संपादकीय
मुंबई में शिवसेना म्युनिसिपल पर राज कर रही है। राज्य में वह विपक्ष में है लेकिन महानगरपालिका पर उसके निर्वाचित लोग बहुमत से काबिज हैं। इसलिए जब शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे ने यह राय दी कि मुंबई को चौबीसों घंटे खुला रहने वाला शहर बनाया जाए, तो म्युनिसिपल ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। आदित्य ठाकरे ने सुझाव दिया था कि मुंबई में कैफे, रेस्टोरेंट, लाइब्रेरी, दंत चिकित्सक और जरूरी सामानों एक स्टोर चौबीसों घंटे खुले रहे ताकि काम से लौटने के बाद लोग कुछ अच्छा वक्त बिता सके। दुनिया के बड़े-बड़े शहरों के मुकाबले मुंबई उबाऊ है, यहां पर पब और बार रात एक बजे बंद हो जाते है, जबकि अंतरराष्ट्रीय शहरों में पब, सुपर मार्केट, स्पा, और जिम चौबीसों घंटे सातों दिन खुले रहते हैं।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बारे में यह बात लिखते आ रहे हैं कि यहां पर रात में बाजारों को जबरिया बंद करवाना बंद होना चाहिए, और अधिक से अधिक दुकानों और बाकी संस्थानों को रात में खुलने के लिए बढ़ावा देना चाहिए। एक बड़ी दकियानूसी और पुरानी सोच यहां पर चली आ रही है कि रात में लोगों के बाहर निकलने से, कारोबार से, जुर्म बढ़ेंगे। जबकि रात से जुर्म का रिश्ता इससे ठीक उलटा है। रात में जुर्म अधिक इसलिए होते हैं कि शहर के बाजारों से लेकर मोहल्लों तक सुनसान रहते हैं, और सन्नाटे में मुजरिमों को मौका मिलता है। आज शहरों में लोगों की निजी जरूरत यह है कि उन्हें रात-दिन हर वक्त बाजार और कारोबार की मनचाही सहूलियत मिलनी चाहिए। दूसरी तरफ शहरों की जरूरत यह है कि दिन के ट्रैफिक जाम वाले घंटों की भीड़ दिन-रात के खाली वक्त की तरफ खिसके, ताकि सड़कें सबसे अधिक भरे हुए वक्त पर कुछ खाली हो सकें।
इसे लेकर हमारी एक और सोच है कि आज पैसे वालों के लिए तो रात में कुछ खरीदना या खाना आसान है। वे शहर में कहीं से भी रेल्वे स्टेशन जा सकते हैं, जहां पर खाने को कुछ न कुछ मिल सकता है। दूसरी तरफ शहरों के सबसे महंगे जो सितारा होटल होते हैं, उनको अपने सितारा दर्जे के लिए चौबीसों घंटे कॉफी शॉप खुली रखनी पड़ती है। इसलिए पैसे वाला तबका तो अपनी गाडिय़ों से अपने घरों से दूर की ऐसी होटलों तक भी पहुंच सकता है। लेकिन दूसरी तरफ साइकिल पर चलने वाला, या मजदूरी करके देर रात लौटने वाला तबका रास्ते में एक कप चाय भी नहीं पी सकता। बेवकूफी का यह मौजूदा इंतजाम बदलना चाहिए, और सरकार को लोगों की, समाज की, और शहरों की जिंदगी में फिजूल का दखल खत्म करना चाहिए। कारोबार अपने हिसाब से रात-दिन कभी भी चले, सरकार का काम उनमें मजदूर कानूनों को लागू करवाने तक रहना चाहिए। यह सोच भी नासमझी की है कि रात में सड़कों पर जिंदगी बढऩे से पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। सड़कों पर लोगों के अधिक रहने से जुर्म घटेगा, और पुलिस का बोझ भी घटेगा। दूसरी तरफ आज पूरे देश में इस बात को लेकर भारी फिक्र है कि महंगे और विदेशी पेट्रोल-डीजल की खपत को कैसे कम किया जाए। दिन में शहरी सड़़कों पर गाडिय़ों की लंबी कतारें लगी रहती हैं, जो विदेशी मुद्रा से आए हुए ईंधन को जलाती हैं। अगर बाजार में रात की जिंदगी बढ़ती है, तो दिन में लोग बिना जरूरत, मजबूरी में सड़कों पर निकलने से बचेंगे, और देर रात की खरीददारी करेंगे, देर रात दूसरे काम निपटाएंगे।
अब शहरों की जिंदगी सूरज को देखकर नहीं चलती। बहुत से लोगों के कारोबार शिफ्ट में चलते हैं, वे रात के किसी भी वक्त खाली समय पाते हैं, और दिन में काम करते हैं, या इसका ठीक उलटा भी होता है। आज सरकारों की सीमित समझ के चलते रात देर से खाली होने वाले लोगों को अपने परिवार सहित जाकर कुछ खाने-पीने तक का मौका नहीं मिलता क्योंकि सारा बाजार बंद करवा दिया जाता है। लोगों की जिंदगी में मनोरंजन, कामकाज, और तफरीह का वक्त कब होना चाहिए, इसे सरकार को काबू में नहीं करना चाहिए। मुंबई में बाजारों को लेकर जो सोच सामने आई है उस पर छत्तीसगढ़ जैसे दूसरे राज्यों को भी सोचना चाहिए जो कि छोटे राज्य माने जाते हैं, लेकिन जहां पर शहरों की जिंदगी दिनभर के ट्रैफिक जाम का शिकार है। हम बरसों से इस बात की वकालत करते आए हैं दिन के अधिक से अधिक कारोबार का विकल्प रात में भी होना चाहिए, और अब समय आ गया है कि जनता को मर्जी से जीने का हक दिया जाए, और सत्ता की कुर्सी पर बैठे लोग जिंदगी के तौर-तरीकों पर हावी होना बंद करें।
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नए साल के आने की खुशी में हर तबका अपने-अपने तरीके से जश्न या खुशियां मनाता है। इसमें सरकार या प्रशासन के नियम यह तय करते हैं कि कोई दावत कितने बजे तक चले। मुम्बई में ऐसी दावतों के लिए पुलिस ने रात डेढ़ बजे तक का वक्त तय किया हुआ है। इसके खिलाफ होटल वालों ने हाईकोर्ट में अपील की और वहां से यह आदेश हुआ है कि पार्टियां सुबह पांच बजे तक चल सकेंगी। इस पर देश के एक बड़े संविधान विशेषज्ञ वकील हरीश साल्वे ने ट्वीट किया है कि यह कैसी नौबत आ गई है कि शराबखानों और पार्टियों को बंद करने का वक्त अदालतों को तय करना पड़ रहा है, राजनीतिक व्यवस्था अलोकप्रिय फैसले लेने से बचते हुए जिम्मेदारी की जगह अदालतों के लिए खुद खाली कर रही है।
हिन्दुस्तान आजादी के बाद से एक ऐसी अजीब से तानाशाह सरकारी इंतजाम का शिकार रहा है जिसमें सरकार हर किस्म के हक अपने हाथ में रखते हुए लोगों की जिंदगी को, कारोबार को, जीने के तौर-तरीकों की लगाम अपने हाथों में रखने की शौकीन रही है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम हर बरस एक-दो बार इस बारे में लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही पुलिस रात साढ़े दस बजे से लाठियां लहराकर, गालियां देकर, पानठेलों तक को बंद करवाने पर उतारू हो जाती है। आधी रात काम से लौटते किसी मजदूर को, किसी रिक्शेवाले को कहीं भी एक प्याली चाय भी नहीं मिल सकती। दूसरी तरफ जो महंगे होटल हैं, उनको अपने सितारा दर्जे के नियमों के मुताबिक चौबीसों घंटे चाय-कॉफी और नाश्ते का इंतजाम रखना पड़ता है, और उतना खर्च उठाने की ताकत रखने वाले कोई भी वहां जाकर खा-पी सकते हैं। बेदिमाग और बददिमाग शासन और प्रशासन को यह समझ नहीं आता कि बाजार में काम करने वाले न सिर्फ कारोबारी-कर्मचारी, बल्कि खुद कारोबारी ही रात नौ-दस बजे के पहले अपने खुद के घर नहीं लौट पाते, और फिर अगर वे चाहें कि परिवार के साथ कुछ देर बाहर निकलें, तो उनको एक चाय ठेला भी खुला नहीं मिल सकता।
बाम्बे हाईकोर्ट ने जो आदेश सिर्फ नए साल की दावत के लिए दिया है, उसे व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। यह सिर्फ एक दिन की दावत का हक नहीं है, यह रोज की बात है, और आज जब शहरीकरण की वजह से लोगों का रात-दिन काम करना होता है, तो फिर उनकी जरूरतों को भी रात-दिन पूरी होने से रोकने का हक किसी सरकार को नहीं है। जनता के हक के खिलाफ सरकारें अपनी बददिमागी दिखाती हैं, और चूंकि आम जनता संगठित नहीं है, इसलिए उसके रोज के हक को कुचलने के खिलाफ भी वह अदालत नहीं जा पाती। जिस कारोबार को सरकारी रोक से नुकसान हो रहा था, वह कारोबार मुम्बई में तो अदालत तक चले गया, बाकी जगहों पर भी देश का वही कानून लागू है, और देश के कानून में अमीर और गरीब ग्राहकों के बीच कोई फर्क भी नहीं है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में सरकार यह तय करती है कि शराबखानों में किस रेट से अधिक सस्ती शराब नहीं बेची जाएगी, तो फिर ऐसा नियम सस्ती शराब पीने की ही ताकत रखने वाले तबके के हक के खिलाफ है। लेकिन जनता में जागरूकता न होने से पुलिस अपने अंदाज में रात साढ़े दस बजे से बाजार का कफ्र्यू लगा देती है, और आम लोग अपने परिवार सहित बाहर निकलकर जिंदगी जीने का हक भी खो बैठते हैं। ठेले-खोमेचे वालों को रात साढ़े दस बजे से लाठियों से भगा दिया जाता है, और बड़े होटलों में खाने को कुछ न कुछ तो चौबीसों घंटे मिलता है।
शहरीकरण और पर्यटन की मामूली समझ रखने वाले लोग भी यह समझ सकते हैं, कि जिस प्रदेश या शहर में रात कुछ खाने-पीने भी न मिले, वहां पर बाहर से आए हुए लोग उस जगह को किस तरह मरघटी सन्नाटे वाली पाते होंगे। अगर किसी देश-प्रदेश, शहर या इलाके को पर्यटकों को बढ़ावा देना है, कारोबार को बढ़ाना है, रोजगार के मौके बढ़ाने हैं, दिन के ट्रैफिक जाम के घंटों की भीड़ को रात तक फैलाना है, तो उसके लिए हर शहर में रात की जिंदगी को जीने का हक देना होगा। छत्तीसगढ़ सहित देश के बाकी जिस हिस्से में भी ऐसी रोक लगती है, उसके खिलाफ स्थानीय जनता या स्थानीय कारोबार अदालतों में जाकर सरकारी मनमानी के खिलाफ इंसाफ पा सकते हैं। यह बात लोकतंत्र में अतिसरकारीकरण, या अतिनियंत्रण है, और इसे खत्म किया जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ के बारे में हम यह सकते हैं कि यहां बाहर से आने वाले पर्यटक कुछ गिनी-चुनी जगहों को देखने के अलावा रात में सब-कुछ मुर्दा पाते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अगर रात में बाजार और मनोरंजन के घंटे बढ़ेंगे, तो उससे कर्मचारियों के नए रोजगार भी खड़े होंगे, और शाम की भीड़ देर रात तक खिसककर सड़कों से ट्रैफिक जाम भी कम करने में मदद करेगी। जो लोग यह सोचते हैं कि रात में बाजार जल्द बंद करवाने से जुर्म कम होते हैं, उनको यह रिकॉर्ड देख लेना चाहिए कि जब तक सड़कों पर चहल-पहल रहती है, कारोबार जारी रहता है, तब तक जुर्म कम होते हैं। जुर्म उस समय बढ़ते हैं, जब सड़कों और बाजारों में सन्नाटा छा जाता है। छत्तीसगढ़ में किसी को इस बात को समझना चाहिए, और यहां की जनता को देर रात तक अपने परिवार के साथ बाहर निकलकर कुछ खाने-पीने के लिए ठेले या रेस्तरां नसीब होने देना चाहिए।
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ सरकार ने बाजार, कारोबार, और जनता के लिए एक बड़ा दोस्ताना फैसला लिया है। उसने दुकानों पर लागू होने वाले कानूनों को शहरी इलाकों के साथ-साथ अब बाकी प्रदेश पर भी लागू किया है, लेकिन यह नया कानून दस या अधिक कर्मचारियों वाली दुकानों और व्यापार पर ही लागू होगा, इससे छोटे कारोबार इससे मुक्त रहेंगे। कर्मचारियों के काम के दिनों को लेकर पहले से श्रम कानूनों में जो व्यवस्था है वह जारी रहेगी, लेकिन जो सबसे बड़ी चीज इस ताजा आदेश में हुई है वह दुकानों को सातों दिन चौबीसों घंटे खोलने की छूट है। कोई होटल, रेस्त्रां, खानपान की जगह, या मॉल और दुकान अब पूरे वक्त काम कर सकेंगे, शर्त बस यह रहेगी कि कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। इसके साथ-साथ कुछ सुरक्षा शर्तों के तहत महिला कर्मचारियों को भी रात में काम करने की छूट रहेगी।
हम अपने इस अखबार में इस कॉलम में, और संपादक के साप्ताहिक कॉलम आजकल में दस-बीस बरस में दर्जन भर से अधिक बार यह बात उठा चुके थे कि सरकार को बाजार बंद करने के धंधे में नहीं पडऩा चाहिए। रात 10 बजे पुलिस घूम-घूमकर लाठी बजाकर पानठेले तक बंद करवाती है, और रेस्त्रां भी इसी वक्त नए ग्राहकों का भीतर आना बंद करते हैं। हमने अजीत जोगी, और रमन सिंह सरकार के समय भी उनके करीबी महत्वपूर्ण अफसरों को लिखकर भी यह सुझाव दिया था, और अखबार में भी कई बार लिखा था कि सरकार को सुरक्षा और मजदूर कानून लागू करने चाहिए, बाजार को अपनी मर्जी से रात-दिन चलने देना चाहिए। आज हालत यह है कि बड़े-बड़े मॉल में करोड़पतियों के पब और बार तो देर रात तक चलते हैं, राजधानी में दर्जनों ऐसे दूसरे ठिकाने देर रात तक दारू और दूसरा नशा परोसते हैं, लेकिन चाय दुकानों को दस-ग्यारह बजे बंद करने का हुक्म दे दिया जाता है। दूसरी तरफ जो पांच सितारा होटल हैं, उन्हें सितारा दर्जा मिलने की शर्त यह रहती है कि वहां चौबीस घंटे कॉफी शॉप चलना चाहिए। गरीब और अमीर की जरूरतों के बीच सरकार की तरफ से यह इतना बड़ा फासला है कि दो-चार सौ रूपए की कॉफी चौबीसों घंटे मिलती है, और दस रूपए की चाय रात दस-ग्यारह बजे बंद हो जाती है। कारखाने, स्टेशन, या कहीं और से लौटते मजदूर या कर्मचारी सडक़ किनारे कुछ खा-पी भी नहीं सकते। हमने यह भी लिखा था कि रात-दिन बाजार खुला रखने की छूट किसी कारोबारी पर रात भर दुकान खोलने की बंदिश नहीं रहेगी, जिसे मर्जी होगी वे रात में कारोबार करेंगे। इससे बाहर से आने वाले सैलानियों और मुसाफिरों को भी सहूलियत मिलेगी, और शहर की सडक़ों पर दिन में पडऩे वाला ट्रैफिक का दबाव भी खत्म होगा, कई लोगों को रात में खानपान और खरीददारी अधिक माकूल रहेगी, और उससे दिन में उतनी गाडिय़ां सडक़ों पर कम रहेंगी। हमने यह बात भी लिखी थी कि खुद कारोबारी रात नौ-दस बजे तक घर पहुंचते हैं, और फिर परिवार को लेकर बाहर निकलने का वक्त मिलता है, तो उस वक्त तक बाजार बंद होने लगता है। चौबीसों घंटे दुकान खुली रखने की छूट होने से वे व्यापारी इसका फायदा उठा सकेंगे जिनके ग्राहक देर रात भी आना चाहते हैं। पहले भी कई शहरों में पेट्रोल पंपों में रात भर खुली रहने वाली छोटे-मोटे सामानों की दुकानें चलती ही थीं। हमारा यह भी मानना है कि रात में देर तक या पूरी रात बाजार में चहल-पहल रहने से गुंडागर्दी और जुर्म भी घटेंगे क्योंकि अंधेरी सूनी सडक़ों पर मुजरिमों का हौसला बढ़ता है।
देर आयद, दुरूस्त आयद। राज्य बनने के बाद से यह पहली सरकार है जिसे कारोबारी और जनता को यह बहुत जायज हक देना सूझा है, और इससे कारोबार भी बढ़ेगा, और सरकार को टैक्स भी अधिक मिलेगा। कर्मचारियों को जरूर यह लग सकता है कि इससे उन्हें अधिक घंटे काम करना पड़ेगा, लेकिन असल में यह भी हो सकता है कि अब कारोबार दो शिफ्ट चलने लगें, और दोनों शिफ्ट के लिए अलग-अलग कर्मचारियों को रोजगार मिलने लगे। पुलिस के ऊपर जरूर इससे कुछ दबाव बढ़ेगा क्योंकि रात में भी सडक़ों की कुछ चौकसी रखनी पड़ेगी, और बाजार को भी चाहिए कि वह पुलिस के साथ तालमेल बिठाकर अपने सुरक्षा कर्मचारियों का कुछ इंतजाम करे। इसके साथ-साथ शहरों में सीसीटीवी कैमरों जैसे निगरानी नेटवर्क को बढ़ाना चाहिए ताकि जुर्म या ट्रैफिक गड़बड़ी पर तुरंत कार्रवाई हो सके। जहां तक बाजार की बिजली की खपत का सवाल है, तो रात के घंटों में बिजली मांग से अधिक पैदा होती है, और छत्तीसगढ़ को दूसरे राज्यों को यह कम रेट पर बेचनी भी पड़ती है।
सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार बाजार और जनता की जरूरतों को जरूरत से अधिक नियंत्रित कर रही थी, और इसी में कई किस्म का भ्रष्टाचार भी पनपता है। कुछ चुनिंदा कारोबार बहुत देर रात तक चलने देने के लिए एक भ्रष्टाचार पनप जाता है। विष्णुदेव साय सरकार का यह फैसला प्रदेश में पर्यटकों और प्रवासियों के लिए दोस्ताना भी रहेगा जो बाहर से आने पर यहां के बाजार में बारह घंटे का मरघटी सन्नाटा देखते हैं। सरकार के भीतर जिस किसी ने भी ऐसी पहल की है, वे तारीफ के हकदार हैं, और प्रदेश के व्यापारी संगठनों को भी इस छूट का फायदा उठाना चाहिए, और रात के बाजार विकसित करने चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
(हम इस विषय पर कई बरस पहले लिखे गए और छपे अपने पिछले कुछ संपादकीय सिर्फ ऑनलाईन पढऩे के लिए पोस्ट कर रहे हैं। वेबसाईट पर देख सकते हैं।)
‘छत्तीसगढ़’31 दिसंबर 2013 का संपादकीय : जनता की जिंदगी पर सरकारी लगाम खत्म करने की जरूरत
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू की गई है जिसमें राज्य के आदिवासियों को छोडक़र बाकी तमाम लोगों पर इसे धर्मों से परे एक सरीखा लागू किया गया है। इस कानून के मुताबिक शादी की उम्र 18 बरस की लडक़ी, और 21 बरस का लडक़ा है। हर शादी का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, और तलाक कानून सम्मत आधार पर ही हो सकेगा। इसी तरह तलाक की हालत में गुजारा-भत्ता, और बाकी हिसाब-किताब सभी धर्मों से परे एक सरीखा होगा। संपत्ति और उत्तराधिकार एक सरीखा लागू होगा। लिव-इन-रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा ताकि इसके जोड़ीदारों की कानूनी सुरक्षा हो सके, और ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों के अधिकार सुनिश्चित हो सकें। इस तरह के रिश्तों से अलग हुए लोगों की आर्थिक सुरक्षा के प्रावधान भी किए गए हैं। इस समान नागरिक संहिता में बहू विवाह पर रोक लगाई गई है, और दोनों जोड़ीदारों को लैंगिक समानता के अधिकार दिए गए हैं। बाल विवाहों पर प्रतिबंध लगाया गया है, और यूनीफॉर्म सिविल कोड के तहत फैसलों के लिए अदालतें तय की गई हैं। प्रदेश के आदिवासियों को उनकी परंपरा के हिसाब से रहने दिया गया है, और यह नया कानून उन पर लागू नहीं हो रहा है।
लेकिन 2024 में लागू इस कानून पर आज चर्चा की जरूरत इसलिए आन पड़ी है कि नैनीताल हाईकोर्ट ने इसके तहत लिव-इन-संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण को एक चुनौती दी गई है, और इस मौखिक टिप्पणी करते हुए मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जी.नरेन्द्र ने कहा है कि जब आप बिना शादी के निर्लज्जता के साथ रह रहे हैं, तो इसके पंजीकरण से किस निजता का हनन हो रहा है? उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बालिग लोगों के साथ रहने के रिश्तों पर रोक नहीं लगा रही है, बल्कि उसके रजिस्ट्रेशन को जरूरी बना रही है। रजिस्ट्रेशन के इस प्रावधान को निजता का हनन बताते हुए देहरादून निवासी 23 बरस के जय त्रिपाठी ने चुनौती दी थी। उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के एक फैसले का हवाला दिया, और कहा कि उनका मुवक्किल अपने साथी के नाम की घोषणा करना नहीं चाहता, और उसे इसके लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सवाल किया कि ऐसे रिश्ते में रहस्य क्या है? आप दोनों एक साथ रह रहे हैं, आपके पड़ोसी जानते हैं, समाज जानता है, दुनिया जानती है, फिर आप किस गोपनीयता की बात कर रहे हैं? क्या आप गुफा में रह रहे हैं? उन्होंने कहा आप बिना शादी किए बेशर्मी के साथ रह रहे हैं, रजिस्ट्रेशन से किस निजता का हनन होगा? याचिकाकर्ता के वकील ने राज्य की एक घटना का जिक्र किया जिसमें अलग-अलग धर्मों के दो जोड़ीदारों में से युवक की हत्या कर दी गई। ऐसे में रजिस्ट्रेशन से नाम उजागर होगा, और लोग खतरे में पड़ेंगे।
ऐसा लगता है कि लोग हाईकोर्ट के जज रहते हुए भी अपनी निजी सोच से अपनी टिप्पणियों को प्रभावित होने से नहीं बचा पाते। हम लिव-इन-रिलेशनशिप पर सुप्रीम कोर्ट के दिए हुए फैसले को देखते हैं तो अदालत ने साफ-साफ यह कहा कि यह न तो जुर्म है, और न ही कोई पाप है, फिर चाहे देश का समाज इसे नामंजूर क्यों न करता हो। अदालत ने यह भी लिखा कि ऐसे रिश्तों में महिला को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए, और ऐसे रिश्तों में पैदा होने वाले बच्चों को संपत्ति का हक देने के लिए यह फैसला दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसे जोड़े अपने आपको ऐसे रिश्ते में बताते हैं तो उनके बच्चों का संपत्ति पर कानूनी हक रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साफ है कि लिव-इन-रिलेशनशिप को न तो जुर्म माना गया है, न पाप माना गया है, और अदालत ने बड़े साफ-साफ शब्दों में यह बात कही है। ऐसे में हमें नैनीताल हाईकोर्ट की टिप्पणी खटकती है जिसमें मुख्य न्यायाधीश ने इसे निर्लज्जता और बेशर्मी करार दिया है। ये विशेषण ऐसे रिश्तों को जुर्म या पाप की तरह ही साबित करते हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट के साफ-साफ फैसले के ठीक खिलाफ है। उत्तराखंड का यह कानून भी इसे न जुर्म कहता है, न पाप कहता है, ऐसे में जज का इसे नीची नजरों से देखना खटकता है, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को बहुत से लोग एक कानूनी नजरिया मानेंगे, और जिस समाज में इस तरह के रिश्तों में साथ रहने वाले लोगों के खिलाफ जगह-जगह हिंसा देखने में आती है, वहां इससे हिंसक लोगों को इससे एक बढ़ावा मिल सकता है। हमारा ख्याल है कि अदालतों में जजों को अपनी टिप्पणियों और अपने विशेषणों को, अपने विचार को फैसलों तक सीमित रखना चाहिए। बहुत से मामलों में यह देखा जाता है कि जज जुबानी जो बातें कहते हैं, वे बातें औपचारिक फैसले का हिस्सा भी नहीं बनतीं, लेकिन वे जुबानी बातचीत की खबरों से एक धारणा बनने लगती है कि अदालत, यानी जज का इस बारे में क्या कहना है, और जनता जरूरत पडऩे पर अपनी पसंद से उन टिप्पणियों का चुनिंदा इस्तेमाल करने लगती है। वैसे भी जब सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह से कानूनी मान्यता दी है तो फिर इसे बेशर्मी और निर्लज्जता कहना जायज नहीं है। इस कानून से निजता का हनन होता है या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है, और हाईकोर्ट के पास उस पर फैसला देने का पूरा हक है। इसके बाद जो पक्ष असंतुष्ट रहे, उसके पास सुप्रीम कोर्ट तक जाने का भी पूरा हक रहेगा। लेकिन जो समाज में लोगों का जीना या मरना मुश्किल करने वाली परंपराएं हैं, उस बारे में जजों को अपनी निजी पूर्वाग्रह अलग रखने चाहिए। हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उत्तराखंड सरकार के बनाए कानून में लिव-इन-रिलेशनशिप को किसी भी कोने से शर्म का सामान नहीं देखते। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
राजनीतिक ताकत से गुंडागर्दी आम बात है। जिन पार्टियों की कोई ताकत नहीं होती उनके लोग भी जमीन पर पांव रखना नहीं चाहते। पार्टियों के चिल्हर नेता भी सडक़ पर गाड़ी रोकने पर पुलिस को धौंसियाने लगते हैं कि वे जानते नहीं कि वे कौन हैं? अदना से नेता गाडिय़ों में काली फिल्म लगाए, सायरन और हूटर लगाए, ऊपर तरह-तरह की लाईटें लगवाए, और पदनाम की बड़ी सी तख्ती लगाकर घूमते हैं। इनका कुल जमा मकसद यही होता है कि पुलिस उन्हें न रोके। और पुलिस के रोकने की नौबत ही इसलिए आती है कि सडक़ों के नियम तोड़े जाते हैं। राजनीतिक बाहुबल का यह प्रदर्शन दारू न पीने वाले, नशा न करने वाले पौव्वा दर्जे के नेताओं को भी आत्ममुग्ध नशे में रखता है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल पुलिस को शहर युवक कांग्रेस अध्यक्ष को दस साथियों सहित गिरफ्तार करना पड़ा क्योंकि वे इस अध्यक्ष का जन्मदिन चौराहे पर मनाने पर आमादा थे। एक चौराहे से हटाया गया, तो दूसरे चौराहे पर जाकर केक काटा गया, और चारों तरफ अंधाधुंध आतिशबाजी की गई। जबकि अभी एक पखवाड़े पहले ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इसी शहर में इसी इलाके में मनाए गए इसी तरह के जन्मदिन पर मामूली कार्रवाई करने पर एक अफसर को सस्पेंड करने, विभागीय जांच करने का आदेश दिया था, और हाईकोर्ट के सख्त रूख को देखकर पुलिस को उस जन्मदिन पर कार्रवाई करनी पड़ी थी। इसी शहर में उसी इलाके में फिर वही हरकत सीधे-सीधे हाईकोर्ट को चुनौती है, और कांग्रेस पार्टी को भी यह देखना चाहिए उसके मवाली किस्म के पदाधिकारी जनता के बीच अब और क्या खोना चाहते हैं? हर चुनाव हारने के बाद भी इस पार्टी के अदना से पदाधिकारी का गुरूर किनारे होने को तैयार नहीं है, और चौराहे पर केक काटना, आतिशबाजी से ट्रैफिक रोकना उन्हें अपनी नेतागिरी की पराकाष्ठा दिख रही है। ऐसे राजनीतिक दलों को धिक्कार है जो अपने पदाधिकारियों और नेताओं के कुकर्मों पर मुंह बंद करके बैठे रहते हैं। और यह हाल सिर्फ कांग्रेस का हो ऐसा भी नहीं है, इसी प्रदेश में बस्तर में भाजपा के एक सांसद अफसरों को मां-बहन की गालियां देते हुए इतने सारे वीडियो में कैद हो चुके हैं कि तैनाती पर बस्तर जाने वाले अफसर परिवार को बाहर के इलाकों में ही छोडक़र जाने लगे हैं। इस सांसद की ताजा गालियों का शिकार एक ऐसा पुलिस अफसर हुआ है जो दो-दो बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित है। अब राष्ट्रपति को यह वीडियो भेजना चाहिए कि वे अपने पदक पर फिर से विचार करें क्योंकि सांसद इस अफसर को गंदी गालियों के लायक ही मानते हैं।
सत्ता की ताकत किसी के साथ हमेशा नहीं रहती। सत्ता बड़ी बदचलन रहती है, और वह घर और यार दोनों बदलते रहती है। लेकिन पारे की तरह अस्थिर सत्ता पर भी लोग अपने अहंकार की ऊंची इमारतें खड़ी कर लेते हैं, और ऐसे लोगों को मुम्बई ट्रैफिक पुलिस के लिए अक्षय कुमार के पुलिस-किरदार वाला एक इश्तहार दिखाना चाहिए जिसमें वह ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों को सडक़ के नाम की तख्ती दिखाकर पूछता है कि क्या वे उसी महान व्यक्ति के बेटे हैं, क्योंकि उनकी हरकत तो ऐसी ही है कि सडक़ उनके बाप की हो। इन दिनों कम से कम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां हम लोगों को करीब से देखते हैं, राजनीतिक बाहुबल का शक्ति प्रदर्शन सार्वजनिक जगहों पर अंधाधुंध पैमाने पर चलता है। और इन छुटभैये नेताओं के और नीचे के चमचे अपने युवा हृदय सम्राटों से प्रेरणा पाते हुए ट्रैफिक नियमों को तोडऩा अपनी शान दिखाने का पहला कदम मानते हैं। अखबारों को चाहिए कि वे ऐसे नेताओं की हरकतें सामने आने पर उनके प्रदेश अध्यक्षों से पूछें कि क्या यह हरकत उनकी पार्टी की रीति-नीति के मुताबिक है?
वैसे तो राजनीति को पूरी दुनिया में सबसे घटिया लोगों का डेरा माना जाता है, और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प जैसे लोग मानो डॉक्टरी सलाह पर दिन में चार बार इस घटियापन का प्रदर्शन करते हैं। इसलिए अब बाकी दुनिया में उनसे कम ताकतवर तमाम नेताओं के लिए वे कामयाबी और कमीनगी दोनों का एक बड़ा आदर्श हैं। कम से कम उत्तर भारत की राजनीति में हम नौजवानों को इसीलिए आते देखते हैं कि वे गुंडागर्दी कर सकें, पुलिस से उलझकर भी बच सकें, और अपना आतंक कायम करके सरकारी अफसरों से गलत काम करवा सकें।
आज मीडिया से परे भी सोशल मीडिया के जमाने में जनता को चाहिए कि राजनीतिक गुंडागर्दी खत्म करवाए। लोगों को ऐसी घटनाओं को खुलकर धिक्कारना चाहिए, ऐसे नेताओं की पार्टियों को कटघरे में खड़ा करना चाहिए, उनसे सार्वजनिक रूप से जवाब-तलब करना चाहिए। इसके साथ-साथ जब कभी चुनाव का मौका आए, या किसी पार्टी के नेता सार्वजनिक रूप से किसी कार्यक्रम में पहुंचें, तो उनसे इन घटनाओं को गिनाकर इन पर उनकी राय पूछनी चाहिए। वैसे तो यह काम अपने आपको लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का दंभ भरने वाले मीडिया का होना चाहिए था, लेकिन छोटे-छोटे पॉकेट साईज के नेता भी बड़े-बड़े इश्तहार देकर मीडिया को पिछवाड़े तले दबाकर बैठते हैं। जब मीडिया का अपना पापी पेट ऐसे ही लोगों से चलता है, तो वे पार्टियों के नेताओं से कुछ नहीं पूछ सकते, जनता को ही आज सोशल मीडिया पर जवाब-तलब करना चाहिए, और ऐसी घटनाओं को वॉट्सऐप जैसी मैसेंजर सर्विसों से चारों तरफ बांटना चाहिए। सार्वजनिक धिक्कार ही किसी पार्टी या उसके नेताओं को सुधार सकती है, वरना पार्टियों में ओहदे तो आजकल उस अंदाज में बिकते हैं जिस अंदाज में राज्यसभा की सदस्यता, या चुनावी उम्मीदवारी बेचने के लिए एक बहनजी बदनाम हैं। लोग अपनी नागरिक जिम्मेदारी पूरी करें, और किसी प्रेरणा के लिए मीडिया की तरफ न देखें।
अमरीका के एक प्रतिष्ठित शोध संस्थान, प्यू रिसर्च सेंटर ने 2024 में 36 देशों में असमानता के ऊपर एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें अलग-अलग देशों के अलग-अलग पहलू सामने आए। भारत में जो सर्वे किया गया उसमें 81 फीसदी लोगों ने आर्थिक असमानता पर फिक्र जाहिर की, और 64 फीसदी लोगों ने इसे बहुत बड़ी समस्या बताया। लोगों ने असमानता के कई तरह के कारण बताए। 79 फीसदी लोगों ने कहा कि संपन्न तबके के पास बहुत अधिक राजनीतिक ताकत है जिससे असमानता उपजती है। 72 फीसदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था को नाकाफी बताया। 56 फीसदी लोगों ने धर्म, नस्ल, या संप्रदाय के भेदभाव को असमानता बढऩे के लिए जिम्मेदार ठहराया। सर्वे में हिस्सा लेने वाले आधे-पौन हिस्से ने मशीनीकरण और कम्प्यूटरीकरण को जिम्मेदार ठहराया, और समान अवसर न मिलने को भी। लेकिन दूसरी तरफ भारत में हुए इस सर्वे में तीन चौथाई लोगों का यह मानना है कि उनके बच्चों की स्थिति उनके मुकाबले बेहतर रहेगी। 44 फीसदी लोगों ने यह माना है कि लैंगिक (कुछ लोग इस शब्द को भी पुरूषवादी मानकर इसके इस्तेमाल के खिलाफ खड़े हो रहे हैं, फिर भी हम अभी प्रचलन में जारी इस शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं-संपादक) असमानता को बहुत बड़ी समस्या मान रहे हैं। 71 फीसदी भारतीयों ने यह माना है कि धार्मिक भेदभाव बड़ी समस्या है, और 57 फीसदी लोगों ने इसे बहुत बड़ी समस्या माना है। 69 फीसदी भारतीय मानते हैं कि जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव एक बड़ी समस्या है।
2024 में किया गया यह सर्वे अभी पांच हफ्ते पहले सामने आया था, और अलग-अलग देशों में इसका अलग-अलग विश्लेषण जारी है। भारत को लेकर बहुत सी विदेशी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सर्वे या दीगर विश्लेषण भारत सरकार को पसंद नहीं आते हैं, और सरकार कई बार इन्हें ऐसे पैमानों पर किया गया बताती है जो कि भारत पर लागू नहीं होते हैं। सरकारों की अपनी कई तरह की मजबूरी रहती है क्योंकि निर्वाचित लोकतंत्र में सरकारें, जनता की राजनीतिक भावना से परे कम सोच पाती हैं। लेकिन भारत में आज जिस तरह का धार्मिक और सांप्रदायिक भावनाओं का माहौल बना हुआ है, उसमें प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे कुछ हैरान करता है। यह बताता है कि 70 फीसदी भारतीय धार्मिक और जातिगत भेदभाव को एक बड़ी समस्या मानते हैं। जबकि भारत में बहुसंख्यक हिन्दू तबका ही 80 फीसदी से अधिक आबादी है, और बची हुई 20 फीसदी आबादी में मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिक्ख, और दूसरे धर्मों के लोग हैं। ऐसे में 70 फीसदी हिन्दुस्तानी अगर धार्मिक और जातिगत भेदभाव को बड़ी समस्या मान रहे हैं, तो जाहिर है कि इनमें हिन्दुओं का भी बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। बाकी धर्मों के सारे के सारे लोग भी इस सोच का समर्थन कर रहे हों, तब भी हिन्दुओं की आधी से अधिक आबादी इस सोच के साथ है। यह राहत की एक बात इसलिए है कि हिन्दू आबादी का बड़ा हिस्सा इसे समस्या मान रहा है। सर्वे का दूसरा एक नतीजा बताता है कि 80 फीसदी भारतीय संपन्न तबके के बढ़ते हुए राजनीतिक प्रभाव को आर्थिक असमानता बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण मान रहे हैं। देश में पूंजीवादी व्यवस्था की वजह से असमानता बढऩा सभी जानते हैं, और काफी लोग मानते हैं। लेकिन सर्वे में अगर तकरीबन तमाम हिन्दुस्तानी इस बात को मान रहे हैं, तो उसका मतलब है कि वे जमीनी हकीकत जान रहे हैं। अब सवाल यह है कि ऐसे भेदभाव के लिए जिम्मेदार पार्टियां या गठबंधन अगर इसके बावजूद चुनावों में जीत हासिल करते हैं, तो उसका एक मतलब यह है कि मतदाता के सामने कोई विश्वसनीय-विकल्प मौजूद नहीं है, और उसे असमानता बढ़ाने वाली ताकतों को चुनने की मजबूरी दिखती है।
अब इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सर्वे को खारिज कर देना तो बड़ा आसान है, लेकिन ऐसे सर्वे से सीख और नसीहत लेना अधिक काम की बात हो सकती है। यह एक अलग बात है कि भारत की चुनावी व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि जाति या धर्म की, संप्रदाय या क्षेत्र की भावनाएं जमीनी हकीकत के साथ मिलकर एक चुनावी विकल्प पेश करती हैं, और उनमें आर्थिक हकीकत पर धार्मिक हसरत हावी हो जाती है। इसलिए चुनावी नतीजों को सामाजिक स्थिति का सीधा-सीधा प्रतिबिंब मानना ठीक नहीं होगा। दुनिया के अलग-अलग बहुत से सर्वे ऐसे आंकड़े बीच-बीच में सामने रखते हैं कि भारत में आर्थिक असमानता कितनी अधिक है, और किस तरह अतिसंपन्न तबका और अधिक संपन्न हुए जा रहा है, और नीचे के सबसे गरीब लोग गरीब ही बने हुए हैं। हालांकि भारत सरकार के कुछ आंकड़े यह दिखाते हैं कि दसियों करोड़ लोग पिछले दस बरस में गरीबी की रेखा के ऊपर लाए जा चुके हैं, लेकिन भारत सरकार कुछ रहस्यमय वजहों से देश के भीतर के केन्द्र सरकार के कराए हुए कई आर्थिक सर्वेक्षणों के आंकड़े जारी नहीं करती है, और उसने कई पैमानों और परिभाषाओं को बदल भी दिया है, इसलिए उसकी पेश की हुई तस्वीर को लोग अधिक भरोसेमंद नहीं मानते हैं।
फिलहाल हम इस बात को लेकर राहत की सांस लेते हैं कि अगर प्यू रिसर्च सेंटर का सर्वे सही है, और आम हिन्दुस्तानियों का 70 फीसदी यह बात मानता है कि धर्म और जाति का भेदभाव देश में आर्थिक असमानता की बड़ी वजह है, और 80 फीसदी लोग अमीरों के राजनीतिक प्रभाव को इस असमानता का गुनहगार मानते हैं, तो ऐसा लगता है कि लोग चुनावों में वोट कई वजहों से किसी को देते होंगे, लेकिन ऐसे सर्वे में उन्होंने अपनी सही समझ उजागर की है। हम यह तो नहीं जानते कि भारत के राजनीतिक दल इन तथ्यों को अपने किसी चुनावी इस्तेमाल का मानेंगे या नहीं, लेकिन जनता के बीच ऐसे नतीजे पहुंचने से उसे चीजों को समझने में आसानी होगी, हालांकि ये नतीजे उसी से की गई बातचीत के आधार, उसी के जवाबों के आधार पर निकाले गए हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
महाकुंभ के लिए प्रयागराज जाने वाले रेल मुसाफिरों की भीड़ में भगदड़ मचने से बीती रात नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब डेढ़ दर्जन लोगों की मौत हो गई है। पहले तो रात घंटों तक मौतों को अफवाह बताया जाता रहा, ठीक उसी तरह जैसे कि कुंभ में जब आधी रात बाद और सुबह के पहले हुई भगदड़ में 30 लोग मारे गए थे, लेकिन राज्य सरकार ने 24 घंटे तक मौतों का कोई जिक्र ही नहीं किया, और चारों तरफ यही अपील की जाती रही कि लोग अफवाह न फैलाएं। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी अपने वीडियो बयान में अफवाहों का खूब जिक्र किया, लेकिन मौतों का नाम भी नहीं लिया। सरकारों के स्तर पर यह एक बड़ी अजीब बात है कि तथ्यों को जनता के सामने साफ-साफ रखने के बजाय सामने पड़ी लाशों को भी छुपाया जाए। खैर, कल नई दिल्ली स्टेशन पर जैसी भीड़ थी वैसी वहां के कुलियों ने छठ पूजा के लिए बिहार जाने वाली भीड़ के दौरान भी नहीं देखी थी। इस अभूतपूर्व और असाधारण भीड़ के नजारे सोशल मीडिया पर वीडियो में दिख रहे थे, और इसके बाद जब वहां कुछ गाडिय़ों के रद्द होने और कुछ के प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा हुई, तो सब कुछ तहस-नहस हो गया। जब दसियों हजार लोग किसी पैदल-पुल से प्लेटफॉर्म बदलते हों, और वहां पर ट्रेन तक पहुंचने की हड़बड़ी भी हो, तो बेकाबू भगदड़ में इतनी कम मौतें कैसे हुईं, यही हैरानी की बात है। यह एक अलग बात है कि मौतों के आंकड़े सीमित रहने के पीछे सरकार के किसी इंतजाम का हाथ नहीं है, दसियों हजार लोगों के बीच जब स्टेशन पर चलने-फिरने की जगह भी नहीं थी, तब वहां तकरीबन नामौजूद रेलवे या दीगर किस्म की पुलिस के रहने से भी बहुत फर्क नहीं पड़ सकता था, क्योंकि किसी भी कीमत पर ट्रेन में चढऩे पर आमादा ऐसी बेतहाशा भीड़ पर काबू पाना शायद फौज के लिए भी आसान नहीं रहता।
जब से कुंभ शुरू हुआ है तब से जिस तरह की भीड़ रेलगाडिय़ों में दिख रही है, वह हैरान करती है कि आस्थावान लोग क्या सोचकर इतना खतरा उठा रहे हैं। कई स्टेशनों के वीडियो देखने मिले हैं कि लोग बांस और बल्लियों से बंद डिब्बों के कांच फोड़-फोडक़र भीतर घुस रहे हैं, और भीतर-बाहर के मुसाफिरों के बीच खुला टकराव चल रहा है। यूपी सरकार हर दिन करोड़-दो करोड़ लोगों के पहुंचने के आंकड़े जारी कर रही है, रेलगाडिय़ां कहीं चल रही हैं, कहीं रद्द हो रही हैं, और सडक़ों का हाल यह है कि किसी-किसी तरफ तो ढाई-तीन सौ किलोमीटर तक सडक़ें जाम हैं। कारें दो-दो दिन अपनी जगह पर फंसी हुई हैं, और उनमें कई जगह बूढ़े लोग, बच्चे, और महिलाएं फंसे हुए हैं। यूपी से दूर मध्यप्रदेश के भीतर सैकड़ों किलोमीटर परे सरकार घोषणा कर रही है कि लोग आगे न जाएं, मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि सरकार और भाजपा के लोग, दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता लोगों की मदद करें।
ऐसा भी नहीं कि कुंभ इसके पहले कभी हुआ नहीं है। इस बार के कुंभ को 144 बरस में आया हुआ बताकर जिस तरह से उसका प्रचार किया गया है, उससे बहुत से लोगों को लगा कि अगर यह मौका चूका तो उनकी जिंदगी में दुबारा यह बारी नहीं आएगी। अपनी धार्मिक आस्था के चलते जितने लोग वहां पहुंचे रहते, वे पहुंचे रहते, लेकिन इस बार कुंभ का रिकॉर्ड बनाने के लिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने हफ्तों या महीनों पहले से जिस तरह का विज्ञापन अभियान शुरू किया था, उससे लोगों के बीच आस्था की एक उत्तेजना बढ़ती चली गई, और लोगों न इंतजाम देखा, न खतरा देखा, और न अपनी ताकत देखी, वे बस उठे और कुंभ के लिए रवाना हो गए। नतीजा यह निकला कि जिस तरह भगदड़ के वक्त कुंभ में करोड़ों लोग इकट्ठा बताए जा रहे हैं, वे वहां किसी सुरक्षा इंतजाम के तहत नहीं थे, वे बस वहां पहुंचे हुए थे। इस किस्म की भीड़ को बढ़ावा देना किसी भी सरकार के लिए उसकी क्षमता से कई गुना बड़ी चुनौती थी, और कुंभ में अब तक यही चल भी रहा है। सिर्फ नई दिल्ली ही नहीं, देश के बहुत से रेलवे स्टेशनों पर कुंभ जाते लोगों की भीड़ और उसकी हिंसा के शिकार आरक्षित सीटों के दूसरे मुसाफिरों की कहानियां भयानक हैं।
अब 144 बरस में एक बार आया यह दुर्लभ मौका बताकर जितने अधिक तीर्थयात्री यूपी में जुटाए गए हैं, वे किसी तरह की हिफाजत का दावा नहीं कर सकते। वे असंभव किस्म की गिनती में वहां पहुंचे हुए हैं, और सरकारी सार्वजनिक न्यौतों के बावजूद उनकी अपनी अक्ल किनारे रखने की उम्मीद उनसे नहीं की जाती है। जो दो बड़े हादसे कुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सामने आए हैं, उनसे कई गुना अधिक बड़ा खतरा मंडरा रहा था, और अभी भी मंडरा रहा है। किसी भी जिम्मेदार सरकार के लिए ऐसी बेकाबू और बेतहाशा भीड़ जुटाने की कोशिश, सार्वजनिक रूप से रात-दिन दुहराए जा रहे न्यौते किसी समझदारी का काम नहीं थे। केन्द्र सरकार और यूपी सरकार दोनों कुंभ को लेकर टक्कर के उत्साह में थीं, और सडक़ों से लेकर पटरियों तक किसी की भी क्षमता ऐसे उत्साह के लायक नहीं थी। महाकुंभ का यह डेढ़ महीने का आयोजन बहुत कुछ गुजर चुका है, इसलिए अब इसमें किसी तरह के पुनर्विचार की कोई चर्चा फिजूल है। लेकिन हम लोगों के लिए अपनी यह सलाह जरूर सामने रख रहे हैं कि ठोस इंतजाम रहते हुए भी उन्हें ऐसे मौके पर कुंभ जाने के पहले कई बार सोचना चाहिए क्योंकि वहां बिना इंतजाम पहुंचने वाली भीड़ के बीच उनका अपना इंतजाम जाने कितना कायम रह पाएगा। केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली क्षमता और योजना शायद आस्थावानों की सामान्य भीड़ का इंतजाम कर पाती, लेकिन न्यौता देकर बढ़ाई गई भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि सरकारों के इंतजाम निहायत नाकाफी रहे, और जनता अगर किसी बड़े हादसे से बची है, तो वह महज एक संयोग है, सरकारी इंतजाम किसी खतरे को टालने लायक बिल्कुल नहीं थे।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां हमारे अखबार का दफ्तर है, वहां सवा साल से नगाड़े ही नगाड़े सुनाई पड़ रहे हैं। ठीक सामने भाजपा का दफ्तर है, और विधानसभा चुनाव से जो शुरूआत हुई, वह लोकसभा चुनाव से होते हुए अब म्युनिसिपल चुनावों तक जारी है, और कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो भाजपा लगातार हर सत्ता पर काबिज हो रही है। पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में भाजपा को उसकी खुद की उम्मीद से बहुत अधिक सीटें मिलीं, और जो कांग्रेस उम्मीद से थी, उसकी बड़ी शर्मनाक हार हुई। लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास पहले से दो सीटें थीं, वे घटकर एक रह गई, और श्रीमती ज्योत्सना महंत ने डबल इंजन की ताकत से डॉ.चरणदास महंत के साथ मिलकर इस प्रदेश में कांग्रेस की नाक बचा ली, वरना लोकसभा में छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के कोई नामलेवा नहीं रहते। अब पंचायत और म्युनिसिपल चुनाव की मतगणना चल रही है तो प्रदेश के सभी दस नगर निगमों में महापौर पद पर भाजपा का कब्जा तकरीबन तय दिख रहा है। 49 नगरपालिकाओं में इस पल 36 पर भाजपा, 8 पर कांग्रेस, और 5 पर अन्य उम्मीदवार पालिका अध्यक्ष बनते दिख रहे हैं। इसी तरह 114 नगर पंचायतों में से 84 के मुखिया भाजपा के लोग बन रहे हैं, 20 पर कांग्रेस के, और 10 पर अन्य। वार्डों में भी बहुत बड़ा बहमुत भाजपा के उम्मीदवारों के साथ है। कांग्रेस अपनी हार मान चुकी है।
अब प्रदेश में अधिकतर जगहों पर म्युनिसिपल के मुखिया भाजपा के रहेंगे, और अधिकतर वार्डों में पार्षद भी। दिल्ली में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है, और विधानसभा चुनावों में भाजपा अपनी जीत के बाद लोकसभा में डबल इंजन के नाम पर वोट मांग रही थी। म्युनिसिपल चुनावों में भाजपा ने तीन इंजन के नाम पर वोट मांगे, और वार्डों में जहां भाजपा है वहां तो पीएम से पार्षद तक सारी सत्ता भाजपा के पास रहेगी, और चार इंजन की सरकार ऐसे वार्डों में रहेगी। जिस वार्ड की रेलगाड़ी में चार-चार इंजन लगे हों, वहां चूक के खतरे भी बढ़ जाते हैं। आज नगाड़ों के बीच नसीहत का मौका नहीं है, लेकिन बधाई देने की औपचारिकता तो आम लोग कर ही रहे हैं, हमारे सरीखे फिक्रमंद लोग पटाखों के बीच भी कुछ तेज आवाज में सावधानी बरतने की नसीहत देते रहते हैं। भाजपा को नगरीय शासन के म्युनिसिपल और वार्डों में मिले भारी बहुमत के साथ-साथ उतनी ही भारी सावधानी भी बरतनी चाहिए। पंचायत और म्युनिसिपल चुनावों में आमतौर पर अधिकतर लोग बार-बार नहीं जीतते क्योंकि एक कार्यकाल पूरा होते-होते या तो लोगों की नाराजगी उनके खिलाफ हो जाती है, या उनके भ्रष्टाचार के किस्से प्रचलन में आ जाते हैं, या अगर पार्षद और महापौर-अध्यक्ष जरूरत से अधिक ईमानदार और कड़े रहते हैं, तो उससे भी लोग खफा हो जाते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जितना छोटा रहता है, उतना ही खतरनाक रहता है। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी रायपुर में तरूण चटर्जी विधानसभा का चुनाव बार-बार जीतने के लिए जाने जाते थे, महापौर भी बनते थे, लेकिन जब वार्ड का चुनाव लड़ा, तो अपने घर से ही हार गए थे। इसलिए जब राज्य शासन के नगरीय प्रशासन विभाग से सहूलियत और सुरक्षा हासिल रहेगी, जब महापौर और अध्यक्ष भाजपा के रहेंगे, तब पार्षद भी भाजपा के रहें तो चार इंजनों की यह रेलगाड़ी समझदारी की पटरी से न उतरे इसका ख्याल भी भाजपा को रखना होगा।
इसके साथ-साथ अब भाजपा अगले करीब चार बरस में अगले विधानसभा चुनाव तक एक कड़ी चुनौती को न्यौता दे चुकी है। अब देश, प्रदेश, शहर, और वार्ड इन तमाम जगहों पर भाजपा के लोगों की ही बहुतायत होने से किसी काम के न होने का कोई बहाना भी नहीं चलेगा, और न ही कोई सफाई दी जा सकेगी। ऐसे दिखने लायक और असरदार काम करना पहले दिन से भाजपा के निर्वाचित नेताओं के सामने चुनौती रहेगी। इस नौबत में संभावनाएं भी खूब हैं, और ताकत के एक ही पार्टी में इकट्ठा हो जाने के खतरे भी रहेंगे। भाजपा के नेता प्रदेश की अधिकतर जगहों पर किसी को किसी काम के लिए मना नहीं कर पाएंगे, और भाजपा के अपने लोगों के किसी गलत काम को रोकने की नौबत भी नहीं रहेगी। जब ताकत बहुत अधिक आ जाती है, तो कई किस्म की गलतियां होने का खतरा भी रहता है। हमने राजीव गांधी की सरकार को ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल के चलते शाहबानो जैसा भयानक गलत काम करते देखा है। और यूपीए-1 सरकार जो कि बाहरी वामपंथी समर्थन से चल रही थी उसे ठीक काम करते देखा है, और जब यूपीए-2 सरकार को समर्थन की जरूरत नहीं रह गई, तब उसमें होने वाले बड़े-बड़े भ्रष्टाचार भी देखे हैं।
लेकिन यह मौका भाजपा के देश के सबसे कामयाब ब्राँड बन जाने का एक और सुबूत है। कमल छाप की पैकिंग में कई कमजोर उम्मीदवार भी जनता के बीच चल जा रहे हैं। पार्टी ने उम्मीदवार छांटने से लेकर आखिरी वोट डलवाने तक के पूरे सिलसिले पर जैसी मजबूत पकड़ बनाई है, वह देखने लायक है। देश में ऐसी मजबूत चुनावी मशीनरी कभी किसी दूसरी पार्टी के पास नहीं रही, और जो राजनीतिक दल भाजपा से सहमत नहीं होते, उन्हें भी उससे दर्जनों चीजें सीखने की जरूरत है। लोकतंत्र में चुनाव जीतकर ही कोई पार्टी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू कर सकती है, इसलिए अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव जीतने का अपना महत्व रहता है। लगातार चुनाव हारने पर भी चैन से घर बैठने का हुनर लोग कांग्रेस से सीख सकते हैं, और एक चुनाव जीतते ही अगला चुनाव चाहे जितना भी दूर हो, उसकी तैयारी में लग जाने की जीवट सोच लोग भाजपा से सीख सकते हैं। यह बात ठीक है कि म्युनिसिपल और पंचायत चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को कुछ फायदा हो सकता है क्योंकि लोगों को लगता है कि सत्ता के साथ जाने से ही उनके इलाकों में काम हो पाएगा, लेकिन सवा साल पहले के विधानसभा चुनाव के वक्त तो प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी बड़ी मजबूत थी, और संपन्न भी थी, लेकिन वह बुरी तरह निपट भी गई। इसलिए सत्ता की ताकत हर चुनाव में काम आए यह भी जरूरी नहीं है। एक बेकाबू और बेहद ताकत सत्ता को किस तरह बेदखल कर देती है, यह छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में देखा हुआ है, और इसलिए अब इस प्रदेश में भाजपा को राज्य सरकार से लेकर म्युनिसिपलों तक सावधानी से काम करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार के सवा साल के कार्यकाल को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि महतारी वंदन सरीखी कई योजनाओं का असर लोकसभा में भी दिखा, और अभी म्युनिसिपल में भी। इसके साथ-साथ पांच बरस के कांग्रेस कार्यकाल के भ्रष्टाचारों से अभी तक जांच एजेंसियों, अदालतों से आने वाली खबरें तकरीबन रोज ही मीडिया में छाई रहती हैं, और उस कार्यकाल की छाया जनता के दिमाग से हटी नहीं है।
आखिर में अब पंचायत के सामने खड़े हुए मतदान को देखें तो लगता है कि म्युनिसिपल चुनावों के नतीजों का उस पर असर पड़ेगा, और वहां भी हो सकता है कि भाजपा के चुने हुए उम्मीदवारों को बहुमत मिल जाए। प्रदेश में हर स्तर पर एक निर्बाध ताकत भाजपा के लिए एक अंदरुनी चुनौती भी रहेगी, लेकिन सफलता से बहस नहीं होती, इसलिए बाकी सरकारों की तरह शहर सरकारों को भी हंड्रेड-डे-हनीमून का हक है।
और चलते-चलते यह चर्चा भी जरूरी है कि प्रदेश का हर चुनाव बुरी तरह हरवाने के बाद अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की बिदाई का वक्त है, और कांग्रेस देश भर में अपने संगठन में बदलाव कर रही है, छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाकर दिल्ली बुलाया गया है, और यह मौका इस राज्य में कांग्रेस को अपना घर सुधारने का भी है। शायद टी.एस.सिंहदेव को इसके लायक समझा जाए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस के बाद अब अमरीका पहुंचे हैं, तो राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ उनकी बहुत महत्वपूर्ण बैठकें हुई हैं। बिफरे हुए सांड के अंदाज में (इस मिसाल के लिए सांड से क्षमायाचना सहित) पूरी दुनिया को चकनाचूर करने में ओवरटाइम कर रहे ट्रम्प भारत के साथ कैसा सुलूक करते हैं इस पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। आज दुनिया का हर महत्वपूर्ण, या अमरीका के लिए नाजुक देश बारीकी से यह देख रहा है कि ट्रम्प उसका क्या भविष्य तय करते हैं, और हिन्दुस्तान भी अमरीका के लिए एक महत्वपूर्ण देश है। मोदी और ट्रम्प की मुलाकात वाले इस दौरे में भारत ने अमरीकी फौजी विमान खरीदने का भी कोई सौदा किया है, और इसकी शर्तें, मोलभाव अभी सामने नहीं आए हैं। फिर भी यह बात साफ है कि ट्रम्प दुनिया के हर देश के साथ आयात-निर्यात का व्यापार संतुलन बराबर करना चाह रहे हैं, और ऐसे में भारत से अमरीका जाने वाले सामानों पर भी कोई टैरिफ लगे या न लगे, इस पर भारतीय कारोबार की नींद हराम हो रखी है, भारतीय शेयर बाजार चौपट पड़ा है। फिर भी इस बात पर गौर करना जरूरी है कि मोदी ट्रम्प से पहले मिलने वाले दो-चार विदेशी शासन प्रमुखों में से एक हैं। इस बारे में बाकी जानकारी अभी खबरों में आती रहेगी, लेकिन आज एक दूसरे मुद्दे पर चर्चा करना जरूरी है।
नरेन्द्र मोदी की एक दूसरी तस्वीर आई है ट्रम्प के सबसे बड़े कारोबारी सहयोगी, टेस्ला नाम की दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी कार कंपनी, एक अंतरिक्ष कंपनी, ट्विटर (एक्स) सहित और कई कारोबारों वाले एलन मस्क के साथ मुलाकात की। एलन मस्क के दो छोटे-छोटे बच्चों से मिलते हुए मोदी उन्हें तोहफे दे रहे हैं। जाहिर है कि यह मुलाकात इसी तरह होनी थी, और इसके लिए मोदी तैयार होकर गए थे। एलन मस्क की ताकत का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री के साथ मस्क की ऐसी औपचारिक बैठक भी हो रही है, और वे अपने बच्चों को भी अमरीकी राष्ट्रपति भवन में ही मोदी से मिलवा रहे हैं। यह तो मेजबान की मर्जी की बात है कि वे मुलाकात के दौरान किसे साथ में रखें। मस्क के पास अमरीकी राष्ट्रपति का दिया हुआ ऐसा एक भी जिम्मा नहीं है कि भारतीय प्रधानमंत्री के साथ वे अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से कोई बात कर सकें। मस्क को ट्रम्प ने सिर्फ यह काम दिया है कि अमरीकी सरकार में फिजूलखर्ची को किस तरह घटाया जा सकता है। यह निहायत ही घरेलू काम है, और इसका अमरीका के बाहर कोई लेना-देना नहीं है। अब ऐसे में राष्ट्रपति भवन में ही आए हुए भारतीय प्रधानमंत्री से मस्क की यह मुलाकात अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कुछ नए पहलू सामने रखती है। एक तो यह कि दुनिया का सबसे संपन्न आदमी भारतीय प्रधानमंत्री से इस तरह मिल रहा है। हो सकता है कि यह भारत के भी कारोबारी हित में हो, और किसी देश के शासन प्रमुख के लिए कारोबारियों से भी अकेले मिलने में कोई अटपटी बात नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या एक अमरीकी कारोबारी अमरीकी राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल ऐसी बैठक के लिए कर सकता है, या फिर दूसरा सवाल यह है कि अगर वह राष्ट्रपति भवन में अपने कारोबार से परे मिल रहा है तो वह राष्ट्रपति या सरकार का किस हैसियत से प्रतिनिधित्व कर रहा है? दिक्कत मोदी के साथ नहीं थी, दिक्कत एलन मस्क की अमरीकी सरकार में हैसियत के साथ है, मस्क अमरीकी सरकार के साथ खरबों का कारोबार करने वाला, अमरीका के दूसरे कारोबारियों के साथ दुश्मनी रखने वाला, और दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में अपने बिखरे हुए कारोबार वाला व्यक्ति है। वह राष्ट्रपति ट्रम्प के सिर पर एक साए की तरह छाया हुआ दिखता है, और बहुत बड़ी अमरीकी पत्रिका, टाईम ने अभी एलन मस्क को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे हुए एक तस्वीर बनाकर तंज कसा था कि वे अघोषित राष्ट्रपति हैं।
हम याद दिलाना चाहेंगे कि अभी ट्रम्प ने राष्ट्रपति भवन के अपने दफ्तर, ओवल ऑफिस में मीडिया से बात की, तो वहीं बगल में एलन मस्क खड़े हुए थे, अपने बेटे को अपने कंधों पर चढ़ाकर रखा था, और मीडिया के सवालों के जवाब वे उसी अंदाज में दे रहे थे। उनके बच्चे राष्ट्रपति के टेबिल के आसपास खेल रहे थे, मस्क की गोद और गर्दन पर चढ़े हुए थे, और बगल में बैठे राष्ट्रपति मस्क को जवाब देते भी सुन रहे थे। यह एक बहुत ही अनोखी, अटपटी, और असाधारण नौबत है जब दुनिया का सबसे रईस आदमी, अमरीकी सरकार के साथ कारोबार करने वाला एक सबसे बड़ा कारोबारी, ट्रम्प के ही टक्कर का सनकी, और वैसी ही भयानक पसंद और नापसंद रखने वाला व्यक्ति अगर अमरीकी राष्ट्रपति के इतिहास में ऐसी अभूतपूर्व ताकत रखता है, तो उसे क्या कहा जाए! खुद डोनल्ड ट्रम्प का परिवार उनके इस कार्यकाल में शपथ ग्रहण के बाद से नहीं दिख रहा है, और उनके इर्द-गिर्द एलन मस्क अपनी सरकारी जिम्मेदारी से परे हर अंतरराष्ट्रीय मामले में टांग अड़ाते हुए रात-दिन दिख रहे हैं।
अमरीकी सरकार की फिजूलखर्ची घटाने की सरकारी जिम्मेदारी से परे एलन मस्क दुनिया के बहुत से देशों के साथ अमरीका के रिश्तों को प्रभावित करने वाले सनकी बयान देते आ रहे हैं। वे ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों की घरेलू राजनीति की जटिलताओं में किसी एक पक्ष के हिमायती होकर किसी दूसरे को हराने के बयान दे रहे हैं, और अमरीका की ऐसी अघोषित विदेश नीति किसी ने देखी नहीं थी, बल्कि दुनिया के किसी भी देश में सरकार पर किसी प्रेतछाया की तरह मंडराने वाला ऐसा इंसान कभी नहीं रहा है। सरकारों के पसंदीदा कारोबारी रहते हैं, इसमें तो कोई लुकीछिपी बात नहीं है, लेकिन सरकार पर अपनी पसंद इस हद तक थोपने का असर रखने वाले ऐसे कारोबारी दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में इसके पहले देखने नहीं मिले हैं। कारोबारी अगर सरकारों पर अपना असर रखते भी हैं तो वह बंद कमरों की बात रहती है, अमरीकी राष्ट्रपति की मीडिया से औपचारिक बातचीत के दौरान उनका कारोबारी दोस्त इस तरह बच्चे को कंधे पर चढ़ाए हुए उन्हीं के दफ्तर में मीडिया के सवालों के जवाब देता रहे, और यह कहता रहे कि हो सकता है कि उसके पहले के कई बयान तथ्यों से परे के रहे हों। अमरीका की विदेश नीति, और अमरीकी सरकार के रूख और उसकी रणनीति दिखाने वाले ऐसे बयान अगर तथ्यों के ठीक खिलाफ दिए गए हैं, तो एलन मस्क किस हैसियत से ऐसा कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, और इससे अमरीका के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर क्या असर होगा, ऐसे सवाल डोनल्ड ट्रम्प के अलावा दुनिया के हर जानकार के मन में उठ रहे होंगे।
हम सरकार और कारोबार का ऐसा घालमेल दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में देखना नहीं चाहते। यह क्रोनी कैपिटलिज्म से बहुत आगे की बात है, और यह पूरे लोकतंत्र को हाईजैक कर लेने का मामला है। ट्रम्प का यह कार्यकाल चार साल के कुछ पहले खत्म हो जाएगा, और अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक वे इसके बाद कभी अमरीकी सरकार में कुछ नहीं बन सकेंगे, लेकिन उनकी दी हुई ताकत से एलन मस्क आज अमरीका की सरकार, उसके विदेश नीति, उसके कारोबार को जिस तरह से हांक रहे हैं, वह हक्का-बक्का करने वाला है।
दिल्ली में शहरी बेघरों के लिए सिर पर छत की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जज, जस्टिस बी.आर.गवई ने सवाल किया कि क्या चुनावों के पहले जिन रेवडिय़ों की घोषणा की जाती है, क्या उनकी बजाय बेघरों को समाज की मूलधारा में लाने की बात नहीं करनी चाहिए ताकि वे भी राष्ट्र की मूलधारा में योगदान कर सकें? जज ने सरकार की तरफ से दाखिल जवाब में इस बात के जिक्र पर भी अफसोस किया कि उसमें बेघरों को दी जाने वाली सुविधाओं का जिक्र है बजाय इसके कि उन्हें किसी काम से लगाया जाए। जज ने पूछा कि क्या हम परजीवियों के एक तबके का निर्माण नहीं कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि इन्हीं चुनावी-रेवडिय़ों की वजह से लोग अब काम करना नहीं चाहते हैं। उन्हें मुफ्त का राशन मिल रहा है जो कि बिना काम किए दिया जा रहा है। उन्होंने अपने निजी अनुभव गिनाते हुए कहा कि उनके किसान परिवार में अब महाराष्ट्र में इन्हीं चुनावी फ्रीबीज की वजह से खेतों में मजदूर नहीं मिल रहे हैं क्योंकि सबको घर बैठे बहुत कुछ मुफ्त मिल रहा है। जनहित याचिका की तरफ से नामी वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि दिल्ली सरकार के चलाए जा रहे शेल्टरों की हालत इतनी खराब है कि उस वजह से भी बेघर लोग वहां जाना नहीं चाहते हैं। इस पर जज ने पूछा कि क्या ऐसे शेल्टर की हालत सडक़ पर सोने से भी ज्यादा खराब है, लोग इन दोनों में से किसे पसंद करेंगे? जस्टिस गवई ने अपना विचार रखा कि लोगों को मुफ्त में चीजें मिलती हैं तो वे अलाल होते जा रहे हैं लेकिन उन्होंने साथ-साथ यह भी माना कि सिर छुपाने का हक लोगों का बुनियादी हक है, और जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे पर तो विचार करना ही है।
चुनावों में किस तरह की लुभावनी घोषणाएं की जाएं, और कैसी न की जाएं इस पर कुछ जनहित याचिकाएं पहले से सुप्रीम कोर्ट में चली आ रही हैं, और पिछले मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ की अगुवाई में एक बेंच इसकी सुनवाई कर रही थी लेकिन यह मामला उनके रिटायर होने तक पूरा नहीं हो पाया था इसलिए इसे अगले मुख्य न्यायाधीश के आने के बाद किसी नई बेंच के सामने पेश करने की बात कहते हुए जस्टिस चन्द्रचूड़ ने इसे रोक दिया था। लेकिन लोकसभा का आम चुनाव निपट जाने की वजह से इसे अधिक प्राथमिकता नहीं मिल पाई, और सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों मामले दस-दस, बीस-बीस बरस से चले आ रहे हैं, और कई मामले व्यापक और तात्कालिक महत्व के रहते हैं, इसलिए मुख्य न्यायाधीश की निजी पसंद-नापसंद पर भी यह रहता है कि वे किन मामलों को पहले देखें। फिलहाल चुनावों में फ्रीबीज का मामला अभी तक किसी किनारे पहुंचा नहीं है, और जस्टिस गवई ने एक दूसरी जनहित याचिका के दौरान वकीलों से चर्चा में यह मौखिक विचार सामने रखा था कि चुनावी तोहफों के बजाय लोगों को स्थाई रूप से देश के कामकाज की मूलधारा में लाया जाना बेहतर होगा।
हम इसी पहलू पर चर्चा करना चाहते हैं कि मध्यप्रदेश से शुरू हुई लाड़ली बहना, छत्तीसगढ़ में चाउर वाले बाबा रमन सिंह की भारी कामयाब पीडीएस प्रणाली, तमिलनाडु में शुरू स्कूलों में सुबह का नाश्ता, और एक-एक करके देश के दर्जन भर राज्यों में अब चल निकली उन राज्यों की महतारियों के लिए सीधे नगदी की योजना का कोई अंत नहीं है। केन्द्र सरकार 80 करोड़ लोगों को हर महीने 5-5 किलो अनाज दे रही है, जिन ग्रामीण इलाकों में रोजगार नहीं रहता, वहां पर मनरेगा जैसी रोजगार योजना ने लोगों को भूखों मरने से बचाया है। इसके अलावा गरीब जोड़ों की शादियां, मुफ्त बिजली, मुफ्त पढ़ाई, मुफ्त इलाज जैसी बहुत सी योजनाएं हैं जिनके मुफ्त शब्द पर कई लोगों को आपत्ति भी होती है कि ये जनता के अपने पैसों पर चल रही हैं, और इन्हें मुफ्त कहना एक गलत शब्दावली है। हम भाषा की बारीकी पर गए बिना यह जरूर सोचते हैं कि वोट पाने के लिए चुनावी तोहफों की शक्ल में राजनीतिक दल जितने वायदे करते हैं, उनके बाद सरकार के बजट में अधिक लचीलापन नहीं बचता है। और जब एक-एक योजना एक-एक राज्य में करोड़ों लोगों को फायदा देने वाली रहती है, तो यह बात तो जाहिर रहती ही है कि इसमें लोगों की बारीक शिनाख्त नहीं हो पाती, और इनमें एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा अपात्र लोगों का भी रहता है। अब एक तरफ सरकारें लोगों को रोजगार देने, या किसी उत्पादक और मुनाफे वाले कामकाज में लगाने से कतराती हैं, और उन्हें सीधे फायदा पहुंचाकर उनसे वोट पाकर किसी तरह पांच साल की सरकार बना लेना चाहती हैं। अर्थशास्त्र के हिसाब से इसमें दो खराबियां हैं। एक तो यह जब इतने व्यापक तबके को किसी योजना में हितग्राही बनाया जाता है, तो उसमें अपात्र लोगों की शिनाख्त मुमकिन नहीं हो पाती। दूसरी बात यह रहती है कि बजट का इतना बड़ा हिस्सा गैररोजगारोन्मूलक कामों में चले जाता है कि देश को इन रेवडिय़ों के एवज में आर्थिक उत्पादकता कुछ नहीं मिलती। अधिक से अधिक गरीब तबकों का पेट भर जाता है, उन्हें दारू पीने को हजार-दो हजार रूपए महीने मिल जाते हैं, राजनीतिक दलों को इसके एवज में वोट मिल जाते हैं, लेकिन यह कीमत खासी महंगी पड़ती है। सरकार बनाने के कुछ अधिक गंभीर तरीके होने चाहिए, बजाय महज लुभावनी योजनाओं से वोटरों को फांसने के, और फिर बजट का बहुत बड़ा हिस्सा उन वायदों को पूरा करने में खर्च करने के।
लोकतंत्र में सरकारों को अपनी कमाई अपनी मर्जी से खर्च करने की तकरीबन पूरी छूट है। और अब तो देश में योजना आयोग भी नहीं रह गया है जहां राज्यों को कमाई और खर्च के अपने आंकड़ों को पेश करना होता था। अब सब कुछ अधिक मनमर्जी से अधिक दूर तक चलने वाला सिलसिला हो गया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले को आगे बढऩा चाहिए, चुनाव आयोग में तो एक किस्म से अपने हाथ झाड़ लिए हैं, लेकिन मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों, और सरकारों को जवाब देना चाहिए कि क्या रेवडिय़ों की बोलियों के बीच मेहनत से कमाने-खाने की चर्चा की कोई गुंजाइश रहनी चाहिए, या फिर देश की जनता को निकम्मा बनाने की कुछ और योजनाओं के बारे में कुछ सोचा जाए? अगर देश की एक बहुत बड़ी आबादी सिर्फ सरकारी मदद और रियायतों की वजह से सामाजिक-मानवीय पैमानों पर एक ठीकठाक जिंदगी जी रही है, तो क्या इसे उस समाज की आर्थिक उत्पादकता भी माना जा सकता है? ये सवाल बड़े अलोकप्रिय, गरीब-विरोधी, और पूंजीवादी लग सकते हैं, लेकिन देश की पूरी अर्थव्यवस्था पूंजीवादी होने के साथ-साथ चुनावी रेवडिय़ों पर आधारित अर्थव्यवस्था भी हो गई है। इस नौबत को सुधारने के रास्ते सुप्रीम कोर्ट में इस बहस के दौरान सामने आ सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
देश में वन नेशन-वन इलेक्शन लागू करने की केन्द्र सरकार की पूरी तैयारी है, लेकिन संसद और अलग-अलग विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ करवाने में कई तरह की संवैधानिक दिक्कतें आएंगी, कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल कम करना पड़ेगा, कुछ का कार्यकाल पूरा हो जाने पर या तो वही सरकार जारी रखनी होगी, या फिर कुछ महीनों का राष्ट्रपति शासन लगाना होगा, ऐसे कई संवैधानिक फेरबदल जरूरी होंगे। हमने बड़े लंबे समय से चुनावों को एक साथ करवाने की वकालत की है। इसके पीछे चुनावी खर्च में कमी का तर्क नहीं है, बल्कि बड़ा मुद्दा यह है कि अलग-अलग चुनाव होते रहने से देश-प्रदेश की सरकारें हर कुछ बरस में तनाव में रहती हैं कि मतदाताओं को कैसे खुश रखा जाए, कौन से ऐसे जरूरी सरकारी कदम न उठाए जाएं जिनसे लोग नाराज हो सकते हैं। अब छत्तीसगढ़ इसकी एक मिसाल है जहां पर विधानसभा चुनावों के छह महीने बाद लोकसभा के चुनाव होते हैं, और उनके करीब छह महीने बाद पंचायत और म्युनिसिपल के। ये तीनों चुनाव सवा साल से अधिक समय तक चलते रहते हैं, और इनमें आधे समय तो आचार संहिता ही लगी रहती है जिससे काम और कारोबार दोनों ही बहुत बुरी तरह प्रभावित होते हैं। लोगों को यह अंदाज नहीं है कि ढाई महीने तक चली लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के दौरान जब राजनीतिक दलों और राजनेताओं वाले, सरकारी या राजकीय कार्यक्रमों के न होने पर कितने किस्म के कारोबार बहुत बुरी तरह प्रभावित होते हैं। खुद अखबारों में सरकार के और राजनीतिक कार्यक्रमों के इश्तहार छपना बंद हो जाता है, और जो अखबार पार्टियों और उम्मीदवारों से वसूली-उगाही नहीं करते हैं, वे और अधिक मुसीबत में आ जाते हैं। ऐसे में अब जब छत्तीसगढ़ इन तीनों चुनावों को निपटाने के करीब है, और सरकार के सवा साल हो चुके हैं, तब चुनाव मुक्त आगे के कार्यकाल की जमकर तैयारी करनी चाहिए। आखिरी का एक साल फिर चुनावी दबावों का रहता है कि उस वक्त कोई कड़ाई नहीं बरती जा सकती, इसलिए सरकार को ये चुनावमुक्त करीब ढाई बरस जमकर इस्तेमाल करने चाहिए।
जैसे किसी खेल के मैदान पर होता है, सामने के खिलाडिय़ों के बीच से रास्ता निकालकर गेंद आगे बढ़ाई जाती है, उसी तरह राज्य सरकारों को यह चुनावमुक्त गलियारा तेजी से आगे बढऩे के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, और इसके लिए तुरंत भिडऩा चाहिए। मुख्यमंत्री की तमाम घोषणाओं के बावजूद सडक़ सुरक्षा के लिए कुछ नहीं हो पा रहा है, पुलिस के पास चुनावों का एक बहाना भी रहता है कि पुलिस बल उसमें उलझ जाता है इसलिए ट्रैफिक सुधारने की गुंजाइश नहीं रहती। अब चुनावों से आजादी है, और प्रदेश में एक काबिल डीजीपी भी काम संभाल चुके हैं। अरूणदेव गौतम इस कुर्सी पर आने के पहले भी सडक़ सुरक्षा के मामले में राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश होते आए हैं, या वहां जवाब दाखिल करने के जिम्मेदार रहे हैं, इसलिए वे इस बात को बेहतर समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट सडक़ सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है। अगर सरकार एक ईमानदार इच्छाशक्ति दिखाए तो इतनी ही पुलिस से वह हर महीने करोड़ों रूपए का जुर्माना वसूल सकती है, और हर बरस सैकड़ों जिंदगियां बचा सकती है। सरकार को बंधी-बंधाई लीक से हटकर यह इंतजाम करना चाहिए कि ट्रैफिक जुर्माने लायक सूचना अगर जनता देती है, तो जुर्माना वसूली के बाद उसका एक हिस्सा उसे भी मिलना चाहिए, और इस जुर्माने की पूरी रकम सीधे-सीधे ट्रैफिक सुधार के लिए दे देनी चाहिए। वोटरों के नाराज हो जाने के खौफ से सत्तारूढ़ नेता कभी सडक़ों पर कड़ाई बरतना नहीं चाहते, लेकिन अब उन्हें यह हिम्मत दिखाना चाहिए कि अगले ढाई-तीन बरस वोटरों को नाराजगी दिखाने का कोई मौका नहीं आने वाला है, और ऐसे में अगर ट्रैफिक को सुधारकर जिंदगियां बचाना दिखाया जा सकेगा, तो अगले विधानसभा चुनाव तक राज्य सरकार की वैसे भी बड़ी वाहवाही होगी।
एक दूसरा मुद्दा जो कि ऐसे ही लंबे चुनावमुक्त दौर में हो सकता है, वह शहरों को सुधारने का है। लोगों को अब याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में चन्द्रशेखर नाम के एक आईएएस अफसर म्युनिसिपल कमिश्नर बने, और उन्होंने बिना किसी भेदभाव के एक साथ पूरे शहर के सडक़ किनारे के कब्जे और अवैध निर्माण हटा दिए, और चौड़ी सडक़ों के किनारे फुटपाथ बन गए, बीच में डिवाइडर बन गए, और नागपुर कुछ महीनों के भीतर ही एक बहुत अधिक सहूलियत वाला, और खूबसूरत शहर हो गया। छत्तीसगढ़ में भी हमने कई दशक पहले एक एडीएम और एक सीएसपी को मिलकर शहर के अवैध कब्जे आसानी से हटाते हुए देखा है। आज पूरे प्रदेश में शहरों में अवैध कब्जे और अवैध निर्माण मिलकर सडक़ों को खत्म कर चुके हैं। जहां-जहां सरकार करोड़ों रूपए लगाकर सडक़ चौड़ी भी करती है, वह भी पूरी की पूरी कारोबारी पार्किंग में खत्म हो जाती है, उससे सरकार को कुछ नहीं मिलता। अब सरकार को दिल कड़ा करके शहरों को सुधारना चाहिए क्योंकि अगर वोटरों को उसके इस कार्यकाल में शहरी सहूलियतें और सुंदरता दिखने लगेंगी, तो उसे अगला चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक पाएंगे। शहरों के अलावा कस्बों में, और गांवों में भी अवैध कब्जों से जहां-जहां जनजीवन में दिक्कत आती है, उसे बिना भेदभाव अगर हटाया जाए, तो जनता भी सरकार का साथ देगी। इसी राजधानी रायपुर में जब आर.पी.मंडल पीडब्ल्यूडी सचिव थे, और बिना इस्तेमाल वाली नहर को पाटकर केनाल रोड बनाना था, तो उन्होंने जाकर मुख्य सचिव से अनुरोध करके उनके बंगले का एक हिस्सा तोडक़र सडक़ की चौड़ाई जारी रखी थी। जब कोई भेदभाव नहीं किया जाता, तो जनता भी साथ देने लगती है, और सरकार के भीतर से भी कोई विरोध नहीं होता।
हम अभी सिर्फ उन्हीं व्यापक मुद्दों की चर्चा कर रहे हैं जिनसे जनता बड़े पैमाने पर प्रभावित होने जा रही है, शुरू में कुछ लोग नाराज होंगे, लेकिन फिर सार्वजनिक सहूलियत देखकर उनकी भी नाराजगी जाती रहेगी। सत्तारूढ़ पार्टी को अपने लोगों को भी इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि वे ट्रैफिक, सडक़, और शहरी सुधार में हाथ बंटाएं, न कि अड़ंगा डालें। पंचायत और म्युनिसिपल चुनावों में जो नए जनप्रतिनिधि जीतकर आएंगे, उन्हें भी शुरू से ही समझ आना चाहिए कि उनका काम गैरकानूनी चीजों को बढ़ावा देने का नहीं है, बल्कि स्थानीय सुधार, विकास, और सडक़ सुरक्षा जैसे व्यापक महत्व के काम उनकी जिम्मेदारी है। राज्य सरकार को कड़ाई से सुधार करने के लिए बड़ी तैयारी करनी चाहिए, और मतदाताओं की फिक्र किए बिना काम करने का यह एक बड़ा मौका है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
तिरुपति के लड्डुओं के लिए मिलावटी घी सप्लाई करने वाली तीन डेयरी कंपनियों के मालिकों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। कुछ महीने पहले जब गुजरात की एक डेयरी प्रयोगशाला से यह रिपोर्ट आई थी कि तिरुपति के लड्डुओं में गाय और सुअर की चर्बी मिला हुआ घी इस्तेमाल हो रहा है, तब बड़ा हंगामा हुआ था। हर बरस करोड़ों लोग तिरुपति के दर्शन को जाते हैं, और कई करोड़ लड्डू का प्रसाद पाकर, या अधिक प्रसाद खरीदकर लौटते हैं। तिरुपति की मान्यता इतनी अधिक है कि दक्षिण भारत में अनगिनत कारोबारी तिरुपति के भगवान को अपने कारोबार में भागीदार बनाते हैं, और कमाई में उनका हिस्सा दान में भेज देते हैं। यह प्रचलित चर्चा है कि वे अपने इंकम टैक्स रिकॉर्ड में भी यह भागीदारी दिखाते हैं, अब यह पता नहीं कितनी सच बात है। अभी जिन तीन कंपनियों के मालिकों को मिलावटी घी सप्लाई के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है, उनमें एक वैष्णवी डेयरी, एक भोले बाबा डेयरी, और एक ए.आर.डेयरी के नाम आए हैं, और गिरफ्तार होने वाले लोगों में विपिन जैन, पोमिल जैन, अपूर्व चावड़ा, और राजू राजशेखरन हैं। इनकी कंपनी, और इनके खुद के नामों का एक महत्व है कि ये सारे के सारे जैन और हिन्दू नाम हैं जिनके बारे में यह माना जा सकता था कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय और हिन्दू आस्था के सबसे बड़े केन्द्र में प्रसाद के लिए घी सप्लाई करते हुए वे चर्बी सप्लाई करने के पहले मर जाना पसंद करेंगे। लेकिन उन्होंने धड़ल्ले से ऐसा घी सप्लाई किया, यह एक अलग बात है कि अब केन्द्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के बड़े भागीदार चन्द्रबाबू नायडू के राज वाले आन्ध्र में तिरुपति मंदिर के नाम पर अप्रिय चर्चा खत्म करने के लिए अब उस घी को सिर्फ मिलावटी घी कहा जा रहा है, और चर्बी और जानवरों के नाम की चर्चा खत्म हो गई है। आखिर तिरुपति आन्ध्र की पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है, और साथ-साथ हर बरस शायद इस मंदिर में डेढ़ हजार करोड़ का चढ़ावा आता है जिससे क्षेत्रीय विकास भी होता है।
किसी किस्म के अच्छे या बुरे कारोबार से किसी धर्म का कोई खास लेना-देना होता हो ऐसा हमें नहीं लगता। पाकिस्तान में ईदी फाउंडेशन के संस्थापक एक मुस्लिम बुजुर्ग दुनिया का सबसे बड़ा एम्बुलेंस नेटवर्क चलाते हैं, और हिन्दुस्तानियों को याद रखना चाहिए कि कई बरस पहले भारत से भटककर पाकिस्तान चली गई एक लडक़ी को भी अपने परिवार में उन्होंने रखा था। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान से बीफ निर्यात करने वाली कंपनियों के मालिकों में तकरीबन तमाम नाम हिन्दुओं के हैं, जिन्होंने अपनी कंपनियों के नाम मुस्लिम किस्म के रख लिए हैं। इसलिए तिरुपति के सालाना करोड़ों श्रद्धालुओं को चर्बी वाले लड्डू देने का जुर्म करने वाले हिन्दू और जैन निकले हैं, तो यह देश में आज के तनाव के माहौल में एक राहत की बात है।
लेकिन कुछ नास्तिकों के मन में इस पूरे सिलसिले से यह सवाल भी उठेगा कि जब ईश्वर के अपने घर में, तिरुपति के भगवान को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में इस तरह की मिलावट हो रही थी, तो ऐसे मुजरिमों पर कोई दैवीय मार क्यों नहीं पड़ी? करोड़ों श्रद्धालुओं की शाकाहारी आस्था को खत्म करने वाले लोग अब तक गिरफ्तार होने के लिए जिंदा क्यों हैं? ईश्वर खुद तो पत्थर की प्रतिमा की शक्ल में वहां पर हैं, और उन्हें चढ़ाया जाने वाला प्रसाद वे खुद तो खाते नहीं होंगे, उन्हें परोस देना मानकर, उसके बाद उसे श्रद्धालुओं में बांटा जाता होगा। ऐसे में ईश्वर का तो कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन शाकाहारी श्रद्धालुओं की जिंदगी भर की कड़ाई अनजाने में खत्म हो गई। यह बात भी कुछ अजीब लगती है कि जिसे अंतर्यामी माना जाता है, जिसे सर्वज्ञ, सर्वत्र, कण-कण में माना जाता है, उसकी नजरों से यह मिलावट कैसे बच गई? जिस जगह की आस्था इतनी है कि लोग वहां सिर मुंडाकर दर्शन के बाद लौटते हैं, प्रसाद का लड्डू पाते हैं, और बाकी परिचितों के लिए भी और प्रसाद खरीदकर लाते हैं, अपनी क्षमता से आगे बढक़र वहां की दान-थैली में रकम और गहने डालते हैं, उन सबकी आस्था के लिए यह एक बड़ी चुनौती हो गई होगी कि वहां के ईश्वर ने प्रसाद में ऐसी भयानक, हिंसक और मांसाहारी मिलावट कैसे हो जाने दी? जिस ईश्वर को सर्वशक्तिमान माना जाता है, उसका चक्र हाथ की उंगली से निकलकर जाकर ऐसे डेयरी मालिकों के गले क्यों नहीं काट पाया? ऐसे ईश्वर के हाथ से बिजली कडक़कर क्यों नहीं निकली, और उसने जाकर इन लोगों को भस्म क्यों नहीं कर दिया? ऐसे कई सवाल लोगों के मन में उठ सकते हैं, यह एक अलग बात है कि आस्था के बाजार में सवालों को फुटपाथ पर भी कारोबार करने को जगह नहीं मिलती, धार्मिक पुलिस तुरंत ही तमाम प्रश्नवाचक चिन्हों को खदेडक़र बाहर कर देती है।
दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि मठों और मंदिरों के जमीन-जायदाद में घपला करने वाले लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता। बल्कि बहुत से धार्मिक केन्द्रों को संभालने वाले धार्मिक मुखिया उन जगहों पर आर्थिक और नैतिक सभी किस्म का घोटाला करते रहते हैं, और यह सब तो उसी छत के नीचे होता है जिस छत के नीचे ईश्वर खुद बसते हैं। लोग बूढ़ी गायों के नाम पर, अनाथ बच्चों के नाम पर घोटाले करते रहते हैं, और उनका बाल भी बांका नहीं होता। इन सबसे मन में यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच ही धर्म कहीं किसी जुर्म के आड़े आता है? अभी लोगों ने देखा होगा कि राष्ट्रपति बनते ही डोनल्ड ट्रम्प अमरीका की परंपरा के मुताबिक एक चर्च गए थे, और वहां पर महिला बिशप ने प्रार्थना सभा में प्रवचन करते हुए ट्रम्प से सीधे-सीधे कहा कि उन्हें ट्रांसजेंडरों, आप्रवासियों पर रहम करनी चाहिए, उन्हें दयालु रहना चाहिए। उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं, और ये बातें अमरीका में धर्म की राजनीति करने वाले, पक्के ईसाई डोनल्ड ट्रम्प के एक कान से घुसीं, और दूसरे कान से निकल गईं। उनके भीतर अगर धर्म कहीं था भी, तो उसे ये बातें छू भी नहीं पाईं।
यह पूरा सिलसिला ईश्वर की सत्ता, उसके जनकल्याणकारी होने, या उसके होने पर ही सवाल खड़े करता है। आपका क्या ख्याल है?
उत्तरप्रदेश में चल रहे महाकुंभ की खबरों को देखें तो हैरानी होती है कि आस्था लोगों से कैसी-कैसी तकलीफें उठवा लेती है। न सिर्फ प्रयागराज के आसपास, बल्कि उत्तरप्रदेश से लगे हुए पड़ोसी प्रदेशों तक हाल यह है कि वहां से ही ट्रैफिक रोक देना पड़ रहा है। एक खबर बताती है कि प्रयागराज से ढाई सौ किलोमीटर पहले ही मध्यप्रदेश में पुलिस ने आगे बढऩा रोक दिया है, और बताया है कि प्रयागराज के चारों तरफ सातों सडक़ों पर कई किलोमीटर का जाम है, और इसमें अगले कई दिन तक कोई कमी नहीं आनी है। एमपी पुलिस ने बताया कि दो सौ-तीन सौ किलोमीटर का जाम लगा है, आगे बढऩा नामुमकिन है। कुछ दूसरी खबरें बताती हैं कि शहर के लोग अपने घरों से निकल नहीं पा रहे हैं, स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान ऑनलाईन लेने पर विचार चल रहा है क्योंकि छात्र-छात्राओं का स्कूल-कॉलेज पहुंचना मुमकिन नहीं है। एमपी के रीवां में प्रयागराज हाईवे पर 72 घंटे से जाम है, और जाम में फंसे हुए श्रद्धालुओं का हौसला टूटने पर भी वे वापिस नहीं मुड़ सकते। कुछ लोगों ने बताया कि चार-चार लेन पर इंच-इंच पर गाडिय़ां जाम हैं, और महिलाओं के लिए सडक़ किनारे शौच के लिए जाना भी नहीं हो पा रहा है। स्टेशन पर भयानक भीड़ है, डिब्बों में किसी भी तरह से लोग घुस रहे हैं, और किसी रिजर्वेशन का कोई मतलब नहीं रह गया है। एमपी के सीएम मोहन यादव ने ट्विटर पर लिखा है कि कुंभ जा रहे मध्यप्रदेश व अन्य जगहों के श्रद्धालुओं का रीवां से लेकर जबलपुर, कटनी, सिवनी जिलों तक रास्ता रूक गया है, और वाहनों में ज्यादातर बुजुर्ग महिलाएं, और बच्चे शामिल हैं। उन्होंने सरकारी अमले के साथ-साथ श्रद्धालुओं और जनप्रतिनिधियों से भी सहयोग करने की अपील की है। लोगों का कहना है कि प्रयागराज के आसपास कई तरफ लोग 24 घंटे से लेकर 48 घंटे तक सिर्फ अपनी गाडिय़ों में फंसे हुए हैं।
इस महाकुंभ में हुई एक भगदड़ में करीब 30 लोगों के मरने की खबरें थीं, लेकिन यूपी की योगी सरकार ने कुछ रहस्यमय कारणों से मौतों की खबर ही जारी नहीं होने दी थी। जिस तरह दसियों हजार करोड़ रूपए लगाकर इस महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है, वह कई सवाल खड़े करता है। जिस यूपी में पैसों की कमी से हजारों स्कूलें बंद हो चुकी हैं, वहां पर एक धार्मिक आयोजन के लिए, तीर्थयात्रियों की संख्या का रिकॉर्ड कायम करने के लिए योगी ने पैसा बहा दिया है। अब क्या सचमुच इतने खर्च की जरूरत थी, या आस्था के बीच ऐसे किसी भी लोकतांत्रिक सवाल को उठाना आज जुर्म कहा जाएगा, यह सोचना कुछ मुश्किल है। यह बात बहुत साफ है कि महाकुंभ में करोड़ों आस्थावान खुद होकर पहुंचे रहते, लेकिन इस बार योगी सरकार ने जिस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ खर्च करके इसका प्रचार किया, उसकी वजह से आने वाले लोग भी बढ़े, और जो लोग इसके पहले अयोध्या के राम मंदिर नहीं जा पाए होंगे, उनके लिए यह दो तीरथ एक साथ करने का मौका भी था। लेकिन जितने लोगों के आने का अंदाज था, उनके हिसाब से भी तैयारी करना मुमकिन नहीं था, और सुरक्षित तो बिल्कुल भी नहीं था। एक दिन, एक वक्त, एक जगह पर करोड़ों लोगों का इकट्ठा होना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, और न्यौता भेज-भेजकर इस चुनौती को और बड़ा किया गया था। वैसे तो आस्था का समझ से अधिक रिश्ता रहता नहीं है, फिर भी यह सवाल उठता है कि क्या किसी जिम्मेदार सरकार को इतनी भीड़ के खतरों को इस हद तक और बढ़ाना था?
सभी धर्मों में कुछ खास दिनों पर किसी तीर्थस्थान पर भीड़ जुटती ही है। नागपुर में हर बरस दीक्षा भूमि में 10 लाख से भी अधिक लोग एक जगह आते हैं। हज यात्रा में भी मक्का में एक वक्त 18-20 लाख लोग इकट्ठा होते हैं, और उनके बीच भगदड़ में कई बार बहुत लोग मारे गए हैं। कुछ बरस पहले एक ही दिन में 24 सौ लोग मरे थे। लेकिन कुंभ की भीड़ तो मानवीय क्षमता से मुमकिन इंतजाम के मुकाबले भी बहुत अधिक बड़ी रहती है। और जब ऐसी भीड़ निजी कारों में भी आने दी जा रही है, तो जाहिर है कि वह सडक़ और पार्किंग सबको अधिक घेरेगी। यह बात हमारी समझ से परे है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने का यह दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा मौका था, और कुंभ के चारों तरफ सौ-दो सौ किलोमीटर से सिर्फ बसों में आवाजाही अगर की गई होती, तो पैसा, पर्यावरण, ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, समय सब कुछ बचा होता। एक बस के लायक मुसाफिर 15-20 कारों में पहुंच रहे हैं, और सरकार यहां पर एक कल्पनाशीलता दिखा सकती थी।
अच्छा हो कि कुंभ का यह आखिरी हफ्ता बिना किसी हादसे के निपट जाए, लेकिन सरकार के भीतर इस बात पर विचार जरूर होना चाहिए कि ऐसी अपार भीड़ के क्या-क्या खतरे हो सकते थे, और किसी भी जिम्मेदार सरकार को ऐसी बेहिसाब भीड़ से बचना चाहिए जिसमें कोई भी अप्रिय नौबत आने पर पुलिस कुछ न कर सके। आस्था के साथ न बहस हो सकती, न तर्क-वितर्क हो सकता, इसलिए हम यह नहीं कहेंगे कि लोगों को कुंभ के गिने-चुने दिनों में गंदे हो चुके पानी में डुबकी लगाने के बजाय बाद में इत्मिनान से परिवार सहित वहां जाना चाहिए था, ताकि वे चैन से कुछ वक्त गुजार सकते, लेकिन आस्था के साथ यह सब बात नहीं हो सकती। सरकार को लोगों को उनकी आस्था तक सीमित रखना था, उसे महंगे प्रचार से लोगों की भीड़ को और नहीं बढ़ाना था। इतने बड़े पैमाने पर कोई सुरक्षा इंतजाम हो नहीं सकता था, आज भी यह माना जाना चाहिए कि बहुत बड़े हादसे के बिना अगर यह निपटा है, निपट रहा है, तो वह लोगों की मेहनत के साथ-साथ एक संयोग की बात भी है। पूरी दुनिया में इससे बड़ा कोई धार्मिक जमावड़ा होता नहीं है, और यह भी कहा जा रहा है कि 144 बरस बाद आया हुआ महाकुंभ था। ऐसे में महाकुंभ के इस आयोजन से अलग-अलग प्रदेशों की सरकारों को बहुत कुछ सीखने मिला होगा, हमने कुंभ शुरू होने के पहले ही यह सलाह दी थी कि सरकारों को, और आईआईएम जैसे मैनेजमेंट संस्थानों को अपने लोगों को यहां सीखने के लिए भेजना चाहिए था। हो सकता है कि उन्होंने इस मौके का फायदा भी उठाया हो। फिलहाल चाहे जायज खर्च से, चाहे नाजायज फिजूलखर्ची से, इतने बड़े इंतजाम को करने के लिए योगी सरकार और उनके अमले को तारीफ तो मिलनी ही चाहिए, और इसमें जितना और सुधार हो सकता था, उसका सबक भी लेना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की राज्य सरकार और वहां के राज्यपाल के बीच चल रहे एक टकराव पर हैरानी जाहिर की है कि और कहा है कि अगर राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयकों पर सरकार को कोई सूचना दिए बिना उन्हें अंतहीन रोककर रखते हैं, तो इस गतिरोध का क्या समाधान होगा। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों के बेंच ने कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक से असहमति के आधार पर सरकार को अपनी राय बताए बिना उसे इस तरह रोक नहीं सकते। जजों ने कहा कि राज्यपाल को तुरंत ही सरकार को अपनी असहमति या आपत्ति बतानी चाहिए क्योंकि सरकार को खुद होकर कैसे पता लगेगा कि राज्यपाल उसे क्यों रोककर बैठे हैं। अदालत ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 200 के पहले ही प्रावधान के मुताबिक राज्यपाल को असहमत होने पर विधेयक विधानसभा को जल्द से जल्द वापिस करना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 2023 में तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की थी कि राज्यपाल के पास एक दर्जन विधेयक पड़े हुए हैं जिन्हें वे मंजूरी नहीं दे रहे, इनमें से एक विधेयक तो जनवरी 2020 से पड़ा हुआ है। कई बरस तक विधायकों को रोकने के बाद राज्यपाल ने घोषणा की कि वे 10 विधेयकों को मंजूरी नहीं दे रहे, और रोक रहे हैं। इसके बाद राज्य सरकार ने विधानसभा में इन्हीं विधेयकों को फिर से पारित किया, और इनमें से कुछ विधेयक सीधे राष्ट्रपति को भेजे गए।
यह राष्ट्रपति और राज्यपाल को संविधान में मिले हुए अधिकारों का साफ-साफ बेजा इस्तेमाल है। और ऐसा बहुत से दूसरे राज्यों में भी हुआ है, पंजाब में भी अभी कुछ महीने पहले ही राज्यपाल को अदालती फटकार लगी थी। देश के कई राज्यों में अलग-अलग समय पर सरकारों को राज्यपाल के खिलाफ अदालत तक जाना पड़ा है। अधिकतर मामलों में यह देखा गया है कि जब केन्द्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों या गठबंधनों की सरकारें रहती हैं, तब यह टकराव खड़ा होता है। किसी राज्यपाल का विवेक उस वक्त नहीं जागता जब उसे मनोनीत करने वाले गठबंधन या पार्टी की ही सरकार राज्य में भी रहती है। यह सिलसिला भारत के संविधान में की गई एक निहायत गैरजरूरी व्यवस्था की वजह से चल रहा है जिसे राज्यपाल कहते हैं। दुनिया के बहुत सारे लोकतंत्रों को देखें तो वहां संविधान प्रमुख नाम की कोई चीज नहीं है। न राष्ट्रपति हैं, और न राज्यपाल। वहां सिर्फ शासन प्रमुख हैं जिन्हें कहीं राष्ट्रपति कहा जाता है, और कहीं प्रधानमंत्री। जब भारतीय लोकतंत्र में कार्यपालिका, न्यायपालिका, और विधायिका के बीच शक्तियों और संतुलन का एक पर्याप्त कारगर ढांचा बना हुआ है, उस वक्त केन्द्र पर सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन की राजनीतिक साजिशों को चलाने के लिए राज्यपाल की व्यवस्था और उसका इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है, और इसे संवैधानिक व्यवस्था कहा जाता है। दुनिया के बाकी बहुत से सभ्य लोकतंत्रों में इस व्यवस्था के बिना मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाने का काम कर देते हैं, जो कि हिन्दुस्तान में भी जारी व्यवस्था है, यहां भी राष्ट्रपति या राज्यपाल को देश और प्रदेश के मुख्य न्यायाधीश ही शपथ दिलाते हैं। अब जो राष्ट्रपति और राज्यपाल को शपथ दिलाते हैं, वे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को शपथ क्यों नहीं दिला सकते?
फिर जहां तक किसी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता देने की बात है, तो हमने देखा है कि न सिर्फ राज्यपाल, बल्कि जिसे तटस्थ रहना चाहिए, वह विधानसभा अध्यक्ष भी राजनीतिक साजिशों में खिलाड़ी की तरह शामिल हो जाते हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष दोनों के बारे में अभी पिछले ही बरस सुप्रीम कोर्ट को क्या-क्या नहीं कहना पड़ा था। हो सकता है कि अंग्रेजों को इस तरह की व्यवस्था ठीक लगी हो क्योंकि उन्हें दूर बैठकर इस देश पर सरकार चलाना था, लेकिन भारतीय संविधान बनाने वाले लोगों को इस बात का शायद अंदाज नहीं था कि संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग भी घटिया दर्जे की राजनीति के खिलाड़ी बनकर अगला कार्यकाल और गर्व दोनों पाने लगेंगे।
राष्ट्रपति और राज्यपाल अगर सरकारों पर हावी हो जाते हैं, तो यह जनता की चुनी गई सरकारों की हेठी भी है। हमने मणिपुर की हिंसा के दौरा में बार-बार इस बात को उठाया था कि एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति रहते हुए भी मणिपुर में आदिवासियों के बड़े पैमाने पर कत्लेआम पर भी उनका मुंह नहीं खुला था, उन्होंने सरकार से जवाब-तलब नहीं किया था, वहां जाने की जहमत भी नहीं उठाई थी। ऐसे राष्ट्रपति पद की देश में जरूरत क्या है? कहने के लिए यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति सरकार, अदालत, और संसद से परे हैं, लेकिन राष्ट्रपति के अधिकारों को देखें तो वह एक किस्म से केन्द्र सरकार के रबर स्टैम्प से अधिक कुछ नहीं है। इसके अलावा जितने किस्म के मनोनयन के अधिकार राष्ट्रपति के पास रहते हैं, उन सबका इस्तेमाल केन्द्र सरकार ही करती है। इसी तरह राज्यों में विश्वविद्यालयों के कुलपति बनाने का जो अधिकार राज्यपाल के पास है, वह केन्द्र की सत्तारूढ़ सरकार की मर्जी से किए जाने वाले मनोनयन का रहता है, और जो राज्य सरकार से टकराव के साथ चलता है। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार पर संवैधानिक लगाम के नाम पर देश और प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख का यह सिलसिला निहायत बोगस है। इसे खत्म करने के लिए हमारी सरीखी सोच वाले कुछ ऐसे लोगों की जरूरत है जो अंग्रेजों की गुलाम मानसिकता से परे यह सोच सकें कि हर तरह का फेरबदल हो सकता है। बिना राष्ट्रपति और राज्यपाल के दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमरीका चलते आया है, और वहां इन दोनों दफ्तरों पर कानूनी लगाम लगाने के लिए अदालतें अपना काम करती रहती हैं, वहां की संसद अपना काम करती है।
अलग-अलग लोकतंत्रों में व्यवस्थाएं अलग-अलग रहती हैं, लेकिन निर्वाचित सरकार के हाथ-पैर बांध देने वाला राजभवन सबसे ही बोगस व्यवस्था है, और इसे बिना देर किए खत्म किया जाना चाहिए। पिछले दशकों में अलग-अलग केन्द्र सरकारों ने एक से बढक़र एक रद्दी लोगों को राज्यपाल बनाने का काम किया है, और अगर लोग घटिया नहीं भी थे तो भी उन्होंने राजभवन के सुख को पाने के लिए, या उससे बड़े राजभवन में जाने के लिए केन्द्र सरकारों के तलुए सहलाते हुए लोकतंत्र विरोधी काम करके दिखाया है। राज्यपालों के शर्मनाक काम इतने अधिक हो चुके हैं कि किसी इज्जतदार व्यक्ति को राज्यपाल बनना भी नहीं चाहिए। चूंकि राजनीतिक दलों को अपने ढाई दर्जन लोगों को खपाने के लिए राजभवन एक अच्छा डेरा है, इसलिए कोई राजनीतिक दल इस व्यवस्था को खत्म करना नहीं चाहते, लेकिन लोकतंत्र में जनता की तरफ से यह आवाज उठनी चाहिए कि उसने जिस सरकार को चुना है उसके सिर पर ऐसा मनोनयन क्यों थोपा जा रहा है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
राज्यसभा में कल इस बात पर बड़ी फिक्र जाहिर की गई कि देश में जंकफूड की खपत बढ़ते चल रही है, और इससे सेहत का बड़ा नुकसान हो रहा है, इससे देश में गैरसंक्रामक रोग बढ़ते चल रहा है। सदन में यह कहा गया कि खाने-पीने के विज्ञापन बच्चों को निशाना बनाते चलते हैं, और उन्हें जंकफूड की लत लगती जा रही है। संसद में यह एक अच्छी बात रही कि हल्ले-गुल्ले और एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलने से परे कुछ समझदारी की बात भी हुई, और भाजपा सांसद सुजीत कुमार ने डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के हवाले से कहा कि 2006 से 2019 के बीच डिब्बा या पैकेटबंद जंकफूड की खपत 40 गुना बढ़ी है। भारत की स्वास्थ्य शोध संस्थान आईसीएमआर के मुताबिक गैरसंचारी रोगों (गैरसंक्रामक) से होने वाली मौतें 1990 में 37.9 फीसदी थीं, जो बढक़र 2016 में 61.8 फीसदी हो गई है।
भारत में खानपान का हाल यह है कि जो पैकेटबंद मीठे-नमकीन सामान पहले शहरों तक सीमित रहते थे, वे हाल के बरसों में गांव-गांव तक पहुंच गए हैं, और जाने-अनजाने सभी किस्म के ब्राँड सडक़ किनारे की दुकानों से लेकर बस्तियों के बीच फुटपाथी दुकानदारों तक बिखरे दिखते हैं। अब मजदूरों के लिए भी यह आसान हो जाता है कि काम के बीच रोते हुए बच्चों को शांत करने के लिए कोई पैकेट खरीदकर दे दिया जाए। नतीजा यह हो रहा है कि अधिक नमक, अधिक शक्कर, और अधिक तेल-घी बच्चों, बड़ों सबके पेट में पहले से कई गुना अधिक जा रहा है, और उनकी आगे की जिंदगी को खराब करने की गारंटी कर रहा है। दूसरी तरफ देश में परंपरागत पान-सुपारी का शौक अब गुटखा-तम्बाकू की तरफ खिसक चुका है, और वह कैंसर में अंधाधुंध बढ़ोत्तरी कर रहा है।
जब हम जंकफूड या फास्टफूड पर किसी तरह की लगाम की बात करते हैं, तो पहली नजर सरकार की तरफ उठती है कि उसे कुछ नियम बनाकर सामानों की पैकिंग पर नमक, शक्कर, और फैट की मात्रा साफ-साफ लिखवानी चाहिए। सरकार से यह उम्मीद भी की जाती है कि वह समाज में जागरूकता लाने की कोशिश करे कि फैक्ट्रियों में बने हुए, और डिब्बा, पैकेट, और बोतल में बंद खाने-पीने के तकरीबन तमाम सामान सेहत के लिए अच्छे नहीं रहते हैं। इसके साथ-साथ सरकार से यह उम्मीद भी की जाती है कि वह रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, बस अड्डों, स्कूल-कॉलेज के कैंटीन-कैफेटेरिया में जंक का बेहतर विकल्प, अधिक सेहतमंद खान-पान उपलब्ध कराए। आज इनमें से अधिकतर जगहों को ठेकों पर दे दिया गया है, और ठेकेदार कंपनियों के कारोबारी हित में रहता है कि वे जंकफूड, और खासकर महंगा सामान ही वहां पर रखें। आज हालत यह हो गई है कि इन जगहों पर गरीब भी नहीं खा पाते, और जिन्हें सेहत की फिक्र रखनी है, वे भी नहीं खा पाते। और सरकार ने खानपान के कारोबारियों को सब कुछ ऐसे ठेके पर दे दिया है कि उसका मानो कोई बस ही नहीं बचा है।
इससे परे जब हम समाज को देखते हैं, तो खाते-पीते घरों के बच्चों को इसी तरह के खानपान की आदत लग रही है, वे जिन जन्मदिन की पार्टियों में जाते हैं, वहां जंक के अलावा और कोई खानपान नहीं रहता, और घर पर भी इन बच्चों की पहुंच बाजारू डिब्बा-पैकेटबंद चीजों तक पूरे वक्त रहती है। परिवार के अधिकतर लोग काम करने वाले रहते हैं, या फिर टीवी और मोबाइल के साथ जुटे रहते हैं, उनके लिए भी बच्चों को अलग से व्यस्त रखने के लिए इस किस्म का खानपान सहूलियत का सामान रहता है। कोई हैरानी नहीं है कि भारत दुनिया में बच्चों के डायबिटीज की राजधानी बन चुका है। जैसी कि कल संसद में फिक्र जाहिर की गई है, खानपान के इश्तहार बच्चों को निशाना बनाकर बनाए जाते हैं, जो कि दुनिया के बहुत से विकसित देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित बात है।
अब बच्चों से परे बड़ों की बात करें, तो हॉस्टल में रहने वाले, दूसरे शहरों में जाकर काम करने वाले, या किसी दाखिला इम्तिहान, नौकरी के मुकाबले की तैयारी करने वाले नौजवानों के लिए भारत के तमाम शहरों में मोबाइल फोन पर ऑर्डर देते ही 15-20 मिनट में मनचाहा खाना पहुंच जाता है, और यह अलग-अलग जगहों से बुलाया जा सकता है, और बाजारू स्वाद की वजह से लोगों को बेहतर लग सकता है। फिर यह भी है कि ऐसे खाने को खत्म करने का भी एक मानसिक दबाव रहता है, और लोग भूख से कुछ अधिक बुलाते हैं, और कुछ या काफी अधिक खाते हैं। नतीजा हर बरस उनके कपड़ों का साईज बढऩे की शक्ल में दिखता है। चूंकि ऐसे लोग आमतौर पर घरेलू रसोई से दूर रहते हैं, इसलिए मनचाहा खाना बुलाना उनके लिए सहूलियत की बात भी रहती है, और मजबूरी की भी।
आज निजी या सरकारी, जितने किस्म के बाजार हैं, उनमें खानपान की विविधता पर कोई काबू नहीं रहता। अब समय आ गया है जब देश और प्रदेश की सरकारों को, और स्थानीय म्युनिसिपलों को भी यह देखना होगा कि हर कुछ दूरी पर सेहतमंद खानपान किस तरह मुहैया कराया जा सकता है? आज तो चाहकर भी लोग सादा खानपान ढूंढ नहीं पाते, कटे हुए फल और सब्जियों के सलाद ढूंढे नहीं मिलते। अब सरकारों को ही खानपान की जागरूकता फैलाने के साथ ही इस तरह के सेहतमंद सामानों की दुकानों के लिए जगह तय करनी चाहिए, और इनकी उपलब्धता की गारंटी करनी चाहिए। इन दोनों तरीकों को एक साथ इस्तेमाल किए बिना बात बन नहीं पाएगी। महज जागरूकता आ जाए, और खरीदकर खाने के लिए सेहतमंद सामान न रहे, तो शायद ही कोई घर पर अपने अकेले के लिए फल-सब्जी काट सकें, या बाहर बिना खाए-पिए रह सकें। लोगों में जागरूकता एक बड़ा धीमा काम है, वह बहुत मेहनत भी मांगता है, और बाजार की चटपटी चीजों के मुकाबले किसी को अंकुरित खाने को कहना, सब्जियों का रस पीने को कहना आसान भी नहीं है। इसलिए लोगों को बाजारू खानपान के, जंकफूड और फास्टफूड के नुकसान अच्छी तरह समझाने होंगे, और सरकार अपने खुद के तमाम अड्डों पर सेहतमंद खानपान की बिक्री का पर्याप्त इंतजाम रखे। शुरूआत के लिए कम से कम इतना तो करना जरूरी है ही। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अब जब अमरीका से अवैध घुसे हुए, या बसे हुए हिन्दुस्तानियों का वापिस आना तय हो चुका है, जब दोनों सरकारें इस पर सहमत हो गई हैं कि अमरीका जितने भारतीय नागरिकों को भेजेगा, भारत उन्हें रखेगा, तब कुछ और बातों पर अभी मतभेद और विवाद बाकी है। भारत की संसद में विपक्ष ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की है कि वहां से निकाले जा रहे भारतीयों को हथकड़ी-बेड़ी लगाकर मालवाहक फौजी विमानों में पहुंचाया जा रहा है, और उनके साथ सामान्य मानवीय बर्ताव भी नहीं किया जा रहा है। इस पर विदेश मंत्री जयशंकर ने अमरीकी सरकार से बातचीत करने का भरोसा दिलाया है। कांग्रेस ने यह भी मांग की है कि जिस तरह एक दूसरे देश, कोलंबिया ने, अपने विमान भेजकर अपने लोगों को वापिस लाने का काम किया है, भारत ने क्यों नहीं किया? कांग्रेस ने यह भी गिनाया है कि जब ये विमान कोलंबियाई नागरिकों को अमरीका से लेकर अपने देश लौटे, तो वहां के शासन प्रमुख, राष्ट्रपति विमान में जाकर उनसे मिले, और उन्हें भरोसा दिलाया। लेकिन हथकड़ी-बेड़ी, और बदसलूकी से परे और कोई मुद्दा चर्चा के लायक नहीं बचा है। अमरीका वहां पहुंचे या बसे हुए, या घुसपैठ करते हुए सरहद पर पकड़ाए हुए लोगों को वापिस भेजने का हक रखता है। किसी भी देश को दूसरे देशों के अवैध आए लोगों को वापिस भेजने का हक रहता है, और इसी के तहत पिछले कई बरस से भारत में पीढिय़ों से बसे हुए लोगों से भी उनके कागज मांगे जा रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि हिन्दुस्तान से लाखों लोग जाकर अमरीका में गैरकानूनी तरीके से क्यों बसे हुए हैं? वहां एक बेहतर जिंदगी की उम्मीद के लिए, या कारोबारी कामयाबी के लिए? अलग-अलग लोगों की अलग-अलग वजहें हो सकती हैं, लेकिन जिन लोगों को अमरीका निकाल रहा है, उनके बारे में भावनाओं से परे भी समझने की जरूरत है। पहली बात तो यह है कि इनमें से हर किसी को यह अच्छी तरह मालूम था कि न तो उन्हें तस्करों को 50 लाख से एक करोड़ रूपए तक देकर गैरकानूनी तरीके से अमरीका में घुसने का कोई हक है, और न ही उन्हें वहां कानूनी तरीके से जाकर समय सीमा के बाद रहने का हक है। इनमें से हर किसी को यह मालूम था कि वे अमरीकी कानून के खिलाफ एक गैरकानूनी काम कर रहे थे। किसी भी देश के लिए बिना दस्तावेजों वाले, बिना नागरिकता और कामकाज के इंतजाम वाले लोग एक समस्या रहते हैं। हर देश ऐसे लोगों की जांच करते रहता है क्योंकि किसी जुर्म या हादसे की हालत में ऐसे लोगों की शिनाख्त आसान नहीं रहती, और कई किस्म के कानूनी मामलों में इन्हें लेकर दिक्कत आती है। आज भी अमरीका के अलग-अलग प्रदेशों के कानून वहां देश की सरकार के फैसलों के खिलाफ हैं, और प्रदेश सरकारें राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के हर फैसले से सहमत भी नहीं हैं। अब भला कौन सा देश यह चाहेगा कि दूसरे देश के अवैध नागरिकों की वजह से उसके अपने देश में केन्द्र और राज्य में टकराव हो, सरकार और अदालत में टकराव हो? ये बातें निकाले जाने वाले लोगों को बहुत कड़वी लग सकती हैं, लेकिन हकीकत यही है। किसी भी देश में पकड़े गए ऐसे अवैध बसे हुए लोगों का बोझ वहां की सरकार पर रहता है, वहां की जेलों में उन्हें रखने का खर्च भी लगता है। और अभी-अभी एक सेंट्रल अमरीकी देश अल सल्वाडोर ने तो अमरीकी विदेश मंत्री के प्रवास के दौरान यह कहा है कि वह अमरीका की जेलों में बंद किसी भी तरह के कैदी को अपनी जेलों में रखने के लिए तैयार है, और यह बात अल सल्वाडोर के लिए कमाई की होगी, और अमरीका के लिए अपनी जेलों में अभी किए जा रहे खर्च में बचत की भी होगी। न सिर्फ अमरीका बल्कि किसी भी देश को यह तय करने का हक है कि दूसरे देशों के किन नागरिकों को वह अपने देश में शरण देना चाहता है, कामकाज का परमिट देना चाहता है, या नागरिकता देना चाहता है।
अब भारत लौटाए गए इन लोगों के सामने दिक्कत यह है कि एक सुनहरे भविष्य के सपने लेकर जाने के लिए इन्होंने 50 लाख से एक करोड़ तक तस्करों को दिए, ताकि उन्हें किसी तरह अमरीकी सरहद में घुसा दिया जाए। इस रकम के लिए पंजाब और गुजरात सरीखे कुछ राज्यों के नौजवानों ने पारिवारिक खेत-जमीन बेचकर, कई तरह के कर्ज जुटाकर बोझ खड़ा कर लिया था कि वे अमरीका में कमाकर इसे चुका देंगे, लेकिन अब अमरीका से निकाले जाने पर उनके लिए दुनिया के किसी भी विकसित देश में दुबारा जाने के रास्ते भी बंद हो चुके हैं। ऐसे लोगों की निराशा समझ में आती है क्योंकि उनके सामने पहाड़ सी जिंदगी, और उससे भी बड़े पहाड़ सा कर्ज बाकी है, और कोई काम उनके पास है नहीं। लेकिन भारत जैसे देश को अपनी हकीकत के बारे में सोचना चाहिए कि उसे छोडक़र सवा सात लाख लोग आज अमरीका में गैरकानूनी तरीके से क्यों बसे हुए हैं? वहां एक बेहतर भविष्य की संभावनाएं अधिक दिख रही होंगी, इसलिए वे जेलों में रहकर भी संभावना ढूंढ रहे हैं। इनके बारे में भारत के पैमानों से अगर देखा जाए तो ये लोग भारत में भी कोई रोजगार पा सकते थे, लेकिन हे सकता है कि वह रोजगार मजदूरी का हो, या किसी कारोबार के अदना से कर्मचारी का हो। हो सकता है कि वहां जाने वाले लोगों की उम्मीदें इसके मुकाबले कई गुना अधिक रही हों, और उन्हें भारत में उन्हें हासिल संभावनाएं पसंद नहीं आ रही हों।
आज भारत में बेरोजगारी कितनी भी हो, आर्थिक असमानताएं पहाड़ और खाई सरीखी क्यों न हों, कोई नागरिक भूखे नहीं मर रहे हैं, और सरकारी राशन के इंतजाम की वजह से लोग जिंदा हैं। अब यह विकल्प तो हर किसी के सामने था कि वे भारत में ही बाकी लोगों की तरह संघर्ष करते रहते, लेकिन उन्होंने एक जुर्म का रास्ता इस्तेमाल किया, और कई देशों का कानून तोड़ते हुए, वे अमरीका में गैरकानूनी तरीके से दाखिल हुए। ऐसे में उनके साथ हमदर्दी तो हो सकती है, लेकिन क्या भारत में उनको कोई मुआवजा भी दिया जा सकता है जिसकी कि मांग ऐसे कुछ परिवार कर रहे हैं? अगर कोई गैरकानूनी काम करते हुए उसके लिए, और उसकी वजह से किसी का नुकसान होता है, तो ऐसे लोग किसी मुआवजे के हकदार कैसे हो सकते हैं? न सिर्फ भारत बल्कि किसी भी देश के सामने उन लोगों की प्राथमिकता रहनी चाहिए जो कि देश में ही रहकर संघर्ष कर रहे हैं, काम पाने, या कोई कारोबार करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे लोग आज देश और दुनिया का कोई कानून भी नहीं तोड़ रहे हैं, और अपने ही देश से उन्हें उम्मीदें हैं। इस देश में जिंदा रहने की गुंजाइश न रहे, तब तो लोग किसी भी तरह से किसी भी देश में जाकर भूख से मौत से बचें, वह समझ आता है। लेकिन अधिक कमाई, बेहतर जिंदगी, और सुनहरे सपने लेकर अगर लोग दुनिया के दूसरे देशों का कानून तोड़ते हैं, तो उनके साथ तो वे देश अपने कानून के मुताबिक कार्रवाई करेंगे ही।
आज अमरीका से लौटे हुए लोग बता रहे हैं कि वहां की जेलों में उनके साथ अच्छा सुलूक नहीं हुआ, और उनसे 50 लाख से एक करोड़ रूपए लेकर उनकी तस्करी करने वाले गिरोहों ने भी उनसे बुरा सुलूक किया, तो इसमें भी कोई बहुत अटपटी बात नहीं है। हिन्दुस्तान के भीतर भी कई प्रदेशों की पुलिस अपनी ही बेकसूर जनता से सौ किस्म की बदसलूकी करती है, वह तो अमरीका में गैरकानूनी घुसपैठियों के साथ, मुजरिमों के साथ वहां की पुलिस का बर्ताव था, उसकी शिकायत का आज कोई औचित्य नहीं है। भारत की सरकार भारत के ही प्रदेशों में जेल में कैदियों से, और बाहर आम नागरिकों से राज्य की पुलिस के बर्ताव पर कोई काबू नहीं रख सकती, वह अमरीका से एक औपचारिक विरोध भी कर पाएगी, ऐसा सोचना मुश्किल है। भारत के भीतर जो सीमित संभावनाएं सभी लोगों के लिए हैं, उनसे परे जिनके सपने जुर्म की दुनिया तक पहुंच जाते हैं, उन्हें उसकी सजा के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत एक देश की तरह अपने नागरिकों के सामने है, और यह उनका अपना फैसला है कि उन्हें कानूनी रूप से यहां रहना है, या गैरकानूनी रूप से दूसरे देशों में जाना है, पहली बात की संभावनाएं, और दूसरी बात की आशंकाएं सबके सामने है।
अमरीकी वोटरों ने एक सनकी तानाशाह को राष्ट्रपति बनाकर पूरी दुनिया को इतने बड़े खतरे में डाल दिया है कि डोनल्ड ट्रम्प का चार बरस का कार्यकाल पूरा होते-होते अमरीकी अपने चुनावी फैसले पर अफसोस करते रह सकते हैं, या फिर यह भी हो सकता है कि वे ट्रम्प के हिंसक तौर-तरीकों के प्रशंसक बनकर आगे फिर इसी किस्म के तानाशाह को चुन सकते हैं जो कि तमाम अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून के खिलाफ जाकर दुनिया में अमरीका को एक माफिया के अंदाज में सबसे ताकतवर बना सके, और बाकी पूरी दुनिया पर अमरीकी मनमानी कर सके। पिछले दो दिनों से ट्रम्प ने दुनिया के अधिकतर देशों को असहज कर रखा है जब उन्होंने फिलीस्तीन के गाजा पर पूरा कब्जा करने की घोषणा की है, और वहां पर एक पर्यटन केन्द्र बनाने का इरादा जाहिर किया है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ बातचीत के बाद ट्रम्प ने इस सदी का दुनिया का सबसे हिंसक इरादा जाहिर किया है कि फिलीस्तीनियों को उनके ही घर से बेदखल किया जाएगा, उन्हें बगल के मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों में बसाया जाएगा। 23 लाख लोगों को अपने देश और अपने घर से बेदखल करने का ट्रम्प का यह इरादा और उनकी मुनादी एक भूमाफिया का तौर-तरीका है जिसमें गरीबों की बस्ती को उनके हक की जमीन से हटाकर कोई बिल्डर अपनी इमारत खड़ी करता है। ट्रम्प ने राष्ट्रपति चुनाव जीतने के पहले से यह फतवा देना चालू किया था कि कनाडा अमरीका का राज्य बन जाए। वे ग्रीनलैंड को कब्जा करना चाहते हैं, और पनामा नहर को कब्जा करने के लिए फौजी कार्रवाई तक का इरादा जाहिर कर चुके हैं। इजराइल का साथ देने के लिए, और मध्य-पूर्व में अपनी फौजी गुंडागर्दी कायम करने के लिए ट्रम्प ने जो हमलावर तेवर दिखाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों के खिलाफ हैं, और मध्य-पूर्व के देशों ने इसका विरोध करना भी शुरू कर दिया है।
ट्रम्प ने जिस अंदाज में जलवायु के पेरिस समझौते को तोड़ा, जिस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन को मदद खत्म की, जिस तरह अमरीकी सरकार से दुनिया भर के कार्यक्रमों को मिलने वाली मदद खत्म की, कनाडा, मैक्सिको, और चीन से अमरीका आने वाले सामानों पर टैरिफ लगाया, जिस तरह यूरोपीय संघ को टैरिफ लगाने की धमकी दी, वह सब कुछ बहुत ही भयानक है। इससे विश्व स्वास्थ्य संगठन का दुनिया भर में चलने वाला कार्यक्रम ठप्प हो जाएगा। जलवायु बचाने की कोशिशों को ट्रम्प दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीनफ्रॉड कहता है, और योरप के देशों के साथ नाटो संगठन को तरह-तरह की धमकी दे रहा है। जिस अंदाज में ट्रम्प ने वहां भारत के अवैध बसे हुए लोगों को हथकड़ी-बेड़ी लगाकर फौजी विमान से लाकर हिन्दुस्तान में पटका है, और लाखों बकाया हिन्दुस्तानियों पर तलवार टंगी हुई है, इन सबसे हिन्दुस्तान के उन हवनबाजों की आंखें खुलनी चाहिए जो कि ट्रम्प की जीत के लिए हवन करने में जुट जाते हैं, या गोली से उसका कान जख्मी होने पर हिन्दुस्तानी सडक़ किनारे मंदिरों में हवन-पूजन करने लगते हैं। हिन्दुस्तान के लोग अगर अमरीका में अवैध बसे हुए थे, तो उन्हें वापिस भेजना तो जायज था, लेकिन क्या हथकड़ी-बेड़ी में जकडक़र उन्हें पेशेवर खतरनाक मुजरिम की तरह पेश करना भी जरूरी था?
कुछ दिनों में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका जाने का कार्यक्रम है, और उसका अकेला मकसद नए राष्ट्रपति ट्रम्प के इस दूसरे कार्यकाल में उनसे मुलाकात है। हम यह उम्मीद ही कर सकते हैं कि हिन्दुस्तानियों के साथ ट्रम्प के सुलूक के बारे में मोदी जरूर ही विरोध दर्ज करेंगे, और फिलीस्तीन पर फिलीस्तीनियों के कब्जे के बारे में अटल बिहारी वाजपेयी का आमसभा का भाषण वे अच्छी तरह सुनकर जाएंगे जिसमें उन्होंने दो देशों के सिद्धांत और अपनी जमीन पर फिलीस्तीनियों के कब्जे की बात खुलकर कही थी, जोर देकर उन्होंने कहा था कि किसी की जमीन पर कब्जा कर लेने वाले को उसका हक नहीं दिया जा सकता, और जब भारत को ऐसी बात अपने बारे में मंजूर नहीं है, तो फिर वह फिलीस्तीनियों, और इजराइलियों के बारे में कैसे मंजूर होगी। अटलजी ने उन्हीं बातों को दोहराया था जो आजादी के पहले से गांधी अपने अखबार में लिखते आ रहे थे, और जो नेहरू से लेकर इंदिरा तक तमाम प्रधानमंत्रियों ने दुहराया भी था। खुद वाजपेयी ने अपने भाषण में मोरारजी देसाई के इसी रूख का हवाला देते हुए फिलीस्तीनियों का समर्थन किया था। हमें पूरी उम्मीद है कि मोदी भारत की विदेश नीति के इतिहास को देखते हुए दुनिया के इस सबसे बड़े मवाली के साथ अपनी मुलाकात में इंसाफ का साथ देंगे, और फिलीस्तीनियों को भगाकर वहां कोई ट्रम्प टॉवर बनाने की हिंसक योजना का विरोध करेंगे। लोगों को याद रखना चाहिए कि दक्षिण अफ्रीका जैसे कई देश हैं जिन्होंने इजराइल के खिलाफ जमकर कहा, और गाजा पर उसके हमले का विरोध किया। लोग अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट तक गए, और इजराइल के खिलाफ वहां से हुक्म करवाया। इन बहुत से देशों का फिलीस्तीन से कोई सीधा लेना-देना नहीं था, और न ही इजराइल से उनकी कोई सीधी दुश्मनी थी। लेकिन यह बात याद रखनी चाहिए कि दुनिया के इतिहास में उन्हीं देशों और नेताओं को दर्ज किया जाता है जो कि स्वार्थ से परे जाकर इंसानियत और इंसाफ के साथ खड़े रहते हैं। मोदी के सामने यह एक बड़ा मौका रहेगा कि वे एक कारोबारी-प्रधानमंत्री बनकर ट्रम्प से मिलें, या फिर दुनिया के एक इंसाफपसंद इतिहास वाले महान हिन्दुस्तान के उस प्रधानमंत्री की हैसियत से जिससे भविष्य इंसाफ की उम्मीद भी करेगा। आज अगर फिलीस्तीन को गरीब की जमीन के टुकड़े की तरह ट्रम्प नाम का भूमाफिया अपने इजराइली गुंडों के साथ मिलकर कब्जा कर लेता है, और मालिक को ही बेदखल कर देता है, तो दुनिया के बाकी देशों को याद रखना चाहिए कि ट्रम्प के हमलावर तेवर सिर्फ गाजा पर नहीं थमेंगे, वे आगे चारों तरफ बढ़ेंगे, और दुनिया के कोई मुल्क महफूज नहीं रह जाएंगे।
हिन्दुस्तान को तो इंदिरा गांधी का इतिहास भी याद है जिसने अमरीकी सरकार के सारे दबाव के खिलाफ जाकर पाकिस्तान को तोडक़र दो टुकड़े कर दिए थे, और बांग्लादेश बनवा दिया था। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने भी संसद के भीतर और बाहर इस बात के लिए इंदिरा की जमकर तारीफ की थी। उस वक्त भी अमरीका ने भारत को धमकाने के लिए अपनी नौसेना का सातवां बेड़ा भेज दिया था जिसने आकर लंगर डाला था। लेकिन इंदिरा गांधी ने फौलादी तेवर दिखाए थे। गांधी, नेहरू, इंदिरा, वाजपेयी, इन सबने फिलीस्तीन के बारे में बहुत साफ-साफ नजरिया रखा था, और साफ जुबान सार्वजनिक रूप से बोली थी। दुनिया का इतिहास साफगोई से लिखा जाता है, और लोगों को चुनावी कामयाबी से परे इंसाफ की फिक्र भी करनी चाहिए, और दुनिया के इतिहास में बेहतर तरीके से अपने जिक्र की भी।
फिलहाल ट्रम्प अपने अपनी ही किस्म के सनकी और तानाशाह बेदिमाग और बददिमाग साथियों के साथ पूरी दुनिया पर हमला कर रहा है, और यह हमला जाने कब थम पाएगा। अमरीका में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी पता नहीं आज फिक्रमंद होगी या नहीं, लेकिन पूरी दुनिया में ट्रम्प ने जो उथल-पुथल मचा रखी है, उसी की कल्पना करके किसी ने बहुत पहले यह लाईन लिखी होगी कि चीनी मिट्टी के बर्तनों की दुकान में बिफरे हुए सांड की की गई तोडफ़ोड़। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अमरीका के नए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की बरसों से चली आ रही घोषणा के मुताबिक उन्होंने अमरीका में रह रहे दूसरे देशों के अवैध घुसपैठियों, और आप्रवासियों को निकालना शुरू किया है। इसके तहत कुछ दूसरे देशों में भी वहां के नागरिकों को ले जाकर छोड़ा गया है, और अब से कुछ देर बाद भारत के सौ से अधिक लोगों को अमृतसर में उतारा जाएगा। पहली बार दूसरे देशों के लोगों को अमरीकी वायुसेना का विमान छोडऩे जा रहा है, और भारत लाए जा रहे लोगों की तस्वीरें बताती हैं कि उन्हें हथकडिय़ों और बेडिय़ों से बांधकर लाया जा रहा है। भारत सरकार ने अमरीकी राष्ट्रपति के इस फैसले से सहमति जताई है कि जो भारतीय वहां गैरकानूनी तरीके से घुसे हैं, या रह रहे हैं, उन्हें भारत वापिस लेगा। यूपीए सरकार में भारत के विदेश राज्यमंत्री रहे हुए, और आज के कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि पिछले बरस भी पिछले अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन के फैसले से 11 सौ हिन्दुस्तानियों को अमरीका से भारत पहुंचाया गया था। शशि थरूर का कहना है कि अमरीका में बिना कानूनी कागजात के सवा सात लाख भारतीय वहां से निकाले जाने के लायक हैं। उन्होंने कल अमरीकी विमान आने की खबरों के बीच यह कहा कि पिछले चार बरस में अमरीकी अधिकारियों ने मैक्सिको और कनाडा की सरहद पर अमरीका घुसने की कोशिश करते दो लाख हिन्दुस्तानियों को गिरफ्तार किया है। शशि थरूर ने कहा कि अगर ये भारतीय नागरिक हैं, तो भारत सरकार की जिम्मेदारी है उन्हें वापिस लेना, इस बारे में कोई बहस नहीं हो सकती। यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि शशि थरूर ने दशकों तक संयुक्त राष्ट्र संघ में काम किया है, और वे अंतरराष्ट्रीय नियमों के खासे जानकार भी हैं। साथ ही भारतीय विदेश राज्यमंत्री रहते हुए वे इस बारे में भारत की नीति से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। अब यह भारत के लिए कितनी राहत की बात है, या कितनी फिक्र की बात है, यह तो भारत सरकार को समझना होगा, और चूंकि अभी संसद का सत्र चल रहा है, तो उसे वहां भी बताना होगा, या कम से कम हमारी उम्मीद है कि उसे इस बारे में संसद में बयान देना चाहिए।
यह सब उस वक्त हो रहा है जब भारत में भी यहां दूसरे देशों से, खासकर पड़ोस के लगे हुए देशों से आकर बस गए अवैध घुसपैठियों या आप्रवासियों को निकालने की सरकारी मुहिम भी चल रही है, लेकिन वह बहुत काम नहीं कर पा रही है। कल ही सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर असम और केन्द्र सरकार को फटकार लगाई है कि जिन लोगों को विदेशी घोषित किया जा चुका है, उन्हें देश से निकाला क्यों नहीं जा रहा है, और उन्हें अनिश्चितकाल तक हिरासत केन्द्रों में क्यों रखा जा रहा है? अदालत ने असम सरकार से पूछा कि क्या वह इन्हें निकालने के किसी मुहूर्त का इंतजार कर रही है? सुप्रीम कोर्ट ने इस राज्य सरकार से कहा है कि इन लोगों को दो हफ्ते में निकालना शुरू किया जाए क्योंकि ऐसे कैम्पों में अनिश्चितकालीन हिरासत लोगों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है। दिलचस्प बात यह सामने आई कि असम सरकार ने यह तर्क दिया है कि इनका निर्वासन संभव नहीं है क्योंकि अवैध आप्रवासियों के मूल देशों का पता नहीं है। भारत में ऐसे बसे हुए अधिकतर लोग बांग्लादेश से आए हुए हैं, जो कि कुछ पीढ़ी पहले भी आए हैं, और उसके बाद से लगातार आना जारी रहा है। इनमें पाकिस्तान से भारत आकर वापिस न लौटने वाले लोग भी हैं, म्यांमार से जान बचाकर भागे हुए रोहिंग्या भी हैं, और हो सकता है कि कम संख्या में श्रीलंका या नेपाल जैसे देशों से आए हुए लोग भी यहां पर हों। भारत में नेपाल और तिब्बत के लोगों के लिए एक खास दर्जा यहां रखा है, लेकिन भारत की शरणार्थी नीति पर अधिक चर्चा करना आज का मकसद नहीं है, आज का मुद्दा तो अमरीका ही है।
अब अमरीकी सरकार की नजर से देखें, तो उसने वहां अवैध रूप से रह रहे सभी देशों के लोगों को निकालना शुरू किया है। इनमें लाखों ऐसे लोग हैं जो अमरीकी जेलों में कैद हैं, और वहां उन पर सरकार का खर्च हो रहा है। आज ही सुबह की खबर है कि अमरीका आसपास के कुछ दूसरे देशों से यह चर्चा भी कर रहा है कि अमरीकी जेलों के कैदियों को वे देश अपने यहां रखें। इससे हो सकता है कि अमरीका का खर्च घट जाए, और उन देशों को कुछ रोजगार और कमाई मिलने लगे। एक सेंट्रल अमरीकी देश अल सल्वाडोर ने अभी अमरीकी विदेशी मंत्री से बातचीत में यह सहमति दिखाई है कि वह अमरीका में गैरकानूनी रूप से बसे अपने लोगों को तो वापिस लेगा ही इसके साथ-साथ वह दुनिया के किसी भी देश के अमरीका में बंद मुजरिमों को भी अपनी जेलों में रखने के लिए तैयार है। इसमें अमरीकी नागरिक भी हो सकते हैं जो कि खूंखार और भयानक जुर्म की सजा काट रहे हैं। यह दुनिया में पहला मौका होगा कि कोई देश दूसरे देश के वहां के मुजरिमों को अपनी जेल में रखने को इस तरह खुशी-खुशी तैयार हुआ हो। हालांकि आज का अमरीका का कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि वह अपने नागरिकों को किसी भी तरह देश के बाहर भेजे, चाहे वे सजा काट रहे मुजरिम ही क्यों न हों। अब अल सल्वाडोर एक भुगतान के एवज में किसी भी किस्म के अमरीकी कैदियों को अपनी जेलों में रखने को तैयार है, और वह उम्मीद करता है कि अमरीका से मिलने वाले भुगतान से उसकी जेलें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाएंगी।
डोनल्ड ट्रम्प की अंधड़ की तरह लागू की जा रही नीतियों से पूरी दुनिया के पैर उखड़े हुए हैं। दुनिया भर के शेयर बाजार औंधेमुंह पड़े हैं कि ट्रम्प किसी देश से होने वाले आयात पर टैरिफ लगा देगा। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में भूकम्प आया हुआ है। ऐसे में जब बहुत से देशों में अमरीका से उसके नागरिक लौटेंगे, तो वे वहां पर एक अलग किस्म की समस्या भी रहेंगे। अवैध आप्रवासियों की नागरिकता वाले देश कहां से इतने लोगों के लिए रोजगार-कारोबार लाएंगे, या अमरीका में उनकी गैरकानूनी घुसपैठ या बसाहट पर उनके देशों में क्या कार्रवाई होगी? भारत के सवा सात लाख लोग अगर अमरीका से बेदखल होंगे, तो इतने कामगारों के लिए देश में कैसी जगह बन पाएगी? ऐसे बहुत से सवाल अमरीकी राष्ट्रपति के रातों-रात अमल में लाए जा रहे सनकी फैसलों से उठ रहे हैं, और सच तो यह है कि कल तक अमरीका के दोस्त रहे देशों के पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है कि ट्रम्प की सनक इन दोस्त-देशों को किस तरह प्रभावित या बर्बाद करेगी। आगे-आगे देखें, होता है क्या।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजधानी रायपुर में सडक़ पर जन्मदिन मनाते हुए दोनों तरफ ट्रैफिक जाम की नौबत खड़ी करने पर भारी नाराजगी जाहिर की है, और इस पर सिर्फ तीन सौ रूपए जुर्माना लगाने वाले अफसर को सस्पेंड करने, और उस पर विभागीय कार्रवाई करने को कहा है। इस घटना में शहर के व्यस्त इलाके में एक नौजवान का जन्मदिन बीच सडक़ कार पर केक रखकर, आतिशबाजी के साथ मनाया जा रहा था, और लंबे ट्रैफिक जाम के बाद कुल तीन सौ रूपए जुर्माना किया गया। सरकार की तरफ से अदालत को बताया गया कि इस मामले में मोटर व्हीकल एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है, और तीन सौ रूपए का चालान काटा गया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पुलिस की इस गैरगंभीर कार्रवाई पर हक्का-बक्का हैं। इसके साथ ही हमें कुछ दूसरी खबरें भी इसी शहर की मिल रही हैं जिनमें सडक़ पर लंबे फेरे से बचने के लिए सौ मीटर का हिस्सा रांग साईड से जाने पर दुपहिया चालकों को दो-दो हजार रूपए जुर्माने के चालान उनके फोन नंबर पर पहुंचे हैं। ऐसा लगता है कि जब किसी मवाली की ताकत सडक़ को अपने बाप की साबित करने की हो जाए, तो उस पर हाथ डालने के पहले पुलिस सौ बार सोचती है। मामूली दुपहिया चालकों को इससे पांच-दस गुना जुर्माने के नोटिस मिल रहे हैं, और ऐसी गुंडागर्दी करने वाले से हो सकता है कि पुलिस केक खाकर लौटी हो।
यह अकेला मामला नहीं है, इसी राजधानी रायपुर में हाईकोर्ट की दर्जनों बार की लताड़ के बाद भी गाडिय़ों पर लदे हुए लाउडस्पीकरों को बजाते हुए निकलने वाले जुलूस पर भी अफसर ऐसी ही मामूली सी कार्रवाई करते हैं, और आज भी पूरी गुंडागर्दी के साथ न सिर्फ धार्मिक और राजनीतिक जुलूस, बल्कि निजी शादियों के जुलूस भी सडक़ों पर ट्रैफिक जाम करते हुए, कान फाड़ते हुए, और दूर-दूर तक रौशनी की अंधाधुंध मार करते हुए निकलते हैं, और रास्ते में पडऩे वाली पुलिस को मानो ये न दिखते हैं, न सुनाई पड़ते हैं। हाईकोर्ट कई बार यह कह चुका है कि अफसर कोई कार्रवाई करना ही नहीं चाहते। होना तो यह चाहिए कि इस तरह की तमाम गाडिय़ों को राजसात किया जाए, ऐसे लोगों पर जनजीवन तहस-नहस करने, लोगों की जिंदगी के लिए खतरा खड़ा करने जैसी धाराएं लगानी चाहिए, ताकि बाकी लोगों को कुछ सबक मिले। लेकिन अफसरों की हमदर्दी मुजरिमों के साथ रहती है, और शांति से जीने की चाहत रखने वाले आम लोग ऐसी सावर्जनिक गुंडागर्दी को बर्दाश्त करने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। हमारा मानना है कि जब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की बार-बार की फटकार भी पूरी तरह बेअसर हो जाती है, तो फिर लोगों को उम्मीद छोड़ देनी चाहिए। राजधानी में राजभवन, मुख्यमंत्री के बंगलों के इर्द-गिर्द का हिस्सा प्रशासन के एक अलग आदेश से कोलाहलमुक्त घोषित कर दिया जाता है, और शहर के, प्रदेश के, सडक़ किनारे बसे और काम करने वाले लोगों के तो मानो कान ही नहीं हैं। ध्वनि प्रदूषण से इसी प्रदेश में कुछ लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन पुलिस और प्रशासन मौजूदा कानूनों पर भी अमल करना नहीं चाहते। एक पुरानी बात चली आ रही है कि हर सफल पुरूष के पीछे किसी महिला का हाथ होता है, उसी तरह कानून तोडऩे वाले हर मुजरिम की पीठ पर किसी न किसी नेता का हाथ होता है। जब शासन और प्रशासन कानून तोडऩे को एक नियमित बात मान लेते हैं, तो फिर वह जनता की नियति ही बन जाती है।
अब इसी राजधानी की कल की खबर है कि पुलिस ने मोटरसाइकिलों के लिए गैरकानूनी साइलेंसर बेचने वाले दुकानदारों की एक बैठक लेकर उन्हें बताया है कि ऐसे साइलेंसर बेचने पर छह महीने की कैद हो सकती है, और जुर्माना हो सकता है। अफसरों ने बैठक में यह भी कहा कि पहले भी कई बार वे इस पर बैठक कर चुके हैं। पुलिस की तरफ से कहा गया कि कारोबारियों को समझाईश दी गई है। अब सवाल यह उठता है कि जो जुर्म है, और जिस पर छह महीने की कैद हो सकती है, उस पर क्या पुलिस का काम पूरी जिंदगी बैठक ले-लेकर हिदायत देना है कि ऐसे मुजरिमों को जेल भेजना है? जो कारोबारी सोच-समझकर गैरकानूनी सामान बेच रहे हैं, और रईसों की जो बिगड़ैल औलाद सोच-समझकर हजारों रूपए खर्च करके कानून तोड़ रही है, लोगों का जीना हराम कर रही है, वे जेल जाने के हकदार हैं, या हिदायत पाने के? क्या कानून पुलिस को इस बात की छूट देता है कि वे मुजरिमों को हिदायत दे-देकर छोड़ते रहें? हर कुछ महीनों में पुलिस अलग-अलग किस्म की हिदायत देती है, और फिर उसे बहुत संगठित, और रहस्यमय तरीके से इजाजत भी देती है। यह हाल उस राजधानी का है जहां कि हर सडक़ से हर कुछ घंटों में मंत्रियों और बड़े अफसरों की आवाजाही चलती ही रहती है, इसलिए बाकी प्रदेश में हालत इससे बेहतर हो, ऐसी कोई वजह नहीं हो सकती।
यह देखना भी हैरान करता है कि अफसरों से ऊपर जो राज्य सरकार है वह हर दिन अखबारों मेें सार्वजनिक गुंडागर्दी की खबरें पढ़ती है, सरकारी वकील हर हफ्ते किसी न किसी ऐसे सार्वजनिक मामले पर हाईकोर्ट की फटकार झेलते हैं, और इसके बाद भी सरकार अगर कोई सुधार नहीं करती है, तो उससे ऐसी तस्वीर बनती है कि वह भी सार्वजनिक मुजरिमों के सामने बेबस है। हकीकत तो यह है कि ऐसी गुंडागर्दी को रोकने के लिए एक छोटा सा अफसर काफी हो सकता है, लेकिन सडक़ों पर अराजकता और गुंडागर्दी की छूट देने के पीछे संबंधित अफसरों की एक संगठित व्यवस्था काम करती है। बिना पुलिस की छूट के यह तो मुमकिन हो नहीं सकता, कि हर ऑटोरिक्शा ड्राइवर अपने दाएं-बाएं एक-एक और सवारी बिठाकर चलता है, तमाम ई-रिक्शा बैटरी बचाने के लिए बिना लाईट जलाए चलते हैं, स्कूली बच्चों को ले जाने वाली गाडिय़ां नियमों के खिलाफ चलती हैं, और ओवरलोड चलती हैं, और इनमें से किसी के खिलाफ भी जब कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो यह जाहिर है कि यह संगठित-संरक्षण सडक़ों के मुजरिमों के लिए बिक्री पर उपलब्ध सामान है।
किसी भी प्रदेश में कानून का सम्मान कितना है यह वहां की ट्रैफिक को देखकर कुछ देर में ही समझ आ जाता है। हम बार-बार यह बात भी लिखते हैं कि लोग अपनी जिंदगी का पहला जुर्म ट्रैफिक नियम तोडऩे का करते हैं, और उस पर कोई कार्रवाई न होने पर वे धीरे-धीरे और गंभीर जुर्म की तरफ बढ़ते हैं। आज छत्तीसगढ़ के हर बड़े शहर में आए दिन चाकूबाजी दिखाई पड़ती है, और नाबालिग या नौजवान गुंडों का यह हौसला सडक़ों पर ट्रैफिक नियम तोडऩे से शुरू होकर बढ़ते-बढ़ते यहां तक पहुंचा हुआ रहता है। राज्य के मुख्यमंत्री एक से अधिक बार प्रदेश स्तर की बैठकों में ट्रैफिक को सुधारने के लिए कड़ाई बरतने की बात कह चुके हैं, मुख्य सचिव सरकारी अफसर-कर्मचारियों के लिए भी हेलमेट और सीट बेल्ट अनिवार्य करने को कह चुके हैं। इसके बाद भी अगर इस राजधानी में गुंडे-मवाली सडक़-चौराहों पर ट्रैफिक रोककर अपना जन्मदिन मनाते हैं, तो सरकार को अपनी जिम्मेदारी और अपने असर के बारे में सोचना चाहिए, हाईकोर्ट तो सोच-सोचकर थक चुका है, निराश हो चुका है, और हथियार डाल चुका है।
तलाक के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अभी पति के पक्ष में फैसला दिया है, और कहा है कि जिन मां-बाप ने बेटे को पाल-पोसकर बड़ा किया, और पढ़ाया, उसका नैतिक और कानूनी दायित्व है कि मां-बाप के बूढ़े होने पर उनकी देखभाल करे, और उनका इंतजाम करे। दो जजों की बेंच ने पत्नी के बारे में भी भारतीय सामाजिक मूल्यों के मुताबिक कहा है कि उससे भी पति के परिवार का हिस्सा बनने की उम्मीद की जाती है। ऐसे में अगर वह अलग रहने की जिद करती है, तो बेटे पर अपने मां-बाप की जिम्मेदारी भी रहती है, और यह तलाक का एक आधार बन सकता है। हम उस मामले पर अधिक लिखना नहीं चाहते जिसे लेकर अदालत का यह फैसला सामने आया है, और तलाक के लिए पहुंचे हुए पति को अदालत ने राहत दी है। हम यहां पर महिला की किसी गलती रहने या न रहने पर टिप्पणी नहीं कर रहे, क्योंकि बहुत से मामले ऐसे भी रहते हैं जिनमें पत्नी की प्रताडऩा होती है, और अभी पिछले एक हफ्ते में ही अपने आसपास हमें दो-तीन ऐसे मामले दिखे हैं। लेकिन मां-बाप के साथ बच्चों का कैसा रिश्ता रहना चाहिए, इस मुद्दे पर हम यहां चर्चा करना चाहते हैं।
इससे बिल्कुल ही अलग एक दूसरा समाचार मध्यप्रदेश का आज ही छपा है जिसमें टीकमगढ़ में एक व्यक्ति की मौत के बाद उसके बेटों में इस बात को लेकर झगड़ा हुआ कि पिता का अंतिम संस्कार कौन करे। और जब बातचीत से यह नहीं सुलझा तो पिता की लाश घर के बाहर पड़ी रही, और बेटे झगड़ते हुए इस सहमति पर पहुंचे कि लाश के दो टुकड़े कर लेते हैं, और आधे-आधे टुकड़े का अंतिम संस्कार दोनों बेटे कर लेंगे। इस पर समाज के लोगों ने उन्हें समझाया लेकिन उनकी जिद को देखते हुए लोगों ने पुलिस को खबर की, और पुलिस ने आकर रिश्तेदारों-घरवालों को समझाईश देकर छोटे बेटे से अंतिम संस्कार करवाया, और बड़ा बेटा लाश के टुकड़े करके एक टुकड़े का अंतिम संस्कार करने की हसरत के साथ वहां रह गया। लोगों को याद होगा कि इसी मध्यप्रदेश में अभी कुछ हफ्ते पहले ही दो भाईयों ने मिलकर बूढ़ी और बीमार मां को गला घोंटकर मार डाला था, क्योंकि उसकी देखभाल करनी होती थी। एक दूसरे मामले में एक आदमी बूढ़ी और बीमार मां को बिना दवा-खाने के घर में बंद करके पत्नी और बच्चे सहित उज्जैन चले गया था, और पीछे से मां के मर जाने के बाद जब लाश की बदबू फैली तब पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया, और यह मामला खुला। ऐसे बहुत से मामले होते हैं जिनमें कोई ईमानदार और वफादार औलाद बूढ़े मां-बाप की जिंदगी भर देखरेख करने के लिए अपनी जिंदगी का सुख-चैन भूल जाती हैं, वहीं दूसरी ओर मां-बाप को मार डालने वाले लोग भी कम नहीं रहते हैं।
देश के कानून में यह तो साफ कर दिया है कि मां-बाप की देखरेख करना औलाद की जिम्मेदारी है, और अगर वे इसे पूरा नहीं करेंगी तो अदालत उनसे मां-बाप को गुजारा भत्ता दिलवा सकती है। बिना किसी अपवाद के, सारे ही मां-बाप अपने बच्चों को बड़ा करते हैं, और उनके जवान होने तक उन पर खर्च करते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं, और उनकी शादी करने से लेकर उनके बच्चों तक की देखभाल करते हैं। मां-बाप की इस पूरी लागत में से अगर सिर्फ आर्थिक हिस्से का हिसाब लगाया जाए, तो भी कमाऊ होने के बाद आल-औलाद को मां-बाप की बकाया जिंदगी उनका ख्याल रखना चाहिए, तभी वे मातृ-पितृ ऋण से उऋण हो सकेंगे। लेकिन हर औलाद अच्छी इंसान हो, यह जरूरी तो है नहीं, हम अपने आसपास ऐसी बहुत सी औलादें देखते हैं जो कि मां-बाप को मारपीट कर उनके पैसे छीनकर नशा करती हैं, और बूढ़े मां-बाप इस आस में मजदूरी करके ऐसी नालायक और हरामखोर औलाद को पालते हैं कि कम से कम वह जिंदा तो रहे।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेटे पर मां-बाप की देखरेख की जो जिम्मेदारी गिनाई है, वह कानून की तंग परिभाषा से परे भी इंसानियत की बात है, और समाज को भी जवान लोगों पर मां-बाप की देखरेख का दबाव बनाकर रखना चाहिए। लेकिन इससे परे भी हमारा ऐसा ख्याल है कि मां-बाप को अपनी औलाद को बिगडऩे न देने के लिए फिक्र करनी चाहिए, और जवान बच्चों को गोद के दुधमुंहों की तरह संभालकर नहीं रखना चाहिए। उन्हें अपनी बचत में से औलादों को एक सीमा से अधिक मदद भी नहीं करनी चाहिए, उन्हें अपने दम पर अपने पैरों पर खड़े होने की राह दिखानी चाहिए। आज हिन्दुस्तानी मां-बाप आल-औलाद के मोह में अपनी पूरी दौलत गंवा बैठते हैं, और दौलत जाने के साथ-साथ औलाद की जिंदगी से मां-बाप का महत्व भी चले जाता है। यह सिलसिला शुरू ही नहीं होने देना चाहिए। संतानमोह, और खासकर पुत्रमोह में मां-बाप उसे खूब निकम्मा हो जाने देते हैं, और अपना सब कुछ गंवा बैठते हैं। हमारा मानना है कि सरकार को एक कानून बनाकर बूढ़े मां-बाप की दौलत औलाद तक जाने के नियम तय करने चाहिए। बूढ़े मां-बाप की बकाया उम्र का हिसाब लगाकर जमीन-जायदाद या दौलत का एक पर्याप्त हिस्सा उन्हीं के नाम पर आखिर तक रखना चाहिए, और आल-औलाद के नाम इस पर्याप्त हिस्से का ट्रांसफर नहीं होने देना चाहिए। यह किसी भी जनकल्याणकारी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह बूढ़े, बीमार, या असहाय लोगों को भावना में बहकर, या पारिवारिक दबावतले पिसकर आत्मघाती बंटवारा न करने दे, या दौलत न गंवाने दे। हमने पहले भी इस मुद्दे पर लिखते हुए इस बात का जिक्र किया था कि बुजुर्ग लोग अपनी जायदाद पर बैंकों से एक रिवर्स लोन ले सकते हैं, जिसके तहत बैंक एक हिसाब लगाकर बुजुर्गों को हर महीने गुजारे के लिए रकम देती है, और उनके गुजर जाने के बाद इस दी गई रकम और ब्याज का हिसाब लगाकर उनकी आल-औलाद को उस दाम पर जमीन-जायदाद दे देती है, या बेचकर अपनी रकम निकालकर बाकी रकम वसीयत के मुताबिक उनके बच्चों को दे देती है।
परिवार और समाज का दबाव बूढ़े मां-बाप झेल नहीं पाते, इसलिए सरकार को ही ऐसा कानून बनाना चाहिए ताकि लोग मौत आने तक गरिमामय तरीके से जी सकें। कल ही हमने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर केरल और कर्नाटक सरकारों के बनाए हुए नियम पर इसी जगह लिखा था कि वहां लाइलाज मरीजों को गरिमामय तरीके से मरने देने की कैसी कानूनी छूट दी जा रही है। आज उसी से मिलती-जुलती बात हम गरिमामय तरीके से बुढ़ापा गुजारने के बारे में कह रहे हैं कि आल-औलाद के रहमोकरम पर जीने के बजाय लोगों को अपने खुद के बुढ़ापे के लिए बचत करके रखनी चाहिए, और अपने इंतजाम के बाद ही अगर कुछ बचे तो उसे आल-औलाद को देना चाहिए, या उन पर खर्च करना चाहिए। भावनाओं में बहकर बच्चों के लिए कुछ भी करना उन्हें भी बर्बाद करने से कम नहीं रहता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
आरटीआई हिन्दुस्तान में बहुत सी गड़बडिय़ों को उजागर करने का अपने किस्म का अनोखा जरिया बन गया है। सरकारी जानकारी के साथ-साथ बहुत किस्म की दूसरी संस्थाओं की जानकारी भी इसके तहत आती है, और लोग आरटीआई के तहत जानकारी निकालकर भ्रष्टाचार, गड़बड़ी, और कई दूसरे किस्म के भेदभाव उजागर करते हैं। अभी रेलवे से एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने जानकारी निकाली है कि 2021 से 2023 के बीच पौने दो करोड़ से अधिक सीटें/बर्थ वीआईपी/इमरजेंसी कोटे में आबंटित की गईं, और दूसरी तरफ इसी दौरान सवा चार करोड़ से अधिक मुसाफिर टिकट कन्फर्म न होने से यात्रा नहीं कर सके। इसमें और गजब की बात यह है कि बारह साल पहले रेल मंत्रालय ने यह प्रस्ताव रखा था कि वीआईपी कोटे की सीटों पर रेलवे के तत्काल दर्जे जितना किराया लिया जाए, लेकिन सरकार ने उसे मंजूरी नहीं दी। इस प्रस्ताव से सरकार को 27 सौ करोड़ रूपए अधिक मिल सकते थे। मतलब यह कि वीआईपी दर्जे के नाम पर इन मुसाफिरों से कोई अतिरिक्त शुल्क भी नहीं लिया जाता, और तत्काल टिकट खरीदने वालों को इनके मुकाबले बहुत अधिक भाड़ा चुकाना पड़ता है। आम जनता के हक छीनकर कुछ खास जनता को दिया जाए, और फिर उस देने को भी रियायती रेट पर दिया जाए, इसे क्या ही कहा जाए!
दरअसल हिन्दुस्तान आजाद तो हो गया, उसकी पौन सदी भी मना रहा है, लेकिन उसके दिमाग से अब तक सामंती सोच हटी नहीं है। हम बार-बार देश में वीआईपी संस्कृति के खिलाफ लिखते हैं। लेकिन सत्ता का मिजाज विशेषाधिकार की इस संस्कृति से परे सोच नहीं पाता है। एक वक्त था जब हिन्दुस्तान में टेलीफोन की कमी रहती थी, और उस वक्त हमारे सरीखे लोगों के घर-दफ्तर में केन्द्रीय संचार मंत्री के कोटे से टेलीफोन लगे थे। अभी हाल के बरसों तक केन्द्रीय विद्यालय में दाखिले के लिए केन्द्रीय मंत्री या सांसद का कोई कोटा होता था, अब वह है या नहीं, पता नहीं। ट्रेन में सफर के लिए जब अंधाधुंध अधिक भाड़े वाला एक तत्काल नाम का दर्जा बनाया गया है, और जिससे सरकार को मोटी कमाई होती है, उसे भी अनदेखा करके नेताओं और अफसरों की मर्जी से, जजों और पत्रकारों सरीखे लोगों को वीआईपी दर्जे के नाम पर ट्रेन में जगह दी जाती है, और आम मुसाफिर कतार में लगे-लगे घर लौटने को मजबूर रहते हैं। सुना है कि ऐसे ही किसी वीआईपी इंतजाम के चक्कर में कुम्भ में सरकार ने आम लोगों के लिए सीमित जगह रखी थी, जहां भगदड़ मची क्योंकि सरकारी अमला वीआईपी इंतजाम पर अधिक ध्यान दे रहा था।
यह तो भला हो यूपीए सरकार के समय बने आरटीआई सरीखे कानून का जिसकी वजह से बहुत किस्म की चीजें सामने आती हैं, वरना सत्ता तो हर नाजुक फाइल को अपनी कुर्सी की गद्दी के नीचे दबाकर रखने की आदी रहती है। जहां जनता के खजाने को नुकसान पहुंचता है, उस कीमत पर भी इस देश में अपने को वीआईपी दर्जा देने वाले लोग मुफ्तखोरी करते हैं। संसद की कैंटीन में अविश्वसनीय सस्ते दामों पर मिलने वाला खाना अक्सर ही सांसदों और दूसरे नेताओं के खिलाफ जनता में नाराजगी और नफरत पैदा करते आया है। एक वक्त तो ऐसा भी था जब सांसदों और विधायकों को भारतीय सेना की सेकेंडहैंड जीप और मोटरसाइकिल रियायती दाम पर मिलती थीं, और उनका कोटा रहता था। आज भी रायपुर सरीखे एयरपोर्ट पर कारों के जाकर रूकने की जगह पर एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ नेताओं और अफसरों के लिए रखा जाता है, जिसकी वजह से बाकी तमाम जनता के लिए बड़ा छोटा सा हिस्सा बचता है। देश में लोकतंत्र की पौन सदी मनाई जा रही है, लेकिन लोगों की सोच ताकत पाने के साथ-साथ और अधिक सामंती होते चलती है।
दरअसल इस देश की बड़ी अदालतें बड़ी सहूलियत पाने वाली हैं, इसलिए वहां भी वीआईपी दर्जे खत्म करने की अधिक सुनवाई नहीं होती है। कुछ अरसा पहले हाईकोर्ट के एक जज ने ट्रेन में उन्हें पर्याप्त सुविधा न मिलने को लेकर रेलवे को नोटिस जारी कर दिए थे, बाद में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस बारे में लिखा था कि जजों को ऐसे किसी प्रोटोकॉल का कोई हक नहीं है, और न ही उन्हें ऐसे नोटिस जारी करने चाहिए। जब संविधान की व्याख्या करने और लोकतंत्र के मूल्यों का सम्मान करने के लिए जिम्मेदार बड़े जजों में नाजायज सहूलियतों की चाह इतनी अधिक रहती है, तो वे भला खास और आम जनता का फर्क कैसे कर सकेंगे, वे तो खुद ही खास के दर्जे की सहूलियत चाहते हैं।
जिस मीडिया पर खास और आम के ऐसे भेदभाव को उजागर करने की जिम्मेदारी रहती है, वह खुद भी खास बनने, और खास दर्जे की सहूलियतें पाने की कोशिश में लगे रहता है। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र के स्थापित स्तंभ सुविधाभोगी होते चले गए हैं, और ऐसे में एक वक्त जनसंगठन और जनआंदोलन के लोग भेदभाव उजागर कर सकते थे, अब वह काम आरटीआई एक्टिविस्ट कर रहे हैं, और जब वे महीनों और सालों की मेहनत से जानकारी पाते हैं, तो फिर मीडिया उसका नगदीकरण कर लेता है, उससे खबरें बना लेता है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को तमाम सरकारी इंतजाम से वीआईपी शब्द हटाने की पहल करनी चाहिए। अदालत कम से कम यह तो कर ही सकता है कि तमाम जजों को ऐसे किसी भी प्रोटोकॉल से परे कर दे जो कि उन्हें आम लोगों से अलग करते हैं। इसके साथ ही जनहित याचिकाओं का संघर्ष चलते रहना चाहिए, न जाने कब कौन मुख्य न्यायाधीश आम जनता के हक का हिमायती निकल आए, और इस देश में सामंती संस्कृति खत्म हो। वैसे तो जनता ही अगर अधिक जागरूक हो जाए, और सडक़ों पर, स्टेशन और एयरपोर्ट पर, और नेताओं की मौजूदगी वाले दूसरे मौकों पर घेराबंदी करके सवाल करने लगे, तब भी नौबत सुधर सकती है। फिलहाल इस अश्लील और हिंसक, अलोकतांत्रिक और अमानवीय वीआईपी संस्कृति का मजा भोगने वाले लोगों को हमारा धिक्कार।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के वक्त मनोनीत अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को भाजपा सरकार आने पर बर्खास्त कर देने का फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के कानूनी अधिकार के तहत ठहराया है। भाजपा सरकार ने आने के बाद तुरंत ही एक आदेश जारी करके सभी राजनीतिक नियुक्तियों को खत्म करने का निर्देश दिया था। इसी के तहत छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को भी हटा दिया गया था। इसके खिलाफ वे हाईकोर्ट गए थे, और अदालत ने यह माना है कि इनकी नियुक्ति में ही लिखा हुआ था कि वे राज्य सरकार के इच्छा के अधीन पद पर रहेंगे, और इस हिसाब से सरकार को इन्हें हटा देने का अधिकार था, और इसमें कुछ गलत नहीं हुआ है। अदालत ने कहा है कि इन लोगों को पद पर बने रहने का संवैधानिक अधिकार नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति पिछली सरकार की इच्छा पर हुई थी, और उनकी विचारधारा वर्तमान सरकार की नीतियों के अनुरूप नहीं है, इसलिए उनकी बर्खास्तगी को उनके कार्य या चरित्र पर कलंक नहीं माना जा सकता।
देश-प्रदेश में बहुत से ऐसे पद हैं जो संवैधानिक रहते हैं, और उन पर नियुक्त किए गए लोगों को कोई सरकार साधारण आदेश से नहीं हटा सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज, यूपीएससी या पीएससी के चेयरमैन, मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल संरक्षण आयोग जैसी बहुत सी संस्थाएं हैं जिनमें एक निश्चित कार्यकाल के लिए, या एक उम्रसीमा तक के लिए लोगों की नियुक्ति होती है, और वहां से उन्हें हटाने के लिए सरकार को महाभियोग जैसी बड़ी गंभीर प्रक्रिया अपनानी होती है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, सत्तारूढ़ विचारधारा भी बदलती रहती है, लेकिन संवैधानिक पदों पर निरंतरता बनी रहती है। इससे परे जो राजनीतिक मनोनयन होते हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सरकार बदलते ही अपनी कुर्सियां छोड़ दें, खुद होकर छोड़ दें, इसके पहले कि सरकार उन्हें बर्खास्त करे। लेकिन बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जो यह उम्मीद करते हैं कि विपरीत विचारधारा की सरकार आने पर भी उन्हें जारी रखा जाएगा, और वे इस्तीफा देने के बजाय बर्खास्तगी तक एक-एक पल ओहदे का मजा लेते रहना चाहते हैं।
लोकतंत्र दरअसल कानूनों में जकड़ी हुई व्यवस्था नहीं है, यह एक ऐसी लचीली व्यवस्था है जिसमें लोगों को एक गरिमामय व्यवहार करना चाहिए, और लोकतंत्र की उदार, पारदर्शी, और गौरवशाली परंपराओं को निभाना चाहिए। इसी के तहत किसी सत्तारूढ़ पार्टी के हार जाने पर अगली सरकार बनने तक प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को अपने पद पर बने रहने को कहा जाता है, लेकिन यह अलिखित परंपरा रहती है कि इन गिने-चुने दिनों में वे कोई बड़े फैसले नहीं लेंगे, और सिर्फ पद की निरंतरता के लिए अगले व्यक्ति के आने तक वहां रहेंगे। इसी तरह लोकतांत्रिक परंपरा का तकाजा रहता है कि सत्तारूढ़ विचारधारा के बदलने पर मनोनीत लोग इस्तीफे दे दें। ऐसे में विश्वविद्यालयों के कुलपति, या ऐसे दूसरे लोगों को इस्तीफे देने की जरूरत नहीं रहती है जिन्हें कि किसी चयन प्रक्रिया के तहत छांटकर नियुक्त किया गया था, और जिनका कार्यकाल तय था, या जो कि निर्धारित कार्यकाल या आयु सीमा वाले संवैधानिक पदों पर बिठाए गए थे। लेकिन निगम, मंडल, या बिना संवैधानिक दर्जे वाले आयोगों के लोगों को पल भर में हट जाना चाहिए, ऐसा न करना एक बड़े ही लीचड़पन की बात रहती है कि वे कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं।
छत्तीसगढ़ में जैसे ही पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी सत्ता से बाहर हुए थे, उनके सचिव रहे सुनिल कुमार ने चुनावी नतीजे आते ही मुख्यमंत्री सचिवालय का अपना कमरा खाली कर दिया था, और सचिवालय में एक दूसरे साधारण कमरे में बैठने लगे थे। ऐसा माना जाता है कि हर नए मुख्यमंत्री को अपने सचिव और निजी सहयोगी अधिकारियों को चुनने का अधिकार रहता है, और इसी को ध्यान में रखकर सुनिल कुमार ने अगला मुख्यमंत्री भी तय होने के पहले सीएम सचिवालय छोड़ दिया था। दूसरी तरफ राज्य में कुछ ऐसे भी अफसर रहे जो कि रिटायर होने के बाद भी सरकार के मनोनीत किसी पद पर सत्ता बदलने के बाद भी बने रहे, और जब तक उन्हें बर्खास्त करने की खबर नहीं दी गई, उन्होंने कुर्सी नहीं छोड़ी। लोकतंत्र अदालती स्थगन आदेश लेकर किसी मनोनीत कुर्सी से चिपके रहने का नाम नहीं रहता। लोगों को अपनी खुद की इज्जत का भी ख्याल रखना चाहिए, और नई सरकार आते ही इस्तीफा देने के लिए तैयार रहना चाहिए।
हर सरकार को अपनी पसंद और विचारधारा के मुताबिक लोगों को मनोनीत करने का अधिकार रहना चाहिए। और चूंकि इस देश में संवैधानिक या इस दर्जे से परे के ओहदों पर राजनेताओं और रिटायर्ड जज-अफसरों को मनोनीत करने की परंपरा है, और इसके लिए कोई विचार-विमर्श नहीं होता है, इसलिए यह पूरा मामला अपने मकसद को ही शिकस्त देते रहता है। हम पहले भी बहुत बार इस पर लिख चुके हैं कि किसी राज्य से रिटायर होने वाले जजों और अफसरों को उसी राज्य में किसी नाजुक ओहदे पर मनोनीत नहीं करना चाहिए। धीरे-धीरे यह सिलसिला मजबूत हो जाता है कि रिटायरमेंट के बाद वृद्धावस्था-पुनर्वास के लिए सत्ता को खुश रखते हुए जज और अफसर अपने कई फैसले देने लगते हैं। इससे अपने अदालती या सरकारी ओहदों पर रहते हुए भी लोग भविष्य की अपनी संभावनाओं को मजबूत करते रहते हैं। इसके साथ-साथ कई ओहदों पर सत्तारूढ़ पार्टी अपने संगठन या अपनी विचारधारा के लोगों को मनोनीत करती है, और नतीजा यह होता है कि जब देश-प्रदेश में ऐसे आयोगों या दूसरे पदों से संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद की जाती है, तो ये लोग अपने को बनाने वाली सरकार को बचाने में लग जाते हैं, जनता के संवैधानिक अधिकारों को बचाने के बजाय। ऐसी नौबत से बचने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टैलेंटपूल बनाना चाहिए जिसमें रिटायर्ड जज और अफसर अपनी दिलचस्पी से अपने नाम भेज सकें, और उनमें से अलग-अलग प्रदेशों के अलग-अलग ओहदों के लिए राज्य की जरूरत के मुताबिक उस राज्य में कभी काम न किए हुए लोगों में से यूपीएससी जैसी कोई स्वतंत्र संस्था लोगों को छांटे, और उन राज्यों में भेजे। जब तक राज्य की राजनीतिक ताकतों की पसंद से ऐसी नियुक्तियां होंगी, वे नियुक्तियां या तो रिटायरमेंट के करीब जजों और अफसरों के फैसलों और कामकाज को प्रभावित करेंगी, या ऐसे नेताओं और समविचारकों की होंगी जो कि संवैधानिक दायित्व पूरा नहीं कर सकेंगे।
अगर लोकतंत्र को पारदर्शी, पूर्वाग्रहमुक्त, और गैरपक्षपाती बनाना है, तो ऐसे तमाम संवैधानिक-गैरसंवैधानिक मनोनयन अनिवार्य रूप से राज्य के बाहर के लोगों के ही होने चाहिए, और नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार, विपक्ष, और न्यायपालिका जैसे अलग-अलग तबकों के लोगों को भी जोडऩा चाहिए ताकि राजनीतिक पसंद-नापसंद से संवैधानिक जिम्मेदारियां तय न हों। ऐसा होने पर ऐसी तमाम नियुक्तियों को एक निर्धारित कार्यकाल तक रखा जा सकेगा, और महाभियोग जैसी किसी गंभीर प्रक्रिया से ही उन्हें हटाया जा सकेगा। लोकतंत्र को गरिमामय और पारदर्शी रहना चाहिए, जो कि सिर्फ सरकार द्वारा राज्य के भीतर के लोगों की नियुक्ति से संभव नहीं है।
उत्तरप्रदेश में चल रहे कुंभ में मौनी अमावस्या की सुबह धार्मिक मान्यताओं के चलते करोड़ों की भीड़ इकट्ठी बताई गई, और उस बीच हुई एक भगदड़ में करीब 30 लोगों की मौत हुई। वहां जैसी भीड़ थी, उसके मुकाबले मौतों का आंकड़ा कुछ भी नहीं था, और पिछले ही बरस इसी यूपी के हाथरस में एक किसी बाबा के प्रवचन में उनके पांवों की धूल लेने के चक्कर में टूट पड़ी भीड़ में कुचलकर करीब सवा सौ लोग मरे थे, इसलिए करोड़ों के भीड़ के बीच भगदड़ का यह आंकड़ा कुछ भी नहीं था। लेकिन इस पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह की चुप्पी साध रखी, और मौतों को अपनी जुबान से मंजूर ही नहीं किया, बल्कि बार-बार ये सिर्फ ये कहते रहे कि अफवाहें न फैलाएं, अफवाहों पर भरोसा न करें, उनसे प्रदेश के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी तबाह हो गई। यह तो ठीक है कि देश भर के टीवी चैनल और अखबार यूपी सरकार के कुंभ-इश्तिहार के बोझतले दबे हुए हैं, और इसलिए जब सबको मौतों के आंकड़े सामने रखने थे, उनमें से अधिकतर लोग इसमें उलझे हुए थे कि मोदी ने योगी से कितने बजे बात की, फिर कितने बजे दुबारा बात की, फिर कितने बजे एक बार फिर बात की, और फिर बाकी नेताओं का भी कि किसने किससे कब-कब फिक्र जाहिर की। मानो मौतों के आंकड़े मायने नहीं रखते थे, महज फिक्र मायने रखती थी। ऐसे माहौल में जब अफवाहें जोर पकड़ती हैं, तो जिम्मेदार लोगों को सामने आकर नैतिक जिम्मेदारी लेनी होती है, और अफवाहों का मुंह बंद करना पड़ता है। यहां तो अफवाहें फैली ही नहीं, और सत्ता का मुंह खुला नहीं। शायद अगले दिन पुलिस के किसी एक अफसर ने 30 मौतों की बात मंजूर की, और बात आई-गई हो गई। कुंभ से उपकृत मीडिया के पास आंकड़े यही रहे कि कितने बजे तक कितने लोगों ने अमृत स्नान किया।
सार्वजनिक जीवन में जनता के ओहदों पर बैठे हुए लोगों में लोगों के गुस्से का सामना करने का हौसला होना चाहिए। और कुंभ में तो किसी भीड़ की पहुंच योगी आदित्यनाथ तक थी भी नहीं, वे किसी भीड़ से घिरे हुए भी नहीं थे, ऐसे में उनका मौत शब्द को भी मुंह पर न आने देना बड़ा अटपटा रहा, और इसने उन्हें एक कमजोर नेता की तरह दिखाया है। दुनिया में धार्मिक भीड़ का इतिहास हादसों से भरा हुआ है, और ऐसे में करोड़ों की भीड़ में कुछ दर्जन मौतें उतना बड़ा कलंक भी नहीं थीं, जितना शायद योगी ने इसे मान लिया, और मौत शब्द को अपनी डिक्शनरी से ही बाहर कर दिया। फिर जब यूपी सीएम मौत के आंकड़े देने तैयार न हों, अफसर चौबीस घंटे बाद मुंंह खोलें, तो केंद्र सरकार के तो कुछ कहने की जिम्मेदारी भी नहीं बनती थी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या कुंभ में खुद होकर पहुंचने वाले करोड़ों लोगों के बाद अरबों रुपयों के इश्तिहार देकर देश भर से और लोगों को न्यौता देना क्या सचमुच कोई समझदारी का काम था? जिनकी आस्था थी वे तो अपने हिसाब से पहुंचने ही वाले थे, और तीर्थयात्रियों के आने का देश में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड, और एक विश्व रिकॉर्ड बनाना क्या इतना जरूरी था? आज भी हमें लगता है कि करोड़ों लोगों की ऐसी भीड़ सुरक्षित नहीं है। किसी भी एक जगह, एक धार्मिक आस्था से इतने लोगों का पहुंचना, और सीमित जगह पर असीमित भक्ति-भाव से कुछ पारंपरिक रीति-रिवाज निभाना क्या किसी भी सरकार के लिए मानवीय रूप से संभव इंतजाम है? आती हुई जनता को न रोकना एक बात है, लेकिन असंभव किस्म के इंतजाम में भीड़ को और बढ़ाने के लिए रात-दिन इश्तिहार दिखाना, एक खतरनाक राजनीतिक फैसला था, और है। इससे खतरा था, कुछ नुकसान हुआ, और अभी खतरे का एक पूरा पखवाड़ा बाकी है।
भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में आमतौर पर जिला प्रशासन किसी भी भीड़ को झेलने के लिए, उसका इंतजाम करने के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार रहता है। लेकिन करोड़ों की ऐसी भीड़ के लिए तो कई जिला मजिस्टे्रट ड्यूटी पर लगाए गए थे, आसपास के कई जिले भी इस भीड़ की आवाजाही से प्रभावित थे, और क्या सचमुच ही इस पूरे आयोजन के लिए किसी जिला प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? जैसा कि राष्ट्र और प्रदेश स्तर के इस आयोजन को राज्य सरकार के फैसले के मुताबिक किया जा रहा था, क्या प्रयागराज के जिला कलेक्टर इस किस्म की भीड़ के इंतजाम में अपने किसी दिमाग का इस्तेमाल कर सकते थे, या उन्हें राज्य सरकार के फैसलों पर ही मुहर लगानी थी? ऐसे में किसी भी हादसे की जवाबदेही कैसे तय हो सकती है? क्या सचमुच ही कोई जिला कलेक्टर अपने इलाके में एक दिन एक वक्त दस करोड़ लोगों के जुटने की इजाजत दे सकते हैं? क्या कोई अफसर इसे न्यायोचित ठहरा सकते हैं कि ऐसी दस करोड़ की भीड़ के लिए उनके पास पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम थे?
यह आयोजन बिना किसी बड़े हादसे के पूरा हो जाए, इसके लिए हमारी शुभकामनाएं हैं। लेकिन सच तो यह है कि ऐसी भीड़ के बावजूद अगर कोई अनहोनी नहीं होती है, तो वह किसी योजना की वजह से न हुई हो, ऐसा नहीं लगता, ऐसा लगता है कि और कोई बड़ा हादसा न होना बस अपने-आप टल गया हो। हमारा तो यह मानना है कि राज्य शासन और स्थानीय प्रशासन इन दोनों के नजरिए से इतनी बड़ी भीड़ को और बढ़ाने का काम नहीं करना चाहिए था। दुनिया का सबसे अच्छा इंतजाम भी लोगों की इतनी बड़ी गिनती के सामने बेअसर हो सकता है। अपनी आस्था से जो लोग वहां पहुंचते, वे अपने-आपमें एक बड़ी चुनौती थे, उन पर, और उनकी वजह से औरों पर होने वाले खतरे को पूरी तरह अनदेखा करना ठीक फैसला नहीं रहा। यह पूरा आयोजन बिना किसी और बड़े हादसे के निपट जाए, उससे भी भीड़ को बढ़ाने को सही कहना समझदारी नहीं होगा। लोकतंत्र में सत्ता को ऐसे फैसले लेने की ताकत तो रहती है, लेकिन इनसे बचना ही बेहतर रहता।
चलते-चलते अभी शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का यह बयान देखने मिल रहा है जिसमें उन्होंने कहा है-मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमें धोखे में रखा कि घटना में कोई मौत नहीं हुई है। आज हमारी सबसे बड़ी पीड़ा है कि हमारा सीएम झूठा है। हमारी जो मृत आत्माएं हैं, उनके प्रति संवेदना व्यक्त करने और उपवास करने के लिए भी सीएम ने मौका नहीं दिया। मौतों के बाद सीएम का बयान आया कि कुछ लोग घायल हुए हैं, उन्होंने किसी मौत का जिक्र नहीं किया। हिंदू धर्म में ये नियम है कि जब परिवार में किसी की मौत हो जाती है, विशेष रूप से इस तरह की परिस्थितियों में तो कोई भोजन नहीं करते। शंकराचार्य ने कहा कि सीएम ने ऐसा आभास करा दिया कि सिर्फ अफवाह चल रही है, और कोई मौत नहीं हुई है। उन्होंने इसे संतों, और सनातनियों के साथ बहुत बड़ा धोखा कहा है और तकलीफ जाहिर की है कि मौतों के बाद का भोजन पूरी जिंदगी पीड़ा देगा। उन्होंने कहा कि समय रहते मौतों का पता लग रहता तो वे एक दिन का उपवास करते, लेकिन इस सच्चाई को योगी आदित्यनाथ ने छुपाकर रखा।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का पहला हफ्ता अपने नाटकीय फैसलोंं का तो रहा, इसके साथ-साथ चीन की एक ऐसी कारोबारी कामयाबी का भी रहा जिसने अमरीका की सबसे कामयाब कम्प्यूटर कंपनियों को पल भर में धूल चटा दी। चीन की एक कंपनी ने इतनी कम लागत में ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है जिसकी लागत, और कामयाबी ने अमरीका को हक्का-बक्का कर दिया है। अमरीका की एक सबसे बड़ी कंपनी ने शेयर मार्केट में एक दिन में 52 लाख करोड़ रूपए खो दिए क्योंकि अमरीकी कंपनियों ने ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस विकसित करने में इस चीनी कंपनी के मुकाबले 25-50 गुना अधिक खर्च किए हैं। और डीपसीक नाम के इस प्लेटफॉर्म ने हफ्ते भर में ही दुनिया का दिल जीत लिया है। एक तरफ अमरीका की हफ्ते भर पहले तक की सबसे कामयाब और लोकप्रिय चैट-जीपीटी की सेवा भुगतान करके ली जा सकती थी, और चीनी डीपसीक न सिर्फ इससे तेज साबित हुआ है, बल्कि मुफ्त भी है। अब अमरीकी शेयर होल्डर यह सोच रहे हैं कि उनसे जुटाए गए पैसों से अमरीकी कंपनियां किस हद तक खर्च कर रही थीं, और क्या वह पूरा खर्च बर्बादी था जो कि ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस बनाने के नाम पर किया जा रहा था। ट्रम्प के लिए यह एक शर्मिंदगी की बात इसलिए भी है कि उन्होंने अपने पहले ही हफ्ते में लाखों करोड़ डॉलर का एक नया प्रोजेक्ट लाँच किया था, जिसका अधिकतर हिस्सा उस कंपनी को मिलना था जिसे चीनी कंपनी की धोबीपछाड़ ने शेयर मार्केट में पल भर में चारों खाने चित्त कर दिया है।
ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर दुनिया में अभी यह साफ नहीं है कि वह इंसानों और कारोबारों का क्या करेगा। यह भी तय नहीं है कि दुनिया के कौन से देश ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और उस पर आधारित प्रोडक्ट बनाने में सबसे आगे रहेंगे, और उस नाते वे दुनिया पर अपना दबदबा बनाकर रखेंगे। अब पिछले एक हफ्ते ने यह साबित किया है कि कम से कम एक प्लेटफॉर्म चीन ने ऐसा बना लिया है जिसका अमरीका के पास कोई जवाब नहीं है। इससे अमरीकी कंपनियों की साख भी चौपट हो रही है, और नई बन रही विश्व व्यवस्था में चीन ने एकाएक एक नई साख पा ली है। दुनिया के अलग-अलग देशों के दसियों लाख लोगों को अमरीका से निकाले जाने की घोषणा हुई है, और ऐसे में चीन से ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की यह नई कारोबारी कामयाबी सामने आई है, इन दोनों बातों को मिलाकर पता नहीं किस तरह देखा जाना चाहिए।
एक चीनी कंपनी ने इतने सस्ते में यह काम कर दिखाया है जिसके लिए अमरीकी कंपनियां अपने इतिहास का सबसे बड़ा खर्च कर रही हैं। असंभव सा लगने वाला बजट ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए दिया जा रहा है, और मानो एक नया ईश्वर ही गढ़ा जा रहा है। दुनिया में सबसे सस्ते सामान बनाने के लिए बदनाम या मशहूर चीन ने इन सब अमरीकी कंपनियों को पछाडक़र जिस तरह यह प्लेटफॉर्म तैयार किया है, उससे अमरीकी सपने चकनाचूर हो गए हैं। और शर्मिंदगी झेलते हुए भी अमरीकी राष्ट्रपति को यह कहना पड़ा है कि अमरीकी कंपनियों को चीनी डीपसीक प्लेटफॉर्म के इस तरह अचानक आ जाने से जाग जाने की जरूरत है क्योंकि यह सस्ता, और तेज भी है। आज दुनिया के हजारों किस्म के कारोबार ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की तरफ देख रहे हैं, कैंसर के हर मरीज के लिए अलग-अलग दवा बनाना भी मुमकिन लग रहा है, और हर इंसान के लिए कैंसर की आशंका होते ही उससे बचाने का टीका भी ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बन सकेगा ऐसा लग रहा है। ऐसे में जो कंपनी, देश, या सरकार दुनिया में अव्वल रहेगी, वह सौ किस्म के कारोबारों में सबसे आगे रह सकती है, और दुनिया पर राज कर सकती है। ऐसी नौबत में एकाएक चीन से जो सूरज निकला है, उसने काला चश्मा पहनने वाले अमरीकी कारोबारियों की आंखें भी चकाचौंध कर दी हैं।
लेकिन आज इस मुद्दे पर आज यहां लिखने का हमारा मकसद न तो ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर लिखने का है, और न ही अमरीकी-चीनी कारोबारी मुकाबले पर। हम तो महज यह याद दिलाना चाहते हैं कि बाकी देशों, और बाकी धंधों को भी यह समझ लेना चाहिए कि किस तरह कोई नया कारोबार एकाएक पूरे बाजार को इतना उथल-पुथल कर सकता है कि दुनिया के जमे-जमाए कारोबार तहस-नहस हो जाएं। आज जिस कामयाबी पर किसी उद्योग-व्यापार, या सरकार को फख्र होता है, कल को हो सकता है कि कोई नया स्टार्टअप उनके एकाधिकार को खत्म कर दे, और उन्हें बेरोजगार कर दे। अमरीकी कंपनी को इस चीनी स्टार्टअप ने एक दिन में जो झटका दिया है, वह भारत की एक सबसे बड़ी कंपनी टाटा की आधी दौलत से अधिक है। इससे छोटे-छोटे कारोबारियों को भी यह सबक लेना चाहिए कि किस तरह उनके इलाके में कोई बड़ी दुकान खुलने से उनका छोटा-छोटा धंधा खत्म हो सकता है। अब तो देश के खरबपति भी सब्जी-भाजी बेचने लगे हैं, और घर तक किराना पहुंचाने लगे हैं। अब दुनिया में धंधों के तौर-तरीके, उनकी संभावनाएं, इस तरह के भूकम्प का सामना कर सकते हैं कि रातोंरात कारोबार की चमकती इमारत खंडहर बन जाए। इसलिए लोगों को दूसरे देशों की ऐसी मिसालों से अपनी-अपनी जिंदगी में एक सबक लेना चाहिए। जो लोग किसी छोटे से कारोबार की आज की कमाई को देखकर कोई बड़ा पूंजीनिवेश कर दें, और कल को वह कारोबार ही बंद हो जाए, तो क्या होगा? लोगों को यह मानकर चलना चाहिए कि कारोबार में तमाम वक्त एक सा नहीं रहता, और कोई कारोबार जाने कब खत्म या बंद हो जाए। लोगों को याद रहना चाहिए कि 25-30 बरस पहले हिन्दुस्तान में किस तरह पेजर का चलन शुरू हुआ था, और उस पर आने वाले एसएमएस को लोग चमत्कार की तरह देखते थे, वह धंधा साल भर भी नहीं चला कि मोबाइल ने आकर उसे मटियामेट कर दिया। ऑर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में दुनिया में सबसे आगे चल रहे अमरीका को जिस तरह अचानक सदमा लगा है, वह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा सबक है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
सयाने-समझदार लोग यह कहते हैं कि ताकत जिम्मेदारी के साथ ही आनी चाहिए। इन दिनों अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प को देखें तो उनके दूसरे कार्यकाल के पहले हफ्ते में ही उन्होंने दुनिया को हक्का-बक्का कर दिया है। ऐसा भी नहीं कि वे अपने पहले कार्यकाल में बहुत समझदारी के फैसले लिए हों, लेकिन वे जितनी बददिमागी के फैसले लेते थे, उससे अधिक बेदिमागी के बयान देते थे। पिछला चुनाव हारने के बाद भी उनका यही सिलसिला जारी रहा, और नतीजा यह हुआ था कि 6 जनवरी 2020 को उनके समर्थकों ने अमरीकी संसद पर हमला कर दिया था, और इस बार उनके राष्ट्रपति बनते ही पहले ही दिन उन सारे हिंसक हमलावरों को राष्ट्रपति के विशेषाधिकार से आम माफी दे दी गई। ऐसा शायद ही दुनिया के किसी लोकतंत्र में होता हो कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था, संसद पर हिंसक हमला हो, और गुनहगार बख्श दिए जाएं। लेकिन ट्रम्प का दुनिया को चौंकाना पिछले हफ्ते भर में रोज जारी है, हर कुछ घंटों में वे और उनके सहायक दुनिया पर एक किस्म से हमला कर रहे हैं, और अमरीका की विदेश नीति के पूरे इतिहास को तहस-नहस कर दे रहे हैं।
अमरीका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अपने आपको पूरी दुनिया का रहनुमा बनाने के लिए बड़ी मेहनत की थी, खूब खर्च किया था, और फौजी ताकत से परे भी उसने पूरी दुनिया में रणनीतिक महत्व के रिश्ते और समझौते किए थे, और ठोस कूटनीति से परे जाकर भी दुनिया का मददगार बनकर लोगों का दिल जीता था, या संयुक्त राष्ट्र में उनके वोट जीते थे, या कई फौजी मोर्चे जीते थे। ट्रम्प ने देश के बाहर और देश के भीतर जरूरतमंदों की मदद की लंबी परंपरा को एक झटके में खत्म कर दिया है। दुनिया के देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को अमरीका से जो मदद मिलती थी, वह तो खत्म की ही जा रही है, उसके साथ-साथ खुद अमरीका के भीतर हजार किस्म के अलग-अलग सामाजिक कार्यक्रमों के लिए जिन संगठनों को मदद मिलती थी, उन सबको भी कम्युनिस्ट कहकर उसे एक साथ खत्म कर दिया जा रहा है। अमरीका ने पेरिस जलवायु समझौता तोड़ दिया है, उसने विश्व स्वास्थ्य संगठन को हजारों करोड़ डॉलर हर बरस की मदद को खत्म कर दिया है, उसने विश्व व्यापार संगठन के समझौते को तोडक़र दुनिया के अलग-अलग देशों पर अलग-अलग प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, उसने इजराइल को वे भारी-भरकम बम सप्लाई करना फिर शुरू कर दिया है जो पिछले अमरीकी राष्ट्रपति ने रोक रखा था, और ट्रम्प ने फिलीस्तीनियों के अपने देश के हक को भी एक किस्म खारिज करने वाला बयान दिया है, और इजराइल के प्रधानमंत्री को सबसे पहले विदेशी नेता के रूप में अमरीका आमंत्रित भी किया है।
एक किस्म से ट्रम्प की घोषणाओं, उनके फैसलों, और उनके राष्ट्रपति की हैसियत वाले आदेशों की वजह से दुनिया की लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था में भूकम्प की लहरें दौड़ पड़ी हैं, और अभी कांपती हुई धरती पूरी तरह से समझ और संभल नहीं पा रही है कि ट्रम्प नाम के इस सुनामी और भूकम्प की मिलीजुली मतदाता-निर्मित आपदा से वह कैसे निपटेगी। किसी एक देश के वोटरों का फैसला बाकी पूरी दुनिया को भी किस हद तक प्रभावित कर सकता है, इसकी एक मिसाल तो हिटलर था, और उसकी एक मिसाल आज के इस वक्त में ट्रम्प है। बेहिसाब ताकत, और शून्य जवाबदेही ने मिलकर ट्रम्प को एक ऐसा तानाशाह बना दिया है जो तय करता है कि कोई अमरीकी नागरिक ट्रांसजेंडर नहीं हैं, वे सिर्फ औरत या मर्द हैं। वह तय करता है कि देश में सरकारी मदद से किनको खाना मिलना है, किनको नहीं, वह तय करता है कि दसियों लाख सरकारी कामगार किस दिन से काम पर आना बंद कर दें, वह तय करता है कि दुनिया का सबसे रईस कारोबारी न सिर्फ अमरीकी सरकार में किफायत लाने का काम करे, बल्कि वह किस तरह दुनिया के बहुत से दूसरे देशों की घरेलू राजनीति को भी तय करे। एक नजर में ट्रम्प अमरीकी जनता का चुना गया, चीनी मिट्टी के बर्तनों की अमरीकी दुकान में जनता का अपना ऐसा बिफरा हुआ पालतू सांड है जो चारों तरफ सब कुछ चकनाचूर कर रहा है। हम दुनिया के बुरे से बुरे सांड को भी ट्रम्प की मिसाल से नवाजना नहीं चाहते, लेकिन बोलचाल की भाषा के इस्तेमाल में इस मुहावरे को यहां पर लिख रहे हैं।
ट्रम्प ने पनामा नहर को फौजी कार्रवाई से भी कब्जे में लेने की घोषणा की है, डेनमार्क से उसके एक हिस्से ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की है, और कनाडा को प्रस्ताव रखा है कि वह अमरीका का राज्य बन जाए। इसके अलावा ट्रम्प ने अमरीकी बाहुबल दिखाते हुए दुनिया के और बहुत से देशों की बांह मरोडऩे का सिलसिला शुरू कर दिया है। दुनिया भर से वहां कानूनी और गैरकानूनी तरीकों से पहुंचे, और बसे हुए लोगों को निकालने की उसकी घोषणा दुनिया के दर्जनों देशों में फिक्र खड़ी कर रही है, और जिन देशों को यह लग रहा है कि उनकी सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, उन्हें इस पर भी गौर करना चाहिए कि अमरीका में अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई करते हुए धर्मस्थलों को अलग रखने की परंपरा कायम रखी थी, अभी ट्रम्प सरकार के अफसरों ने दो दिन पहले ही कई जगह गुरुद्वारों की जांच की है, और वे अवैध रूप से वहां रह रहे लोगों को ढूंढ रहे हैं। सरकार ने अप्रवासियों की जांच करने के लिए अफसरों को खुली छूट दी है। अमरीका में बसे सिक्खों ने ऐसी कार्रवाई पर बड़ी फिक्र जताई है, और इसका विरोध किया है, इसे अपने धर्म पर हमला बताया है। जितना हमला यह अमरीका के सिक्ख गुरुद्वारों पर है, उससे अधिक खतरनाक यह मिसाल दुनिया के कई देशों में वहां की सरकारों द्वारा इस्तेमाल की जाएगी।
ट्रम्प की घोषणा के मुताबिक अगर दसियों लाख लोगों को गिरफ्तार करके उनके देशों में वापिस भेजा जाएगा, तो उनके रोजगार और कारोबार दोनों किस हद तक बर्बाद होंगे, इस पर अभी उनके देश कुछ कह नहीं रहे हैं। बिफरे हुए सांड की ताकत आज दुनिया के किसी देश में नहीं है, और तमाम देश ट्रम्प के अगले हमले की आशंका में सो रहे हैं, जो कि महज फौजी ताकत से नहीं हो रहा है, कई शक्लों में हो रहा है। अमरीकी जनता देश के भीतर ही जिस दर्जे की उथल-पुथल झेल रही है, वह उसके लिए ही अकल्पनीय थी। लेकिन ट्रम्प अपने दूसरे कार्यकाल में एक बात के लिए बेफिक्र है कि उसके किसी जुर्म के बिना उसे कोई भी हटा नहीं सकते, और महाभियोग से परे उसका कार्यकाल बना रहेगा। दूसरी जिस बात के लिए वह बेफिक्र है वह यह कि अमरीकी राष्ट्रपति महज दो कार्यकाल पूरा कर सकते हैं, और इसके बाद ट्रम्प का वैसे भी कोई चुनावी भविष्य नहीं है। ऐसे में जबकि ट्रम्प का दांव पर कुछ भी नहीं लगा है, उसने अमरीका की तमाम बेहतर चीजों को दांव पर लगा दिया है, इससे अमरीकी इतिहास भी तबाह हो रहा है, और अमरीकी भविष्य का पता नहीं क्या होगा। लेकिन जैसी कि दुनिया की आशंका है, ट्रम्प दुनिया को इतना तबाह करके जा सकता है कि वह एक बार फिर चीन, रूस, या ईरान की तरफ देखने लगे।


