राजपथ - जनपथ
सब चंगा सी
पिछले दिनों विदेश मंत्री एस जयशंकर आईआईएम के दीक्षांत समारोह में शिरकत करने रायपुर आए, तो कई भाजपा नेता स्वागत के लिए एयरपोर्ट पहुंचे थे। स्वाभाविक तौर पर भाजपा नेताओं की चिंता पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की समस्या को लेकर थी। बताते हैं कि जयशंकर ने कम शब्दों में अपनी बात रखी, और आश्वस्त किया कि हमारी तैयारी पूरी है, और कोई समस्या नहीं आएगी।
पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे युद्ध के चलते पूरी दुनिया में पेट्रोलियम संकट गहरा गया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी विशेषकर गैस की किल्लत हो रही है। कमर्शियल सिलेंडर के दाम बढ़ चुके हैं, और रसोई गैस की समस्या पैदा हो गई है।
जाने-माने डिप्लोमेट और विदेश मंत्री जयशंकर इन समस्याओं से निपटने में अहम रोल अदा कर रहे हैं। वीआईपी लाउंज में विधायक सुनील सोनी और पुरंदर मिश्रा ने उनसे अनौपचारिक चर्चा भी की। सुनील सोनी से जयशंकर पहले से ही परिचित हैं।
सोनी सांसद थे तब पासपोर्ट और अन्य विषयों को लेकर जयशंकर से पहले भी मिल चुके हैं। मिश्रा खुद वित्तीय मामलों के गहरे जानकार हैं, मगर वो भी जयशंकर से खोदकर कुछ निकलवाने में असफल रहे। हल्के-फुल्के अंदाज में जयशंकर ने उनसे सिर्फ इतना ही कहा कि तमाम परिस्थितियों से निपटने की तैयारी पूरी है, और किसी तरह की कोई समस्या नहीं आएगी।
घर के भीतर मतभेद
पंडरी स्थित कृषि उपज मंडी की जमीन पर जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना की तैयारी चल रही है। वैसे तो यह पिछली भूपेश बघेल सरकार का प्रपोजल था, और इस दिशा में काफी कुछ कार्रवाई हो चुकी थी। अब विष्णु देव साय सरकार ने पुराने प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। हालांकि पूर्व मंडी अध्यक्ष, और धरसीवां से तीन बार विधायक रह चुके देवजी पटेल इसकी खिलाफत कर रहे हैं, और इसको लेकर फिर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए कानूनी सलाह ले रहे हैं। ये बात अलग है कि कोर्ट पहले भी उनकी याचिका खारिज कर चुकी है।
सरकार का तर्क है कि मंडी अब तुलसी-बाराडेरा में शिफ्ट हो चुकी है। ऐसे में खाली जमीन पर व्यावसायिक परियोजना गलत नहीं है। सरकार को उम्मीद है कि जेम्स-ज्वेलरी पार्क की स्थापना से न सिर्फ रोजगार के नए अवसर होंगे, बल्कि ज्वेलरी कारोबार का बड़ा केन्द्र स्थापित होगा।
देवजी जिन बिंदुओं को लेकर कोर्ट जाने की सोच रहे थे, उसका समाधान पहले ही हो चुका है। पिछली सरकार ने एक दिन में ही जमीन का लैंड यूज बदल दिया था, और जमीन उद्योग विभाग के हवाले कर दी थी। ऐसे में परियोजना में रोक के लिए कानूनी विकल्प सीमित रह गए हैं। चूंकि यह कांग्रेस सरकार के समय की परियोजना थी, इसलिए कांग्रेस के लोग स्वाभाविक रूप से इसके पक्ष में हैं। भाजपा सरकार योजना को आगे बढ़ा रही है। देखना है आगे क्या होता है।
टिड्डा नीलकंठ की चोंच में
जीवो जीवस्य भोजनम्, यह प्रकृति का शाश्वत सत्य है। सृष्टि में हर एक जीवन का एक चक्र है, जहां एक जीव दूसरे का आहार बनकर संतुलन बनाए रखता है। श्रीमद्भागवत में भी इसे जीवो जीवस्य जीवनम् भी कहा गया है। यानि एक जीव का जीवन दूसरे जीव के जीवन पर आधारित है।
नीलकंठ की चोंच में फंसा यह टिड्डा एक शिकार ही नहीं, बल्कि प्रकृति के उसी अनिवार्य संतुलन का प्रतीक है। विनाश ही नए सृजन का मार्ग बनाता है, और एक का अंत अनेक के अस्तित्व की शुरूआत है। टिड्डा फसलों के लिए हानिकारक हैं और नीलकंठ जैसे कई पक्षियों का आहार है। (तस्वीर प्राण चड्ढा)
खेतों का विलेन थाली का सुपर हीरो
छत्तीसगढ़ के किसान हों या राजस्थान के, ‘टिड्डी दल’ का नाम सुनते ही माथे पर पसीना आ जाता है। फसलों को चट कर जाने वाला यह ‘दुश्मन’ अब दुनिया के दूसरे कोनों में एक बिल्कुल अलग पहचान बना रहा है। जिस टिड्डे को हम खेतों से खदेडऩे के लिए थालियां पीटते थे, दुनिया अब उसे अपनी ‘खाने की थाली’ में बड़े चाव से सजा रही है। और बात सिर्फ भूनकर खाने तक सीमित नहीं है, अब तो बाकायदा इसका ‘प्रोटीन पाउडर’ बनाकर डिब्बों में बेचा जा रहा है।
मेक्सिको से इजरायल तक का सफर दुनिया में टिड्डा खाने का शौक कोई नया नहीं है। मेक्सिको में इसे ‘चैपुलिन्स’ (ष्टद्धड्डश्चह्वद्यद्बठ्ठद्गह्य) कहा जाता है और वहां यह मूंगफली की तरह स्नैक्स के रूप में बिकता है। थाईलैंड के नाइट मार्केट्स में इसे डीप-फ्राई करके सोया सॉस के साथ परोसा जाता है। लेकिन असली क्रांति आई है इजरायल और यूरोप में। वहां '॥ड्डह्म्द्दशद्य स्नशशस्रञ्जद्गष्द्ध' जैसी हाई-टेक कंपनियां अब टिड्डों की बाकायदा खेती कर रही हैं। उनका तर्क है कि गाय या भैंस पालने के मुकाबले टिड्डों को पालना पर्यावरण के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद है। ये कम पानी पीते हैं, कम जगह घेरते हैं और प्रदूषण भी नहीं फैलाते।
डिब्बे में बंद ‘पावरफुल’ पाउडर अब सबसे दिलचस्प मोड़, टिड्डे का प्रोटीन पाउडर। जिम जाने वाले शौकीनों के लिए यह नया ‘सुपरफूड’ बनकर उभरा है। वैज्ञानिकों का दावा है कि टिड्डे के पाउडर में 60 से 70 प्रतिशत तक प्रोटीन होता है, जो चिकन या मटन से कहीं ज्यादा है। इसका स्वाद भी कोई बुरा नहीं होता, बल्कि हल्का ‘नटी’ (अखरोट जैसा) होता है। इसे आटे में मिलाकर ‘प्रोटीन ब्रेड’ बनाई जा रही है और चॉकलेट शेक में घोलकर पिया जा रहा है। यानी जो टिड्डा कभी फसलों का काल था, वह अब ‘मसल बिल्डिंग’ का सबसे बड़ा जरिया बनता जा रहा है।
सावधानी भी है जरूरी लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप खेत में उड़ते किसी भी टिड्डे को पकडक़र आजमाने लगें। असल में, खेतों में टिड्डों को मारने के लिए भारी मात्रा में कीटनाशकों का छिडक़ाव किया जाता है, जो उन्हें जहरीला बना देता है। खाने और पाउडर बनाने के लिए जो टिड्डे इस्तेमाल होते हैं, उन्हें खास लैब या नियंत्रित ‘फार्म’ में उगाया जाता है।
निष्कर्ष भारत में शायद ही कोई जल्द ही ‘टिड्डा करी’ या ‘टिड्डा शेक’का आर्डर दे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचल बता रही है कि भविष्य की ‘फूड सिक्योरिटी’ इन्हीं छोटे-छोटे उडऩे वाले जीवों में छिपी है। तो अगली बार जब आप टीवी पर टिड्डी दल का हमला देखें, तो बस इतना सोचिएगा कि दुनिया के किसी कोने में कोई जिम का शौकीन शायद इसे ‘प्रोटीन पाउडर’ के रूप में अपनी डाइट में शामिल करने की तैयारी कर रहा होगा। खेतों का ‘विलेन’ वाकई अब ग्लोबल मार्केट का ‘सुपर हीरो’ बन चुका है!


