राजपथ - जनपथ
अमरूद खा लेने पर शो कॉज नोटिस
सरकारी दफ्तरों में निचले स्तर के कर्मचारियों पर किस तरह औपचारिक, कठोर और कई बार असंवेदनशील कार्रवाई की जाती है, उसे समझने के लिए एक नोटिस और उसके जवाब पर नजर डालते हैं।
राज्य आपदा मोचन बल लखनऊ के सूबेदार ने ड्यूटी पर तैनात एक गार्ड को नोटिस जारी किया। इसमें लिखा कि जिन पांच दिनों में आप कमांड हाउस में ड्यूटी पर थे, वहां आपकी तैनाती की जगह के ठीक सामने अमरूद का पेड़ है। यहां से अमरूद तोडऩे वाले को न तो रोका, न ही अमरूद तोड़े जाने की सूचना ही आपने अपने किसी उच्च अधिकारी को दी। यह कृत्य लापरवाही है, अनुशासनहीनता को दर्शाता है, कर्तव्य के प्रति शिथिलता और मनमानी का परिचायक है।
अफसर ने गार्ड से लिखित स्पष्टीकरण मांगा ताकि उचित कार्रवाई नियमानुसार की जा सके।
गार्ड ने जवाब में क्या लिखा? उसने लिखा 05 जनवरी की रात स्पेशल खाने में पनीर की गुणवत्ता सही नहीं थी। इसके कारण उन्हें तेज पेट दर्द होने लगा। छुट्टियों पर रोक लगी थी, इसलिए वे डॉक्टर को नहीं दिखा सके। उन्होंने यूट्यूब पर देखा था कि अमरूद खाने से पेट दर्द में राहत मिलती है और इसी कारण उन्होंने अमरूद खाया। साथ ही उसने स्वीकार किया कि यह उसकी पहली गलती है। वे भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करेंगे। गार्ड ने क्षमा की प्रार्थना भी की।
इस जवाब को आप चालाकी भरा मान सकते हैं लेकिन है बचाव के लिए कानूनी भाषा से भरी हुई है। बीमार कर्मचारी अपनी गलती भी मान रहा है और बता रहा है कि मामला उसकी सेहत का होने के बावजूद छुट्टी लेने में वह असमर्थ था, क्योंकि उसे इसकी इजाजत ही नहीं थी।
पता नहीं, गार्ड के जवाब से सूबेदार संतुष्ट हुआ या नहीं। मगर, गार्ड ने उनके लिए कुछ सवाल जरूर छोड़ दिए- क्या पेट दर्द से परेशान हो जाने पर सामने के पेड़ से अमरूद तोड़ लेना अनुशासन तोडऩा है? पेट दर्द के बावजूद डॉक्टर तक नहीं पहुंच पाने पर उसे ड्यूटी के प्रति जिम्मेदार और प्रताडि़त माना जाए या लापरवाह? इससे ऊपर क्या ऐसे मामले में नोटिस जारी भी किया जाना चाहिए? आखिरी सवाल, आखिर उस अमरूद के पकने का इंतजार कौन कर रहा था?
बृजमोहन, सरकार, और संगठन
स्काउट्स एंड गाइड्स के राज्य इकाई के अध्यक्ष पद से हटाने के खिलाफ सांसद बृजमोहन अग्रवाल अपनी ही सरकार के खिलाफ कोर्ट चले गए हैं। हाईकोर्ट ने बृजमोहन की याचिका पर राज्य सरकार को जवाब-तलब भी किया है। चर्चा है कि बृजमोहन के तेवर से सरकार असहज जरूर है, लेकिन वो कोर्ट के बाहर प्रकरण को निपटाने में रूचि नहीं दिखा रही है।
डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने तमाम विवादों पर बृजमोहन से चर्चा की थी, लेकिन विवाद नहीं सुलझा। इन सबके बीच पार्टी के राष्ट्रीय सह महामंत्री (संगठन) बी सतीश रायपुर आए थे। बृजमोहन ने उन्हें मंगलवार को अपने निवास चाय पर आमंत्रित किया। दिल्ली जाने से पहले सतीश, रायपुर सांसद के निवास करीब आधा घंटा रुके, और कहा जा रहा है कि बृजमोहन ने तमाम विवादों पर अपना पक्ष रखा।
हल्ला है कि पार्टी संगठन, बृजमोहन के रूख से सहमत नहीं है। कुछ इसी तरह का विवाद छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ से भी जुड़ा हुआ है। संघ में कार्यकारी अध्यक्ष पद पर बृजमोहन की नियुक्ति का प्रस्ताव पारित किया गया था। ओलंपिक संघ के अध्यक्ष सीएम विष्णुदेव साय हैं। वन मंत्री केदार कश्यप, और बृजमोहन अग्रवाल उपाध्यक्ष हैं। मगर कार्यकारी अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का आदेश नहीं निकल पाया। अब सतीश से अनौपचारिक मुलाकात के बाद बृजमोहन के समर्थकों को तमाम विवादों का निपटारा होने की उम्मीद है। देखना है आगे क्या होता है।
आवारा कुत्तों पर सोशल मीडिया का नजरिया
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ की अगुवाई वाली बेंच ने राज्यों और स्थानीय निकायों को चेतावनी देते हुए कल कहा कि हर डॉग बाइट, विशेष रूप से बच्चों या बुजुर्गों पर हमले के मामले में, भारी मुआवजा लगाया जाएगा। साथ ही, कुत्तों को फीड करने वालों की जिम्मेदारी तय करते हुए कहा कि अगर वे कुत्तों से इतना प्यार करते हैं, तो उन्हें घर ले जाएं, सडक़ों पर न छोड़ें जहां वे लोगों को काटते या डराते घूमें। कोर्ट ने कहाहर मौत या चोट के लिए राज्य को भारी जुर्माना भरना पड़ेगा, और फीडर्स भी जिम्मेदार होंगे। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी बहस छेड़ दी है।
डॉग लवर्स और एनिमल एक्टिविस्ट्स की ओर से फैसले पर कड़ी आलोचना आई। एक उपयोगकर्ता स्वप्निल शिव ने गंभीर टोन में लिखा है कि फीडिंग को अपराध बताना गलत है। कहा है कि कृष्ण की इस भूमि पर दया का कार्य अपराध कैसे? सभी कुत्ते नहीं काटते, सिर्फ हमलावरों को सजा दो। कुछ यूजर्स ने रोचक तरीके से तंज कसा है। जैसे एक ने लिखा कि कुत्तों को घर ले जाना आसान नहीं, लेकिन इंसानों की सुरक्षा भी जरूरी है। एनिमल लवर्स ने तर्क दिया है कि समस्या कुत्तों में नहीं, बल्कि स्टेरलाइजेशन और वैक्सीनेशन की कमी में है। वे कोर्ट के घर ले जाओ वाले बयान को अव्यावहारिक बताते हैं। वे कह रहे हैं कि इससे आवारा जानवरों की समस्या और बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, फैसले का जोरदार स्वागत भी करने वाले लोग हैं। ञ्चक्च4क्रड्डद्मद्गह्यद्धस्द्बद्वद्धड्ड बाई राकेश सिंहा हैंडल पर जज के वक्तव्य को उत्कृष्ट बयान कहा गया है। उन्होंने लिखा है कि कुत्तों का काटना जीवनभर का दाग छोड़ता है, फीडर्स घर ले जाएं। फौजदार नाम के हैंडल पर लिखा गया है कि अगर इतना प्यार है तो घर ले जाओ, सडक़ों पर वर्चुअल सिग्नलिंग बंद करो। इंसान पहले, पूंछ बाद में।
अलजेब्रा आईएनडी की पोस्ट में 1800 लाइक्स आए, जहां लिखा गया कि हर बाइट के लिए जिम्मेदारी तय होगी। सनातन प्रभात ने लिखा है- सार्वजनिक सुरक्षा पहले, रोमांटिसाइजेशन बंद करो। कुल मिलाकर, एक्स पर लोगों का निष्कर्ष विभाजित लेकिन समर्थन की ओर झुका हुआ लगता है। अधिकांश पोस्ट्स मानते हैं कि यह लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान है। एनिमल लवर्स इसे जानवरों के प्रति क्रूरता मानते हैं, लेकिन नियंत्रण समर्थक इसे मानव अधिकारों की जीत बताते हैं।
सहकारी बैंकों में भर्ती की तैयारी
प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों में अध्यक्ष, और उपाध्यक्ष पद पर नियुक्तियां हुई है। नवनियुक्त पदाधिकारियों की रविवार को पार्टी दफ्तर कुशाभाऊ ठाकरे परिसर में बैठक हुई। ये पदाधिकारी, सहकारिता मंत्री केदार कश्यप से मिलने आए थे, लेकिन उनके राजधानी से बाहर होने की वजह से मुलाकात नहीं हो पाई। दो-तीन दिनों में बैंक पदाधिकारी, सहकारिता मंत्री से मिलेंगे।
मुलाकात की बड़ी वजह यह है कि रायपुर और एक-दो बैंकों को छोडक़र बाकी बैंक घाटे में हैं। रायपुर सहित कई बैंकों में कर्मचारियों की भारी कमी है। धान खरीदी की वजह से बैंकों पर काफी दबाव है। नव नियुक्त पदाधिकारी चाहते हैं कि सरकार, बैंकों में भर्तियों की अनुमति दें। यही नहीं, अंबिकापुर सहित कुछ बैंकों में भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतें आई है। जांच भी चल रही है। बैंक पदाधिकारी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रभावी कार्रवाई हो। इसके अलावा खुद की सुविधाएं बढ़ाने की भी मांग है। देखना है कि नवनियुक्त पदाधिकारियों की मांगों पर सरकार क्या फैसला लेती है।


