राजपथ - जनपथ
हिसाब अभी बाकी है...
अगर पुराना हिसाब-किताब बाकी है, तो आगे उसी व्यक्ति या संस्थान से दोबारा कारोबार करने में दिक्कत होना स्वाभाविक है, यह व्यापार का एक सामान्य नियम है। कुछ ऐसी ही स्थिति से सरकार के एक मंत्री को दो-चार होना पड़ा है।
चर्चा है कि मंत्रीजी अपने करीबियों को प्रदेश के एक पर्यटन स्थल पर घुमाने ले जाने की तैयारी में हैं। वहां कई रिसॉर्ट और होटल मौजूद हैं। मंत्रीजी के कार्यालय से जब बुकिंग के लिए फोन किया गया, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने अपने यहां पहले से कमरे उपलब्ध नहीं होने की बात कह दी।
मंत्रीजी के लिए तो सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरने का इंतजाम हो गया, लेकिन करीबियों के लिए व्यवस्था नहीं होने पर उन्हें एक सरकारी स्कूल में ठहराने का बंदोबस्त करना पड़ा।
अब सवाल उठता है कि कमरे खाली होने के बाद भी होटल और रिसॉर्ट संचालक आनाकानी क्यों कर रहे हैं। इसकी वजह भी दिलचस्प बताई जा रही है। बताते हैं कि कुछ महीने पहले इसी पर्यटन केंद्र में भाजपा का एक बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें बड़ी संख्या में वीवीआईपी पहुंचे थे। उस दौरान सभी होटल और रिसॉर्ट बुक किए गए थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब भुगतान की बारी आई, तो आयोजक पूरा हिसाब चुकाए बिना ही निकल गए। इससे संचालक नाखुश रहे। अब जब मंत्रीजी के करीबियों को ठहराने की बारी आई, तो होटल और रिसॉर्ट संचालकों ने इस बार एक सुर में मना कर दिया।
..तो छत्तीसगढ़ से तरबूज नहीं

खाड़ी देशों से हमारी कार बाइक को रफ्तार देने वाले पेट्रोल डीजल की आवक कम हुई है तो वहां के लोगों के गले को तर करने वाले तरबूज( कलिंदर )की जावक थम गई है। ईरान इजरायल युद्ध की वजह से इसका निर्यात पूरी तरह से बंद हो गया है। इस बार तो सीधे रायपुर एयरपोर्ट के कार्गो प्लेन से निर्यात की भी तैयारी थी। उत्पादन अच्छा होने के बाद भी निर्यात नहीं हो पा रहा है। हालांकि इसका फायदा स्थानीय बाजार को होगा। आम लोगों के लिए दाम अलग गिरेंगे। थोक सब्जी बाजार के अध्यक्ष श्रीनिवास रेड्डी की मानें तो पिछले सीजन में 20-25 हजार रुपए टन बिकने वाला तरबूज इस बार 10 हजार रुपए टन से कम पर आ गया है। रेड्डी के मुताबिक किसानों ने इस बार 10 हजार एकड़ में तरबूज बोया था। जहां प्रति एकड़ 35-38 टन का औसत उत्पादन आंका जाता है। यानी सीजन में कुल 6 लाख टन के आसपास होता। इसकी कीमत 300 करोड़ होती। लेकिन किसानों की मेहनत पर पेट्रोल छिडक़ दिया गया। यह सही है कि देश का बाजार 100 करोड़ लोगों का है लेकिन गिरे हुए भाव में बेचना होगा। उसके लिए भी अन्नदाता किसान को कारोबारियों की चिरौरी करनी पड़ रही है जो आपदा को अवसर बना कर औने पौने दाम में बेचने मजबूर कर रहे हैं। तरबूज उत्पादक किसानों का कहना है कि फरवरी के पहले सप्ताह 17 हजार रुपए के ऊंचे भाव में 100 ट्रक माल निर्यात हुआ था। उसके बाद से इतनी बड़ी खेप अब तक बुक नहीं हुई है, और तो और अधिक मांग वाले मुंबई, पुणे नासिक से भी आर्डर कम हो गया है। जबकि गर्मी अब अपने उच्चतम तापमान की ओर बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ के तरबूज उत्पादकों को अब स्थानीय बाजार का ही सहारा है। यही वजह है कि मुख्य बाजार के साथ शहरों के आवासीय कालोनी, हाइवे के किनारे तरबूज भरे छोटा हाथी, तूफान, ट्रेक्स,मेटाडोर देखे जा सकते हैं।
छुट्टियों पर राजनीति जरूर होती है...
सरकारी दफ्तरों में पांच दिवसीय सप्ताह के बीच सोमवार और शुक्रवार को पडऩे वाली छुट्टियों का बड़ा महत्व हो जाता है। कर्मचारियों के लिए ये राहत और निजी जीवन के संतुलन का अवसर होते हैं। शुक्रवार को अवकाश मिल जाए तो तीन दिन का लंबा वीकेंड, और सोमवार को छुट्टी हो तो चार दिन का। इस महीने के आखिरी दिनों में दो बड़े पर्व राम नवमी और महावीर जयंती ऐसे अवसर लेकर आए थे, जो कर्मचारियों को लंबा अवकाश दे सकते थे। लेकिन राज्य स्तर पर छुट्टियों का निर्धारण कुछ अलग तरह से हो गया।
राम नवमी की छुट्टी गुरुवार को घोषित की गई, जबकि कई कर्मचारी संगठनों का तर्क था कि वास्तविक उत्सव शुक्रवार को मनाया जा रहा है। इसी तरह महावीर जयंती का अवकाश मंगलवार को तय हुआ। परिणाम यह हुआ कि छुट्टियां बिखरी-बिखरी रहीं और कर्मचारियों को लगातार अवकाश का लाभ नहीं मिल पाया।
हालांकि कई कर्मचारी व्यवस्था के बीच रास्ता निकालने में माहिर होते हैं। उन्होंने दो दिन का वैयक्तिक अवकाश लेकर पांच दिन की छुट्टी का इंतजाम कर लिया। लेकिन यह जुगाड़ हर किसी के लिए संभव नहीं होता। खासकर उन कर्मचारियों के लिए, जिनकी छुट्टियां सीमित हैं या काम का दबाव अधिक है।
उधर पड़ोसी मध्यप्रदेश सरकार ने अपेक्षाकृत लचीला रुख अपनाया। वहां राम नवमी की छुट्टी को गुरुवार से बदलकर शुक्रवार कर दिया गया। महावीर जयंती का अवकाश भी मंगलवार से खिसकाकर सोमवार कर दिया गया।
छत्तीसगढ़ में कर्मचारी संगठनों ने अपने स्तर पर ज्ञापन सौंपे, लेकिन उनकी मांगों का असर नहीं दिखा। मगर, मध्यप्रदेश में कर्मचारियों ने राजनीतिक हस्तक्षेप का महत्व समझा। वहां के विधायकों ने छुट्टियों को बदलने के लिए मुख्यमंत्री को चि_ी लिखी। वहां मुख्यमंत्री ने सहमति दे दी। कर्मचारियों को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के विधायकों का साथ मिला।
वैसे छुट्टियों पर चर्चा करते हुए एक और बहस का एक और पक्ष हमेशा खुल जाता है। आम जनता अक्सर यह सवाल उठाती है कि सरकारी कर्मचारियों को आखिर इतनी छुट्टियां क्यों? राज्य बनने के बाद से कई ऐसे सार्वजनिक अवकाश घोषित किए जा चुके हैं, जिसका मकसद राजनीतिक फायदा उठाना है।



