बस्तर
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
जगदलपुर, 22 सितम्बर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की परंपरागत शुरुआत रविवार को काछनगादी पूजा विधान के साथ हुई। इस अवसर पर 10 वर्षीय कन्या पीहू दास पर सवार काछनदेवी ने बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलकर दशहरे के निर्विघ्न आयोजन की अनुमति प्रदान की।
काछनगुड़ी चौक पर आयोजित इस पूजन में हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे। देवी से बस्तर के माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने पर्व के सफल आयोजन की अनुमति मांगी। देवी की स्वीकृति मिलते ही वातावरण जयकारों और आतिशबाजी से गूंज उठा।
इस अवसर पर वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद व बस्तर दशहरा समिति अध्यक्ष महेश कश्यप, विधायक किरण देव, महापौर संजय पांडे सहित परंपरागत दायित्व निभाने वाले मांझी-चालकी, नाइक-पाइक, मेंबर-मेंबरिन तथा बस्तर संभाग के कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुंदरराज पी, कलेक्टर हरिस एस, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा और बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि तथा अधिकारी मौजूद रहे।
काछनगादी रस्म का महत्व
बस्तर दशहरे में काछनगादी रस्म को पर्व का आधार माना जाता है। मान्यता है कि आश्विन अमावस्या के दिन काछनदेवी पनका जाति की कुंवारी कन्या के शरीर में अवतरित होकर झूले पर लेटती हैं और दशहरे के निर्विघ्न आयोजन का आशीर्वाद देती हैं। इस रस्म के पूर्ण होने के बाद ही दशहरा पर्व की अन्य परंपराओं की शुरुआत होती है।
गोल बाजार में रैला देवी की पूजा
काछनगादी पूजा विधान के उपरांत रविवार शाम जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पारंपरिक पूजा विधिवत सम्पन्न हुई। इसमें जनप्रतिनिधियों, परंपरागत पदाधिकारियों, जिला प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।


