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मेव अपने को मुसलमान नहीं, मेव कहलाना पसंद करते हैं
08-Aug-2023 3:57 PM
मेव अपने को मुसलमान नहीं,  मेव कहलाना पसंद करते हैं

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प्रभु झरवाल

मेवात के मेव समाज के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। मेवात में 9वीं-10वी शताब्दी के आसपास, राजपूतों के उदय से पहले। मेवाल गोत्र के राजाओं का शासन था। इसलिए इस क्षेत्र का नाम मेवात पड़ा। यहां के लोगों को मेव कहा जाता था। ये मेव शब्द उनको अपने अतीत से जोड़े रखता है। इसलिए मेव अपने आपको मुसलमान कहलाना पसंद नहीं करते, वे अपने आपको मेव कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। मुसलमान तो उनको हिंदुओं ने बनाया है, हिंदुओं ने मेवों को मुसलमानों की तरफ धकेला है।

मेव भारत का एक ऐसा समाज है जो हिंदू-मुस्लिम धर्म, संस्कृति दोनों को एक साथ जिया है, निभाया है। मेव समाज हिन्दू-मुस्लिम एकता, भाईचारे की कड़ी है। ये लगभग 1992 तक ईद के साथ साथ होली भी खेलते थे, दिवाली भी मनाते थे, हिंदुओं के लगभग सभी त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाते थे। शादी में निकाह भी पढ़ते थे, और फेरे भी लेते थे।

इनके पुरानी पीढ़ी के नाम भी मंगल खां, शेरू खां, कालू खां हिंदू मुस्लिम मिक्स नाम होते थे। दाढ़ी मूंछ हिंदुओं जैसे रखते थे। धोती-कुर्ता पहनते थे। 1992 के हिंदू मुस्लिम दंगों में इन्होंने महसूस किया की ना तो हिंदू अपना समझ रहे है और ना मुस्लिम अपना, दोनो की नफरत का शिकार कब तक होते रहेंगे। उनको लगा कि अब कहीं एक साइड हो जाना चाहिए।

हिंदू उनको अपना नहीं रहे थे, मुसलमानों में वे जाना नही चाह रहे थे। हिंदुओं ने इनके घर वापसी का कोई प्रयास किया नहीं, मुस्लिम संस्थाओं ने इनके लिए दरवाजे खोल दिए। 1992 के बाद से इनके पहनावे, नामकरण, रीति रिवाजों में तेजी से बदलाव आया। मेवात का मेव समाज मीना, जाट, गुर्जर, राजपूत और अन्य समाजों से बना हु़वा है। मेव समाज अभी भी अपने बच्चों की शादी मुसलमानों में नही करते, ये मेवों में ही करते है, चाचा, ताऊ के बच्चों के साथ शादी नहीं करते। ये तीन गोत्र टालते है। इन्होंने निश्चित कर रखा है की किन गोत्र में शादी करनी है, किनमें नहीं करनी।

मेवों का इतिहास बहुत ही शानदार और गौरवपूर्ण रहा है। मेवों को एक देशभक्त कौम के रूप में जाना जाता है। लेकिन विडंबना है कुटिल मानसिकता वाले लोग मेवों को भारत की प्राचीन संस्कृति और भाईचारे से पहले भी दूर धकेला है और अब भी धकेलते जा रहे है। मुस्लिम हो, अंग्रेज हो या कोई ओर, किसी भी बाहरी आक्रांता और आततायियों का मेवों ने मुंहतोड़ जवाब दिया है। आक्रांताओं से संघर्ष में इस समाज ने अपना बहुत कुछ खोया है।

दिल्ली से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर होते हुए भी विकास यहां से कोसो दूर है। गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, असुरक्षा की भावना चरम पर है। बेरोजगारी और अशिक्षा की वजह यहां के युवा अपराध की तरफ बढ़ गए। ना सरकार ने मेवात की तरफ ध्यान दिया, ना हिंदू मुसलमानों ने अपना समझकर इनका विकास करने में मदद की। निरंतर खतरा और असुरक्षा की भावना, गरीबी, बेरोजगारी निरंतर इनको अपराध की तरफ धकेल रही है। हिंदुस्तान के लोगों से निवेदन है कि मेवों को मेव ही रहने दो और मेवात को मेवात ही रहने दो, मिनी पाकिस्तान का ठप्पा लगाकर, अपने हिस्से को उपहार स्वरूप पाकिस्तान को भेंट ना करो।


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