संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : रेरा को खत्म करने की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की गंभीरता समझी जाए
सुनील कुमार ने लिखा है
13-Feb-2026 3:48 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : रेरा को खत्म करने की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की गंभीरता समझी जाए

देश में निर्माण कारोबार और जमीन-जायदाद के बाजार को नियमों के तहत लाने के लिए हर प्रदेश में रेरा नाम की एक नियामक संस्था बनाई गई जो कि ग्राहकों के हितों को बचाने के मकसद से लिया गया फैसला था, लेकिन आज हालत यह है कि वह बिल्डर-माफिया के हाथों का एक और हथियार बनकर रह गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कल इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्यों को यह सोचना चाहिए कि रेरा का गठन क्यों किया गया था? जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया था वे पूरी तरह निराश और हताश हैं। इस संस्था को खत्म कर दिया जाए तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। अदालत की इन कड़ी टिप्पणियों को देखते हुए जानकर विशेषज्ञ तबकों को अपने-अपने राज्य के रेरा के कामकाज, और उसके असर का विश्लेषण करना चाहिए कि रेरा में भारी अधिकार देकर बैठाए गए लोग रीयल इस्टेट ग्राहकों के हित में काम करते हैं, या फिर वे बिल्डर-माफिया की मदद करते हैं, और अपने लिए प्लाट और मकान की रिश्वत जुटाते हैं?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि जिन सरकारी विभागों को रेरा के दिए गए फैसलों पर अमल करवाना है, वे भी इसमें दिलचस्पी नहीं लेते, क्योंकि बिल्डर और कॉलोनाइजर माफिया उनकी जेब गर्म करते रहता है। जमीन, मकान, बिल्डिंग, और कॉलोनी से जुड़े कारोबार सरकारी विभागों के साथ तालमेल से ही काम करते हैं। ऐसे में इस संगठित, ताकतवर, और भ्रष्ट कारोबार के खिलाफ अगर रेरा कभी कोई आदेश दे भी देता है, तो भी उस पर अमल नहीं हो पाता। कहने के लिए तो रेरा को इतने अधिकार दिए गए हैं कि वे चाहें तो गलत कारोबार करने वाले लोगों के बैंक खाते भी बंद करवा सकते हैं, लेकिन जमीन-बिल्डिंग का कारोबार भ्रष्टाचार और गैरकानूनी तौरतरीकों में डूबा हुआ भी रहता है, और धड़ल्ले से चलता भी है। मतलब यह कि रेरा की कोई घोषित या अघोषित पकड़ उस पर नहीं रहती। अब यह रेरा और इस कारोबार के बीच का गैरकानूनी और अघोषित गठजोड़ है, या फिर रेरा के आदेशों पर अमल न होना है, जो भी हो, रेरा नाम के सफेद हाथी को खत्म करने का सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है, और लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई सवाल हो नहीं सकता।

अब हम राज्यों में बिल्डर और कॉलोनाइजर कारोबार को देखें, तो वे सरकार के कई विभागों के दर्जनों नियम-कानूनों के बीच काम करते हैं, और इनमें से हर किसी की पकड़ से बचे भी रहते हैं। इस कारोबार के इश्तहारों से मीडिया पटे रहता है, और वहां ऐसे माफिया की छानबीन आमतौर पर तब तक नहीं होती, जब तक उससे विज्ञापन मिलने की उम्मीद पूरी तरह टूट न जाए। मीडिया के अधिकतर हिस्से में तो यह होता है कि बिल्डर-माफिया के कारोबारी हितों को लेकर किसी इलाके के सुनहरे भविष्य की झूठी रिपोर्ट छापी या दिखाई जाती हैं ताकि विज्ञापनदाता को उससे सीधा फायदा हो सके। इसी तरह विज्ञापनदाता कारोबारियों के खिलाफ रेरा से कोई आदेश होने पर उसको खबरों में कोई जगह नहीं मिलती। ग्राहक और निवासी कितनी भी शिकायत करें, विज्ञापन पाने वाले मीडिया में उसकी सुनवाई नहीं होती। अगर मीडिया ही ईमानदार रहता, सरकार के विभाग अपनी जिम्मेदारी पूरी करते रहते, तो रेरा के नाम पर एक और सफेद हाथी खड़ा करने की जरूरत नहीं रहती। आज तो हालत यह है कि बिल्डर-माफिया ही अधिकरत प्रदेशों में यह तय करते हैं कि रेरा का मुखिया किसे बनाया जाए।

लेकिन अब हम रेरा से जरा ऊपर उठें और देखें कि देश और प्रदेशों में कौन-कौन से नियामक आयोग, या दूसरी संवैधानिक संस्थाएं अपने घोषित मकसद को छूती भी नहीं हैं, तो ऐसी बहुत सी संस्थाएं दिखेंगी। महिलाओं, बच्चों, एसटीएस, पर्यावरण और मानवाधिकार से जुड़ी जितनी संवैधानिक संस्थाएं बनाई जाती हैं, और जिन पर सरकार की राजनीतिक पसंद से लोगों को बिठाया जाता है, वे अपनी जिम्मेदारी के ठीक उल्टा काम करती हैं। वे कानून तोडऩे वाले लोगों, जुल्म करने वाले लोगों को बचाने का काम करती हैं। अपने को बिठाने वाली सरकारों के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए ऐसी संवैधानिक संस्थाओं पर बैठे हुए लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। नतीजा यह होता है कि संसद के बनाए कानूनों के तहत राज्यों में जिन संस्थाओं को बनाया जाता है, वे राजनीतिक चारागाह बनकर रह जाती हैं, और देश की बड़ी अदालतें यह मानकर चलती हैं कि जनता के पास एक संवैधानिक विकल्प है।

सुप्रीम कोर्ट ने रेरा के बारे में जो कड़ी टिप्पणी की है, उसे देखते हुए हर प्रदेश के जागरूक और जानकार लोगों को अपने-अपने प्रदेश की ऐसी दूसरी संस्थाओं की अप्रासंगिकता पर बात करनी चाहिए। सफेद हाथियों के लिए हर प्रदेश की राजधानियों में ऐसी हाथी-शालाएं बनी हुई हैं, ऐसे अस्तबल जनता पर बोझ हैं, और इन्हें खत्म करने के लिए क्या किया जाना चाहिए इस पर चर्चा होनी चाहिए। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम कई बार यह मुद्दा उठा चुके हैं कि किसी भी राज्य में काम कर चुके जज या अफसर, या वहां के स्थानीय नेताओं को संवैधानिक और नियामक संस्थाओं में नियुक्त नहीं करना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टेलेंट-पूल बनाना चाहिए, और उसमें से इन कुर्सियों के लिए लोगों को छांटने का काम एक गैरसत्तारूढ़, गैराजनीतिक कमेटी को देना चाहिए।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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