संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बाल सुधारगृहों से बच्चे तो भाग जाते हैं, अपने पीछे कई सवाल छोड़ भी जाते हैं
सुनील कुमार ने लिखा है
18-Feb-2026 5:47 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : बाल सुधारगृहों से बच्चे तो भाग जाते हैं, अपने पीछे कई सवाल छोड़ भी जाते हैं

छत्तीसगढ़ में अभी सरगुजा के एक बाल सुधारगृह में गंभीर अपराधों में बंद किए गए 13 नाबालिग फरार हो गए। उनमें से 4 पकड़ा गए हैं, लेकिन 9 को कई जिलों में ढूंढा जा रहा है। समाचार बताता है कि वे गार्ड को बंधक बनाकर, उन पर हमला करके, दीवाल से छलांग लगाकर भाग निकले। इन नाबालिगों पर कुछ सबसे गंभीर अपराधों के मामले किशोर न्यायालय में चल रहे हैं। यह पहला मौका नहीं है कि इस राज्य के बाल सुधारगृह में हिंसा करके वहां बंदी बनाए गए किशोर फरार हुए हों, लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तो दुर्ग के एक बाल सुधारगृह की छत पर चढ़ गए लडक़े रसोई गैस सिलेंडर को पुलिस पर फेंकने के लिए उठाकर खड़े थे, और दिल दहलाने वाली उनकी वैसी तस्वीरें सामने आई थीं। देश का कानून नाबालिगों को मुजरिम नहीं मानता है, उन्हें कानून से टकरा रहे नाबालिग ही मानता है। सुप्रीम कोर्ट में एक बहस यह भी चल रही है कि बहुत भयानक जुर्म में शामिल नाबालिगों को भी क्या बालिग मानकर सजा नहीं दी जानी चाहिए? इस मामले में मानवाधिकारवादी लोगों का कहना है कि नाबालिगों के साथ अलग सुलूक होना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ निर्भया जैसे भयानक सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल एक नाबालिग ने निर्भया की देह के साथ जैसे जुल्म किए थे, उसे देखते हुए लोगों को यह भी लगता है कि कई किस्म के जुर्म उम्रसीमा से परे मान लेने चाहिए।

हम बाल सुधारगृह के नाम पर ही आते हैं। इसे सुधार माना गया है। लेकिन वहां का जो हाल रहता है, क्या उसमें सचमुच ही किसी तरह के सुधार की कोई गुंजाइश रहती है? एक तो जो नाबालिग वहां पहुंचते हैं, उनमें से बहुत सारे लगातार जुर्म के बीच बरसों से जीते हुए रहते हैं। वे नशा सीख चुके रहते हैं, दूसरे बालिग मुजरिमों के मातहत और उनके साथ काम करते हुए वे जुर्म की दुनिया का हिस्सा बन चुके रहते हैं। किसी मामले में पकड़ में आने के बाद जब उन्हें बाल सुधारगृह भेजा जाता है, तब तक वे अपराधों में रम चुके रहते हैं। बहुत ही कम नाबालिग ऐसे रहते होंगे जो अपनी पहली चूक या पहली गलती, पहले गलत काम के साथ ही पकड़ाए जाते हों, और बाल सुधारगृह भेज दिए गए हों। फिर सरकार के दूसरे किसी भी इंतजाम की तरह बाल सुधारगृह में नाबालिगों के भीतर के भी अलग-अलग उम्र सीमा के सभी तरह के बच्चे वहां रहते हैं, और जैसा कि बालिगों की जेल में होता है, जो अधिक बड़े मुजरिम रहते हैं, उन्हीं का राज चलता है। बाल सुधारगृह में भी अधिक बड़े जुर्म में पकडक़र भेजे गए लडक़ों का दबदबा रहता है, और यह बात तो बहुत आम है कि देश की सबसे सुरक्षित जेलों में भी मोबाइल भी पहुंच जाते हैं, नशा भी पहुंच जाता है। यह मानना भी फिजूल होगा कि नशे के आदी हो चुके नाबालिग सुधारगृह में नशे का जुगाड़ करने की कोशिश नहीं करते होंगे। सरकारों की सारी व्यवस्था जितनी भ्रष्ट रहती है, उसमें ऐसा इंतजाम बहुत मुश्किल भी नहीं रहता होगा। बाल सुधारगृह तो जेलों जैसी बहुत कड़ी सुरक्षा व्यवस्था वाले भी नहीं रहते, हथकड़ी, बेड़ी, सलाखों की कोठरियां उनमें नहीं रहतीं, और ऐसे में अधिक बड़े जुर्म वाले, अधिक अराजक हो चुके लडक़ों का वहां अधिक दबदबा स्वाभाविक ही लगता है।

जब देश का कानून नाबालिगों को एक अलग दर्जा देता है, और किसी जुर्म में उनके शामिल होने पर भी न उन्हें मुजरिम कहता, न उन्हें दी जाने वाली सजा को कैद कहता, और सब कुछ सुधार के नजरिए से किया जाता है। ऐसे में सच तो यह है कि सरकारों को सुधारगृहों को सचमुच ही सुधार के लायक बनाना होगा, वरना नाबालिगों को वहां रखकर उन्हें जुर्म से अधिक वाकिफ करके ही छोड़ा जा रहा है। बड़े या बालिग कैदियों की जेलों में भी यही होता है, जिनको वहां बंद रखा जाता है, वे और अधिक बड़े, और अधिक कड़े मुजरिम बनकर निकल सकते हैं। अब बच्चों के, नाबालिगों के सुधारगृह में भी अगर माहौल वैसा ही है, तो फिर सरकारें अपनी न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी भी पूरी करते नहीं दिखती हैं। यह बात भी समझना चाहिए कि बड़े लोगों की जेलों में पहुंचे हुए लोग जिंदगी का अधिक बड़ा हिस्सा गुजारने के बाद वहां पहुंचते हैं, और वहां पर वे अपने जुर्म के अनुपात में ही लंबे बरसों के लिए कैद रहते हैं। दूसरी तरफ बाल सुधारगृह में पहुंचे हुए नाबालिगों की उम्र बहुत बाकी रहती है, उन्हें सुधारगृह में बंद रखने का वक्त भी बड़ा कम रहता है, और अगर वे जुर्म में मंजकर बाहर निकलते हैं, तो वे समाज में लंबे समय के लिए एक खतरा रहते हैं। इसलिए सरकार को समाज की व्यापक हिफाजत और भलाई के लिए कानून से टकरा रहे बच्चों के लिए बेहतर इंतजाम करना चाहिए। हम किसी रहस्य की बात नहीं कर रहे हैं, पूरी दुनिया का यही तजुर्बा है कि अगर वहां बच्चों को ठीक से नहीं रखा गया, तो भविष्य बहुत लंबे वक्त के लिए बर्बाद होता है, उन बच्चों का भी, और पूरे समाज का भी।

बाल सुधारगृहों की पूरी सोच को आम सरकारी ढर्रे से अलग हटकर विश्लेषण की जरूरत है। सरकारों को समाज के जानकार और विशेषज्ञ तबकों से सलाह लेना चाहिए, और बाल सुधारगृहों के अनुभवी लोगों से भी यह पूछना चाहिए कि अलग-अलग सीमा तक अराजक हो चुके, अलग-अलग सीमा तक जुर्म सीख चुके, नशे के आदी हो चुके, अलग-अलग उम्र के बच्चों को एक साथ रखना क्या जायज है? क्या यह सभी तरह के जानवरों को एक बाड़े में बंद कर देने सरीखा नहीं है? क्या बिना किसी पुख्ता हिफाजत, और इंतजाम के, अलग-अलग दर्जे के बिगड़े हुए बच्चे एक साथ रखने से, कम बिगड़े हुए बच्चों के अधिक बिगड़ जाने का एक बड़ा खतरा नहीं रहता है? ये सारे असुविधाजनक सवाल किसी बाल सुधारगृह में हिंसा, या अराजकता सामने आने पर उठ खड़े होते हैं, कम से कम हमारे मन में तो उठते ही हैं, लेकिन हमारा मन काफी नहीं है, ये सरकारों के सामने, और समाज के बीच भी उठने चाहिए। आज के नाबालिग बच्चे अधिक जुर्म सीखकर, अधिक हिंसक होकर, अधिक बड़े मुजरिम बनकर बालिग होकर बाहर निकलेंगे, तो वे समाज और सरकार दोनों के लिए एक बड़ी समस्या रहेंगे। इस समस्या को देखते हुए ही नहीं, देश के बच्चों का इससे परे भी ख्याल रखने के लिए सरकार और समाज दोनों को बाल सुधारगृहों की पूरी सोच और व्यवस्था के बारे में गंभीरता से विश्लेषण, और आत्ममंथन करना चाहिए।

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