महासमुन्द

सांकरा में बाबा साहब की याद में संचालित है 800 पुस्तकों का नि:शुल्क पुस्तकालय
14-Apr-2026 2:39 PM
सांकरा में बाबा साहब की याद में संचालित है  800 पुस्तकों का नि:शुल्क पुस्तकालय

दानदाताओं के सहयोग से प्रतिभाओं को निखारने का काम हो रहा

आज अम्बेडकर जयंती पर विशेष

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

महासमुंद,14अप्रैल। महासमुंद जिले के ग्राम सांकरा में पिछले साल 20 अप्रैल 2025 को एक पुस्तकालय खोलकर उसका नाम डॉ. भीमराव अम्बेडकर दिया गया। यह पुस्तकालय नि:शुल्क है और विद्यार्थी से लेकर कोई भी इंसान यहां बैठकर अपने पसंद की किताबें पढ़ सकते हैं। वर्तमान में स्कूल कालेज पढ़ रहे कई छात्र बैठकर यूपीएससी और सीजीपीएससी की तैयारी कर रहे हैं। यहां वर्तमान में 800 किताबें हैं जो किसी न किसी सज्जन द्वारा दान में दी गई हैं।

ऐसा नहीं है कि यहां केवल सांकरा वालों ने ही किताबें दान में दी हैं बल्कि बिलासपुर, नागपुर, रायपुर और दुर्ग के लोगों ने किताबें दान में दी हैं। यहां आए दिन विद्यार्थियों को किताबों की ओर रुझान खातिर तरह-तरह के कार्यक्रम भी होते हैं ताकि नई पीढ़ी के लिए भी यह रुचिकर बना रहे। इस पुस्तकालय के फाउंडर मेम्बर डॉ. हरे कृष्ण प्रधान रायपुर और सांकरा निवासी अविनाश चंद्र साहू दिशा में काम कर रहे हैं कि किसी तरह युवाओं का ध्यान मोबाइल आदि से हटकर किताबों की ओर हो।    

दानदाता डॉ. तपन बोडले नागपुर, डॉ. रुपेश रामटेके नागपुर, डॉ. अजय पांडेय बिलासपुर, डॉ. प्राजंंंंंंंंंंंल प्रधान रायपुर तथा विजय पांडेय दुर्ग का कहना है -हमारे छोटे से प्रयास से एक नया पुस्तकालय डॉ.भीमराव अम्बेडकर पुस्तकालय स्थापित किया गया है। यह स्थान केवल किताबों का नहीं, विचारों और कल्पनाओं के उड़ान का भी होगा। डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि ज्ञान का विकास मानव की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है और पुस्तकालय उसकी आधारशिला है। अत:हम दिल से चाहते हैं कि खासकर युवा वर्ग हमारी भावनाओं को समझें और आगे राज्य स्तर और देश स्तर की पढ़ाई की तैयारी यहां बैठकर करें।

पुस्तकालय के फाउंडर मेम्बर डॉ. हरेकृष्ण प्रधान का सांकरा में एक क्लिनिक है और वे डॉ. भीमराव अम्बेडकर से काफी प्रभावित हैं। उनका मानना है कि किताबों से दोस्ती करने वालों की मंजिल ही अलग है। आजकल ेयुवा वर्ग, बच्चे सभी मोबाइल में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। एक नया नशा का नाम मोबाइल है। पुस्तकालय खोलने का मतलब यह भी था कि लोग मोबाइल के बजाय पुस्तकों से दोस्ती करे और अथाह ज्ञान प्राप्त करे। यह जानते हुए भी कि अब लोगों का रुझान किताबों की ओर न के बराबर है ,फिर भी एक कोशिश है कि हम युवाओं को अदृश्य दुनिया से वास्तविक दुनिया की ओर लाएं। हम स्कूली बच्चों पर ज्यादा फोकस करते हैं। उनके लिए भाषण प्रतियोगिता आदि भी आयोजित करते हैं। उन्हें पुस्तकालय से जोड़े रखने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। बच्चे हमारे कार्यक्रमों में शामिल होते भी हैं। हमें पता है कि कोशिशें सफल होती हैं।


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