राजपथ - जनपथ
माओवाद के अंत में सिर्फ 13 दिन बाकी?
आज 17 मार्च है। बस्तर से माओवाद के खात्मे के लिए तय डेडलाइन 31 मार्च में अब सिर्फ 13 दिन बाकी रह गए हैं। बस्तर माओवादियों के रेड कॉरिडोर की सबसे मजबूत कड़ी था। अब यह निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पहली बार केंद्र सरकार ने माओवादी हिंसा को पूरी तरह खत्म करने के लिए समयसीमा तय की और उसी के अनुरूप सुरक्षा बलों ने रणनीति, संसाधन और ऑपरेशन के स्तर पर तालमेल दिखाया है।
फरवरी 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने यह डेडलाइन घोषित की थी। इसके बाद सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी और छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ तेलंगाना की स्पेशल इंटेलिजेंस यूनिट ने मिलकर बस्तर के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा के ऐसे कठिन इलाकों में घुसकर वह काम किया, जो दशकों तक संभव नहीं हो पाया था। अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्र में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित भी किया गया।
इसके अलावा आधुनिक हथियार मोर्टार, यूबीजीएल, एके-47, ड्रोन, थर्मल इमेजर के साथ इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत किया गया। इसके चलते ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अधिक नुकसान नहीं उठाना पड़ा। ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट ने माओवादियों को उनके सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकलने और सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया। अब हजारों की संख्या में माओवादी हथियार डाल चुके हैं।
इसी दौरान कई दुर्गम इलाकों में सडक़ें बनीं, मोबाइल टावर पहुंचे। जिन गांवों में पहले शासन का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा था, वहां अब लोगों की समस्याओं को सुना जा रहा है। इससे स्थानीय युवाओं का सरकार पर भरोसा बढ़ा और माओवादी भर्ती पर असर पड़ा। डेडलाइन की घोषणा के बाद हिंसा की घटनाओं और मौतों में 80-85 प्रतिशत तक गिरावट बताई जा रही है। संगठन का शीर्ष नेतृत्व या तो खत्म हो चुका है या लगातार भाग रहा है।
अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या अगले 13 दिनों में यह अभियान पूरी तरह अपने लक्ष्य तक पहुंच पाएगा। पूरी तरह खत्म हो न हो, यह तो कहा जा सकता है कि माओवादी आंदोलन अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
चुनाव पर्यवेक्षक यानी ‘वर्किंग टूर’ भी
पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ प्रशासनिक हलचल भी तेज हो गई है। नेताओं के साथ अब अफसर भी चुनावी जिम्मेदारियों के लिए मैदान में उतर रहे हैं। प्रदेश के 30 आईएएस और आईपीएस अफसरों को हाल ही में ट्रेनिंग दी गई थी, जिनमें 5 आईपीएस शामिल थे।
ताजा स्थिति यह है कि 12 आईएएस और 3 आईपीएस अफसरों को चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है। आईपीएस अफसरों में डॉ. अजय यादव, बद्रीनारायण मीणा और अंकित गर्ग को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। सभी अफसर अपने-अपने प्रभार वाले राज्यों के लिए रवाना हो रहे हैं।
जिन अफसरों की ड्यूटी नहीं लगी है, वे फिलहाल राहत महसूस कर रहे हैं। आमतौर पर चुनाव ड्यूटी को काफी चुनौतीपूर्ण और बोझिल माना जाता है, खासकर पश्चिम बंगाल जैसे संवेदनशील राज्यों में। यही वजह रही कि कुछ अफसरों ने ड्यूटी से बचने की कोशिश भी की।
हालांकि, चुनाव आयुक्त ने ट्रेनिंग के दौरान स्पष्ट किया था कि चयन पूरी तरह योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर किया गया है। इसके बावजूद कई अफसर पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आए।
दिलचस्प बात यह है कि सभी अफसर चुनाव ड्यूटी से बचना नहीं चाहते। कुछ ऐसे भी रहे हैं जो खुद इस जिम्मेदारी के लिए उत्सुक रहते थे। पूर्व आईएएस एस.एल. रात्रे का नाम भी ऐसे ही अधिकारियों में लिया जाता है, जो चुनाव पर्यवेक्षक बनने में खास रुचि रखते थे। उनके बारे में यह भी चर्चा रही कि जहां भी उनकी ड्यूटी लगी, वहां स्थानीय प्रशासन ने उनका विशेष स्वागत-सत्कार किया।
वहीं, इस बार भी कुछ अफसरों में उत्साह देखा जा रहा है, खासकर उन लोगों में जिन्हें केरल जैसे खूबसूरत राज्य में पर्यवेक्षक बनने का मौका मिला है। उनके लिए यह जिम्मेदारी के साथ-साथ एक तरह का ‘वर्किंग टूर’ भी बन गया।
फ्लाईओवर की मुखालफत..

रायपुर में तात्यापारा से शारदा चौक तक प्रस्तावित फ्लाईओवर को लेकर राजनीतिक और व्यावसायिक हलकों में विरोध के स्वर तेज होते दिख रहे हैं। सरकार ने भले ही इस महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी दे दी हो, लेकिन जमीन पर इसे लागू करना आसान नहीं नजर आ रहा। वर्तमान में शारदा चौक के आगे स्काईवॉक का निर्माण कार्य जारी है, जिसकी वजह से इलाके में लगातार जाम की स्थिति बनी रहती है। इसी के चलते स्थानीय व्यापारी संगठनों में नाराजगी बढ़ रही है और वे फ्लाईओवर योजना का विरोध कर रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन खड़ा होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति सहज नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल इस योजना से असहमत बताए जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। कहा जा रहा है कि वे इस मसले पर सीएम विष्णु देव साय और डिप्टी सीएम अरुण साव से चर्चा कर सकते हैं।
अब देखना होगा कि सरकार विरोध के बीच इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है, या फिर स्थानीय दबाव के चलते इसमें कोई बदलाव किया जाता है।
ट्रेन आने की भ्रामक घोषणा

गोंदिया रेलवे स्टेशन की तस्वीर है। देर रात शिवनाथ एक्सप्रेस का इंतजार करते हुए एक यात्री ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट शेयर की है। डिस्पले में दिखाया जा रहा है कि ट्रेन 1 बजकर 48 मिनट पर पहुंचेगी। वह समय कब का बीत चुका। प्लेटफॉर्म पर लगी घड़ी बता रही है कि समय रात के 2 बजकर 6 मिनट हो चुके हैं। 1.48 बजे ट्रेन पहुंची ही नहीं, काफी देर बाद प्लेटफॉर्म आई। पर रेलवे का इलेक्ट्रॉनिक नोटिस बोर्ड उसी पर अटका रहा।


