राजपथ - जनपथ
सामान बदलने के पहले पढ़ें
ओडिशा के पत्रकार प्रिय रंजन साहू ने फेसबुक पर एक दिलचस्प जानकारी पोस्ट की है, जो कि बिना जरूरत सामान बदलने वालों के लिए सीख हो सकती है।
‘कल्याण फार्मा, संबलपुर की सबसे पुरानी दवा की दुकानों में से एक, शहर की-शायद ओडिशा की-सबसे पुरानी फ्रिज का दावा कर सकती है। 1960 में संस्थापक स्वर्गीय चित्तरंजन पांडा ने खरीदी अल्विन प्रेस्टकोल्ड फ्रिज आज भी चालू है। मालिकों ने इसे नया क्यों नहीं बदला? ‘दो वजहें हैं,’ पांडा के बेटे आलोक पांडा कहते हैं। ‘पहली, इसने कभी एक बार भी हमें धोखा नहीं दिया।
ये बिना रखरखाव वाली है और नए फ्रिजों को आसानी से हरा सकती है। दूसरी, प्रेस्टकोल्ड रखना हमारे लिए सम्मान की बात है। लगता है जैसे हमने कोई विरासत खरीदी हो।’
महिला-आदिवासी संतुलन की राजनीति
प्रदेश से राज्यसभा के लिए फूलोदेवी नेताम को दोबारा मौका मिलने के पीछे केवल औपचारिक राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि कई तरह के समीकरण भी काम करते दिखाई दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे कांग्रेस की दूसरी ऐसी महिला नेत्री बन गई हैं जिन्हें राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ से दूसरी बार राज्यसभा जाने का अवसर मिल रहा है। इससे पहले मोहसिना किदवई प्रदेश से दो बार राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं।
बताया जाता है कि इस बार प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं—पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने मिलकर पार्टी नेतृत्व को यह समझाया कि राज्यसभा के लिए स्थानीय चेहरे को मौका दिया जाना चाहिए। दरअसल, कांग्रेस के तीन राज्यसभा सदस्य ऐसे हैं जो कि प्रदेश से बाहर के हैं इनमें से केटीएस तुलसी का कार्यकाल खत्म हुआ है। अभी भी रंजीत रंजन और राजीव शुक्ला प्रदेश से बाहर के हैं। इसलिए स्थानीय प्रतिनिधित्व का सवाल भी उठ रहा था।
जब प्रत्याशी तय करने की चर्चा आगे बढ़ी, तो एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। राज्यसभा में कांग्रेस की महिला सांसदों की संख्या सीमित है। अभी पार्टी की ओर से पांच महिला सदस्य हैं—सोनिया गांधी, रंजीत रंजन, रजनी पाटिल, जेबी माथेर और फूलोदेवी नेताम। अगर फूलोदेवी का कार्यकाल खत्म हो जाता और उन्हें दोबारा मौका नहीं मिलता, तो यह संख्या घटकर चार रह जाती।
यहीं पर एक और राजनीतिक गणित सामने आया। राज्यसभा में कांग्रेस के कुल 27 सदस्य हैं, लेकिन आदिवासी समुदाय से सिर्फ दो सांसद थे—फूलोदेवी नेताम और गुजरात से नरेनभाई राठवा। दोनों का कार्यकाल लगभग साथ ही समाप्त हो रहा था। अगर दोनों को ही दोबारा मौका नहीं मिलता, तो राज्यसभा में कांग्रेस का कोई भी आदिवासी सांसद नहीं रह जाता।
चर्चा है कि पार्टी रणनीतिकारों ने इसी पहलू पर काफी विचार किया। आखिरकार फूलोदेवी नेताम के नाम पर सहमति बनी। इस फैसले से पार्टी एक साथ दो संदेश देने में सफल हो गई, महिला प्रतिनिधित्व भी बना रहा और आदिवासी चेहरा भी। चूंकि नरेनभाई राठवा को पार्टी ने दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया, इसलिए अब राज्यसभा में कांग्रेस की ओर से आदिवासी प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी अकेले फूलोदेवी नेताम के कंधों पर ही रहेगी।
स्पीकर की वापसी, लेकिन अभी विश्राम

इधर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह कोयंबटूर में स्पाइन सर्जरी कराने के बाद रायपुर लौट आए हैं। शुक्रवार को वे कोयंबटूर से रायपुर पहुंचे। माना एयरपोर्ट पर नीति आयोग के नए उपाध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा ने उनका स्वागत किया और डॉ. सिंह ने उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए बधाई दी।
हालांकि विधानसभा का सत्र 9 मार्च से शुरू होने जा रहा है, लेकिन डॉक्टरों की सलाह के चलते डॉ. सिंह फिलहाल सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे। वे कुछ समय तक विश्राम पर रहेंगे। ऐसे में सदन की आगे की कार्यवाही सभापति द्वारा संचालित की जाएगी। विधानसभा में अब विभागवार बजट चर्चा का दौर शुरू होने वाला है और सत्र 20 मार्च तक चलेगा। आने वाले दिनों में विपक्ष के तीखे तेवर के चलते सदन की कार्रवाई हंगामेदार रहने के आसार हैं।
बड़े काम का गधा
जो व्यक्ति कोई काम न करता हो तो उसे गधा कहकर नकारात्मक छवि बना दी जाती है। लेकिन गधा (जानवर) बड़े काम का होता है। बोझ ढोने से लेकर पैसे कमाने आधुनिक स्टार्ट अप तक के लिए उपयोगी हो गया है। अब पशुपालन क्षेत्र में एक अनोखा स्टार्टअप करोड़पति बना सकता है। यह बात कर होली मिलन के एक कार्यक्रम में पशुधन विकास विभाग के अधिकारी ने शेयर किया।
दरअसल भारत में गधों की संख्या में आई भारी गिरावट सरकार के लिए चिंता का विषय है। 2019 की 20वीं पशुगणना के आंकड़ों के अनुसार, देश में अब मात्र 1.23 लाख गधे ही शेष बचे हैं। साल 2012 से अब तक इनकी आबादी में करीब 60 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
केंद्र सरकार ने आबादी को बचाने और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत एक बड़ी योजना शुरू की है। इस योजना के जरिए गधा पालन शुरू करने वाले उद्यमियों को सरकार 50 लाख रुपए तक की भारी-भरकम सब्सिडी मुहैया करा रही है। 1 करोड़ के प्रोजेक्ट पर 50 लाख की मदद देगी।
राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत एक व्यक्ति, किसान उत्पादक संगठन , स्वयं सहायता समूह, संयुक्त देयता समूह और धारा-8 कंपनियां आवेदन कर सकती हैं। योजना के मुताबिक गधे पालन के प्रोजेक्ट की कुल लागत का 50 फीसदी हिस्सा सरकार सब्सिडी के तौर पर देगी।
एक यूनिट में कम से कम 50 मादा और 5 नर गधों का होना आवश्यक है। यह लाभ केवल भारतीय मूल (स्वदेशी) की नस्लों पर ही देय है, विदेशी नस्लों पर नहीं। गधों के दूध और अन्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार इसे एक मुनाफे वाले बिजनेस मॉडल के रूप में प्रमोट कर रही है।


