धमतरी, 17 जनवरी। जिला समग्र शिक्षा और अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में धमतरी शहर स्थित धनकेशरी मंगल भवन में प्रख्यात साहित्यकार स्व.श्रीकांत वर्मा के रचित कहानी ‘दुपहर’ का मंचन हुआ, जिसे देखने पहुंचे शिक्षकों के अलावा तमाम दर्शकों ने खूब सराहा।
इस नाटक च्दुपहरज् में बचपन और किशोरावस्था की मन: स्थितियों का रोचक अनुभव दिखाया गया है.
विहान ड्रामा वर्क्स भोपाल के निर्देशक सौरभ अनंत ने कवि स्व. श्रीकांत वर्मा का 35 साहित्य पढऩे के बाद तीन कहानियों ‘दुपहर’ , ‘संकर’ व ‘चॉकलेट’ को मंचन हेतु चयनित किया था।
यह नाटक मूलत: बचपन और किशोरावस्था की मन:स्थितियों का रोचक अनुभव कराता है। जिसमें केंद्रीय पात्र बिगुल और कप्तान दो लडक़े हैं जो स्कूल से भागकर नदी किनारे जाने के लिए निकले हैं।

इस नाटक में ऐसे कई संवाद ऐसे हैं जो शिक्षा की गहराई को समझने के लिए काफी है. जैसे ‘ यहाँ पे खुद से आकर निशाना लगाना सीखना पड़ता है. कोई मासाब नहीं आते सीखाने, समझा’ यानी यह नाटक यह भी कहता है कि सीखने को स्कूल या कॉलेज की चारदीवारी तक सीमित नहीं किया जा सकता, ख़ास तौर पर साहस और प्रयोगशीलता जैसे गुणों की शिक्षा को। इसमें कप्तान की भूमिका शुभम कटियार और बिगुल की भूमिका रुद्राक्ष भायरे ने निभाई। दोनों अभिनेताओं ने अपने सहज और रंग भरे अभिनय से दर्शकों को प्रभावित किया।
इस नाट्य प्रस्तुति में गिटारिस्ट स्नेह विश्वकर्मा,गीत, गायक व संगीत निर्देशन निरंजन कार्तिक, रूपसज्जा, वेशभूषा एवं रंग सामग्री श्वेता केतकर, तकनीकी सहायक कार्तिकेय नामदेव, अभिनय प्रशिक्षण व सहायक निर्देशक श्वेता केतकर, प्रकाश परिकल्पना, नाट्य रूपांतरण व निर्देशक सौरभ अनंत का योगदान रहा।
नाटक के अंत में सवाल जवाब का भी एक सेशन हुआ.
श्रीकांत वर्मा जी की ‘दुपहर’ कहानी का नाट्य मंचन
कथासार -
बिगुल और कप्तान दो लडक़े हैं जो स्कूल से छुट्टी मारकर भाग निकले हैं। कप्तान एक ऐसा लडक़ा है जो पाँचवी कक्षा में दो बार फेल हो चुका है। उससे कम उम्र का बिगुल अब उसकी कक्षा में आ गया है। कप्तान उसका असली नाम नहीं है। वह सबसे पीछे की पंक्ति में बैठता है। वह निडर है, उद्दंड भी उसका मन हमेशा स्कूल के बाहर ही भागता है। उसे हर शिक्षक से डाँट और मार पड़ती है, मगर वह रोता बिल्कुल नहीं। इसीलिए उसके सहपाठी उसे कप्तान पुकारते हैं। बिगुल भी कप्तान को अपना हीरो मानता है। वह कप्तान से दोस्ती करना चाहता है। आज कप्तान बिगुल को स्कूल से भगाकर ले आया है। बिगुल में बहुत सारी झिझक और डर है। उसने स्कूल से आगे की दुनिया कभी देखी ही नहीं।
यही वजह है कि उसे कप्तान का साथ अच्छा लगता है और उसमें आत्मविश्वास भर उठता है। बिगुल नदी देखना चाहता है। कप्तान उसे खेतों, टीलों, मंदिरों और क़ब्रिस्तान के रास्ते नदी तक ले जाता है। बिगुल के सामने अब एक नदी है, जिसे जीवन में पहली बार वह देख रहा है। धीमे धीमे बहती, गुनगुनाती, हवा के संग खेलती नदी । वह मंत्रमुग्ध सा खड़ा उसे देखता रह जाता है। तभी कप्तान पानी में कूद पड़ता है। बिगुल उसे पुकारता रहता है। जैसे वह ख़ुद को ही पुकार रहा हो। यह कहानी बचपन और किशोरावस्था की मन:स्थितियों के रोचक अनुभव दिखा है।
पात्र परिचय -
1. कप्तान -शुभम कटियार
2. बिगुल - रुद्राक्ष भायरे
गिटारिस्ट -स्नेह विश्वकर्मा
गीत, गायक व संगीत निर्देशन - निरंजन कार्तिक
रूपसज्जा, वेशभूषा एवं रंग सामग्री,-श्वेता केतकर
तकनीकी सहायक -कार्तिकेय नामदेव
अभिनय प्रशिक्षण व सहायक निर्देशक -श्वेता केतकर
प्रकाश परिकल्पना, नाट्य रूपांतरण व निर्देशक -सौरभ अनंत
प्रस्तुति - विहान ड्रामा वर्क्स, भोपाल (मध्यप्रदेश)