संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : असाधारण इच्छाशक्ति की असल जिंदगी की कहानियों से बेहतर मिसाल और क्या?
सुनील कुमार ने लिखा है
30-Jan-2026 4:33 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  असाधारण इच्छाशक्ति की असल जिंदगी की कहानियों से बेहतर मिसाल और क्या?

libraary, photo credit - matrubhumi


इस बार गणतंत्र दिवस पर देश के जिन लोगों को पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान हुआ है, उनमें एक नाम कर्नाटक के मांडया जिले के हरलाहल्ली गांव के अनके गौड़ा का है। वे पहले बस कंडक्टर थे, फिर एक शक्कर कारखाने में काम करते थे। उन्होंने अपना मकान बेचकर आधा एकड़ जमीन पर एक किताबघर बनाया, और पिछले पचास बरस में उन्होंने तनख्वाह का करीब 80 फीसदी किताबों पर खर्च करके यहां 20 लाख से अधिक किताबें इकट्ठा की हैं। वे खुद एक कोने में फर्श पर सोते हैं क्योंकि सारी जगह किताबों से भरी हुई है। बिना किसी फीस के, लोग यहां आकर किताबें पढ़ सकते हैं, और अब तो दूर-दूर से यहां शोधकर्ता आने लगे हैं। बिना किसी सरकारी मदद के एक जिद्दी इंसान की मेहनत किस तरह एक असाधारण तस्वीर गढ़ सकती है, उसकी यह एक मिसाल है। भारत में अलग-अलग जगहों में अलग-अलग लोगों ने कुछ इस तरह का ही करिश्मा कर दिखाया है।

ऐसी कुछ और मिसालें ढूंढें, तो दशरथ मांझी का नाम आता है जो बिहार के एक गांव के रहने वाले थे, और गांव से अस्पताल पहुंचने में पहाड़ी का चक्कर काटकर 55 किलोमीटर घूमकर जाना पड़ता था। अपनी बीमार पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के लिए उनके पास कोई आसान रास्ता नहीं था, पत्नी के गुजरने के बाद 22 बरस तक वे लगे रहे, और पहाड़ काटकर 9 किलोमीटर लंबी सडक़ बनाई जिससे अस्पताल का 55 किलोमीटर का रास्ता घटकर अब 15 किलोमीटर रह गया। उन पर माउंटेन मैन नाम की फिल्म भी बनी थी। ऐसी एक दूसरी मिसाल फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले जादव पायेंगे की है। असम के जादव ने 1979 में बाढ़ से प्रभावित होने के बाद अकेले ही साढ़े 5 सौ हेक्टेयर जंगल लगाया, जो मोलाई फॉरेस्ट के नाम से जाना जाता है। बीते कई बरस से इसमें हाथी और बाघ जैसे जानवर भी आ बसे हैं। पर्यावरण बचाने की उनकी जिद ने 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित करवाया। एक अलग मिसाल बिहार के आनंद कुमार की है जो गरीब बच्चों का आईआईटी में दाखिला कराने के लिए सुपर-30 नाम से प्रशिक्षण देते हैं। 2002 से अब तक उनके केन्द्र से निकले हुए पांच सौ से अधिक छात्र-छात्राओं को आईआईटी में दाखिला मिल चुका है। उन पर एक फिल्म, सुपर-30 बनी है। एक और मिसाल महाराष्ट्र की एक दलित महिला कल्पना सरोज की है, जो अपने बचपन में गरीबी के साथ-साथ बालविवाह की शिकार भी हो गई थी। उन्होंने अपनी कोशिशों से एक बड़ी कंपनी खड़ी की, और उसमें महिलाओं और वंचित तबके के लोगों को जोड़ा, उनके लिए दरवाजे खोले, उन्हें भी पद्मश्री मिला है। महाराष्ट्र की ही सिंधु ताई सपकाल जो खुद बेघर हो गई थीं, उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए 6 आश्रम बनाए, 15 सौ से अधिक बच्चों को गोद लिया, उनकी जिंदगियां बदलीं। 2021 में उन्हें भी पद्मश्री दिया गया। कर्नाटक की एक आदिवासी तुलसी गौड़ा ने 30 हजार से ज्यादा पेड़ लगाए, उनके इस असाधारण काम के लिए 2021 में उन्हें पद्मश्री मिला।

हालांकि ऐसी कहानियां और भी हैं, लेकिन मिसाल के तौर पर इतनी काफी हैं। इनमें से कोई भी व्यक्ति ऐसे नहीं थे, जो पारिवारिक संपन्नता, ओहदे या किसी और तरह की ताकत से वे कोई बड़ा काम कर पाए। बिल्कुल ही अभाव की पृष्ठभूमि से उठकर सिर्फ अपनी जिद, लगन, और मेहनत से उन्होंने आसमान छू लिया। इतनी मेहनत से इनमें से हर कोई अपने लिए बहुत आराम की जिंदगी जुटा सकते थे। आईआईटी में दाखिले के लिए माँ-बाप कोचिंग सेंटरों को दसियों लाख रूपए का भुगतान करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन आनंद कुमार ऐसे जीवट व्यक्ति हैं जो कि फक्कड़ की जिंदगी जीते हैं, और गरीब बच्चों के लिए काम करते हैं। गिनाने के लिए अच्छा काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कुछ लोगों के पास कुछ तर्क या तथ्य हो सकते हैं, लेकिन हम यहां इनमें से किसी भी सामाजिक योगदान वाले व्यक्ति के वकील की तरह उनकी तारीफ नहीं कर रहे हैं, सिर्फ कुछ मिसालें सामने रख रहे हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि लोग 30 हजार पेड़ लगाएं, साढ़े पांच सौ हेक्टेयर पर जंगल लगाएं, तो ही धरती पर उनका योगदान रहेगा। डेढ़ हजार अनाथ बच्चों से बहुत कम, दस-पन्द्रह, या पच्चीस-पचास अनाथ बच्चों की जिंदगी भी बदल देना बहुत बड़ा काम होगा। इसलिए लोगों को ऐसी बड़ी कामयाबी, और ऐसे बड़े योगदान को देखकर दहशत में नहीं आना चाहिए, बल्कि यह मानना चाहिए कि जब इन लोगों ने काम शुरू किया होगा, तो पहली बार इनके कोई छात्र-छात्रा आईआईटी पहुंचे होंगे, पहली बार कोई पेड़ लगा होगा, पहली बार किसी पहाड़ी सडक़ के लिए कुदाली चली होगी। हजार मील का सफर भी पहले कदम से ही शुरू होता है, और ऐसे पहले कदम को यह पता नहीं होता है कि उसका सफर हजार मील का रहेगा।

हर माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों को अपने देश, और दूसरे देशों की ऐसी कहानियां सुनाएं, और बच्चे चाहें तो इनके कुछ वीडियो ढूंढकर भी उन्हें दिखाएं। यही काम स्कूलों में भी होना चाहिए, और हो सके तो हर मोहल्ले कोई उत्साही व्यक्ति किसी सार्वजनिक जगह पर बच्चों को इकट्ठा करके ऐसे विषय पर चर्चा भी कर सकते हैं। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सभी तरह की जानकारी भरपूर मौजूद है, माँ-बाप और शिक्षक, या मोहल्ले के वरिष्ठ लोग उनमें से सकारात्मक जानकारी को ठोक-बजाकर हर हफ्ते योगदान की ऐसी कहानियां सामने रख सकते हैं। आज जिस तरह की अवैज्ञानिक बातों में बच्चों को उलझाया जा रहा है, उससे भी बच्चों को आजादी मिलेगी, और उन्हें समझ आएगा कि इंसानों की शक्ल में असली ईश्वर कैसे होते हैं। उन्हें यह भी समझ आएगा कि जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा अगर किसी काम में लगाना है, तो वह इस तरह के सकारात्मक सामाजिक योगदान के काम होने चाहिए। समाज के प्रमुख लोगों को चाहिए कि वे बच्चों के सामने उनके अपने इलाके की जरूरतों और संभावनाओं की चर्चा करें, और उनके सामने नेक काम करने की चुनौती रखें। हिन्दुस्तान में भला कौन सा ऐसा मोहल्ला हो सकता है जहां मैदान या बगीचे, तालाब के किनारे या दूसरी सार्वजनिक जगहें साफ करने की जरूरत न हो, चारों तरफ गंदगी बिखरी रहती है, और आसपास के बच्चों को इकट्ठा करके सुरक्षित तरीके से सफाई करने का अभियान चलाया जा सकता है। जो बच्चे सफाई करेंगे, वे गंदगी फैलाने से भी कतराएंगे, जो बच्चे पेड़ लगाएँगे, वे पेड़ों को नुकसान पहुंचाने का काम कभी नहीं करेंगे, इस तरह के दर्जनों ऐसे काम हैं जिनमें बच्चों को बचपन से ही जोड़ा जाए, तो वे बड़े होकर सचमुच ही सामाजिक सकारात्मकता के मामले में बड़े उत्पादक साबित होंगे।

गणतंत्र दिवस पर ऐसे कुछ सम्मान के साथ ही ये कहानियां खत्म हो जाएं, यह ठीक नहीं है। देश की तमाम सरकारों को भी चाहिए कि वे स्कूलों के पाठ्यक्रम से परे कुछ ऐसी बुकलेट तैयार करें जिनमें देश भर के ऐसे चर्चित महान समाजसेवकों, पर्यावरणवादियों, और दूसरे मौलिक योगदान देने वालों की कहानियां रहें। बच्चों के सामने असल जिंदगी की ठोस अच्छी मिसालें रखने से बेहतर नसीहत देने का और कोई तरीका नहीं होता। इस काम से स्कूली पाठ्यक्रम को बोझिल बनाए बिना भी आकर्षक तरीके से बच्चों के सामने ऐसी ऑडियो-विजुअल कहानियां रखी जा सकती हैं, और बच्चों का तो महज नाम हम ले रहे हैं, ऐसी मिसालें तो बड़ों के काम की भी रहेंगी।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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