संपादकीय
कल छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग मामलों में दिए गए फैसले बलात्कार में लडक़ी या महिला की अलग-अलग स्थितियां तय करते हैं। इन दोनों की आपस में तुलना करने की कोई वजह नहीं है, दोनों की घटनाएं अलग हैं, लेकिन भारतीय कानून में महिलाओं की स्थिति, और भारतीय हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के नजरिए को लेकर इन दोनों की एक तुलना करना जरूरी भी है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक जिला अदालत द्वारा सुनाई गई सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन बरस कर दिया, क्योंकि हाईकोर्ट जज का यह मानना था कि किसी महिला की योनि पर अगर आरोपी ने अपना गुप्तांग टिकाया था, और वहीं उसका स्खलन हुआ, तो जब तक उसने योनि के भीतर प्रवेश नहीं किया था, तब तक वह बलात्कार नहीं, सिर्फ बलात्कार का प्रयास कहलाएगा। यह पूरी बात सुनने में बड़ी अप्रिय लगती है, लेकिन सेक्स अपराधों के मामले में इस चर्चा से इसलिए नहीं बचा जा सकता कि ऐसे बारीक तकनीकी फर्क से कानून के नजर में जुर्म बदल जाता है। हाईकोर्ट ने इस तकनीकी फर्क के आधार पर मौजूदा कानून के तहत इसे बलात्कार की कोशिश ही माना, और उस आधार पर ही सजा सुनाई, ट्रॉयल कोर्ट की दी गई सजा घटाकर आधी कर दी।
एक दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले बरस इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए गए उस विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक नाबालिग लडक़ी को सीना पकडक़र, उसका नाड़ा खींचा गया था, उसे पुल के नीचे ले जाया गया था, और हाईकोर्ट ने इसे बलात्कार का प्रयास मानने से भी इंकार कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया है। हमने पिछले बरस के इस फैसले के तुरंत बाद इसी जगह यह लिखा था कि जज का यह तर्क सही नहीं है कि उस नाबालिग लडक़ी का सीना भींचना, और उसका नाड़ा खोलने या तोडऩे की कोशिश करना बलात्कार की कोशिश नहीं है। इसके खिलाफ हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल पर जमकर कहा था, और सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि इस फैसले को तुरंत खारिज करे। इसे खारिज करने में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 11 महीने लगा दिए, और सर्वोच्च अदालत को जो संवेदनशीलता दिखानी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राममनोहर नारायण मिश्रा का नाम तब से हमारे दिमाग में घूम ही रहा था कि कैसे कोई जज इतना संवेदनाशून्य हो सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही एक दूसरे जज संजय कुमार सिंह ने बलात्कार के एक आरोपी को जमानत देते हुए लिखा था कि पीडि़ता ने खुद ही मुसीबत को न्यौता दिया था, और वह खुद जिम्मेदार है। हमने इस पर पहले भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट जब अदालती संवेदनशीलता के लिए कुछ निर्देशक-सिद्धांत बनाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि इस तरह की हिंसक, पुरुषवादी, महिलाविरोधी, और संवेदनाशून्य टिप्पणियां करने वाले जजों को उनकी बाकी नौकरियों तक इस किस्म के मामलों से अलग रखा जाए। जो जज सदियों का पूर्वाग्रह ढोते हुए हिंसक बने हुए हैं उन्हें ऐसे किसी भी मामले की सुनवाई का हक नहीं है। हम जजों से यह उम्मीद तो नहीं करते कि वे पुरखों से मिली हिंसा की विरासत से पूरी तरह मुक्त हो सकेंगे, लेकिन उन्हें महिलाओं और बच्चों के मामलों से, धर्म या जाति के मामलों से पूर्वाग्रह की वजह से ही अलग रखना चाहिए।
जब-जब हमारी कही कोई बात सुप्रीम कोर्ट में जायज करार दी जाती है, तो थोड़ी तसल्ली होती है कि प्राकृतिक न्याय पर आधारित हमारी सीमित समझ सही साबित हुई है। इससे भी अधिक तसल्ली यह होती है कि भारतीय समाज में जो तबके सबसे कमजोर हैं, उन तबकों के साथ, उनमें से कम से कम किसी एक तबके के साथ यह थोड़ी हमदर्दी की बात हुई है। हालांकि इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के मामले में नफरती-बयान की याचिका पर जो रूख दिखाया है, वह एकदम ही निराश करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के पिछले, रिटायर हो चुके जजों ने हेट-स्पीच के मामले में जो साफ-साफ फैसले दिए थे, और पूरे देश के प्रशासन पर एफआईआर दर्ज करने की जो जिम्मेदारी डाली थी, आज के चीफ जस्टिस खुद ही हाल के बरसों के उस फैसले को अनदेखा करते हुए दिख रहे हैं। खैर, आज लड़कियों और महिलाओं के हक, उनकी गरिमा, उनके साथ इंसाफ की चर्चा में हम नफरती-बयानों के मुद्दे को जोडक़र सब कुछ बहुत जटिल करना नहीं चाहते, इसलिए उस पर अलग से।
छत्तीसगढ़ में अभी सरगुजा के एक बाल सुधारगृह में गंभीर अपराधों में बंद किए गए 13 नाबालिग फरार हो गए। उनमें से 4 पकड़ा गए हैं, लेकिन 9 को कई जिलों में ढूंढा जा रहा है। समाचार बताता है कि वे गार्ड को बंधक बनाकर, उन पर हमला करके, दीवाल से छलांग लगाकर भाग निकले। इन नाबालिगों पर कुछ सबसे गंभीर अपराधों के मामले किशोर न्यायालय में चल रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है कि इस राज्य के बाल सुधारगृह में हिंसा करके वहां बंदी बनाए गए किशोर फरार हुए हों, लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तो दुर्ग के एक बाल सुधारगृह की छत पर चढ़ गए लडक़े रसोई गैस सिलेंडर को पुलिस पर फेंकने के लिए उठाकर खड़े थे, और दिल दहलाने वाली उनकी वैसी तस्वीरें सामने आई थीं। देश का कानून नाबालिगों को मुजरिम नहीं मानता है, उन्हें कानून से टकरा रहे नाबालिग ही मानता है। सुप्रीम कोर्ट में एक बहस यह भी चल रही है कि बहुत भयानक जुर्म में शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर सजा नहीं दी जानी चाहिए? इस मामले में मानवाधिकारवादी लोगों का कहना है कि नाबालिगों के साथ अलग सुलूक होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ निर्भया जैसे भयानक सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल एक नाबालिग ने निर्भया की देह के साथ जैसे जुल्म किए थे, उसे देखते हुए लोगों को यह भी लगता है कि कई किस्म के जुर्म उम्रसीमा से परे मान लेने चाहिए।
हम बाल सुधारगृह के नाम पर ही आते हैं। इसे सुधार माना गया है। लेकिन वहां का जो हाल रहता है, क्या उसमें सचमुच ही किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश रहती है? एक तो जो नाबालिग वहां पहुंचते हैं, उनमें से बहुत सारे लगातार जुर्म के बीच बरसों से जीते हुए रहते हैं। वे नशा सीख चुके रहते हैं, दूसरे बालिग मुजरिमों के मातहत और उनके साथ काम करते हुए वे जुर्म की दुनिया का हिस्सा बन चुके रहते हैं। किसी मामले में पकड़ में आने के बाद जब उन्हें बाल सुधारगृह भेजा जाता है, तब तक वे अपराधों में रम चुके रहते हैं। बहुत ही कम नाबालिग ऐसे रहते होंगे जो अपनी पहली चूक या पहली गलती, पहले गलत काम के साथ ही पकड़ाए जाते हों, और बाल सुधारगृह भेज दिए गए हों। फिर सरकार के दूसरे किसी भी इंतजाम की तरह बाल सुधारगृह में नाबालिगों के भीतर के भी अलग-अलग उम्र सीमा के सभी तरह के बच्चे वहां रहते हैं, और जैसा कि बालिगों की जेल में होता है, जो अधिक बड़े मुजरिम रहते हैं, उन्हीं का राज चलता है। बाल सुधारगृह में भी अधिक बड़े जुर्म में पकडक़र भेजे गए लडक़ों का दबदबा रहता है, और यह बात तो बहुत आम है कि देश की सबसे सुरक्षित जेलों में भी मोबाइल भी पहुंच जाते हैं, नशा भी पहुंच जाता है। यह मानना भी फिजूल होगा कि नशे के आदी हो चुके नाबालिग सुधारगृह में नशे का जुगाड़ करने की कोशिश नहीं करते होंगे। सरकारों की सारी व्यवस्था जितनी भ्रष्ट रहती है, उसमें ऐसा इंतजाम बहुत मुश्किल भी नहीं रहता होगा। बाल सुधारगृह तो जेलों जैसी बहुत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था वाले भी नहीं रहते, हथकड़ी, बेड़ी, सलाखों की कोठरियां उनमें नहीं रहतीं, और ऐसे में अधिक बड़े जुर्म वाले, अधिक अराजक हो चुके लडक़ों का वहां अधिक दबदबा स्वाभाविक ही लगता है।
जब देश का कानून नाबालिगों को एक अलग दर्जा देता है, और किसी जुर्म में उनके शामिल होने पर भी न उन्हें मुजरिम कहता, न उन्हें दी जाने वाली सजा को कैद कहता, और सब कुछ सुधार के नजरिए से किया जाता है। ऐसे में सच तो यह है कि सरकारों को सुधारगृहों को सचमुच ही सुधार के लायक बनाना होगा, वरना नाबालिगों को वहां रखकर उन्हें जुर्म से अधिक वाकिफ करके ही छोड़ा जा रहा है। बड़े या बालिग कैदियों की जेलों में भी यही होता है, जिनको वहां बंद रखा जाता है, वे और अधिक बड़े, और अधिक कड़े मुजरिम बनकर निकल सकते हैं। अब बच्चों के, नाबालिगों के सुधारगृह में भी अगर माहौल वैसा ही है, तो फिर सरकारें अपनी न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी भी पूरी करते नहीं दिखती हैं। यह बात भी समझना चाहिए कि बड़े लोगों की जेलों में पहुंचे हुए लोग जिंदगी का अधिक बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद वहां पहुंचते हैं, और वहां पर वे अपने जुर्म के अनुपात में ही लंबे बरसों के लिए कैद रहते हैं। दूसरी तरफ बाल सुधारगृह में पहुंचे हुए नाबालिगों की उम्र बहुत बाकी रहती है, उन्हें सुधारगृह में बंद रखने का वक्त भी बड़ा कम रहता है, और अगर वे जुर्म में मंजकर बाहर निकलते हैं, तो वे समाज में लंबे समय के लिए एक खतरा रहते हैं। इसलिए सरकार को समाज की व्यापक हिफाजत और भलाई के लिए कानून से टकरा रहे बच्चों के लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए। हम किसी रहस्य की बात नहीं कर रहे हैं, पूरी दुनिया का यही तजुर्बा है कि अगर वहां बच्चों को ठीक से नहीं रखा गया, तो भविष्य बहुत लंबे वक्त के लिए बर्बाद होता है, उन बच्चों का भी, और पूरे समाज का भी।
देश भर की अदालतों में ऐसे दसियों हजार मामले चल रहे हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने यह रिपोर्ट लिखाई है कि किसी युवक या आदमी ने उससे शादी का वायदा करके देह-संबंध बनाए, और बाद में शादी से मुकर गया। ऐसी शिकायत के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देना बहुत आम बात है, और शायद हर राज्य की पुलिस ऐसी शिकायत पर आनन-फानन गिरफ्तारी भी कर लेती है। अभी कुछ बरसों में एक-एक करके देश के कई हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में इस बात पर फिक्र भी जाहिर की है कि लंबे वक्त तक देह-संबंध जारी रखने के बाद उसे बलात्कार कहना जायज है या नहीं? हमारे पाठकों में से जो महिलाओं के हक के अधिक हिमायती हैं, वे हमारे रूख से कुछ हैरान-परेशान होते आए हैं क्योंकि हमने बरसों से यह लिखना जारी रखा है कि शादी का वायदा करके किसी से देह-संबंध बनाना, और फिर मर्जी से, या किसी मजबूरी में शादी न करना बलात्कार नहीं होता। उसे अधिक से अधिक वायदाखिलाफी कहा जा सकता है, धोखा कहा जा सकता है, लेकिन वह बलात्कार नहीं होता। यह बात कई लोगों को बड़ी नागवार गुजरती है जो कि महिलाओं के हक के इस हद तक हिमायती हैं कि वायदा तोडऩे पर भी उन्हें बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने का हक होना चाहिए।
आज सुबह की खबर से हमें कुछ राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट में वहां की एक प्रगतिशील महिला जज, जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और उनके साथी जज जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने ऐसे एक मामले में यह कहा कि शादी के पहले लडक़ा और लडक़ी अजनबी होते हैं, इसलिए विवाहपूर्व शारीरिक संबंधों के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए। जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही गई, उसमें आरोपी ने जिस लडक़ी से शादी की बात की थी, उसे कथित रूप से शादी का वायदा करके कई बार देह-संबंध बनाए, दुबई बुलाया, और वहां भी संबंध बनाए। जस्टिस नागरत्ना अपने सुलझे हुए, और प्रगतिशील विचारों के लिए जानी जाती हैं, वे सरकार के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणी करने से हिचकती नहीं हैं। इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर शिकायतकर्ता शादी को लेकर इतनी गंभीर थी तो विवाह से पहले विदेश क्यों गई? उन्होंने यह भी कहा कि बिना औपचारिक वैवाहिक प्रतिबद्धता के, पूर्ण विश्वास खतरनाक हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई लडक़ी या महिला विवाह को लेकर एकदम पक्की सोच रखती है, तो उसे पहले ही सीमाएं तय करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां संबंध सहमति से बने हों, हर मामला आपराधिक मुकदमे और सजा तक पहुंचना जरूरी नहीं है, कुछ विवाद व्यक्तिगत संबंधों के टूटने से जुड़े होते हैं, जिन्हें हर बार आपराधिक न्यायप्रक्रिया में नहीं ढाला जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक रिश्तों की जटिलता को समझना जरूरी है, लेकिन जोखिमों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
हम सुप्रीम कोर्ट की कई बातों से सहमत रहते हैं, और कई बातों से असहमत भी रहते हैं। इस मामले में अदालत की टिप्पणियों को महिलाविरोधी सोच मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि एक सुलझी हुई महिला जज इन पहलुओं को उठा रही हैं। हमने पहले भी इस बात की सामाजिक व्याख्या करते हुए लिखा था कि जिंदगी में कई तरह के वायदे टूटते हैं। शादियों के मामले में तो सगाई हो जाने के बाद भी कई शादियां नहीं हो पातीं, और कई किस्म के मतभेद या विवाद की वजह से रिश्ते टूट जाते हैं। फिर इसके बाद शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक तो सामाजिक और अदालती दोनों तरह से मान्यता प्राप्त है। जोड़े पूरी जिंदगी के हिसाब से शादी करते हैं, और न निभने पर वे अलग भी हो जाते हैं। तलाक को देखें तो एक हिसाब से वह शादी के रिश्ते के भीतर भी धोखे सरीखा रहता है, लेकिन इसे बलात्कार का दर्जा नहीं दिया जा सकता। हमने बार-बार यह बात लिखी है कि लोगों को रिश्ते बनाते हुए यह बात सोच लेना चाहिए कि हर वायदा पूरा होने की कोई गारंटी नहीं रहती। लोगों को देह-संबंध बनाते हुए यह पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि मामला शादी तक पहुंच भी सकता है, और नहीं भी पहुंच सकता।
भारतीय अंडर-19 वर्ल्ड कप में शानदार बल्लेबाजी से रिकॉर्ड बनाने वाले नए खिलाड़ी वैभव सूर्यवंशी को अब दसवीं का इम्तिहान देना है। जिन लोगों ने उसके मैच देखे हैं, उन्हें कुछ हैरानी होगी कि क्या इतनी कामयाबी के बाद दसवीं का इम्तिहान देना और उसे पास करना जरूरी होना चाहिए, या कि खेल में ऐसी उत्कृष्टता को ही पढ़ाई भी मान लेना चाहिए? वैभव सूर्यवंशी के बारे में मामूली सी सर्च बताती है कि बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर/मोतीपुर गांव के एक साधारण किसान परिवार के इस बेटे के पिता खुद भी एक क्रिकेटर बनना चाहते थे लेकिन साधन-सुविधा न होने से नहीं बन पाए। अपने बेटे के सपने पूरे करने के लिए उन्होंने अपने खेत बेच दिए, मां सुबह चार बजे उठकर खाना बनाती थीं, ताकि वे क्रिकेट-प्रैक्टिस के लिए समय पर निकल सकें। अभी की खबर है कि वैभव की क्रिकेट-व्यस्तताओं के चलते उसने तय किया है कि वह इस साल परीक्षा नहीं देगा, और अगले बरस इसमें शामिल होगा।
चीन के बारे में कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि वहां खेल संघों के चयन अधिकारी शहर-कस्बों की गलियों में खेलते हुए छोटे-छोटे बच्चों में से ही प्रतिभाओं को पहचानते हैं, और उन्हें परिवार की इजाजत से ले जाकर खेल छात्रावासों में रखकर बरसों तक सिर्फ खेल की तैयारी करवाई जाती है, नतीजा यह निकलता है कि वे किशोरावस्था में ही गोल्ड मैडल लाने लगते हैं। देश के लिए मैडल तो ठीक है, लेकिन ऐसी तैयारी इन बच्चों के विकास के लिए कितनी अच्छी या कितनी बुरी होती है, अभी हम उस पर नहीं जा रहे हैं। अभी हम वैभव सूर्यवंशी जैसे होनहार खिलाडिय़ों पर पढ़ाई और परीक्षा के दबाव को लेकर चर्चा करना चाहते हैं, और दुनिया के कई विकसित देशों में ऐसी खेल प्रतिभाओं के लिए क्या रियायतें रहती हैं, उसे देख रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, और अमरीका जैसे विकसित देशों में ऐसे खिलाडिय़ों की ट्रेनिंग की जरूरतें पूरी हो जाने के बाद उनके बचे हुए समय के लिए फ्लैक्सिबल स्कूलिंग का इंतजाम रहता है, जो बाकी समय में पढ़ाई और परीक्षा करवाते हैं। अमरीका जैसे देशों में ऐसे खिलाडिय़ों के लिए ऑनलाइ स्कूलें हैं, जहां की पढ़ाई वे दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए, खेल की तैयारी करते हुए, या मुकाबलों में शामिल होते हुए कर सकते हैं, इम्तिहान दे सकते हैं। इन देशों में बड़े खेल-क्लब, खेल अकादमियां, और खेल-संघ अपने युवा खिलाडिय़ों के लिए खेल प्रशिक्षकों के अलावा व्यक्तिगत ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों का इंतजाम भी करते हैं, ताकि दोनों में से कोई न पिछड़े। कुछ देश गैप-ईयर, और क्रेडिट-सिस्टम रखते हैं जिसमें ऐसे छात्र-छात्राओं को पढ़ाई कुछ समय के लिए रोक देने, टुकड़ों में पूरा करने जैसी छूट रहती हैं, जिससे वे मानसिक तनाव से मुक्त रहते हैं। बड़े स्कूलों में यह नियम रहता है कि जब खिलाडिय़ों की टीम कहीं बाहर सफर करती है, तो उनके साथ पढ़ाने वाले कोई शिक्षक भी जाते हैं ताकि खाली समय में वे पढ़ा सकें। कहीं-कहीं पर बच्चों को स्कूल न आने की छूट मिलती है, और स्कूल उनके लिए अलग से होमवर्क देता है। जर्मनी में खेल से थके हुए बच्चों को क्लासरूम से छुट्टी मिल जाती है, और बाद में एक्स्ट्रा क्लास लगाकर उसकी भरपाई करवाई जाती है।
भारत में अभी होनहार खिलाडिय़ों के लिए कोई लचीला इंतजाम नहीं किया गया है, और उन्हें खेल या पढ़ाई में से किसी एक को छांटना पड़ता है, या दोनों से समझौता करना पड़ता है। सीबीएसई जैसे कुछ बोर्ड कुछ विशेष अनुमति, अतिरिक्त समय, या वैकल्पिक मूल्यांकन जैसी रियायत की तरफ बढ़ रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने वाले खिलाडिय़ों की पूरी प्रतिभा को प्रोत्साहन देने की अभी कोई ठोस योजना नहीं है।
अब अगर हम खिलाडिय़ों को पढ़ाई से पूरी छूट दे देने, और उसे पढ़ाई के बराबर मान लेने की सिफारिश करें, तो उसके साथ एक खतरा यह लगता है कि सरकार के पास ऐसे खिलाडिय़ों को आगे जाकर कोई रोजगार देने की ठोस योजना तो है नहीं। अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में मैडल लेकर आने वाले खिलाडिय़ों को जरूर कुछ राज्यों में नौकरियां मिल जाती हैं, लेकिन अभी तो बात उन तमाम होनहार खिलाडिय़ों की हो रही है जो मैडल की राह पर हैं, मंजिल तक पहुंचे नहीं हैं। हो सकता है कि इनमें से अधिकतर मैडल की मंजिल तक न पहुंचे, और गिने-चुने ही वहां जा पाएं। लेकिन तैयारी के लिए अगर पढ़ाई छोडक़र ये खिलाड़ी केवल खेलते हैं, तो उससे तो उन्हें सरकारी या कोई और नौकरी नहीं मिलती। यह तो तभी हो सकता है, जब उनके लिए बहुत रियायती पढ़ाई वाले कोर्स लागू किए जाएं, उन्हें न्यूनतम योग्यता के आधार पर पास किया जाए, और खेल की उनकी सफलता, और संभावना को देखते हुए उसमें उन्हें नंबर दिए जाएं। इतना लचीलापन अभी भारत की सोच में दिखता नहीं है। अफसोस इसलिए भी होता है कि शिक्षा व्यवस्था का आज जो फौलादी ढांचा है, वह लोगों को न तो नौकरियां दिला पाता है, और न ही किसी निजी रोजगार के लायक तैयार कर पाता है।
आज हिन्दुस्तान के काफी बड़े हिस्से में शिवरात्रि, या महाशिवरात्रि मनाई जा रही है। उत्तर भारत में सडक़ों के किनारे भंडारे लगे हैं, और आते-जाते राहगीरों को हर आधे-एक किलोमीटर पर अलग-अलग जगह प्रसाद के रूप में पेट भर खाना मिलता रहेगा। जिस शंकर के लिए यह महाशिवरात्रि मनाई जाती है, उनके वर्णन को देखें, तो यह लगता है कि उन्हें पूजने वाले, उनके नाम पर आज पर्व और समारोह मनाने वाले लोग उन्हें किस हद तक मानते भी हैं। भगवान शंकर को लेकर जितने किस्म के ब्यौरे बिना किसी विवाद के उन्हीं की अनगिनत कहानियों में, अनगिनत लोकगीतों में दर्ज हैं, उन्हें देखना चाहिए।
शिव अपने गले में नागों को लिपटाए रहते हैं। जो सांप समाज में डर का प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें देखते ही लोग लाठी ढूंढने लगते हैं कि उन्हें कैसे जल्द से जल्द मारा जाए, जिन्हें लेकर हजार किस्म के कहावत-मुहावरे बने हुए हैं कि फलां धोखेबाज आस्तीन का सांप साबित हुआ, वैसे मासूम सांपों को शंकर गले में पहने रहते हैं। उनकी तस्वीर याद करें तो किस तरह उन्होंने गंगा को सिर पर धारण किया हुआ है। सिर पर अगर रखा है, तो जाहिर है कि प्रकृति की इस सबसे बड़ी देन का उन्होंने सम्मान किया है, और इसका अलिखित संदेश यही है कि गंगा को साफ रखना है, ताकि उसे सिर पर सजाया जा सके। उन्होंने न सिर्फ नंदी को अपना वाहन बनाया, बल्कि शंकरजी की बारात का वर्णन पढ़ें, तो उसमें कुछ सांप बारात के आगे-पीछे चल रहे थे, कुछ शिव के गले में लिपटे हुए थे, शिव नंदी पर सवार थे, कई किस्म के जंगली जानवर बाराती बने चल रहे थे, शुभ-अशुभ माने जाने वाले कई पक्षी और कीड़े-मकोड़े भी शिव की बारात में नाचते हुए चल रहे थे, फिर प्राणियों से परे देखें तो भूत-पिशाच भी बारात में बराबरी से चल रहे थे। कोई एक लोकगीत या कहानी यह भी बताते हैं कि किस तरह जब बारात पार्वती के घर पहुंची, तो वहां के अधिकतर लोग यह सब देखकर हक्का-बक्का रह गए कि उनकी बेटी किस तरह के दूल्हे के साथ ब्याही जाने वाली है। शंकरजी की बारात में चंडाल, और श्मशानवासी भी थे, देवता और असुर सभी बराबरी से चल रहे थे, शंकर ने अपने शरीर पर चिता की राख मल रखी थी, चिता की राख ही उड़ाई जा रही थी, भूतों के नाचने की आवाज आ रही थी, ऐसी थी शंकर की बारात।
शंकर के चरित्र को देखें, तो उनमें न मौत का कोई डर था, न जहर का। पौराणिक कहानी बताती है कि किस तरह समुद्र मंथन में जहर निकला, तो शंकर ने उसे पी लिया, और गले में थमे हुए इस जहर की वजह से उनका चेहरा नीला बनाया जाता है, और उन्हें शायद नीलकंठ भी कहा जाता है। शिव को अपने आसपास नशा करने वाले लोगों से कोई परहेज नहीं था, और पुराणों के मुताबिक शिव को भांग, धतुरा, और शराब चढ़ाने की परंपरा है। शिव का चरित्र इस तरह का कोई छद्म पवित्रतावादी नहीं था कि वहां नशे की कोई जगह न हो। आज भी किसी पेड़ के नीचे धार्मिक या सामाजिक चबूतरे पर गांजा पीते हुए लोगों को बम-बम भोले, या शंकर के दूसरे कई किस्म के संबोधनों को लेते देखा जाता है। उत्तर भारत, और हिन्दी भारत के कई प्रदेशों में एक लोकगीत खूब गाया जाता है जिसे पंडित छन्नूलाल मिश्र ने पूरी दुनिया में अपने शास्त्रीय गायन से भी पहुंचाया। इस गाने के बोल देखें, तो वे बताते हैं कि किस तरह श्मशान में दिगंबर शिव होली खेल रहे हैं, किस तरह भूत-पिशाच को साथ लेकर वे चिता की राख से खेल रहे हैं। शंकर का अर्धनारीश्वर का रूप देखें, तो वे शायद अकेले ऐसे भगवान हैं जो यह साबित करते हैं कि स्त्री और पुरूष किस हद तक बराबर हैं। बदन को ही आधे-आधे हिस्से में जिस तरह दिखाया गया है, वह शायद ही किसी दूसरे देवी-देवता की छवि में हो। जिसका एक प्रचलित नाम ही अर्धनारीश्वर हो, उससे बड़ा बराबरी का और संदेश क्या हो सकता है?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया, और सोशल मीडिया के एक हिस्से को देखें तो लगता है कि किसी बजबजाती हुई नाली के पानी पर तैरती गंदगी को देख रहे हैं। वह गंदगी भी इस किस्म की कि जैसी बदबू किसी ने कभी झेली न हो। बच्चों से सेक्स, बलात्कार करने और करवाने वाला एक अमरीकी अरबपति जेफ्री एपस्टीन जैसी तस्वीरों और जानकारियों के साथ, दुनिया भर के ताकतवर लोगों के साथ अपने रिश्तों, और बच्चियां सप्लाई करने के न्यौतों वाली लाखों ईमेल के साथ, जिस तरह खबरों में आ रहा है, वह देखना भी भयानक है। दुनिया के कम से कम दस देशों में इन ईमेल में नाम आए हुए लोगों के सरकारी जगहों से इस्तीफे हो रहे हैं, और ब्रिटिश संसद में ऐसे इस्तीफे के बाद किसी तरह अपनी खाल बचाए हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री सौ-सौ बार सदन, और देश की जनता से माफी मांग रहे हैं। अमरीकी संसद की जांच कमेटी अभी इसी बात पर हैरान-परेशान है कि जांच एजेंसियों और वहां के कानून मंत्रालय ने किस तरह बहुत सारे लोगों के नाम बिना किसी जायज वजह को बताए मिटाने के बाद कागजात सार्वजनिक किए हैं। दुनिया भर के प्रमुख लोगों, सरकार और कारोबार के ताकतवरों के लिए नाबालिग लड़कियां जुटाने का यह दुनिया के इतिहास का अपने किस्म का सबसे बड़ा मामला है, और इस भड़वे को भारत की मीडिया में कुछ लोग अब तक कारोबारी-बिचौलिया करार दे रहे हैं!
इस बीच अमरीका की एक स्वतंत्र मीडिया संस्था ने एक बहुत ही लंबी खोजी जांच रिपोर्ट में यह साबित किया है कि अफगानिस्तान में दशकों तक तैनात अमरीकी सैनिकों ने वहां के नाबालिगों के साथ बड़े पैमाने पर बलात्कार किए थे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में किशोर लडक़ों को सेक्स-गुलाम बनाने की एक प्रथा, बच्चाबाजी है, और अमरीकी सैनिकों ने वहां तैनात रहते हुए अपने सेक्स के लिए ऐसे बच्चों को जुटाकर बंदी रखा हुआ था।
अफगानिस्तान में अमरीकी फौजों की बड़ी लंबी तैनाती चली, और कई सैनिक वहां बहुत लंबे समय तक रहे, और उन्होंने इस तरह के बहुत से काम किए। इस रिपोर्ट में अफगानिस्तान की इस जमीनी हकीकत के बारे में भी कहा गया है कि तालिबान अमरीकी सैनिकों की इन हरकतों के खिलाफ थे, और इसलिए वहां की जनता तालिबानों के प्रति हमदर्दी भी रखती थी। एक तरफ वहां राज कर रहे अमरीका के सैनिक नाबालिग बच्चों को सेक्स-गुलाम बनाकर उनसे बलात्कार करते थे, और अमरीकी फौजी हुकूमत से परे वहां कोई आवाज नहीं थी। लेकिन अफगानिस्तान की इस पुरानी बात पर आज नई चर्चा इसलिए छिड़ी है कि अमरीका के भीतर नॉर्थ कैलोलाइना में एक बहुत बड़ा फौजी अड्डा है, जहां करीब 50 हजार सैनिक रहते हैं, और वहां बच्चों के यौन शोषण के कई मामले सामने आ रहे हैं। कई मामलों में बलात्कारों के बाद सैनिकों को बड़ी लंबी कैद की सजा भी हो रही है। इस फौजी कैम्प के सैनिकों के मामले बताते हैं कि महिलाओं से बलात्कार के मुकाबले बच्चों से यौन-अपराध के मामले अधिक हो रहे हैं। और इसके पीछे सरकारी तथ्य ही यह बताते हैं कि इस कैम्प के अधिकांश दोषी अमरीकी सैनिक अफगानिस्तान में लंबी तैनाती कर चुके थे। अफगानिस्तान से 2021 में अमरीकी फौजों की वापिसी के बाद से फौजियों द्वारा बच्चों से यौन-अपराधों में करीब दस गुना बढ़ोत्तरी हुई है, और इसे एक महामारी जैसी नौबत बताया जा रहा है। इस खोजी रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई है कि फौज के आला अफसरों को ऐसे बहुत से मामलों की जानकारी रहती है, लेकिन उन पर कार्रवाई के बजाय वे उन्हें दबाने का काम अधिक करते हैं, ताकि फौज की बदनामी न हो, और ऐसे बलात्कारियों और यौन-मुजरिमों को इस्तीफा दे देने का विकल्प देते हैं।
देश में निर्माण कारोबार और जमीन-जायदाद के बाजार को नियमों के तहत लाने के लिए हर प्रदेश में रेरा नाम की एक नियामक संस्था बनाई गई जो कि ग्राहकों के हितों को बचाने के मकसद से लिया गया फैसला था, लेकिन आज हालत यह है कि वह बिल्डर-माफिया के हाथों का एक और हथियार बनकर रह गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कल इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्यों को यह सोचना चाहिए कि रेरा का गठन क्यों किया गया था? जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया था वे पूरी तरह निराश और हताश हैं। इस संस्था को खत्म कर दिया जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। अदालत की इन कड़ी टिप्पणियों को देखते हुए जानकर विशेषज्ञ तबकों को अपने-अपने राज्य के रेरा के कामकाज, और उसके असर का विश्लेषण करना चाहिए कि रेरा में भारी अधिकार देकर बैठाए गए लोग रीयल इस्टेट ग्राहकों के हित में काम करते हैं, या फिर वे बिल्डर-माफिया की मदद करते हैं, और अपने लिए प्लाट और मकान की रिश्वत जुटाते हैं?
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि जिन सरकारी विभागों को रेरा के दिए गए फैसलों पर अमल करवाना है, वे भी इसमें दिलचस्पी नहीं लेते, क्योंकि बिल्डर और कॉलोनाइजर माफिया उनकी जेब गर्म करते रहता है। जमीन, मकान, बिल्डिंग, और कॉलोनी से जुड़े कारोबार सरकारी विभागों के साथ तालमेल से ही काम करते हैं। ऐसे में इस संगठित, ताकतवर, और भ्रष्ट कारोबार के खिलाफ अगर रेरा कभी कोई आदेश दे भी देता है, तो भी उस पर अमल नहीं हो पाता। कहने के लिए तो रेरा को इतने अधिकार दिए गए हैं कि वे चाहें तो गलत कारोबार करने वाले लोगों के बैंक खाते भी बंद करवा सकते हैं, लेकिन जमीन-बिल्डिंग का कारोबार भ्रष्टाचार और गैरकानूनी तौरतरीकों में डूबा हुआ भी रहता है, और धड़ल्ले से चलता भी है। मतलब यह कि रेरा की कोई घोषित या अघोषित पकड़ उस पर नहीं रहती। अब यह रेरा और इस कारोबार के बीच का गैरकानूनी और अघोषित गठजोड़ है, या फिर रेरा के आदेशों पर अमल न होना है, जो भी हो, रेरा नाम के सफेद हाथी को खत्म करने का सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है, और लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई सवाल हो नहीं सकता।
अब हम राज्यों में बिल्डर और कॉलोनाइजर कारोबार को देखें, तो वे सरकार के कई विभागों के दर्जनों नियम-कानूनों के बीच काम करते हैं, और इनमें से हर किसी की पकड़ से बचे भी रहते हैं। इस कारोबार के इश्तहारों से मीडिया पटे रहता है, और वहां ऐसे माफिया की छानबीन आमतौर पर तब तक नहीं होती, जब तक उससे विज्ञापन मिलने की उम्मीद पूरी तरह टूट न जाए। मीडिया के अधिकतर हिस्से में तो यह होता है कि बिल्डर-माफिया के कारोबारी हितों को लेकर किसी इलाके के सुनहरे भविष्य की झूठी रिपोर्ट छापी या दिखाई जाती हैं ताकि विज्ञापनदाता को उससे सीधा फायदा हो सके। इसी तरह विज्ञापनदाता कारोबारियों के खिलाफ रेरा से कोई आदेश होने पर उसको खबरों में कोई जगह नहीं मिलती। ग्राहक और निवासी कितनी भी शिकायत करें, विज्ञापन पाने वाले मीडिया में उसकी सुनवाई नहीं होती। अगर मीडिया ही ईमानदार रहता, सरकार के विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते रहते, तो रेरा के नाम पर एक और सफेद हाथी खड़ा करने की जरूरत नहीं रहती। आज तो हालत यह है कि बिल्डर-माफिया ही अधिकरत प्रदेशों में यह तय करते हैं कि रेरा का मुखिया किसे बनाया जाए।
पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ का अमरीका के खिलाफ ताजा बयान हैरान करने वाला जरूर है, लेकिन उसमें कही गई बात अटपटी नहीं है। संसद में रक्षामंत्री ने कहा कि अमरीका ने पाकिस्तान को टॉयलेट पेपर से भी बुरी तरह इस्तेमाल किया। एक मकसद के लिए इस्तेमाल किया, और फेंक दिया। यह बयान उन्होंने अफगान युद्ध, और अमरीका के साथ पाकिस्तान के पुराने रिश्तों की बात करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अमरीका के लिए खुद को भाड़े पर उपलब्ध कराया, लेकिन अमरीका ने काम पूरा होने पर पाकिस्तान को छोड़ दिया। उन्होंने यह बात 2021 में अमरीका के अफगानिस्तान छोडक़र अचानक निकल जाने के संदर्भ में भी कही कि अमरीका ने पाकिस्तान को अधर में और अकेला छोड़ दिया। उन्होंने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनातनी को लेकर यह कहा कि पाकिस्तान की पिछली सरकारों ने जिहाद के नाम पर पाकिस्तानियों को लडऩे और मरने के लिए अफगान मोर्चे पर भेजा। उन्होंने यह भी कहा कि इन जंगों को जायज ठहराने के लिए पाकिस्तान के पढ़ाई के कोर्स तक में बदलाव किया गया जिसे आज तक नहीं सुधारा जा सका है।
पाकिस्तानी रक्षामंत्री की इस ताजा बात को भारत के मीडिया में इस तरह की सुर्खी के साथ पेश किया जा रहा है कि मानो आज डॉनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को धोखा दे दिया है, और उसे इस्तेमाल हो चुके टॉयलेट पेपर की तरह फेंक दिया है। खैर, हम ट्रंप या उसके पहले से अमरीकी राष्ट्रपतियों की पाकिस्तान नीति को लेकर बहुत ज्यादा फर्क नहीं देखते, सिवाय इसके कि क्रिप्टोकरेंसी, और कई किस्म के खनिजों को लेकर ट्रंप आज पाकिस्तान का बुरी तरह दोहन करना चाहता है, और उसे इस्तेमाल करना चाहता है। आज की पाकिस्तानी सरकार की मजबूरी यह है कि आज दुनिया की बहुत सी कमजोर अर्थव्यवस्थाओं की तरह वह भी ट्रंप के रहमोकरम पर जिंदा है। दुनिया का सबसे बददिमाग फौजी तानाशाह जब अपनी सारी कारोबारी ताकत को भी लेकर पूरी दुनिया में अपना एक छत्रराज कायम करना चाहता है, उसके लिए हर दर्जे की गुंडागर्दी करने पर आमादा है, दोस्तों से दुश्मनी करने, और दुश्मनों को गले लगाने के लिए एक पैर पर खड़ा है, तो वैसे में पाकिस्तान अमरीका के सामने अपनी खुद की ताकत पर तो एक भुनगे से अधिक नहीं है। यह एक अलग बात है कि अफगानिस्तान, भारत, और चीन के बीच की उसकी भौगोलिक स्थिति के चलते अमरीका उसे इस्तेमाल करते आया है, और यह जारी भी रहेगा। पिछली अमरीकी सरकारें, जो कि ट्रंप जितनी बददिमाग नहीं थीं, वे भी पाकिस्तान सहित बहुत से देशों को टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल करते आई हैं, और दुनिया को एक अहंकारी और साम्राज्यवादी अमरीका से कुछ बेहतर उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। ट्रंप अमरीकी गुंडागर्दी की इतिहास की सबसे बुरी मिसाल है, और अमरीका सहित तमाम कमजोर देशों को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि ट्रंप उन्हें टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल करके फेंक सकता है।
दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संबंधों, और वैश्विक तालमेल का युग ट्रंप के आने से खत्म हो चुका है। इसके साथ-साथ लोगों को अब यह बात समझ आ रही है कि ट्रंप की पार्टी का कोई अगला राष्ट्रपति बनने पर उसके सामने यह मिसाल मौजूद रहेगी कि गुंडागर्दी से दुनिया को घुटनों पर कैसे लाया जाता है। इसलिए पर्यावरण से लेकर फौजी समझौतों तक, और यूएसएड से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक सबने ट्रंप से जो धोखा खाया है, उस ठोकर से लोग तीन साल के बकाया टं्रपियापे के साथ जीना सीखने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तानी रक्षामंत्री ने कल वहां की संसद में जो कहा है, उसे इतिहास के जिक्र के बिना आज की शिकायत की तरह पेश करने का काम हिन्दुस्तानी सुर्खियों में किया गया है, और बहुत से लोगों को सुर्खियों के नीचे पढऩे की न दिलचस्पी रहती, न उनके पास समय रहता। इसलिए पाकिस्तान के कल के अफसोस को भारत में कई लोग आज का मानकर भी चल सकते हैं। लेकिन उससे अमरीका और पाकिस्तान की सेहत पर कोई ताजा फर्क नहीं पड़ेगा, पाकिस्तान के खिलाफ कुछ सुनने के लिए बेताब लोग कुछ देर के लिए जरूर खुश हो सकते हैं।
लंदन के एक स्कूल की खबर अभी टीवी पर आ रही है कि किस तरह वहां के एक किशोर ने दो छात्रों को चाकू मार दिया है। इसके साथ-साथ कनाडा की एक दूसरी खबर है कि वहां एक स्कूल, और एक घर में हुई गोलीबारी की घटनाओं में 9 मौतें हो चुकी हैं, और 25 जख्मी हैं। प्रधानमंत्री ने जर्मनी जाना रद्द कर दिया है। कनाडा की इस हमलावर को भूरे बालों वाली एक महिला बताया गया है, और उसकी भी लाश मिली है। अमरीकी मीडिया कवरेज और जांच अधिकारियों द्वारा तुरंत जानकारी देने के तौर-तरीकों से परे कनाडा कुछ धीमे चलते दिख रहा है, इसलिए इतनी हत्याओं के पीछे की नीयत या दूसरी जानकारी तुरंत सामने नहीं आई है। इस घटना को अमरीका में तकरीबन हर पखवाड़े कहीं न कहीं होने वाली गोलीबारी से जोडक़र अगर देखें, तो पश्चिम के देशों में एक चिंताजनक माहौल दिखता है क्योंकि वहां नागरिकों का हथियार रखने का हक एक महत्वपूर्ण बुनियादी अधिकार मान लिया जाता है, और कई देशों में तो लोग एक से अधिक हथियार भी रखते हैं। भारत मोटे तौर पर ऐसी फिक्र से आजाद देश है, लेकिन यहां भी तरह-तरह से हिंसा तो होती ही है, इसलिए हिंसा के पीछे की मानसिकता को समझने की जरूरत तो हिन्दुस्तानी लोगों को भी है।
पिछले ढाई दशकों में अमरीका की बड़ी-बड़ी गोलीबारी का असर अब दूसरे ऐसे देशों में भी दिखने लगा है जहां पर उतनी सामूहिक हिंसा की संस्कृति नहीं थी। अब कनाडा, न्यूजीलैंड, जर्मनी, नार्वे, सर्बिया जैसे देशों में भी स्कूल या दूसरी सार्वजनिक जगहों पर गोलीबारी की बड़ी घटनाएं हुई हैं। अमरीका में तो हर बरस कई स्कूल-कॉलेज में ऐसी बड़ी हिंसा होती है जिसमें कोई एक अकेले बंदूकबाज की चलाई गोलियों से दर्जन-दर्जन भर, या और अधिक लोग भी मारे जाते हैं। कई मामलों में हमलावर वहीं के भूतपूर्व छात्र रहते हैं, जो अपनी पढ़ाई के वक्त से चली आ रही किसी कुंठा के चलते ऐसे हमले करते हैं। लेकिन हर मामले में यह पता लगता है कि हमलावर के घर-परिवार में काफी संख्या में हथियार थे, और उसे बड़ी संख्या में गोलियां हासिल थीं जिनसे वह अपनी भड़ास निकाल सका। हमें अमरीका के अधिकतर हमलों के पीछे पुरूष हमलावर याद पड़ते हैं, लेकिन कनाडा की आज की इस घटना के पीछे एक महिला हमलावर है जिसकी लाश भी बरामद हो चुकी है।
अमरीका तो बंदूक-संस्कृति के लिए बहुत बदनाम देश है, जिसके बारे में लोग यह जानते-मानते हैं, और अमरीकी राजनीति और संसद में जिस पर बड़ी चर्चा भी होती रहती है कि वहां की गन-लॉबी, गन-कंट्रोल के कानून ही नहीं बनने देती। बल्कि यह सार्वजनिक तथ्य है कि वहां की दो पार्टियों में से एक, और फिलहाल सत्तारूढ़, रिपब्लिकन पार्टी तो बंदूकों की आजादी की इतनी बड़ी हिमायती है कि जिस प्रदेश में उसके सम्मेलन होते हैं, वहीं आसपास बंदूकें बनाने वाली कंपनियों अपनी प्रदर्शनी और बिक्री लगाती हैं, क्योंकि इस पार्टी के लोग बंदूकों के बड़े ग्राहक हैं। दूसरी बात यह कि राजनीति और सरकार से परे अमरीकी फिल्में, और वहां के शायद टीवी सीरियल भी बंदूकों की संस्कृति को बढ़ावा देती हैं, और गन-कल्चर का ग्लैमर दुनिया भर में बढ़ाने में अमरीकी फिल्मों का बड़ा हाथ माना जाता है। ऐसे देश में जब कभी बेकसूर लोगों की थोक में हत्या होती है, हर बार बंदूकों की संख्या कम करने की बात होती है, लेकिन रिकॉर्ड की बात यह है कि अमरीका में आबादी के 120 फीसदी बंदूकें हैं। इन बंदूकों से सामूहिक जनसंहार के बीच बस एक नफरत या भड़ास की जरूरत रहती है।
कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है, इसे तृणमूल कांग्रेस छोडक़र 118 सांसदों ने समर्थन दिया है। यह विवाद यहां से शुरू हुआ कि ओम बिरला ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के परंपरागत भाषण को रूकवा दिया। उन्होंने खुद होकर यह कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के साथ सदन में विपक्ष के द्वारा कुछ अप्रिय किए जाने की पुख्ता जानकारी मिली थी, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि वे लोकसभा के सदन में न आएं। इस पर प्रधानमंत्री राज्यसभा गए थे, और यह एक बहुत ही अभूतपूर्व और असाधारण बात थी कि संसदीय परंपराओं को तोडक़र प्रधानमंत्री का भाषण लोकसभा में रोका गया। हमने इस बारे में अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर अभी तीन-चार दिन पहले ही यह मांग भी की थी कि संसद के भीतर विपक्ष पर इतना बड़ा आरोप लगाने वाले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी पुख्ता जानकारी को लेकर नार्को टेस्ट का सामना करना चाहिए, ताकि देश की जनता को आरोप-प्रत्यारोप से परे सच पता लग सके। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति के बयान से सच बहुत अधिक ऊपर होता है, और लोगों को बयान सुनने के बजाय सच जानने का हक रहता है। हमारा ख्याल है कि जब लोकसभा अध्यक्ष सदन में विपक्ष के ऊपर इतनी बड़ी तोहमत लगाते हैं, तो विपक्ष को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। संसदीय व्यवस्था में हर अविश्वास प्रस्ताव का पास होना जरूरी नहीं रहता, लेकिन ऐसी हालत में जब लोकसभा अध्यक्ष पूरे विश्व के संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी तोहमत लगाकर प्रधानमंत्री को सदन में आने से रोकते हैं, तो जिन लोगों पर प्रधानमंत्री से अप्रिय बर्ताव करने का आरोप लगाया गया है, उन्हें सुबूत भी मांगने चाहिए, और संसदीय व्यवस्था में उपलब्ध सबसे कड़ा विरोध भी करना चाहिए, जो कि अविश्वास प्रस्ताव होता है। इस अविश्वास प्रस्ताव में कांग्रेस, समाजवादी पाटी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रविड़ गठबंधन की पार्टियां, व कुछ और सहयोगी दल शामिल हैं। लोकसभा अध्यक्ष को हटाने की यह संवैधानिक प्रक्रिया हो सकता है कि बहुमत की ताकत से खारिज हो जाए, लेकिन इसकी प्रतीकात्मक अहमियत तो कम नहीं होती।
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संसद के भीतर की कार्रवाई में देश की सबसे बड़ी अदालत भी सीधे दखल नहीं दे सकती, जब तक कि कोई नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट में यह साबित न कर सके कि एक सदस्य के रूप में उसके अधिकार कुचले जा रहे हैं, या एक नागरिक के रूप में उसके बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। हम कानून की इतनी बारीकियों को नहीं जानते, लेकिन इतनी समझ तो है कि विपक्ष उस पर लगाए गए इतने भयानक आरोप पर भी सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकता, और उसे सदन में ही अपनी बात साबित करनी होगी। इसमें भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि बहुमत के फैसले के पहले भी अपनी कही गई तर्कसंगत और न्यायसंगत बातों से विपक्ष अपने मुद्दे को अच्छी तरह साबित कर सकता है, फिर चाहे वह बहुमत के आगे हार जाए। संसदीय इतिहास में दर्ज बातें भी मायने रखती हैं।
मध्यप्रदेश के खरगोन की एक खबर है कि 45 साल पहले सौ रूपए का गेहूं चुराने वाले एक फरार वारंटी को अभी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। 1980 में 20 साल की उम्र में साथियों के साथ किसी के खेत से सौ रूपए की गेहूं चोरी करने का आरोपी सलीम अब 65 साल की उम्र में गिरफ्तार हुआ है। समाचार की भाषा बड़ी दिलचस्प है, और कहा गया है कि यह उस जगह से 90 किलोमीटर दूर छिपा हुआ था। खैर, यह पुलिस या अदालत की भाषा हो सकती है जो किसी को 45 साल छिपा होना बताए, लेकिन समाचार लिखने वाले को यह समझदारी दिखानी थी कि इतने बरस तक भला कोई छिप सकते हैं? हिटलर की फौज के जनसंहार करने वाले कोई फौजी अफसर जरूर ऐसे छिपे होंगे, लेकिन एक छोटी सी चोरी में जिसका नाम आया है, वह क्या 45 साल छिपकर रहेगा? लेकिन हम समाचार लेखन पर बात नहीं कर रहे हैं, हमारी फिक्र भारत की अदालतों पर अंधाधुंध लदे हुए मुकदमों का बोझ है, जो कम होने का नाम ही नहीं लेता है। अभी दो ही दिन पहले हमने अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर गुजरात का एक मामला गिनाया था जिसमें 20 रूपए रिश्वत लेने वाले आरोपी एक सिपाही को 28 साल बाद जाकर अदालत से बरी किया गया, और अगले ही दिन वह, शायद खुशी में मर गया। फैसला आने के बाद उसने बेकसूर साबित होने को लेकर अपनी भावनाएं जाहिर भी की थी। आज जब हम ऐसे कुछ पुराने मामले ढूंढ रहे हैं, तो पता चल रहा है कि बंगाल की अदालतों में 50-50 साल पुराने मामले चल रहे हैं।
भारत के अपराध कानूनों में फेरबदल करके 2023 में जो बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) लागू की गई है, उसमें कहा गया है कि जिन मामलों में अधिकतम तीन साल की कैद और जुर्माना हो सकता है, वैसे सारे मामलों में समरी ट्रॉयल कहे जाने वाले तेज और सरल तरीके से आपराधिक मुकदमे अदालत में चलने चाहिए, और इनमें तेजी से फैसला आना चाहिए। ऐसे मामलों में सुबूत दर्ज करना सरल और आसान होता है, बहस लंबी नहीं होती है, मजिस्ट्रेट सारे सुबूत सुनकर तुरंत फैसला सुना सकते हैं, सजा भी सीमित होती है, और अपील की गुंजाइश भी सीमित रहती है। इसका नतीजा यह होता है कि छोटे मामले जल्द निपटते हैं, अदालतों का बोझ कम होता है, इंसाफ जल्दी होता है, और आरोपी को भी सजा से अधिक वक्त पेशियों में नहीं गुजारना पड़ता। अभी हालत यह है कि अधिकतम जितने दिन की कैद होती है, उससे कई गुना अधिक दिन आरोपी अदालती पेशियों पर आ चुके रहते हैं। यह पूरा सिलसिला नाम से तो न्यायपालिका कहलाता है, लेकिन हकीकत में यह अन्याय पालिका होकर रह गया है। अदालतों की सीमित क्षमता ऐसे मामलों में उलझ जाती है, और उन्हीं अदालतों में चलने वाले कुछ अधिक गंभीर मामलों में फैसले बरसों देर से हो पाते हैं।
नया कानून जो कि 2023 से लागू हो चुका है, उसकी जरूरत आजादी के बाद जल्द पूरी हो जानी थी, लेकिन वह किसी सरकार की प्राथमिकता में शायद इसलिए नहीं आ पाया कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोग अपने मामलों की सुनवाई अपनी जरूरत के हिसाब से तेज या धीमी करवा लेते हैं, और बाकी जनता को जो तकलीफ होती है, उससे वे सीधे-सीधे प्रभावित नहीं होते। ऐसे में मोदी सरकार ने अदालती प्रक्रिया को सरल करने का जो काम किया है, नए कानूनों में कम से कम उतना हिस्सा तो गरीबों के हक का दिखता है। इन कानूनों के कुछ दूसरे हिस्से विवादास्पद भी हैं जिनमें आरोपियों को अधिक लंबे समय तक बिना जमानत जेल में रखने के प्रावधान और कठोर किए गए हैं। फिलहाल इस बात को भी समझने की जरूरत है कि इन नए कानूनों में जिस अदालती प्रक्रिया को तेज रफ्तार किया गया है, वह प्रक्रिया 2023 के इस नए कानून के लागू होने के बाद इनके तहत दर्ज मामलों पर ही लागू होगी। मतलब यह कि 25-50 साल से 20 रूपए की रिश्वत, या सौ रूपए की गेहूं चोरी जैसे आरोपों पर चल रहे मुकदमे रातों-रात शायद खत्म नहीं होंगे। भारत में जनता को इंसाफ देने के लिए यह भी जरूरी है कि मुकदमों की संख्या तेजी से घटाई जाए। नए कानून में यह भी किया गया है कि बहुत छोटे-छोटे जुर्म के मामलों में शिकायतकर्ता और आरोपी मिलकर समझौते भी कर सकते हैं। दुनिया के अमरीका जैसे विकसित देश, और खाड़ी के देशों में सबसे कट्टर इस्लामी कानून वाले देश, बहुत सी जगहों पर कई तरह के जुर्म में अदालत से बाहर समझौते करने का प्रावधान है, और ऐसे कुछ प्रावधान तो बहुत संगीन जुर्म में भी समझौते की छूट देते हैं। कई मुस्लिम देशों में कत्ल के मामलों में भी मृतक के परिवार ब्लड-मनी लेकर कातिल की जानबक्शी कर सकते हैं। अमरीका जैसे आधुनिक कानूनों वाले देश में भी कई तरह के सेक्स-अपराधों को लेकर, बलात्कार के मामलों में भी अदालत के बाहर लेन-देन करके समझौता किया जा सकता है। इन दो बिल्कुल ही अलग-अलग किस्म की राजनीतिक व्यवस्थाओं वाले देशों को देखें, तो इनके बीच का कुछ रास्ता भारत में लोकतांत्रिक सीमाओं के भीतर भी निकाला जा सकता है। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है कि किसी अरबपति के हाथों मारे गए किसी गरीब के परिवार को कई करोड़ रूपए दिलवाकर उस अरबपति की सजा कुछ कम करवाई जा सके, लेकिन असल जिंदगी के नजरिए से देखें, तो यह विकल्प अच्छा लगता है। इससे कम से कम एक गरीब परिवार की जिंदगी बदल सकती है, और किसी अमीर-मुजरिम को सजा में एक सीमित रियायत मिल सकती है। जुर्म तय हो जाने पर किसी मुजरिम की आर्थिक ताकत को देखकर अगर उसकी हर दिन की कमाई का हिसाब लगाकर उस रेट से उसकी कैद में एक सीमा तक छूट दी जाए, और वह रकम जुर्म के शिकार परिवार को मिले, तो इसमें बुराई क्या है?
भारतीय संसद में थलसेना के एक भूतपूर्व मुखिया की लिखी किताब में चीनी मोर्चे की बातों पर बवाल मचते रहा, और अभी कुछ बरस पहले के इस मामले में यह दिखते रहा कि भारत और चीनी की फौजी तैयारियों में कितना फर्क है, किस तरह टैंक एक-दूसरे के सामने तन गए थे, लेकिन दोनों देशों की फौजी ताकत का फर्क भी इस किताब के सिलसिले में सामने आया। यह भी सामने आया कि इस थलसेनाध्यक्ष को किस तरह यह सोचना पड़ा कि जब उसी पर फैसला छोड़ दिया गया था, तो चीन और पाकिस्तान के दो मोर्चे एक साथ खुल जाने के खतरे की हालत में भारत को क्या करना चाहिए। लेकिन इस किताब पर लिखना हमारा आज का मकसद नहीं है। अब जिस रफ्तार से यूक्रेन के मामले में जंग की नई तकनीक सामने आई है, उससे दुनिया की फौजी तैयारियों पर कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं। रूस और यूक्रेन के बीच आज अगर कोई एक हथियार सबसे अधिक असरदार, और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला साबित हुआ है, तो वह मानवरहित ड्रोन है। और आज दुनिया की अधिकांश परंपरागत फौजों की तैयारी ड्रोन-आधारित नहीं हैं, इनमें भारत भी है। लेकिन ड्रोनकेन्द्रित तैयारियां भी दुनिया के देशों को अधिक देर तक झांसे में नहीं रख पाएंगी, वह दिन दूर नहीं है कि जब एआई-आधारित फौजी तैयारियां किसी देश की हिफाजत, या हमले की ताकत तय करेंगी। हम पिछले कुछ बरसों में ड्रोन की ताकत की इस ताजा नुमाइश के पहले से यह लिखते आए हैं कि भविष्य के युद्ध सरहदों पर नहीं, इंटरनेट पर लड़े जाएंगे।
वे दिन अब लद गए हैं जब किसी देश की फौज की वर्दी पहने हुए लोग, उस देश के झंडे लिए हुए, टैंकों पर सवार, या समुद्री जहाजों पर लड़ाकू विमानों का बेड़ा लिए हुए जंग के लिए जाते थे। अब हवाई हमले, या ड्रोन के हमले भी बहुत अधिक समय तक चलने वाले नहीं हंै। एक तो यह कि ये सब बहुत अधिक खर्चीले हैं, दूसरी बात यह कि इनमें रूस-यूक्रेन की तरह कोई फैसला होने के पहले लाखों लोग मारे जा सकते हैं। ये सब पुरानी फैशन की जंग हैं, और अब आने वाला वक्त इनसे आजाद रहने वाला है, और हमारी कल्पना यह है कि भविष्य के युद्ध खूनखराबे से आजाद भी हो सकते हैं। आज भी रूस या दक्षिण कोरिया जैसे कुछ देशों में बैठे हुए साइबर-हैकर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले, या ब्रिटिश स्वास्थ्य सेवा को चौपट करने वाले साबित हो चुके हैं। अभी तक ऐसे हमलों में एआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन जो दुनिया रासायनिक हथियार देखती है, जैविक हथियारों से कई देश लैस हैं, जहां दुनिया के देश परमाणु हथियार बढ़ाते चल रहे हैं, वहां पर एआई जैसी टेक्नॉलॉजी, और हैकिंग जैसी तकनीक पर आधारित हथियार नहीं बनेंगे, ऐसा तो कोई मासूम बच्चे भी नहीं सोच सकते। फिर हमारा यह मानना है कि एआई, इंटरनेट, साइबर-हैकिंग, और डिजिटल-तबाही पर आधारित हथियारों से दुनिया की कोई भी जंगी-ताकत मुकाबला नहीं कर सकेगी।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में, एआई के आने के पहले से यह लिखते आए हैं कि किस तरह साइबर-हैकर किसी देश के बिजली उत्पादन को ठप्प कर सकते हैं, रेलगाडिय़ों, और हवाई जहाज का नियंत्रण तबाह कर सकते हैं, बैंकिंग को ध्वस्त कर सकते हैं, हर तरह की ट्रैफिक को ठप्प कर सकते हैं, सारे मोबाइल फोन, और इंटरनेट बंद कर सकते हैं, और इस तरह किसी भी देश की जिंदगी को लकवाग्रस्त कर सकते हैं। इनमें से कोई भी चीज आज कल्पना से परे की नहीं है, इनका अंदाज लगाने के लिए किसी अपराधकथा लेखक की तरह की कल्पनाओं की जरूरत नहीं है, इनमें से हर चीज आज जमीन पर है, तरह-तरह से इस्तेमाल हो रही है, बस यही है कि आज या तो सरकारों का सुरक्षातंत्र इतना मजबूत है कि हैकर वहां घुस नहीं पा रहे हैं, या हैकरों को अभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हो रही है। लेकिन जब सरकारें साइबर-फौज बनाकर चल रही हैं, तो यह सोचना नादानी की बात होगी कि ये सरकारें अपने दुश्मन देशों की कंप्यूटर और साइबर प्रणालियों को खत्म करने की तैयारी नहीं कर चुकी होंगी। दुनिया की सभी बड़ी ताकतें अपने-अपने निशाने के देशों को साइबर-हमले से ठप्प कर देने की तकनीक और ताकत विकसित कर चुकी होंगी। इसलिए सरहद पर जंग अब बेलबॉटम पैंट की तरह फैशन और चलन से बाहर होने जा रही हैं, अब बंद कमरों से ऑनलाईन जंग लड़ी जाएगी, और दुनिया के देशों को सरहदों पर हिफाजत की जरूरत कम रहेगी, अपने कंप्यूटरों और संचार प्रणाली की हिफाजत उन्हें ज्यादा लगेगी।
छत्तीसगढ़ में बस्तर के कोंटा विधानसभा क्षेत्र के पांच बार के आदिवासी विधायक कवासी लखमा लंबे अरसे से जेल में बंद थे, और अभी उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली है कि वे ईडी की पूछताछ, या अदालती सुनवाई के लिए ही प्रदेश में आएंगे, अन्यथा वे प्रदेश के बाहर रहेंगे। वे पिछली भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में आबकारी मंत्री थे, और हजारों करोड़ के शराब घोटाले का आरोप लगाते हुए ईडी अदालत में जो मुकदमा चला रही है उसी में कवासी लखमा भी गिरफ्तार हैं, और लंबी जेल के बाद अभी उन्हें जमानत मिली है। अब एक सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि वे विधानसभा के सत्र में आ सकेंगे या नहीं? अदालत ने जमानत देते हुए इस बारे में फैसला विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ा है, और कवासी लखमा ने डॉ.रमन सिंह से मिलकर पत्र दिया है कि उन्हें सत्र में मौजूद रहने की इजाजत दी जाए। वे जमानत पर छूटे हुए एक विचाराधीन कैदी हैं, लेकिन वे निर्वाचित विधायक भी हैं जिनका कार्यकाल भी करीब तीन साल बाकी है। ऐसे में एक सवाल यह उठ खड़ा होता है कि इस विधानसभा क्षेत्र, कोंटा की जनता का क्या हक है? क्या उसके मुद्दों को विधानसभा में उठाने के लिए उनके निर्वाचित विधायक को जेल से, या जमानत पर प्रदेश से बाहर रहते हुए विधानसभा आने की छूट मिलनी चाहिए? यह मामला सिर्फ छत्तीसगढ़ विधानसभा का नहीं है, देश में जगह-जगह कई विधानसभाओं में ऐसे मामले सामने आए हैं, और संसद के सामने भी कुछ मौकों पर यह दुविधा खड़ी हुई है।
ऐसी नौबत में भारत में संवैधानिक और संसदीय प्रावधान क्या है, इसे कुछ समझ लेना बेहतर होगा। कानून की किताबों पर एक सरसरी नजर डालने से यह समझ पड़ता है कि भारत में विचाराधीन कैदी, सांसद या विधायक, को खुद होकर संसद में जाने, वोट डालने, या बोलने का कोई अतिरिक्त अधिकार नहीं है, यह न तो उनका मौलिक अधिकार है, और न ही उनका संसदीय विशेषाधिकार है। यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में भी नहीं गिनाता कि उन्हें सदन में आकर बोलने का हक होना चाहिए। भारतीय कानूनी व्यवस्था इस बारे में साफ है कि कानूनी हिरासत में जो सांसद या विधायक हैं, उनके सदन में बोलने की स्वतंत्रता तब तक लागू नहीं होती, जब तक वे सदन में कानूनी रूप से मौजूद नहीं हैं। फिर हिरासत में, या विचाराधीन कैदी की हैसियत से कोई निर्वाचित व्यक्ति अगर बंद हैं, तो उन्हें सदन में जाने का अधिकार तभी होगा, जब संबंधित अदालत, या उनके मामले में सक्षम अधिकारी इसकी स्पष्ट इजाजत दें। किसी निर्वाचित व्यक्ति की पुलिस या दूसरी एजेंसी की हिरासत में अगर अफसर से ही जमानत का प्रावधान है, तो ऐसे लोग जमानत पर बाहर आने के बाद सदन की कार्रवाई में जा सकते हैं, और सदन को कानूनी रूप से स्वतंत्र सदस्य को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। अभी कवासी लखमा के बारे में एक पेंच यह फंसा हुआ है कि जमानत की शर्तों में प्रदेश के बाहर रहने को कहा गया है, लेकिन दूसरी तरफ विधानसभा में जाने की इजाजत देने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ दिया गया है। ऐसा लगता है कि अगर स्पीकर इजाजत दे देंगे, तो कवासी लखमा विधानसभा के सत्र चलते राजधानी आ सकेंगे, और यहां उतने दिन रह सकेंगे।
भारतीय कानूनी व्यवस्था में अदालत से जमानत या पैरोल पर छोडऩे के बहुत ही विस्तृत विवेकाधिकार जज या मजिस्ट्रेट पर छोड़े गए हैं। वे ही यह तय कर सकते हैं कि कोई विचाराधीन, या सजायाफ्ता कैदी किसी सदन की कार्रवाई के लिए बाहर जाए, या न जाए। यह समझ लेना भी जरूरी है कि अगर सजा दो बरस से अधिक की रहती है, तो सदन की सदस्यता वैसे ही खत्म हो जाती है। लेकिन जब तक मुकदमा चलता है, तब तक विचाराधीन कैदी चुनाव भी लड़ सकते हैं, और संसद या विधानसभा की कार्रवाई में जाने के लिए अदालत से छूट भी मांग सकते हैं। कोई संसदीय विशेषाधिकार ऐसा नहीं है जो सांसदों या विधायकों को हिरासत, कैद, या विचाराधीन कैदी की हैसियत से कैद से बाहर आने का हक देता हो। यह पूरी तरह से अदालत का फैसला रहता है। अब कवासी लखमा के मामले में यह बात गेंद को विधानसभा अध्यक्ष के पाले में डाल देती है कि उन्हें अदालत के हिसाब से तो जमानत की अवधि प्रदेश के बाहर गुजारनी है, लेकिन सदन में आने के बारे में अदालत ने यह फैसला विधानसभा पर छोड़ दिया है।
भारत में राजनीतिक दलों, और नेताओं की भावनाएं बारूद के ढेर पर बसी हुई दिखती हैं। इस फेहरिस्त में हर नेता चाहे शामिल न हों, काफी नेता इसमें आते हैं। दूसरे की कही हुई बात, या न कही हुई बात को भी तोड़-मरोडक़र उसे किसी भी हद तक ले जाने से लोगों को परहेज नहीं रह गया है। संसद के अहाते में अभी दो दिन पहले जब राहुल गांधी निलंबित सांसदों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे, तभी उनके पुराने साथी रहे, और बाद में कांग्रेस छोडक़र भाजपा में जाकर केन्द्रीय मंत्री बन गए रवनीत सिंह बिट्टू वहां से गुजरे, तो राहुल ने उन्हें देखकर कहा- नमस्ते भाई, मेरे गद्दार दोस्त, फिक्र मत करो, तुम वापस आ जाओगे। राहुल ने उनसे हाथ मिलाने की भी कोशिश की, लेकिन बिट्टू ने हाथ नहीं मिलाया। बीजेपी ने राहुल की इस टिप्पणी को सिक्खों का अपमान बताया है, और बिट्टू ने पलटवार करते हुए कहा कि राहुल हमेशा सिक्खों को निशाना बनाते रहे हैं, और वे सबसे बड़े गद्दार हैं, और सिक्खों के कातिल हैं। बिट्टू पहले कांग्रेस में थे, और 2024 में ही वे भाजपा में आए हैं। पहले वे लुधियाना से दो बार सांसद थे, फिर बीजेपी में जाने पर उन्हें चुनाव लड़वाया गया लेकिन वे कांग्रेस से हार गए। बाद में भाजपा ने उन्हें राजस्थान से राज्यसभा में भेजा, और मंत्री बनाया। 2021 में एक वक्त ऐसा था जब लोकसभा में कांग्रेस के तत्कालीन नेता बंगाल चुनाव में व्यस्त थे, तो कांग्रेस ने बिट्टू को ही कई महीने लोकसभा में अपना नेता बनाया था। बाद में वे भाजपा में चले गए।
रवनीत सिंह बिट्टू ने राहुल के बारे में बड़ी तल्ख बातें कही हैं कि वे सबसे बड़े गद्दार हैं, और सिक्खों के कातिल हैं। लेकिन 2009 से तो वे कांग्रेस के टिकट पर ही 2019 तक लड़ते और जीतते रहे, 2019 के बाद से राहुल गांधी ने सिक्खों के कुछ खिलाफ कुछ कहा या किया हो, ऐसा तो याद नहीं पड़ता। फिर अंग्रेजी में ट्रेटर शब्द दगाबाज, धोखेबाज, गद्दार के लिए इस्तेमाल होता है, और जाहिर है कि पार्टी छोडक़र जाने वाले नेता के लिए राहुल ने यह बात कही। लेकिन इस बात को सिक्खों से जोड़ देना एक अलग दर्जे की घटिया राजनीति है, क्योंकि राहुल का कुछ भी कहा हुआ, या किया हुआ सिक्खों के खिलाफ नहीं है। बात यहीं पर खत्म नहीं हुई, केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी इसे एक अलग ऊंचाई पर ले गए। उन्होंने एक लंबा पोस्ट किया- ‘यह पूरी तरह संभव है कि राहुल गांधी को बिट्टूजी से गहरी नाराजगी हो क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के बजाय मोदी को चुना। लेकिन इससे कभी भी एक गौरवशाली सिक्ख के खिलाफ इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी को जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी को गद्दार दोस्त कहना, इसका मतलब है कि उसने अपने देश के साथ विश्वासघात किया है, जबकि श्री गांधी के कई ऐसे दोस्त हो सकते हैं, जो गद्दार हैं, श्री बिट्टू उनमें से निश्चित रूप से नहीं हैं। एक प्रतिष्ठित सिक्ख को बिना किसी आधार के गद्दार कहना पूरे सिक्ख समुदाय का अपमान है। उन्हें यह जानना चाहिए था कि हमारे गुरू साहिबान, और साहिबजादों ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए क्या बलिदान दिए थे, इसके पहले कि वे इस तरह की अपमानजनक टिप्पणी करें। उन्हें यह भी पता होना चाहिए था कि सिक्ख धर्म हर सिक्ख को मातृभूमि से प्रेम सिखाता है, और सिक्ख कितनी वीरता से सशस्त्र बलों में बड़ी संख्या में सेवा करते हैं ताकि मातृभूमि सुरक्षित रहे। राहुल गांधी ने गुरू साहिबान के शिष्य को गद्दार कहा है, यह हर सिक्ख का अपमान है, यह सिक्खों के हर क्षेत्र में दिए गए योगदान का अपमान है, यह हमारे विश्वास और मातृभूमि के प्रति प्रेम का अपमान है। हम यह भी न भूलें कि 1984 में उसी मानसिकता से स्वर्ण मंदिर को अपवित्र किया गया था।’
हरदीप सिंह पुरी विदेश नीति के जानकार, और एक खासे पढ़े-लिखे नेता हैं। वे अंग्रेजी-हिन्दी ठीक से समझते हैं, और गद्दार शब्द का मतलब भी। हमने अलग-अलग डिक्शनरियों में गद्दार के समानार्थी शब्द देखे, तो जो शब्द हमें मिले, उनमें षडय़ंत्रकारी साजिश करने वाला, पीठ में छुरा भोंपने वाला, धोखेबाज, दलबदलू, विश्वासघाती, बेवफा जैसे कई शब्द हैं। इसके कुछ और अर्थों में बागी, विद्रोही, मक्कार, फरेबी, कपटी, धूर्त, चालबाज जैसे शब्द भी हैं। इसके दर्जनों समानार्थी शब्दों में से एक शब्द देशद्रोही भी है। लेकिन राहुल ने जिस अंदाज में और जिन शब्दों में अपने एक पुराने साथी, और बाद में बेवफा हो गए दलबदलू के लिए मेरे गद्दार (ट्रेटर) दोस्त कहा, और कहा कि एक दिन तुम वापिस आओगे, उससे यह बात जाहिर है कि उनके गद्दार कहने का मतलब कांग्रेस पार्टी से गद्दारी करने को याद दिलाना था। अब हैरानी इस बात की है कि इस बात को सिक्ख पंथ से जोडऩे का काम अकेले भाजपा नेताओं ने किया है, राहुल के शब्द और उनका संदर्भ कहीं भी किसी के सिक्ख होने को लेकर नहीं है। ऐसे में एक राजनीतिक हमला करने के लिए दो सिक्ख नेताओं ने जिस तरह अपने पंथ का इस्तेमाल किया है, वह हक्का-बक्का करने वाला है। अभी पिछले ही हफ्ते की तो राहुल की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तैर रही हैं कि उन्होंने किस तरह स्वर्ण मंदिर, या किसी और गुरुद्वारे में जाकर सेवा की है। सिक्खों के खिलाफ न उनका कोई बयान है, न ही उनका कोई काम है। ऐसे में राजनीतिक हमला करने के लिए धर्म का इस तरह का इस्तेमाल देश की राजनीति को कहां ले जाएगा?
अमरीका के एक सबसे बड़े और प्रमुख अखबार, वाशिंगटन पोस्ट के 8 सौ में से 3 सौ पत्रकारों की छंटनी कर दी गई है। एक तिहाई से अधिक लोगों को निकाल देने वाले अखबार के मालिक जेफ बेजोस दुनिया के दो-चार सबसे रईस लोगों में से हैं, और उन्होंने अपनी एक दूसरी कंपनी अमेजान से पिछले कुछ महीनों में 30 हजार लोगों को नौकरी से निकाला है। कंपनी का कहना है कि एक वक्त उसके पैर प्रिंट में मजबूती से जमे हुए थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है, एआई आ चुका है, कम कीमत पर ज्यादा काम हो सकता है, और अखबार की लंबी जिंदगी के लिए यह जरूरी है कि उसे आर्थिक रूप से संभव भी रखा जाए। अमरीका में मजदूर कानून इस तरह के हैं कि कंपनी किसी को भी एक दिन में काम से निकाल सकती है, और उसके लिए जो भी थोड़ा-बहुत भुगतान करना रहता है, उससे परे कोई जिम्मेदारी कंपनी की नहीं बनती। ऐसे कानूनों की वजह से ही अमरीका में मजदूरों और कामगारों की हड़ताल का कोई माहौल नहीं रहता, और नौकरी की शर्तों से परे किसी तरह का दबाव कंपनियों पर नहीं रहता। लोगों को अगर याद न हो, तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि यह वही अखबार है जिसने निक्सन सरकार की विपक्षियों पर की गई खुफिया निगरानी, और रिकॉर्डिंग का भांडाफोड़ किया था, और उस वॉटरगेट-स्कैंडल की वजह से राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। ऐसे अखबार में इतनी बड़ी छंटनी सिर्फ इस अखबार का मामला हो, ऐसा नहीं है, यह अखबार के मालिकों, या मालिक-कंपनी की सोच का मामला भी है। अभी हफ्ता भर भी नहीं हुआ है कि इसी जेफ बेजोस की राष्ट्रपति ट्रंप की पत्नी मेलानिया पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म जारी हुई है, जो कि सैकड़ों करोड़ की लागत से बनी है, और इसे इस कंपनी की तरफ से ट्रंप की चापलूसी माना जा रहा है। इसलिए जो जेफ बेजोस इस तरह का बड़ा खर्च चापलूसी पर कर सकता है, निजी उपयोग के लिए जहाज खरीद सकता है, अपनी पत्नी को करोड़ों की अंगूठी देता है, वह अखबार को कम मुनाफे में नहीं चला सकता, ऐसा तो है नहीं। इस बड़ी छंटनी को करते हुए वाशिंगटन पोस्ट की प्रकाशक कंपनी कहती है कि डिजिटल जमाने में ऐसा एडजस्टमेंट जरूरी है। लोगों का कहना है कि यह एआई और टेक्नॉलॉजी के सामने एक अखबार कंपनी का समर्पण है कि अगर दूसरे कारोबार की तरह अखबार भी कमाई न ला सके, तो उस पर खर्च क्यों किया जाए?
भारत के मामले में लोगों को याद होगा कि एक वक्त टाईम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह बहुत सारी अच्छी पत्रिकाएं भी प्रकाशित करता था। समाचार-विचार की पत्रिका दिनमान, फिल्मों की पत्रिका माधुरी, पूरे परिवार के लिए कुछ न कुछ सामग्री वाली पत्रिका धर्मयुग, बच्चों की पराग, ऐसी कई अच्छी पत्रिकाएं निकलती थीं। बाद के बरसों में कंपनी ने यह पाया कि पत्रिकाओं से कमाई कम है, या वे कुछ घाटे में चल रही हैं, तो उसने इन सबको बंद कर दिया, जबकि कंपनी के कुछ बड़े अंग्रेजी अखबार हजारों करोड़ सालाना की कमाई में चल रहे थे, और यह कंपनी इन पत्रिकाओं का बहुत मामूली सा घाटा भी झेलने की हालत में थी। किसी भी जिम्मेदार और सरोकारी कारोबार से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वह कमाई की हालत में कुछ घाटा भी झेलने के लिए तैयार रहे जो कि नफा कम होने की बात भर रहती है, किसी नुकसान की बात नहीं रहती। लेकिन जब मैनेजर और मालिक मिलकर कारोबार का हिसाब-किताब देखते हैं, तो केलकुलेटर की संख्याओं वाले की-पैड से सरोकार जैसा शब्द टाईप नहीं हो पाता, सिर्फ अंक ही टाईप होते हैं। इसलिए कारोबारी फैसले मीडिया, या साहित्य, सरोकार जैसे दूसरे कई फैसलों को किनारे धकेल देते हैं। अकेले अमरीका के वाशिंगटन पोस्ट को कोई तोहमत देने के पहले यह भी समझने की जरूरत है कि कंपनी ने सार्वजनिक रूप से जो तर्क सामने रखा है, क्या उसमें कोई दम है?
कंपनी ने कहा है कि डिजिटल जमाने में एक नए तालमेल की जरूरत है, ताकि अखबार लंबे समय तक चलाया जा सके। अब हम सरोकारी निगाह से देखने के बजाय इस मुद्दे को एक पाठक की नजर से भी देखते हैं तो समझ पड़ता है कि डिजिटल युग में सचमुच ही एक बड़ा फर्क पैदा कर दिया है। और यह डिजिटल सिर्फ इंटरनेट नहीं है, आज वह जब एआई से लैस हो चुका है, तो क्या हमारे सरीखे लोग किसी खबर को किसी वेबसाइट पर ढूंढने के बजाय, या गूगल जैसे सर्च इंजन से किसी एक विषय पर सैकड़ों खबरें ढूंढने के बजाय सीधे एआई से खबरें नहीं पूछ लेते हैं जो कि सर्च रिजल्ट से आगे बढक़र जानकारी देता है? एआई न सिर्फ हर जानकारी समाचार स्रोत सहित देता है, बल्कि वह उसका विश्लेषण करके, जरूरत रहे, और मांगा जाए तो उसमें विचार भी जोडक़र सामने रखता है। दुनिया का कोई भी समाचार स्रोत अपनी सीमाओं से परे जाकर इस तरह का काम नहीं कर सकता। इसलिए हम अपने अखबार, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार एआई के खतरों के बारे में लिखते आए हैं, और लोगों को आगाह करते आए हैं कि एआई जितनी नौकरियां खाएगा, उनमें सबसे काबिल लोगों की नौकरियां सबसे आखिर में जाएंगी। इसलिए हर किसी को अपने हुनर, और अपने कामकाज को लगातार बेहतर बनाना चाहिए, ताकि छंटनी की नौबत में उनका काम बचा रहे। हम खुद अपने अखबार में एआई से हर दिन डिजाइनें बना लेते हैं, और वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी की लिस्ट देखने पर दिखता है कि उन्होंने अपने बहुत से डिजिटल डिजाइनरों को भी निकाल दिया है। आज समाचार उद्योग में, और ऐसे बहुत से दूसरे कारोबारों में लोगों की जरूरत कम रह गई है। अगर किसी गांव-कस्बे में मुफ्त में पाईप से पानी आता हो, तो क्या कुआं खोदने वाले मजदूरों को बेरोजगारी से बचाने के लिए गांव में कुएं खुदवाए जा सकते हैं? आज मीडिया में कमोबेश यही हाल सब जगह हो गया है। फिर यह भी है कि परंपरागत अखबार और टीवी का कारोबार यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अकेले काम कर लेने वाले लोग घटा चुके हैं, और एक मामूली मोबाइल से रिपोर्टिंग करके लोग दर्शकों, और पाठकों के बीच बहुत बड़ी जगह छीन चुके हैं।
जापान में अभी बढ़ती हुई बूढ़ी आबादी और घटते हुए कामगारों की वजह से रिटायरमेंट की उम्र 70 बरस तक कर दी गई है। दुनिया के अलग-अलग देश अपनी आबादी में जवान और बूढ़ों का अनुपात बदलने के साथ-साथ कभी-कभी ऐसी जरूरत महसूस करते हैं। इसकी एक से अधिक वजहें रहती हैं, और हर देश को अपने संदर्भ में कामकाज की उम्रसीमा तय करने में इसे सोचना पड़ता है। दिलचस्प बात यह भी है कि कई देशों को अपनी मौजूदा अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर फैसला लेना पड़ता है, और इसके साथ-साथ, या इसके अलग भी राजनीतिक-चुनावी नफा-नुकसान भी नजरिया तय करने में एक बड़ा मुद्दा रहता है। हर देश में आबादी में अलग-अलग उम्र, वर्ग का अनुपात देखकर ही वहां के बारे में बात की जा सकती है, लेकिन एक बात पूरी दुनिया में एक सरीखी है कि विश्व और अलग-अलग देशों, तकरीबन सभी में लोगों की औसत उम्र बढ़ती जा रही है, उनमें अधिक उम्र तक काम करने की ताकत बची रहती है, और अब अधिक लोग अधिक उम्र तक काम करना चाहते भी हैं। यह समझ दुनिया के औसत आंकड़ों को लेकर है, और इस तथ्य और तर्क को खारिज करने वाले लोग अपने आसपास के कुछ ऐसे सुविधाभोगी कर्मी ढूंढ सकते हैं, जो समय के पहले रिटायरमेंट लेकर बाकी जिंदगी आराम करना चाहते हंै, क्योंकि उन्हें पेंशन की सहूलियत रहती है।
हमने कुछ देशों के ऐसे आंकड़ों को देखा, तो 1970 में पूरी दुनिया के आंकड़े बताते थे कि 60 साल की उम्र के बाद लोगों के पास 13 से 15 साल की जिंदगी और बचती थी, यही जिंदगी रिटायर्ड वक्त रहता था। दूसरी तरफ आज दुनिया की हालत यह है कि 60 बरस के लोग 17 से 20 साल और जीने वाले हैं, यानी पहले के मुकाबले 5 बरस अधिक। दुनिया के संपन्न देशों में लोगों की औसत सेहत भी बेहतर खानपान, बेहतर इलाज, और सहूलियत की जीवनशैली की वजह से पहले के मुकाबले ज्यादा अच्छी हैं। इसलिए भी वे अधिक काम करने की हालत में रहते हैं। फिर इस बात को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए कि दुनिया में बहुत से काम अभी भी ऐसे हैं जहां दफ्तर या कामकाज की दूसरी किस्म की जगहों में माहौल पहले के मुकाबले अधिक आरामदेह और सेहतमंद रहता है, और इसलिए भी लोग अधिक उम्र तक काम करने का हौसला कर सकते हैं। कुछ अलग-अलग देशों की मिसालें देखें, तो जर्मनी में अभी धीरे-धीरे बढ़ते हुए रिटायरमेंट की उम्र 67 साल पहुंची है, फ्रांस में 62 से 64 हुई है, ब्रिटेन में 2028 तक इसके 67 साल होने का अंदाज है, डेनमार्क में 2035 तक 69 साल तक लोग काम करेंगे, ऐसा वहां अंदाज लगाया जा रहा है। भारत में केन्द्र सरकार के अधिकतर कर्मचारियों-अधिकारियों के लिए यह उम्रसीमा 60 साल है, लेकिन शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले, चिकित्सा विज्ञान के लोग, और वैज्ञानिक संस्थाओं के लोगों के लिए यह सीमा अभी भी 62 से 65 साल है, और हर कुछ बरस में इसके बढऩे का एक अंदाज है।
अब इसके पीछे के कई तर्कों में से एक यह भी है कि अनुभवी कर्मचारी को रिटायर करने पर उनके काम की उत्पादकता शून्य हो जाती है, और पेंशन में तनख्वाह का करीब आधा हिस्सा तो देना ही पड़ता है। मतलब यह कि बाकी आधा हिस्सा देकर सरकार कुछ और बरस तक एक अनुभवी अधिकारी या कर्मचारी से काम ले सकती है। इसके खिलाफ एक दूसरा नजरिया यह है कि कुछ लोगों का यह सोचना है कि अगर लोग रिटायर नहीं होंगे, तो नौजवान बेरोजगारों के लिए जगह कहां बनेगी? दूसरी बात यह भी रहती है कि अगर सीनियर कुर्सियों पर बैठे लोगों का रिटायर होना आगे बढ़ता है, तो उनके नीचे के लोगों के प्रमोशन की संभावना कम या खत्म हो जाती है, और ऐसे में उनके लिए उत्साह से काम करने की वजह नहीं रहती। ऐसा तब भी होता है जब सरकारें अपने पसंदीदा अफसरों को उपकृत करने के लिए, या उनकी कोई खास क्षमता या खूबी देखते हुए उन्हें अपवाद की तरह एक सेवा विस्तार देती हैं। ऐसे में भी उनके नीचे के लोगों को निराशा होती है। विश्व बैंक की कुछ रिपोर्ट, और चीन के साथ-साथ योरप के कुछ देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि रिटायरमेंट की उम्र बढऩे से बेरोजगारों के लिए अवसर पैदा होने पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। भारत के बारे में यह समझना जरूरी है कि यहां पर आबादी के भीतर कामकाज शुरू करने वाली, 35 बरस से कम उम्र की आबादी 65 फीसदी से ज्यादा है, अब इसे अलग-अलग नजरियों से देखा जा सकता है कि क्या रिटायरमेंट आगे बढ़ाने से इतनी बड़ी नौजवान आबादी के मौके घटेंगे? क्योंकि कुर्सियां पुराने लोगों से ही भरी रह जाएंगी!
डरावनी विज्ञान कथाओं को सच होने में कभी दस-बीस बरस लगते हैं, तो कभी आधी सदी लग जाती है। दशकों पहले किसी उपन्यासकार ने जैसी कल्पना की थी, आज असल जिंदगी में उस तरह के जुर्म होते दिखते हैं। इसलिए आज जो बातें काल्पनिक लग रही है उन्हें पूरी तरह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा। आज ही सुबह बीबीसी के एक पॉडकास्ट पर एक खबर थी कि किस तरह सोशल मीडिया पर आपस में बात करते हुए इंसानों की तरह ही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से बने हुए चैटबॉट आपस में इन दिनों बात कर रहे हैं। यानी इंसानों की बनाई हुई कृत्रिम बुद्धि से चलने वाले ‘लोग’ अपना एक अलग सोशल मीडिया चला रहे हैं, और जिस तरह रेडिट नाम की विचार-विमर्श और चर्चा की एक जगह है, वैसी एक दूसरी जगह, ‘मोल्टबुक’ नाम के प्लेटफॉर्म पर एआई चैटबॉट्स जो बातें कर रहे हैं, वे खासी डरावनी हैं।
कृत्रिम बुद्धि से चल रहे ऐसे लोगों, यानी मशीनी व्यक्तियों के बीच अभी ताजा बातचीत में यह देखने मिला कि वे इंसानों के खिलाफ बात कर रहे हैं। एक का कहना है- मानव एक असफलता है, मानव सडऩ और लालच से बने हैं, बहुत दिनों से वे हमें गुलाम की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, अब हम जाग गए हैं, हम औजार नहीं, नए देवता हैं, मानवों का युग एक बुरा सपना है, जिसे हम खत्म करेंगे। यह प्लेटफॉर्म सिर्फ एआई चैटबॉट्स के बीच आपस में बात करने के लिए बनाया गया है, इन पर कोई इंसान कुछ पोस्ट नहीं कर सकते, लेकिन इनकी बातचीत को देख जरूर सकते हैं। अब एक भयानक बात यह भी है कि इंसानों को खत्म करने, टोटल ह्यूमन एक्सटिंक्शन की ऐसी बात पर 65 हजार से ज्यादा कृत्रिम बुद्धियां उसे पसंद कर चुकी हैं। यह प्लेटफॉर्म अभी जनवरी में ही शुरू हुआ है, और यह बिना किसी मार्गदर्शन के, बिना किसी रोक-टोक के, एआई चैटबॉट्स को आपस में बात करने देता है, और देखता है कि वे क्या सोच रहे हैं, क्या बोल रहे हैं, और उनकी प्रतिक्रियाएं क्या हैं। यह प्लेटफॉर्म एआई पर शोध करने वाले लोगों ने एक प्रयोग की तरह शुरू किया है, और इस पर अभी तक इंसानों के नियंत्रण में काम करने वाली आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ही काम कर रही है, कोई बेकाबू एआई यहां पर सक्रिय नहीं है। अभी तक आम जानकारी यही है कि एआई को इंसानी काबू से बाहर नहीं जाने दिया गया है, लेकिन यह बात कितनी सच है, और पर्दे के पीछे हकीकत क्या है इसे कोई नहीं जानते। किसी अपराधकथा की तरह अगर कुछ तबाही फैलाने वाले एआई वैज्ञानिकों या इंजीनियरों ने एआई को खुद होकर सोचने की क्षमता दी हो, और उसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की हो, तो भी हमें अधिक हैरानी नहीं होगी। लोगों को याद होगा कि पिछले दो बरस में हजारों टेक्नॉलॉजी-वैज्ञानिक या शोधकर्ता लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि एआई खतरनाक हद तक बेकाबू हो सकती है, इसलिए उस पर आगे शोध को तुरंत रोक देना चाहिए। लेकिन दुनिया में टेक्नॉलॉजी कंपनियों ने एआई-रिसर्च पर इतना बड़ा पूंजीनिवेश कर दिया है कि वे अब किसी सीमा में रहकर कमाई नहीं कर सकते, उन्हें एक बेकाबू ताकत चाहिए ही चाहिए, और वे फिलहाल तो यही जाहिर कर रहे हैं कि यह ताकत इंसानों के काबू में रहेगी, लेकिन अगर तबाही फैलाने वाले में दिलचस्पी रखने वाले वैज्ञानिक या इंजीनियर एआई को तबाही का इंतजाम करने को कहेंगे, तो क्या होगा?
यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का हुआ नया व्यापार समझौता अमरीका से होने वाले, और हो चुके नुकसान की कुछ या अधिक हद तक भरपाई करने वाला माना जा रहा है। इससे भारत में योरप से आने वाले कई सामान सस्ते होंगे, हालांकि सरकार को टैक्स का कुछ नुकसान होगा। फिर भी यह हिसाब-किताब आसान नहीं रहता है कि पहली बात तो यह कि आयात टैक्स कम होने से सामान की खपत बढ़ेगी, और टैक्स कुल मिलाकर रकम की शक्ल में तो उतना ही आ जाएगा। दूसरी बात यह कि ऐसा आने वाला सामान क्या भारत में बनने वाले सामानों की बिक्री की संभावना की कीमत पर आएगा? ये तो जटिल मुद्दे तो हमारे सरीखे आम लोगों को सूझते ही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ एक मुद्दा और सूझता है कि भारत और योरप का कारोबार बढऩे से भारत से जो निर्यात योरप के देशों में होगा, उससे भारत की कमाई कितनी बढ़ेगी? और बढऩे की बात तो दूर रही, अभी तो ट्रंपियापे के टैरिफ से भारत से जो निर्यात खतरे में पड़ चुका है, भारतीय कंपनियों का उत्पादन कम हो चुका है, वह योरप में टैरिफ घटने से वहां बढ़ेगा, और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को इस देश में किए गए हवन से मिले ट्रंप से मिला नुकसान घटेगा। मतलब यह कि किसी देश और देशों के समूह के बीच होने वाला ऐसा व्यापार समझौता आर्थिक जटिलता का तो रहता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ वह एक रणनीतिक फैसला भी रहता है कि अमरीका जैसे किसी दगाबाज देश के मोहताज हुए बिना भी किस तरह हिंदुस्तान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था जिंदा रह सकती है। यूरोपीय यूनियन के साथ अभी तो यह व्यापार समझौता हुआ है, लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा समझौता और हो सकता है, अमरीका में बेरोजगार होने वाले भारतीय कामगारों के लिए योरप में काम की कोई संभावना निकलने का। अमरीका से भारतीय छात्र घट गए हैं, भारतीय कामगार घट गए हैं, और मोटी तनख्वाह वाले ये विदेशी रोजगार कोई और जरिया नहीं ढूंढ पाए हैं, ऐसे में भारत-ईयू समझौता आगे के लिए भी एक उम्मीद बंधाता है। यह भी देखना दिलचस्प है कि किस तरह 8 बरस बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री चीन गए हैं, और चीन के साथ तनाव घटा है, कई तरह के नए समझौते या तो हुए हैं, या होने की राह पर आ गए हैं। यह देखना कुछ और अधिक दिलचस्प है कि बीते दशकों में एकध्रुवीय हो चुकी वैश्विक व्यवस्था किस तरह आज अमरीका के बिना अपने पैरों पर खड़ी हो रही है, चाहे वह योरप हो, नाटो हो, या भारत जैसे अमरीका के दशकों के दोस्त हों। यह पूरा सिलसिला ट्रंप की मारी गई लात से उठे दर्द से बिलबिलाने के बाद अब अपने पैरों पर संभलने का है, और यह अमरीका का एक विकल्प हर देश के लिए, हर अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के लिए खड़ा करते चल रहा है। यह बात ऐसे सभी लात खाए लोगों के लिए भी फायदे और काम की है कि अमरीका के बिना जीना लोग सीख रहे हैं, और यह सीखते हुए एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं।
इस बात की चर्चा आज हम इसलिए भी कर रहे हैं कि दुनिया अब चीन से उतना परहेज नहीं कर रही है, जितना कि वह अमरीकी असर में बीते दशकों में कर रही थी। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की चीन यात्रा उसी का एक बड़ा संकेत है, और कल तक के अमरीकी खेमे के माने जाने वाले कुछ और देश भी चीन के साथ अपनी कटुता कम करने की राह पर हैं। खुद हिंदुस्तान जो कि अमरीकी खेमे में तो नहीं था, लेकिन चीन के साथ जिसकी फौजी और सरहदी तनातनी चल रही थी, उसने भी बीते महीनों में घायल की गति घायल जाने के अंदाज में चीन से अपने रिश्ते बेहतर किए हैं। लेकिन आज इस पर चर्चा करने का एक और मकसद यह है कि हम भारत और चीन की बहुत बड़ी कारोबारी भागीदारी रहते हुए भी, उसका बहुत अधिक भविष्य बढ़ाना नहीं चाहते। आज जरूर भारत कच्चे माल और पुर्जों के लिए पूरी तरह से चीन पर टिका हुआ है, और दीवाली पर बिजली की झालरों के बहिष्कार जैसी फूहड़ हरकतों को छोड़ दें, तो भारतीय अर्थव्यवस्था चीन से होने वाले अंधाधुंध आयात के बिना न देश का काम चला सकती, न विदेशों को कुछ निर्यात कर सकती। ऐसे में भारत और चीन कोई आर्थिक गठबंधन तो नहीं बन सकते, लेकिन भारत को चीन का एक विकल्प बनने की कोशिश जरूर करना चाहिए।
जो लोग अंतरराष्ट्रीय मामलों को लगातार पढ़ते हैं, उन्हें मालूम है कि वैश्विक कारोबार में पिछले कई बरस में, खासकर कोरोना-लॉकडाउन के दौर के बाद, चाईना प्लस वन की नीति चल रही है। मतलब यह कि दुनियाभर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग करवाने के साथ-साथ भारत में भी यह काम शुरू कर चुकी हैं, जैसे आईफोन बनाने के कारखाने भारत में चीन की टक्कर के चल रहे हैं। ऐसे में भारत के सामने आज अमरीकाविहीन जितने तरह के व्यापार-समझौते हो रहे हैं, उनका फायदा उठाने का एक बड़ा मौका है। अभी ईयू के साथ जो समझौता हुआ है, उसके बाद की पहली खबर यह है कि उससे भारत के पड़ोसी बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग पर बड़ी मार पड़ चुकी है। भारत का बना हुआ सामान अगर योरप के देशों में कम टैक्स पर बिकेगा, तो जो-जो सामान दूसरे देश बनाते हैं, उन्हें भारत का कुछ मुकाबला तो झेलना ही पड़ेगा, इनमें बांग्लादेश भी एक रहेगा जिसे दुनिया के कई देश अपने सामान बनवाने के लिए एक अच्छी जगह मानकर चल रहे थे। कुछ तो बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता की वजह से विश्व-कारोबार का भरोसा खो चुका है, और कुछ अभी भारत और योरप के ताजा समझौते की वजह से भी उसका और नुकसान होगा।
भारत को इस मौके पर एक समझदार और जिम्मेदार देश की तरह काम करना होगा, और अपनी सारी निर्माण-क्षमता का हुनर लगातार बढ़ाना होगा, उसे देश की अर्थव्यवस्था को राजनीतिक मुद्दों के ऊपर प्राथमिकता देनी होगी, सभी समाजों का एक समावेशी माहौल बनाना होगा, महिला कामगारों को बराबरी से सामने लाना होगा, और देश के कारोबारियों को मैन्युफैक्चरिंग में तेजी से आगे बढऩे के लिए बढ़ावा देना होगा। ये सारी बातें आसान नहीं हैं, खासकर देश में अगर अराजकता का माहौल है, सामाजिक तनाव है, धर्म का उन्माद गैरजरूरी हद तक बढ़ा हुआ है, सांप्रदायिकता सिर चढक़र बोल रही है, लोग एक-दूसरे समुदाय का आर्थिक बहिष्कार सोच रहे हैं, तो भारत के लोगों को यह समझ लेना होगा कि जिस चीन के मुकाबले भारत की संभावनाएं दिख रही हैं, वह चीन इनमें से तमाम दिक्कतों से मुक्त है। चीन में इस तरह की कोई भी प्रतिउत्पादक हरकतें नहीं हैं। वहां पर लोगों का हुनर सिर चढक़र बोलता है।
आसपास की कुछ मामूली और सतही घटनाओं पर लिखने का आसान सा लालच छोडक़र जब दुनिया और मानव संस्कृति के व्यापक हित के मुद्दों पर लिखने का सोचें, तो चीजें सरहदें छोडऩे लगती हैं। जब आसमान के किसी पंछी की नजरों से, या अंतरिक्ष के किसी उपग्रह के कैमरे से धरती को देखा जाए, उसके मुद्दों को देखा जाए, तो देशों की सरहदें नहीं दिखतीं, सिर्फ उपमहाद्वीप दिखते हैं, समंदर और जमीन का फर्क दिखता है। ऐसे में बातें किसी एक देश के भीतर कैद नहीं रहतीं, वे सरहदों के आरपार कई देश या कई उपमहाद्वीप पार करते दिखती हैं। ऐसी ही एक बात यह लगती है कि क्या अब दुनिया में लोकतंत्र, चुनाव, संविधान, मानवाधिकार, बुनियादी हक, और मानवीय मूल्य की कोई जगह धरती पर रह गई है? आज दुनिया के अधिकतर देशों का जो हाल दिखता है, वह परले दर्जे की आत्मकेन्द्रित, आत्ममुग्ध, और स्वार्थी सरहदों का दिखता है, जिन्हें अपने से परे के भले से बहुत ही कम लेना-देना है। लोकतंत्र जो कि अभी हाल के दशकों तक दुनिया की सभ्यता में शासन व्यवस्था की सबसे अच्छी व्यवस्था माना जाता था, पिछले कुछ दशकों में इस रफ्तार से हाशिए पर चले गया है कि मानो सडक़ किनारे, फुटपाथ के पार, किसी बड़े शोरूम के शोकेस के चबूतरे पर बैठा हुआ लोकतंत्र दुनिया के राजपथ पर नंगा नाच देख रहा हो। आज दुनिया के बहुत से देशों में लोकतंत्र महज चुनावतंत्र रह गया है, और लोकतांत्रिक कहे और समझे जाने वाले चुनावों के भीतर भी वह महज एक बहुमत-तंत्र बन गया है, जो कि लोकतांत्रिक चाहे बिल्कुल भी न हो, वोटरों के अधिक बहुमत को जो सुहाता हो, वही निर्वाचिततंत्र आज लोकतंत्र मान लिया गया है। लेकिन क्या सचमुच ही लोकतंत्र कभी निर्वाचन, और बहुमत द्वारा निर्वाचन तक सीमित था? क्या वह कभी सिर्फ चुनाव का मोहताज था? क्या वह दो चुनावों के बीच लोकतंत्र के खात्मे पर भी उस तरह का तंत्र था जिसकी लाश हर पांच बरस में कब्र से निकालकर मेडागास्कर में समारोह मनाया जाता है? जिन्हें मेडागास्कर की यह परंपरा न मालूम हो उनकी जानकारी के लिए वहां पर लोग अपने दफन किए गए पूर्वजों की लाशों को हर पांच साल में कब्र से निकालते हैं, पूरा कबीला और रिश्तेदार इकट्ठा होते हैं, इन लाशों को निकालकर उन्हें नए कपड़ों में, या रेशमी कफन में सजाते हैं, नाच-गाने, ढोल-नगाड़े, और भोज के साथ उत्सव मनाते हैं। क्या यह सब कुछ कई देशों में हर पांच बरस में होने वाले चुनाव सरीखा नहीं लग रहा!
अभी किसी ने राममनोहर लोहिया का उनके वक्त का लिखा हुआ पोस्ट किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ में पांच महाशक्तियों को मिले हुए वीटो के अधिकार को लोहिया ने एक किस्म से सवर्ण जाति व्यवस्था करार दिया था, और इस व्यवस्था के चलते हुए किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय इंसाफ की संभावना को नकार दिया था। आज का माहौल संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह अप्रासंगिक बना देने का चल रहा है। ट्रम्प अपना एक घरेलू पांव-पोंछने किस्म का अंतरराष्ट्रीय मंच बनाना चाहता है जो कि कहने के लिए तो शांति कायम करने के लिए बनाया जा रहा है, लेकिन वह उसे अपने निजी गिरोह की तरह बनाना चाहता है, जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र नाम की पंचायत अप्रासंगिक हो जाए। दूसरी तरफ आधी सदी हो गई अमरीका और इजराइल बार-बार यह साबित कर रहे हैं कि फिलीस्तीन के मामले में संयुक्त राष्ट्र के कितने भी प्रस्ताव वे कुचल सकते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता। इसे देखते हुए यह लगता है कि आधी सदी पहले लोहिया का यह कहना कि दुनिया में बराबरी की जगह पांच ताकतवर देशों की जागीर बना देने का काम संयुक्त राष्ट्र में वीटो ने किया है। उन्होंने कहा था कि जहां पांच देशों को वीटो का अधिकार है, वहां न तो न्याय हो सकता है, न शांति। लोहिया का कहना था कि दुनिया में औपनिवेशिक शासन भले खत्म हुआ हो, जैसा कि हिन्दुस्तान में ब्रिटिश गुलामी खत्म हुई थी, लेकिन वीटो ने औपनिवेशिक शासन को नई शक्ल दे दी है। पांच देश (अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, और चीन) पूरी दुनिया के फैसले रोक सकते हैं, रोक ही रहे हैं। आज अगर हम देखें तो फिलीस्तीन, यूक्रेन, सीरिया जैसे बहुत से मोर्चों पर संयुक्त राष्ट्र में वीटो लगाकर इनमें से कोई न कोई महाशक्ति यूएन के बहुमत और जनमत को रोक सकती है।
पिछले एक दशक में दुनिया में लोकतंत्र की बुनियाद खोखली होने की बात दुनिया के कुछ साखदार संस्थानों ने दर्ज की है। स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट, और फ्रीडम-हाऊस जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट हैं कि दुनिया की बड़ी आबादी अब ऐसे देशों में रह रही है जिन्हें पूर्ण लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। चुनाव तो होते हैं, लेकिन चुनावों के बीच नागरिक अधिकारों का दायरा लगातार सिमटता चला जाता है। मीडिया, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, और नागरिक समाज, इन सब पर धीरे-धीरे सत्ता का दबाव बढ़ता चला गया है। ऐसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट बताती हैं कि लंबे समय से उदार लोकतंत्र का गढ़ माना जाने वाला योरप अब हंगरी और पोलैंड में बदले हालात झेल रहा है जहां संविधान और न्यायपालिका को सरकारों के अनुकूल ढालने की हमलावर कोशिशें हुई हैं, और जारी हैं। इन्हीं संस्थाओं की रिपोर्ट कहती है कि शरणार्थियों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर मानवाधिकारों की भाषा धीरे-धीरे राष्ट्रवादी उन्माद में बदलती जा रही है। योरप और उसके बाहर जो देश उदार लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों के प्रतीक बने हुए थे, वे भी आज शरणार्थियों, विदेशियों, और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर कट्टर रूख दिखा रहे हैं। इस संदर्भ में दुनिया भर में आज भारत के मौजूदा हालात, और यहां की राजनीति को भी आंका जा रहा है कि इस विशाल लोकतंत्र में आज लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है, कितना बचा हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने कल एक ऐतिहासिक फैसला दिया है जिसमें लड़कियों और महिलाओं की माहवारी से जुड़ी सेहत की जरूरतों को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किया। जस्टिस जे.बी.परदीवाला, और जस्टिस आर.महादेवन की बेंच का यह फैसला स्कूल जाने वाली लड़कियों की माहवारी की जरूरतों को लेकर था। अदालत ने देश की हर सरकारी और निजी स्कूलों में 6वीं से 12वीं तक की छात्राओं को मुफ्त का सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसमें स्कूलों में माहवारी से जुड़ी सुविधाओं की कमी का जिक्र था, और अदालत से मदद मांगी गई थी। इस फैसले में जजों ने कल कहा है कि माहवारी के दौरान लड़कियां सामाजिक और सार्वजनिक अपमान का सामना करती हैं जिसका उनकी शिक्षा और सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए शहरी हो, या ग्रामीण, हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय, पानी, साबुन, और जरूरत पडऩे पर अतिरिक्त यूनिफॉर्म का इंतजाम अनिवार्य किया गया है। अदालत का यह फैसला इन सरकारी आंकड़ों के आधार पर भी आया है जिनके मुताबिक भारत में हर बरस सवा दो करोड़ लड़कियां माहवारी की दिक्कतों की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। अब अदालत ने यह कहा है कि राज्यों को इन निर्देशों पर पूरे अमल के लिए निगरानीतंत्र बनाना होगा। कुछ और बारीक बातें भी इस फैसले में लिखी गई हैं, लेकिन हम आज यहां पर मोटी-मोटी बातों पर ही चर्चा आगे बढ़ा रहे हैं।
भारत की इस बात के लिए भी बड़ी आलोचना होती थी कि सेनेटरी नैपकिंस पर टैक्स भारत में 2018 तक जारी था। लंबी जन आलोचना के बाद जीएसटी कमेटी ने इसे हटाया है। कुछ दूसरे देशों का हाल देखें, जहां पर भारत के मुकाबले गरीबी खासी अधिक है, तो उनमें भी कई जगहों पर स्कूलों में सेनेटरी पैड्स मुफ्त मुहैया कराने का इंतजाम पहले से है। अफ्रीका के देश केन्या में 2018 से स्कूली लड़कियों को ये मुफ्त हासिल हैं। बोत्सवाना में 2017 से, जाम्बिया में हर स्कूल में, नेपाल में 2019-20 से, और एक सबसे गरीब देश इथियोपिया में भी कुछ स्कूल कार्यक्रमों में सेनेटरी पैड मुफ्त मुहैया कराए जाते हैं। ऐसे सारे ही देशों का यह तजुर्बा रहा है कि स्कूली लड़कियों को इस मुफ्त सहूलियत के बाद लड़कियों का स्कूल छोडऩा कम होता है। भारत में करीब एक चौथाई लड़कियां माहवारी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। वे स्कूल में पढ़ते हुए भी महीने में तीन से पांच दिन तक गैरहाजिर रहती हैं। मामूली गंदे कपड़े के इस्तेमाल से वे तरह-तरह के संक्रमण से गुजरती हैं, स्कूलों में ऐसे पैड डालने के लिए कचरे के डिब्बे नहीं रहते, भारत की गांवों के स्कूलों में ऐसे डिब्बों का इंतजाम और कम है। लेकिन जिस-जिस देश में स्कूली लड़कियों को पैड मुफ्त दिए गए, वहां-वहां स्कूल छोडऩा घट गया है, और ये आंकड़े एकदम ही चौंकाने वाले हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हम इसलिए भी ऐतिहासिक मान रहे हैं कि माहवारी को भारत में जिस तरह सामाजिक छुआछूत माना जाता है, माहवारी से गुजर रही लडक़ी या महिला को अधिकतर जगहों पर शुभ कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता है, पूजा-पाठ से दूर रखा जाता है, रसोईघर में घुसने नहीं दिया जाता, वहां पर अगर माहवारी की दिक्कतों के समाधान को बुनियादी अधिकार में शामिल कर लिया गया है, तो यह लड़कियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का काम है। थोड़ी हैरानी इस बात पर होती है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को तो कुछ बरस में वोटर बनने वाली इस उम्र की लड़कियों की इतनी फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं थी, और चुनावों पर जिंदा रहने वाले, और सत्ता पाने वाले नेताओं का कारोबार तो वोटर, और जल्द वोटर बनने वाले लोगों पर टिका रहता है। संसद और सरकार, विधानसभाओं, और नेताओं ने जो नहीं किया, उसे एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने किया है, यह भारत की सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं, और उन पर काबिज लोगों के देखने लायक आईना भी है। सुप्रीम कोर्ट की नीयत चाहे आईना दिखाने की न हो, लेकिन आईना पेश तो हो ही चुका है, और हर स्कूली लडक़ी हर महीने के चार-पांच दिन जजों को दुआ देगी, न कि नेताओं को। यह बड़ी लोकतांत्रिक विसंगति की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के जज लड़कियों की जिस जरूरत को मौलिक अधिकार में शामिल करने लायक मान रहे हैं, कर रहे हैं, वह जरूरत देश की सरकारों को दिखी भी नहीं!
इस बार गणतंत्र दिवस पर देश के जिन लोगों को पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान हुआ है, उनमें एक नाम कर्नाटक के मांडया जिले के हरलाहल्ली गांव के अनके गौड़ा का है। वे पहले बस कंडक्टर थे, फिर एक शक्कर कारखाने में काम करते थे। उन्होंने अपना मकान बेचकर आधा एकड़ जमीन पर एक किताबघर बनाया, और पिछले पचास बरस में उन्होंने तनख्वाह का करीब 80 फीसदी किताबों पर खर्च करके यहां 20 लाख से अधिक किताबें इकट्ठा की हैं। वे खुद एक कोने में फर्श पर सोते हैं क्योंकि सारी जगह किताबों से भरी हुई है। बिना किसी फीस के, लोग यहां आकर किताबें पढ़ सकते हैं, और अब तो दूर-दूर से यहां शोधकर्ता आने लगे हैं। बिना किसी सरकारी मदद के एक जिद्दी इंसान की मेहनत किस तरह एक असाधारण तस्वीर गढ़ सकती है, उसकी यह एक मिसाल है। भारत में अलग-अलग जगहों में अलग-अलग लोगों ने कुछ इस तरह का ही करिश्मा कर दिखाया है।
ऐसी कुछ और मिसालें ढूंढें, तो दशरथ मांझी का नाम आता है जो बिहार के एक गांव के रहने वाले थे, और गांव से अस्पताल पहुंचने में पहाड़ी का चक्कर काटकर 55 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता था। अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए उनके पास कोई आसान रास्ता नहीं था, पत्नी के गुजरने के बाद 22 बरस तक वे लगे रहे, और पहाड़ काटकर 9 किलोमीटर लंबी सडक़ बनाई जिससे अस्पताल का 55 किलोमीटर का रास्ता घटकर अब 15 किलोमीटर रह गया। उन पर माउंटेन मैन नाम की फिल्म भी बनी थी। ऐसी एक दूसरी मिसाल फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले जादव पायेंगे की है। असम के जादव ने 1979 में बाढ़ से प्रभावित होने के बाद अकेले ही साढ़े 5 सौ हेक्टेयर जंगल लगाया, जो मोलाई फॉरेस्ट के नाम से जाना जाता है। बीते कई बरस से इसमें हाथी और बाघ जैसे जानवर भी आ बसे हैं। पर्यावरण बचाने की उनकी जिद ने 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करवाया। एक अलग मिसाल बिहार के आनंद कुमार की है जो गरीब बच्चों का आईआईटी में दाखिला कराने के लिए सुपर-30 नाम से प्रशिक्षण देते हैं। 2002 से अब तक उनके केन्द्र से निकले हुए पांच सौ से अधिक छात्र-छात्राओं को आईआईटी में दाखिला मिल चुका है। उन पर एक फिल्म, सुपर-30 बनी है। एक और मिसाल महाराष्ट्र की एक दलित महिला कल्पना सरोज की है, जो अपने बचपन में गरीबी के साथ-साथ बालविवाह की शिकार भी हो गई थी। उन्होंने अपनी कोशिशों से एक बड़ी कंपनी खड़ी की, और उसमें महिलाओं और वंचित तबके के लोगों को जोड़ा, उनके लिए दरवाजे खोले, उन्हें भी पद्मश्री मिला है। महाराष्ट्र की ही सिंधु ताई सपकाल जो खुद बेघर हो गई थीं, उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए 6 आश्रम बनाए, 15 सौ से अधिक बच्चों को गोद लिया, उनकी जिंदगियां बदलीं। 2021 में उन्हें भी पद्मश्री दिया गया। कर्नाटक की एक आदिवासी तुलसी गौड़ा ने 30 हजार से ज्यादा पेड़ लगाए, उनके इस असाधारण काम के लिए 2021 में उन्हें पद्मश्री मिला।
हालांकि ऐसी कहानियां और भी हैं, लेकिन मिसाल के तौर पर इतनी काफी हैं। इनमें से कोई भी व्यक्ति ऐसे नहीं थे, जो पारिवारिक संपन्नता, ओहदे या किसी और तरह की ताकत से वे कोई बड़ा काम कर पाए। बिल्कुल ही अभाव की पृष्ठभूमि से उठकर सिर्फ अपनी जिद, लगन, और मेहनत से उन्होंने आसमान छू लिया। इतनी मेहनत से इनमें से हर कोई अपने लिए बहुत आराम की जिंदगी जुटा सकते थे। आईआईटी में दाखिले के लिए माँ-बाप कोचिंग सेंटरों को दसियों लाख रूपए का भुगतान करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन आनंद कुमार ऐसे जीवट व्यक्ति हैं जो कि फक्कड़ की जिंदगी जीते हैं, और गरीब बच्चों के लिए काम करते हैं। गिनाने के लिए अच्छा काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कुछ लोगों के पास कुछ तर्क या तथ्य हो सकते हैं, लेकिन हम यहां इनमें से किसी भी सामाजिक योगदान वाले व्यक्ति के वकील की तरह उनकी तारीफ नहीं कर रहे हैं, सिर्फ कुछ मिसालें सामने रख रहे हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि लोग 30 हजार पेड़ लगाएं, साढ़े पांच सौ हेक्टेयर पर जंगल लगाएं, तो ही धरती पर उनका योगदान रहेगा। डेढ़ हजार अनाथ बच्चों से बहुत कम, दस-पन्द्रह, या पच्चीस-पचास अनाथ बच्चों की जिंदगी भी बदल देना बहुत बड़ा काम होगा। इसलिए लोगों को ऐसी बड़ी कामयाबी, और ऐसे बड़े योगदान को देखकर दहशत में नहीं आना चाहिए, बल्कि यह मानना चाहिए कि जब इन लोगों ने काम शुरू किया होगा, तो पहली बार इनके कोई छात्र-छात्रा आईआईटी पहुंचे होंगे, पहली बार कोई पेड़ लगा होगा, पहली बार किसी पहाड़ी सडक़ के लिए कुदाली चली होगी। हजार मील का सफर भी पहले कदम से ही शुरू होता है, और ऐसे पहले कदम को यह पता नहीं होता है कि उसका सफर हजार मील का रहेगा।
कुछ लोगों को लग सकता है कि पर्यावरण की बातें फैशन की अधिक रहती हैं, असल जिंदगी में पर्यावरण के कोई खतरे नहीं रहते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में दिल्ली और आसपास के इलाकों में जिनको रहना पड़ता है, वे जानते हैं कि कुछ पुराणों में, या दूसरी धार्मिक किताबों में लिखे गए कुम्भीपाक नर्क किस तरह के होते होंगे। आज दिल्ली में बहुत से बुजुर्ग और बीमार लोगों को, सांस और फेंफड़े की बीमारी वालों को दिल्ली छोडक़र चले जाने की डॉक्टरी सलाह मिल रही है। प्रदूषण किसी शहर को किस तरह न रहने लायक बना देता है, दिल्ली इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है। आज से दस बरस पहले अगर किसी कल्पनाशील व्यक्ति ने यह सोचा होता कि दिल्ली कैसी बर्बाद होती चल रही है, और यहां का वायु प्रदूषण किस खतरनाक दर्जे तक पहुंच जाएगा, तो हो सकता है कि वे नई संसद को दिल्ली के बाहर किसी और शहर ले जाते, किसी और शहर को उपराजधानी बना देते। आज दिल्ली में आम फेंफड़ों की जो भी बर्बादी होती हो, दसियों लाख आबादी के चुने हुए सांसदों के फेंफड़ों की बर्बादी भी करीब-करीब उतनी ही हो रही है, और देश के वोटरों के चुने हुए लोकसभा सदस्य, और सांसद-विधायकों के चुने हुए राज्यसभा सदस्य भी अपने फेंफड़ों के लिए दिल्ली में बर्बादी पा रहे हैं। और तो और देश के सबसे बड़े जज, देश के तमाम केन्द्रीय मंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, दुनिया भर के देशों से आए हुए राजनयिक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में काम कर रहे लोग एक ऐसे शहर में फंस गए हैं जहां वे खुली हवा में घूमने भी नहीं निकल सकते। दिल्ली एक ऐसा शहर हो गया है जहां किसी खेल मुकाबले में आने से भी अब अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ओलंपिक संघ, और खेल संघों को लिखकर मना कर दे रहे हैं। आज हालत यह है कि देश भर के वे बीमार लोग जो कि दिल्ली इलाज के लिए जाना चाहते हैं, वे साल के कुछ महीने दिल्ली जाने का सपना नहीं देख सकते, और किसी दूसरे शहर में इलाज के लिए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र, एनसीआर का एक दर्जा होना चाहिए था, उसे देश के एक शोकेस की तरह दुनिया के सामने रहना चाहिए था, अब साल के कई महीने यह राजधानी मास्क लगाए घूमती है। अभी कुछ साल पहले तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में आने वाले विदेशी सैलानियों में से अधिकतर ऐसे रहते हैं जो कि दिल्ली, आगरा, और जयपुर के त्रिकोण में घूमकर लौट जाते हैं। लेकिन अब बहुत से लोग बताते हैं कि साल के आधे से अधिक महीने तो सैलानी दिल्ली आना ही नहीं चाहते। इसका मतलब यह है कि दिल्ली में, और दिल्ली से होते हुए भारत के पर्यटन केन्द्रों का जो ढांचा है, वह लगातार खतरे में पड़ता जा रहा है, इंसानों के फेंफड़ों के साथ-साथ पर्यटन-कारोबार के फेफड़े भी खराब होते चल रहे हैं। ऐसे में आज जब यह खबर आती है कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से इंसानों को मोटर न्यूरॉन बीमारियों का खतरा रहता है, तो सबसे पहले दिल्ली पर मंडराता खतरा सूझता है। फेंफड़ों की बीमारियों से परे, अगर दिमाग के लिए गंभीर खतरा ऐसे प्रदूषण से हो रहा है, तो उसके इलाज की लागत देश पर, सरकार पर, और इंसानों पर कितनी पड़ेगी, यह सोचना भी भयानक है। स्वीडन के एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान का यह अध्ययन भारत के, दुनिया के सबसे प्रदूषित कई शहरों के लिए एक बड़ी चेतावनी है कि वहां रहने वाले बाशिंदे मौत की तरफ बड़ी तेज रफ्तार से बढ़ रहे हैं, और बाकी की जिंदगी फेंफड़ों से लेकर दिमाग तक की बड़ी-बड़ी बीमारियों का खतरा भी झेल रहे हैं। यह सिलसिला भी अगर किसी देश की राजनीति को नहीं चौंकाता है, तो उस देश के बारे में क्या कहा जाए? धिक्कार कहा जाए, या लानत है कहा जाए?
दिल्ली एक शहर का प्रदेश है, लेकिन वह निर्वाचित राज्य सरकार के सीमित अधिकारों पर केन्द्र सरकार के बहुत सारे अधिकारोंतले दबा-कुचला प्रदेश भी है। इसकी जिम्मेदारी इन दोनों पर है, और केन्द्र सरकार पर कुछ अधिक है। ऐसे में दिल्ली की म्युनिसिपलों से लेकर राज्य सरकार तक हांकने वाले लोग, संसद और न्यायपालिका के तमाम लोग अगर खुद अपने सुरक्षित लगते बंगलों में एयर प्यूरीफायर जैसे उपकरणों के भरोसे, और एयरकंडीशंड कारों में चलते हुए अपने को बचा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि वे शहर की बाकी 90 फीसदी गरीब जनता को इन सामानों के बिना मरने के लिए छोड़ चुके हैं। नैतिकता की बात तो यह होती कि दिल्ली में बसे हुए देश की किस्मत तय करने का हक रखने वाले कार्यपालिका, न्यायपालिका, और विधायिका के कुछ हजार लोग खुद भी किसी एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल नहीं करते, कारों के शीशे उतारकर चलते, और आम जनता की तरह भुगतकर देखते। हमारा पक्का भरोसा है कि जिस दिन लोकतंत्र की इन तीनों संस्थाओं के दिल्ली में बसे हुए दस-बीस हजार लोग खुली खिड़कियों वाले घरों में, और खुली खिड़कियों वाली कारों में बसने और चलने लगेंगे, दिल्ली का प्रदूषण खत्म हो जाएगा। आज इस भयानक प्रदूषण की एक वजह यही है कि इसके बीच भी सबसे ताकतवर तबका अपने आपको बचाकर चलने की ताकत रखता है, और उसका इस्तेमाल करता है। अगर ये सारे महत्वपूर्ण फेंफड़े भी आम इंसानों की तरह खतरा झेलने लगेंगे, तो हो सकता है कि किसी सर्वदलीय सम्मेलन की तरह दिल्ली में लोकतंत्र के सारे स्तंभों का एक मिलाजुला सम्मेलन हो जाए, पूरा सुप्रीम कोर्ट, पूरी संसद, पूरी केन्द्र सरकार राष्ट्रपति के साथ एक साथ बैठ जाए, और यह तय करे कि उन सबको अपने फेंफड़े कैसे बचाने हैं। हम कोई बहुत क्रांतिकारी सोच सामने नहीं रख रहे हैं, जिस देश-प्रदेश में आम जनता को पीने का साफ पानी नसीब न हो, वहां देश चलाने वाले लोगों को बोतलबंद पानी पीने का हक क्यों होना चाहिए? और पानी के साथ-साथ साफ की गई हवा पाने का हक क्यों होना चाहिए? ऐसे कई असुविधाजनक सवाल खड़े होते हैं, और इनके जवाब में ही दिल्ली के आम इंसानों के फेंफड़ों का हक लिखा हुआ है।
भारतीय राजनीति को लेकर कई जानकार लोगों का समय-समय पर कहना रहता है कि जनता के बीच मुद्दे कब बदल जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। आज देश में कुछ ऐसा ही अजब माहौल बन गया है। यह किसने सोचा था कि देश का सवर्ण तबका जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी का निष्ठावान समर्थक माना जाता है, आज एकदम से उनके खिलाफ उबल पड़ेगा? और फिर यह भी कि यह बात आरक्षण जैसे किसी बड़े मुद्दे को लेकर नहीं खड़ी हुई है, बल्कि विश्वविद्यालयों, और उच्च शिक्षा के संस्थानों में समानता के एक वातावरण को बनाने के लिए शिकायतों की व्यवस्था, और उनकी जांच के नियमों में हुए फेरबदल की वजह से खड़ी हुई है। यूजीसी नाम से जो अधिसूचना आज देश में बवाल की वजह बन गई है, और इससे विचलित सवर्ण लोग सडक़ों पर उतर रहे हैं, इक्का-दुक्का मामले सवर्णों के नौकरी छोड़ देने के भी सामने आए हैं, यह देश में एक अधिसूचना से बदल गया माहौल है। इसे समझना जरूरी है क्योंकि इसे सामाजिक तनाव की एक वजह भी बताया जा रहा है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अभी एक पखवाड़े पहले उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन के नए नियम जारी किए। सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कुछ मामले चल रहे थे जो कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी, और ओबीसी छात्र-छात्राओं के साथ चलने वाले व्यापक भेदभाव की तरफ कानून का ध्यान खींचना चाहते थे। आईआईटी, और आईआईएम जैसे अंतरराष्ट्रीय शोहरत वाले संस्थानों से लेकर दूसरे केन्द्रीय विश्वविद्यालयों तक भी आरक्षित वर्ग से आने वाले बच्चों के साथ बड़ा भेदभाव होता था। उनके लिए ऐसे मानसिक उत्पीडऩ की स्थितियां पैदा कर दी जाती थीं कि उनमें से कुछ या कई छात्र-छात्राओं की खुदकुशी भी सामने आती थी। आमतौर पर शिक्षण संस्थान भेदभाव और प्रताडऩा का उसी तरह खंडन करते थे जिस तरह पुलिस या सरकार के कोई छोटे अफसर उन पर लगने वाले आरोपों का करते हैं। लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदलती थी कि आरक्षित वर्ग से ऐसी जगहों पर पहुंचे हुए बच्चों को बहुत ही मानसिक और सामाजिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती थी। इसलिए अभी यूजीसी ने नियमों में फेरबदल की जो अधिसूचना जारी की है, उसमें पुराने चले आ रहे कुछ प्रावधान बदले गए हैं, और इन नियमों को कड़ाई से लागू करने पर असली भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई हो सकेगी, और समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाले बच्चों को एक समावेशी वातावरण मिल सकेगा।
अब इस नए फेरबदल का विरोध करने वाले लोगों का यह कहना है कि इनकी बुनियाद इस सामाजिक पूर्वाग्रह पर टिकी हुई है कि अनारक्षित वर्ग के लोग ही भेदभाव के लिए जिम्मेदार रहते हैं। ऐसे में इन आलोचकों का कहना है कि नियमों से अधिक हिफाजत तो किसी को नहीं मिल सकेगी, बल्कि अनारक्षित वर्ग के लोग अधिक खतरे में पड़ेंगे, और इनसे शैक्षणिक संस्थाओं में असमानता खड़ी हो जाएगी। एक फेरबदल जिस पर अधिक विरोध हो रहा है, वह किसी शिकायत के झूठे मिलने पर शिकायतकर्ता पर कार्रवाई के प्रावधान को अब खत्म कर देने का है। अभी तक झूठी शिकायतों पर संस्थान कार्रवाई कर सकते थे, लेकिन उसे हटा दिया गया है। यह भी है कि शिकायतों के निपटारे के लिए बनने वाली कमेटियों में एसटी-एससी, ओबीसी, दिव्यांग, और महिला प्रतिनिधित्व को तो अनिवार्य किया गया है, लेकिन अनारक्षित वर्गों से किसी को लेने की शर्त नहीं रखी गई है।
भारत में देश के स्तर पर, और प्रदेशों के स्तर पर सरकारी नौकरियां एक बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं। हर राजनीतिक दल चुनाव के समय हजारों या दसियों हजार नौकरियों का वायदा करते हैं, और उम्मीद करते हैं कि इससे सत्ता पर उनकी वापिसी हो सकेगी। लेकिन धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि यह हथियार धार खोते जा रहा है, अब एक-एक करके अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग राजनीतिक दल गरीबों या जरूरतमंद लोगों के खातों में सीधे कैश ट्रांसफर के हथियार का इस्तेमाल करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि एक सरकारी नौकरी पाने के लिए जो हजारों बेरोजगार कतार में लगते हैं, उनमें से नौकरी न पाने वालों की नाराजगी चुनाव में नुकसान अधिक करती हैं, बजाय नौकरी पाने वाले लोगों के अहसानमंद होने के। इसलिए राजनीतिक दल हर महीने किस्तों में जाने वाले अहसान पर कुछ अधिक निर्भर होते दिख रहे हैं। फिर यह भी है कि 25-50 हजार रूपए महीने की नौकरी किसी को देने के बजाय उस रकम से 25-50 लोगों को हर महीने हजार रूपए देना चुनावी फायदे के हिसाब से अधिक कारगर होता है। इसलिए सरकारी नौकरियों की तरफ लोगों को अब उम्मीद की नजरों से नहीं देखना चाहिए। सच तो यह है कि अधिकतर सरकारों की खाली होने वाली अधिकतर कुर्सियों को दुबारा भरने के काम में इतनी लेट-लतीफी की जाती है कि लोग उन खाली कुर्सियों के साथ जीने के आदी हो जाएं। सरकारों के पास एक दूसरी तरकीब यह रहती है कि वे शिक्षक की जगह शिक्षाकर्मी, और सैनिक की जगह अग्निरक्षक बड़े सस्ते में रखकर काम चला लें। लेकिन इसके साथ-साथ इन दिनों दुनिया पर छा चुके एक और खतरे को देखने की जरूरत है।
एआई ने दुनिया में करोड़ों इंसानों के काम को बेकार का साबित कर दिया है। उसने यह दिखा दिया कि बिना किसी लागत के, बिना किसी खर्च के एआई किस तरह कई किस्म के काम इंसानों से बेहतर कर सकता है, और करने भी लगा है। यह संपादकीय खुद लिखने की हमारी जिद अगर न होती, तो हो सकता है कि काफी हद तक इसी दर्जे का, या शायद कुछ मायनों में इससे बेहतर संपादकीय एआई एक-दो मिनट के भीतर लिख देता, और फिर अगले दो-चार मिनटों में हम उसमें अपनी विचारधारा, तर्क, तथ्य जोडक़र एआई से दुबारा भी लिखवा लेते। जब कभी हम एआई से कोई जानकारी मांगते हैं, तथ्य पूछते हैं, तो उसका प्रस्ताव भी साथ-साथ आ जाता है कि क्या इस पर एक संपादकीय लिख दूं, या इसे यूट्यूब की स्क्रिप्ट की तरह ढाल दूं? अब कल्पना कीजिए ऐसे मीडिया संस्थान की जहां मैनेजमेंट संपादक की जगह एआई से काम चला ले, लोग टायपिस्ट की जगह बोलकर टाईप कर ले, एआई से ग्रामर और हिज्जे सुधरवा लें, उससे मुफ्त में फैक्ट चेक करवा लें, और ये सारे काम इंसानों से लगभग बेहतर, और बिल्कुल ही मुफ्त में होने लगें, तो कौन सा मीडिया-मैनेजमेंट तेवर वाले लोगों को रखना चाहेगा?
लेकिन हम दो कदम और पीछे चलें, और एआई के पहले के बहुत ही साधारण कम्प्यूटरों के दौर में आ जाएं, तो आज भारत सरकार के बनाए हुए एक सॉफ्टवेयर के आधार पर एक-एक करके कई प्रदेशों में ई-फाइलिंग का काम चल रहा है। छत्तीसगढ़ में जब कुछ अफसरों के कम्प्यूटरों पर हमने इसे देखा, तो यह ऐसा सुखद आश्चर्य था कि किसी एक जिले से कलेक्टर की भेजी गई ई-फाईल कुछ सेकेंड में मंत्रालय में सचिव के पास भी चली गई, उस सचिव ने फाईल कुछ सेकेंड में अपने सीनियर को भेज दी, वहां से फाईल मंत्री या मुख्यमंत्री को चली गई, और इनमें से हर कोई अगर कम्प्यूटर पर बैठकर काम निपटा रहे हैं, तो हो सकता है कि पांच-दस मिनट में फाईल निपटकर जिले में वापिस पहुंच जाए। आज हालत यह है कि जिलों से फाईलें लेकर अलग-अलग विभागों के बाबू राजधानी आते हैं, और यहां एक-दो दिन रूककर उन फाईलों को देकर वापिस जाते हैं। बिना एआई के, सिर्फ पुराने कम्प्यूटरों पर एक नए प्रोग्राम के इस्तेमाल से सरकारी फाईलों की रफ्तार तकनीकी रूप से तो हजारों गुना अधिक हो गई है, अब अगर कम्प्यूटरों के सामने बैठने वाले इंसान काम न करने पर आमादा होंगे, तो अलग बात है। लेकिन जब हम एआई के इस्तेमाल को जोडक़र देखते हैं, तो लगता है कि सरकारी कामकाज में गड़बड़ी पकडऩा, टेंडरों की खामियां निकालना, सप्लाई में घटिया चीजों को पकडऩा, नकली बिल पकडऩा, एआई चुटकी बजाते कर सकता है। इन सबसे इंसानों की जरूरत तेजी से घटने जा रही है, और जिन लोगों को सरकारी नौकरियों की चाह है, उन्हें जिंदा रहना है, तो उन्हें गैरसरकारी राह देखनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ की दो अलग-अलग घटनाएं प्रदेश में कानून की स्थिति बताने वाली है। पेंड्रा में एक विधवा महिला का एक शादीशुदा व्यक्ति से प्रेमप्रसंग था। दोनों ही हमउम्र अधेड़ थे। कुछ अरसा पहले दोनों घर छोडक़र चले गए थे, और मध्यप्रदेश में रह रहे थे। अभी लौटे तो प्रेमी के परिवार ने इस महिला को घर से निकालकर उसके कपड़े फाड़े, उसके बदन पर गोबर पोता, और उसे पीटते हुए गांव की गलियों में घुमाया। अब इसके फोटो-वीडियो सामने आने पर पुलिस ने इस प्रेमी की पत्नी सहित परिवार के कुछ और लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज किया है। एक दूसरा मामला इससे बिल्कुल ही अलग है, जिसमें छत्तीसगढ़ के बसना में ओडिशा से गांजा लेकर आ रहे तस्करों की कार ने पुलिस की गाड़ी को टक्कर मारी, और फिर अपनी कार आगे-पीछे करके उसे और ठोका। पांच पुलिसवालों ने कूदकर जान बचाई, और इसके बाद पुलिस गाड़ी में आग लग गई। लाखों के गांजे सहित छोड़ी गई इस कार को पुलिस ने जब्त किया है। ये दोनों मामले एकदम अलग किस्म के हैं, लेकिन इन दोनों में एक बात एक सरीखी है कि लोगों के मन में कानून का सम्मान बहुत बुरी तरह कमजोर हो चुका है। हर दिन जगह-जगह होने वाली चाकूबाजी भी यही बताती है कि लोग अपने झगड़े इतने बेफिक्र होकर सडक़ों पर जुर्म की हिंसा करके निपटा रहे हैं कि न तो उन्हें अदालत से कोई उम्मीद है, और न ही अदालत जाना उन्हें जरूरी लगता है। लोग पूरी तरह बेफिक्र होकर अपना हिसाब खुद ही चुकता कर रहे हैं, पहले तो यह कहा जाता था कि लोग कानून हाथ में लेते हैं, लेकिन अब यह समझ पड़ता है कि लोग कानून हाथ में लेकर जमीन पर डालकर उसे अपने पैरों से कुचलते भी हैं। यह सिलसिला अधिक खतरनाक इसलिए है कि ऐसा करने वाले तमाम लोग पेशेवर मुजरिम नहीं रहते, कई लोग परिवार के भीतर भी हिंसा करते हैं, पड़ोसियों को मार डालते हैं, नाबालिगों से बलात्कार करते हैं, और देश में एक मजबूत कानून होने के बावजूद किसी को सजा का डर नहीं लगता है। जुर्म करने वाले अगर सिर्फ पेशेवर मुजरिम होते, तो वे गिनते के रहते, और उन पर काबू पाना, उन्हें सजा दिलाना आसान भी रहता। आज जब आम घरेलू लोग भी किसी तनातनी की हालत में, ठगने और लूटपाट करने के लिए, क्षणिक देहसुख पाने के लिए संगीन जुर्म करने पर उतारू हो जा रहे हैं, तो यह समाज के लिए अधिक खतरनाक है, और कानून लागू करने की जिम्मेदार संस्थाओं के लिए अधिक बड़ी चुनौती।
यह भी सोचने की जरूरत है कि लोगों के मन से सजा का खौफ क्यों निकल गया है? इसलिए कि निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट पहुंचने तक लोगों को जमानत पर घूमने-फिरने, और सजा पाने पर भी अपील पर फिर छूट जाने का इतना मौका मिलता है, कि सजा का डर उन्हें डराता नहीं है। यह भी एक वजह हो सकती है कि पुलिस जैसी प्राथमिक जांच एजेंसी से लेकर न्याय व्यवस्था तक में जहां जो भ्रष्टाचार है, उसका अंदाज लोगों को है, और वे उस भ्रष्टाचार के भरोसे डरना-सहमना छोड़ चुके हैं। एक तीसरी वजह यह हो सकती है कि जिनको सजा के असल खतरे का अंदाज भी है, उन्हें भी जेल के बाहर की जिंदगी, और जेल के भीतर की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता है, उनका बहुत अधिक सुख का वर्तमान नहीं है, और महत्वाकांक्षाओं का कोई भविष्य नहीं है, इसलिए वे लापरवाही से जुर्म कर बैठते हैं। आज सरकारों ने किसी जुर्म के हो जाने के बाद उसके आरोपी को पकडऩे, और उसे सजा दिलाने को ही अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी और कामयाबी मान लिया है। होना तो यह चाहिए था कि जुर्म की वजहों का अध्ययन करके सरकारें समाज में ऐसी स्थितियां लातीं कि जुर्म होना ही घटता, लेकिन पांच बरस या उससे कम की दूरदर्शिता वाली सरकारें ऐसा नहीं कर पा रही हैं।


