संपादकीय
छत्तीसगढ़ में ताजा राजनीतिक विवाद पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की वर्तमान उपमुख्यमंत्री अरूण साव की एक आलोचना को लेकर खड़ा हो गया है। भूपेश ने साव के सरकारी कामकाज को लेकर उनकी तुलना बंदर से कर दी और कोई पुरानी बंदर राजा की कहानी सुना दी। उन्होंने साव के साहू समाज के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन भूपेश के राजनीतिक बयान के बाद साहू समाज के कुछ लोग साव की आलोचना को साहू समाज की आलोचना मानकर भूपेश से दस दिन में माफी मांगने को कह रहे हैं। कांगे्रस और भाजपा के बीच वैसे भी तलवारें कम नहीं खिंची हुई हैं, फिर उसके बाद अब इसमें जातिवाद का तडक़ा और लग गया। अरूण साव वजनदार मंत्री हैं, उपमुख्यमंत्री भी हैं, सांसद भी रह चुके हैं, वे हाईकोर्ट में सरकारी वकील भी थे, और वे भूपेश बघेल के जितने ही छत्तीसगढ़ी भी हैं। वे अपना राजनीतिक बचाव करने में पर्याप्त सक्षम हैं। ऐसे में उनके खिलाफ भूपेश के किस्सा-कहानी अंदाज के एक राजनीतिक बयान को अगर साव का समाज अपना सामाजिक अपमान मानकर प्रदेश स्तर के आंदोलन की चेतावनी दे रहा है, तो यह सिलसिला आगे बढऩे पर कहां तक पहुंचेगा?
छत्तीसगढ़ में न सिर्फ साहू और कुर्मी जातियां राजनीति में हैं, बल्कि अनुसूचित जाति और जनजाति की तो विधानसभा और लोकसभा की सीटें भी आरक्षित हैं। उनके निर्वाचित जनप्रतिनिधि पंच से लेकर सांसद तक हर स्तर पर हैं। फिर सरकारी ओहदों पर छत्तीसगढ़ की तमाम जातियों के अलावा भी अलग-अलग धर्मों के लोग भी रहते हैं, और कुछ ऐसी जातियों के लोग भी रहते हैं जिन्हें घोर छत्तीसगढ़वाद के लोग परदेसिया कहते हैं। अब बृजमोहन अग्रवाल सरीखे लोग इसी शहर में पैदा होकर अपने घर के सामने बिना कपड़ों के बचपन खेलकर पूरी जिंदगी से सार्वजनिक जीवन में रहकर जनता के बीच निर्वाचित राजनीति कर रहे हैं, इसके बाद भी अगर उग्र छत्तीसगढ़वाद के झंडाबरदार अगर महाराज अग्रसेन और भगवान झूलेलाल के खिलाफ बयानबाजी करके स्थानीयता की अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, और अपने छत्तीसगढ़ी होने के दावे का नगदीकरण करना चाहते हैं, तो यह छत्तीसगढ़ में हाल के महीनों में खड़ा हुआ एक अलग किस्म का बवाल है। इसने पर्याप्त तनाव खड़ा कर दिया है, और गिरफ्तारियों से लेकर छत्तीसगढ़ या शहरों का बंद भी हो चुका है। इस तनाव को देखते हुए अब साहू समाज और भूपेश के बीच का यह तनाव ऐसा लग रहा है कि साव या उनकी तरफ से राजनीतिक जवाब देने के बजाय जात की राजनीति को सत्ता और विपक्ष की राजनीति पर हावी किया जा रहा है।
अब हम इससे जुड़ी हुई एक दूसरी बात पर आना चाहते हैं, जो कि पहली नजर में अलग लग सकती है, लेकिन अगर एक पंछी की विहंगम दृष्टि से, आसमान से छत्तीसगढ़ को एक नजर में देखें, तो बस्तर के इलाके में चल रहा एक अलग किस्म का विवाद दिखेगा, जिसमें आदिवासियों के ईसाई बनने पर ऐसे लोगों को मतांतरित कहा जा रहा है, उनका आरक्षित दर्जा खत्म करने की मांग हो रही है, उन्हें गांवों में दफन नहीं होने दिया जा रहा है, और उनमें से बहुत से लोगों की ‘मूल धर्म’ में वापिसी का अभियान चलाया जा रहा है। यह भी पता लग रहा है कि ईसाई धर्म को छोडऩे वाले कुछ लोग हिन्दू धर्म में आ रहे हैं, और कुछ लोग अपनी मूल आदिवासी संस्कृति में लौट रहे हैं। पहले भी बस्तर में यह बात चलती आ रही थी कि आदिवासियों में कुछ लोग अपने को हिन्दू मानते हैं, और बाकी लोग अपने को आदिवासी ही मानते हैं। इस तरह बस्तर अभी आदिवासी से ईसाई, और फिर ईसाई से आदिवासी, या हिन्दू आवागमन देख रहा है। यह तनाव कम नहीं है।
दूसरी तरफ मैदानी इलाकों में जगह-जगह हिन्दुत्व का झंडा लिए हुए बजरंग दल, और उसके संगी-साथी संगठन ईसाई घरों में इतवार की सुबह होने वाली सामान्य प्रार्थना सभाओं पर भी हमले कर रहे हैं, पुलिस मौजूदगी में ईसाईयों को पीट रहे हैं, और पुलिस है कि उन्हीं पर हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने, या धर्मांतरण करने के लगाए गए आरोपों पर जुर्म कायम कर रही है। अभी क्रिसमस के पहले बजरंग दल के लोगों ने रायपुर के एक मॉल में क्रिसमस की साज-सज्जा पर हिंसक हमला किया, और सांता क्लॉज की प्रतिमाओं को तोड़ा। इसके वीडियो पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ को भारी शर्मिंदगी दिला गए। लेकिन इसमें गिरफ्तार बजरंग दल के लोग अभी जब जेल से छूटकर बाहर आए, तो पगड़ी और माला पहनाकर उनका स्वागत किया गया। यह हिन्दुत्व के ईसाई धर्म पर हमले का एक नया आयाम है, जिसमें तमाम हमलों के वक्त पुलिस पॉपकॉर्न खाते हुए दर्शक की भूमिका निभाती है, और आखिर में हिन्दी फिल्म की पुलिस की तरह सायरन बजाते पहुंचती है।
भारतीय राजनीति की बोलचाल में गालियां और गंदी बातें थमने का नाम ही नहीं लेती हैं। एक किसी की बात पर बवाल थमता नहीं है, कि मानो उसे चुनौती मानते हुए कोई और नेता कहीं और गंदगी फैलाना शुरू कर देते हैं। अभी मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश के एक सबसे बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने प्रदेश के एक वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार के सवाल के जवाब में एक अश्लील गाली दे दी, और पत्रकार ने अपनी रीढ़ की हड्डी का इस्तेमाल करते हुए प्रदेश के इस मंत्री की भाषा को खुली चुनौती दी। नतीजा यह निकला कि चारों तरफ इस गंदी जुबान के वीडियो को देख-देखकर लोगों ने कैलाश विजयवर्गीय को इतना धिक्कारा कि सहमे और हड़बड़ाए मंत्री ने तुरंत अफसोस जाहिर कर दिया, लेकिन तब तक पूरे देश में मंत्री की बद्जुबानी का घंटा तो बज ही चुका था। अब बाकी देश में इस गूंज से कई लोगों के सामने एक चुनौती खड़ी हो गई थी, और दूसरे सर्टिफाइड बद्जुबान लोगों के बीच एक हीनभावना की लहर दौड़ पड़ी थी कि एक तरफ तो घंटे बज रहे हैं, और दूसरी तरफ वे अब तक कुछ भी नहीं बोल पाए हैं! ऐसे में भाजपा के एक दूसरे राज, उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के पति ने एक बयान देकर अपने को हीनभावना से तुरंत बाहर कर लिया। गिरधारी लाल साहू मंच और माइक से यह कहते हुए वीडियो पर दिख रहे हैं कि उत्तराखंड के नौजवानों की अगर शादी नहीं हो रही है, तो ऐसे चार-पांच नौजवान उनके साथ चलें, उनके लिए बिहार से लड़कियां ले आएंगे, जहां 20-25 हजार में लड़कियां मिल जाती हैं। बात की बात में यह वीडियो चारों तरफ फैल गया, और अब वही पुराना, तेरा बहाना के अंदाज में मंत्री-पति सफाई दे रहे हैं कि उनकी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। भाजपा के लिए असुविधा की बात यह भी है कि बिहार में वह सत्तारूढ़ गठबंधन की बराबरी की भागीदार है, और बिहार के भाजपाई गृहमंत्री इस सरकार में उपमुख्यमंत्री भी हैं। अब अगर भाजपा के राज में लड़कियां 20-25 हजार रुपए में बिक रही हैं, और दूसरे राज्य की भाजपा की महिला विभाग की महिला मंत्री का पति उन्हें थोक में खरीदने की बात कर रहा है, तो भाजपा इन दो राज्यों के बीच कौन सा स्टैंड लेगी?
न सिर्फ भाजपा, बल्कि राजनीति में कुछ दूसरी पार्टियों के कुछ दूसरे नेता भी आए दिन सार्वजनिक रूप से अपना मुंह इस तरह खोलते हैं कि मानो डॉक्टर को अपना रिसता हुआ बवासीर दिखा रहे हों। खासकर महिलाओं के बारे में बात करने का कोई मौका लगे, और कई लोग अपनी नीचता न दिखाएं, तो उन्हें मानो रात का खाना नहीं पचता होगा। एक बात तो यह समझ में नहीं आती कि किसी मंत्री के परिवार के बाकी लोगों को सार्वजनिक बद्जुबानी करने की इतनी हड़बड़ी क्या रहती है? छोटे-छोटे गांवों में तो सरपंच-पति की पुरानी और मजबूत परंपरा चली आ रही है जो कि आसानी से नहीं टूट रही है, लेकिन मोदी और शाह की पार्टी में दिल्ली के इतने करीब के राज्य की एक मंत्री का पति भी बद्जुबानी करे, यह बात कुछ अटपटी लगती है। साख तो यह है कि आज भाजपा में लीडरशिप की पकड़ फौलादी है, ऐसी साख के बीच बद्जुबानी के घंटे एमपी से उतराखंड तक बजते चले जाना कुछ अटपटा नहीं है?
फिर अब राजनीतिक दलों और राजनीति को पलभर के लिए छोड़ दें, तो भारतीय समाज में भी महिलाओं के लिए जो हिकारत है, वह गजब की है। लेकिन भारत को कोसने से भी थोड़ी देर के लिए अगर अलग हो जाएं, तो बाकी दुनिया में भी महिलाओं का हाल बहुत अच्छा नहीं है। दुनिया में जो जापान अपनी सबसे आधुनिक टेक्नोलॉजी के लिए जाना जाता है, उस जापान की एक ताजा खबर लोगों को हक्का-बक्का कर सकती है। अभी अक्टूबर के महीने में जापान को पहली महिला प्रधानमंत्री मिली है, और इस बार के संसद चुनाव में महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। लेकिन संसद की कार्रवाई शुरू होने के पहले महिला शौचालयों के बाहर सांसदों की लंबी कतारें लगती हैं, क्योंकि उनकी संख्या के मुकाबले शौचालय बहुत कम हैं। और जब संसद में यह हाल है, तो बाकी सरकारी दफ्तरों, मॉल्स, और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर हालत इससे भी अधिक खराब है। क्या हिंदुस्तान में महिलाओं की स्थिति पर हमारी तरह अफसोस जाहिर करने वाले लोगों को भी जापान की यह जानकारी पाकर हैरानी नहीं होगी कि जापान की निर्वाचित संसद की 73 महिला सांसदों के लिए दो केबिन वाला एक ही शौचालय है। मतलब यह कि एक वक्त में कुल दो महिलाएं फारिग हो सकती हैं, और यह व्यवस्था जापान की इस संसद में 1936 से चली आ रही है। अब इस देश में अधिकतर जगहों पर महिलाओं के शौचालयों को लेकर यही नौबत है। संसद भवन में महिला शौचालय बढ़ाने की मांग को लेकर महिला प्रधानमंत्री सहित करीब 60 महिला सांसदों ने एक मांगपत्र पर दस्तखत किए हैं। एक सबसे विकसित देश होने के बावजूद लैंगिक असमानता के मामले में वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में जापान इस साल 148 देशों में 118वें नंबर पर रहा। भारत की नई संसद में हालत इसके मुकाबले बहुत अच्छी है, लेकिन लोगों का अंदाज है कि अभी ताजा-ताजा बनी हुई इस इमारत में भी सुधार की गुंजाइश है। अब जब कुछ बरसों के भीतर सांसदों में से अनिवार्य रूप से 30 फीसदी महिलाएं रहेंगी, तब भारतीय संसद में महिला शौचालयों की क्षमता कहीं चुक न जाए।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में तमनार इलाके में जिंदल की एक कोयला खदान के लिए हो रही जनसुनवाई के दौरान एक महिला पुलिस अधिकारी को भीड़ ने, मोटे तौर पर महिलाओं ने बुरी तरह पीटा था। दो-तीन दिन पहले आए उसके वीडियो ने भी लोगों को हिला दिया था। लेकिन जब कई महिलाएं पीट रही थीं, वर्दी पहनी हुई थाना प्रभारी नीचे गिर गई थी, तब उसी भीड़ में से कम से कम कुछ महिलाएं दूसरों को रोक रहीं थीं, और इस महिला पुलिस अधिकारी को पानी दे रही थीं। खैर, वह जनसुनवाई प्रशासन ने भी कड़ा जनविरोध देखते हुए रद्द कर दी, खुद जिंदल ने जनसुनवाई का आवेदन वापिस ले लिया, और बात आई-गई हो गई लग रही थी। महिला अधिकारी से मारपीट करने वाले लोगों के खिलाफ जुर्म दर्ज हो गया था, उनकी गिरफ्तारी भी चल रही थी। इस बीच दो दिन पहले एक नया वीडियो आया जिसमें भीड़ के हमले से निकलकर इस मौके से हट रही एक महिला सिपाही को पुरूष हमलावरों की भीड़ ने एक खेत में घेरकर गिरा दिया, उसे बुरी तरह से मारा, इसका वीडियो भी बनाया जिसमें उसे चप्पल से मारने वाला हिस्सा भी रिकॉर्ड है। लेकिन इन सबसे परे इस महिला सिपाही के कपड़े बुरी तरह फाड़ दिए गए, और वह अपने बदन को ढांकने की कोशिश करते हुए गिड़गिड़ाती रही, रोकर कहती रही कि वह दुबारा नहीं आएगी, लेकिन हमलावर मर्द थे कि उसके कपड़े फाड़े जा रहे थे, उसे मारे जा रहे थे। जिन लोगों ने यह वीडियो देखा है, वे हिल गए हैं कि पुलिस सिपाही जैसी छोटी सी एक नौकरी करते हुए किस तरह एक महिला की जान पर बन आई, और किस तरह पेशेवर मुजरिमों ने नहीं, गांव के आम लोगों ने उसके कपड़ों के चिथड़े उड़ा दिए, और मर्दों की भीड़ एक अकेली औरत को इस बुरी तरह मारती रही।
भीड़ अगर किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस पार्टी से जूझती है, तो वह बात फिर भी समझ आती है। लेकिन एक अकेली निहत्थी महिला सिपाही को घेरकर उसके साथ जब कई लोग ऐसा हिंसक और अश्लील बर्ताव करते हैं, तो यह उनके भीतर की हैवानियत का सुबूत है। जानकार लोग बताते हैं कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता। लेकिन यहां पर भीड़ उस तरह की भी नहीं थी, यहां पर तो हमलावर प्रदर्शनकारी मर्दों का एक जत्था था, एक छोटा सा गिरोह था जो अपनी तमाम अपूरित कुंठाओं को एक महिला पर भी निकाल रहा था, और एक पुलिस पर भी। जबकि तमनार के इस पूरे प्रदर्शन में ऐसा भी नहीं कि पुलिस ने बहुत अधिक बल प्रयोग किया हो, बहुत से लोगों को मार डाला हो, और विचलित लोगों ने एक महिला सिपाही के साथ ऐसी हरकत की हो। यह तो लोगों पर कोई खतरा भी नहीं था, और किसी खेत में एक महिला को गिराकर आधा एक दर्जन मर्द उसके साथ ऐसा हिंसक बर्ताव कर रहे थे। ये प्रदर्शनकारी नक्सलियों की तरह के हिंसा के आदी भी नहीं थे, लेकिन एक जानकारी पुलिस अफसर के मुताबिक आंदोलनकारियों में से बहुत से लोग बुरी तरह नशे में थे।
नशा छत्तीसगढ़ की एक इतनी बड़ी बीमारी बन गया है कि दोस्तों के बीच कत्ल हो रहे हैं, भाई भाई को मार रहे हैं, कई जगहों पर आल-औलाद मां-बाप को मार रही है, और कुछ मौकों पर तो थके हुए मां-बाप ने नशेड़ी बेटे को भी मार डाला है। नशे में नाबालिग लडक़े भी हर किस्म की हिंसा कर रहे हैं, वे बलात्कार और सामूहिक बलात्कार कर रहे हैं, वे कत्ल कर रहे हैं, किडनैप कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ नशे में इस तरह डूब गया है कि बाप बेटी से बलात्कार कर रहा है, शिक्षक और हेडमास्टर मिलकर छात्रा से बलात्कार कर रहे हैं, और कोई लडक़ा अपनी गर्लफ्रेंड को बुलाकर अपने दोस्तों के साथ मिलकर उससे बलात्कार कर रहा है। ऐसे अधिकतर मामलों में हिंसक मुजरिम किसी न किसी नशे में डूबे हुए रहते हैं, शराब का नशा तो आसानी से दिख जाता है, लेकिन इनमें से कई लोग दूसरे किस्म का नशा भी अब करने लगे हैं जो कि छत्तीसगढ़ में धड़ल्ले से प्रचलित हो रहा है। एक जानकार का कहना है कि जब तक शराब ठेके निजी हाथों में रहते थे, तब तक हर ठेकेदार इस बात की फिक्र करता था कि उसके इलाके में किसी और तरह के नशे का धंधा न हो, क्योंकि इससे उसके पेट पर लात पड़ती थी। लेकिन अब तो सरकार खुद ही दारू बेचने पर एकाधिकार रखती है, अब अपने-अपने ठेका इलाके में नशे के धंधे पर निगरानी रखने वाले दारू ठेकेदार भी नहीं रह गए। वैसे भी पुलिस हर दिन शराब से परे के गैरकानूनी नशे के जितने कारोबारियों को रोज पकड़ती है, उससे यह समझ आता है कि पकड़ में आने वाले मामलों से कम से कम सौ गुना अधिक मामले तो पकड़ में न आने वाले रहते होंगे, और चाहे अभी तक छत्तीसगढ़ पर पंजाब की तरह की फिल्म न बनी हो, छत्तीसगढ़ उड़ रहा है।
नशे से सरकार को इतनी मोटी कमाई होती है कि सरकारों की कोई भी नीयत इस धंधे को घटाने की नहीं रहती। अगर हमारा अंदाज सही है, तो बीते बरसों में लगातार छत्तीसगढ़ की आबादी के अनुपात में भी शराब की बिक्री बढ़ती चली जा रही है। फिर यह बात भी है कि दूसरे प्रदेशों से तस्करी से आने वाली शराब, छत्तीसगढ़ के शराब कारखानों में अभी भी धड़ल्ले से बनने वाली दो नंबर की टैक्स चोरी की शराब का कोई हिसाब-किताब सरकारी आंकड़ों में तो दिखता नहीं है। इन सबको अगर जोड़ दिया जाए, तो भी ये आंकड़े भयानक हो जाते हैं। फिर दूसरे कई किस्म का नशा तो किसी भी सरकारी आंकड़ों में आ नहीं सकता। हर गली-मोहल्ले की किराना दुकान में बिकने वाले, पंचर बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन की ट्यूब बिकती है, और कचरा बीनने वाले, बेघर फुटपाथी बच्चे इसी ट्यूब से केमिकल निकालकर सूंघकर नशा करते हैं, और सुबह से टुन्न रहते हैं। ऐसे बच्चे बड़े होने तक माहिर मुजरिम हो जाते हैं, और नाबालिग रहते-रहते वे गिरफ्तार होकर बाल सुधारगृह का फेरा लगा चुके रहते हैं, जहां पर दूसरे कई किस्म के जुर्म के प्रशिक्षक नाबालिग बच्चे उनका ग्रेजुएशन करवाने के लिए तैयार रहते हैं।
अमरीका के फायनांस कैपिटल न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर जोहरान ममदानी ने अभी पद की शपथ ली है। वे पिछले सौ साल के सबसे कम उम्र के मेयर भी बने हैं। भारत के लोगों के लिए यह बात कुछ अटपटी हो सकती है कि न्यूयॉर्क की घड़ी के मुताबिक नए साल में दाखिल होते हुए आधी रात उन्होंने शपथ ली। और एक अलग खबर बताती है कि इसके साथ ही न्यूयॉर्क शहर के टाइम्स स्क्वेयर में नए साल का जलसा मनाने के लिए दस लाख लोगों के इक_ा होने का अंदाज था। इतनी भीड़ के बीच हवा में इस बात की तनातनी भी थी कि डेमोक्रेटिक पार्टी के इस नौजवान मेयर ने कई और रिकॉर्ड भी तोड़े थे। अमरीकी राष्ट्रपति किसी मेयर उम्मीदवार के खिलाफ अपनी पूरी ताकत से जुट गया था, और शहर को यह धमकी दी थी कि इस मुस्लिम नौजवान को अगर मेयर बनाओगे तो अमरीकी सरकार शहर की कोई मदद नहीं करेगी। इसके बावजूद ममदानी शानदार तरीके से जीतकर आए। एक भारतवंशी परिवार के होने के बावजूद भारत से बहुत लोगों ने उन्हें बधाईयां नहीं दी थीं, क्योंकि वे भारत के कुछ घरेलू मामलों को लेकर आलोचना कर चुके थे। 34 बरस के इस नौजवान ने यह गजब का मुकाबला किया था जिसमें डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से वह अकेले लड़ रहा था, और रिपब्लिकन उम्मीदवार की तरफ से राष्ट्रपति ट्रंप खुद लड़ रहे थे। जिन लोगों को पता न हो वे जान लें कि जोहरान ममदानी की मां मीरा नायर भारतीय मूल की एक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त फिल्म निर्देशक हैं, और उनके पति महमूद ममदानी भी भारतीय मूल के ही हैं।
वैसे तो अमरीका के एक शहर के मेयर की कामयाबी इतनी अहमियत नहीं रखती कि हम हिंदुस्तान के अखबार में उस पर विचारों के इस कॉलम में लिखें, लेकिन किस तरह विपरीत परिस्थितियों के बीच भी कामयाबी पाई जा सकती है, सीधे आसमान में छेद करने के लिए एक पत्थर उछाला जा सकता है, यह जोहरान ममदानी की कामयाबी से सामने आया है। यह वही शहर है जहां 2001 में दुनिया के सबसे बड़े आंतकी ओसामा बिन लादेन के विमानों ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर की जुड़वां इमारतों को टक्कर मारकर उन्हें जमीन से मिला दिया था, और हजारों लोग मारे गए थे। दुनिया के इतिहास में उतना बड़ा कोई आतंकी हमला हुआ नहीं था, और अमरीका की उससे बड़ी कोई बेइज्जती नहीं हुई थी। ऐसे न्यूयॉर्क शहर में 25 बरस गुजरने के पहले ही एक मुस्लिम नौजवान ट्रंप की चुनौती को झेलते हुए जिस अंदाज में इस शहर का मेयर बना है, वह देखने लायक है। न्यूयॉर्क शहर दुनिया में सबसे अधिक मिलवा आबादी वाला शहर है, यानी यहां पर हर धर्म, रंग, राष्ट्रीयता के लोग हैं। यहां की मुस्लिम आबादी करीब 9 फीसदी है, जो कि ऐसा कोई चुनाव जीतने लायक नहीं है। जब तक भरपूर संख्या में दूसरे धर्मों के लोगों ने जोहरान को वोट नहीं दिया होगा, तब तक वह जीत नहीं सकता था।
आज की यह बातचीत कुछ तो इस नौजवान मेयर के बारे में है जिसने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, और उसके पहले के भी डेमोक्रेटिक पार्टी के अपने राजनीतिक इतिहास में भी कभी अपने मुस्लिम होने की बात नहीं छुपाई, कभी इस्लाम के प्रति अपनी आस्था नहीं छुपाई। उसने इन बातों को खुलकर सामने रखा, उसके बावजूद किसी मुस्लिम आतंकी के धरती पर खड़े किए गए सबसे गहरे जख्म वाले इस शहर ने एक मुस्लिम मेयर चुना। यह बात कुछ तो जोहरान की तारीफ में है, और बाकी पूरी तारीफ का हकदार यह न्यूयॉर्क शहर है जिसने 11 सितंबर के उस कुख्यात हमले के जख्म अब तक रिसना जारी नहीं रखा है, उससे ऊबर गया है।
भारत में अभी कुछ हफ्ते पहले एक शहर में कुछ नाबालिग स्कूली छात्रों को पकड़ा गया जो कि पाकिस्तान स्थित इस्लामिक आतंकियों के प्रचार के झांसे में आ गए थे। टेलिफोन और तरह-तरह के दूसरे मैसेंजरों पर इनके संदेश पकड़ाए, तो देश की खुफिया एजेंसी ने इन पर निगरानी रखना शुरू किया, और सुबूत जुटते चले गए। यह किस प्रदेश के किस शहर में हुआ है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि हिंदुस्तान के कुछ मुस्लिम बच्चे ऐसे झांसे में आ गए, और वे इंटरनेट पर डार्क वेब पर हथियारों के बारे में भी पूछताछ करने लगे। जब जांच एजेंसियों ने इन बच्चों से पूछताछ की, तो पता लगा कि इन्हें स्कूल में दूसरे बच्चे इनके धर्म की वजह से चिढ़ाते रहते थे, परेशान करते थे, पाकिस्तानी और आतंकी कहते थे, इन सबकी वजह से इनके मन में बड़ा रंज था, और सोशल मीडिया के रास्ते ऐसे रंज पर नजर रखने वाले पाकिस्तानी एजेंटों ने इन तक पहुंच की, और इनका ब्रेनवॉश किया। खतरा यह भी था कि इन बच्चों के मन में रंज इतना था कि वे हथियार पाकर हिंसा करने की सोच रहे थे। अब देश के कानून के तहत किसी नाबालिग पर जो भी कार्रवाई हो सकती है, वह कार्रवाई जांच एजेंसियां करेंगी, लेकिन इस नौबत के बारे में भी सोचना चाहिए कि स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के मन में दूसरे बच्चों को धर्म को लेकर इस तरह के हमले करना सूझता कहां से है, उनके मन में यह जहर आता कहां से है कि किसी धर्म के बच्चों को आतंकी कहकर पाकिस्तान जाने को कहा जाए।
अभी हफ्ते भर में ही हमने इस बात पर भी लिखा है कि स्कूली बच्चों को अखबार पढ़ाना यूपी में शुरू किया गया है, और कुछ दूसरे प्रदेश ऐसा करने का सोच रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि अखबारों में अगर बच्चों को भडक़ाने वाली ऐसी खबरें छपेंगी, और उन्हें स्कूलों में औपचारिक रूप से पढ़ाया जाएगा, या अखबार पढऩे को कहा जाएगा, तो उनके मन में दुनिया की जानकारी आएगी, या अपने देश के लिए जहर आएगा? इस खतरे के बारे में हम अपने इस कॉलम में, और अपने यू-ट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार लिखते-बोलते हैं कि अगर आहत आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा भी रंज में बदला लेने पर ऊतारू हो जाएगा, तो न तो ऐसे हर व्यक्ति की शिनाख्त हो सकेगी, न ही ऐसे हर व्यक्ति को समय रहते रोका जा सकेगा। पूरी दुनिया में जगह-जगह बिना किसी बड़े संगठन से जुड़े हुए अकेले हमलावर बहुत सा नुकसान कर देते हैं। अमरीका में तो हर बरस दर्जनों ऐसी गोलीबारी होती है जो एक अकेला निराश, हताश, या आक्रोशित व्यक्ति कोई ऑटोमेटिक बंदूक लेकर कर देता है, और एक-एक घटना में कई लोग मारे जाते हैं। अभी ऑस्ट्रेलिया में एक यहूदी त्यौहार के वक्त भारत से ऑस्ट्रेलिया जाकर बसे एक मुस्लिम आदमी ने अपने जवान बेटे के साथ मिलकर यहूदियों को मारने की नीयत से गोलीबारी की, और 15 लोगों को मार डाला। ऐसे लोगों को दुनिया में लोन-वुल्फ कहा जाता है, यानी एक अकेला भेडिय़ा जो कि मनमाने हमले कर देता है। (यह शब्दावली अंग्रेजी में इस्तेमाल होती है, हालांकि इसे गढऩे वाले लोगों को ऐसा एक भी भेडिय़ा नहीं मिलेगा जो इस किस्म का खून-खराबा करता होगा।) भारत में अभी जिन बच्चों को आतंकी प्रचार का शिकार पाया गया है, उन बच्चों के बारे में ऐसी गारंटी कौन ले सकते हैं कि वे ऐसे प्रचार के झांसे में नहीं आएंगे, और आगे कोई हिंसा नहीं करेंगे? आज तो पंजाब जैसे सरहदी राज्यों से हर हफ्ते खबरें आती हैं कि किस तरह पाकिस्तान से नशा, और हथियार लेकर ड्रोन आते हैं, उन्हें सुरक्षा एजेंसियां कभी पकड़ लेती हैं, गिरा लेती हैं, लेकिन हो सकता है कि ऐसे आने वाले हथियार इस देश के भीतर पाकिस्तान के कुछ एजेंट किसी तबके के बेचैन लोगों तक पहुंचाएं, और उन्हें आतंकी हमला करने के लिए उकसाएं। अभी कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में लाल किले के इलाके में जो विस्फोट हुआ था, उससे जुड़े हुए तमाम तार कश्मीर और यूपी के कई मुस्लिम डॉक्टरों और दूसरे लोगों तक पहुंचे ही थे जिनकी गिरफ्तारियां हुई हैं, और वे आतंकी हमलों की तैयारी में थे। अब उनके पास बड़ी मात्रा में विस्फोटक पहुंचे थे, शायद दूसरे हथियार भी जब्त हुए थे। जहां तक हथियारों की बात है, तो भारत की हर तरफ की जमीनी सरहद उससे नाखुश देशों से ही घिरी हुई है। बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, और पाकिस्तान, किसी भी तरफ से, या हर तरफ से हथियार यहां आ सकते हैं। हथियारों का अपना कोई धर्म नहीं होता, उनकी अपनी कोई विचारधारा भी नहीं होती। और यह भी जरूरी नहीं है कि इन देशों की सरकारें ही वहां से ये हथियार भेजें, इन देशों के कारोबारी भी किसी आतंकी संगठन से भुगतान पाकर ऐसे हथियार तस्करी से भारत पहुंचा सकते हैं, शायद पहुंचा भी रहे हैं। मणिपुर जब जल रहा था, उस वक्त वहां के लोगों के हाथों में ढेरों गैर-कानूनी हथियार थे, जो कि जाहिर तौर पर सरहद पार से आए हुए लगते थे।
एआई के बारे में लिखते हुए थकने की नौबत ही नहीं आती। जब तक आज का यह संपादकीय लिखना पूरा होगा, तब तक दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस में कई और चीजें इतनी जुड़ चुकी होंगी, कि आज की आखिरी लाईन लिखने के बाद कल के लिए पहली लाईन लिखना फिर शुरू किया जा सकता है। अब एक खबर यह आई है कि एआई से तरह-तरह के वीडियो बनाकर लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, और उन्हें बड़ी संख्या में दर्शक मिल रहे हैं। यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की संख्या से ही कमाई जुड़ी रहती है, जितने अधिक दर्शक, उतनी ही अधिक कमाई, इसलिए इस प्लेटफॉर्म पर लोगों का अकेला मकसद अधिक से अधिक दर्शक पाना रहता है। इस काम में लोग पहले से वीडियो बनाते आए हैं, लेकिन अब एआई की मदद से घटिया वीडियो बनाकर इंसानों के बनाए हुए असली वीडियो से अधिक कमाई हो रही है। अभी अमरीका में किए गए एक शोध में यह पता लगा है कि भारत में ऐसा एक चैनल, बंदर अपना दोस्त, है जो भारत में सबसे अधिक देखा जा रहा है, और 240 करोड़ बार देखे गए इसके वीडियो की वजह से इसे 35 करोड़ तक कमाई का अंदाज है। कहने के लिए एआई की मदद से बनाए गए घटिया वीडियो को स्लॉप कहा जाता है, यानी कचरा या बेकार। लेकिन ऐसे वीडियो धड़ल्ले से चल रहे हैं, और सच तो यह है कि ये इंसानों के हक को भी खा रहे हैं।
एआई वीडियो शुरू होने के पहले एक वीडियो बनाने के लिए, लेखक, कैमरापर्सन, एंकर, एडिटर, कई लोग लगते थे, संगीत देने वाले लगते थे। अब एआई अकेला ही मुफ्त में ये सारे काम कर दे रहा है। और तो और कंटेंट भी एआई सुझा देता है, उस पर आपके कोई सुझाव हों, तो उन्हें तुरंत ही जोड़-घटाकर वह पलक झपकते नया कटेंट बना देता है। हम अपने इस अखबार में संपादकीय के लिए कभी विषय तलाशते हुए अलग-अलग एआई औजारों से कहते हैं कि कोई विचारोत्तेजक विषय एडिटोरियल, या वीडिटोरियल के लिए 25-25 शब्दों में सुझाएं, तो एआई आधे मिनट के भीतर ही ऐसे 25 विषय सुझा देता है, और कभी-कभी इनमें से कोई विषय काम का रहने पर उसके बारे में और विस्तार से पूछने पर भी वह जानकारी दे देता है। ऐसी जानकारी हम अपने संपादकीय पेज पर एक लेख की तरह चैटजीपीटी के हवाले से, उससे मिलते-जुलते एक काल्पनिक नाम, चित्रगुप्त नाम से प्रकाशित भी कर देते हैं। लेकिन हम तो बिल्कुल ही बचकानी पूछताछ करते हैं, असली पेशेवर लोग तो एआई का इस्तेमाल धोबी की गधे की तरह खूब सारा बोझ लादकर करते हैं, और वे उससे वीडियो, संगीत, सभी कुछ बनवा लेते हैं। अब जो होनहार या प्रतिभाशाली, मौलिक और रचनात्मक लोग अभी तक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालते थे, उनके पेट पर एआई की लात बड़ी जोर की पड़ी है। कहने के लिए तो इंटरनेट पर सभी के लिए बहुत सी जगह है, लेकिन दुनिया की आबादी तो सीमित है, और उनमें से जिन लोगों की पहुंच इंटरनेट तक है, उनकी जिंदगी इस काम के लिए घंटे भी सीमित हैं। अब उन घंटों को अगर एआई-सामग्री चुराने लगे, तो जिनका पेट और मुंह है, वे तो भूखे रह जाएंगे। यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है, आगे यह कहां तक पहुंचेगा, इसका ठिकाना नहीं है। एआई से बनाए हुए बंदर के कुछ वीडियो हमने भी देखे हैं, उसमें बड़ी तीखी राजनीतिक बातों की वजह से लोग बंधे रह जाते हैं, और उन मुद्दों पर कुछ और देखने-सुनने की उनकी जरूरत बाद में कम रह जाती है।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय सिंह ने अपनी सालाना आदत के मुताबिक मधुमक्खी के छत्ते में जोरों से एक पत्थर मारा। उन्होंने एक पुरानी फोटो पोस्ट की जिसमें भाजपा के एक सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी गुजरात के किसी कार्यक्रम में कुर्सी पर बैठे हैं, और उनके ठीक सामने से नीचे बैठने वालों का सिलसिला शुरू हो रहा है जिसमें पहले ही नंबर पर, आडवाणीजी के पैरों के पास नरेंद्र मोदी बैठे हुए हैं। बाकी नेता भी पीछे दिख रहे हैं। दिग्विजय ने इस फोटो को पोस्ट करते हुए लिखा- यह चित्र बहुत ही प्रभावशाली है, किस प्रकार आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक व जनसंघ का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठकर प्रदेश का मुख्यमंत्री, और देश का प्रधानमंत्री बना। यह संगठन की शक्ति है। जय सियाराम।
अब कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के ठीक पहले दिग्विजय का यह फोटो पोस्ट करना जिन लोगों को बहुत मासूम हरकत लग रही होगी, उन्हें दिग्विजय की काबिलीयत का अंदाज नहीं है। इस पोस्ट से लेकर कार्यसमिति की बैठक निपट जाने तक यह सुगबुगाहट चलती रही कि क्या दिग्विजय कांग्रेस संगठन में बदलाव की तरफ इशारा कर रहे हैं? कांग्रेस पार्टी ने औपचारिक रूप से दिग्विजय के एक और बयान को सिरे से खारिज कर दिया, और कहा कि कांग्रेस और भाजपा में फर्क है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी गिना दिया कि कांग्रेस कभी धर्म की राजनीति नहीं करती। इसके बाद कांग्रेस के एक स्थायी असहमत, असंतुष्ट, और बागी माने जाने वाले सांसद शशि थरूर भी एक कार्यक्रम में दिग्विजय के साथ बैठे मिले। लोगों ने दो और दो चार जोड़कर यह अटकलें भी लगाईं कि क्या अब कांग्रेस के एक पुराने चुनाव चिन्ह की तरह यह बागी बैला-जोड़ी बन रही है? कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने दिग्विजय के बयान पर आरएसएस को नाथूराम गोडसे से जोड़ा और कहा कि जो संगठन गोडसे के नाम से जाना जाता है, वह गांधी की ओर से बनाए गए संगठन को क्या सिखा सकता है? कांग्रेस के एक और नेता मणिकम टैगोर ने दिग्विजय की पोस्ट को सेल्फ-गोल बताया, और कहा कि आरएसएस से सीखने की कोई जरूरत नहीं है, जो कि नफरत पर बना है, नफरत फैलाता है। उन्होंने कहा कि आप अलकायदा से क्या सीख सकते हैं? लेकिन कांग्रेस के एक और नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि दिग्विजय पूरी तरह पार्टी लीडरशिप के साथ हैं, और हम सभी आरएसएस की विचारधारा को खारिज करते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने पार्टी के औपचारिक रुख को बताते हुए कहा कि कांग्रेस को गोडसे के संगठन आरएसएस से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।
दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर समय-समय पर अपने कई बयानों को पार्टी की तरफ से खारिज पाते रहे हैं। फिर भी वे मानो अपनी एक अलग सोच सामने रखने के लिए सालाना लीज नवीनीकरण करवाते रहते हैं। कांग्रेस का भी हक है कि अपने नेताओं को समय-समय पर झिड़की देते रहे, और उसने किसी नेता के बयान के गुण-दोष को देखे बिना भी उसे खारिज करने पर महारत हासिल कर रखी है, कई दूसरी पार्टियों की तरह। अब ऐसे में दिग्विजय की कही बात के तर्क को सुनने और समझने वाले कांग्रेस पार्टी में अगर कोई होंगे भी, तो भी उनके सामने चुप रहने की मजबूरी है। दूसरी कई बड़ी पार्टियों की तरह कांग्रेस में भी लीडरशिप के खिलाफ कुछ कहने का रिवाज रह नहीं गया है।
अभी चार दिन ही हुए हैं, कांग्रेस के भीतर से यह आवाज उठी थी कि प्रियंका गांधी को पार्टी की लीडरशिप देनी चाहिए। फिर मानो यह बात कांग्रेस के प्रथम-परिवार के भीतर दरार की अफवाहें पैदा करने के लिए काफी न हों, प्रियंका के विवादास्पद पति, रॉबर्ट वाड्रा ने सार्वजनिक रूप से कहा कि चारों तरफ से यही मांग है, और आज उनके खुद के भी राजनीति में आने की जरूरत है...
कुल मिलाकर प्रियंका के किसी चापलूस ने, और प्रियंका के पति ने मिलकर ऐसी किसी दरार की अफवाहों को पुख्ता कर दिया। अब राहुल गांधी अपनी अब तक की बड़ी अस्पष्ट लीडरशिप क्षमता के चलते हुए सवालों के घेरे में रहते आए हैं, लोकसभा में प्रियंका के एक दो धांसू भाषणों को देखते हुए उन्हें पार्टी का लीडर बनाने की अफवाहें जोर पकड़ रही हैं। मतलब यह कि पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पार्टी की सबसे वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, पार्टी के चार दिन पहले तक भविष्य समझे जा रहे राहुल गांधी, और अब पार्टी की एक नई संभावना बताई जा रही प्रियंका गांधी के बीच लीडरशिप की धुंध और गहरा गई है।
-सुनील कुमार
छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश में अतिचर्चित और घोर विवादास्पद चमत्कारी कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ऊर्फ बागेश्वर सरकार को लेकर पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के भूपेश बघेल ने एक मोर्चा खोला है। आमतौर पर भारतीय राजनीति के लोग धर्म के चोले में रहने वाले किसी भी किस्म के इंसान से पंगा नहीं लेते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के प्रभाव में उनके धर्म या संप्रदाय के काफी वोटर होने की आशंका नेताओं को रहती है, और किसी धर्मगुरू, कथावाचक, या चमत्कारी चोले से टक्कर लेना चुनावी राजनीति वाले नेता के लिए एक खतरा माना जाता है। फिर भी भूपेश बघेल ने धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर एक असाधारण हल्ला बोला है, और उसे इस राज्य की कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से भी जोड़ दिया है। भूपेश का कहना है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री धार्मिक आयोजनों की आड़ में पैसा बटोरने छत्तीसगढ़ आते हैं, और वे भाजपा के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं। भूपेश के इस बयान पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, और डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने जवाबी हमला बोला है। सीएम ने कहा है कि उन्हें राजनीतिक दल का एजेंट कहना न केवल एक संत का अपमान है, बल्कि सनातन धर्म की परंपरा पर भी प्रहार है।
भूपेश बघेल का बाकी बयान भी गौर करने लायक है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं हनुमान चालीसा पढ़ रहा हूं, वह कल का बच्चा है, मेरे बेटे से भी उम्र में दस साल छोटा है, और वह हमें सनातन धर्म सिखाने चला है। उन्होंने कहा कि अगर दिव्य दरबार में लोग ठीक हो रहे हैं, तो फिर मेडिकल कॉलेज खोलने की जरूरत क्यों पड़ रही है? उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती कबीर साहेब और गुरू घासीदास की आध्यात्मिक परंपरा की है, यहां किसी बाहरी व्यक्ति से सीखने की जरूरत नहीं है। भूपेश ने यह भी कहा है कि कथावाचक यहां आकर अंधविश्वास फैलाते हैं।
अब पता नहीं बेलपत्री में शहद लगाकर शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद परीक्षा पास करने के लिए पढ़ाई की जरूरत न रहने की बात को भूपेश कैसे अंधविश्वास कह रहे हैं? जिस प्रवचनकर्ता की बात पर लाखों लोगों को भरोसा है, उसके दावे को देखते हुए स्कूल-कॉलेज की जरूरत भी क्यों होनी चाहिए?
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री नाम का यह नौजवान अपनी जुबान की वजह से खबरों में बने रहता है, और खासकर इलेक्ट्रॉनिक समाचार चैनलों की लार टपकती रहती है कि इस बाबा के मुंह से क्या निकले, उसमें कौन से गिने-चुने सनसनीखेज, आपत्तिजनक, अपमानजनक, भडक़ाऊ, विवादास्पद, और ओछे शब्दों वाले हिस्से को काटकर बार-बार, बार-बार दिखाया जाए। शायद टीवी चैनलों की ऐसी लार ही रहती है जिस पर फिसलना बड़बोले लोगों को अच्छा लगता है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जिस तरह की भाषा में धर्म के बारे में कहते हैं, उससे तो देश के शंकराचार्य भी हक्का-बक्का हैं, यह एक अलग बात है कि अब शंकराचार्यों के नाम पर भीड़ उतनी नहीं जुटती है क्योंकि वे उतनी छिछोरी जुबान में नहीं बोल पाते। अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के भिलाई में अपने प्रवचन या कथावाचन, जो भी कहें, उसके बीच धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने पत्रकारों के बारे में जिस गंदी जुबान में कहा, वह भी गौर करने लायक है कि धर्म के नाम पर चल रहे कार्यक्रम में जैसी भाषा, जैसी चुनौती, चेतावनी, और धमकी वे देते हैं, क्या वह किसी भी धर्म के गौरव को बढ़ाने वाली भाषा है? जिन लोगों को लगता है कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री हिंदुओं को जोडऩे का काम कर रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि क्या वे भारतीय समाज को तोडक़र हिंदुओं को उसके एक टुकड़े के रूप में एक टापू में जोडऩे की कोशिश नहीं कर रहे हैं? भारत का सांस्कृतिक इतिहास सभी धर्मों के ताने-बाने का रहा है, आज उसमें से हिंदुओं को अलग कर लेने, या दूसरे धर्म के लोगों को निकाल देने से, महज ताने-ताने, या महज बाने-बाने बच जाएंगे, देश नाम का यह कपड़ा नहीं रह जाएगा।
हम भूपेश बघेल के उठाए किसी मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे, वे सक्रिय राजनीति में हैं, और अपने बयान पर आए हुए जवाबों का जवाब देने के लिए जरूरत से अधिक ही सक्रिय रहते हैं। लेकिन मैं धर्म और राजनीति के घालमेल के बारे में जरूर बोलना चाहूंगा, और यह बात किसी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री तक सीमित नहीं है, जब यह नौजवान पैदा भी नहीं हुआ था, उसकी सौ-पचास पीढिय़ां पहले के उसके पुरखे रहे होंगे, तब भी इस दुनिया में धर्म और राजनीति की पार्टनरशिप फर्म कामयाबी से काम कर रही थी। उसे रजिस्टर इसीलिए करवाया गया था कि ये दोनों एक-दूसरे को पाल-पोस सकें। धर्म की जनता को झांसा देने की अपार क्षमता राजाओं के भी पहले कबीलों के सरदारों को भी सुहाती रही है। जब कुछ सौ या हजार लोगों के कबीले रहते थे, तब भी वहां का सरदार मंतर पढऩे वाला कोई ओझा, बैगा, गुनिया रखता था, जो लोगों को बरगलाते रहता था कि राजा का साथ किसलिए देना चाहिए। बाद के बरसों में जब औपचारिक राजपाठ कायम हुआ, तब राजा ने औपचारिक धर्म की स्थापना की, उसका विस्तार किया, उसे स्थापित किया।
मुझे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है, ऐसे कई बुलबुले इस महान देश के इतिहास में हवा में उठे और वक्त के साथ फूट गए। फूटने के पहले तक वे किसी बड़े से बुलबुले की तरह चमकदार रंगों वाले भी रहे, और लोग उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब अविभाजित मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ के अलग होने का दौर था, और भोपाल से उस वक्त के छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर मंत्री सत्यनारायण शर्मा एक रावतपुरा सरकार नाम के प्राणी को ले आए थे, उसका यहां पर आश्रम स्थापित कर दिया था, और रातों-रात हजारों कांग्रेसी इस सरकार के अंदाज में ही सिर पर पगड़ीनुमा गमछा बांधने लगे थे। उस वक्त कांग्रेस के लोगों को लगता था कि राज्य बनेगा तो सत्यनारायण शर्मा शायद मुख्यमंत्री बनेंगे। और भावी मुख्यमंत्री जिसे गुरू मानें, उसे राजनीति के लोग अपना महागुरू मान लेते हैं। ऐसे में रावतपुरा सरकार नाम से प्रचलित रविशंकर महाराज का गौरवगान छत्तीसगढ़ में इतना चला कि रायपुर में उनके कार्यक्रम के लिए एक बड़े आईपीएस अफसर ने पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के सैकड़ों प्रशिक्षु सिपाहियों की ड्यूटी इस कार्यक्रम में लगा दी थी। अभी तो इस नौजवान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के आगमन पर पुलिस के उस इलाके के टीआई ने जूते उतारकर, टोपी उतारकर बागेश्वर महाराज की चरणरज पाकर अपना जीवन धन्य किया था, लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाले लोगों को अभी महज 25 बरस पहले इसी राज्य में रावतपुरा सरकार का डंका-मंका भूल गया है। आज रावतपुरा सरकार की हालत यह है कि अपने मेडिकल कॉलेज के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन को रिश्वत देते हुए वे टेलीफोन कॉल और संदेशों में कैद हैं, और सीबीआई ने अदालत में जो चार्जशीट पेश की है, उसमें उनका नाम भी सजा हुआ है। अब पता नहीं अदालत में उनकी पेशी पर उनके लिए मंच बनाकर सिंहासन लगाया जाएगा, या कटघरे में उनकी पूजा होगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि रावतपुरा सरकार पूरी तरह से कांग्रेसी थे, और इसलिए मोदी की सीबीआई ने उन्हें धांस दिया है। अब मोदी की सीबीआई हो या ट्रंप का सीआईए, कोई एजेंसी भला किसी को रिश्वत देने पर मजबूर कर सकती है? और अगर रावतपुरा सरकार के ऐसे ही चमत्कार थे, तो फिर लोगों को रिश्वत देने की नौबत क्यों आई?
धर्म और राजनीति के घालमेल का एक और किस्सा मुझे याद है जिसका जिक्र मैं कभी-कभी, मतलब है कि हर कुछ महीने में कर देता हूं। धर्म से मेरा खास लगाव है, धर्म के पूरे किरदार को मैं अच्छी तरह समझता हूं, और इसलिए पाखंडी धर्म-प्रचार के मुकाबले जनता को आगाह करना अपनी जिम्मेदारी भी समझता हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश की बड़ी पुरानी बात है। एक मठ के महंत ने अपनी अत्यंत ‘करीबी’ एक महिला के नौजवान बेटे को पीट देने वाले लोगों को खुद खड़े रहकर अपने लठैतों से मरवाया था। जब इस हत्या की बात उस वक्त के मुख्यमंत्री तक पहुंची, तो वे परेशान हुए कि उनके राज में एक मठाधीश को फांसी की नौबत आ गई, तो वह बड़ी शर्मनाक नौबत होगी। उन्होंने इस मठाधीश से कॉलेजों के लिए सैकड़ों एकड़ जमीनें दान करवाईं, और केस को रफा-दफा करवाया। उस सर्वोच्च वर्ण के मुख्यमंत्री का यह अपने किस्म का न्याय था कि इतना दान करवा देने से कत्ल की सजा देना हो गया। तो राजनीति, राजा, सत्ता, और धर्म का कुछ ऐसा ही घालमेल पूरी दुनिया के इतिहास में घुला-मिला है, भारत कोई अकेली मिसाल नहीं है।
दुनिया के इतिहास में जो बातें दर्ज हैं, और ये बातें मैं अपने शब्दों में नहीं लिख रहा हूं, इतिहास देखकर लिख रहा हूं, जब समाज कबीलाई था तब सरदार की शक्ति महज बाहुबल से नहीं चलती थी, उसे एक सर्टिफिकेट की कमी लगती थी कि वह सही है, ईश्वर का चुना हुआ है, प्रकृति की विशेष ताकत उसके साथ है। यहीं से ओझा, बैगा, या पुजारी जैसे लोग खड़े किए गए, जिनका काम था एक तथाकथित और काल्पनिक ईश्वर से अपने रिश्तों का झांसा देना, और कबीले के सरदार के फैसलों को ईश्वर का फरमान बताना। इतिहास लिखता है कि आस्था सत्ता का औजार बनी। धीरे-धीरे धर्म सत्ता का भागीदार होते गया, वह सरदार को जनता की नाराजगी के मुकाबले एक हिफाजत देता था, धर्म का डर, पाप की धारणा, और पुण्य से होने वाले फायदों का झांसा देता था, और इसके बदले राजा उसे राज्याश्रय देता था। ये दोनों जनता के शोषण के बुलडोजर के दो पहिए बन गए थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात कार्ल मार्क्स की लिखी हुई है, लेकिन मार्क्स जब पैदा भी नहीं हुआ था, तब भी बहुत से इतिहासकारों ने दुनिया में धर्म और राज्यसत्ता के गठजोड़ को दर्ज किया था। पुरोहित की मेहरबानी से राजा ईश्वर का प्रतिनिधि साबित कर दिया गया था। चीन में राजा के बारे में कहा जाता था कि वे स्वर्ग के आदेश से बने हैं, योरप में इसे ईश्वरीय अधिकार कहा जाता था, भारत में राजधर्म कहा जाता था, और लोकतंत्र के आने के पहले तक सारे के सारे तंत्र इसी गठजोड़ के थे।
देश के एक सबसे प्रमुख हिंदी साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल के गुजरने पर अब उनकी कही बातें चारों तरफ गूंज रही हैं। एक खबर बताती है कि विनोदजी ने किस तरह अखबार पढऩे के महत्व को बताया था और बच्चों के लिए भी अखबार पढऩा जरूरी कहा था उनका कहना था कि अखबार पढऩे की आदत आगे चलकर सोचने को मजबूर करती है। उनका यह भी कहना था कि अखबार ज्ञान का बड़ा माध्यम है, और खबरों को पढऩा अगर दिलचस्प तरीके से सिखाया और बताया जाए तो बच्चे उसमें दिलचस्पी लेना शुरू कर देते हैं। यह भी दिलचस्प बात है कि उत्तरप्रदेश में योगी सरकार ने सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए दस मिनट अखबार पढऩा अनिवार्य कर दिया है। अब योगी तो घोर हिंदुत्ववादी भाजपाई मुख्यमंत्री हैं, लेकिन दूसरी तरफ वामपंथी शासन वाले केरल में जाने एक सदी से, या उसके भी पहले से अखबार पढऩे की कई अलग-अलग किस्म की परंपराएं हैं। एक वक्त सार्वजनिक जगहों पर कुछ छांटी गई दीवारों पर अखबार के पन्ने चिपका दिए जाते थे, और लोग वहां खड़े होकर खबरों को पढ़ते थे। जाहिर है कि ऐसे लोग आपस में खबरों पर बात भी करते रहे होंगे। हो सकता है कि देश के कुछ और प्रदेशों में भी ऐसा रहा हो, लेकिन केरल की एक खूबी यह भी थी कि जिस जगह पर बहुत से मजदूर बैठकर काम करते हैं, वहां पर एक मजदूर एक ऊंची कुर्सी पर बैठकर अखबार पढक़र उसमें से जरूरी और महत्वपूर्ण बातें बाकी मजदूरों को सुनाता है, और इस अखबार पढऩे वाले मजदूर को भी कारखानेदार को रोजी देनी पड़ती है। इस तरह बिना पढ़े हुए, काम करते हुए भी केरल के मजदूर देश और दुनिया से वाकिफ रहते आए हैं। शायद यह भी एक वजह है कि केरल में देश की सबसे बड़ी साक्षरता है, लैंगिक अनुपात देश में केरल में सबसे अधिक है, महिलाओं के कामकाजी होने का अनुपात भी केरल में देश के किसी भी दूसरे प्रदेश के मुकाबले अधिक है।
विनोद कुमार शुक्ल किसी वामपंथी, या दक्षिणपंथी सोच के हिमायती नहीं रहे, लेकिन उनकी अखबार पढऩे और पढ़वाने की सोच दक्षिणपंथी यूपी से लेकर वामपंथी केरल तक आज अमल में आ रही है, यह कैसी गजब की बात है। फिर बहुत से लोगों को यह भी शिकायत रहते आई है कि विनोद कुमारजी राजनीतिक, या जनसरोकार के मुद्दों पर कभी बोलते नहीं थे। यह संपादकीय लिख रहे संपादक ने 25 बरस पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाते हुए विनोद कुमारजी को लोकतंत्र से जुड़े हुए जलते-सुलगते मुद्दों पर लंबा इंटरव्यू किया था, और इस वीडियो रिकॉर्डेड इंटरव्यू में उन्होंने आदिवासियों के हक से लेकर नक्सलियों तक, और मानवाधिकार से लेकर दूसरे राजनीतिक मुद्दों तक खुलकर टिप्पणी की थी। अब यह लगता है कि जो लोग विनोद कुमार शुक्ल को राजनीति और सरोकार के मुद्दों से अछूता मानते हैं, उन्होंने शायद कभी उनसे इन मुद्दों पर ठोस चर्चा की कोशिश नहीं की थी।
खैर, विनोद कुमार शुक्ल पर चर्चा आज का मकसद नहीं है, बल्कि मकसद यह है कि क्या स्कूल के बच्चों को अखबार पढ़वाना चाहिए? क्या अखबारों में आज हिंसा की जितनी खबरें रहती हैं, जितनी नकारात्मक खबरें रहती हैं, चारों तरफ भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी पन्नों पर छाए रहते हैं, क्या वह सबकुछ बच्चों के लिए स्कूल की उम्र में पढऩे लायक बातें हैं? यह सवाल कुछ मुश्किल इसलिए है क्योंकि घरों में अखबार आते हैं, और उन्हें कोई छुपाकर तो रखा नहीं जाता, वे बच्चों की नजरों में आते ही हैं, और बच्चे अगर दिलचस्पी लें, तो बहुत से बच्चों के घरों में अखबार पढऩे का माहौल हो सकता है, और वहां पर तो मां-बाप उनके मन में उठते सवालों के जवाब देने के लिए रहते भी हैं। स्कूलों में तो बच्चे तो बहुत से रहते हैं, सवाल बहुत से हो सकते हैं, और हो सकता है कि शिक्षक उनमें से किसी सवाल का तथ्यपूर्ण, वैज्ञानिक, और सही ऐतिहासिक जानकारी वाले जवाब दे, तो कुछ ही देर में वे पिट भी सकते हैं। इसलिए स्कूलों में अखबार पढ़वाने की सोच पर योगी सरकार ने क्या सोचकर अमल किया है, लेकिन कोई भी अच्छा अखबार कई किस्म के सवाल खड़े करता है, और आज का माहौल सवालों का तो है नहीं। अगर कंटीली झाडिय़ां सामने आएं, और सवालों की फसल सामने आए, तो अभी पहले तो सवाल ही काटे जाएंगे, कांटे तो फिर भी बर्दाश्त करने लायक माने जाएंगे।
अमरीका के सबसे चर्चित कारोबारी, और दुनिया के सबसे संपन्न व्यक्ति, एक्स और स्पेस-एक्स, टेस्ला जैसी कंपनियों के मालिक एलन मस्क दर्जन भर बच्चों के पिता हैं। उनका सबसे नया बच्चा शादी से परे के किसी संबंध से अभी सामने आया है। वे दुनिया में आबादी को खूब बढ़ाने के हिमायती हैं, और उनका कहना है कि आबादी का घटना मानव-प्रजाति के ऊपर सबसे बड़ा खतरा है। वे खुलकर कहते हैं कि अगर बुद्धिमान और सक्षम लोग बच्चे पैदा नहीं करेंगे, तो भविष्य असंतुलित होगा। इशारे-इशारे में वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि समाज के शिक्षित और तकनीकी वर्ग में जन्मदर बहुत कम हो गई है, जबकि कम संसाधन वाले वर्गों में यह अधिक है। इस असंतुलन को वे दीर्घकालीन समस्या मानते हैं। उनकी इस सोच को गरीबविरोधी रईस सोच भी कहा जाता है। दूसरी तरफ एक अलग खबर है टेलीग्राम नाम के मोबाइल एप्लीकेशन के संस्थापक की है कि उसके दुनिया के 12 से अधिक देशों में सौ बच्चे हैं, और उनमें से जिनकी भी माँ आकर पावेल ड्यूरोव से डीएनए रिश्ता स्थापित कर सकेगी, उसे उनकी संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा। दरअसल, यह आदमी बीते कई बरसों से दुनिया में अच्छे और स्वस्थ शुक्राणु की कमी का तर्क देते हुए अपने देश रूस की एक प्रजनन शुक्राणु शाला के माध्यम से अपने स्पर्म मुफ्त में बांट रहा है। उसकी शर्त यही रहती है कि स्पर्म पाने वाली महिला 37 बरस से कम की रहनी चाहिए। पावेल ने इस उम्र सीमा की महिला के अपने शुक्राणु से गर्भधारण करने पर आईवीएफ तकनीक का पूरा खर्च उठाने का प्रस्ताव भी दिया है। अब यह बात जाहिर है कि यह रूसी कारोबारी 41 बरस की उम्र में दुनिया का एक सबसे सफल कारोबारी माना जाता है, और अगर ऐसे सेहतमंद आदमी के शुक्राणु से कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके बच्चे के स्वस्थ होने की संभावना भी अधिक रहती है। अब सोने में सुहागे की तरह अगर ऐसे बच्चे को 17 अरब डॉलर की इसकी सम्पत्ति में हिस्सा भी मिलेगा, तो ऐसा लगता है कि दुनिया की महिलाओं के बीच इसके लिए एक कतार भी लग सकती है। यह पूरी खबर कुछ अटपटी है, लेकिन दुनिया में संपन्न, ताकतवर, और सनकी लोगों के बीच ऐसी सोच और लोगों में भी हो सकती है।
अब हम ऐसी सोच के खतरे अगर देखें, तो दुनिया में अलग-अलग देशों में चिकित्सा वैज्ञानिक इस कोशिश में लगे हुए हैं कि शुक्राणु के स्तर पर ही कौन-कौन सी जांच करके गंभीर बीमारियों के खतरे वाले शुक्राणुओं का उपयोग कम किया जाए, या इसमें जेनेटिक चयन करके उनमें ऐसी बीमारियों के खतरे पहले से समझ लिया जाए, और उनका उपयोग न किया जाए। इससे परे अभी जेनेटिक एडिटिंग स्पर्म के स्तर पर शायद नहीं आई है। प्रयोगशालाओं में जिस तरह से अलग-अलग स्पर्म में से सबसे स्वस्थ, और बीमारीरहित स्पर्म छांटने का मुकाबला चल रहा है, उससे एक बात हो रही है कि इसका खर्च उठाने की क्षमता रखने वाले संपन्न वर्ग के होने वाले बच्चों में गंभीर बीमारियों वाले बच्चे कम हो सकते हैं। इसके बाद वे अपनी संपन्नता का फायदा उठाकर बाकी कई बीमारियों से भी बच सकते हैं, या उनक इलाज करवा सकते हैं। दूसरी तरफ दुनिया में जो विपन्न तबका है, उसके सामने शुक्राणु-चयन जैसी कोई सहूलियत नहीं है, न ही कोई जांच उनको हासिल है, और उनके होने वाले बच्चे अभावों में ही बड़े होते हैं। नतीजा यह होता है कि संपन्न और विपन्न के बीच आज जो महज आर्थिक फासला है, वह धीरे-धीरे बढ़ते हुए साधारण, और अधिक स्वस्थ डीएनए के बीच फासले सरीखा भी होते चले जाएगा।
फिर इस रूसी कारोबारी जैसी हसरत वाले और लोग भी अगर सामने आने लगेंगे, अपने स्पर्म से हजारों बच्चे पैदा करने लगेंगे, आत्ममुग्धता आसमान तक चली जाएगी, तो एक वक्त ऐसा आ सकता है कि दुनिया से जेनेटिक विविधता कुछ कम होने लगे। हम ऐसे दिन की कल्पना करें जब ऐसे एक-एक संपन्न, या बहुत अधिक प्रतिभाशाली, स्वस्थ, मशहूर खिलाड़ी, या चर्चित व्यक्ति अपने शुक्राणु बांटने को तैयार हो जाएं, और एक-एक से हजारों बच्चे होने लगें, तो दुनिया में विविधता और कम हो सकती है। इससे दुनिया में बेहतर समझे जाने वाले रूप-रंग, कद-काठी, सुंदर, स्वस्थ लोगों की एक नई जमात खड़ी हो सकती है, जिसके मुकाबले दूसरे लोग कुछ कमजोर भी लग सकते हैं। ऐसे दिन की कल्पना आज आसान नहीं है, लेकिन एआई जैसे औजार के इस्तेमाल से यह नौबत अधिक दूर तक जा सकती है, क्योंकि दुनिया के सिरफिरे या सनकी, या तानाशाही मिजाज वाले आत्ममुग्ध लोग यह सोच सकते हैं कि उन्हें दूसरे आम लोगों के मुकाबले अधिक बच्चे पैदा करने का हक है, और फिर कृत्रिम गर्भाधान तकनीक से तो किसी एक व्यक्ति के शुक्राणुओं से उसके जीवनकाल में लाखों महिलाओं को गर्भवती किया जा सकता है। ऐसे में अगर पुरूष की हसरत के साथ अतिसंपन्नता जुड़ जाए, या उसका शुक्राणु लेने और गर्भवती होने का खर्च उठाने की ताकत महिलाओं में भी हो, तो भी दुनिया से डीएनए विविधता कम होने लगेगी, और उसके कुछ अलग खतरे रहेंगे।
छत्तीसगढ़ सरकार ने यह तय किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों को औपचारिक रूप से दी जाने वाली सलामी, गार्ड ऑफ ऑनर को बंद कर दिया जाए। इसके पहले कई दूसरे राज्य यह फैसला लेकर उसे लागू कर चुके हैं क्योंकि कहीं पहुंचने वाले मंत्री या आला अफसर के इंतजार में दर्जन-दो दर्जन पुलिसवाले एक अलग किस्म की पोशाक में दिन-दिन भर इंतजार करते हैं ताकि आने वाले तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति को सलामी दी जा सके, ताकि उनके अहंकार शांत हो सके। 2019 में ओडिशा ने यह फैसला लागू कर दिया था, 2018 में राजस्थान ने, और 2015 में महाराष्ट्र ने सलामी की प्रथा खत्म कर दी थी। खैर, जब जागे तभी सबेरा। हम इस किस्म की सामंती प्रथाओं को खत्म करने के लिए दशकों से लिखते चले आ रहे हैं। प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और बाद में उनके देखादेखी, शायद मजबूरी में मन मारकर, राज्यपालों को भी इस मोह को छोडऩा पड़ा था।
कम्प्यूटर की मेहरबानी से पिछले कुछ बरसों के हमारे संपादकीय एक जगह इकट्ठा हैं, और हमारे सामने 2014 का एक संपादकीय है जिसमें दागियों को मंत्री बनाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, और उसमें हमने लिखा है कि दागियों को सलाम करने वाली सरकारी सलामी गारद वाला लोकतंत्र कभी गौरवशाली नहीं हो सकता। 2012 में एक संपादकीय में हमने लिखा था कि राष्ट्रपति भवन से लेकर राजभवनों, और अदालतों तक सामंती प्रतीक खत्म करने चाहिए, और राज्यों के राजभवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक दरबार हॉल जैसे शब्द हटाने चाहिए। इसी के साथ हमने लिखा था कि राज्यपाल के कार्यक्रमों के शुरू और आखिर में राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का एक पूरा बैंड ही उनके साथ सफर करता है, और पूरे वक्त यही एक काम करता है। गांधी के देश में ऐसी सामंती फिजूलखर्ची खत्म होनी चाहिए। इसी संपादकीय में हमने सलामी गारद के खिलाफ भी लिखा था। 2017 में हमने फिर दरबार हॉल, झंडा फहराने और उतारने की औपचारिकता, सलामी गारद, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की घुड़सवार पलटन जैसी सामंती और अहंकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। उसी साल एक और संपादकीय में हमने राज्यपाल के साथ चलने वाले पुलिस बैंड, और देश में सलामी गारद की प्रथा खत्म करने के बारे में लिखा था कि राजा के साथ गाने-बजाने वाले और चारणभाट की तरह के जो लोग चलते थे, वह राजशाही के दिनों में ही ठीक लगता था। 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के समय एक कलेक्टर के चिलचिलाती धूप में धूप का चश्मा लगाने पर मुख्य सचिव द्वारा दिए गए नोटिस के खिलाफ लिखा था कि इतनी धूप में चश्मा न लगाने, और बंद गले का कोट पहनने का यह रिवाज अंग्रेजों की छोड़ी गई गंदगी है, और हिन्दुस्तान को इसे सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हमने उसमें लिखा था कि जहां पुलिस की कमी से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक नहीं ले जाया जाता, बरसों तक बिना सुनवाई कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है, ऐसे लोग किसी सलामी के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में संभालकर रख रहे हैं। 2023 में हमने संपादकीय में लिखा था कि कुपोषण और गरीबी से लदे हुए इस देश में राजभवनों में पुलिस बैंड, और सलामी गारद जैसे सामंती इंतजाम खत्म होने चाहिए, और झंडा फहराने या उतारने के लिए भी सलामी गारद की तैनाती फिजूलखर्ची है। 2018 में हमने राजभवन के दरबार हॉल, राष्ट्रगान के लिए पुलिस बैंड, सलामी गारद, राजदंड, खौलती गर्मी में कोट जैसी अंग्रेजी जूठन और सामंती फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। 2015 में हमने सलामी गारद, राज्यपाल के लिए पुलिस बैंड, और ऐसे तथाकथित वीवीआईपी लोगों के लिए सडक़ों पर ट्रैफिक रोकने के खिलाफ लिखा था, और उस वक्त के छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक रोकने पर जनता से माफी भी मांगी थी। यह संपादकीय हमने महाराष्ट्र सरकार द्वारा सलामी प्रथा खत्म करने के मौके पर लिखा था। 2020 में हमने ऐसी ही सामंती प्रथाओं को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा पर लिखा था कि वे गार्ड ऑफ ऑनर खत्म करने वाले हैं। उन्होंने उनके खड़ी कर दी गई सलामी गारद को खत्म करने की घोषणा की थी, और हमने हेमंत सोरेन की तारीफ में यह लिखा था। उसमें हमने पुलिस बैंड के ऐसे दिखावटी और सजावटी इस्तेमाल के खिलाफ भी लिखा था कि राज्यपाल की ऐसी झूठी शान के लिए लाखों रूपए महीने खर्च किए जा रहे हैं, जो गर्व की नहीं, शर्म की बात है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने यह तय किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों को औपचारिक रूप से दी जाने वाली सलामी, गार्ड ऑफ ऑनर को बंद कर दिया जाए। इसके पहले कई दूसरे राज्य यह फैसला लेकर उसे लागू कर चुके हैं क्योंकि कहीं पहुंचने वाले मंत्री या आला अफसर के इंतजार में दर्जन-दो दर्जन पुलिसवाले एक अलग किस्म की पोशाक में दिन-दिन भर इंतजार करते हैं ताकि आने वाले तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण व्यक्ति को सलामी दी जा सके, ताकि उनके अहंकार शांत हो सके। 2019 में ओडिशा ने यह फैसला लागू कर दिया था, 2018 में राजस्थान ने, और 2015 में महाराष्ट्र ने सलामी की प्रथा खत्म कर दी थी। खैर, जब जागे तभी सबेरा। हम इस किस्म की सामंती प्रथाओं को खत्म करने के लिए दशकों से लिखते चले आ रहे हैं। प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और बाद में उनके देखादेखी, शायद मजबूरी में मन मारकर, राज्यपालों को भी इस मोह को छोडऩा पड़ा था।
कम्प्यूटर की मेहरबानी से पिछले कुछ बरसों के हमारे संपादकीय एक जगह इकट्ठा हैं, और हमारे सामने 2014 का एक संपादकीय है जिसमें दागियों को मंत्री बनाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, और उसमें हमने लिखा है कि दागियों को सलाम करने वाली सरकारी सलामी गारद वाला लोकतंत्र कभी गौरवशाली नहीं हो सकता। 2012 में एक संपादकीय में हमने लिखा था कि राष्ट्रपति भवन से लेकर राजभवनों, और अदालतों तक सामंती प्रतीक खत्म करने चाहिए, और राज्यों के राजभवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक दरबार हॉल जैसे शब्द हटाने चाहिए। इसी के साथ हमने लिखा था कि राज्यपाल के कार्यक्रमों के शुरू और आखिर में राष्ट्रधुन बजाने के लिए पुलिस का एक पूरा बैंड ही उनके साथ सफर करता है, और पूरे वक्त यही एक काम करता है। गांधी के देश में ऐसी सामंती फिजूलखर्ची खत्म होनी चाहिए। इसी संपादकीय में हमने सलामी गारद के खिलाफ भी लिखा था। 2017 में हमने फिर दरबार हॉल, झंडा फहराने और उतारने की औपचारिकता, सलामी गारद, राष्ट्रपति के अंगरक्षकों की घुड़सवार पलटन जैसी सामंती और अहंकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। उसी साल एक और संपादकीय में हमने राज्यपाल के साथ चलने वाले पुलिस बैंड, और देश में सलामी गारद की प्रथा खत्म करने के बारे में लिखा था कि राजा के साथ गाने-बजाने वाले और चारणभाट की तरह के जो लोग चलते थे, वह राजशाही के दिनों में ही ठीक लगता था। 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के समय एक कलेक्टर के चिलचिलाती धूप में धूप का चश्मा लगाने पर मुख्य सचिव द्वारा दिए गए नोटिस के खिलाफ लिखा था कि इतनी धूप में चश्मा न लगाने, और बंद गले का कोट पहनने का यह रिवाज अंग्रेजों की छोड़ी गई गंदगी है, और हिन्दुस्तान को इसे सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हमने उसमें लिखा था कि जहां पुलिस की कमी से विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक नहीं ले जाया जाता, बरसों तक बिना सुनवाई कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है, ऐसे लोग किसी सलामी के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में संभालकर रख रहे हैं। 2023 में हमने संपादकीय में लिखा था कि कुपोषण और गरीबी से लदे हुए इस देश में राजभवनों में पुलिस बैंड, और सलामी गारद जैसे सामंती इंतजाम खत्म होने चाहिए, और झंडा फहराने या उतारने के लिए भी सलामी गारद की तैनाती फिजूलखर्ची है। 2018 में हमने राजभवन के दरबार हॉल, राष्ट्रगान के लिए पुलिस बैंड, सलामी गारद, राजदंड, खौलती गर्मी में कोट जैसी अंग्रेजी जूठन और सामंती फिजूलखर्ची के खिलाफ लिखा था। 2015 में हमने सलामी गारद, राज्यपाल के लिए पुलिस बैंड, और ऐसे तथाकथित वीवीआईपी लोगों के लिए सडक़ों पर ट्रैफिक रोकने के खिलाफ लिखा था, और उस वक्त के छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक रोकने पर जनता से माफी भी मांगी थी। यह संपादकीय हमने महाराष्ट्र सरकार द्वारा सलामी प्रथा खत्म करने के मौके पर लिखा था। 2020 में हमने ऐसी ही सामंती प्रथाओं को लेकर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा पर लिखा था कि वे गार्ड ऑफ ऑनर खत्म करने वाले हैं। उन्होंने उनके खड़ी कर दी गई सलामी गारद को खत्म करने की घोषणा की थी, और हमने हेमंत सोरेन की तारीफ में यह लिखा था। उसमें हमने पुलिस बैंड के ऐसे दिखावटी और सजावटी इस्तेमाल के खिलाफ भी लिखा था कि राज्यपाल की ऐसी झूठी शान के लिए लाखों रूपए महीने खर्च किए जा रहे हैं, जो गर्व की नहीं, शर्म की बात है।
इसके पहले के कुछ दशकों में इस अखबार के संपादक ने जगह-जगह इस बात को जोर-शोर से लिखा था कि अंग्रेजी की छोड़ी गई गंदगी के टोकरे को सिर पर उठाकर चलने को जो भारतीय अपनी शान मानते हैं, उन्हें शर्म आनी चाहिए। महज एक कुर्सी पर कुछ वक्त तक रहने से कोई व्यक्ति जनता के पैसों की बर्बादी की कीमत पर सलामी के हकदार कैसे हो सकते हैं? सरकारी अमले का ऐसा बेजा इस्तेमाल उन कर्मचारियों के मनोबल को भी तोड़ता है, और जनता के पैसों की तो अंधाधुंध आपराधिक बर्बादी करता ही है। हमने अखबार में लिखने के अलावा निजी मुलाकातों में भी कई मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को यह बात सुझाई थी, लेकिन सादगी की थोड़ी-बहुत शुरूआत भी प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति भवन से की थी, उनके पहले एपीजे अब्दुल कलाम ने अपने निजी तौर-तरीकों में सादगी बरती थी, लेकिन आडंबर की प्रथाओं को खत्म करने की तरफ उनका ध्यान नहीं गया था।
किसी लोकतंत्र में सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं पर सवार लोगों को लालबत्ती, मोटरगाडिय़ों के काफिले जैसे निरर्थक लालच छोडऩे चाहिए। इन बातों से किसी की इज्जत नहीं बढ़ती, और ये बातें किसी कुर्सी पर काबिज रहने तक ही चलती हैं। जो सचमुच ही इज्जत के लायक रहते हैं, वे आडंबरों के मोहताज नहीं रहते। जो लोग सादगी का जीवन जीने वाले महान लोगों को अपने नेता मानते हैं, उन्हें तो कम से कम सादगी और किफायत पर अमल करना चाहिए। इस तरह के खर्च लोकतंत्र पर कलंक हैं, और सरकारों को चाहिए कि ऐसी तमाम प्रथाओं को खत्म करे।
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल से ही नैतिकता और ईमानदारी से उन्होंने एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखी थी। कोई भी ऐसे सिद्धांत रिश्वत लेने, उसके एवज में नाजायज सरकारी फायदे देने, और मोटा भुगतान करने वालों को तरह-तरह की कुर्सियां देने, जुर्म से माफी देने में आड़े न आ जाएं, इसका ट्रम्प ने पूरा ध्यान रखा था। इसके अलावा भारत की कुनबापरस्ती की सबसे बुरी मिसालों को भी कुचलते हुए ट्रम्प ने अनैतिक कुनबापरस्ती का जो टॉवर खड़ा किया, वह ऊंचाई में न्यूयॉर्क के ट्रम्प टॉवर से भी ऊंचा था। अपने इस दूसरे कार्यकाल में एक बरस पूरा होने के पहले ही, कार्यकाल के पहले दिन से ही ट्रम्प ने जिस अंदाज में राष्ट्रपति भवन को जैसी खुली सौदेबाजी का अड्डा बना लिया है, उसके सामने दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों की मिसालें भी खासी ईमानदार लगने लगी हैं। अभी खबर है कि ट्रम्प को अरबों डॉलर देकर उसके एवज में अमरीका की कई कंपनियों ने मोटा फायदा कमाया, कई लोगों ने अपने परिवार के जुर्म के लिए राष्ट्रपति के विशेषाधिकार से माफी पा ली, कई लोगों के खिलाफ चल रहे केस खत्म कर दिए गए। बेशर्मी का हाल यह है कि राष्ट्रपति भवन में एक बड़े हिस्से को तोडक़र ट्रम्प एक जलसाघर बना रहा है, और इसके लिए निजी कंपनियों और कारोबारियों से पैसा लिया गया है। ट्रम्प इसे गर्व की बात बता रहा है कि कोई देश उसे दुनिया का एक सबसे महंगा हवाई जहाज तोहफे में दे रहा है, और कोई राष्ट्रपति भवन में होने वाले नाजायज निर्माण के लिए चंदा।
जो लोग अमरीका को एक अच्छा लोकतंत्र मानते थे, उन सब लोगों को समय-समय पर अमरीकी राष्ट्रपति निराश करते रहे। नाजायज काम करने वाला ट्रम्प पहला और अकेला नहीं है, इसके पहले भी राष्ट्रपति की माफी की अपार ताकत के इस्तेमाल के लिए भ्रष्टाचार सामने आते रहा है। अमरीकी संविधान के मुताबिक इस विशेषाधिकार के खिलाफ न संसद कुछ कर सकती, और न ही अदालतें दखल दे सकतीं। पता नहीं संविधान बनाने वाले लोगों को क्या यह खुशफहमी थी कि अमरीकी राष्ट्रपति नैतिक और सज्जन लोग होंगे? अगर उन्हें ऐसी कोई गलतफहमी थी, तो आज ट्रम्प यह साबित कर रहा है कि राष्ट्रपति को चंदा देकर ओहदा पाना, या माफी पाना अमरीकी इतिहास में आज सबसे अधिक संगठित है, और सबसे अधिक बेशर्म भी है। ट्रम्प ने अपने गोल्फ रिजॉट्र्स में दुनिया भर के रईसों और उनके दलालों का स्वागत करना आज भी जारी रखा है। दूसरी सरकारों से किसी तरह का फायदा उठाने पर अमरीकी कानून में रोक है, लेकिन ट्रम्प धड़ल्ले से यह करते आया है।
भारत तो कुनबापरस्ती के लिए बदनाम देश है। लेकिन ट्रम्प ने अपनी बेटी इवांका, और दामाद जेरेड कुशनर को अमरीका की विदेश नीति में भारी-भरकम जिम्मेदारी दे रखी है, और जिन देशों के साथ इन लोगों की कंपनियों का कारोबार है, उन देशों के साथ अमरीका के रिश्तों में भी ट्रम्प के कुनबे की सीधी औपचारिक दखल है। ट्रम्प का दामाद अभी रूस में यूक्रेन के साथ युद्धविराम की संभावना पर बात करने के लिए अमरीकी सरकार की तरफ से जाकर बैठकों में शामिल रहा, कभी वह मध्य-पूर्व में जाकर इजराइल और फिलीस्तीन के बारे में कई देशों की सरकारों के साथ बैठकों में शामिल होता है। यह एकदम ही अभूतपूर्व और असाधारण नौबत है, जब राष्ट्रपति और उनका कुनबा हर किस्म के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में भी लगे हुए हैं, और ऐसे देशों के साथ जंग जैसे मुद्दों पर सरकारी बैठकों में भी शामिल हैं। राष्ट्रपति कारोबार में हैं, और उनका कारोबारी परिवार राष्ट्र की नीतियों और संबंधों को तय करने में शामिल है। अमरीकी विश्लेषकों का मानना है कि वहां का संविधान बनाते हुए राष्ट्रपति की इस दर्जे की बेशर्मी की कल्पना नहीं की गई होगी। अब अमरीका में यह बहस चल रही है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ नियमों से चलता है, या फिर उसके लिए चरित्र भी जरूरी है।
डॉनल्ड ट्रम्प ने यह मिसाल भी पेश की है कि अपने राजनीतिक विरोधियों, और अपने से असहमत लोगों से बदला किस तरह से निकाला जाता है। उनके खिलाफ जितने तरह के मुकदमे अमरीका में बरसों से चल रहे हैं, उन मामलों की जांच करने वाले, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के खिलाफ भी ट्रम्प ने ढेरों मुकदमे दर्ज करवा दिए हैं, और संवैधानिक संस्थाओं को वह गैरकानूनी और नाजायज कार्रवाई के लिए खुलकर सार्वजनिक बयानों में भडक़ाता और उकसाता है। अपने कार्यकाल के इस पहले ही साल में उसने लोकतंत्र, संविधान, नैतिकता, और सार्वजनिक जीवन के सामान्य शिष्टाचार, इन सबको जिस तरह कुचलकर रख दिया है, उससे लगता है कि अमरीका ने पिछली एक सदी में दुनिया पर जितने बम बरसाए थे, उससे अधिक बम आज अमरीकी घरेलू लोकतंत्र पर बरस रहे हैं। ट्रम्प जिस तरह की मनमानी कर रहा है, जितना भ्रष्टाचार कर रहा है, जितनी तानाशाही कर रहा है, उतनी किसी बहुत बेशर्म अफ्रीकी तानाशाह ने भी नहीं दिखाई थी, और न ही किसी अरबी तेल साम्राज्य के तानाशाह ने।
बुढ़ापा खराब कैसे किया जाए इसमें किसी को पीएचडी करनी हो, तो वे नीतीश कुमार को गाइड बना सकते हैं। अपने खुद के बुढ़ापे में जिस तरह की हरकत उन्होंने एक मुस्लिम महिला डॉक्टर का हिजाब खींचकर की है, वह हरकत अब भी जारी है। अभी जब मीडिया ने उनसे यह सवाल किया कि क्या वे उस महिला से माफी मांगेगे तो वे एक गजल की लाइन की तरह मुस्कुराकर चल दिए। किसी बच्चे को भी यह सिखाया जाता है कि अगर गलती हो जाए तो उस पर अफसोस जाहिर करते हुए माफी मांग लेना चाहिए। उर्दू तो जुबान ही ऐसी है जिसमें बात शुरू करने के पहले ही, मुआफ कीजिएगा कह दिया जाता है। अंग्रेजी में बोलचाल में जिस शब्द का दिनभर में सबसे अधिक इस्तेमाल होता है, वह सॉरी है। लेकिन हिंदी के मिजाज में, खासकर बोलचाल में न तो धन्यवाद है, और न ही सॉरी है। फिर राजनीति में आने के बाद तो लोग शिष्टाचार के गिने-चुने शब्द भी भूल जाते हैं, और बद्जुबानी करने को अपना हक मान लेते हैं। जिस नीतीश को उनके समर्थक सुशासन बाबू कहते थकते नहीं हैं, उनका हाल यह है कि सरकारी कार्यक्रम के मंच से एक मुस्लिम महिला डॉक्टर को नियुक्तिपत्र देते हुए वे लोगों के सामने ही उसके चेहरे से हिजाब खींच लेते हैं, और आम हिंदुस्तानी मर्दानगी की शान बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री का सारा आभामंडल इस पर एक हैवानी हँसी हँसने लगता है। ऐसी सार्वजनिक घटना का चारों तरफ धिक्कार होने के बाद भी यह बेहया आदमी मीडिया के सवालों पर मुस्कुराकर चले जा रहा है। उसने यह खबर अब तक सौ जगह पढ़ ली होगी कि उसकी अश्लील हिंसा की शिकार महिला ने यह तय किया है कि इस बर्ताव के बाद वह अब इस नौकरी को करेगी ही नहीं। एक महिला, एक अल्पसंख्यक महिला, सरकारी नौकरी में आने जा रही एक महिला की जिंदगी को इस तरह और इस हद तक बर्बाद करने के बाद भी जिस सुशासन बाबू के मुंह पर मुस्कुराहट अभी बाकी है, वह बेशर्मी, और बुढ़ापा बर्बाद करने पर औरों को पीएचडी करवा ही सकता है।
अब नीतीश से उबरें और आम बात करें, तो आम हिंदुस्तानी लोगों में अपने अधिकारों के लिए जिस दर्जे का स्वाभिमान रहता है, और दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को लेकर जिस दर्जे की हिकारत रहती है, वह देखने लायक रहती है। सार्वजनिक जगहों पर लोग अधिक से अधिक बद्तमीजी की नुमाइश इस तरह करते हैं कि अपने मां-बाप की सिखाई बातों की ट्रॉफी सामने रख रहे हों। लोग दूसरों के प्रति इतना खराब व्यवहार करते हैं कि उनकी अपनी मां-बहनों को हिचकियां आने लगती हैं क्योंकि बद्तमीजी के शिकार लोग जुबान से न सही, मन से तो गालियां देने ही लगते हैं। एक बुढ़ऊ एक मुस्लिम महिला का हिजाब खींचते हुए यह भी नहीं सोचता कि उसके दिल से निकली हुआ आह वह कैसे झेलेगा? कबीर तो कह गए हैं कि मरे चाम की आह से लौह भस्म हो जाए, यहां तो जिंदा मुस्लिम महिला का चाम है, उसकी आह को एक अदना सा मिस्टर पलटू कितना झेलेगा? लेकिन अभी ऊपर के पैरा में ही हमने तय किया था कि हमको बात इस आदमी से परे करना है।
हिंदुस्तानियों को व्यवहार सिखाने की खास जरूरत इसलिए नहीं पड़ती कि इस देश का माहौल बद्तमीजी का आदी है, और जब ये बद्तमीज किसी सभ्य देश जाते हैं, तो पलभर में सभ्यता और शालीनता की खाल ओढ़ लेते हैं। उन्हें मालूम है कि दूसरे देशों में बद्तमीजी का नतीजा जूते खाना होगा, और धकियाकर उस देश से निकाल दिया जाना होगा, और ट्रंप का देश हो तो फिर हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़कर मालवाहक विमान में चढ़ाकर देश में कैदी की तरह उतरना होगा, इसलिए बाहर जाते ही लोग हर 50 कदम पर थूकना, और हर मोड़ पर मूतना बंद कर देते हैं। यही सुशासन बाबू किसी मुस्लिम देश में गए हुए होते, तो अब तक इस हरकत सरकार की तरफ से कानूनी रूप से सर तन से जुदा हो चुका रहता। इस बात को नीतीश से जोड़कर न देखा जाए, बल्कि हिंदुस्तानियों की बद्तमीजी की आम आदत, और संस्कृति से जोड़कर देखा जाए, जिससे मुक्त होने पर लोगों को हीनभावना होने लगती है कि वे कहीं पश्चिमी संस्कृति के बुरे प्रभाव का तो शिकार नहीं हो रहे हैं?
भारत में किस्से-कहानी के लिए श्रवण कुमार की मिसाल अच्छी है, लेकिन मिसाल से परे असल जिंदगी में आल-औलाद बूढ़े माँ-बाप को कांवर में लेकर तीर्थयात्रा कराते हों, ऐसी इक्का-दुक्का कहानी तो हर कुछ महीनों में सामने आती है, लेकिन माँ-बाप को प्रताडि़त करना, उनके पैसों को हड़पने के लिए, उनकी सम्पत्ति अपने नाम करने के लिए तरह-तरह की साजिश रचना, और माँ-बाप को ठन-ठन गोपाल कर देने के बाद उन्हें घर से निकाल देना अधिक सुनाई पड़ता है। श्रवण कुमार की कहानी सुनकर जो माँ-बाप अपना सब कुछ बच्चों के हवाले कर देते हैं, वे आमतौर पर बुढ़ापे में बहुत बुरी मौत मरते हैं। रेमंड कंपनी के संस्थापक और कंपनी को हजारों करोड़ तक पहुंचाने वाले विजयपत सिंघानिया को उनके बेटे ने जिस तरह कोठी से निकालकर गेट के बाहर फिंकवा दिया था, वह तस्वीर लोगों को याद होगी। भारतीय उद्योग का वह एक सबसे चर्चित उद्योगपति आज किसी तरह एक मामूली जिंदगी जी रहा है। एक समय वह शानदार और कामयाब कारोबार का संस्थापक-मुखिया होने के साथ-साथ माइक्रोलाईट विमान उड़ाकर रिकॉर्ड बनाने वाला रोमांच-प्रेमी भी था। लेकिन वह जिंदगी अपनी ही औलाद के हाथों फजीहत में नर्क बन गई।
केरल की एक खबर है कि वहां सांप काटने से एक आदमी की मौत हुई। बाद में पुलिस जांच में पता लगा कि सांप का इंतजाम करके उसके बेटों ने ही बाप को मरवाया था, क्योंकि उन्होंने अपनी औकात से बाहर जाकर बाप का तीन करोड़ का बीमा करवाया था, और वे बीमा दावा हासिल करना चाहते थे। ऐसे मामलों में बीमा कंपनी और पुलिस दोनों को शक होता है, और जांच में दोनों बेटों के अलावा चार और लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। 56 बरस का पिता घर में मरा मिला, और अस्पताल ले जाने में बेटों ने देर की, ताकि बाप के मरने की गारंटी हो जाए। यह सब देखकर बीमा कंपनी को शक हुआ, और उसने पुलिस को खबर की। जांच में पता लगा कि इस मौत के एक हफ्ता पहले भी बेटों ने बाप को एक जहरीले कोबरा से कटवाया था, लेकिन बाप बच गया। निराश बेटों ने इस बार एक अधिक जहरीले करैत का इंतजाम किया, और सोते हुए बाप को गर्दन पर उससे कटवाया। बेटों के अलावा जो गिरफ्तार हुए हैं वे सांप जुटाकर हत्या में साथ देने वाले लोग हैं। बेटों ने बीमे के तीन करोड़ के लिए श्रवण कुमार के देश में यह एक अलग मिसाल पेश की। एक सरकारी स्कूल के प्रयोगशाला सहायक का काम करने वाले बाप का तीन करोड़ का बीमा करवाना भी शक पैदा कर रहा था जो कि बेटों ने ही करवाया था। गणेशन के बेटे मोहनराज, और हरिहरण अब जेल में हैं।
छत्तीसगढ़ के लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले एक करोड़ का बीमा-दावा पाने के लिए एक नौजवान ने पहले तो अपनी नानी का बीमा करवाया, और फिर उसे सांप से कटवाकर मार डाला। पिछले बरस के इस मामले में पुलिस ने हत्यारे नाती के अलावा बीमा एजेंट, और संपेरे को भी गिरफ्तार किया था। सांप से कटवाने के लिए नाती अपनी नानी को बस्तर से ओडिशा ले गया था, और वहां संपेरे ने कार के भीतर ही सांप लाकर बूढ़ी महिला को कटवाया था। घर लाकर नानी की मौत बताकर उसने बीमा-दावा किया था। 30 हजार रूपए पाने वाला संपेरा भी कत्ल में अब जेल में हैं। कुछ ऐसे ही मामले और देखें जिनमें बीमा-दावे के लिए परिवार के लोगों ने ही बुजुर्गों की हत्या की, तो 2022 में यूपी के गाजियाबाद में पिता का 50 लाख का बीमा करवाकर बेटे ने 72 साल के बाप को नींद की गोलियां देकर मार डाला था, बाद में पोस्टमार्टम में इस ओवरडोज का पता लगा। 2021 में महाराष्ट्र के पुणे में एक महिला ने अपनी पूरी तरह स्वस्थ 85 बरस की नानी का एक करोड़ का बीमा कराया, और उसे जहर देकर मार डाला। 2020 में हरियाणा में दो बेटों ने मिलकर अपने बुजुर्ग बाप को कार से कुचलवाया, और दुर्घटना बीमा पॉलिसी का 75 लाख का दावा किया। बाद में सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, और कॉल रिकार्ड से साजिश का भांडाफोड़ हुआ। तमिलनाडु के कोयम्बटूर में 2019 में 30 लाख का बीमा क्लेम पाने के लिए एक बेटे ने माँ को बाथरूम में गिराकर मारने की कोशिश की, बाद में डॉक्टर के शक, और पड़ोसियों की गवाही से बेटा गिरफ्तार हुआ। राजस्थान के जयपुर में 2023 में पति-पत्नी ने मिलकर 70 साल की सास को मार डाला, ताकि बीमा-दावा मिल सके, और जमीन-घर पर कब्जा हो सके। इसके लिए उन्होंने धीमा जहर देकर बूढ़ी महिला की बीमारी का नाटक पेश किया। 2024 में एक नौजवान ने कर्नाटक के बेंगलुरू में दो करोड़ का बीमा करवाने के बाद दादा को मार डाला, और रकम का दावा किया, बाद में जांच में वह पकड़ा गया।
इन सारे मामलों को हम इसलिए गिना रहे हैं कि भारत में लोग संतान मोह में अपना सब कुछ समर्पित कर देते हैं, और आल-औलाद हत्यारी न भी हो, तो भी वह माँ-बाप को बूंद-बूंद चाय और एक-एक कौर खाने के लिए तो तरसा ही सकती है। हमने इसी मुद्दे पर कुछ महीने पहले भी इसी जगह लिखा था, और उसमें मध्यप्रदेश की भी एक घटना का जिक्र किया था जिसमें बूढ़ी, बीमार, बिस्तर पर पड़ी 85 बरस की माँ को ताले में बंद करके बेटा-बहू अपने बच्चों को लेकर महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन चले गए थे, और बाद में बदबू आने पर पड़ोसियों ने पुलिस को रिपोर्ट की, जिसमें दरवाजा तोडक़र इस बूढ़ी महिला की लाश बरामद की थी। ऐसी घटनाओं से लोगों को सबक लेने की जरूरत है, और बुजुर्गों को कभी भी अपनी पूरी संपत्ति आल-औलाद को नहीं देना चाहिए, और अपनी हिफाजत के लिए दूसरे रिश्तेदारों, और पड़ोसियों का एक नेटवर्क भी बनाकर रखना चाहिए।
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने औरत-मर्द, और दूसरे तमाम किस्म की यौन-प्राथमिकताओं वाले लोगों को भी एक बराबरी का मौका दिया, तो यह लगने लगा था कि सामाजिक जमीन पर जो भेदभाव है, वह ऑनलाइन पर कुछ कम होगा। और यह बात तकनीकी रूप से सही भी है कि महिलाओं को सोशल मीडिया पर बराबरी से लिखने की आजादी है। लेकिन जब इसे बारीकी से देखें, तो इसका एक दूसरा पहलू भी दिखता है कि महिलाओं के खिलाफ ढेर सारे मर्द अपनी सदियों की भड़ास और यौनकुंठा लेकर टूट पड़े हैं। अभी तक मर्दों को यौनकुंठा निकालने के लिए किसी सार्वजनिक शौचालय के दरवाजे के भीतर कुरेदकर कुछ लिखने की जहमत उठानी पड़ती थी। अब यह काम आसान हो गया है, और किसी फर्जी नाम से भी बनाए गए सोशल मीडिया अकाउंट पर मनचाही हिंसक बातें लिखी जा सकती हैं, लिखी जा रही हैं, और अब तो फर्जी नाम भी जरूरी नहीं रह गया, अब तो लोग अपने असली नामों से भी गंदी बातें लिखने लगे हैं। किसी महिला के लिए सोशल मीडिया एक बहुत ही खतरनाक, नाजुक, और नुकसानदेह जगह भी हो सकती है जहां उसके रूप-रंग, उसकी कद-काठी, उसके जात-धरम जैसे तमाम पहलुओं पर बड़ा संगठित हमला हो सकता है। यह हमला किसी मर्द पर भी हो सकता है, लेकिन महिलाओं पर यह खतरा ठीक उसी तरह अधिक लागू होता है जिस तरह असल जमीन पर, असल समाज के बीच महिलाएं अधिक निशाना बनती हैं।
अभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक मुस्लिम महिला के चेहरे से नकाब खींचकर एक अलग ही किस्म की मर्दानगी, और सत्तारूढ़ बद्दिमागी की नुमाइश की है। फिर मानो यह काफी नहीं था, चारों तरफ से आते धिक्कार के बीच भी नीतीश कुमार परले दर्जे के बेशरम बने हुए अपने होंठ सिलकर सो गए हैं। दूसरी तरफ उनके हिमायती इस बारे में पूछे गए सवाल पर खी-खी कर रहे हैं, और नीतीश के बर्ताव को महिला के साथ बड़ी रियायत बता रहे हैं कि उन्होंने नकाब भर तो छुआ, कहीं और तो नहीं छुआ। एक दूसरा नेता कल सामने आया कि यह मुस्लिम महिला दिल्ली में हुए आतंकी विस्फोट से जुड़ी हुई हो सकती है। झारखंड का यह भाजपा नेता इस महिला के मुस्लिम होने से उसे आतंकी विस्फोट से जोड़ रहा है, तो इस तर्क से तो हिंदुस्तान के 20 करोड़ तमाम मुस्लिमों को कुसूरवार ठहराया जा सकता है। अब ये दो बातें बिना डिजिटल दुनिया के तो सीमित रह गई रहतीं, लेकिन अब सोशल मीडिया और डिजिटल मैसेंजरों की मेहरबानी से एक-दो मिनट के ऐसे वीडियो चारों तरफ तैर रहे हैं, वह महिला अगर नौकरी पर आने की हिम्मत जुटा भी पाती, तो इस तरह के ओछे, घटिया, महिला-विरोधी, और सांप्रदायिक हमलों के चलते वह इसकी हिम्मत भी नहीं कर सकेगी।
डिजिटल दुनिया में महिलाओं पर होने वाले हमले हमलावर लोगों के देशों की संस्कृति पर आधारित रहते हैं। वहां की संस्कृति अगर महिलाओं को कुचलने की है, महिला विरोधी है, तो वहां के मर्द सोशल मीडिया और इंटरनेट पर महिलाओं की मौजूदगी को ही अपने एकाधिकार पर हमला मान लेते हैं। उनमें बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जिनके दिल-दिमाग में यौन-कुंठाएं लबालब रहती हैं, और ओवरफ्लो होती रहती हैं। ऐसे लोग पहला मौका मिलते ही किसी महिला का जिक्र करते हुए, उसकी असली या नकली फोटो लगाते हुए उस पर इस तरह हमले करने लगते हैं कि मानो अंधेरी रात के सुनसान जंगल में उस महिला के देह पर हाथ फेरने का मौका मिल गया। किसी महिला से वैचारिक असहमति होने पर लोग उसके दिमाग का सामना करने के बजाय उसके बदन में घुस जाने पर आमादा हो जाते हैं। उसके साथ-साथ उसके परिवार की और लड़कियों और महिलाओं के नाम लेकर जिस तरह से यौनकुंठा की गालियां पोस्ट की जाती हैं, वे किसी भी संवेदनशील महिला को मानसिक अवसाद का शिकार बना देने के लिए काफी रहती हैं। और यही शायद उनका मकसद भी रहता है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया की तकनीक जब बढ़ते-बढ़ते एआई और उससे बने हुए एक औजार डीप-फेक तक पहुंच गई, तो लोगों की कुंठाओं को पंख लग गए। जिन देशों और समाजों में उन्मुक्त जीवन की वजह से ऐसी कुंठाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए थी, वैसे गोरे देशों में भी स्कूलों के बच्चे अपनी सहपाठी लड़कियों के डीप-फेक अश्लील वीडियो बनाकर उन्हें चारों तरफ फैला रहे हैं, और इंटरनेट, डिजिटल मीडिया, और सोशल मीडिया के बिना लड़कियां जितनी ऊंचाई तक पहुंच चुकी थीं, वहां से भी उन्हें नीचे घसीटा जा रहा है। फिर जब महिला को नीचे घसीटने का मौका हो, तो फिर नीच हो जाने से कोई परहेज तो हो नहीं सकता।
दिक्कत यह है कि हिंदुस्तान जैसे देश में महिला सुरक्षा के लिए कानून तो बड़े-बड़े और कड़े-कड़े हैं, लेकिन उन पर अमल के मामले में सरकारें उसी तरह काम करती हैं जिस तरह मर्दों से हावी कोई संस्था काम कर सकती है। आज सरकार, राजनीति, अदालत, और मीडिया, इन तमाम जगहों पर जिस तरह महिलाएं बहुत कमजोर हालत में हैं, और मर्दों का बोलबाला है, उसी तरह सोशल मीडिया पर अश्लील और हिंसक हमले करने वाले, पहली नजर में ही जुर्म करने वाले लोगों का बोलबाला है, और वे जब किसी के पीछे पड़ते हैं, तो उसका जीना हराम कर देते हैं। यह नौबत खासकर हिंदुस्तान जैसे देश में महिलाओं के दिल-दिमाग के सुख-चैन को खत्म कर देती हैं अगर मर्दों की टोली अपने पर आ जाती है।
भारत की 140 करोड़ से अधिक की आबादी में करीब 97 करोड़ वोटर चुनाव आयोग की लिस्ट में दर्ज हैं। अभी मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम किस्तों में अलग-अलग राज्यों में चल रहा है, और पहले दौर में कई प्रदेशों में वोटरों का एक बड़ा हिस्सा लिस्ट में नहीं आ पा रहा है। इसके पीछे 2003 की मतदाता सूची में वोटरों, या उनके मां-बाप के नाम न मिलना भी एक वजह है। एक दूसरी वजह नामों के अँग्रेजी या हिन्दी के हिज्जों का फर्क है, या वोटर लिस्ट बनाने वालों के लिखने के तौर-तरीकों का फर्क है। महिलाओं के नाम के साथ पति का नाम जुड़ जाना, पुरूष मतदाता के नाम के साथ उनके पिता के नाम के आधे हिस्से का जुड़ जाना, जैसी कई बातें सामने आ रही हैं। यह भी है कि 2003 के बाद जिन वोटरों ने अपने नाम, पते, या जन्म तारीख को सुधरवाया है, उनके भी नाम दुबारा ढूंढने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। सरकार ने अपने कई विभागों, और स्थानीय संस्थाओं के लोगों को इस काम में झोंक दिया है, जिससे सरकार का रोजमर्रा का काम थम सा गया है। लेकिन मतदाता सूची में ऐसे वोटरों के नाम जुड़वाने में राजनीतिक दल अधिक सक्रियता दिखा सकते हैं जिनके जात-धरम, या इलाके को लेकर उन्हें समर्थन की अधिक उम्मीद है। अब यह खेल भी सभी राजनीतिक दलों के लिए खुला हुआ है, और जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उन्हें जुड़वाने के लिए वोटरों को खुद भी कोशिश करनी चाहिए, या उनके इलाके में सक्रिय नेता और उनकी पार्टी को भी।
लेकिन आज की यह बात हम सिर्फ मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) तक सीमित रखना नहीं चाहते। भारत में तरह-तरह के बहुत से दस्तावेज सरकारी दफ्तरों से बनते हैं। इनमें एक-एक करके कई कागजात हासिल करने के लिए ऑनलाईन सहूलियत भी होती चल रही है। लेकिन जब असल जिंदगी में इसकी कोशिश की जाती है, तो पता चलता है कि सरकारी विभागों के सर्वर डाउन है, इंटरनेट कनेक्शन जुड़ नहीं रहा है, या वेबसाइट ठीक से काम नहीं कर रही है। कभी-कभी यह भी लगता है कि इन दफ्तरों का सरकारी अमला ऑनलाईन सिस्टम को पसंद नहीं करता, और इसीलिए ऑनलाईन प्रणाली को ठप्प कर देता है। सरकारी दफ्तरों में फाइल को आगे बढ़ाने के लिए उस पर वजन रखने का जो चलन है, वह ऑनलाईन से कमजोर हो जाता है, और हो सकता है कि तकनीकी गड़बड़ी मानवनिर्मित भी हो।
दूसरी बात यह भी है कि भारत में अब दर्जन भर से अधिक किस्म के पहचान पत्र, और दर्जनों किस्म के प्रमाणपत्र कम्प्यूटरों से बनने लगे हैं, और ये ऑनलाईन हों, या सरकारी दफ्तरों में जाकर बनवाने पड़ें, उनमें भाषा और हिज्जे की कई तरह की दिक्कतें आती हैं। अंग्रेजी में तो अधिकतर हिज्जे एक ही तरह के रहते हैं, लेकिन हिन्दी या दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के हिज्जे कई तरह से लिखे जाते हैं। अभी तक सरकारी कम्प्यूटरों में ऐसे फेरबदल को मिलाने के लिए एआई जैसे किसी औजार का इस्तेमाल तो शुरू हुआ नहीं है, इसलिए रिकॉर्ड बनाने में, ढूंढने में, और उन्हें किसी दूसरे विभाग के कम्प्यूटर पर भरने में एक मामूली सी चूक भी गड़बड़ कर सकती है। इसके साथ-साथ पता और जन्म तारीख जैसी जानकारी में किसी एक अंक का भी फेरबदल होने से रिकॉर्ड आपस में नहीं मिलते। भारत अभी डिजिटलीकरण के दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा है, और अब तक इस काम में नागरिक के स्तर पर एआई का उपयोग नहीं हुआ है। आने वाले बरसों में यह दिक्कत दूर होना तय है, लेकिन तब तक लोगों को परेशानी जारी है, और एक खतरा यह है कि जो लोग सारी जानकारी ठीक-ठीक दुरूस्त नहीं करवा पाएं, वे लोग वोट देने का हक और मौका चूक सकते हैं।
भारत में जब आधार कार्ड शुरू हुआ था, तो उसका बड़ा विरोध भी हुआ था। लेकिन आज वह भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला पहचानपत्र बन गया है। दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी भारत की आधार कार्ड परियोजना पर अपने देश में अमल कर रहे हैं, और भारत उनकी मदद भी कर रहा है। अपनी आबादी की वजह से ही भारत की यह परियोजना दुनिया की अपने किस्म की सबसे बड़ी परियोजना है। लेकिन इस बार मतदाता सूची पुनरीक्षण में चुनाव आयोग ने जाने क्या सोचकर आधार कार्ड को दर्जन भर पहचानपत्रों में से एक मानने से इंकार कर दिया था, और लोगों को आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर वहां से इस फैसले के खिलाफ हुक्म लाना पड़ा था। लेकिन हम यहां अभी चुनाव आयोग और उसके राजनीतिक झगड़ों पर बात करना नहीं चाहते, हमारा मकसद आम नागरिक के सरकारी दस्तावेजों और पहचानपत्रों के कामकाज को आसान बनाना है।
आज एआई दुनिया भर से किसी भी जानकारी को ढूंढकर पल भर में सामने धर देता है। सरकार और चुनाव आयोग के पास लोगों की पहचान के जो रिकॉर्ड हैं, उन्हें जोडक़र एक साथ देखने का काम एआई बड़ी आसानी से पल भर में कर सकता है। आधार कार्ड, मतदाता कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे बहुत से पहचानपत्र और दस्तावेज हैं जिनमें बड़ा मामूली फेरबदल होने पर भी कई सरकारी, अदालती, या चुनावी कामकाज में उन्हें रोक दिया जाता है। आज जिस तरह वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण हो रहा है, सरकार को हर नागरिक के सभी तरह के दस्तावेजों को एक-दूसरे से जोडऩे, और उनके बीच अगर कोई विसंगति है, तो उसे निकालकर लोगों को दिखाने का एक अभियान छेडऩा चाहिए। लोग यह तय कर सकें कि उनकी अलग-अलग जगह पर दर्ज जानकारियों में से सबसे सही कौन सी हैं, सही हिज्जे क्या हैं, या तारीख और पता सही है या नहीं। इसके लिए सरकार को मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसा घर-घर जाने वाला अभियान छेडऩे की जरूरत भी नहीं है, और इसे अनिवार्य बनाने की जरूरत भी नहीं है जिसमें से किसी को निजता भंग होने का अंदेशा हो। सरकार ऐसे ऑनलाईन विकल्प दे सकती है, या सरकारी कम्प्यूटर सेंटरों से ऐसी मामूली फीस वाली सुविधा मुहैया करा सकती है।
हिंदी के एक सबसे बड़े साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल 90 बरस की उम्र में छत्तीसगढ़ के रायपुर में एम्स में भर्ती हैं, और उनकी हालत खासी खराब बताई जा रही है। पिछले कई महीने उनके घर और अस्पताल में मिले-जुले गुजरे हैं, और उनके चाहने वाले करीबी लेखक-पत्रकार लगातार सोशल मीडिया पर उनकी खबर डालते जाते हैं। लोग उनसे मिलने जाते हैं तो अपनी तस्वीरें भी पोस्ट करते हैं। उनकी हालत देखते नहीं बनती है, खासकर वे लोग बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं जिन्होंने पिछली करीब आधी सदी से उन्हें रूबरू देखा है। अब इस दौर में केंद्र सरकार के छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े अस्पताल, एम्स में उनकी जो हालत सुनाई पड़ रही है, वह बहुत दयनीय है। कुछ लोगों ने लिखा है कि विनोद कुमारजी के बेटे शाश्वत अकेले ही सारा इंतजाम देख रहे हैं, और अस्पताल के डॉक्टर या कर्मचारी जैसा बर्ताव कर रहे हैं, वैसा तो किसी साधारण सरकारी अस्पताल के डॉक्टर-कर्मचारी किसी आम मरीज के साथ भी शायद नहीं करते हैं। फिर विनोदजी से तो पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ पहुंचते ही फोन पर बात की थी और मिजाजपुर्सी की थी, और उनका सम्मान किया था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह समेत कई दूसरे मंत्री या नेता विनोद कुमारजी को देखने समय-समय पर अलग-अलग अस्पतालों में या घर पर जाते रहे हैं, और उनके साथ तस्वीरें फेसबुक पर डालते रहे हैं। इसी बीच विनोद कुमारजी को पहले से घोषित ज्ञानपीठ पुरस्कार देने के लिए आयोजक आकर उनके घर पर एक पारिवारिक माहौल में यह औपचारिकता पूरी कर गए।
इन महीनों में लगातार दुर्बल और जर्जर होते चले जा रहे विनोदजी के साथ मुलाकात करने, और तस्वीरें खिंचवाने के लिए दिल से करीब, और शोहरतपसंद, सभी किस्म के लोग टूटे पड़े रहे। शोहरत की चाह में भी कोई बुराई नहीं है अगर विनोदजी जैसे सहज और सरल व्यक्ति अपनी सेहत को खतरे में डालकर भी लोगों से मिलने को इस तरह आसानी से तैयार हो जाते हैं। अब फेसबुक पर एक बहस चल रही है कि उनके लिए एम्स में इंतजाम कैसा है। कुछ बहुत करीबी लोग ऐसी बहस से दूर भी हैं। और कुछ करीबी लोग बहस को अपनी-अपनी पसंद के सिरे तक खींचकर ले जा रहे हैं। लोगों के अपने राजनीतिक रुझान उनके लिखे हुए में झलकते हैं, और किसी भी तरह के राजनीतिक रुझान से तकरीबन अछूते रहते आए विनोद कुमारजी अब कुछ पढ़ने की हालत में भी नहीं हैं कि उनके बारे में क्या लिखा जा रहा है। तस्वीरों में उनकी जो हालत दिखती है, उससे लगता है कि अब लोगों को रहम करना चाहिए, और उनकी ऐसी खराब हालत की तस्वीरें पोस्ट करना बंद करना चाहिए। लेकिन उनके साथ अपनी तस्वीरें पोस्ट करते हुए लोगों को उनके हाथ थामना भी अच्छा लगता है, और कमरे में भीड़ बढ़ाना भी।
मैं अपनी पूरी जिंदगी में परिवार के किसी सदस्य से मिलने भी आईसीयू में नहीं गया, क्योंकि मुझसे फायदा कुछ नहीं होना था, सिर्फ संक्रमण का नुकसान हो सकता था। लेकिन जब सार्वजनिक जीवन में प्रचार से नफा पाना हो, तो मरीज को होने वाले नुकसान की आशंका को अनदेखा करना ही सहूलियत की बात होती है। फिर हिंदुस्तानी डॉक्टर चाहे निजी अस्पताल के हों, चाहे सरकारी अस्पताल के, आने वाले दिग्गजों के साथ, मरीज के बगल खड़े हुए उन्हें अपनी तस्वीर भी सुहाती है। विनोदजी को लेकर लोग सोशल मीडिया पर अपने-अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो कि कुछ लिखे बिना भी उनके किसी काम आ रहे हों, लेकिन जो लोग लिख रहे हैं वह तो यही लिख रहे हैं कि अकेले उनका बेटा ही 102 डिग्री बुखार में भी फर्श पर सोकर ड्यूटी कर रहा है, और अस्पताल के कर्मचारी तो न डायपर बदलने को हैं, और न ही बिस्तर पर पड़े-पड़े उन्हें हो गए जख्मों पर मरहम लगाने के लिए हैं। लोग यह भी लिख रहे हैं कि यह सब अकेले उनके बेटे शाश्वत को ही करना पड़ रहा है। कुछ लोगों ने यह भी लिखा है कि सरकार की तरफ से इलाज के लिए कोई मदद नहीं मिली, और प्रधानमंत्री के फोन, या मुख्यमंत्री के आने के बाद कोई सरकारी अधिकारी आ गए थे कि मदद के लिए आवेदन लिख दें। इसका जिक्र भी सरकार को कोसने के लिए हो रहा है, और सरकार के लोग अपना बचाव भी कर रहे हैं, और यह भी लिख रहे हैं कि विनोदजी की आड़ में लोग अपना एजेंडा आगे न बढ़ाएं।
मेरा विनोद कुमारजी से परिचय तकरीबन आधी सदी का है, लेकिन मैंने उनके करीब के दायरे में उस वक्त आने-जाने की कोशिश नहीं की जब उनकी सेहत के लिए लोगों का उनसे कुछ दूर रहना ही बेहतर था। वे इतने सज्जन हैं कि वे न लोगों को रोक-टोक सकते थे, और न उनके नाम को लेकर बीते बरसों में छेड़े जा रहे विवादों पर वे कुछ बोलते थे। आज उनकी जो गंभीर हालत है, उसे देखते हुए भी जो लोग भी तस्वीरों से या लिखकर अपने एजेंडा को आगे बढ़ा रहे हैं, अपने-आपको आगे बढ़ा रहे हैं, उससे मुझे अफ्रीका की एक तस्वीर याद आ रही है। उस विख्यात या कुख्यात तस्वीर में एक बच्चा भूख से मरने की कगार पर है, उसके पीछे कुछ कदम दूरी पर एक गिद्ध बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहा है, और एक अमरीकी फोटोग्राफर ने यह भयानक पल कैमरे में कैद करके दुनिया के सामने अफ्रीका के अकाल और भूखमरी को पेश किया था। बाद में उस फोटोग्राफर से बची पूरी जिंदगी यह सवाल होते रहा कि फोटो खींचने के अलावा उसने मौत के करीब पहुंचे उस भूखे बच्चे के लिए क्या किया? क्या उसे गिद्ध से बचाने की कोशिश की, या उससे एक तस्वीर कमाकर वाहवाही पाने वह अपनी सहूलियत की दुनिया में लौट गया था, इस मरणासन्न बच्चे को गिद्ध के हवाले छोड़कर। बाद में यह खबर भी फैली थी कि इस फोटोग्राफर ने दुनिया के सवालों से परेशान होकर खुदकुशी कर ली थी, लेकिन सच यह था कि वह अपनी जिंदगी की कुछ और चीजों से परेशान था, और उनके चलते उसने खुदकुशी की थी।
दिल्ली का वायु प्रदूषण न सिर्फ दिल्ली, बल्कि पूरी दुनिया का दिल दहला रहा है। जिन लोगों को दिल्ली नहीं भी जाना है, उन्हें भी लगता है कि अगर किसी दिन उनके शहर की हालत हिन्दुस्तान की इस राजधानी जैसी हो गई, तो क्या होगा? दिल्ली की ताकत में भला कोई कमी तो थी नहीं कि उसकी कोई अनदेखी हुई। वहां भारत की सरकार बैठती है, संसद वहीं है, और सुप्रीम कोर्ट भी वहीं है। अंग्रेजों के वक्त के बनाए और बसाए हुए दिल्ली के सबसे ताकतवर रिहायशी इलाकों के लालच में देश की तमाम संवैधानिक संस्थाएं भी वहीं हैं। और इन सबके वहां रहने से इनसे जुड़़े हुए केन्द्र सरकार के, या राष्ट्रीय स्तर के सारे दफ्तर और संस्थान भी वहीं हैं। चूंकि सरकार वहीं हैं इसलिए सारे अंतरराष्ट्रीय मिशन वहीं हैं, दुनिया भर के देशों के दूतावास और उच्चायोग भी वहीं हैं। फिर मानो यह काफी न हो, तो दिल्ली देश के दिल में बसी हुई हैं, इस नाते प्रदेशों की आपसी आवाजाही का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्र से होकर गुजरता है। उत्तर भारत का केन्द्र होने के नाते दिल्ली ही सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, और हर दिन लाखों कारें इस हवाई अड्डे पर आती-जाती हैं।
ऐसी दिल्ली का प्रदूषण आज इतना भयानक है कि वहां कई किस्म की गाडिय़ों का दाखिला रोक देना पड़ा है, निर्माण कार्य रोक दिए गए हैं, इमारतों के भीतर होने वाले कई तरह के दूसरे काम भी रोक दिए गए हैं। दिल्ली के डॉक्टर अपने बुजुर्ग मरीजों और सांस की तकलीफ वालों को दिल्ली छोडक़र कहीं और जाने की सलाह हर बरस कई महीने देते हैं। यह नौबत बहुत ही भयानक इसलिए है कि बाजार में पहुंचने वाले ग्राहक भी घट चुके हैं, लोगों की उत्पादकता घट चुकी है, सिर्फ एक चीज बढ़ी है, वह है इलाज का खर्च। ऐसी दिल्ली में केन्द्र और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के निर्देशों पर प्रदूषण में कमी लाने की कई तरह की योजनाएं बनाई हैं, जो जाहिर तौर पर पूरी तरह नाकाफी हैं, और इसीलिए प्रदूषण घटने का नाम नहीं ले रहा है। यह भी तब है जब हिन्दुस्तान किसी ज्वालामुखी के मुहाने पर नहीं हैं कि वहां का लावा और धुआं हालत को और तबाह कर दे। यह बिना किसी प्राकृतिक आपदा के पूरी तरह मानवनिर्मित आपदा है, और इससे जूझने के लिए पूरी तरह बुद्धिहीन मानव सत्ता की अपनी ताकत का इस्तेमाल करके कहीं कृत्रिम बारिश करवाने की कोशिश कर रहे हैं, तो कहीं प्रदूषण नापने वाले उपकरणों के आसपास के इलाकों में पानी छिडक़ रहे हैं, ताकि प्रदूषण की रीडिंग कम आए।
वैसे तो सुप्रीम कोर्ट खुद भी परेशान है क्योंकि उसके सारे जजों के फेंफड़े साथ छोड़ रहे हैं, वे अपने बंगलों में भी घूम नहीं पा रहे हैं, और खुले में कहीं भी नहीं जा पा रहे हैं। फिर भी इन जजों की निगरानी में सरकारों की सारी कोशिशें ऐसी कतरा-कतरा हरकतें हैं कि जिनसे प्रदूषण मेें कोई कमी नहीं आनी है, और हो सकता है कि आने वाले बरसों में ऐसी जहरीली हवा से मौतें और बढ़ती चली जाएं, और दिल्ली के लोगों की औसत उम्र घटती चली जाए। आज जरूरत इस अदूरदर्शिता से उबरने की है। इसके लिए भारत को अपने संघीय ढांचे के बारे में सोचना होगा कि क्यों हर चीज दिल्ली में केन्द्रित होनी चाहिए? देश के कम से कम चार अलग-अलग हिस्सों में राज्य सरकारों से प्रस्ताव मांगने चाहिए कि अगर केन्द्र सरकार के दफ्तर दिल्ली के बाहर कहीं ले जाए जाएंगे, तो कौन से राज्य उसके लिए जमीन देने तैयार हैं, और कौन सी सहूलियतें जुटाकर देंगे। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय तय होना था, तो अमरीका ने न्यूयॉर्क शहर में उसके लिए न सिर्फ जगह दी, बल्कि अपने कानूनों में उसके कामगारों के लिए कई तरह की छूट भी दी। भारत में किसी प्रदेश में किसी कानूनी छूट की जरूरत नहीं है, लेकिन एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन से आसान पहुंच वाले, प्रदूषणमुक्त, पर्याप्त सडक़ों और बिजली के ढांचे वाले इलाके कौन से प्रदेश केन्द्र सरकार को दे सकते हैं, उसके बारे में राष्ट्रीय स्तर पर तुरंत एक योजना बनानी चाहिए। जब दिल्ली से देश भर के दफ्तर घटेंगे, तो ही दिल्ली की आबादी घटेगी, वहां साधनों और सुविधाओं की खपत घटेगी, सडक़ें सांस ले सकेंगी, और प्रदूषण घटेगा। केन्द्र सरकार और देश की दूसरी संवैधानिक संस्थाओं के बहुत से दफ्तरों को देश के अलग-अलग हिस्सों में ले जाना एक दूरदर्शिता की बात होगी, और उससे दस-बीस बरस बाद बढऩे वाला खतरा खत्म हो जाएगा। इससे देश के संघीय ढांचे को भी एक मजबूती मिलेगी, और लोगों की महज दिल्ली आवाजाही देश के कई हिस्सों की आवाजाही में बदलेगी।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आमतौर पर एक गंभीर नेता माने जाते हैं, यह एक अलग बात है कि मुख्यमंत्री पद की शपथ 10वीं बार लेने के लिए वे समय-समय पर गठबंधन बदलते रहे हैं, लेकिन बातचीत होश-हवास की करते हैं। ऐसे में अभी सरकारी डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र देने के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच पर से जब वे एक मुस्लिम डॉक्टर को कागज सौंप रहे थे, तो कैमरों के सामने ही वे झुके, हाथ बढ़ाया, और यह क्या है कहते हुए इस डॉक्टर का हिजाब खींच दिया। कहीं भी मुख्यमंत्री जो भी करते हैं, उनके आसपास के लोग उसे स्थाई रूप से तारीफ के लायक पाते हैं, और नीतीश की इस हरकत के वीडियो में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय, और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव दीपक कुमार हँसते हुए दिखते हैं। ऐसा तो है नहीं कि नीतीश अपने इतने लंबे राजनीतिक जीवन में इफ्तार-दावते करते हुए भी मुस्लिम महिला की पोशाक के इस कपड़े को जानते नहीं होंगे। इस राज्य में 17 फीसदी से अधिक मुस्लिम हैं, इसलिए नीतीश हिजाब को भी जानते हैं, उसके धार्मिक रीतिरिवाज से भी वाकिफ हैं, और 75 बरस के भारतीय होने की वजह से वे भारतीय महिला के साथ किसी पुरूष की सीमाओं को भी जानते हैं। इसके बाद भी उन्होंने ऐसी हरकत क्यों की, यह हैरानी की बात है। ऐसा लगता है कि उनका दिमाग 15 बरस लेट सठियाया है।
दिक्कत यह है कि जिस एनडीए का वे हिस्सा हैं, उस एनडीए के यूपी के एक मंत्री संजय निषाद से मीडिया के एक कैमरे पर जब पूछा गया कि नीतीश ने ऐसा क्यों किया होगा, तो इस अधेड़-बुजुर्ग मंत्री का कहना था- अरे वो भी तो आदमी है न, छू दिया तो इतना पीछे नहीं पड़ जाना चाहिए। कहीं और छू दिया होता, तो क्या होता? इस पर माइक थामे हुए रिपोर्टर भी टक्कर से हँसते हुए पूछता है- तो आपको क्या लगता है, कि कहीं और भी छू लेते क्या? इस पर यह मंत्री कहता है- नकाब छूने पर इतना कहा जा रहा है, तो कहीं और छू देते, चेहरा छू देते, या उंगली कहीं और लग जाती, तो क्या कहते? नकाब को छूना तो लाजिमी है।
जो मर्दों के दबदबे वाली सोच है उसे इस बात पर हैरानी हो रही है कि एक सरकारी डॉक्टर का हिजाब मुख्यमंत्री ने खींच लिया, तो इसमें उनकी आलोचना क्यों होनी चाहिए? एक तो महिला, जिसकी कि इस देश में सैकड़ों बरस से ऐसी ही स्थिति है। दूसरी बात यह कि वह एक मुस्लिम महिला है, जिसके साथ शायद आज के भारत में कुछ और हद तक आजादी ली जा सकती है। फिर अगर वह महिला मुस्लिम धर्म या रीति-रिवाज के मुताबिक कोई हिजाब पहनी हुई है, तो उसे तो खींचा ही जा सकता है। नीतीश के मंत्री अब सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि चेहरा ढांके हुए हिजाब लगाने से तो मरीजों को डॉक्टर की सिर्फ आंखें ही दिखाई देंगी, ऐसे में काम कैसे चलेगा? कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर ऐसी फूहड़ बातों के जवाब में यह लिखा है कि उनके जितने ऑपरेशन हुए उनमें डॉक्टर और नर्स सभी ने चेहरों पर मास्क बांध रखा था, और उनकी सिर्फ आंखें ही दिख रही थीं।
जिस बिहार में मुस्लिम वोट मायने रखते हैं, वहां पर नीतीश की यह हरकत बुढ़ापे में बचकानी है, सठियाई हुई है, और मुस्लिम महिला के प्रति हिकारत से भरी हुई भी है कि उसे जैसा चाहे वैसा छुआ जा सकता है। अब इस हिकारत में उसका मुस्लिम होना अधिक मायने रखता है, या उसका महिला होना, यह तो तभी पता लग सकेगा जब नीतीश अपनी हरकत के बारे में मुंह खोलेंगे। फिलहाल तो देश में जो लोग सही या गलत के बारे में सोचने के लिए किसी का मुस्लिम होना या न होना काफी मानते हैं, उनके लिए नीतीश की हरकत में कोई बुराई नहीं है, जैसा कि यूपी का यह मिनिस्टर हँसते हुए कैमरे पर कहता है। अब जब विपक्षी पार्टियां इस हरकत के लिए औपचारिक रूप से नीतीश को बेशरम लिख रही हैं, कांग्रेस यह पूछ रही है कि बिहार के सबसे बड़े पद पर बैठा आदमी जब ऐसी हरकत कर रहा है, तो सोचिए कि राज्य में महिलाएं कितनी सुरक्षित रहेंगी? कांग्रेस ने मांग की है कि नीतीश को इस घटिया हरकत के लिए तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। यह घटियापन माफी के लायक नहीं है। आरजेडी ने लिखा है कि नीतीशजी की मानसिक स्थिति अब बिल्कुल ही दयनीय स्थिति में पहुंच चुकी है। देवबंदी मौलवी कारी इसहाक गोरा ने कहा है कि इसे देखकर केवल मेरा ही नहीं, पूरे देश की जनता का खून खौल उठा होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में नीतीश को पूरे देश की महिलाओं से माफी मांगनी होगी।
नीतीश कुमार असल राजनीति को अच्छी तरह समझने वाले नेता हैं। बिहार पर्याप्त मुस्लिम आबादी वाला राज्य है, और नीतीश कुमार भारत के राजनीतिक पैमाने पर मुस्लिमों से हमदर्दी रखने वाली आरजेडी के साथ भी गठबंधन में रह चुके हैं, और भाजपा के साथ भी। वे आज पूरे देश में मुस्लिम समुदाय के साथ हो रहे सुलूक को भी समझते हैं, और वे तनावपूर्ण मुस्लिम भावनाओं से भी वाकिफ हैं। जब कोई समाज आहत चल रहा हो, तो उसके रिवाजों के साथ इस तरह की निहायत गैरजरूरी आजादी लेना परले दर्जे की गैरजिम्मेदारी भी है। हिन्दू-मुस्लिम से परे भी किसी महिला के कपड़ों के साथ, उसके बदन के साथ किसी तरह की आजादी उसके बहुत करीबी परिचित भी नहीं लेते। नीतीश को बुढ़ापे में आकर कम से कम इतनी अक्ल तो आ जानी थी कि सरकारी डॉक्टर बन रही एक मुस्लिम महिला आज मुख्यमंत्री की इस चुहलबाजी के मुकाबले कर भी क्या सकती है? उसे तो इसी सरकार में, इसी व्यवस्था में जिंदा रहना है, और वह मुख्यमंत्री के मुकाबले किसी टकराव में इंसाफ पाने की कोई उम्मीद तो रख नहीं सकती।
अमरीका ने अभी अधिकतर किस्म के वीजा के लिए यह जरूरी कर दिया है कि अर्जी देने वाले लोग पिछले पांच बरस के अपने सभी तरह के सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी दें, अपने सारे फोन नंबर दें, ईमेल पते दें ताकि उनके आवेदन पर विचार करने के पहले अमरीकी सरकार यह देख सके कि उनकी हरकतें कैसी रही हैं, और उनकी सोच कैसी हैं। वैसे तो दुनिया का हर देश विदेशियों को आने की इजाजत देने का विशेषाधिकार रखता है, और बहुत से देश वीजा आवेदन खारिज करते समय यह बताते भी नहीं कि क्यों मना किया जा रहा है। अब अमरीका लोगों के सोशल मीडिया प्रोफाइल की जांच करेगा, और देखेगा कि क्या वे नफरत फैलाने वाले हैं? क्या वे किसी तरह की उग्रवादी सोच रखते हैं, क्या वे किसी तरह की हिंसा से जुड़े रहे हैं, उनकी हरकतें आतंकियों जैसी हैं? इसके अलावा अमरीकी सरकार की यह भी सोच है कि किसी तरह की धार्मिक हिंसा फैलाने वाले लोगों को भी अमरीका नहीं आने देना चाहिए, या जो लोग भडक़ाऊ और उकसाऊ बातें करते हैं, उन्हें भी वहां आने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।
भारत में आज दसियों लाख लोग सोशल मीडिया पर आए दिन गंदी गालियों, हिंसक धमकियों, और नफरती साम्प्रदायिकता फैलाने का काम करते हैं। आज अल्पसंख्यक धर्मों का विरोध करते हुए लोग उनकी प्रार्थना सभाओं पर हमले करते हैं, और उन बातों को, अपनी गौगुंडई को सोशल मीडिया पर शान के साथ पोस्ट करते हैं। अब मजे की बात यह है कि ऐसे लोग हजारों रूपए की वीजा फीस देकर अपनी अर्जी अमरीकी वीजा सेंटर में लगाएंगे, वहां पर उनके फिंगर प्रिंट, आंखों की पहचान के बायोमेट्रिक्स भी ले लिए जाएंगे, उनके बैंक खाते और सोशल मीडिया की हर जानकारी ले ली जाएगी, फिर जब वीजा अर्जी खारिज की जाएगी, तो भी अमरीका के पास ऐसे विदेशियों की हर जानकारी मौजूद रहेगी। अगर अमरीकी दूतावास पहले ही अर्जी खारिज करना तय कर लेंगे, तो भी हो सकता है कि वे अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए कई और किस्म के सवाल करके उनके जवाब दर्ज करके रखें। नतीजा यह होगा कि अमरीकी सरकार के पास भारत के ऐसे तमाम आवेदकों के बारे में जानकारी रहेगी जो किसी धर्म से, किसी जाति से, किसी और वर्ग से नफरत करते हैं। इसके बाद अमरीकी सरकार एआई की मदद से ऐसे लोगों का कई तरह से उपयोग भी कर सकती है। उसे दुनिया के दूसरे देशों में तबाही फैलाने से कोई परहेज नहीं है, वह सिर्फ अपने देश में, और अपनी जमीन पर बर्बादी नहीं चाहती। इसलिए जानकारी के अपने विशाल भंडार का इस्तेमाल अमरीका अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए के मार्फत तरह-तरह से कर सकता है। आज अमरीकी वीजा का आवेदन भरते हुए लोग अपने पिछले पांच-दस बरस की हर बैंक जानकारी, दौलत की जानकारी, बैंक कर्ज और जुर्म की जानकारी, परिवार के दूसरे सदस्यों की जानकारी तो देते ही थे, अब वे सोशल मीडिया पर अपनी सोच, अपने दोस्त-परिचित, अपनी हरकत की जानकारी भी अमरीकी अधिकारियों के सामने रख देंगे।
आज जिस तरह सडक़ों पर कुछ किशोर और नौजवान लोग जेब में चाकू लेकर चलते हैं, या सडक़ पर किसी और तरह से गुंडागर्दी करते हैं, उसी तरह सोशल मीडिया पर आज साम्प्रदायिक, नफरती, धर्मान्ध, जातिवादी लोग लगातार हिंसा की बातें करते हैं। एक-एक सफल या चर्चित महिला के पीछे हजारों लोग हिंसक और अश्लील तरीके से लग जाते हैं। आज जिसकी वीजा अर्जी अमरीका खारिज कर देगा, उसकी वीजा अर्जी दुनिया के और कई देश भी खारिज कर सकेंगे। देशों के बीच घोषित या अघोषित रूप से जानकारी का लेन-देन चलते रहता है, और कल के दिन यह पता लगेगा कि अमरीका और यूरोपीय यूनियन के बीच जानकारी का ऐसा लेन-देन है कि किसी की वीजा अर्जी खारिज होने की जानकारी एक-दूसरे से मिल सकेगी। ऐसे में भारत या किसी भी देश के हिंसक लोगों के लिए किसी भी बड़े या महत्वपूर्ण देश जाना मुश्किल होने लगेगा। आज भारत से हर बरस दसियों लाख मां-बाप भी अपने अमरीका-बसे बच्चों के पास आते-जाते हैं। उन बच्चों का वहां का रोजगार वैसे ही खतरे में पड़ा हुआ है, और पता लगेगा कि परिवार के दूसरे लोग सोशल मीडिया पर नफरती और हिंसक फतवे देते रहते थे, और वे अमरीका को नापसंद लिस्ट में दर्ज हो गए। इसके बाद लोग अपने आल-औलाद के पास भी नहीं जा सकेंगे।
छत्तीसगढ़ विधानसभा का एक विशेष सत्र कल पहली बार इतवार को हुआ, और इसमें वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी ने ‘अंजोर 2047’ नाम की एक रिपोर्ट पेश की कि जब देश की आजादी की सालगिरह रहेगी, तब तक छत्तीसगढ़ किस दिशा में आगे बढ़ेगा, और कहां पहुंचेगा। वित्तमंत्री अगले 20 बरस का अंदाज लगाने के लिए कुछ खूबियां रखते हैं, वे मंत्रिमंडल में अकेले भूतपूर्व नौकरशाह हैं, गांव और गरीबी से ऊपर उठे और आईएएस बने भोला छत्तिसगढिय़ा भी हैं, निजी जीवन में वे शेयर बाजार में पूंजीनिवेश करते हुए देश के कारोबार, अर्थव्यवस्था, और वित्तीय चीजों को बेहतर समझते भी हैं। महत्वपूर्ण मंत्रियों में वे सबसे नौजवान भी हैं, इसलिए वे 2047 का अंदाज लगाने के लिए तब तक सक्रिय रह सकने वाले नेताओं में से भी एक हैं।
खैर, किसी एक व्यक्ति पर चर्चा आज का मकसद नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ को लेकर अपनी सरकार की जो कल्पनाएं उन्होंने सामने रखी हैं, वैसी कई कल्पनाएं भारत की मोदी सरकार भी बीच-बीच में सामने रखती है, और अब पांच-पांच बरस के लिए किसी सोच का वक्त खत्म हो गया है, और अब सरकारें, राजनीतिक दल, और नेता 2047 तक का वक्त मांगने लगे हैं, तब तक के सपने दिखाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ ने अपने अस्तित्व के पिछले 25 बरस देखे हैं, और अगले 20-22 बरस की कल्पना अभी की सरकार ने सामने रखी है। यह एक अलग बात है कि हर पांच बरस में जनता यह तय करती है कि अगला कार्यकाल किस पार्टी को देना है, और 2047 तक तीन-चार सरकारें आ सकती हैं।
कल जब छत्तीसगढ़ का यह विजन डॉक्यूमेंट सामने आया, उसी वक्त अमरीका की एक खबर भी आई कि किस तरह वहां पर अभी 40-45 बरस के लोग अधेड़ उम्र में एक बार फिर स्कूल-कॉलेज जा रहे हैं, दिन भर के काम के बाद रात की क्लास पहुंच रहे हैं, ताकि वे अपने मौजूदा हुनर को बेहतर कर सकें, या कोई ऐसा नया हुनर सीख सकें जिस पर एआई के हमले से उसकी जरूरत खत्म होने का खतरा न हो। हम अपने इस कॉलम में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बार-बार इस बात को उठाते हैं कि दुनिया के तमाम कामगारों को इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि अगर एआई उनके काम को इंसानों के मुकाबले बेहतर तरीके से कर सकेगा, तो वे कहीं के नहीं रह जाएंगे। एक तरफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग से जुड़ा हुआ, और कम्प्यूटर प्रणालियों से नियंत्रित रोबो है, जो मशीन मानव एक ही किस्म के दुहराए जाने वाले कामों से इंसानों को तेजी से बेदखल कर रहा है, और दूसरी तरफ एआई है जिसकी संभावनाओं की आशंका भी अभी इंसानों को ठीक से नहीं हो पाई है। अमरीका के कैलिफोर्निया में बिना ड्राइवर वाली कारों में घूमकर लौटने वाले सोशल मीडिया पर लिखते हैं कि उनका तजुर्बा कैसा रहा। हर दिन अमरीका से लेकर चीन तक कई देशों में लगातार ऐसी कारें बढ़ती जा रही हैं, और ऐसी कारें हर किलोमीटर के बाद कुछ अधिक अनुभवी और माहिर भी होते चल रही हैं। अब अमरीका और दूसरे कुछ देशों के फुटपाथों पर सामान पहुंचाने वाली छोटी-छोटी सी पहियों वाली गाडिय़ां दौड़ते दिखती हैं जो कि कैमरों से लैस हैं, भीड़ और ट्रैफिक के बीच चलना जानती हैं, और कूरियर कहे जाने वाले लोगों की नौकरियां खाती जा रही हैं।
अमरीका की खबर बता रही है कि वहां अधेड़ लोगों के पढऩे और सीखने के लिए जो सस्ते कॉलेज हैं, वहां पर लोग अब शौक में नहीं, आशंका में पहुंच रहे हैं कि अगर वे अपना काम बेहतर नहीं करेंगे, तो वे बेरोजगार हो जाएंगे। हमने आज की यह बात छत्तीसगढ़ के 2047 तक के सपने से जोडक़र शुरू की है। अगले 20-25 बरस का कोई भी सपना आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की पूरी मार का अंदाज लगाए बिना नहीं देखा जा सकता। एक तरफ मशीनें हैं जो कि तेजी से इंसानों को बेदखल कर रही हैं। सदियों से धान के खेतों में फसल काटने के लिए लगने वाले मजदूरों की जरूरत अब खत्म सी हो गई है, क्योंकि पंजाब से बड़ी-बड़ी दानवाकार मशीनें आकर कुछ घंटों में ही फसल काटकर किसान को दे देती हैं, और लागत शायद इंसानी मजदूरी से कम पड़ती है। धीरे-धीरे खनिज से जुड़े हर काम में मजदूरों की जरूरत कम होती जाएगी, क्योंकि मशीनें उन कामों को संभाल लेंगी। खेत और खदान में इंसानों की जरूरत अगर घटेगी, तो वह एक बड़ा फर्क रहेगा, और उनके लिए किसी वैकल्पिक रोजगार का कोई सपना अभी दिखता नहीं है। दूसरी तरफ सरकारी कामकाज, स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई, इन सबमें एआई का इस्तेमाल वैसे भी शुरू हो गया है, और यह दो-ढाई दशक में किस तरह इंसानों के बिना होने लगेगा, ऐसा बुरा सपना अभी लोगों को समझ नहीं पड़ रहा है। क्लासरूम शिक्षक की जगह बड़ी-बड़ी स्क्रीन, और सबसे काबिल और माहिर शिक्षक के रिकॉर्ड किए हुए व्याख्यान, या उनसे ऑनलाईन सवाल-जवाब से नौकरियां बहुत बुरी तरह खत्म हो जाएंगी। आज भी छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भारत सरकार की एक योजना के तहत जिस तरह ई-फाइल का काम चलने लगा है, उसकी रफ्तार देखने लायक है। घंटे भर में एक फाइल किसी जिले से निकलकर सचिव से होते हुए मुख्य सचिव तक पहुंचकर, मंजूरी या नामंजूरी पाकर वापिस जिले तक पहुंच सकती हैं, और कुछ मामलों में पहुंच भी रही होगी। अभी तक इसमें सिर्फ कम्प्यूटरों का इस्तेमाल है, एआई इसमें दाखिल नहीं हुआ है, लेकिन उसके दाखिल होने के बाद तस्वीर और बुरी तरह बदल सकती है।
हमारा ख्याल है कि आज दुनिया का कोई भी देश हो, उसे अपने हर रोजगार को लेकर, हर कामगार को लेकर एआई की रौशनी में भविष्य का अंदाज लगाना चाहिए। किसी भी समाज की उत्पादकता बेरोजगारों की भीड़ में नहीं हो सकती। कम्प्यूटर और एआई, अपने से और अधिक बेरहम कारोबार के साथ मिलकर इंसानों के लिए बहुत बड़ी तबाही ला सकते हैं। जिस तरह आज इंसान कोई सामान दस रूपए सस्ता मिलने पर पड़ोस की दुकान छोड़ ऑनलाईन खरीदने लगते हैं, उसी तरह उद्योग-व्यापार के मैनेजमेंट मजदूरी और हुनर के किसी भी काम को मशीन और एआई से सस्ते में निपटने पर इंसानों को पल भर में धंधे से बाहर कर देंगे।
अमरीका में अभी एक मुकदमा अदालत में दायर किया गया है कि ओपन एआई नाम की एआई कंपनी के चैटजीपीटी की वजह से 83 बरस की एक महिला के बेटे ने उसका कत्ल कर दिया। 56 बरस का उसका बेटा कुछ मानसिक परेशानियों से गुजर रहा था, और वह चैटजीपीटी से अपने संदेहों को लेकर चर्चा करता था। इस भूतपूर्व आईटी पेशेवर ने चैटजीपीटी से चर्चा की थी कि उसकी मां के घर पर एक कम्प्यूटर-प्रिंटर रखा हुआ है, और उसे शक है कि इसका इस्तेमाल उसकी जासूसी करने के लिए किया जा रहा है, और यह एक जासूसी उपकरण हो सकता है। इस पर चैटजीपीटी ने जवाब दिया था- आपका अंदाज बिल्कुल सही है, यह सिर्फ एक प्रिंटर नहीं है, इसका इस्तेमाल आपकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा है। चैटजीपीटी ने इस मानसिक रोगी को यह भी कहा था कि उससे जुड़े लोग, पुलिस अधिकारी, और उसके दोस्त भी उसके खिलाफ काम करने वाले एजेंट हैं। इसके बाद इस बेटे ने अपनी मां का कत्ल कर दिया था, और खुदकुशी कर ली थी। इसके पहले भी चैटजीपीटी पर खुदकुशी के लिए उकसाने के कई मुकदमे दायर हो चुके हैं क्योंकि लोगों से बात करने वाला यह कम्प्यूटर प्रोग्राम, उनकी निराशा को कई मामलों में खुदकुशी तक बढ़ाते पाया गया है। इस ताजा मामले में इस मानसिक विचलित 56 बरस के बेटे को चैटजीपीटी एक-एक बार में घंटों तक बातचीत में उलझाकर रखता था, और उसके दिमाग में भय भरी आशंकाओं को बढ़ाते चलता था, और उसके आसपास के लोगों, खासकर उसकी मां के बारे में बहुत बुरी तरह संदेह पैदा करते चलता था।
एआई औजार का यह हाल तो तब है जब वह अभी अपने को विकसित करने वाली कंपनियों के हाथ में ही है। अभी तक वह मुजरिमों, आतंकियों, और नफरतजीवियों के हाथों में पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो रहा है। जिस दिन इन तबकों के लोग एआई को हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे, हो सकता है कि वे किसी धर्म या जाति के लोगों को सामूहिक आत्महत्या की प्रेरणा दें, हो सकता है कि वे किसी सम्प्रदाय के गुरू का गढ़ा हुआ ऐसा वीडियो उस सम्प्रदाय के मानसिक रूप से कमजोर लोगों तक भेजें जिनमें गुरू मरने-मारने की प्रेरणा दे रहा हो। हो सकता है किसी धर्मान्ध के सामने किसी दैवीय आकाशवाणी को इस तरह पेश किया जाए कि वह दूसरे लोगों को मरने-मारने पर उतारू हो जाए। आज तो किसी धर्म पर आस्था ही लोगों को सामूहिक हत्या की प्रेरणा दे देती है, अगर एआई की मदद से ऐसे ऑडियो या वीडियो बनाए जाएं, जो कि लोगों को सीधे ईश्वर से आए हुए लगें, तो हो सकता है कि वे थोक में हत्या और आत्महत्या करने वाले समूह बन जाएं।
एआई से घुसपैठिया सॉफ्टवेयर बनाकर लोग बड़ी आसानी से मानसिक चिकित्सालयों, और परामर्शदाताओं के कम्प्यूटरों में घुस सकते हैं, और मानसिक रूप से अस्थिर, परेशान, विचलित, हिंसक लोगों की लिस्ट बना सकते हैं कि उन्हें किस-किस तरह भडक़ाया जा सकता है। जब लोगों की पहुंच दूसरों के फोन और मैसेंजर सर्विसों में दर्ज संदेशों तक होने लगेगी, तो एआई की मदद से उन्हें ब्लैकमेल भी किया जा सकता है, और कई तरह के नाजायज कामों के लिए मजबूर भी किया जा सकता है। एआई की ताकत का एक बड़ा छोटा सा नमूना यह हो सकता है कि ऑनलाईन शॉपिंग करने वाले कौन से लोग पोर्नो खरीदते हैं, कौन से लोग नशा या हथियार खरीदते हैं, कौन हैं जो सेक्स खरीदते हैं, या किस तरह की दवाइयां खरीदते हैं। ऐसे लोगों का विश्लेषण करके एआई ऐसी समर्पित फौज तैयार कर सकता है जिसे प्रभावित करके, या जिसकी बांह मरोडक़र उनसे नाजायज काम करवाए जा सकते हैं। लोगों को याद होगा कि अभी पिछली ही बरस इजराइल की खुफिया एजेंसी ने दुनिया की पेजर बनाने वाली एक कंपनी से खरीदी के एक बड़े ऑर्डर का सुराग निकाला था, और फिर उस सप्लाई की जगह अपने विस्फोटकों से भरे हुए पेजर सप्लाई किए थे जो कि लेबनान के हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला के तमाम नेताओं द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे। इसके बाद एक संदेश भेजकर इजराइल ने उन तमाम पेजरों में विस्फोट करवा दिया था, और बहुत से लोग मारे गए थे। एक जरा से औजार का ऐसा भयानक हथियार सरीखा इस्तेमाल बिना एआई का था, अब अगर एआई की असीमित ताकत के साथ तबाही की ऐसी नीयत को जोड़ दिया जाए, तो क्या नहीं हो सकता?
एआई से आज दुनिया भर की लोकतांत्रिक ताकतें यह सीधा खतरा महसूस कर रही हैं कि वह जनभावनाओं और जनमत को किसी नेता, पार्टी, या विचारधारा की तरफ मोडऩे का काम कर सकता है, या पिछले कुछ चुनावों से कर भी रहा है। इससे किसी खास विचारधारा, या किसी कारोबार को पसंद पार्टी की जीत की संभावना बढ़ाई जा सकती है, किसी और पार्टी या नेता की हार की गारंटी बढ़ाई जा सकती है। आज दुनिया भर में पानी फिल्टर करने वाले कारखानों से लेकर बिजलीघरों तक सब कुछ कम्प्यूटरों से नियंत्रित होता है। साइबर हैकर वैसे भी दुनिया के कई सबसे सुरक्षित कम्प्यूटरों में घुसपैठ करते रहते हैं, अब अगर इसके साथ-साथ एआई की ताकत और जुड़ जाए, तो वे सोच से परे की तबाही ला सकते हैं। हम पहले भी लिख चुके हैं कि किसी धर्म के खिलाफ काम करने वाले लोग उस धर्म के लोगों तक सप्लाई होने वाले खानपान, दवाओं, और दूसरे सामानों में मिलावट कर सकते हैं, रसायनों का अनुपात बदल सकते हैं, किसी तरह की गैस रिलीज कर सकते हैं, वोल्टेज को बढ़ाकर सारे उपकरणों को जला सकते हैं। इसी तरह एआई की ताकत से लैस आतंकी समूह किसी प्रयोगशाला से तरह-तरह की बीमारियों के वायरस रिलीज कर सकते हैं, और कोरोना जैसी एक नौबत ला सकते हैं। अब कल्पना करें कि कोई एक समूह जिस वक्त कोई वायरस जारी करे, उसी वक्त वह उसके इलाज या रोकथाम के टीकों, और उसकी दवाओं के कारखानों में मिलावट करवा दे, लेबल बदलवा दे, या उत्पादन ठप्प करवा दे, तो क्या होगा? जिस वक्त ऐसी कोई महामारी फैलाई जाए, उसी वक्त मरीजों के कम्प्यूटर रिकॉर्ड गायब करवा दिए जाएं, तो क्या होगा?
लोकसभा के कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भारतीय सांसदों पर पार्टी व्हिप के प्रावधान को खत्म करने, या कम से कम सीमित करने का एक निजी प्रस्ताव सदन में रखा है। उनका तर्क यह है कि सांसदों को पार्टी के निर्देशों के मुताबिक मतदान करने की मौजूदा बंदिश खत्म की जाए, क्योंकि अभी पार्टी के कहने के बाद अगर कोई उस निर्देश के खिलाफ वोट डालते हैं, तो उनकी सदन की सदस्यता पार्टी के नोटिस पर खत्म की जा सकती है। यह भारत के दलबदल कानून से पार्टी व्हिप को जोड़ देने की वजह से हुआ है कि कोई सांसद अगर पार्टीलाईन के खिलाफ वोट दे, तो उसे बागी करार दिया जाता है, और इसके दाम उस सांसद को सदस्यता की शक्ल में चुकाने पड़ सकते हैं। मनीष तिवारी सुप्रीम कोर्ट के एक वकील हैं, और कांग्रेस की राजनीति में लंबे समय से हैं। वे लोकसभा के निर्वाचित सदस्य हैं, और उनकी यह सोच पार्टी का अधिकृत सोच नहीं भी है, तो भी यह पार्टी का किसी तरह का विरोध भी नहीं है। भारतीय संसद में इस तरह के प्राइवेट मेंबर बिल सफल नहीं होते हैं, वे कानून नहीं बन पाते, लेकिन वे बहस का एक मुद्दा तो बन ही जाते हैं, और ऐसे मुद्दों पर सदन से सडक़ तक चर्चा होने लगती है।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम भारतीय संसद में विचारों की विविधता खत्म होने पर कई बार पहले भी फिक्र जाहिर कर चुके हैं, और इसे हम देश की जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नुकसान की शक्ल में भी देखते हैं। आज स्थिति यह है कि कोई सांसद मतदाताओं के सीधे वोट से लोकसभा पहुंचे, या सांसदों और विधायकों के वोटों से राज्यसभा पहुंचे, वे अपने मतदाताओं की सोच को सदन में नहीं रख सकते। आमतौर पर उन्हें पार्टी की सोच को ही आगे बढ़ाना पड़ता है। और जब किसी भी तरह के मतदान की नौबत आती है, तो पार्टी के सचेतक की जारी की गई नोटिस के मुताबिक ही मतदान करना पड़ता है। संसद के भीतर हालत यह रहती है कि जब किसी मुद्दे पर बहस के लिए पार्टी को उनकी सदस्य संख्या के मुताबिक समय दिया जाता है, तो अधिकतर सांसदों को अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक ही कुछ बोलना पड़ता है। लाखों वोटरों की पसंद से जो सांसद बनकर पहुंचते हैं, वे न तो अपनी मर्जी की बातें रख पाते, और न ही वे अपनी मर्जी से किसी मतदान में वोट दे पाते। इस तरह सांसदों की मौलिक सोच भी किनारे धरी रह जाती है, और व्यापक महत्व के मुद्दों पर पार्टियां ही कई तरह की सौदेबाजी कर सकती हैं, अपने सांसदों को किसी भी वोट में समर्थन या विरोध करने को कह सकती हैं। इससे लोकतंत्र में विचारों के उन्मुक्त प्रवाह पर बड़ी आंच आती है, और एक व्यक्ति के रूप में, किसी प्रदेश या लोकसभा सीट के प्रतिनिधि के रूप में सांसद सदन में पार्टीलाईन से परे कुछ नहीं बोल पाते।
मनीष तिवारी का उठाया हुआ मुद्दा एकदम सही है। आज हम अमरीकी संसद में देखते हैं कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अपनी ही पार्टी के हर सदस्य का समर्थन नहीं पाते, सदस्यों के लिए यह आम बात है कि वे अपनी पार्टी के नेता से असहमति रखें, या सदन में उसकी आलोचना करें। हमने दुनिया के कुछ प्रमुख लोकतंत्रों में संसद के भीतर दलबदल कानून के तहत पार्टी सोच से परे वोट डालने पर सदस्यता खत्म होने के खतरे को देखा, तो पता लगा कि ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इन संसदों में ऐसा कोई खतरा नहीं रहता, यहां पर कोई दलबदल कानून नहीं है। दूसरी तरफ न्यूजीलैंड, पाकिस्तान, और बांग्लादेश ही ऐसी संसदें हैं जहां पर दलबदल कानून की वजह से असहमत वोट पर सदस्यता जाने का एक सीमित खतरा रहता है। अकेला भारत ऐसा है जहां पर दलबदल कानून बहुत कड़ा बनाया गया है, और पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट डालने पर सदस्यता जाने का पूरा खतरा रहता है।
भारत में एक समय सदन में सरकार बचाने या गिराने की सौदेबाजी रोकने के लिए दलबदल कानून लाया गया था। लेकिन आज इसने सांसदों की मौलिक और निजी सोच की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुंजाइश ही खत्म कर दी है। इससे इतने विशाल लोकतंत्र की संसद में मौलिक विचारों की बहस की संभावना भी बहुत तंग हो गई है। मनीष तिवारी का प्रस्ताव यह सुझाता है कि जब सरकार पर विश्वास मत हो, यानी सरकार बचाने या गिराने की बात हो, तब तो पार्टी व्हिप के मुताबिक वोट डालना जरूरी रहना चाहिए, लेकिन बाकी विधेयकों पर सांसद को अपनी मर्जी से वोट डालने की छूट रहनी चाहिए। आज किसी विधेयक पर वोट के वक्त पार्टी का फैसला ही अंतिम होता है, और इसलिए संसद या विधानसभा में पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट देकर सदस्यता बचाने के लिए पार्टी में विभाजन साबित करना पड़ता है, और उसके लिए सदन में उस पार्टी के दोतिहाई सदस्य जरूरी रहते हैं। अब सदस्यों की व्यक्तिगत सोच के बजाय थोक में दलबदल करवाने की व्यवस्था हो गई है, और हमने कई प्रदेशों में ऐसे दलबदल से सरकारें बनते और गिरते देखा है।
एक-एक करके दुनिया की बहुत सी वैज्ञानिक संस्थाओं ने यह पाया है कि प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी के साथ-साथ माइक्रो और नैनो प्लास्टिक के कण भी पेट में जाते हैं, और वे धीरे-धीरे बदन के हर हिस्से में पहुंचने लगते हैं, खून की नलियों में पहुंचकर वे दिल और दिमाग तक भी चले जाते हैं। भारतीय शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि बाजार में पानी भरी बोतलें, जो कि सिंगल यूज प्लास्टिक रहती हैं, वे इंसानी शरीर को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साईंस ऑफ टेक्नॉलॉजी के शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि ऐसी प्लास्टिक (पीईटी) बोतलों से शरीर में जाने वाले दूसरे पदार्थ बदन की जैविक प्रणाली को खराब कर सकते हैं। अभी प्रकाशित एक शोध के नतीजों से पता लगा है कि वे इंसानों की आंतों, खून, और कोशिकाओं को सीधे नुकसान पहुंचा सकते हैं। वे आंतों में शरीर के लिए फायदेमंद जीवाणुओं को प्रभावित कर सकते हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता, पाचन, मानसिक स्वास्थ्य, और बॉडी मेटाबोलिज्म पर बुरा असर डाल सकते हैं। इनका असर इंसानी बदन के रेड ब्लड सेल्स पर भी पड़ सकता है। शरीर में कई बैक्टीरिया फायदा पहुंचाते हैं, लेकिन ऐसे नैनो प्लास्टिक से इन बैक्टीरियाओं को भी नुकसान पहुंचता है।
हम वैज्ञानिक निष्कर्षों के अधिक खुलासे में गए बिना यह चर्चा आगे बढ़ाना चाहते हैं कि किस तरह आज बड़े अफसरों और नेताओं के घर-दफ्तर में, संपन्न कारोबारियों के यहां, और संपन्न सार्वजनिक समारोहों में दो सौ एमएल की प्लास्टिक बोतल में पानी रखना शान-शौकत और स्वागत का प्रतीक माना जाता है। मेहमानों का स्वागत बोतलबंद पानी से किया जाए, इसे आज संपन्न समाज में एक न्यूनतम सार्वजनिक शिष्टाचार मान लिया गया है। ऐसी बोतलों से हर घूंट पानी के साथ नैनो प्लास्टिक के कण बदन में जाने का खतरा रहता है। इसके साथ-साथ यह भी सोचने की जरूरत रहती है कि ऐसी हर खाली बोतल धरती की छाती पर अगले सैकड़ों-हजारों बरस के प्रदूषण का बोझ बन जाती हैं, जिसका किसी भी तरह से निपटारा नहीं हो सकता। फिर इस प्लास्टिक प्रदूषण से निकलने वाले कण मिट्टी और पानी में मिलकर आगे बढ़ते हैं, फल और सब्जियों के रास्ते, दूसरी उपज के रास्ते, और इंसान के खाने वाले दूसरे प्राणियों के माध्यम से इंसान के शरीर में पहुंच जाते हैं।
प्लास्टिक के बोतलबंद पानी को लेकर हम कई अलग-अलग हिसाब से लगातार विरोध करते आए हैं। नैनो प्लास्टिक शरीर में पहुंचने की बात तो अभी हाल के बरसों में सामने आई है, लेकिन हम तो जनता के पैसों से किए जाने वाले इस खर्च के खिलाफ आगाह करते आए हैं, और सत्ता पर काबिज बड़े लोगों से यह अपील भी करते आए हैं कि वे सरकारी या दूसरी सार्वजनिक बैठकों में अपने घर से लाई गई पानी की बोतल लेकर जाएं, ताकि आयोजकों को भी यह बात समझ में आए कि ऐसा दिखावा जरूरी नहीं है। जब किसी बैठक या कार्यक्रम में मौजूद सबसे वरिष्ठ या महत्वपूर्ण लोग अपनी बोतल लेकर चलेंगे, तो बाकी लोगों के लिए भी इस सादगी और किफायत को अपनाना एक किस्म से जरूरी हो जाएगा। भारत के एक राष्ट्रपति ने अपने नाम के साथ महामहिम लिखवाना बंद करवाया था, तो हर प्रदेश के राजभवन में बिखरे महामहिम शब्द खत्म हो गए। इसके बाद अब राजभवन शब्द को हटाकर उसे लोकभवन करने की नई शब्दावली भी आ गई।
ऑस्ट्रेलिया ने बीते कल से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर यह रोक लगा दी है कि वे 16 बरस से कम उम्र के किसी बच्चे का अकाऊंट नहीं खोलेंगे। आज मौजूद अकाऊंट भी जांच-परखकर, उम्र का प्रमाणपत्र देखकर बंद करने पड़ेंगे ताकि कम उम्र के कोई बच्चे इन प्लेटफॉर्म्स पर न रहें। यह खबर तो काफी पहले से आ रही थी, लेकिन आज इस पर लिखने की एक वजह यह भी है कि इस फैसले को लागू करते हुए ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री ने बड़ी सुंदर बात कही है कि अब बच्चे अपना बचपन जी सकेंगे, दोस्तों और परिवार के साथ बातचीत में अधिक वक्त गुजार सकेंगे, और अधिक शौक पूरे कर सकेंगे। एक विकसित और आधुनिक, संपन्न और विशाल देश होने के बाद ऑस्ट्रेलिया का यह फैसला दुनिया के कुछ और जिम्मेदार देशों के सामने मिसाल बन सकता है कि वे भी अपनी किशोरावस्था वाली पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य को खतरों से बचाने के लिए, और बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 9 दिसंबर से यह फैसला लागू करते हुए कहा है कि अगर कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उम्र की जांच के मामले में लापरवाही करे तो उस पर पांच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का जुर्माना लगाया जा सकता है। सरकार का कहना है कि यह कदम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बचाने के लिए, और उन्हें ऑनलाईन प्रताडऩा और शोषण से सुरक्षित रखने के लिए भी किया गया है। वहां हुए एक सर्वे में यह पता लगा था कि 70 फीसदी से अधिक ऑस्ट्रेलियाई मां-बाप ऐसे रोक के पक्ष में थे। यह एक अलग बात है कि वहां के बच्चे इसका तोड़ निकालने की तरकीबें ढूंढ रहे हैं।
हम भारत में न सिर्फ बच्चों, बल्कि अधिक उम्र के लोगों का हाल भी देखते हैं कि वे सोशल मीडिया पर एक गंभीर और खतरनाक नशे के आदी हो गए दिखते हैं। विवाहेत्तर प्रेमप्रसंगों का एक बड़ा जरिया सोशल मीडिया बन गया है, और उस पर पोस्ट करने के लिए लोग बावलों की तरह रील बनाते हुए जान की बाजी भी लगा देते हैं। परिवारों के भीतर लोगों का एक-दूसरे के साथ उठना-बैठना कम हो गया है क्योंकि तकरीबन तमाम लोग अपने-अपने मोबाइल फोन या लैपटॉप पर जुटे रहते हैं। जहां नौजवान दोस्तों के झुंड दिखते हैं, तो उनमें अधिकतर लोग अपने-अपने फोन पर डूबे रहते हैं। इस नशे ने लोगों की पढऩे की आदत खत्म कर दी है, उन्हें एक-दो मिनट के बाद कोई भी चीज भारी पडऩे लगती है क्योंकि उनकी सोच का दायरा एक रील की लंबाई तक सीमित हो गया है। नतीजा यह है कि एक या दो मिनट के भीतर जो सबसे सनसनीखेज बात हो सकती है, वही लोगों को बांध पाती है, कामयाब होती है, और उससे कुछ कमाई भी हो सकती है।
कुछ और देशों का सोशल मीडिया पर रोक-टोक का तजुर्बा देखें, तो चीन में 2019 से ही सोशल मीडिया पर 18 साल से कम बच्चों के लिए समय सीमा तय है। कोई भी नाबालिग एक दिन में सिर्फ 40 मिनट ही टिक-टॉक के चीनी संस्करण, डोयिन का इस्तेमाल कर सकते हैं, और वह भी रात 10 से सुबह 6 बजे तक ब्लॉक हो जाता है। 2021 से चीन ने 14 साल से कम उम्र के बच्चों के गेमिंग पर भी एक घंटे की समय सीमा लगाई हुई है। इससे बच्चों में इंटरनेट की लत कम हुई है, और पढ़ाई का समय बढ़ा है। फ्रांस ने 2023 से यह कानून बना दिया कि 15 साल से कम उम्र के बच्चे अपने पालकों की अनुमति से ही सोशल मीडिया खाते खोल सकते हैं। अमरीका के अलग-अलग राज्य स्वायत्तता रखते हैं, और कुछ राज्यों में 14 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाऊंट पर रोक है। इससे बड़े 14-15 साल वाले बच्चे भी माता-पिता की सहमति से ही यह खोल सकते हैं। योरप के नार्वे में अभी यह उम्र सीमा 13 साल है, लेकिन वहां के 70 फीसदी नागरिक इसे बढ़ाकर 15 साल करना चाहते हैं। ब्राजील में मां-बाप की इजाजत से 13 साल के बाद बच्चे अकाऊंट खोल सकते हैं। अलग-अलग देशों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके मानसिक स्वास्थ्य में ऐसी रोक-टोक से फायदा देखने मिला है।


