विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
राजनीति और धर्म से जुडे लोगों के लिए लिए तो दुर्भाग्य से हमारे देश में कोई आचरण नियमावली है ही नहीं। चुनावों के समय जरूर चुनाव आयोग और उससे संबद्ध मशीनरी को मिले विशेष अधिकारों के कारण नेताओं पर कुछ दिन के लिए थोडी बहुत लगाम कसी जाती है अन्यथा उनके लिए कोई लिखित या परंपरा के रुप में आचरण नियमावली नहीं बनाई गई।
इस मामले में सभी दल बराबर के दोषी हैं क्योंकि किसी भी राजनैतिक दल ने ऐसी पहल नहीं की। इसके बरक्स नौकरशाहों और न्यायालय के न्यायमूर्तियों के लिए न केवल विस्तृत आचरण नियमावली है बल्कि समय समय पर न्यायालयों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश और सरकार द्वारा ज़ारी नियम भी उन पर लागू होते हैं। इसके बावजूद कभी कभी नौकरशाह और न्यायमूर्ति भी इस तरह का व्यवहार करते हैं जिससे बडी विचित्र स्थितियां पैदा हो जाती हैं। कुछ दिन पहले कुछ ऐसा ही कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायधीश अभिजीत गंगोपाध्याय के आचरण और आदेशों के बारे में हुआ है।
न्यायमूर्ति गंगोपाध्याय ने पश्चिम बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले में सी बी आई जांच के आदेश दिए थे। इस जांच के बाद ही इस घोटाले की परतें खुलती चली गई थी जिनमें सैकड़ों करोड़ रुपए के काले धन की जब्ती हुई थी और तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेता और तत्कालीन शिक्षा मंत्री की गिरफ्तारी हुई थी। निश्चित रुप से यहां तक यह अत्यंत सराहनीय निर्णय था जिससे भ्रष्टाचार का इतना बड़ा मामला जनता के सामने आया था।
न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय यहीं नहीं रुके। उन्होंने इस मामले पर मीडिया में बेबाक इंटरव्यू भी दे दिया। न्यायालय की यह परंपरा रही है कि न्यायमूर्ति उन मामलों पर मीडिया में इंटरव्यू नहीं देते जिनकी सुनवाई उनकी अदालत में चल रही है। यहीं से सर्वोच्च न्यायालय से उनके टकराव की शुरुआत हुई। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस ने न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शिक्षक भर्ती घोटाले से तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं का नाम जुडऩे से पार्टी वैसे ही इन न्यायमूर्ति महोदय से खुन्नस खाई हुई थी, उनके इंटरव्यू ने आग में घी डाल दिया जिससे पार्टी को उनके खिलाफ मोर्चा खोलने का मौका मिल गया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनके आचरण को उचित नहीं माना और उनके इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट जांच के लिए मांग ली। इसके पहले कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में किसी निर्णय पर पहुंचता न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारी को आधी रात तक उनके इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट भेजने का निर्देश जारी कर दिया। इस निर्देश ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी। इस स्थिती से निबटने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ को भी देर शाम अदालत लगानी पड़ी और न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के निर्देष को रद्द करना पड़ा।
प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व में सर्वोच्च न्यायालय इन दिनों न्यायिक व्यवस्था में सुधार के लिए कई प्रगतिशील और सकारात्मक परिवर्तनों की शुरुआत कर रहा है ताकि नागरिकों को सहज और त्वरित न्याय सुलभ हो और न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़े। ऐसे में न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय के प्रकरण से न्यायिक व्यवस्था के बारे में जनता में गलत संदेश जाता है। इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति द्वारा ट्रेन यात्रा के दौरान हुई असुविधा के लिए रेल अधिकारियों का स्पष्टीकरण तलब कर लिया था। इसे भी सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने उचित नहीं माना और देश के सभी न्यायिक अधिकारियों से प्रोटोकॉल को लेकर उदारता का परिचय देने का अनुरोध किया है। उपरोक्त वर्णित न्यायमूर्तियों की तरह देश के विभिन्न हिस्सों से प्रशासनिक अधिकारियों के मातहतों और आम जनता से दुर्व्यवहार के किस्से भी समाचारों की सुर्खियां बनते रहते हैं। ऐसे अधिकारियों के कारण नौकरशाही के बारे में भी जनता में बहुत गलत संदेश जाता है। संबंधित सरकारों को ऐसे अधिकारियों से भी सख्ती से निबटना चाहिए।


