राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : रोजमर्रा के प्रदर्शन से परेशानी
02-Apr-2026 6:10 PM
राजपथ-जनपथ : रोजमर्रा के प्रदर्शन से परेशानी

रोजमर्रा के प्रदर्शन से परेशानी

कांग्रेस ने प्रदेश में दो-चार जिलों को छोडक़र लगभग सभी जिला अध्यक्षों को बदल दिया है। नए जिलाध्यक्षों ने जिम्मेदारी संभालते ही कामकाज शुरू कर दिया है और कुछ का प्रदर्शन खासा बेहतर माना जा रहा है। इनमें रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन और दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर खासे चर्चा में हैं। दोनों की सक्रियता इतनी ज्यादा है कि स्थानीय स्तर पर ही इसे लेकर अलग तरह की प्रतिक्रिया सामने आने लगी है।

रायपुर शहर अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन तीन बार पार्षद रह चुके हैं और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके नेतृत्व में राजधानी में विभिन्न मुद्दों को लेकर कांग्रेस द्वारा लगभग रोज धरना-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

कुछ ऐसा ही हाल दुर्ग ग्रामीण अध्यक्ष राकेश ठाकुर का भी है। वे भी लगातार अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं और संगठन को सक्रिय बनाए हुए हैं।

हालांकि, इन लगातार हो रहे कार्यक्रमों से कार्यकर्ताओं में थकान की चर्चा भी सामने आ रही है। बताते हैं कि दुर्ग ग्रामीण के एक वरिष्ठ नेता इस मुद्दे को लेकर पूर्व सीएम भूपेश बघेल तक पहुंच गए। उन्होंने जहां राकेश ठाकुर की सक्रियता की सराहना की, वहीं यह भी कहा कि रोजाना के धरना-प्रदर्शन से कार्यकर्ता थक रहे हैं। नेता ने सुझाव दिया कि चुनाव में अभी समय है, ऐसे में कार्यक्रमों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए। अब देखना होगा कि इस सलाह के बाद धरना-प्रदर्शनों की रफ्तार में कोई कमी आती है या नहीं।

कॉफी हाउस में छांछ पे चर्चा ...

भाजपा के पुराने  नेताओं का ग्रुप एक बार फिर सिविल लाइन काफी हाउस में जुटा।  सरगुजा से बस्तर के निवासी ये नेता इससे पहले वे होली के दो दिन पहले मिले थे। इनकी  पिछले विचारों से सहमत इस बार कुछ नए नेता भी आ पहुंचे। 1 अप्रैल को बुलाया गया तो लगा अप्रैल फूल बना रहे होंगे लेकिन बैठक शुरू हुई तो सब कुछ साफ हो गया कि मन की बात हो रही। बैठक दोपहर की थी तो चाय-काफी मना किया कि चाय अब पच नहीं रही है और इसलिए गर्मी के मौसम में छांछ मंगाया गया और छांछ के सेवन के साथ चर्चा आगे बढी। पिछली बैठक की तरह सर्वानुमति यह बनी कि किसी का नाम सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। एक ने कहा कि अब तो मंडल से लेकर जिला होते हुए, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर पद वितरित करने की उम्र तय कर दी गई है, यह अलग बात है कि जिन्होंने उम्र तय की है उनकी उम्र 60 वर्ष से लेकर 75 वर्ष की हो चुकी है, लेकिन निचले स्तर पर नियम लागू है।

एक नेता जो पितृ संस्था से भी काफी नजदीकी रखते हैं ने कहा कि अब कहीं पर भी किसी भी बात की सुनवाई नहीं है, सिर्फ एक ही बात है हमें हर हालत में राज्य और केंद्र में सरकार चाहिए और अब उत्तर भारत से होते हुए हमें दक्षिण भारत में परचम लहराना है और जो चुनाव जीत सकते हैं। उनका कितना भी विरोध करिए, लेकिन आज वह चुनाव जीतने में सफल हैं। पितृ संस्था ने यह आंतरिक निर्णय ले लिया है। 

और हां अब 2028 के विधानसभा चुनाव हो या 2029 के लोकसभा चुनाव सभी में 35 वर्ष से लेकर 55 वर्ष के उम्र के प्रत्याशियों का ही चयन होगा, चाहे वह किसी भी दूसरे पार्टी से क्यों ना आया हो और वह अगर चुनाव जीत सकते हैं, तो उन्हें टिकट मिलेगा, जिन्हें विरोध करना है वो करते रहें। यह निर्णय भी आंतरिक रूप से लिया जा चुका है।

तभी तीसरे नेता ने कहा कि अब तो जिला स्तर पर मार्गदर्शक मंडल कार्यालय खुलने चाहिए, क्योंकि पहले विदाई के समय शॉल और श्रीफल दिया जाता था, अब तो सिर्फ संकेत दिया जा रहा है कि आपकी उम्र हो चुकी है, अपनी पार्टी में 30 से 40 वर्ष तक सेवा दे चुके हैं आपकी सेवा का ही परिणाम है कि राज्यों में और केंद्र में भाजपा की सरकार और एनडीए की सरकार बन रही है और भविष्य में भी बने। बाकी जिसने संकेत समझ लिया, तो अपने घर पर विश्राम करना प्रारंभ कर दे। इन्होंने बताया कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा, जो असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद होगी, उसमें 35 वर्ष से 55 वर्ष तक के उम्र के लोगों को संगठन में महत्व दिया जाएगा, सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत पुराने लोगों को जिन्हें आवश्यक समझा जाएगा, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया जाएगा। यह भी बताया कि मंडल स्तर और जिला स्तर पर जारी प्रशिक्षण वर्ग में तीसरी आंख लगी हुई है और उसमें चेहरे भी चिन्हित किया जा रहे हैं, 2028 के विधानसभा  और 2029 लोकसभा चुनाव के लिए। क्योंकि लगभग तय है कि प्रत्याशियों के चेहरे बदले जाएंगे। वह भी बड़ी संख्या में चाहे छत्तीसगढ़ हो या चाहे देश या अन्य राज्य हो, सभी जगह यह नियम लागू किया जाएगा।

इसी बीच पितृ संस्था से जुड़े और भाजपा में भी सक्रिय रहे नेता ने कहा कि संघ ने भी अब प्रांत की योजना को समाप्त कर दिया और संभाग स्तर पर अपना संगठन को मजबूती देने के लिए कदम आगे बढ़ा चुकी है।

तब अंत में छाछ का आनंद लेते हुए एक नेता ने कहा कि अब तो घर बैठना ही उचित है। अंत में उठते-उठते एक मार्गदर्शक मंडल के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे, नेताजी ने कहा कि उपरोक्त सभी स्लोगन, जो 1980 में दिए गए थे उसे 2014 के बाद विलोपित कर दिए गए हैं।  अंत में सभी ने कहा कि सही दिशा, स्पष्ट नीति घोषित तो नहीं की गई है लेकिन सभी के लिए पार्टी में संकेत लगभग यही है।

विकास की कीमत चुकाता मगरमच्छ

दंतेवाड़ा जिले के बारसूर में एक तालाब को सुंदर बनाने और जिपलाइन प्रोजेक्ट के लिए खाली किया जा रहा है। पानी घटते ही करीब 10 फीट लंबा एक मगरमच्छ अपने प्राकृतिक घर से बेघर होकर बाहर निकल आया। भूख और पानी की तलाश में भटकने लगा।  स्थानीय लोगों में भय व्याप्त हो गया।

सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम पहुंची और जाल बिछाकर उसे पकड़ा। उसे सुरक्षित इंद्रावती नदी में छोड़ दिया गया। तत्काल तो समस्या टल गई लेकिन चिंता बनी हुई है। तालाब में थोड़ा-सा पानी बचा है। प्रोजेक्ट अभी अधूरा है और इस गर्मी में तालाब के फिर से भरने की संभावना भी नहीं दिखती। ऐसे में वहां वर्षों से रह रहे और कई मगरमच्छों का क्या होगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तालाब में पिछले 50 साल से मगरमच्छ रह रहे हैं। बावजूद इसके, पानी निकालने से पहले उनके पुनर्वास की कोई योजना नहीं बनाई गई। शायद इस घटना के बाद बचे हुए मगरमच्छों के प्रति संवेदना जागे।


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