संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : यूजीसी पर सवर्ण-बवाल, नफे की राजनीति, या...
सुनील कुमार ने लिखा है
28-Jan-2026 4:33 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : यूजीसी पर सवर्ण-बवाल, नफे की राजनीति, या...

भारतीय राजनीति को लेकर कई जानकार लोगों का समय-समय पर कहना रहता है कि जनता के बीच मुद्दे कब बदल जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। आज देश में कुछ ऐसा ही अजब माहौल बन गया है। यह किसने सोचा था कि देश का सवर्ण तबका जो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी का निष्ठावान समर्थक माना जाता है, आज एकदम से उनके खिलाफ उबल पड़ेगा? और फिर यह भी कि यह बात आरक्षण जैसे किसी बड़े मुद्दे को लेकर नहीं खड़ी हुई है, बल्कि विश्वविद्यालयों, और उच्च शिक्षा के संस्थानों में समानता के एक वातावरण को बनाने के लिए शिकायतों की व्यवस्था, और उनकी जांच के नियमों में हुए फेरबदल की वजह से खड़ी हुई है। यूजीसी नाम से जो अधिसूचना आज देश में बवाल की वजह बन गई है, और इससे विचलित सवर्ण लोग सडक़ों पर उतर रहे हैं, इक्का-दुक्का मामले सवर्णों के नौकरी छोड़ देने के भी सामने आए हैं, यह देश में एक अधिसूचना से बदल गया माहौल है। इसे समझना जरूरी है क्योंकि इसे सामाजिक तनाव की एक वजह भी बताया जा रहा है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अभी एक पखवाड़े पहले उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन के नए नियम जारी किए। सुप्रीम कोर्ट में ऐसे कुछ मामले चल रहे थे जो कि उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी, और ओबीसी छात्र-छात्राओं के साथ चलने वाले व्यापक भेदभाव की तरफ कानून का ध्यान खींचना चाहते थे। आईआईटी, और आईआईएम जैसे अंतरराष्ट्रीय शोहरत वाले संस्थानों से लेकर दूसरे केन्द्रीय विश्वविद्यालयों तक भी आरक्षित वर्ग से आने वाले बच्चों के साथ बड़ा भेदभाव होता था। उनके लिए ऐसे मानसिक उत्पीडऩ की स्थितियां पैदा कर दी जाती थीं कि उनमें से कुछ या कई छात्र-छात्राओं की खुदकुशी भी सामने आती थी। आमतौर पर शिक्षण संस्थान भेदभाव और प्रताडऩा का उसी तरह खंडन करते थे जिस तरह पुलिस या सरकार के कोई छोटे अफसर उन पर लगने वाले आरोपों का करते हैं। लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदलती थी कि आरक्षित वर्ग से ऐसी जगहों पर पहुंचे हुए बच्चों को बहुत ही मानसिक और सामाजिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती थी। इसलिए अभी यूजीसी ने नियमों में फेरबदल की जो अधिसूचना जारी की है, उसमें पुराने चले आ रहे कुछ प्रावधान बदले गए हैं, और इन नियमों को कड़ाई से लागू करने पर असली भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई हो सकेगी, और समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाले बच्चों को एक समावेशी वातावरण मिल सकेगा।

अब इस नए फेरबदल का विरोध करने वाले लोगों का यह कहना है कि इनकी बुनियाद इस सामाजिक पूर्वाग्रह पर टिकी हुई है कि अनारक्षित वर्ग के लोग ही भेदभाव के लिए जिम्मेदार रहते हैं। ऐसे में इन आलोचकों का कहना है कि नियमों से अधिक हिफाजत तो किसी को नहीं मिल सकेगी, बल्कि अनारक्षित वर्ग के लोग अधिक खतरे में पड़ेंगे, और इनसे शैक्षणिक संस्थाओं में असमानता खड़ी हो जाएगी। एक फेरबदल जिस पर अधिक विरोध हो रहा है, वह किसी शिकायत के झूठे मिलने पर शिकायतकर्ता पर कार्रवाई के प्रावधान को अब खत्म कर देने का है। अभी तक झूठी शिकायतों पर संस्थान कार्रवाई कर सकते थे, लेकिन उसे हटा दिया गया है। यह भी है कि शिकायतों के निपटारे के लिए बनने वाली कमेटियों में एसटी-एससी, ओबीसी, दिव्यांग, और महिला प्रतिनिधित्व को तो अनिवार्य किया गया है, लेकिन अनारक्षित वर्गों से किसी को लेने की शर्त नहीं रखी गई है।

दरअसल यह विवाद इस सामाजिक पूर्वाग्रह पर टिका हुआ है कि भारत में सामाजिक समानता है, और आरक्षित वर्गों को किसी और अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि आरक्षण का फायदा पाने वाले लोग ही नहीं, उनके पूरे तबके अनारक्षित वर्गों की गालियां खाते हैं, उनसे भेदभाव पाते हैं। जब कई बरस की पढ़ाई संस्थागत जगहों पर रहने-खाने के साथ की जाती है, तो वहां पर भेदभाव जानलेवा या आत्मघाती भी बन जाता है। देश में ऐसे कई चर्चित मामले हुए हैं जिनमें जाति के आधार पर हुई प्रताडऩा के बाद छात्र-छात्राओं को खुदकुशी एक आसान रास्ता लगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के सख्त रूख को देखते हुए केन्द्र सरकार के तहत आने वाली एक कुछ हद तक स्वायत्त संस्था, यूजीसी ने नियमों में यह फेरबदल किया है, और शायद केन्द्र सरकार और यूजीसी को भी यह अंदाज नहीं रहा होगा कि इससे अनारक्षित, खासकर सवर्ण तबकों के बीच इतना विरोध होने लगेगा। देश में हाल के बरसों में हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर, धर्म का दखल बढऩे से, और साम्प्रदायीकरण बढऩे से सवर्ण तबके में एक अलग किस्म का ध्रुवीकरण हुआ है। हालांकि इस ध्रुवीकरण में सवर्णों के साथ-साथ ओबीसी बड़े पैमाने पर लागू हैं, लेकिन अब जब उच्च शिक्षा संस्थानों ने ओबीसी तबके को एसटी-एससी के साथ जोडक़र खास हिफाजत दी गई है, तो हिन्दुत्व की धार्मिक भीड़ में कम से कम यूजीसी के मुद्दे पर दो अलग-अलग खेमे बन गए हैं, ओबीसी यूजीसी के साथ हैं, और सवर्ण अलग हो गए हैं।

जिस बात से हमने आज की यह चर्चा शुरू की थी, किस तरह एक दिन में देश का नरेटिव बदलता है, चर्चा के मुद्दे कहीं से कहीं पहुंच जाते हैं, यह देखना लोकतंत्र में बड़ा दिलचस्प रहता है, और यह भी समझने की जरूरत रहती है कि यह फेरबदल कुछ दूसरी घटनाओं को अखबारों के भीतर के पन्नों पर धकेलने के लिए तो इस वक्त नहीं लाए गए हैं? 12 जनवरी की यह अधिसूचना देश-विदेश की घटनाओं, और खबरों के परिप्रेक्ष्य में देखे बिना तो जारी नहीं की गई होगी। लेकिन हम वक्त से परे गुण-दोष के आधार पर इसे देखना चाहते हैं, और देश की सवर्ण बेचैनी के संदर्भ में भी इसका आंकलन करना चाहते हैं। फिलहाल सवर्ण-हिन्दुत्व के सबसे चहेते चेहरे नरेन्द्र मोदी से यह तबका कुछ नाराज हो गया है, कुछ लोग यह भी कहेंगे कि खासा नाराज हो गया है, देखना है कि यह सवर्ण-नाराजगी किस कीमत पर है? क्या यह एसटी-एससी-ओबीसी तबकों की हमदर्दी और समर्थन की कीमत पर है? अगर ऐसा है तो चुनावी राजनीति करने वाले किसी नेता या किसी पार्टी को इससे बड़े और किसी तबके के समर्थन का तो सपना भी नहीं आ सकता। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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