदगी जिन बातों के खिलाफ रहे, उन्हें करते हुए लोग उनके भक्त होने का दिखावा भी कर लेते हैं।

सत्ता की बिसात और विशेष ट्रेनें

सत्ता की बिसात बंगाल में बिछी है, लेकिन उसकी हलचल छत्तीसगढ़ की पटरियों पर महसूस की जा रही है। बंगाली बहुल भिलाई, रायपुर बिलासपुर कोरबा रायगढ़ रेलवे स्टेशनों पर इन दिनों कुछ अलग ही नजारा है। खडग़पुर, हावड़ा और शालीमार जाने वाली हर ट्रेन हाउसफुल है। वेटिंग लिस्ट का आंकड़ा 200 के पार जा चुका है। लेकिन ये भीड़ ‘वोट’ की है। वजह साफ है, पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव। यात्रियों के इस रेले को देखते हुए रेलवे प्रशासन भी अलर्ट मोड पर है। लंबी वेटिंग लिस्ट को क्लीयर करने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर जोन छत्तीसगढ़ से बंगाल और असम के लिए स्पेशल ट्रेनें चला रहा है। तो कुछ ट्रेनों में एक्स्ट्रा कोच भी जोड़े जा रहे हैं ताकि वोटर्स को उनके गंतव्य तक पहुंचाया जा सके। ये लंबी वेटिंग लिस्ट बता रही है कि इस बार बंगाल का चुनाव कितना दिलचस्प और अहम होने वाला है। रेलवे की स्पेशल ट्रेनें इन वोटर्स को सत्ता की मंजिल तक पहुंचाएगी या नहीं, ये तो वक्त बताएगा, लेकिन मतदाताओं का उत्साह सिस्टम पर भारी पड़ता दिख रहा है। देश के दूसरे प्रदेशों से भी बंगाल के लिए विशेष ट्रेनें बुक हो चुकी हैं, गुजरात से चार।

सेव इंडिया, सेव बंगाल व्हाट्सएप ग्रुप

इस पर यह भी गौर करने वाला घटनाक्रम है कि छत्तीसगढ़ भाजपा के दो दिग्गजों ने सेव इंडिया, सेव बंगाल नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है बंगालियों के बीच।  इस ग्रुप का पहला सामूहिक कार्यक्रम 29 मार्च को मन की बात के साथ रजबंधा मैदान में हुआ। इसे सुनने के लिए विशेष रूप से बंगालियों के लिए तैयारी की गई थी। लजीज भोजन भी करवाया गया। पीएम को सुनने के बाद बंगालियों की मैराथन बैठक हुई । इसमें तय हुआ अभी नहीं तो कभी नहीं..। की रणनीति के अनुसार जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में है, यहां से सम्मानजनक ढंग से भेजा गया और भेजा जा रहा है ताकि बंगाल निवासी अपने रिश्तेदारों को भाजपा को वोट देने  प्रेरित करें। इन परिवारों के सदस्य और चेहरे चिन्हित किए गए हैं। इनके साथ चार प्रोफेशनल नेता भी भारी लगेज के साथ भेजे गए हैं। ताकि उन पर नजर रखी जा सके।

नया चेहरा, या एक्सटेंशन?

क्या केंद्र सरकार मुख्य सचिव और डीजीपी की तरह हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को भी एक्सटेंशन देगी? यह सवाल इन दिनों प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल, हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स  वी श्रीनिवास राव 31 मई को रिटायर हो रहे हैं। अपने मजबूत संपर्कों के लिए पहचाने जाने वाले राव के संभावित एक्सटेंशन को लेकर अभी से कयास शुरू हो गए हैं।

1990 बैच के आईएफएस अधिकारी राव को पिछली भूपेश बघेल सरकार ने पांच सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ  फॉरेस्ट  फोर्स बनाया था। मौजूदा सरकार ने भी उन्हें पद पर बरकरार रखा है। जहां तक एक्सटेंशन का सवाल है, तो राज्य में पहले ही अमिताभ जैन को तीन माह और अशोक जुनेजा को छह माह का एक्सटेंशन मिल चुका है। हालांकि फॉरेस्ट विभाग का इतिहास अलग रहा है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अब तक किसी भी पीसीसीएफ को एक्सटेंशन नहीं मिला है। अलबत्ता रिटायरमेंट के बाद संविदा नियुक्तियों के उदाहरण जरूर हैं। राव के बाद नए नए हेड  ऑफ  फॉरेस्ट फोर्स को लेकर भी हलचल तेज है। 1994 बैच के अरुण पाण्डेय स्वाभाविक दावेदार माने जा रहे हैं, जबकि इसी बैच के प्रेम कुमार भी दौड़ में शामिल हैं।  इन सबके बीच 1995 बैच के ओपी यादव का नाम तेजी से उभरकर सामने आया है। ओपी यादव वर्तमान में कैम्पा का प्रभार संभाल रहे हैं। उनके बड़े भाई एसपी यादव यूपी कैडर के आईएफएस अधिकारी हैं और रिटायरमेंट के बाद केंद्र सरकार के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं। संपर्कों के लिहाज से ओपी यादव को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। इसमें सरगुजा कनेक्शन चर्चा का विषय है। अरुण पांडेय और ओपी यादव, दोनों ही सरगुजा के रहवासी हैं। ऐसे में अगर हेड आफ फारेस्ट फोर्स पद पर सरगुजा को प्रतिनिधित्व मिलता है, तो इसे आश्चर्यजनक नहीं माना जाएगा। फिलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं है कि राज्य सरकार राव के एक्सटेंशन के लिए प्रस्ताव भेजेगी या नहीं, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इसको लेकर चर्चाएं तेज हैं। देखना है आगे क्या होता है।


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