विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
लोकतंत्र में किसी भी सरकार की प्राथमिकता जन कल्याण आधारित योजनाएं होनी चाहिए। लेकिन जब सरकार के अधिकांश मंत्रालय किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों के शक्तिशाली समूह की चाटुकारिता करने लगते हैं तब स्थितियां बहुत विचित्र और हास्यास्पद होने लगती हैं। थोडी बहुत चाटुकारिता मानव जीवन में स्वाभाविक है, लेकिन जब यह मर्यादा की सीमा तोडऩे लगती है तब जन कल्याण का लक्ष्य कहीं पीछे छूट जाता है और सरकार का लगभग हर मंत्रालय और हर मंत्रालय का लगभग हर विभाग चाटुकारिता की दौड़ में एक दूसरे को पीछे छोड़ देने के लिए विवेक को खूंटी पर टांग देता है और यह कोशिश करता है कि चाटुकारिता की मैराथन में स्वर्ण पदक उसे ही मिलना चाहिए।
रेलवे इस मामले में इस समय सबसे आगे है। जितनी भी नई वंदे भारत ट्रेन शुरु की जा रही हैं उन्हें हरी झंडी दिखाने के लिए प्रधान मंत्री के कार्यक्रम का इन्तजार करना पड़ता है। ऐसा लगता है कि पूरा रेल अमला वंदे भारत पर ध्यान केंद्रित कर रहा है भले ही जनता और मीडिया कई रूट पर महंगे किराए वाली वंदे भारत चलाने पर रेलवे की आलोचना कर रहा है और ट्रेन दो तिहाई खाली जा रही हो। वंदे भारत प्रधान मंत्री का प्रिय प्रोजेक्ट है इसलिए रेल मंत्री उसे इतनी अहमियत दे रहे हैं।हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने गुजरात के उस स्कूल का कायाकल्प कर प्रेरणा स्थली के रुप में विकसित करने की योजना बनाई है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राथमिक शिक्षा ली थी। इसके निमार्ण के बाद यहां अन्य स्कूलों के बच्चों के टूर लाकर स्कूली बच्चों को प्रेरणा दिए जाने की योजना है।निकट भविष्य में यह भी संभव है कि जिस स्टेशन पर प्रधानमंत्री चाय बेचते थे वहां भी चाय की मार्केटिंग के लिए कोई राष्ट्रीय चाय केंद्र बन सकता है जहां देश के विभिन्न क्षेत्रों के चाय विक्रेताओं को मार्केटिंग के लिए प्रेरणा मिल सके।
इस मामले में केवल वर्तमान केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकते।कांग्रेस का इतिहास भी काफी कलंकित रहा है। आपात काल और उससे दो साल पहले कांग्रेस में संजय गांधी की ऐसी असंवैधानिक चौकड़ी थी जिसके इशारों पर तमाम मंत्रालय कठपुतली की तरह नाचते थे।क्षेत्रीय दलों की प्रदेश सरकार भी इस मामले में राष्ट्रीय दलों से कतई पीछे नहीं रही हैं। उदाहरण स्वरूप उत्तर प्रदेश में यह काम काफ़ी पहले मुलायम सिंह यादव और मायावती भी कर चुके हैं जिन्होंने अपने अपने जन्मस्थलों को फाइव स्टार गांव बनाने के लिए जन संसाधन पानी की तरह बहाए थे। मायावती का अपने दल के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियों का आकर्षण तो इतना ज्यादा था कि लखनऊ से लेकर नोएडा तक कई करोड़ की हाथी की मूर्तियां लगवा दी गई थी। बाद में चुनाव के समय चुनाव आयोग के निर्देश पर चुनाव पूरे होने तक इन मूर्तियों को ढकवाना पड़ा था।
वर्तमान केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश सरकारों के लिए नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं यथा शिक्षा, स्वास्थ, सडक़, बिजली और कानून व्यवस्था से ज्यादा देश के मंदिरों के आसपास देवताओं के नाम पर लोक बनाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। अकेले मध्य प्रदेश की बात करें तो उज्जैन में महाकाल लोक के बाद अब प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में आधा दर्जन धार्मिक लोक निर्माण की योजनाएं घोषित हुई हैं। दुर्भाग्य यह भी है कि हाल में किए गए महाकाल लोक जिसका उदघाटन बहुत जोर शोर से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से हुआ था, उसकी विशालकाय मूर्तियां थोडी सी आंधी में धरासाई हो गई। धार्मिक स्थलों के निर्माण में भी भ्रष्टाचार का प्रवेश हमारे सरकारी और गैर सरकारी समाज के सडऩे का जीवंत प्रतीक है। धार्मिक लोक के निर्माण में यह आक्षेप भी लग सकता है कि धर्म विशेष के पूजा स्थलों को प्राथमिकता देना संविधान सम्मत नहीं है लेकिन सत्ता केंद्रित राजनीति में कोई भी राजनीतिक दल बहुसंख्यक समाज के वोट बैंक के कारण यह प्रश्न उठाने का साहस नहीं कर सकता।


