राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : गिड़गिड़ाएं नहीं, सुविधाएं दीजिए
01-Apr-2026 5:49 PM
राजपथ-जनपथ : गिड़गिड़ाएं नहीं, सुविधाएं दीजिए

गिड़गिड़ाएं नहीं, सुविधाएं दीजिए

सूरजपुर जिला मुख्यालय के अस्पताल में गंभीर हालत में पहुंची एक महिला के गर्भस्थ शिशु की जान प्रदेश की महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की गुहार के बाद भी नहीं बचाई जा सकी। गुहार लगाने से बचना भी नहीं था। कथित तौर पर राजवाड़े कह रही थीं कि मेरा ही खून निकाल लो, मगर शिशु की जान बचा लो..। उनके पहुंचने से पहले से पहले परिजन विनती कर रहे थे कि डॉक्टर साहब कुछ करो। कथित तौर पर डॉक्टर ने कहा कि विधायक या मंत्री, चाहे जिसे बुला लो, कुछ नहीं होगा। स्थिति शर्मनाक ही कही जाएगी कि मंत्री जी पहुंच गईं, पर शिशु की जान नहीं बचाई जा सकी। अस्पताल परिसर में गंदगी, बदबू और अव्यवस्था फैली थी। डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों ने संवेदनहीनता दिखाई या नहीं, यह अलग मसला है लेकिन मोटे तौर पर मौत का कारण तो यही सामने आया है कि वहां ब्लड बैंक की सुविधा ही नहीं थी।

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नजर डालें तो यह अचरज में डालने वाली घटना है ही नहीं। मंत्री की मौजूदगी हो, जिला मुख्यालय का अस्पताल हो तब भी। तस्वीर चिंताजनक है, हालात बदतर। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर अभी भी 38 से 44, प्रति हजार जीवित जन्म के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर क्षेत्रों में यह दर और भी ऊंची पाई गई है। केरल जैसे राज्य से तुलना करें तो वहां एक हजार में केवल 5 शिशुओं की मौत होती है। यानी छत्तीसगढ़ के बच्चों के लिए जीवन का जोखिम सात से आठ गुना अधिक है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टरों की भर्ती केवल 28 प्रतिशत हो पाई है। मतलब 72 प्रतिशत पद खाली हैं। असिस्टेंट प्रोफेसरों के 51 प्रतिशत पद खाली हैं, लगभग आधा। यह आम शिकायत है कि आदिवासी जिलों में डॉक्टरों की तैनाती की जाती है, मगर वे वहां कभी-कभार जाते हैं या फिर जाते ही नहीं। नर्स और स्टाफ भी ताला बंद कर गायब रहती हैं। ऐसे मामलों में भी नवजातों और प्रसूताओं की मौत की घटनाएं सरगुजा में हो चुकी हैं। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, जिसे लेकर दावा है कि यह प्रदेश के 2100 से अधिक गांवों में पहुंच रही हैं, कितने काम की हो सकती हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है। जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, जांच बिठाई जाती है, कभी-कभी कुछ लोग सस्पेंड कर दिए जाते हैं, पर जिला अस्पतालों में जांच उपकरण, ब्लड बैंक और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, तैनाती सुनिश्चित करना प्राथमिकता में नहीं है। फिर स्टाफ को चेतावनी दीजिए और सख्त कार्रवाई करिये।

...तो पार्टी में कद बढ़ेगा

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ के भाजपा नेता असम और पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए गए हैं। पश्चिम बंगाल की 56 विधानसभा सीटों के बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रदेश भाजपा महामंत्री (संगठन) पवन साय संभाल रहे हैं।

खास बात यह है कि पश्चिम बंगाल में न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देशभर के भाजपा कार्यकर्ता जुटे हुए हैं। सरकार के आधा दर्जन निगम-मंडल के चेयरमैन फरवरी से ही वहां डटे हुए हैं। अब एक-एक कर कुछ विधायक और पूर्व विधायकों को भी बंगाल बुलाया गया है।

पूर्व मंत्री राजेश मूणत और शिवरतन शर्मा पहले से ही प्रचार में सक्रिय हैं। उनके साथ महासमुंद के विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा, दुर्ग ग्रामीण के ललित चंद्राकर, पूर्व विधायक रजनीश सिंह, मोतीराम चंद्रवंशी सहित दर्जनभर से अधिक विधायक-पूर्व विधायक बंगाल पहुंच चुके हैं।

पार्टी की रणनीति हर मतदाता तक पहुंच बनाने और उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करने की है। हालांकि अभी प्रचार शुरू ही हुआ है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा की घटनाएं काफी होती हैं, जिसे देखते हुए निर्वाचन आयोग नजर बनाए हुए है।

भाजपा के कार्यकर्ता भी सतर्क हैं और एक-दूसरे के संपर्क में बने हुए हैं। चुनाव प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि यदि चुनाव परिणाम अनुकूल आते हैं, तो पार्टी के भीतर उनका कद भी बढ़ेगा। देखना है आगे क्या होता है।

20 महीने का एरियर्स

8 वें केंद्रीय वेतन आयोग ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों से 30 अप्रैल तक नए वेतन-भत्तों को लेकर प्रस्ताव सुझाव मांगे हैं। सभी केंद्रीय व राज्य संगठनों के नेता आयोग की वेबसाइट पर फीडबैक देने में जुट गए हैं। इसी सिलसिले में वेतन भत्तों पर नए फिटमेंट फैक्टर को लेकर केंद्रीय अमले का जो आंकलन है उसके अनुसार, जिन कर्मचारियों का मूल वेतन 50,000 रुपये से कम है, उन्हें सबसे ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है; उन्हें लगभग 20 महीनों का बकाया (एरियर्स) और अलग-अलग फि़टमेंट फ़ैक्टर मिल सकते हैं। शुरुआती स्तर पर, लेवल 1 (18,000 रुपये) के कर्मचारियों को 3.6 लाख रुपये से 5.65 लाख रुपये के बीच भुगतान मिल सकता है, जबकि लेवल 8 (47,600 रुपए) के कर्मचारियों को 9.52 लाख रुपए से लेकर लगभग 14.94 लाख रुपए तक मिल सकते हैं।

फिटमेंट प्रस्तावित वेतन संशोधन में यह फैक्टर ही मुख्य आधार बना हुआ है। जहाँ 7वें वेतन आयोग ने इसे 2.57 पर तय किया था, वहीं समझा जा रहा है कि सरकार 2.0 और 2.57 के बीच के विकल्पों पर विचार कर रही है।

हालाँकि, कर्मचारी यूनियन 3.0 से 3.25 के ऊँचे दायरे की माँग कर रही हैं - एक ऐसा कदम जिससे न्यूनतम मूल वेतन 18,000 रुपये से बढक़र लगभग 54,000 रुपये तक पहुँच सकता है। वेतन आयोग के 10-वर्षीय चक्र के अनुसार, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी, 2026 से लागू होने की संभावना है। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है।


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