राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : पेट्रोल पंप का धंधा
16-Apr-2026 5:58 PM
राजपथ-जनपथ : पेट्रोल पंप का धंधा

पेट्रोल पंप का धंधा

पश्चिम एशिया संकट की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत की स्थिति बनती जा रही है। यदि यह विवाद जल्द नहीं सुलझा, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और गैस का संकट और गहरा सकता है। इस कमी का असर सिर्फ आम लोगों पर ही नहीं, बल्कि राजनेताओं पर भी देखने को मिल रहा है। दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों के कई छोटे-बड़े नेता पेट्रोल-डीजल और गैस एजेंसी के कारोबार से जुड़े हुए हैं।

पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी को हमेशा से स्थिर आमदनी का जरिया माना जाता है। यही कारण है कि विशेष रूप से राजनेता इस क्षेत्र में निवेश के लिए उत्सुक रहते हैं।

चर्चा है कि दुर्ग जिले के एक प्रभावशाली कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री के पास पांच पेट्रोल पंप हैं, जो परिवार के अलग-अलग सदस्यों के नाम पर संचालित हो रहे हैं। इस बात का खुलासा किसी विपक्षी ने नहीं, बल्कि पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से किया।

दरअसल, एक निजी कार्यक्रम में खाड़ी क्षेत्र में जारी संकट के चलते पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कमी पर चर्चा हो रही थी। मंच से संबोधित करते हुए एक नेता ने कमी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया। बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों के पास दो-तीन पेट्रोल पंप हैं, वे भी अब एक-एक पंप बंद करने की स्थिति में आ रहे हैं।

इसी कड़ी में उन्होंने पास बैठे पूर्व मंत्री की ओर इशारा करते हुए कहा, कि भइया के पास तो पांच-छह पेट्रोल पंप हैं, आपने भी दो-तीन बंद कर दिए होंगे? इस पर पूर्व मंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन यह टिप्पणी कांग्रेस के भीतर चर्चा का विषय बन गई है।

गौर करने लायक बात ये है कि पूर्व मंत्री के पास पिछली सरकार में एक महत्वपूर्ण विभाग था, लेकिन वे अक्सर यह शिकायत करते रहे कि उन्हें ट्रांसफर तक का अधिकार नहीं दिया गया। चुनाव हारने के बावजूद अभी भी पार्टी में उनका प्रभाव बरकरार है।

यूसीसी पर जवाब से ज्यादा सवाल

यदि सब कुछ समयबद्ध तरीके से चलता रहा तो गुजरात, उत्तराखंड और गोवा के बाद छत्तीसगढ़ चौथा राज्य होगा, जहां समान नागरिक संहिता यानि यूसीसी लागू हो जाएगा। छत्तीसगढ़ में इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक रिटायर्ड न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में समिति बना दी गई है। जहां भी यूसीसी पर जोर दिया जा रहा है, वहां पर सरकारों का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे पूरे देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करें। कानून अलग-अलग होने की वजह से न्याय की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। यूसीसी रहेगा तो कानून सरल, एक जैसा और पारदर्शी रहेगा। न्याय व्यवस्था ज्यादा सुलभ होगी और कुशल भी। उम्मीद यह भी की गई है कि खासकर महिलाओं के अधिकारों में यूसीसी लागू होने से समानता आएगी। जैसे, संपत्ति के अधिकार, तलाक और बहुविवाह के मामलों में उन्हें मौजूदा कानूनों से ज्यादा मदद नहीं मिल पाती। सरकार का यह भी मानना है कि इससे सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलेगा।

ये सभी आदर्श परिस्थितियां हैं, पर छत्तीसगढ़ के संदर्भ में कुछ चर्चा कर लें। यह साफ है और जानना जरूरी कि संविधान की जिस धारा 44 की बात कही जा रही है, वह एक नीति निर्देशक प्रावधान है। यानि सुझाव है, अनिवार्यता नहीं। मगर, इसकी अवहेलना भी तो नहीं करनी है। जब संविधान बनने के सात दशक पूरे हो गए हों तो इस पर विचार तो करना ही चाहिए।

दूसरी बात, आदिवासी सुमदायों को इस प्रावधान से अलग रखा जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार आश्वासन दिया है कि आदिवासी समुदायों को यूसीसी से बाहर रखा जाएगा। वे उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और असम के संदर्भ में ऐसा बयान दे चुके हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारिक बयान में अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 32 प्रतिशत आदिवासी आबादी पर भी यूसीसी लागू होगा या नहीं। मगर, शाह के बयान के बाद मानकर चला जा सकता है कि यहां भी वही पॉलिसी रहेगी।

जो उच्चस्तरीय समिति देसाई की अध्यक्षता में बनाई गई है उसमें राज्य के नागरिकों, संगठनों और विशेषज्ञों से सुझाव लेने की बात कही गई है। छत्तीसगढ़ के गोंड, बैगा, उरांव, हलबा आदि में सदियों से कस्टमरी लॉ, यानि रीति रिवाज पर आधारित कानून चला आ रहा है। ये प्रथाएं संविधान की 5वीं अनुसूची पेसा और अनुच्छेद 13-3-ए के तहत संरक्षित भी है। यूसीसी में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे, गोद लेने के तरीके में रखे गए प्रावधान आदिवासी समुदाय की प्रथाओं से टकराते हैं। जैसे, बैगा और गोंड समूहों में बेटियों को पिता की संपत्ति, खासकर खेतों पर अधिकार नहीं मिलता या बहुत कम मिलता है। संपत्ति मोटे तौर पर पुत्रों या पुरुष वंशजों में बंटती है। मगर दूसरा पहलू यह भी है कि विवाह होते ही पति की संपत्ति पर उसका अधिकार हो जाता है। महिलाओं के प्रति आदिवासी समुदाय में यह कहीं अधिक प्रगतिशील प्रथा है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के भी कुछ फैसले आ चुके हैं। आदिवासी महिलाओं को तलाक लेने और दोबारा और तीसरी बार विवाह करने मामले में भी बड़ी आजादी है। वह अदालत गए बिना ही अपने पहले पति को छोडक़र दूसरा विवाह कर सकती है। इसकी मंजूरी और मान्यता उसे केवल समाज से लेनी पड़ती है।

आदिवासी नेता कहते हैं कि उनकी प्रथा महिलाओं को ज्यादा आजादी देती है, जबकि यूसीसी जैसे कानून जटिल हैं। छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने कई वक्तव्यों में माना है कि प्रथाएं आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान हैं। यूसीसी इन पर थोप दिया गया तो उनकी अस्तित्व पर खतरा है। आदिवासी समाज में महिलाओं को विवाह-तलाक में ज्यादा स्वतंत्रता है, जबकि संपत्ति में पुरुष-केंद्रित व्यवस्था समुदाय की रक्षा करती है। उनका यह भी कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, समुदाय की सामूहिक संपत्ति होती है। कानून के तहत बाहरी व्यक्ति को बेचना या हस्तांतरित करना प्रतिंबंधित तो अभी भी है पर यदि यूसीसी लागू हो गया तो यह सामूहिक संपत्ति या भूमि व्यक्तिगत मान लिया जाएगा और बाहरी लोगों के हाथ में जाने का खतरा बढ़ेगा।

वैसे सरकार का फैसला सिर्फ समिति के गठन तक सीमित है। समिति की रिपोर्ट, उस पर विधानसभा में चर्चा और कानून के पास हो जाने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

अफसरों की चुनाव ड्यूटी

भारतीय पुलिस सेवा के एक और अफसर त्रिलोक बंसल की अचानक चुनाव ड्यूटी लग गई, और उन्हें पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में पर्यवेक्षक बनाया गया है। उनकी चुनाव ड्यूटी लगने की पुलिस महकमे में काफी चर्चा है।

आईपीएस के वर्ष-2016 बैच के अफसर बंसल एसटीएफ में एसपी के पद हैं। उन्हें कुछ दिन पहले कोंडागांव एसपी का प्रभार दिया गया था। कोंडागांव एसपी पंकज चंद्रा आईपीएस अवार्ड होने के बाद डेढ़ महीने के ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद गए हैं।

बंसल का आर्डर 5 अप्रैल को निकला, और फिर पांच दिन बाद जॉइनिंग कर जिले के एक थाने का निरीक्षण करने पहुंचे थे तभी चुनाव आयोग से फोन आ गया, और उन्हें तत्काल प्रभाव से पश्चिम बंगाल पहुंचने कहा गया। उन्हें बांग्लादेश से सटे संवेदनशील चौबीस परगना जिले में पर्यवेक्षक बनाया गया है। आम तौर पर फील्ड अफसरों को पर्यवेक्षक नहीं बनाया जाता है, लेकिन बंसल इस मामले में अपवाद रहे।

पीएचक्यू ने भी इस मामले में चुनाव आयोग से बात करने की जरूरत महसूस नहीं की, और उन्हें रिलीव कर दिया गया। बंसल के अलावा दो और आईपीएस अफसर चुनाव ड्यूटी कर रहे हैं। इनमें डॉ. अजय यादव, अभिषेक मीणा भी हैं। कुल मिलाकर इस बार बंगाल में आधा दर्जन से अधिक आईएएस और आईपीएस अफसर चुनाव ड्यूटी कर रहे हैं।

जमीन के नीचे छिपे खतरे

नक्सलमुक्त घोषित कर देने का मतलब यह नहीं है कि रातोंरात बस्तर पूरी तरह बदल गया। जंगल के कच्चे रास्तों पर तैनात महिला कमांडो, हाथ में मेटल डिटेक्टर लिए, हर कदम पर छिपे खतरे को तलाश रही हैं।

प्रेशर आईईडी, कमांड आईईडी और टिफिन बम जैसे विस्फोटक आज भी जमीन के भीतर दफ्ऩ हैं, जो किसी भी वक्त जानलेवा साबित हो सकते हैं। मतलब यह है कि सुरक्षा बलों की लड़ाई सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि अदृश्य खतरों से भी है। बम स्क्वायड और डॉग स्क्वाड लगातार जोखिम उठाकर आम लोगों के लिए रास्ते सुरक्षित बना रहे हैं। बस्तर में माओवादी हिंसा से मुक्ति में महिला जवानों की जो भागीदारी रही है, उस पर अलग से कहानी लिखी जानी चाहिए।


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