संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला, पैड लड़कियों का बुनियादी हक!
सुनील कुमार ने लिखा है
31-Jan-2026 6:00 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला, पैड लड़कियों का बुनियादी हक!

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक ऐतिहासिक फैसला दिया है जिसमें लड़कियों और महिलाओं की माहवारी से जुड़ी सेहत की जरूरतों को जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित किया। जस्टिस जे.बी.परदीवाला, और जस्टिस आर.महादेवन की बेंच का यह फैसला स्कूल जाने वाली लड़कियों की माहवारी की जरूरतों को लेकर था। अदालत ने देश की हर सरकारी और निजी स्कूलों में 6वीं से 12वीं तक की छात्राओं को मुफ्त का सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसमें स्कूलों में माहवारी से जुड़ी सुविधाओं की कमी का जिक्र था, और अदालत से मदद मांगी गई थी। इस फैसले में जजों ने कल कहा है कि माहवारी के दौरान लड़कियां सामाजिक और सार्वजनिक अपमान का सामना करती हैं जिसका उनकी शिक्षा और सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए शहरी हो, या ग्रामीण, हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय, पानी, साबुन, और जरूरत पडऩे पर अतिरिक्त यूनिफॉर्म का इंतजाम अनिवार्य किया गया है। अदालत का यह फैसला इन सरकारी आंकड़ों के आधार पर भी आया है जिनके मुताबिक भारत में हर बरस सवा दो करोड़ लड़कियां माहवारी की दिक्कतों की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं। अब अदालत ने यह कहा है कि राज्यों को इन निर्देशों पर पूरे अमल के लिए निगरानीतंत्र बनाना होगा। कुछ और बारीक बातें भी इस फैसले में लिखी गई हैं, लेकिन हम आज यहां पर मोटी-मोटी बातों पर ही चर्चा आगे बढ़ा रहे हैं।

भारत की इस बात के लिए भी बड़ी आलोचना होती थी कि सेनेटरी नैपकिंस पर टैक्स भारत में 2018 तक जारी था। लंबी जन आलोचना के बाद जीएसटी कमेटी ने इसे हटाया है। कुछ दूसरे देशों का हाल देखें, जहां पर भारत के मुकाबले गरीबी खासी अधिक है, तो उनमें भी कई जगहों पर स्कूलों में सेनेटरी पैड्स मुफ्त मुहैया कराने का इंतजाम पहले से है। अफ्रीका के देश केन्या में 2018 से स्कूली लड़कियों को ये मुफ्त हासिल हैं। बोत्सवाना में 2017 से, जाम्बिया में हर स्कूल में, नेपाल में 2019-20 से, और एक सबसे गरीब देश इथियोपिया में भी कुछ स्कूल कार्यक्रमों में सेनेटरी पैड मुफ्त मुहैया कराए जाते हैं। ऐसे सारे ही देशों का यह तजुर्बा रहा है कि स्कूली लड़कियों को इस मुफ्त सहूलियत के बाद लड़कियों का स्कूल छोडऩा कम होता है। भारत में करीब एक चौथाई लड़कियां माहवारी के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। वे स्कूल में पढ़ते हुए भी महीने में तीन से पांच दिन तक गैरहाजिर रहती हैं। मामूली गंदे कपड़े के इस्तेमाल से वे तरह-तरह के संक्रमण से गुजरती हैं, स्कूलों में ऐसे पैड डालने के लिए कचरे के डिब्बे नहीं रहते, भारत की गांवों के स्कूलों में ऐसे डिब्बों का इंतजाम और कम है। लेकिन जिस-जिस देश में स्कूली लड़कियों को पैड मुफ्त दिए गए, वहां-वहां स्कूल छोडऩा घट गया है, और ये आंकड़े एकदम ही चौंकाने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हम इसलिए भी ऐतिहासिक मान रहे हैं कि माहवारी को भारत में जिस तरह सामाजिक छुआछूत माना जाता है, माहवारी से गुजर रही लडक़ी या महिला को अधिकतर जगहों पर शुभ कार्य में शामिल नहीं होने दिया जाता है, पूजा-पाठ से दूर रखा जाता है, रसोईघर में घुसने नहीं दिया जाता, वहां पर अगर माहवारी की दिक्कतों के समाधान को बुनियादी अधिकार में शामिल कर लिया गया है, तो यह लड़कियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का काम है। थोड़ी हैरानी इस बात पर होती है कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को तो कुछ बरस में वोटर बनने वाली इस उम्र की लड़कियों की इतनी फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं थी, और चुनावों पर जिंदा रहने वाले, और सत्ता पाने वाले नेताओं का कारोबार तो वोटर, और जल्द वोटर बनने वाले लोगों पर टिका रहता है। संसद और सरकार, विधानसभाओं, और नेताओं ने जो नहीं किया, उसे एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने किया है, यह भारत की सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं, और उन पर काबिज लोगों के देखने लायक आईना भी है। सुप्रीम कोर्ट की नीयत चाहे आईना दिखाने की न हो, लेकिन आईना पेश तो हो ही चुका है, और हर स्कूली लडक़ी हर महीने के चार-पांच दिन जजों को दुआ देगी, न कि नेताओं को। यह बड़ी लोकतांत्रिक विसंगति की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के जज लड़कियों की जिस जरूरत को मौलिक अधिकार में शामिल करने लायक मान रहे हैं, कर रहे हैं, वह जरूरत देश की सरकारों को दिखी भी नहीं!

क्या इसके पीछे भारत के समाज, और यहां की राजनीति पर हावी पुरूषप्रधान सोच है, जो कि लड़कियों को, महिलाओं को बराबरी के हक के लायक समझती नहीं है, या फिर मतलबपरस्त चुनावी राजनीति है जिसकी नजर में लड़कियां 12वीं पास करने के बाद ही वोटर बनती हैं। जब तक कोई वोटर न बने, उसकी फिक्र क्यों करना? हम कई बार इस बात को लिखते, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर बोलते हैं कि अभी कुछ बरस पहले तक भारतीय स्कूली किताबें पढ़ाती थीं कि कमल घर चल, कमला नल पर जल भर। इन्हें पढक़र बड़े हुए कमल कमला की माहवारी की फिक्र भला कर भी कैसे सकते थे? इसीलिए किसी देश और समाज में, किसी संस्कृति में लड़कियों और महिलाओं के प्रति सम्मान किस्तों में नहीं आता, वह मिजाज में पूरी तरह आ सकता है, या बिल्कुल नदारद रह सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला अमल में आने में कई राज्यों के लिए कुछ दिक्कतें ला सकता है। वैसे तो किसी सामान की सप्लाई शुरू करने में सरकार में बैठे लोगों का उत्साह देखते ही बनता है, लेकिन सेनेटरी पैड खरीदने, लड़कियों के लिए साबुन और पानी वाले अलग शौचालय बनाने, कचरे के डिब्बे रखने, और इनके निपटारे के काम को कुछ सरकारें अदालत की मनमानी से लद गया फिजूलखर्च मान सकती है। लेकिन अदालत को अपनी इस नई परिभाषा पर कड़ाई से टिके रहना होगा, और सरकारों के लिए भी यह राजनीतिक रूप से मुमकिन नहीं होगा कि वे अदालत को अपना फैसला बदलने या सुधारने को कहें। लड़कियों के हक की यह एक लंबी छलांग है, और यह देश के दीर्घकालीन हित में भी है क्योंकि लड़कियों की पढ़ाई जारी रहेगी, वे बीमारियों से दूर रहेंगी, और आत्मविश्वास से भरी रहेंगी, तो देश की तस्वीर ही बदल जाएगी। लड़कियों के इस मौलिक अधिकार को कानूनी दर्जा मिलने में चाहे जितना भी वक्त लगा हो, जब जागे तभी सबेरा, अब कम से कम सरकारों को अपनी बाकी फिजूलखर्चियां घटाकर आधी आबादी के इस मौलिक अधिकार का सम्मान करना चाहिए। जो सरकार ऐसा न करे, उसे स्कूली छात्राएं याद भी रखें, आखिर जल्द ही वे भी वोटर तो बनेंगी ही।   

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