संपादकीय
अमरीका के एक सबसे बड़े और प्रमुख अखबार, वाशिंगटन पोस्ट के 8 सौ में से 3 सौ पत्रकारों की छंटनी कर दी गई है। एक तिहाई से अधिक लोगों को निकाल देने वाले अखबार के मालिक जेफ बेजोस दुनिया के दो-चार सबसे रईस लोगों में से हैं, और उन्होंने अपनी एक दूसरी कंपनी अमेजान से पिछले कुछ महीनों में 30 हजार लोगों को नौकरी से निकाला है। कंपनी का कहना है कि एक वक्त उसके पैर प्रिंट में मजबूती से जमे हुए थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है, एआई आ चुका है, कम कीमत पर ज्यादा काम हो सकता है, और अखबार की लंबी जिंदगी के लिए यह जरूरी है कि उसे आर्थिक रूप से संभव भी रखा जाए। अमरीका में मजदूर कानून इस तरह के हैं कि कंपनी किसी को भी एक दिन में काम से निकाल सकती है, और उसके लिए जो भी थोड़ा-बहुत भुगतान करना रहता है, उससे परे कोई जिम्मेदारी कंपनी की नहीं बनती। ऐसे कानूनों की वजह से ही अमरीका में मजदूरों और कामगारों की हड़ताल का कोई माहौल नहीं रहता, और नौकरी की शर्तों से परे किसी तरह का दबाव कंपनियों पर नहीं रहता। लोगों को अगर याद न हो, तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि यह वही अखबार है जिसने निक्सन सरकार की विपक्षियों पर की गई खुफिया निगरानी, और रिकॉर्डिंग का भांडाफोड़ किया था, और उस वॉटरगेट-स्कैंडल की वजह से राष्ट्रपति निक्सन को इस्तीफा देना पड़ा था। ऐसे अखबार में इतनी बड़ी छंटनी सिर्फ इस अखबार का मामला हो, ऐसा नहीं है, यह अखबार के मालिकों, या मालिक-कंपनी की सोच का मामला भी है। अभी हफ्ता भर भी नहीं हुआ है कि इसी जेफ बेजोस की राष्ट्रपति ट्रंप की पत्नी मेलानिया पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म जारी हुई है, जो कि सैकड़ों करोड़ की लागत से बनी है, और इसे इस कंपनी की तरफ से ट्रंप की चापलूसी माना जा रहा है। इसलिए जो जेफ बेजोस इस तरह का बड़ा खर्च चापलूसी पर कर सकता है, निजी उपयोग के लिए जहाज खरीद सकता है, अपनी पत्नी को करोड़ों की अंगूठी देता है, वह अखबार को कम मुनाफे में नहीं चला सकता, ऐसा तो है नहीं। इस बड़ी छंटनी को करते हुए वाशिंगटन पोस्ट की प्रकाशक कंपनी कहती है कि डिजिटल जमाने में ऐसा एडजस्टमेंट जरूरी है। लोगों का कहना है कि यह एआई और टेक्नॉलॉजी के सामने एक अखबार कंपनी का समर्पण है कि अगर दूसरे कारोबार की तरह अखबार भी कमाई न ला सके, तो उस पर खर्च क्यों किया जाए?
भारत के मामले में लोगों को याद होगा कि एक वक्त टाईम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन समूह बहुत सारी अच्छी पत्रिकाएं भी प्रकाशित करता था। समाचार-विचार की पत्रिका दिनमान, फिल्मों की पत्रिका माधुरी, पूरे परिवार के लिए कुछ न कुछ सामग्री वाली पत्रिका धर्मयुग, बच्चों की पराग, ऐसी कई अच्छी पत्रिकाएं निकलती थीं। बाद के बरसों में कंपनी ने यह पाया कि पत्रिकाओं से कमाई कम है, या वे कुछ घाटे में चल रही हैं, तो उसने इन सबको बंद कर दिया, जबकि कंपनी के कुछ बड़े अंग्रेजी अखबार हजारों करोड़ सालाना की कमाई में चल रहे थे, और यह कंपनी इन पत्रिकाओं का बहुत मामूली सा घाटा भी झेलने की हालत में थी। किसी भी जिम्मेदार और सरोकारी कारोबार से ऐसी उम्मीद की जाती है कि वह कमाई की हालत में कुछ घाटा भी झेलने के लिए तैयार रहे जो कि नफा कम होने की बात भर रहती है, किसी नुकसान की बात नहीं रहती। लेकिन जब मैनेजर और मालिक मिलकर कारोबार का हिसाब-किताब देखते हैं, तो केलकुलेटर की संख्याओं वाले की-पैड से सरोकार जैसा शब्द टाईप नहीं हो पाता, सिर्फ अंक ही टाईप होते हैं। इसलिए कारोबारी फैसले मीडिया, या साहित्य, सरोकार जैसे दूसरे कई फैसलों को किनारे धकेल देते हैं। अकेले अमरीका के वाशिंगटन पोस्ट को कोई तोहमत देने के पहले यह भी समझने की जरूरत है कि कंपनी ने सार्वजनिक रूप से जो तर्क सामने रखा है, क्या उसमें कोई दम है?
कंपनी ने कहा है कि डिजिटल जमाने में एक नए तालमेल की जरूरत है, ताकि अखबार लंबे समय तक चलाया जा सके। अब हम सरोकारी निगाह से देखने के बजाय इस मुद्दे को एक पाठक की नजर से भी देखते हैं तो समझ पड़ता है कि डिजिटल युग में सचमुच ही एक बड़ा फर्क पैदा कर दिया है। और यह डिजिटल सिर्फ इंटरनेट नहीं है, आज वह जब एआई से लैस हो चुका है, तो क्या हमारे सरीखे लोग किसी खबर को किसी वेबसाइट पर ढूंढने के बजाय, या गूगल जैसे सर्च इंजन से किसी एक विषय पर सैकड़ों खबरें ढूंढने के बजाय सीधे एआई से खबरें नहीं पूछ लेते हैं जो कि सर्च रिजल्ट से आगे बढक़र जानकारी देता है? एआई न सिर्फ हर जानकारी समाचार स्रोत सहित देता है, बल्कि वह उसका विश्लेषण करके, जरूरत रहे, और मांगा जाए तो उसमें विचार भी जोडक़र सामने रखता है। दुनिया का कोई भी समाचार स्रोत अपनी सीमाओं से परे जाकर इस तरह का काम नहीं कर सकता। इसलिए हम अपने अखबार, और यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार एआई के खतरों के बारे में लिखते आए हैं, और लोगों को आगाह करते आए हैं कि एआई जितनी नौकरियां खाएगा, उनमें सबसे काबिल लोगों की नौकरियां सबसे आखिर में जाएंगी। इसलिए हर किसी को अपने हुनर, और अपने कामकाज को लगातार बेहतर बनाना चाहिए, ताकि छंटनी की नौबत में उनका काम बचा रहे। हम खुद अपने अखबार में एआई से हर दिन डिजाइनें बना लेते हैं, और वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी की लिस्ट देखने पर दिखता है कि उन्होंने अपने बहुत से डिजिटल डिजाइनरों को भी निकाल दिया है। आज समाचार उद्योग में, और ऐसे बहुत से दूसरे कारोबारों में लोगों की जरूरत कम रह गई है। अगर किसी गांव-कस्बे में मुफ्त में पाईप से पानी आता हो, तो क्या कुआं खोदने वाले मजदूरों को बेरोजगारी से बचाने के लिए गांव में कुएं खुदवाए जा सकते हैं? आज मीडिया में कमोबेश यही हाल सब जगह हो गया है। फिर यह भी है कि परंपरागत अखबार और टीवी का कारोबार यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अकेले काम कर लेने वाले लोग घटा चुके हैं, और एक मामूली मोबाइल से रिपोर्टिंग करके लोग दर्शकों, और पाठकों के बीच बहुत बड़ी जगह छीन चुके हैं।
अमेजान की इफरात कमाई को डालकर वाशिंगटन पोस्ट को पहले जितने पत्रकारों से चलाना एक नासमझी का कारोबारी फैसला भी होता, और शायद उतने पत्रकारों की आज के वक्त में जरूरत भी नहीं रह गई है। किसी अखबार के परंपरागत पाठकों के बीच उस अखबार की भी उतनी जरूरत शायद नहीं रह गई है। एआई ने न सिर्फ सीधे-सीधे नौकरियां खाई हैं, बल्कि नौकरियों से परे कारोबारी संभावनाएं भी खा ली हैं। अब मजदूरी और शारीरिक काम वाले रोजगारों से परे कम ही ऐसे काम हैं जहां एआई की छाया न पड़ी हो। इसलिए वाशिंगटन पोस्ट से एक तिहाई से ज्यादा लोगों की ऐसी छंटनी से दुनिया को अपने काम के बारे में सोचना चाहिए कि अगर एआई सीधे-सीधे उनकी नौकरी नहीं भी खाएगा, तो भी एआई की वजह से कारोबार पर फर्क पड़ेगा, कामगारों के काम का मूल्यांकन मुफ्त में अधिक बारीकी से हो सकेगा, और कंपनी मैनेजमेंट को यह पता लगेगा कि किस समाचार-विचार को, किस वीडियो या रिपोर्ट को पढ़ा या देखा जा रहा है, और कौन सी लिखी या कही बातें किसी का ध्यान नहीं खींच रही हैं। यह भी हो सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट का यह फैसला एआई के माध्यम से अखबार, उसकी वेबसाइट, और उसके दूसरे प्लेटफॉर्म के एक बड़े बारीक विश्लेषण पर टिका हुआ हो कि उसकी मेहनत कहां-कहां गैरजरूरी हो रही है। दुनिया भर के कामगारों को, और कंपनियों को भी छंटनी की ऐसी खबरों को बारीकी से देखना चाहिए, और एआई की मार, उसके वार के पहले ही अपने आपको बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए, बजाय किसी कारोबारी से रहम की उम्मीद करने के। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


