संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट की महिला जज ने वादाखिलाफी पर रेप की रिपोर्ट लिखाने को गलत कहा
सुनील कुमार ने लिखा है
17-Feb-2026 5:01 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट की महिला जज ने वादाखिलाफी पर रेप की रिपोर्ट लिखाने को गलत कहा

देश भर की अदालतों में ऐसे दसियों हजार मामले चल रहे हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने यह रिपोर्ट लिखाई है कि किसी युवक या आदमी ने उससे शादी का वायदा करके देह-संबंध बनाए, और बाद में शादी से मुकर गया। ऐसी शिकायत के साथ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा देना बहुत आम बात है, और शायद हर राज्य की पुलिस ऐसी शिकायत पर आनन-फानन गिरफ्तारी भी कर लेती है। अभी कुछ बरसों में एक-एक करके देश के कई हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में इस बात पर फिक्र भी जाहिर की है कि लंबे वक्त तक देह-संबंध जारी रखने के बाद उसे बलात्कार कहना जायज है या नहीं? हमारे पाठकों में से जो महिलाओं के हक के अधिक हिमायती हैं, वे हमारे रूख से कुछ हैरान-परेशान होते आए हैं क्योंकि हमने बरसों से यह लिखना जारी रखा है कि शादी का वायदा करके किसी से देह-संबंध बनाना, और फिर मर्जी से, या किसी मजबूरी में शादी न करना बलात्कार नहीं होता। उसे अधिक से अधिक वायदाखिलाफी कहा जा सकता है, धोखा कहा जा सकता है, लेकिन वह बलात्कार नहीं होता। यह बात कई लोगों को बड़ी नागवार गुजरती है जो कि महिलाओं के हक के इस हद तक हिमायती हैं कि वायदा तोडऩे पर भी उन्हें बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने का हक होना चाहिए।

आज सुबह की खबर से हमें कुछ राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट में वहां की एक प्रगतिशील महिला जज, जस्टिस बी.वी.नागरत्ना, और उनके साथी जज जस्टिस उज्जवल भुइयां की बेंच ने ऐसे एक मामले में यह कहा कि शादी के पहले लडक़ा और लडक़ी अजनबी होते हैं, इसलिए विवाहपूर्व शारीरिक संबंधों के मामले में सावधानी बरतनी चाहिए। जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात कही गई, उसमें आरोपी ने जिस लडक़ी से शादी की बात की थी, उसे कथित रूप से शादी का वायदा करके कई बार देह-संबंध बनाए, दुबई बुलाया, और वहां भी संबंध बनाए। जस्टिस नागरत्ना अपने सुलझे हुए, और प्रगतिशील विचारों के लिए जानी जाती हैं, वे सरकार के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणी करने से हिचकती नहीं हैं। इस मामले में उन्होंने कहा कि अगर शिकायतकर्ता शादी को लेकर इतनी गंभीर थी तो विवाह से पहले विदेश क्यों गई? उन्होंने यह भी कहा कि बिना औपचारिक वैवाहिक प्रतिबद्धता के, पूर्ण विश्वास खतरनाक हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई लडक़ी या महिला विवाह को लेकर एकदम पक्की सोच रखती है, तो उसे पहले ही सीमाएं तय करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जहां संबंध सहमति से बने हों, हर मामला आपराधिक मुकदमे और सजा तक पहुंचना जरूरी नहीं है, कुछ विवाद व्यक्तिगत संबंधों के टूटने से जुड़े होते हैं, जिन्हें हर बार आपराधिक न्यायप्रक्रिया में नहीं ढाला जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक रिश्तों की जटिलता को समझना जरूरी है, लेकिन जोखिमों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

हम सुप्रीम कोर्ट की कई बातों से सहमत रहते हैं, और कई बातों से असहमत भी रहते हैं। इस मामले में अदालत की टिप्पणियों को महिलाविरोधी सोच मानने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि एक सुलझी हुई महिला जज इन पहलुओं को उठा रही हैं। हमने पहले भी इस बात की सामाजिक व्याख्या करते हुए लिखा था कि जिंदगी में कई तरह के वायदे टूटते हैं। शादियों के मामले में तो सगाई हो जाने के बाद भी कई शादियां नहीं हो पातीं, और कई किस्म के मतभेद या विवाद की वजह से रिश्ते टूट जाते हैं। फिर इसके बाद शादीशुदा जोड़ों के बीच तलाक तो सामाजिक और अदालती दोनों तरह से मान्यता प्राप्त है। जोड़े पूरी जिंदगी के हिसाब से शादी करते हैं, और न निभने पर वे अलग भी हो जाते हैं। तलाक को देखें तो एक हिसाब से वह शादी के रिश्ते के भीतर भी धोखे सरीखा रहता है, लेकिन इसे बलात्कार का दर्जा नहीं दिया जा सकता। हमने बार-बार यह बात लिखी है कि लोगों को रिश्ते बनाते हुए यह बात सोच लेना चाहिए कि हर वायदा पूरा होने की कोई गारंटी नहीं रहती। लोगों को देह-संबंध बनाते हुए यह पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि मामला शादी तक पहुंच भी सकता है, और नहीं भी पहुंच सकता।

हमने बीते बरसों में ऐसे कई मामले देखे हैं जिनमें किसी लडक़ी या महिला ने किसी आदमी के शादीशुदा होने की बात को पूरी तरह जानते हुए भी उसके साथ प्रेम-संबंध और देह-संबंध बनाए, और बाद में संबंध टूटने पर बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई कि उसने वायदा किया था कि वह अपनी पत्नी से तलाक लेकर उससे शादी कर लेगा। दूसरी तरफ एक शादीशुदा महिला ने एक नौजवान के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई कि उसने शादी का वायदा करके उस महिला से बलात्कार किया। अब यह नौजवान अविवाहित था, वह तो कानूनी रूप से किसी से शादी करने का हकदार भी था, लेकिन यह शादीशुदा महिला तो खुद ही कानूनी रूप से किसी और से शादी नहीं कर सकती थी, इसके बावजूद उसने ऐसी रिपोर्ट लिखाने का हौसला किया था। अब शादी का वायदा करके देह-संबंध बनाने, और फिर वायदा पूरा न करने के दर्ज मामलों की गिनती हिन्दुस्तान में शायद लाखों तक पहुंची हुई है। हर दिन किसी न किसी अखबार में ऐसी खबर रहती है। इसके बावजूद अगर कोई लोग, खासकर बालिग लोग देह-संबंध बनाते हैं, तो हमारा मानना है कि उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम रहती है, और रहना चाहिए, कि शादी हो भी सकती है, और नहीं भी हो सकती। अगर देह-संबंध बनाने हैं, तो किसी वायदे के आधार पर नहीं बनाने चाहिए, शादी की औपचारिकता पूरी हो जाने के बाद बनाने चाहिए, या फिर एक आधुनिक सोच के साथ ऐसे किसी वायदे के बिना बनाने चाहिए, जिसे बाद में बलात्कार करार देने की जरूरत न पड़े।

हमारा यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के मामलों को लेकर एक व्यापक आदेश जारी करना चाहिए कि दो बालिग लोगों के बीच शादी के वायदे को लेकर अगर देह-संबंध बनते हैं, तो कम से कम इस आधार पर उसे जुर्म करार नहीं दिया जा सकता कि वायदा तोडऩा बलात्कार है। यह सिलसिला बहुत सी लड़कियों, और महिलाओं को एक नाजायज हक देते आया है कि एक रिपोर्ट लिखाकर वे किसी को गिरफ्तार करवा सकती हैं, जेल भेज सकती हैं। ऐसे गलत मामलों की वजह से महिलाओं को खास हिफाजत देने वाले बने हुए कानूनों की साख भी कम होती है, और तमाम महिलाओं की साख पर भी आंच आती है कि वे कानूनों का बेजा इस्तेमाल करती हैं। इस प्रसंग में दहेज प्रताडऩा कानून की चर्चा भी जरूरी है, जिसका व्यापक बेजा इस्तेमाल किया गया है, और अब अदालतों ने यह पाया है कि हर शिकायत असल प्रताडऩा नहीं होती, और ऐसे मामलों में पूरे के पूरे ससुराल की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। वादाखिलाफी को लेकर अगर किसी तरह की सजा का प्रावधान है, तो वैसे किसी कानून के तहत लडक़ी या महिला शिकायत दर्ज करवाए। अधिक सही बात यह होगी कि जस्टिस नागरत्ना की सलाह पर गौर करके अपनी जिम्मेदारी से ही देह-संबंध बनाए, किसी शादी की उम्मीद से ऐसा करना, और फिर बरसों बाद यह कहना कि बरसों से बलात्कार हो रहा है, यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

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