राजपथ - जनपथ
जीत का ऐलान, मगर जंग अभी बाकी
देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए आज का दिन ऐतिहासिक है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा नक्सलवाद के पूरी तरह खत्म होने की कल की गई घोषणा के बाद 31 मार्च की सुबह उम्मीद की नई रोशनी लेकर आई है। लेकिन इस तस्वीर में दिखते चेहरे एक अलग ही सच्चाई को बयान कर रहे हैं। जंग बंदूक की खत्म हो गई हो पर भूख, मजबूरी और बुनियादी सुविधाओं की बाकी है।
सोशल मीडिया पर आई यह तस्वीर बीजापुर जिले के जगरगुंडा की है। यह जगह कभी नक्सलियों की अघोषित राजधानी थी। नीली टीन की दीवार के सहारे बैठे और खड़े ये ग्रामीण सुबह 4 बजे अपने गांव करकेगुड़ा से निकले, सरकारी राशन 30 किलो चावल, 1 किलो नमक और थोड़ा सा गुड़ पाने के लिए। ये लोग अब तक इंतजार कर रहे हैं। इस कतार के लिए किसी ने दिनभर की मजदूरी छोड़ी, तो किसी ने उधार लेकर वाहन में सफर किया। यह इंतजार उनके जीवन की कठिनाई का आईना है। नक्सलवाद का खात्मा एक बड़ी कामयाबी है, मगर एक और जंग बाकी है। भूख के खिलाफ, गरीबी, अशिक्षा के खिलाफ, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के खिलाफ।
बीरगांव अब भी ‘गांव’
प्रदेश में गैस की किल्लत चल रही है। सरकार ने रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए नए फरमान जारी किए हैं। इसमें शहरी इलाके में 25 दिन, और गांवों में बुकिंग के बाद 45 दिन में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध होगा। नई व्यवस्था तुरंत लागू भी हो गई है। मगर बीरगांव में एक नया विवाद शुरू हो गया है।
बीरगांव नगर निगम क्षेत्र के रहवासियों को सिलेंडर के लिए 45 दिन का इंतजार करने के लिए कहा गया है। इसको लेकर पिछले दो-तीन दिनों से बीरगांव इलाके के गैस एजेंसी के संचालकों, और उपभोक्ताओं के बीच विवाद चल रहा है। गैस एजेंसी संचालकों ने जिला प्रशासन, और स्थानीय गैस कंपनियों के प्रतिनिधियों से चर्चा की।
गैस कंपनियां बीरगांव को अब भी ग्रामीण क्षेत्र मान रही है। जबकि बीरगांव नगर पालिका से नगर निगम में तब्दील हो चुका है। यहां आबादी भी काफी बढ़ गई है। मगर सहुलियत अब भी ग्रामीण स्तर की है। जबकि बीरगांव नगर निगम के अधीन उरला और सिलतरा औद्योगिक क्षेत्र भी आते हैं। आर्थिक रूप से बीरगांव कई और नगर निगम की तुलना में बेहतर स्थिति में है। मगर गैस कंपनियां मानने के लिए तैयार नहीं है, और उन्हें रसोई गैस के लिए शहर के बजाए ग्रामीण क्षेत्र के लिए तय किए गए नियम मान्य होंगे। यानी सिलेंडर के लिए उन्हें 45 दिन इंतजार करना होगा।
अंबिकापुर से नई विमान सेवा

पिछले दिनों अंबिकापुर से एक नई विमान सेवा की शुरुआत हुई। अंबिकापुर से बिलासपुर, और दिल्ली के अलावा कोलकाता के लिए भी विमान शुरू हुई है। सीएम विष्णुदेव साय ने एलाइंस एयर की नई विमान सेवा का वर्चुअल उद्घाटन किया। सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज दिल्ली, और कोलकाता के लिए शुरू हुई विमान सेवा को अपनी प्रमुख उपलब्धि मान रहे हैं। वो खुद विमान से दिल्ली गए, और यात्रियों को मिठाई भी खिलाई।
पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव भी अंबिकापुर से विमान सेवा के लिए प्रयासरत रहे हैं। करीब सालभर पहले रायपुर-बिलासपुर-अंबिकापुर विमान सेवा शुरू हुई थी। फ्लाई बिग एयर लाइन कंपनी की ये विमान सेवा बमुश्किल तीन महीने ही चली, और फिर बाद में बंद हो गई। अब नए सिरे से रूट तय कर नई कंपनी ने विमान सेवा शुरू की है, लेकिन ये भी लंबे समय तक चलेगी इसको लेकर कुछ लोगों को शंका है। अंबिकापुर-दिल्ली विमान सेवा को लेकर मीडिया में काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया आई थी। पहले दिन ही 72 सीटर विमान फुल नहीं हो पाई। कुल 46 लोग ही दिल्ली के लिए उड़ान भरी। इसमें से 16 यात्री बिलासपुर से आए थे। अंबिकापुर से 30 लोग बैठे। इन सबको देखकर जानकार लोग मान रहे हैं कि ये सेवा भी लंबे समय तक नहीं चल पाएगी। वैसे भी निजी विमानन कंपनियां मुनाफे के आधार पर चलती है। अंबिकापुर से दिल्ली और कोलकाता के लिए रायपुर की तरह पैसेंजर मिलना मुश्किल है। रायपुर से तो दिल्ली के लिए आठ फ्लाइट चलती है, और सभी फुल रहती है। वैसा पेसेंजर रायपुर या बिलासपुर से मिलना मुश्किल है।
कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि बनारस और रांची को जोड़ा जाना चाहिए। तभी अंबिकापुर से विमान सेवा फायदेमंद रहेगी, और लोगों को भी सहुलियत होगी। अंबिकापुर से बनारस और रांची जाने वाली की संख्या काफी अधिक है। देखना है नई सेवा कितने दिन चलती है।
हार्न की जगह, ढेंचू-ढेंचू

दुनिया भर में मंडराते ईंधन संकट ने लोगों की चिंता तो बढ़ा रखी ही है, पर सोशल मीडिया पर ऐसे मौके भी गुदगुदाने, मुस्कान लाने वाले रचनात्मक काम जारी है। ऐसी ही एक तस्वीर फेसबुक में मिली है। एक गधा, जिसकी पीठ पर बाइक की सीट है, हेडलाइट और हैंडल तक फिट कर दिया गया है। सवारी तो गधे की होगी लेकिन फीलिंग बाइक चलाने की मिलेगी। तस्वीर देखकर लोग हिसाब लगाने लगे हैं कि क्या आने वाले दिनों में बाइक की जगह डंकी को दौड़ाना सस्ता पड़ेगा? माइलेज का अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह गधे के मूड और चारे की क्वालिटी पर निर्भर करता है। कुछ लोग इसे गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नया आविष्कार भी बता रहे हैं। वही यूनिवर्सिटी, जिसने हाल ही में नई दिल्ली के एक एआई सम्मेलन में चीनी रोबोट को अपना बताकर प्रदर्शित कर दिया था।
महिला कांग्रेस की गतिविधियां शून्य
कांग्रेस में कोई फैसले में काफी विलंब होता है। इससे पार्टी नेता और कार्यकर्ता निराश भी रहते हैं। ताजा मामला प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति से जुड़ा है।
राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम के इस्तीफे के बाद से महिला कांग्रेस अध्यक्ष का पद खाली है। प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए पार्टी हाईकमान ने प्रक्रिया शुरू की, और पांच महिला नेत्रियों को शॉर्टलिस्ट कर इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया।
इंटरव्यू की जिम्मेदारी महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष अलका लांबा को दी गई थी। जिन नेत्रियों का इंटरव्यू हुआ था उनमें पूर्व विधायक श्रीमती छन्नी साहू, संजारी-बालोद की विधायक संगीता सिन्हा, सिहावा की पूर्व विधायक श्रीमती डॉ. लक्ष्मी ध्रुव, और अन्य दो थे। इन सभी का जनवरी के पहले हफ्ते में इंटरव्यू हुआ था। मगर आज तक अध्यक्ष के नाम घोषित नहीं हो पाए हैं।
चर्चा है कि प्रदेश के बड़े नेताओं ने अध्यक्ष पद के लिए अलग-अलग नामों की सिफारिश की है। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव, और नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने छन्नी साहू को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश की है, तो पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने संगीता सिन्हा का नाम आगे बढ़ाया है। कहा जा रहा है कि बड़े नेता किसी एक नाम पर सहमत नहीं होने के कारण भी नियुक्ति में विलंब हो रहा है।
पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि किसी एक नाम पर सहमति बनाना काफी कठिन होता है। ऐसे में हाईकमान को दखल देकर सीधे नियुक्ति आदेश जारी करना चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसका प्रतिफल यह है कि महिला कांग्रेस की तमाम गतिविधियां ठप पड़ गई है जबकि महिलाओं से जुड़े रसोई गैस किल्लत जैसे मुद्दों पर पार्टी बड़ा माहौल नहीं बना पा रही है।


