बस्तर
महिला दिवस को ले बाजार में फेंके नक्सल पर्चे
भोपालपटनम, 15 फरवरी। गत दिनों पूर्व अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की वर्षगांठ के संदर्भ में नक्सलियों ने बाजार में पर्चे फेंके।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की 112वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश में महिलाओं पर बढ़ रहे मनुवादी पितृसत्तात्मक हमलों के विरुद्ध संघर्ष तेज करने माओवादियों ने अपील की। आर्थिक राजनीतिक सामाजिक संस्कृति क्षेत्रों में स्त्री पुरुष की समानता के लिए संघर्ष करने की अपील की। अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक महिलाओं की संघर्षशील विरासत का प्रतीक बनी 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को विगत 112 सालों से दुनिया भर की उत्पीडि़त वर्गों का तबकों की महिलाओं अपनी जनवादी हक के लिए पुरुष समानता को संपन्न करने की दिशा में मार्गदर्शन लेने की दिवस के रूप में संघर्ष दिवस के रूप में मना रहे हैं। जर्मनी की नेतृत्व में 1910 में आयोजित समाजवादी महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनियाभर में हो रही महिलाओं के संघर्ष से प्रेरणा लेते हुए पीडि़त महिलाओं को एकत्रित करने का लक्ष्य मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था, तब से लेकर आज तक 8 मार्च को 1947 से पहले देश में हुए साम्राज्यवादी सामंतवादी विरोधी आंदोलनों को सत्ता परिवर्तन के बाद भारतीय संविधान में जनता के लिए स्त्री पुरुष समानता सामाजिक न्याय सहित कुछ जनवादी हक अधिकार दिए गए लेकिन इन्हें अमल में लाने वाला राज्य यंत्र विशाल ग्रामीण इलाकों में उपस्थित मजबूत सामंतवादी सामाजिक होटल और परिवार यह सब मनुवादी ब्राह्मणवाद सोच विचारों से लैस होने की वजह से आजादी के अमृत वर्ष तक यह हक अधिकार कभी मिला ही नहीं।
यह स्थिति सामंत वादियों दलाल नौकरशाही बड़ा पूंजी पतियों साम्राज्य वादियों के लूट के लिए सुगम मार्ग बना रही है इसलिए लूटेरे वर्गों अपने हितों के लिए जाति व्यवस्था को ब्राह्मणी मनुवादी रिती सत्तात्मक से भरा हुआ कला संस्कृति आचार व्यवहार को आधुनिक मीडिया के जरिए और बढ़ावा दे रहे हैं श्रमिक विरोधी महिला विरोधी जनवादी विरोधी या मनुवादी ब्राह्मणो तक सीमित नहीं है।
यह शासक वर्गों के लूट को जनता से अनुमोदन दिलाने का कारगर हथियार की काम कर रही है इसलिए उत्पीडि़त जातियों दलितों आदिवासियों के धनी व शासक वर्गों में विकसित शक्तियों की जाति व्यवस्था को ब्राह्मण अधिपति सोच को समर्थन देते हुए मजबूत कर रहे हैं मनु धर्म महिलाओं उत्पीडि़त जातियों आदिवासियों दलितों के लिए शिक्षा को प्रतिबंध किया तो 2020 में लाई गई शिक्षा नीति भारतीय संस्कृति के नाम से छात्रों में जाति आधारित सामंतवादी मूल्यों को मनु वादियों मनु धर्म शास्त्र के नक्शे कदम पर चलने की संदेश दे रही है।
यह महिलाओं को स्वतंत्र राजनीतिक सामाजिक आर्थिक जिंदगी से वंचित कर गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर कर रही है आदिवासी भी हिंदू होने का दावा करते हुए आदिवासी इलाकों जंजीर कैद करने की साजिश है अमन 11 व्यवस्था के साथ बंधा हुआ प्रतीत पितृसत्ता के कारण कोली मजदूर खेती मजदूर संगठित व असंगठित मजदूर वर्ग के बहुसंख्यक महिलाओं को उत्पीडि़त जातियों दलित आदिवासी धार्मिक अल्पसंख्यक के हैं नितिन आधुनिक मनु वादियों के भौतिक लैंगिक हमलों का शिकार होकर खतरनाक अभद्र परिस्थितियों में जी रहे हैं।
उन्होंने अपील की कि आज देश में सत्तारूढ़ ब्राह्मण हिंदू हिंदुत्व फासीवादी ताकतें देश विदेशी कारपोरेट वर्गों के असीमित फायदों के लिए उत्पीडि़त वर्गों के संघर्षों से हासिल हक और अधिकारों का हनन कर रहे हैं, वैसे ही महिलाओं के साथ भी कर रहे हैं इसलिए मजदूर किसान दलित आदिवासी छात्र नौजवान बुद्धिजीवी प्रगतिशील जनवादी हितैषी हो, सब लोग खासकर महिलाएं एकजुट होकर आधुनिक वादियों द्वारा महिलाओं पर हो रहे घातक हमलों को प्रतिरोध करने के लिए हो रहे क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होकर स्त्री पुरुष समानता के लिए आगे बढऩे आदिवासी महिला संगठन करती है।


