विचार/लेख
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक़ डार अगले महीने बांग्लादेश के दौरे पर जाएंगे।
पाकिस्तानी मीडिया में कहा जा रहा है कि पिछले साल अगस्त महीने में बांग्लादेश से भारत समर्थक सरकार के हटने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश की करीबी बढ़ रही है।
2012 के बाद बांग्लादेश में किसी भी पाकिस्तानी विदेशी मंत्री का यह पहला दौरा होगा। पिछले गुरुवार को डार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री के आमंत्रण पर वह अगले महीने फऱवरी में दौरा करेंगे।
डार ने इस बात की भी पुष्टि की थी कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनूस ने पाकिस्तान आने का न्योता स्वीकार कर लिया है और दोनों देशों की सहमति से दौरे की तारीख़ की घोषणा की जाएगी।
हिना रब्बानी खार पाकिस्तान की आखऱिी विदेश मंत्री थीं, जो नवंबर 2012 में डी-8 समिट में हिस्सा लेने ढाका गई थीं। हिना रब्बानी खार का यह दौरा सिफऱ् पाँच घंटे का था।
डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा था कि पाकिस्तान बांग्लादेश को हर संभव मदद करेगा। हालांकि बांग्लादेश ने पाकिस्तान से किसी तरह की मदद मांगी नहीं थी। इसके बावजूद डार ने बांग्लादेश को मदद की पेशकश की है।
डार की पेशकश पर सवाल उठ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि पाकिस्तान की तुलना में बांग्लादेश के पास विदेशी मुद्रा भंडार ज़्यादा है, आर्थिक वृद्धि दर ज़्यादा है, निर्यात ज़्यादा है तो मदद क्या मिलेगी?
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल एबीएन से बात करते हुए कहा, ‘मुझे लगता है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान वाली ग़लती बांग्लादेश में ना करे। इसहाक डार ने बांग्लादेश को लेकर जो कहा, उस पर मुझे सख्त आपत्ति है।’
‘डार ने बांग्लादेश का जिक्र करते हुए कहा कि वह उसे तरह की मदद करने के लिए तैयार हैं। ‘मदद करने के लिए तैयार हैं’ जैसी भाषा को डिप्लोमैसी में ख़ुद को सुपरियर दिखाने के रूप में देखा जाता है। पहले तो यही बताना चाहिए क्या बांग्लादेश ने हमसे मदद मांगी है?’
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे
अब्दुल बासित ने क्या कहा?
अब्दुल बासित ने कहा, ‘पाकिस्तान से बांग्लादेश कई मोर्चों पर आगे है। बांग्लादेश की जीडीपी पाकिस्तान से बेहतर है। प्रति व्यक्ति आय पाकिस्तान से बेहतर है। सबसे अहम बात तो यह है कि बांग्लादेश ने कोई मदद मांगी ही नहीं है। ऐसे में आप मदद की पेशकश क्यों कर रहे हैं?’
बासित ने कहा, ‘इसी चीज़ को बेहतर भाषा में कहा जा सकता था कि पाकिस्तान बांग्लादेश के साथ हर मोर्चे पर साथ मिलकर काम करना चाहता है। डिप्लोमैसी में बात ऐसे होती है। मुझे नहीं मालूम कि उन्हें कौन ऐसी स्क्रिप्ट लिखकर दे रहा है। इन्हें जानना चाहिए कि बांग्लादेश के लोग बहुत ही ग़ैरतमंद हैं। बांग्लादेश के लोगों ने पाकिस्तान बनाया था। मुझे लगता है कि पाकिस्तान को बांग्लादेश के मामले में थोड़ा एहतियात से काम लेना चाहिए।’
अब्दुल बासित ने कहा, ‘अफगानिस्तान को हमने जिस तरह से हैंडल किया है, उस पर शर्म आती है। ऐसी ग़लती हमें बांग्लादेश के साथ नहीं करनी चाहिए। पाकिस्तान के बांग्लादेश से संबंध अच्छे हो रहे हैं, इसमें पाकिस्तान की कोई मेहनत नहीं है। शेख़ हसीना को वहाँ के लोगों ने हटा दिया, इसलिए पाकिस्तान को बढ़त मिल गई है।
बासित ने कहा, ‘अफग़़ानिस्तान में तालिबान के आने पर हमने जश्न मनाया था लेकिन इसका क्या हुआ?इसीलिए बांग्लादेश के मामले में हमें बहुत ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है। हमें बांग्लादेश के साथ ताल्लुकात को भारत के लेंस से नहीं देखना चाहिए। सार्क को लेकर बांग्लादेश उत्साहित है। लेकिन भारत के बिना सार्क को सक्रिय नहीं किया जा सकता है।’
अब्दुल बासित ने कहा, ‘बांग्लादेश के मामले में हमें धीरे-धीरे और संभलकर आगे बढऩा चाहिए। संभव है कि बांग्लादेश की सरकार जनभावना के कारण भारत को लेकर आक्रामक हो। इसलिए हमें बहुत जल्दीबाज़ी में नहीं रहना चाहिए। लेकिन पाकिस्तान को अवसर मिला है और इस अवसर को अफगानिस्तान की तरह गँवाए ना।’
पाकिस्तान में बांग्लादेश की विदेश नीति पर बहस
पाकिस्तानी मीडिया में बांग्लादेश को लेकर ख़ासा उत्साह देखने को मिल रहा है। इस उत्साह की सबसे बड़ी वजह ये है कि भारत और बांग्लादेश के संबंधों में कड़वाहट आई है।
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने पाकिस्तानी न्यूज चैनल समा टीवी से कहा, ‘बांग्लादेश की विदेश नीति को लेकर बहस हो रही है। इसमें बात की जा रही है कि नई नीति में भारत की क्या भूमिका होगी और पाकिस्तान का क्या रोल होगा। मोहम्मद युनूस ने सार्क को जिंदा करने के लिए कहा है। मोहम्मद युनूस को लगता है कि सार्क को जि़ंदा कर दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और बाक़ी देशों के साथ भारत को अलग-थलग किया जा सकता है। ये पहली दफ़ा है कि पाकिस्तान तो भारत विरोधी था ही लेकिन बाक़ी के पड़ोसियों में भी ये भावना बढ़ी है।’
नजम सेठी ने कहा, ‘ज़ाहिर है, भारत को तकलीफ़ हो रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच व्यापार शुरू हो रहा है। पाकिस्तान व्यापार समुद्र या हवाई मार्ग से ही कर सकता है। हवाई मार्ग से करने के लिए भारत के एयर स्पेस का इस्तेमाल करना होगा। दोनों देशों के बीच हवाई सेवा भी शुरू हो रही है लेकिन इसके लिए पैसेंजर भी तो होने चाहिए। ज़ाहिर है कि इसमें वक़्त लगेगा। बांग्लादेश में एक सोच बन रही है कि भारत तमाम तनाव के बावजूद पाकिस्तान से एक अरब डॉलर से ज़्यादा का कारोबार कर रहा है तो हम क्यों नहीं कर सकते हैं। अब ये सारे तथ्य सामने आ रहे हैं।’
नजम सेठी ने कहा, ''पाकिस्तान के लोग टेक्सटाइल उद्योगपति बांग्लादेश में अपना प्लांट लगाना चाह रहे हैं। बांग्लादेश में पाकिस्तान के कारोबारियों को आधारभूत संरचना मिलेगी और अपना कारोबार बढ़ा सकते हैं। यहाँ बिजली और श्रम दोनों सस्ते हैं। दूसरी तरफ बांग्लादेश चाहता है कि पाकिस्तानी आर्मी बांग्लादेश की आर्मी को ट्रेनिंग दे। ऐसे में भारत बहुत डरा हुआ है। बांग्लादेश की आर्मी पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेगी तो भारत विरोधी होगी। ज़ाहिर है कि ट्रेनिंग से विचार भी बदलेगा। पाकिस्तान की सोच है कि अब उसे बांग्लादेश के ज़रिए भारत को निशाना बनाने का मौका मिलेगा। इसहाक़ डार इन्हीं चीज़ों पर मुहर लगाने जा रहे हैं।’
बांग्लादेश के लोगों में पाकिस्तान को लेकर भावना स्थायी या अस्थायी?
एजाज अहम चौधरी पाकिस्तान के पूर्व डिप्लोमैट हैं और उन्होंने हाल ही में बांग्लादेश का दौरा किया था।
पाकिस्तान के डॉन टीवी से अपना अनुभव साझा करते हुए एजाज अहमद ने बताया, ‘दो साल पहले जब मैं ढाका गया था तो एयरपोर्ट से निकलते ही शेख़ मुजीब-उर रहमान हर जगह दिखते थे लेकिन इस बार उनका नामोनिशान नहीं था। यानी शेख़ हसीना को लेकर बहुत ग़ुस्सा था। दूसरी तरफ़ हिन्दुस्तान को लेकर भी मुझे भारी नाराजग़ी वहां दिखी। मैं बे ऑफ बंगाल कन्वर्सेशन में गया था। उस सेशन के दौरान हॉल में एक युवा बांग्लादेशी लडक़ी ने कहा कि आप ट्रंप की नीति की बात न करें बल्कि मोदी की नीति की बात करें, जिन्होंने हमारी जनसंहारक प्रधानमंत्री को जगह दे रखी है।’
एज़ाज़ चौधरी ने कहा, ‘तीसरा रूझान मुझे दिखा कि बांग्लादेश में पाकिस्तान को लेकर बहुत सकारात्मक माहौल था। 1971 को लेकर कोई नाराजग़ी नहीं दिखी। दो साल पहले भी लोग पाकिस्तान से प्रेम दिखाते थे लेकिन शेख़ हसीना सरकार से डरते थे। लेकिन अब लोग खुलकर बोल रहे हैं। बांग्लादेश के लोग कहते थे कि पाकिस्तान जाने का ठप्पा पासपोर्ट पर लगता था तो फिर हिन्दुस्तान का वीज़ा नहीं मिलता था।’
एज़ाज़ अहमद से पूछा गया कि बांग्लादेश के लोगों में पाकिस्तान को लेकर जो अभी जज़्बा दिख रहा है वो अस्थायी है या स्थायी है?
इस सवाल के जवाब में एज़ाज़ चौधरी ने कहा, ‘ये सवाल बहुत वाजिब है। ढाका ट्रिब्यून में एक लेख पढ़ रहा था कि जिसमें लिखा था कि बांग्लादेश में हिन्दू 9 प्रतिशत हैं लेकिन सरकारी नौकरी में वे 15 फ़ीसदी हैं। हम अभी से ये नहीं कह सकते हैं कि शेख़ हसीना की अवामी लीग़ ख़त्म हो गई है। अब भी है। बांग्लादेश तीन तरफ़ से भारत से घिरा है। ऐसे में उसे भारत के प्रभाव से निकलना आसान नहीं होगा। मेरा भी मानना है कि पाकिस्तान को लेकर यह जज़्बा अभी अस्थायी है।’
बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन मानती हैं कि शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद बांग्लादेश में पाकिस्तान को लेकर उत्साह बढ़ा है।
तसलीमा नसरीन ने लिखा है, ‘कुछ महीने पहले बांग्लादेश में बांग्ला बोलने वाले पाकिस्तान समर्थकों ने मोहम्मद अली जिन्ना की पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि दी थी। उसके बाद जिन्ना की जयंती मनाई गई। बांग्लादेश में अचानक जिन्ना प्रेम क्यों बढ़ा है? सच यह है कि जिन्ना प्रेम कोई नया नहीं है बल्कि शुरू से ही था।’
‘बांग्ला बोलने वाले ये मुसलमान व्यापक इस्लामी दुनिया की सोच से संचालित होते हैं। मैं जानबूझकर इन्हें बांग्ला बोलने वाला कहती हूं, न कि बंगाली क्योंकि हर बांग्ला बोलने वाला व्यक्ति बंगाली नहीं हो सकता है। जो सच्चा बंगाली होगा, वह बंगाली संस्कृति से प्रेम करेगा।’ (bbc.com/hindi)
A Painful Memory of a Fellow Journalist
-Dipankar Ghosh
For two days, words have failed me. How do you begin to write a tribute to a journalist, a friend, a brother? What memories do you choose? How do you describe him when nothing really contains him?
The first time I met Mukesh Chandrakar was in December 2015, weeks after I had landed in Chhattisgarh as the Indian Express correspondent in the state. There was a story in Bastar, and I had reached Bijapur, one of India's most dangerous places to report, with very little to go on. There I was, at the district headquarters, in a run-down press club building among a group of journalists eyeing me suspiciously. The suspicion of "national journalists" is warranted. Very often, we climb on the shoulders of our regional colleagues, leave them to danger, or worse forget we ever knew them. The story spot was deep inside the forests, some 80 kilometres away. Impossible to access without help.
I asked loudly, sheepishly, if someone would come with me tomorrow. By come with me, I meant take me. In that moment, I was helpless. There was only one voice that said "Haan, kal chalenge aapke saath."
I went back to the relative comfort of my hotel in Jagdalpur. Mukesh went to the mechanic shop to repair his motorcycle for what lay ahead. The next day, at the agreed 5 am, we met at the Bijapur bus stop(there was no phone network except BSNL in Bastar in 2015), and set off. Me on the back of his bike. He was young, but he was my first teacher in Bastar. He taught me the dangers of relieving yourself on the sides of a freshly laid road, because that's where an IED would be. He taught me to stand up on the back of a bike to ensure that your muscles don't spasm under duress. We navigated paved roads, and then unpaved roads, and then no roads. Carried the motorcycle across streams. Waded through mud. He told me how to navigate a complicated world of hostile police, hostile Maoists, and beleaguered people. I was doing all this for my story. He too was doing all this for my story.
The piece appeared. It was an important story, and the state took note. I was congratulated for my work. The byline said my name, not his. I worked for the Indian Express, he didn't. For four and a half years, Mukesh did this over and over again. Not just for me, but for many others. It was on his back that stories of Bastar, of state-Maoist violence, of people were ever told.
For me, Mukesh was the personification of bravery. I'm not going to pretend that in a universe where media organisations he worked for didn't even pay for his petrol let alone a stable salary, sustenance wasn't a problem, and therefore some wires weren't crossed. But Mukesh loved journalism with a passion. When he was with you, nothing was impossible. He was always compassionate to people he reported on, always empathetic.
He was rooted in Bastar, but not limited by it. After a decade of jumping from one channel to the other, he realised organisations would never truly value its ground reporters in the region. He recognized the power of technology, and became an enterpreneur--starting Bastar Junction, a YouTube channel that at last count has 162 thousand followers. Go to YouTube now and watch his videos, and you will find more journalism than screaming television studios can ever offer. He reported and wrote from spots of attacks, crossed forests and mountains to get to victims of violence, reported from police camps, and from Naxal camps. If one core principle of journalism is to inform, to reach new areas, to give voice to the voiceless, journalists like Mukesh are peerless.
Journalism in Bastar has risks, and he bore them all. Getting to a spot is more physically arduous, more dangerous than most can imagine. Maoists threatened his life several times; the state threatened him when he exposed excess. He was often bullied by his own Bijapur fraternity for helping "national journalists" but he never, ever wavered. It was him, and my other dear friend Ganesh Mishra, who risked their lives and went deep into the forests to rescue a CRPF Jawan abducted by Maoists.
But Bastar claimed him. On December 24, Mukesh helped report a story of a road in Bijapur, being built at great cost, but with shoddy material and obvious corruption. The story caused an enquiry. A week later, one day after the new year, Mukesh was found dead, buried inside a septic tank in the home of the contractor that built that road.
The last time I met him was during the Chhattisgarh elections, when I spent the day with him, Ganesh Mishra. We reported, talked and laughed for hours. And then Mukesh took me home because he had cooked some lunch himself. We laughed and lamented my distance from Bastar, and friends like the two of them. His last message to me, in October, had the words "Pata nahi kab mulakat hogi, par mulakat ka intezaar humesha rahega." I told him, "jald hogi mulakat."
How does one begin to remember him? As a journalist? As a bridge to Bastar? As the voice of those that would never be heard otherwise? Remember him as them all. He was them all. To me, he was my friend, my brother--Mukesh Chandrakar. Go well, Bhai. Mulaqaat ka humesha intezaar rahega.
-हिमांशु दुबे और अभय सिंह
कनाडा चर्चा में है। कारण हैं वहां के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो। उन्होंने सोमवार (स्थानीय समय के मुताबिक़) को सत्ताधारी लिबरल पार्टी के नेता पद और प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
ट्रूडो ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने इस्तीफ़े की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वो पार्टी के नेता के तौर पर इस्तीफ़ा देते हैं और अगला नेता चुने जाने के बाद वो पीएम पद छोड़ देंगे।
वैसे पीएम जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफ़ा देने का भारत पर क्या असर पड़ेगा? क्या भारत को इससे ख़ुश होना चाहिए? लिबरल पार्टी का नया नेता भारत के लिए कैसा साबित होगा?
ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी हिंदी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मामलों के जानकारों से बातचीत की। विशेषज्ञ मानते हैं कि जस्टिन ट्रूडो के हटने से संबंध बेहतर होने की उम्मीद है।
क्या भारत को ख़ुश होना चाहिए?
ये बिलकुल स्पष्ट था कि जब तक ट्रूडो कनाडा के प्रधानमंत्री बने रहेंगे, तब तक भारत-कनाडा के संबंधों में नया मोड़ जिसकी ज़रूरत है, वो नहीं आ पाएगा।’
यह कहना है प्रोफ़ेसर हर्ष वी। पंत का, जो नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं।
उन्होंने कहा, ‘ट्रूडो ने इसे निजी तौर पर ले लिया था और जिस तरह की संजीदगी इस मुद्दे पर चाहिए थी, वो नहीं दिखा रहे थे। उससे दोनों देशों के बीच के संबंधों में काफ़ी नुक़सान हुआ।’
दरअसल, जस्टिन ट्रूडो पिछले कुछ समय से भारत विरोधी बयानबाज़ी कर रहे थे। इस बीच, कनाडा ने स्टूडेंट वीज़ा से जुड़ा एक फ़ैसला लिया था, जिससे भारतीय स्टूडेंट्स की दिक्कतें बढ़ गई थीं।
यही वजह है कि भारत और कनाडा के बीच तनाव देखने को मिल रहा है।
वॉशिंगटन डीसी के विल्सन सेंटर थिंक टैंक में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगेलमैन भी भारत और कनाडा के संबंधों को लेकर यही राय रखते हैं।
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘ट्रूडो का इस्तीफ़ा भारत-कनाडा के बिगड़ते संबंधों को स्थिर करने का मौका दे सकता है।’
‘नई दिल्ली ने द्विपक्षीय संबंधों में गहराई तक फैली समस्याओं के लिए सीधे तौर पर ट्रूडो को जि़म्मेदार ठहराया है। हाल के वर्षों में कनाडा एकमात्र पश्चिमी देश है, जिसके भारत के साथ संबंध लगातार खऱाब हुए हैं।’
क्या अब बदलेंगे कूटनीतिक संबंध?
तो क्या अब बदल जाएंगे भारत और कनाडा के कूटनीतिक संबंध? इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि जब भी इस तरह का बदलाव होता है, तो बदलाव की उम्मीद तो होती है।
उन्होंने कहा, ‘जब नया प्रशासन आएगा, वो नई शुरुआत करेगा। और नए प्रधानमंत्री और नए प्रशासन से एक नई उम्मीद तो रहती है। लेकिन, यह ज़रूर है कि लिबरल पार्टी की भी अपनी चुनौतियाँ हैं।’
‘अक्टूबर में चुनाव होने हैं। तो चुनावों में तो काफ़ी समय है। और लिबरल पार्टी की जो सीटें हैं, उसमें भी कई ऐसे नेता हैं, जो सिख कम्युनिटी से आते हैं।’
‘और जो रेडिकल सिख कम्युनिटी बिहेवियर को सपोर्ट करते रहे हैं। तो मुझे लगता है कि कोई इतनी बड़ी उम्मीद करना, थोड़ा अस्वाभाविक बात होगी।’
‘जब तक चुनाव नहीं हो जाते, तब तक मुझे लगता है कि यह समस्या बनी रहेगी। क्योंकि, लिबरल पार्टी को तो अपनी सीटों को बनाकर रखना पड़ेगा, फिर चाहे ट्रूडो लीड करे या कोई और लीड करे।’
भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल की राय भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘ट्रूडो ने अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया, जो अच्छी बात है।’
‘उन्होंने अपनी ग़ैर-जि़म्मेदार नीतियों से भारत-कनाडा संबंधों को नुक़सान पहुंचाया। लेकिन, कनाडा में सिख उग्रवाद की समस्या ख़त्म नहीं होगी, क्योंकि इन तत्वों ने कनाडा की राजनीतिक प्रणाली में गहरी पैठ बना ली है।’
क्या कंजर्वेटिव के आने से बेहतर होंगे रिश्ते?
ऐसे में सवाल उठता है कि कनाडा में अगर कंजर्वेटिव पार्टी का नेता प्रधानमंत्री बनता है तो क्या उसका व्यवहार भारत के लिए अलग होगा?
प्रोफेसर पंत कहते हैं, ‘बिल्कुल, मुझे लगता है कि ऐसा होगा। क्योंकि, ट्रूडो से पहले आप स्टीफन हार्पर की बात करें, जो एक कंज़र्वेटिव कार्यकाल था, तब भारत-कनाडा के संबंधों ने एक नया आयाम लिया था।’
‘ट्रूडो के आने से बिल्कुल पहले, प्रधानमंत्री मोदी वहां गए थे। तब स्टीफन हार्पर वहां के प्रधानमंत्री थे। और दोनों देशों के बीच एक बहुत बड़ी साझेदारी का खाका तैयार किया गया था।’
‘फिर ट्रूडो आए। उन्होंने अपने हिसाब से चीज़ें कीं, जिसका नुकसान भारत-कनाडा संबंधों को हुआ। मुझे लगता है कि कंजर्वेटिव आते हैं, तो भारत-कनाडा के संबंधों को फायदा होना चाहिए।’
हालांकि, प्रोफे़सर पंत का यह भी कहना है कि ऐसा मानना कि जो समस्याएं हैं, उनको पूरी तरह से दरकिनार कर दिया जाएगा, तो ऐसा नहीं होगा।
उन्होंने कहा, ‘ये समस्याएं तो बनी रहेंगी। लेकिन, उस समस्या को किस तरह से हैंडल किया जाता है, वो महत्वपूर्ण है। खासतौर पर उन देशों के लिए, जो खुद को स्ट्रेटेजिक पार्टनर कहते हैं।’
क्या ट्रूडो की विदेश नीति ने खेल बिगाड़ा?
क्या ट्रूडो की विदेश नीति उन पर भारी पड़ गई? इस सवाल के जवाब में प्रोफेसर पंत ने कहा कि देखिए, इनका (ट्रूडो) जो राजनीतिक पतन हुआ, वो अंदरूनी कारणों से ही होता है।
उन्होंने कहा, ‘यह जरूर है कि जब इनको लगा कि मैं राजनीति में कमजोर हो रहा हूं, तो इन्होंने कोशिश की कि विदेश नीति में कुछ नया किया जाए। जैसे- पहले इन्होंने भारत के साथ तनातनी की।’
‘फिर हाल ही में इन्होंने कहा कि मैं ट्रंप से मिलूंगा। कोशिश करूंगा कि ये टैरिफ कम हो जाएं। तो उसका नतीजा भी हमको देखने को मिला कि किस तरह से यह उन पर भारी पड़ा।’
पंत ने कहा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि ट्रूडो जिस तरह से विदेश नीति के मामले में फ़ेल हुए, इस बात ने कनाडा के मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि फिलहाल ये नेतृत्व और प्रधानमंत्री हमारे लिए सही नहीं हैं।’
पिछले कुछ समय से जस्टिन ट्रूडो को कनाडा में विपक्षी पार्टियों के साथ-साथ अपनी पार्टी के नेताओं से भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।
इसका एक प्रमाण कनाडा की उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलैंड का प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो से टकराव के बाद पद छोडऩा भी माना जा सकता है।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी भी जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे को लेकर कुछ ऐसी ही राय रखते हैं।
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘कनाडा की तीन अहम दिक्कतें ‘टी’ से शुरू होती हैं- ट्रूडो, टेररिज़्म (जिसका सबसे बड़ा उदाहरण एयर इंडिया बम विस्फोट है), और टैरिफ़।’
‘अब ट्रंप के टैरिफ़ की धमकी ने लगभग एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद ट्रूडो को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया है।’
इस्तीफा देने के बाद क्या बोले ट्रूडो?
जस्टिन ट्रूडो ने इस्तीफ़ा देने के बाद कहा, ‘प्रधानमंत्री के रूप में हर एक दिन सेवा करना मेरे लिए गर्व की बात रही। हमने महामारी के दौरान सेवा की, मज़बूत लोकतंत्र के लिए काम किया, बेहतर कारोबार के लिए काम किया। आप सभी को पता है कि मैं फाइटर हूं।’
उन्होंने कहा, ‘2015 में जब से मैं प्रधानमंत्री बना, तब से कनाडा और इसके हितों की रक्षा के लिए काम कर रहा हूँ। मैंने मध्य वर्ग को मज़बूत करने के लिए काम किया। देश को महामारी के दौरान एक दूसरे का समर्थन करते देखा।’
हालांकि, प्रोफे़सर पंत ने कहा कि यह तो कई समय से चल रहा था कि ट्रूडो को जाना पड़ेगा। यह लिबरल पार्टी के लिए ज़रूरी था। यह कनाडाई राजनीति के लिए ज़रूरी था।
उन्होंने कहा, ‘वहां (कनाडा में) एक तरह से असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। मुझे लगता है कि भारत और कनाडा के संबंधों के लिए भी यह ज़रूरी था।’
‘क्योंकि यह माना जा रहा था कि जितने लंबे समय तक ट्रूडो सत्ता में बने रहेंगे, तो भारत और कनाडा के संबंधों में बदलाव नहीं आ सकता।’
‘उनके जाने के बाद देखना होगा कि भारत और कनाडा के संबंधों में बदलाव कितने जल्दी आते हैं।’
कैसे बिगड़े भारत-कनाडा के रिश्ते?
जून 2023 में 45 साल के ख़ालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की कनाडा के वैंकूवर के पास बंदूकधारियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने इस हत्या के पीछे भारत का हाथ होने का आरोप लगाया था। इसके बाद भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव बढ़ता चला गया।
फिर अमेरिकी अख़बार ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ ने सूत्रों के हवाले से लिखा था कि भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कनाडा में सिख अलगाववादियों के खिलाफ अभियान के ऑर्डर दिए थे।
29 अक्टूबर, 2024 को कनाडा की सरकार के उप विदेश मंत्री डेविड मॉरिसन ने देश की नागरिक सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा कमेटी को बताया कि भारत सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने कनाडाई नागरिकों को धमकी देने या उनकी हत्या के अभियान को मंजूरी दी थी। इसके बाद यह मामला और भी ज़्यादा बिगड़ गया था।
दरअसल, कनाडा में ख़ालिस्तान समर्थकों की ओर से भारत विरोधी प्रदर्शनों का होना और खालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव लगातार बढ़ा है।
कनाडा का आरोप है कि ख़ालिस्तान समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ है, जबकि भारत इससे इनकार करता रहा है।
भारत और कनाडा के बीच का कारोबार
भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष (2023-2024) में 31 मार्च तक कनाडा और भारत का द्विपक्षीय व्यापार 8।4 अरब डॉलर का था।
भारत विशेष तौर पर कनाडा में रत्न, ज्वेलरी, महंगे पत्थर, दवाइयां, रेडीमेड कपड़े, ऑर्गेनिक केमिकल और लाइट इंजीनियरिंग गुड्स निर्यात करता है।
वहीं, कनाडा से भारत दाल, न्यूज़प्रिंट, वुड पल्प, एस्बेस्टस, पोटाश, आइरन स्क्रैप, कॉपर और इंडस्ट्रियल केमिकल आयात करता है।
नेशनल इन्वेस्टमेंट प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन एजेंसी (इन्वेस्ट इंडिया) के अनुसार, भारत में विदेशी निवेशकों में कनाडा 18वें नंबर पर है।
2020-21 से 2022-23 में कनाडा का भारत में कुल निवेश 3।31 अरब डॉलर था। वैसे, कनाडा का यह निवेश भारत के कुल एफड़ीआई का आधा प्रतिशत ही है। (bbc.com/hindi)
-सतीश जायसवाल
महाराष्ट्र के लोकनृत्य ‘लावणी’ को कुलीन समाज में प्रतिष्ठा की जगह देर से मिली। इन दिनों उसका क्रेज है।‘ लावणी’ का यह क्रेज लोक मंच से निकलकर भव्य मंडपों और नृत्य समारोहों में दिखने लगा है।
‘लावणी’ को इन दिनों के ‘क्रेज’ से अलग, उसके विकास क्रम में देखने के लिए भी यह उपयुक्त समय है।
महाराष्ट्र की यह लोकनृत्य परम्परा अब अपनी क्षेत्रीय पहचान से आगे निकलकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा में अपनी जगह बनाने के लिए उत्सुक्त दिखती है।
‘लावणी’ के लिए ‘नौवारी’ साड़ी अनिवार्य है। एक तरह से ‘लावणी’ का एक हिस्सा। लेकिन महाराष्ट्र के एक बड़े हिस्से में यह ग्रामीण स्त्रियों का सहज पहनावा है।
इन दिनों ‘लावणी’ की तरह ही, यह ‘नौवारी’ साड़ी भी शहरी युवतियों के लिए ‘फैशन क्रेज’ होती जा रही है।भव्य समारोहों में अलग से दिखती है। लेकिन ‘नौवारी’ साड़ी पहनना आसान नहीं होता।
एक तो नौ गज की उसकी लम्बाई को सम्हालना।फिर बीच में से काष्टा मारकर दोनों पांवों को अलग अलग ढांकना। शहरी युवतियों के लिए यह बहुत आसान नहीं होता।
आज सुबह की सैर में ‘नौवारी’ साड़ी का वैभवशाली सौंदर्य अनायास ही देखने मिल गया।
गोरेगांव स्टेशन पर एक नव वधू ‘बायको’ (स्त्री) अपने परिवार के साथ अभी अभी किसी लोकल ट्रेन से उतरी।शायद अपने पति के साथ उसके गांव जा रही थी।
उसके परिवार के लोगों ने वहीं, स्टेशन से बाहर की भीड़ में दोनों की आरती उतारी और हल्दी कुमकुम का टीका भी किया।
मैं दूर पर था। लेकिन वह सब मेरे सामने था। वह एक सुखद दृश्य था।उसमें छुअन थी।
‘नौवारी’ साड़ी पहनी हुई वह नव वधू किसी गुडिय़ा की तरह सजी हुई दिख रही थी। लेकिन अपनी साड़ी में गुमी जा रही थी। कुछ ऐसे कि, साड़ी में नारी है या नारी में साड़ी है ..?’.
-राजेश अग्रवाल
बीजापुर (बस्तर) के पत्रकार मुकेश चंद्राकर की बेरहमी से हुई हत्या के बाद इस बात पर बहस हो रही है कि पत्रकार सुरक्षा कानून जल्द से जल्द लागू किया जाए। मगर सच तो यह है कि यदि मार्च 2023 में विधानसभा में जिन प्रावधानों के साथ यह पारित किया गया, उसे आंखों में धूल झोंकने वाला कानून करार दिया जा सकता है। इस विधेयक का उद्देश्य मीडियाकर्मियों की सुरक्षा और पंजीकरण सुनिश्चित करना था, लेकिन इसकी धाराओं को करीब से देखने पर यह अधिकतर मामलों में अप्रभावी और निरर्थक है।
विधेयक की उत्पत्ति 2015 के पत्रकार आंदोलन से हुई, जब बस्तर में पत्रकारों पर बढ़ते हमलों के चलते सुरक्षा कानून की मांग उठी थी। कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही जस्टिस आफताब आलम की अध्यक्षता में एक मसौदा समिति बनाई, जिसने 2020 में एक विस्तृत और विचारशील मसौदा तैयार किया। मसौदे में मीडियाकर्मियों की सुरक्षा के लिए ठोस प्रावधान और पंजीकरण प्रक्रिया का समावेश था।
विधेयक की प्रमुख समस्याएं कुछ इस तरह से हैं- एक, विधेयक में मीडियाकर्मियों की पंजीकरण प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से जटिल बना दिया गया है। केवल पंजीकृत मीडिया संस्थानों में काम करने वाले मीडियाकर्मियों को ही सुरक्षा का प्रावधान दिया गया है। स्वतंत्र पत्रकारों और स्ट्रिंगर्स को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, जो पत्रकारिता की जमीनी हकीकत के विपरीत है। मुकेश चंद्राकर स्वतंत्र पत्रकार थे और संभवत: वे न्यूज चैनल एनडीटीवी एमपीसीजी के लिए केवल स्ट्रिंगर थे। ऐसे सैकड़ों पत्रकार हैं, जिन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता, कर्मचारियों के रूप में रिकॉर्ड नहीं दर्ज होता। वे अंशकालीन काम करते हैं और असाइनमेंट के अनुसार ही भुगतान किया जाता है। दूसरा, जस्टिस आफताब आलम समिति ने पंजीकरण और सुरक्षा के लिए अलग-अलग निकायों का सुझाव दिया था। लेकिन अंतिम विधेयक में सुरक्षा समिति को ही पंजीकरण का कार्य सौंपा गया है, जो एक हास्यास्पद स्थिति है। पंजीकरण की प्रक्रिया में किसी अपीलीय प्राधिकरण का प्रावधान भी नहीं है, जिससे मीडियाकर्मियों के लिए न्याय पाने का रास्ता कठिन हो जाता है। पंजीयन से मना करने पर पत्रकार समिति के खिलाफ कहीं भी शिकायत नहीं कर सकता। इसके अलावा विधेयक में यह प्रावधान है कि किसी भी शिकायत के आधार पर मीडियाकर्मी का पंजीकरण निलंबित किया जा सकता है। यह प्रावधान पत्रकारों की स्वतंत्रता को बाधित कर सकता है और उनकी सुरक्षा को कमजोर करता है।
मौजूदा शक्ल में यह स्वतंत्र पत्रकारिता को बढ़ावा देने के बजाय, मीडियाकर्मियों की सरकार पर निर्भरता बढ़ाने का काम करता है। विधेयक में उनकी सुरक्षा के लिए प्रभावी प्रावधानों की बेहद कमी है। अच्छा होगा कि सरकार यदि वास्तव में पत्रकारों की स्वतंत्र रिपोर्टिंग को संरक्षण देना चाहती है तो इसके प्रावधानों को सरल बनाए, बदलाव करे। मौजूदा कानून के जरिये तो मुकेश चंद्राकर जैसे पत्रकारों को संरक्षण मिलना तो मुश्किल दिखाई पड़ता है।
बिधूड़ी और कब-कब रहे विवादों में
बीते एक साल से चर्चाओं में रहने वाले बीजेपी नेता और पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी एक बार फिर से चर्चाओं में हैं।
चाहे संसद में एक मुस्लिम सांसद पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना हो या 2024 लोकसभा चुनाव में टिकट कटना हो या फिर दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों में विधायकी का टिकट दिया जाना हो, वो चर्चाओं में बने रहते हैं।
अब रमेश बिधूड़ी कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी पर विवादित टिप्पणी को लेकर चर्चा में हैं।
उनके बयान की कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने निंदा की है।
कांग्रेस ने जहां बीजेपी से माफी की मांग की है। वहीं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि ‘महिला मुख्यमंत्री के अपमान का बदला दिल्ली की सभी महिलाएं लेंगी।’
रमेश बिधूड़ी क्यों हैं चर्चा में
साल 2014 और 2019 में दक्षिणी दिल्ली से सांसद रहे रमेश बिधूड़ी को बीजेपी ने कालकाजी सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है। इसी सीट से दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी विधायक हैं और वो फिर से इसी सीट से चुनावी मैदान में हैं।
वहीं कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता अल्का लांबा को इस सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है।
रमेश बिधूड़ी का हाल का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वो इसी इलाके की एक जनसभा को संबोधित कर रहे हैं। इसमें वो कथित तौर पर बिहार की सडक़ों और हेमा मालिनी को लेकर दिए गए लालू प्रसाद यादव के बयान का जि़क्र कर रहे हैं।
इसी बयान में बिधूड़ी ने आगे बोलते हुए बेहतरीन सडक़ बनाने का वादा किया और इस बीच प्रियंका गांधी के बारे में विवादास्पद बात कही।वहीं, रविवार को दिल्ली के रोहिणी में हुई ‘परिवर्तन रैली’ के दौरान रमेश बिधूड़ी ने भाषण देते हुए मुख्यमंत्री आतिशी के नाम को लेकर विवादित टिप्पणी की।
कांग्रेस और आप आक्रामक
पूर्व सांसद के ये बयान सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इसको लेकर कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बिधूड़ी के भाषण का एक वीडियो एक्स पर साझा करते हुए लिखा, ‘ऊपर से नीचे तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार आपको भाजपा के इन ओछे नेताओं में दिख जाएंगे।’
कांग्रेस ने प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का एक वीडियो बयान जारी कर बिधूड़ी के बयान को बेहद शर्मनाक बताया।
उन्होंने कहा, ‘यह बीजेपी का असली चेहरा है। इस महिला विरोधी भाषा और सोच के जनक खुद पीएम मोदी हैं, जो ‘मंगलसूत्र’ और ‘मुजरा’ जैसे शब्द बोलते हैं। इस घटिया सोच के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए।’
आतिशी पर बयान के लिए आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, ‘बीजेपी ने फिर अपना ‘महिला विरोधी चेहरा’ दिखाया। बीजेपी के गालीबाज नेता रमेश बिधूड़ी ने महिला मुख्यमंत्री आतिशी जी के खिलाफ भद्दी और गंदी भाषा का इस्तेमाल किया। अपनी हार नज़दीक देखकर अप बीजेपी इतना बौखला गई है कि महिलाओं को खुलेआम गाली दे रही है।’
वहीं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को चुनाव से भी जोड़ दिया।
उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘बीजेपी के नेताओं ने बेशर्मी की सारे हदें पर कर दीं। बीजेपी के नेता दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी जी को गंदी-गंदी गालियां दे रहे हैं। एक महिला मुख्यमंत्री का अपमान दिल्ली की जनता सहन नहीं करेगी। दिल्ली की सभी महिलाएं इसका बदला लेंगी।’
रमेश बिधूड़ी की ‘सफ़ाई’
प्रियंका गांधी वाड्रा पर दिए बयान का वीडियो वायरल होने के बाद रविवार को बिधूड़ी ने एक्स पर पोस्ट करके कहा कि उनका मकसद किसी को अपमानित करना नहीं था।
उन्होंने लिखा, ‘किसी संदर्भ में मेरे द्वारा दिये गये बयान पर कुछ लोग ग़लत धारणा से राजनीतिक लाभ के लिए सोशल मीडिया पर बयान दे रहे हैं।’
‘मेरा आशय किसी को अपमानित करने का नहीं था। परंतु फिर भी अगर किसी भी व्यक्ति को दुख हुआ है तो मैं खेद प्रकट करता हूँ।’
हालांकि उन्होंने अभी तक आतिशी पर दिए गए भाषण को लेकर कुछ भी नहीं कहा है।
विवादों से पुराना नाता
19 सितंबर 2023 को संसद के मॉनसून सत्र में ‘चंद्रयान-3 की सफलता’ विषय पर चर्चा चल रही थी। इस दौरान रमेश बिधूड़ी ने बसपा सांसद कुंवर दानिश अली के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया।
इस बयान के असंसदीय होने की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चर्चा के दौरान सदन में मौजूद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फौरन इस पर अपना अफसोस जाहिर किया।
बसपा सांसद दानिश अली को कहे गए अपशब्दों को लेकर पड़े चौतरफा दबाव के बाद बीजेपी को अपने सांसद को कारण बताओ नोटिस जारी करना पड़ा।
कुंवर दानिश अली ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ‘मुझे उम्मीद है कि मेरे साथ न्याय होगा और स्पीकर साहब कार्रवाई करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं भरे मन से इस सदन को छोडऩे पर विचार करूंगा।’
इस मामले में हालांकि कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कुछ ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स भी आईं जिसमें बताया गया कि रमेश बिधूड़ी ने लोकसभा की विशेषाधिकार समिति के आगे अपने बयान के लिए अफ़सोस ज़ाहिर किया।
सोनिया गांधी को बनाया निशाना
ऐसा नहीं था कि रमेश बिधूड़ी का नाम पहली बार किसी विवाद के सिलसिले में सामने आया हो। साल 2017 में उन्होंने कांग्रेस पर हमला करने के लिए सोनिया गांधी के इतालवी मूल का मुद्दा उठाया था।
मथुरा में उन्होंने एक जनसभा के दौरान कहा, ‘इटली में ऐसे संस्कार होते होंगे कि शादी के पांच-सात महीने बाद पोता या पोती भी आ जाए, भारतीय संस्कृति में ऐसे संस्कार नहीं हैं।’
हालांकि बाद में उन्होंने इस बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि ‘हमारे पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले हमसे ‘अच्छे दिन’ का हिसाब नहीं मांग सकती है।’
बिधूड़ी ने ये बात कांग्रेस की उस आलोचना का जवाब देने में कही थी कि सरकार बनने के ढाई साल बाद भी बीजेपी सरकार ने अपने वादे पूरे नहीं किए हैं।
महिला सांसदों की शिकायत
बिधूड़ी पर पहले भी संसद के भीतर ‘असंसदीय’ और ‘अशोभनीय’ कमेंट करने का आरोप लग चुका है।
साल 2015 में चार महिला सांसदों ने स्पीकर के पास जाकर उनके कथित ‘बर्ताव’ को लेकर शिकायत की थी।
रंजीत रंजन, सुष्मिता देव, अर्पिता घोष और पीके श्रीमति टीचर ने बिधूड़ी पर ‘अभद्र और अमर्यादित’ भाषा के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। (बाकी पेज 8 पर)
हालांकि बिधूड़ी ने उनके आरोपों से इनकार किया था।
एक अंग्रेज़ी अख़बार से उन्होंने इस मामले पर पूछे जाने पर अपने जवाब में कहा था, ‘मेरी उनसे कोई निजी लड़ाई नहीं है और मैंने ऐसी किसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया है। वे ध्यान भटकाने के लिए ऐसे तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं। वे महिला होने का नाजायज फायदा उठा रही हैं।’
रमेश बिधूड़ी का राजनीतिक करियर
दिल्ली के तुगलकाबाद में जन्मे बिधूड़ी की परवरिश और पढ़ाई-लिखाई इसी शहर में हुई।
एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनके पिता ने गांव में स्कूल, आर्य समाज मंदिर और अस्पताल के लिए अपनी ज़मीन दान कर दी थी।
अस्सी के दशक में दिल्ली यूनिवर्सिटी के भगत सिंह कॉलेज की स्टूडेंट पॉलिटिक्स के जरिए वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संपर्क में आए।
इसके बाद बिधूड़ी ने लंबी सियासी पारी खेली। वे संगठन की राजनीति के रास्ते साल 2003 में पहली बार दिल्ली विधानसभा पहुंचे।
साल 2014 में पहली बार दक्षिणी दिल्ली की प्रतिष्ठित सीट से लोकसभा के लिए चुने जाने से पहले वे तीन बार दिल्ली विधानसभा के सदस्य रह चुके थे।
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में रमेश बिधूड़ी ने आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा और कांग्रेस उम्मीदवार और बॉक्सिंग चैंपियन विजेंदर सिंह को हराया था। (bbc.com/hindi)
-चंदन कुमार जजवाड़े
कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी बेवजह नहीं होता है। संभव है कि वजह बाद में पता चले।
बिहार में नीतीश कुमार कुछ भी करने वाले होते हैं तो उसके संकेत पहले से ही मिलने लगते हैं। कई बार लगता है कि ये तो सामान्य बात है लेकिन कुछ महीने बाद ही असामान्य हो जाती है।
नीतीश कुमार की एक तस्वीर पर ख़ूब बात हो रही है। इस तस्वीर में नीतीश कुमार ने हँसते हुए तेजस्वी यादव के कंधे पर हाथ रखा है और तेजस्वी हाथ जोडक़र थोड़ा झुक कर हँस रहे हैं।
हालांकि यह एक सरकारी कार्यक्रम की तस्वीर है। जहां पक्ष और विपक्ष का आना एक औपचारिक रस्म होता है। लेकिन कई बार औपचारिक रस्म में ही अनौपचारिक चीज़ें हो जाती हैं।
दरअसल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान राज्यपाल की शपथ ले रहे थे और इसी कार्यक्रम में नीतीश कुमार भी मौजूद थे और बिहार विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव भी।
दोनों नेताओं की यह तस्वीर आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने एक चैनल के कार्यक्रम में कहा था कि नीतीश कुमार के लिए उनके दरवाज़े खुले हुए हैं।
बिहार में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं और राज्य के सियासी गलियारों में पिछले कुछ दिनों से नीतीश कुमार को लेकर लगातर अटकलें लगाई जा रही हैं। इन अटकलों को नीतीश की चुप्पी ने भी हवा दी है।
लालू के इस बयान के बाद बिहार में कांग्रेस के नेता शकील अहमद ख़ान ने भी कहा, ‘गांधीवादी विचारधारा में विश्वास करने वाले लोग गोडसेवादियों से अलग हो जाएंगे, सब साथ हैं, नीतीश जी तो गांधीजी के सात उपदेश अपने टेबल पर रखते हैं।’
कऱीब एक साल पहले ही नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन का साथ छोड़ा था और वापस एनडीए में चले गए थे। वो अगस्त 2022 में दोबारा बिहार में महागठबंधन से जुड़े थे।
गुरुवार को जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पत्रकारों ने इस मुद्दे पर सवाल किया तो वो ख़ामोश दिखे, लेकिन राज्य के नए राज्यपाल ने पत्रकारों के सवाल के जवाब में कहा, ‘आज शपथ ग्रहण का दिन है, राजनीतिक सवाल मत पूछिए।’
हालांकि जेडीयू के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने लालू के बयान से किनारा करते हुए कहा, ‘छोडि़ए न... लालू जी क्या बोलते हैं, क्या नहीं बोलते हैं ये लालू जी से जाकर पूछिए हमलोग एनडीए में हैं और मज़बूती से एनडीए में हैं।’
हालांकि ललन सिंह का यह कहना बहुत मायने नहीं रखता है क्योंकि नीतीश कुमार ने तो यहां तक कहा था कि मिट्टी में मिल जाऊंगा लेकिन फिर से बीजेपी के साथ नहीं जाऊंगा।
क्या नीतीश फिर पाला बदल सकते हैं?
बिहार में बीजेपी के नेता कई बार इस तरह का बयान देते हैं कि वो राज्य में अपना मुख्यमंत्री और अपनी सरकार चाहते हैं।
पिछले दिनों बीजेपी विधायक और राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के मौक़े पर कहा था कि अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब राज्य में बीजेपी का अपना मुख्यमंत्री होगा।
हालांकि बाद में वो अपने बयान से पलटते नजऱ आए और एक बयान जारी कर नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए का चेहरा बताया।
हाल के समय में देशभर में कई क्षेत्रीय दलों में टूट हुई है, जिनमें महाराष्ट्र की शिव सेना और एनसीपी जैसे दल भी शामिल हैं। बिहार में रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी एलजेपी के भी दो टुकड़े हो गए, जिसके लिए चिराग पासवान ने बीजेपी के प्रति नाराजग़ी भी जताई थी।
इसके अलावा ओडिशा में बीजू जनता दल जैसी ताक़तवर क्षेत्रीय पार्टी भी बीजेपी से हार गई। क्षेत्रीय पार्टियों के कमज़ोर पडऩे का सीधा फायदा बीजेपी को हो रहा है। ऐसे में क्या नीतीश के मन में भी बीजेपी का डर है?
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, ‘डर बड़े-बड़े नेताओं को होता है तो नीतीश कुमार को क्यों नहीं होगा। इसलिए नीतीश कुमार दो तरह से खेल रहे हैं। वो बीजेपी के साथ हैं और तेजस्वी के कंधे पर हाथ रखकर संकेत दे रहे हैं कि हालात बदले तो वो आरजेडी के साथ भी आ सकते हैं।’
सुरूर अहमद मानते हैं कि अगर नीतीश को कभी बिहार की सत्ता किसी और को सौंपनी पड़े तो उनकी पार्टी में कोई नेता नहीं है और वो बिहार के मौजूदा नेताओं को यहां की सत्ता नहीं सौंपेंगे, ऐसी स्थिति में उनके लिए तेजस्वी यादव ज़्यादा सही हैं।
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी बिहार की मौजूदा सियासत को कुछ अलग नज़रिए से देखते हैं।
उनका कहना है, ‘नीतीश राजनीतिक तौर पर मज़बूत हैं, इसलिए उनकी चर्चा होती रहती है। अलग बीजेपी ने नीतीश की पार्टी तोड़ी तो भी उनका वोट नहीं तोड़ पाएंगे। नीतीश के भरोसे ही केंद्र की सरकार चल रही है तो बीजेपी ऐसा क्यों करेगी।’
उनका मानना है कि बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्य में बहुत फक़ऱ् है। नीतीश कुमार सियासी तौर पर बहुत अनुभवि नेता हैं, जो हर चाल को पहले ही भांप लेते हैं।
वो कहते हैं, ‘नीतीश अगर आरजेडी के साथ जाते हैं तो भी वो ज़्यादा से ज़्यादा सीएम ही रहेंगे, पीएम नहीं बन जाएंगे। हो सकता है कि नीतीश कुमार बीजेपी पर दबाव बना रहे हों कि वो 122 विधानसभा सीटें चाहते हैं, बाक़ी सीटें बीजेपी अपने सहयोगियों के साथ बांटे।’
बिहार में कैसे शुरू हुईं अटकलें
बिहार में विधानसभा की 243 सीटें हैं और राज्य के पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू को महज़ 43 सीटों पर जीत मिली थी जबकि उसने 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालांकि इसके बाद भी नीतीश कुमार ही राज्य के मुख्यमंत्री बने थे।
पहले उन्होंने एनडीए में रहकर सीएम पद अपना दावा बनाए रखा और फिर अगस्त 2022 में महागठबंधन में आ गए। उनकी पार्टी ने उस वक्त आरोप भी लगाया था कि जेडीयू को तोडऩे की कोशिश की जा रही थी।
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, ‘दरअसल नीतीश को लेकर नई चर्चा पिछले दिनों बीजेपी के वरिष्ठ नेता और गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान के बाद शुरू हुई।’
‘एक चैनल के कार्यक्रम में अमित शाह से पूछा गया कि एनडीए ने महाराष्ट्र में बिना सीएम का चेहरा पेश किए बड़ी जीत हासिल की है, तो क्या बीजेपी बिहार में भी ऐसा प्रयोग करना चाहेगी? तो अमित शाह ने कहा मैं पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता हूँ। इस तरह के फ़ैसले लेना संसदीय बोर्ड का काम होता है।’
नचिकेता नारायण कहते हैं कि नीतीश को लेकर अमित शाह ने स्पष्ट बयान नहीं दिया और यहीं से नीतीश ने चुप्पी अपना ली है, जो बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकती है ताकि उन्हें विधानसभा चुनावों में साझेदारी में ज़्यादा से ज्य़ादा सीटें मिल सकें।
नचिकेता नारायण मानते हैं, ‘लालू प्रसाद यादव ने नीतीश के लिए दरवाजा खुला होने की बात कहकर एक सधी हुई चाल चली है। इसका असर धीरे-धीरे समझ में आएगा। लालू जानते हैं कि एनडीए में किसी भ्रम या टूट का फ़ायदा आरजेडी को होगा।’
दरअसल बिहार में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और नीतीश कुमार की जेडीयू राज्य की एक ऐसी पार्टी है जो आरजेडी या बीजेपी किसी के साथ भी गठबंधन में जा सकती है।
आंकड़े बताते हैं कि नीतीश कुमार की पार्टी अकेले भले ही बहुत कुछ हासिल न कर पाए लेकिन वो जिस गठबंधन में होती है, उसकी ताक़त काफ़ी बढ़ जाती है।
सुरूर अहमद कहते हैं, ‘बिहार को लेकर जो ख़बरे चल रही हैं या चलाई जा रही हैं, वह काफ़ी दिनों से हो रहा है। लेकिन बीते 15 दिनों से इसमें कुछ ख़ास बातें देखी गईं। पहले 15 दिसंबर से नीतीश महिला सम्मान यात्रा पर जाने वाले थे, जिसे स्थगित कर दिया, फिर प्रगति यात्रा की योजना बनाई गई। लेकिन 25-26 दिसंबर के आसपास नीतीश को लेकर अटकलें गर्म होनी शुरू हो गईं।’
इसी दौरान 19 और 20 दिसंबर को राजधानी पटना में ‘बिहार बिजनेस कनेक्ट -2024’ का आयोजन हुआ, जिसमें निवेश के अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इस कार्यक्रम के आखिरी दिन नीतीश कुमार को मुख्य अतिथि के तौर पर आना था, लेकिन वो इसमें नहीं आ सके।
इस मामले ने भी सियासी अटकलों को काफी हवा दी।
नीतीश को लेकर क्या है बेचैनी?
बिहार में बीजेपी के सहयोगी दलों की बात करें तो ये पार्टियाँ आमतौर पर सेक्युलर पॉलिटिक्स के लिए जानी जाती हैं।
इनमें नीतीश कुमार की जेडीयू, चिराग पासवान की एलजेपी (आर), पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी हम (सेक्युलर) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे दल शामिल हैं।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, ‘बीजेपी के साथ आने से इन दलों के सेक्युलर वोटों में जो नुक़सान होता है, उसे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को राज्यपाल बनाकर एक संदेश देने और भरने कोशिश ज़रूर की गई है। लेकिन बीजेपी मूल रूप से बिहार को लेकर बेचैन रहती है।’
प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में बीजेपी नीतीश कुमार से साथ एकता चाहती है। लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अपनी ताक़त बढ़ाकर अपने बूते राज्य में सरकार बनाना चाहती है, इसलिए नीतीश कुमार को कमज़ोर करना चाहती है। पिछली बार भी चिराग पासवान की मदद से यह कोशिश की गई।’
‘इस तरह से देखें तो नीतीश कुमार बीजेपी की ज़रूरत भी हैं और बेचैनी की वजह भी। यही बेचैनी कई बार बीजेपी नेताओं के बयान में भी नजऱ आती है।’
हालांकि बाद में वो अपने बयान से पलटते नजऱ आए और एक बयान जारी कर नीतीश कुमार को बिहार में एनडीए का चेहरा बताया है।
पुष्पेंद्र कुमार मानते हैं कि नीतीश कुमार अपनी चुप्पी से रहस्य बनाकर रखते हैं, बाक़ी संजय झा जैसे नेता लोगों के बीच मान्य नेता नहीं हैं, वो बीजेपी और नीतीश के बीच डोर का काम करते हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं हैं।
बिहार के मौजूदा सियासी समीकरण पर नचिकेता नारायण कहते हैं, ‘बिहार में भ्रम की जो स्थिति है उसकी सच्चाई नीतीश कुमार को छोडक़र कोई नहीं जानता है। पिछली बार भी जब नीतीश कुमार ने गठबंधन बदला था तो दो दिन पहले तक उनके मंत्रियों तक को कुछ पता नहीं था।’
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूजरूम की ओर से प्रकाशित) (bbc.com/hindi)
-विष्णुकांत तिवारी
40 साल बाद और हफ़्ते भर की गहमागहमी के बीच बुधवार रात साल 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद बचा ज़हरीला कचरा शहर से बाहर भेजा जा रहा है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड फ़ैक्ट्री में हुई त्रासदी को दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक आपदाओं में से एक माना जाता है। तीन दिसंबर 1984 की सुबह, अमेरिका की यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के स्वामित्व वाली एक कीटनाशक फ़ैक्ट्री से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस लीक हुई थी, जिसके चलते लाखों लोग ज़हरीली गैस की चपेट में आ गए थे।
सरकारी आँकड़ों में गैस रिसाव से 5000 लोगों की मौत का दावा किया जाता है लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग ये संख्या 10 हज़ार तक मानते हैं।
बुधवार रात ज़हरीला कचरा 12 ट्रकों में भरकर भोपाल से 230 किलोमीटर दूर पीथमपुर के लिए रवाना किया गया।
भारी पुलिस सुरक्षा के बीच बुधवार रात 9:30 बजे 40 गाडिय़ों का काफि़ला प्रशासन की ओर से तैयार किए गए ग्रीन कॉरिडोर से गुजऱते हुए सुबह 6 बजे पीथमपुर पहुँचा।
प्रशासन के अनुसार ज़हरीला कचरा भरते हुए विशेष सावधानी बरती गई है और जिस स्थान पर कचरा रखा था, वहाँ की धूल भी पीथमपुर भेजी गई है।
कचरा भरने के लिए 50 से ज़्यादा मज़दूरों को पीपीई किट के साथ लगाया गया था और हर 30 मिनट में मज़दूरों की टीमों को बदला जा रहा था।
साल 2015 में हुए ट्रायल रन के अनुसार, एक घंटे में 90 किलोग्राम कचरे को जलाया जा सकता है। उस हिसाब से 337 टन कचरे को जलाने में पाँच महीने से अधिक का समय लग सकता है।
मध्य प्रदेश गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के संचालक स्वतंत्र कुमार सिंह ने बताया, ‘देश में औद्योगिक कचरे की आवाजाही और ट्रासंपोर्ट में अब तक के सबसे उच्च सुरक्षा प्रोटोकॉल के साथ यूनियन कार्बाइड का कचरा बुधवार रात पीथमपुर के लिए रवाना हुआ था, जहाँ अगले कुछ महीनों के अंदर इसे जलाया जाएगा।’
ज़हरीले कचरे को हटाने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि इस कचरे के निपटान में भारत सरकार के कई संगठन शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘पिछले 40 सालों से भोपाल के लोग इस कचरे के साथ रह रहे थे। इस ज़हरीले कचरे के निपटान से पर्यावरण पर कोई असर नहीं पड़ा है। पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीक़े से हुई। हमारी कोशिश यह भी है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न हो।’
कचरे के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई
भोपाल निवासी आलोक प्रताप सिंह ने कचरे को हटाने के लिए सबसे पहले अगस्त 2004 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
इसके बाद की सुनवाइयों के दौरान हाई कोर्ट ने साल 2005 में यूनियन कार्बाइड के ज़हरीले कचरे को निपटाने के लिए एक टास्क फ़ोर्स समिति बनाई, जिसे इस प्रक्रिया के सही तरीक़े से किए जाने के लिए सुझाव देना था।
इसी दौरान केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर 345 मीट्रिक टन ख़तरनाक कचरा इक_ा किया।
साल 2006 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 346 मीट्रिक टन ज़हरीले कचरे को अंकलेश्वर (गुजरात) भेजने का आदेश दिया था।
लेकिन उसके कुछ समय बाद गुजरात सरकार ने इस मामले में अपनी असमर्थता व्यक्त की।
साल 2010 से 2015 तक पीथमपुर स्थित एक फ़ैक्ट्री में कचरे को जलाने के लिए सात परीक्षण किए गए थे, जिनमें आखऱिी परीक्षण में पर्यावरण के मानकों को पूरा किया गया था।
इसी दौरान ट्रायल रन के तहत पीथमपुर में लगभग 10 टन कचरे को जलाया भी गया।
साल 2021 में राज्य सरकार ने बचे हुई 337 मीट्रिक टन ज़हरीले कचरे को निपटाने के लिए निविदाएं आमंत्रित की थीं।
जुलाई 2024 में पीथमपुर इंडस्ट्रियल वेस्ट मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड को कचरा ले जाने और इसे निपटाने के लिए अधिकृत किया गया।
इसी बीच साल 2022 में राज्य सरकार ने पीथमपुर में कचरे को नष्ट करने का एलान किया, जिसमें अनुमानित 126 करोड़ रुपए की लागत का बजट केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश सरकार को दिया।
चार दिसंबर 2024 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए चार सप्ताह के भीतर कचरे को भेजने का आदेश दिया था।
इसके बाद क़वायद तेज़ करते हुए सरकार ने कचरे को पीथमपुर पहुँचाने की प्रक्रिया 29 दिसंबर को शुरू की। चार दिन तक चली इकठ्ठा करने की प्रक्रिया में 337 मीट्रिक टन कचरे को बैग्स में भरा गया।
इस दौरान सरकार ने पूरी गोपनीयता बनाए रखी। कचरा ले जाने के लिए गाडिय़ाँ कब निकलेंगी, इस पर सरकार ने चुप्पी साध रखी थी।
मंगलवार 31 जनवरी की रात से कचरे के इन बैग्स को कंटेनर्स में लोड करना शुरू किया गया और बुधवार दोपहर तक पूरा कचरा भरे जाने के बाद रात में ही इसे पुलिस की भारी मौजूदगी में पीथमपुर रवाना किया गया।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, सरकार को तीन जनवरी यानी शुक्रवार को रिपोर्ट पेश करनी है। इस कारण भी कचरा बुधवार रात ही रवाना कर दिया गया था।
ज़हरीले कचरे का
क्या होगा?
लेकिन सवाल ये है कि पीथमपुर पहुँचने के बाद इस कचरे का होगा क्या?
इस मामले पर मध्य प्रदेश गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के संचालक स्वतंत्र कुमार सिंह ने बीबीसी को बताया, ‘मध्य प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों में निकलने वाले रासायनिक और अन्य अपशिष्ट के निष्पादन के लिए धार जि़ले के पीथमपुर में एकमात्र प्लांट है। यहाँ ज़हरीले कचरों को सुरक्षित तरीक़े से जलाया जाता है।’
‘यह प्लांट सेंट्रल पल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) के दिशा निर्देश के मुताबिक़ संचालित होता है। हमने साल 2015 में सीपीसीबी की देखरेख में सभी निर्धारित मानकों के अनुसार, सुरक्षा का ध्यान रखते हुए 10 मीट्रिक टन कचरे को जलाने का ट्रायल रन किया था।’
संचालक स्वतंत्र कुमार सिंह ने बताया कि देश में पीथमपुर जैसे 42 संयंत्र हैं, जिनमें ऐसे रासायनिक कचरों को जलाया जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो भोपाल से पीथमपुर पहुँचे कचरे को सबसे पहले ज़्यादा तापमान वाले इंसीनरेटर (भट्टी) में जलाया जाएगा, इससे निकलने वाले धुएं को नियंत्रित करने के लिए व्यवस्था की गई है, जो यह तय करेगी कि कचरे को जलाने पर निकले धुएँ में मौजूद ख़तरनाक तत्व आबोहवा में न घुल जाएँ।
जलाने के बाद अवशेष की भी कई परतों पर जाँच की जाएगी और जब तक सभी ख़तरनाक रसायन नष्ट नहीं हो जाते तब तक प्रक्रिया दोहराई जाती रहेगी। इसके बाद जो बच जाएगा, उसे ज़मीन में गाड़ दिया जाएगा।
ज़मीन के नीचे गाडऩे के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि ये राख अंदर ही अंदर अन्य जल स्रोतों और अन्य जगहों पर रिस कर न पहुँचे।
लैंडफि़लिंग के लिए ज़मीन में डबल कंपोजिट लाइनर सिस्टम (दो प्लास्टिक लाइनर और दो मिट्टी के लाइनर का मिश्रण) का इस्तेमाल किया जाएगा।
मध्य प्रदेश के पर्यावरणविद और पूर्व केमिस्ट्री प्रोफ़ेसर सुभाष सी पांडेय कहते हैं, ‘मध्य प्रदेश में 150 के आसपास केमिकल फ़ैक्टरी हैं, जहाँ का कचरा पीथमपुर स्थित प्लांट में जलाया जाता है। यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी के कचरे को जलाने के लिए वो उपयुक्त जगह है।’
‘हालांकि कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि इससे समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जो केमिकल यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी के कचरे में हैं, उनसे ज़्यादा घातक और ख़तरनाक केमिकल युक्त कचरे को पीथमपुर में जलाया जा रहा है। इस तरह की बातें लोगों को भ्रमित करेंगीं।’
वे कहते हैं, ‘क्योंकि ये काम सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की देखरेख में हो रहा है, तो इसमें ग़लती या लापरवाही की गुंजाइश बहुत कम है।’
पीथमपुर में कचरा ले जाने के बीच स्थानीय लोगों और अन्य फ़ैक्टरी कर्मचारियों में असमंजस बरकरार है।
एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सरकार को पहले यहाँ के लोगों को इस बारे में दिशा निर्देश देने थे, उसके बाद इस प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए था।
उन्होंने कहा,‘भोपाल में हुई गैस त्रासदी के लिए हमारी संवेदनाएं हैं लेकिन ऐसा कुछ यहाँ न हो इसको लेकर व्यवस्था नहीं की गई। स्थानीय लोगों को कुछ भी नहीं बताया गया। कचरे को निपटाने से अगर कोई समस्या होती है, तो हम लोग कहाँ जाएँगे?’
इसी बीच पीथमपुर बचाओ समिति ज़हरीला कचरा लाने के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन कर रही है और इलाक़े के कई मज़दूर संगठनों ने भी 2-3 जनवरी को पीथमपुर बंद का आह्वान किया है।
बीजेपी नेता का भी विरोध
जहाँ एक तरफ़ स्थानीय लोगों में असमंजस और ऊहापोह बना हुआ है, वहीं इस ज़हरीले कचरे के इर्द गिर्द राजनीति भी तेज़ है।
पीथमपुर से सटे इंदौर के मेयर और बीजेपी नेता पुष्यमित्र भार्गव ने भी पीथमपुर में कचरा न जलाने की बात कही है।
उन्होंने कहा, ‘बीते कुछ दिनों से कचरा निष्पादन की बात की जा रही है। पीथमपुर के लोग विरोध भी कर रहे हैं तो मेरा मानना है कि इसको लेकर पुनर्विचार होना चाहिए ताकि पीथमपुर में ये कचरा न जले।’
‘ये पीथमपुर के साथ इंदौर और प्रदेश के लिए भी सही होगा। क्योंकि इस कचरे को पहले गुजरात में जलाने की बात थी, लेकिन उस पर रोक लगी, फिर इसको जर्मनी भेजने की बात आई उस पर भी रोक लगी।’
उन्होंने इस पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया।
पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि कचरा जलाने के बाद जो इसका पर्यावरण पर जो प्रभाव पड़ेगा, उसकी जाँच के बाद जो भी तथ्य सामने आएँ, उन्हें माननीय न्यायालय के सामने पेश करना चाहिए और उसके बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए।
इस मामले पर सरकार पूरी सुरक्षा व्यवस्था और कचरा जलाने के बाद पर्यावरण से संबंधित किसी दुष्प्रभाव की बात से इनकार कर रही है, लेकिन पीथमपुर और आस पास के इलाक़ों में लोगों के मन में इसको लेकर संशय बना हुआ है। (bbc.com/hindi)
-सैयद मोजिज इमाम
बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर एक बार फिर चर्चा में हैं। वजह पिछले दिनों राज्यसभा में दिया गया गृहमंत्री अमित शाह का एक बयान है।
इसने विपक्ष को गृहमंत्री और उनकी पार्टी पर हमलावर होने का मौक़ा दे दिया है। हालाँकि, अमित शाह का कहना है कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
यही नहीं, उनके बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर कांग्रेस पर पलटवार किया। अमित शाह ने प्रेस वार्ता की।
इससे भी अंदाज़ा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी इस विवाद से कितनी बेचैन है।
आखऱि डॉ. आंबेडकर आज के वक़्त और राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हैं, हमने कुछ विशेषज्ञों के ज़रिए इसे समझने की कोशिश की।
‘डॉ. आंबेडकर मसीहा हैं’
डॉ. आंबेडकर को दलित समाज में एक मसीहा की तरह माना जाता है।
उन्होंने एक समता मूलक समाज की स्थापना का ख़्वाब देखा। वह शोषित वर्गों के अधिकार, आज़ादी और गरिमापूर्ण जि़ंदगी के लिए अलख जगाने वाले माने जाते हैं।
पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफ़ेसर श्याम लाल ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘डॉ। आंबेडकर ने दलित समाज के उत्थान के लिए जैसा काम किया है, ऐसे में अगर वह समाज उन्हें अपना मसीहा या भगवान मानता है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति भी नहीं है।’
‘आज़ादी से पहले या उसके बाद इस समाज के लिए आंबेडकर ने जितना काम किया, उतना किसी और ने नहीं किया है।’
पूर्व आईएएस अधिकारी और कांग्रेस के नेता पीएल पुनिया का कहना है, ‘अगर आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई न लड़ी होती, तो हम लोग आईएएस अधिकारी न बनकर आज भी ग़ुलामी की जि़ंदगी जी रहे होते।’
पुनिया ने कहा, ‘बाबा साहेब की मूल लड़ाई समाज में बराबरी के अधिकार की थी। साथ ही उनका संघर्ष इस बात के लिए भी था कि राजनीतिक शक्ति समाज के आखिऱी व्यक्ति तक कैसे पहुँचे।’
‘दिल्ली के भारती कॉलेज के आंबेडकर स्टडी सर्किल के डॉ। जसपाल सिंह का कहना है, ‘आंबेडकर ने सिफऱ् दलित वर्ग के लिए ही नहीं बल्कि समाज के सभी दबे-कुचले लोगों की बेहतरी के लिए काम किया।’
हालाँकि, इस संदर्भ में दूसरों के साथ उनके राजनीतिक मतभेद भी रहे लेकिन उनका मूल लक्ष्य समाज में बराबरी का ही था।’
आंबेडकर और राजनीति
साल 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर ही भाजपा को घेरने की कोशिश की थी। ऐसा माना जाता है कि इस वजह से भी भाजपा अकेले बहुमत के आँकड़े तक नहीं पहुँच सकी। लिहाज़ा, अमित शाह के बयान पर भाजपा चिंतित दिख रही है।
अमित शाह राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान डॉ। बीआर आंबेडकर की विरासत पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा था, अब ये एक फ़ैशन हो गया है। आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकरज् इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।
गृह मंत्री के भाषण के इसी छोटे से अंश पर विपक्षी दल आपत्ति जता रहे थे।
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला कहते हैं, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर पर राजनीतिक दलों के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप के केंद्र में अनुसूचित जाति के 20-22 प्रतिशत मतदाता हैं।
असली लड़ाई इस वोट बैंक को हासिल करने और उसे बरकऱार रखने की है। वास्तव में लंबे प्रयास के बाद पिछले दिनों भाजपा अनुसूचित जाति के एक बड़े वर्ग को लुभाने में कामयाब हुई थी।
इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शाह के हमलों के बावजूद कांग्रेस इस मुद्दे पर पीछे हटते दिखना नहीं चाहती।
कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, बाबा साहेब आंबेडकर जी ने हमें हमारा संविधान दिया। हर नागरिक को अधिकार दिया है।
भाजपा ने जिस तरह से उनका अपमान किया, उससे पूरे देश की जनता आहत है। बाबा साहेब का इस तरह से अपमान देश नहीं सहेगा।
कांग्रेस के साथ ही बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) भी भाजपा के खिलाफ सडक़ों पर उतर आई।
अभी तक ज़्यादातर मुद्दों पर ख़ामोश रहने वाले बीएसपी के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार 24 दिसंबर को हर जि़ला मुख्यालय पर प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भी दिया।
हालाँकि, बीएसपी की अध्यक्ष मायावती ने 'एक्स' पर लिखा कि धरना-प्रदर्शन इसका हल नहीं है।
उन्होंने कहा, बाबा साहेब विरोधी टिप्पणी वापस नहीं लेने व पश्चाताप नहीं करने पर बीएसपी के आह्वान पर आयोजित ऐसे प्रदर्शन आदि समस्या का स्थाई हल नहीं हैं।
इसके लिए बहुजनों को सत्ता की मास्टर चाबी प्राप्त करके, शासक वर्ग बनकर ही अपना उद्धार स्वयं करने योग्य बनना होगा। तभी मुक्ति व सम्मान संभव होगा।"
भीमराव आंबेडकर की विरासत के साथ कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति को मज़बूत किया था। उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर दलितों की अनदेखी संभव नहीं है।
आंबेडकर ने दलित समाज में सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही चेतना जगाई है। अब यह एक बड़ा धड़ा है। राजनीतिक रूप से काफ़ी मज़बूत भी है।
इसके साथ आ जाने पर सत्ता के शीर्ष तक पहुँचा जा सकता है।
प्रोफेसर श्याम लाल का बयान।
दलित समाज में आंबेडकर का क्या स्थान है, भाजपा को भी ये बात बख़ूबी पता है।
इसलिए इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे तो आए लेकिन उन्होंने बीएसपी के खिलाफ कुछ नहीं कहा।
मंगलवार 24 दिसंबर को एक प्रेस कांफ्रेंस में योगी आदित्यनाथ ने कहा, गृहमंत्री अमित शाह के आधे-अधूरे बयान को पेश कर राजनीति की जा रही है।
कांग्रेस और सपा ने गफ़लत पैदा करने का प्रयास किया है। सपा सरकार के समय सुपर सीएम ने बाबा साहेब पर क्या कहा था, यह किसी से छिपा नहीं है।
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला के मुताबिक, साल 2024 के लोकसभा के चुनावों के दौरान इंडिया गठबंधन ने दलित समाज के एक धड़े को अपने पक्ष में कर लिया था।
विपक्ष ने भाजपा के कई नेताओं के बयानों के आधार पर जनता को यह बताया कि अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो आरक्षण समाप्त कर देगी। संविधान बदल देगी।
यही नहीं, गृह मंत्री अमित शाह के अप्रैल 2024 के एक बयान को काट-छाँट कर आरक्षण समाप्त करने की झूठी बात फैलाई गई। लोकसभा चुनाव में वह काम भी कर गई।
हालाँकि, शुक्ला नहीं मानते कि यह रणनीति दोबारा काम करेगी। उनका तर्क है, ऐसा इसलिए कि एक तो चुनाव अभी दूर है। दूसरा, एक ही मसले को राजनीतिक दल कितनी बार उपयोग में ला सकते हैं।
आंबेडकर कैसे बने दलितों के मसीहा
मीडिया स्टडीज़ ग्रुप ने समाजवादी चिंतक मधु लिमये की एक किताब छापी है- डॉ। आंबेडकर: एक चिंतन।
इसमें उनके हवाले से लिखा गया है जीवन के कटु अनुभवों से आंबेडकर ने सीखा था कि दलितों की स्थिति में सुधार समतामूलक समाज की स्थापना में एक व्यापक आंदोलन का हिस्सा है।
इस वजह से ही आंबेडकर ने सामाजिक परिवर्तन की लडाई लड़ी। इसमें उनके अन्य लोगों से वैचारिक मतभेद भी रहे। यहाँ तक कि आंबेडकर ने सामाजिक चेतना जगाने के लिए हिंदू धर्म को भी त्याग दिया था।
मधु लिमये के मुताबिक, आंबेडकर को अर्थशास्त्र पढऩे के लिए विदेश भेजा गया था लेकिन उनकी सबसे ज्यादा रुचि जाति समस्या को लेकर ही थी।
जाति व्यवस्था के उद्गम स्थल की खोज और उसको नष्ट करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया था।
वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडिय़ा का कहना है, आंबेडकर अपने इस विचार की वजह से दोनों धड़ों के निशाने पर रहे हैं।
भाजपा और कांग्रेस ने आंबेडकर की विचारधारा का समर्थन राजनीतिक कारणों से ही किया है लेकिन इसका समायोजन नहीं किया।
आंबेडकर जाति व्यवस्था के खि़लाफ़ लड़ रहे थे। इसके खिलाफ उनकी विचारधारा की लड़ाई अब भी जारी है।
हालाँकि, अनिल चमडिय़ा का कहना है, आंबेडकर को कांग्रेस भी नापसंद करती रही है। भाजपा और कांग्रेस द्वारा एक-दूसरे को आंबेडकर का विरोधी बताना, हिन्दुत्ववाद के बीच में डॉ। आंबेडकर को फँसाए रखने का प्रयास है।
डॉ. आंबेडकर ने हिन्दुत्ववादी यानी मनुवादी विचारधारा को किसी भी स्तर पर स्वीकार करने वाली राजनीतिक पार्टियों की आलोचना की है। उन्हें समाज में समानता विरोधी बताया है।
दूसरी ओर, प्रोफ़ेसर श्याम लाल का मानना है, सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं, आंबेडकर ने महिला, पुरुष, अल्पसंख्यक के लिए भी काम किया है।
एक राष्ट्र को कैसे सबको एक साथ लेकर चलना चाहिए, यह सोच आंबेडकर ने ही दी है।
एक राष्ट्र तभी अग्रसर हो सकता है, जब समाज में सबको बराबरी को दर्जा प्राप्त हो। समाज में किस तरह से सबको शामिल करना है, यह आंबेडकर ने बताया है।
हालाँकि, प्रोफेसर श्याम लाल के मुताबिक, कोई भी महापुरुष होता है तो उसको उस समाज से जोड़ दिया जाता है, जिसमें वह पैदा होता है। ये एक त्रासदी है।
आंबेडकर ने सिफऱ् दलितों के लिए ही काम नहीं किया, बल्कि उच्च वर्ग से लेकर निम्न वर्ग तक के लिए काम किया।
जाति-विहीन व्यवस्था, स्वराज से अधिक ज़रूरी
आंबेडकर का मानना था कि स्वराज से पहले हिंदू समाज में जाति-विहीन व्यवस्था क़ायम करना ज़रूरी है।
एक जगह उन्होंने लिखा था, ऐसे स्वराज का कोई फ़ायदा नहीं है जिसकी आप रक्षा न कर सकें। मेरे विचार में हिंदू समाज जब जाति-विहीन हो जाएगा, तभी उसमें अपने-आप की रक्षा करने की ताक़त आएगी।
पूर्व आईएएस अधिकारी पीएल पुनिया कहते हैं, आंबेडकर ने अंग्रेज़ों से कहा कि वे यहाँ से जाएँ, लेकिन इस जाति व्यवस्था को ख़त्म करके ही जाएँ।
उस समय हिंदू महासभा जैसे संगठन भी हिंदू समाज को ताक़तवर बनाने की बात कर रहे थे।
हिंदुओं की संख्या बढ़ाने और मुसलमानों की तादाद कम करने का उनका एक फ़ॉर्मूला था। उन लोगों का शुद्धिकरण हो जिनके पूर्वजों ने किन्हीं कारणों से इस्लाम धर्म अपना लिया था।
आंबेडकर ने तेलुगू समाचार के एक अंक में लिखा था, अगर हिंदू समाज बचा रहना चाहता है तो उसे अपनी संख्या बढ़ाने के बजाय अपनी एकजुटता बढ़ाने पर ज़ोर देना चाहिए।
इसका सीधा मतलब है, जाति का उन्मूलन। अगर हिंदू समाज को जाति का उन्मूलन कर संगठित कर दिया जाए तो शुद्धि की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
आंबेडकर और सावरकर
बाबा साहब आंबेडकर ने बहुत पहले ही कह दिया था, हम समाज में बराबरी का अधिकार चाहते हैं और हम जहाँ तक संभव है, हिंदू समाज में ही रहकर ये अधिकार लेना चाहते हैं।
अगर ज़रूरी हुआ तो हम हिंदुत्व से पिंड छुड़ाने से नहीं हिचकेंगे। अगर हम हिंदुत्व को छोड़ते हैं तो मंदिर जाने में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं रहेगी।
हिंदू धर्म से जुड़े मुद्दों पर आंबेडकर और सावरकर की राय अलग-अलग थी।
जब आंबेडकर ने ये कहा था कि हिंदू धर्म छोडऩे में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होगी, तब उन्होंने ये साफ़ नहीं किया था कि वह बौद्ध धर्म अपनाने के बारे में सोच रहे हैं।
इस विषय में सावरकर ने 'निर्भिद' के तीन नवंबर 1935 के अंक में एक विस्तृत लेख लिखा था।
सावरकर ने आंबेडकर के हिंदू धर्म छोडऩे की इच्छा पर सवाल उठाते हुए लिखा था, हिंदू धर्म में भी हर संगठित धर्म की तरह तर्कहीनता के कुछ तत्व हैं। लेकिन दूसरे धर्मों में भी इस तरह की तर्कहीनता पाई जाती है। (bbc.com/hindi)
-सिद्धार्थ ताबिश
भारत में हर रोज सबसे ज्यादा मौतें सडक़ दुर्घटना से होती है.. यहां लगभग हर तीसरे मिनिट में रोड पर एक जान जाती है.. भारत दुनिया का सबसे अधिक रोड दुर्घटना वाला देश है।
मगर भारतीय रोड से आते हुए जंगल क्रॉस करने में डरते हैं, कुत्ते से डरते हैं, बाघ से डरते हैं, तेंदुए का सोच के ही इनकी जान सूख जाती है, श्मशान से डरते हैं, रात से डरते हैं.. क्योंकि ये फ्लैट में बैठे रहते हैं और इन्हें इनकी सरकार, समाज कभी ये याद नहीं दिलाते हैं कि ‘रोड’ पर चलना इनके लिए सबसे अधिक खतरनाक काम है।
एक लकड़बग्घा अगर किसी का शिकार कर दे तो यही फ्लैट में बैठे मूर्छित लोग जो मीडिया चलते हैं, हेडलाइन छापते हैं कि ‘आदमखोर’ भेडि़ए ने जान ली.. मगर यही लोग कभी किसी भी ब्रांड की किसी कार को ‘आदमख़ोर’ कहते आपको नहीं दिखेंगे.. दरअसल कारों को आदमख़ोर बोलना चाहिए हमें क्योंकि ये हर तीसरे मिनिट में एक ‘आदमी’ की जान लेती हैं.. सरकारें भी कभी कार को आदमख़ोर नहीं घोषित करती हैं क्योंकि कार इन्हें मोटा टैक्स देती हैं।
हमारी जीवन में जितनी भी धारणाएं और डर हैं वो सब समाज और बाज़ार जनित होते हैं.. मीडिया और बाज़ार जो दिखाता है वही हमारे मन मस्तिष्क पर हावी रहता है.. इंश्योरेंस कंपनियां जो डराती है वो कोई डर नहीं है, मेडिकल कंपनियां जो डराती हैं वो कोई वास्तविक डर नहीं होता है.. जितने भी आसपास आपको अपना इंश्योरेंस, प्रोडक्ट इत्यादि बेचने बैठे हैं, इनके यहां बड़े बड़े मनोवैज्ञानिक ‘डर’ क्रिएट करने के पैसे लेते हैं और आपको उसी हिसाब से डराया जाता है।
नेता और सरकार आपको आपके अस्तित्व, धर्म, समाज और आबादी को लेकर डराते हैं.. मगर एक भी नेता आपको कभी ये कहता नहीं मिलता है कि ‘जितने तुम आतंकवाद और धार्मिक वैमनस्यता में मरते हो उसका 200 गुना तुम रोज़ रोड पर मारे जाते हो.. और रोड पर चलना बंद कर दो वरना तुम्हारा अस्तित्व खतरे में आ जायेगा.. जिस धर्म की जितनी बड़ी भीड़ होगी वो उतना ही रोड दुर्घटना में मारा जाएगा’.. कभी सुना है किसी नेता, विचारक, मोटिवेशनल स्पीकर, धार्मिक व्यक्ति के मुंह से ऐसी बातें?
2024 को अब तक के सबसे गर्म साल के रूप में याद किया जाएगा। इस साल रिकॉर्ड गर्मी और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनियाभर में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता में वृद्धि हुई। भारत भी इन आपदाओं से अछूता नहीं रहा।
(dw.comhi)
2024 भारत के लिए 123 सालों में सबसे गर्म साल रहा। भारतीय मौसम विभाग के निदेशक मृत्युंजय महापात्र ने बताया कि 1901 के बाद यह देश का सबसे गर्म साल था। उन्होंने कहा, ‘भारत में 2024 का भूमि सतह का औसत वार्षिक तापमान 1991-2020 की अवधि के औसत से 0.65 डिग्री सेल्सियस अधिक था।’
पिछले साल भारत ने अब तक की सबसे लंबी ताप लहर का सामना किया, जहां तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया। मई में दिल्ली में तापमान 49.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो 2022 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड के बराबर था।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है, लेकिन उसने 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। फिलहाल, देश ऊर्जा उत्पादन के लिए मुख्य रूप से कोयले पर निर्भर है।
दुनियाभर में प्रभाव
यह साल दुनिया के लिए भी सबसे गर्म रहा। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि 2024 अब तक का सबसे गर्म साल साबित हुआ, जो एक दशक तक लगातार बढ़ती गर्मी का चरम था। वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के विशेषज्ञों का कहना है कि 2024 में हुई लगभग सभी प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता में जलवायु परिवर्तन की भूमिका थी। जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिके ओटो ने कहा, ‘2024 में जीवाश्म ईंधनों से होने वाली तापमान वृद्धि के प्रभाव पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट और विनाशकारी थे। हम एक खतरनाक नए युग में जी रहे हैं।’
जून में सऊदी अरब में हज यात्रा के दौरान तापमान 51.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिससे 1,300 से अधिक लोगों की जान चली गई। थाईलैंड, भारत और अमेरिका में भी गर्मी से दर्जनों लोगों की मौत हुई। मेक्सिको में हालात इतने गंभीर थे कि बंदर पेड़ों से गिरकर मरने लगे।
अप्रैल में संयुक्त अरब अमीरात में एक दिन में दो साल की बारिश हुई, जिससे दुबई का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बंद हो गया। पश्चिम और मध्य अफ्रीका में ऐतिहासिक बाढ़ से 1,500 से अधिक लोगों की मौत हुई और करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए। यूरोप, खासकर स्पेन, में भी भारी बारिश और बाढ़ के कारण सैकड़ों लोगों की जान गई।
अमेरिका और कैरिबियन में कई बड़े तूफानों ने तबाही मचाई, जिनमें मिल्टन, बेरील और हेलीन शामिल हैं। फिलीपींस में नवंबर में छह बड़े तूफान आए, जिनमें से एक तूफान यागी ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारी तबाही मचाई। दिसंबर में चक्रवात ‘चीनो’ ने मायोट द्वीप को बुरी तरह प्रभावित किया।
अमेरिका, कनाडा और अमेजन बेसिन में भीषण सूखे और जंगल की आग से लाखों हेक्टेयर भूमि जलकर खाक हो गई। दक्षिण अमेरिका में जनवरी से सितंबर तक जंगल की आग की 400,000 से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं। दक्षिणी अफ्रीका में लंबे सूखे के कारण 2.6 करोड़ लोग भूखमरी के कगार पर पहुंच गए।
स्विस री इंश्योरेंस कंपनी ने 2024 में वैश्विक आर्थिक नुकसान का अनुमान 310 अरब डॉलर लगाया। ब्राजील में सूखे के कारण कृषि क्षेत्र को जून से अगस्त के बीच 2.7 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक स्तर पर वाइन उत्पादन 1961 के बाद सबसे कम रहा।
भारत के लिए चुनौतियां
जलवायु परिवर्तन ने न केवल भारत के तापमान को बढ़ाया है, बल्कि बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति भी बढ़ाई है। इससे कृषि उत्पादन और जनजीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।
2024 में भारत ने सबसे लंबी ताप लहर, भीषण बाढ़ और सूखे का सामना किया, जिससे हजारों लोगों की जान गई और अरबों का आर्थिक नुकसान हुआ।
विशेषज्ञों के मुताबिक गर्मी और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को देखते हुए भारत को अपने ऊर्जा स्रोतों को फिर से जांचने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने की जरूरत है। भारत को 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। कई विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पर्यावरणीय खतरों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर त्वरित और ठोस कदम उठाना जरूरी हो गया है। 2024 ने यह चेतावनी दी है कि यदि तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।
वीके/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)
1 जनवरी के अवसर पर
-रमेश अनुपम
विनोद कुमार शुक्ल इस 1 जनवरी 2025 को अपने सुदीर्घ जीवन के 88वां वर्ष पूर्ण कर 89वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं इस अर्थ में वे हिंदी के सबसे सम्माननीय बुजुर्ग कवि-लेखक हैं।
विनोद कुमार शुक्ल आज भी जिस तरह से लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहते हैं, वह काफी कुछ विस्मित करने वाला है। उनके लेखन का क्षेत्र भी इधर विविध और विपुल होता जा रहा है, जिसमें बहुत सारा लेखन बच्चों और किशोरों के लिए भी है।
विनोद कुमार शुक्ल के लगभग दो काव्य संग्रह के लायक कविताएं और कहानियां अभी अप्रकाशित हैं। विनोद कुमार शुक्ल जिस तरह से प्रचुर मात्रा में लिख रहे हैं उससे लगता है कुछ ही दिनों में इसकी संख्या में काफी इजाफा भी संभव है।
विनोद कुमार शुक्ल के पाठकों की संख्या काफी बड़ी है। हिंदी से बाहर भी उन्हें पढ़ने और प्यार करने वाले उनके असंख्य पाठक वर्ग है। इसलिए उनके काव्य संग्रह और कहानी संग्रह की सबको आतुरता के साथ प्रतीक्षा है।
'मैं दुनिया के सारे सन्नाटे को सुनता हूं। रात में जब नींद नहीं आती है तो मैं मुक्तिबोध की तस्वीर के निकट जाकर बैठ जाता हूं और इस तरह मुक्तिबोध को अपने निकट पाता हूं।’ कहने वाले विनोद कुमार शुक्ल अपने जीवन और लेखन में मुक्तिबोध के सान्निध्य में बिताए हुए दिनों को याद कर इन दिनों बेहद भावुक हो उठते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल को गढ़ने में जिन पांच विराट चरित्रों की सर्वाधिक उल्लेखनीय भूमिका रही है उनमें उनकी मां श्रीमती रुक्मिणी देवी, चाचा किशोरी लाल शुक्ल जिन्होंने पिता की असमय मृत्यु के पश्चात पूरे परिवार को आश्रय दिया, विनोद जी की धर्मपत्नी श्रीमती सुधा शुक्ल, हरिशंकर परसाई तथा मुक्तिबोध प्रमुख हैं।
जबलपुर में कृषि महाविद्यालय में अध्ययन के दरम्यान विनोद कुमार शुक्ल को हरिशंकर परसाई का सान्निध्य मिला। विनोद कुमार शुक्ल अक्सर परसाई जी के नेपियर टाउन स्थित घर जाया करते थे।
राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में मुक्तिबोध की नियुक्ति के पश्चात अपने बड़े भाई संतोष शुक्ल जो मुक्तिबोध के छात्र थे, उनके साथ मुक्तिबोध के बसंतपुर निवास में जाकर पहले पहल मिलना विनोद जी को आज भी रोमांचित करता है कि किस तरह शाम की गहरे धुंधलके में मुक्तिबोध अपने हाथों में कंदील लेकर बाहर निकले थे , जिसकी रोशनी पहले आई थी, रोशनी के पीछे-पीछे मुक्तिबोध आए थे किसी कविता की अपूर्व बिम्ब की तरह।
साहित्य और अपने लेखन को लेकर विनोद कुमार शुक्ल का यह कथन दुनिया के किसी भी बड़े कवि या लेखक के कथन की तरह है, अभी हाल ही में रायपुर के शैलेंद्र नगर स्थित अपने घर में उन्होंने कहा था कि ’आप जो लिख रहे हैं, वह अपने लिए नहीं लिख रहे हैं। आप जो भी लिख रहे हैं वह सब ओर बिखर जायेगा और बिखर कर सब तक पहुंच जाएगा। मेरा लिखा हुआ अगर बिखर कर सब तक नहीं पहुंचा तो मेरा लिखा हुआ एक पेड़ की तरह हो जायेगा जिससे लोग मेरी छाया में सुस्ता सकें।’
अभी हाल ही में दिसंबर के माहांत में विनोद जी के पास इजरायल से एक मेल आया है जिसमें मरीना रिम्शा ने उनकी तीन कविताओं ’हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था’, ’जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे’ और ’जीने की आदत’ के हिबू्र और अंग्रेजी में अनुवाद करने की इजाजत मांगी है।
मरीना रिम्शा ने विनोद कुमार शुक्ल को भेजे गए अपने मेल में लिखा है कि उनकी इन कविताओं के हिबू्र भाषा में अनुवाद से इजरायल और फिलिस्तीन युद्ध में आहत नागरिकों को राहत मिलेगी।
विनोद कुमार शुक्ल का एक काव्य संग्रह अंग्रेजी में भी आ गया है। अमेरिका में अरविंद कृष्ण मल्होत्रा इस कार्य को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से सम्पन्न किया है । अंग्रेजी में अनुदित विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं की अनुवाद की यह किताब 2024 में अमेरिका से प्रकाशित हो गई है ।
विनोद कुमार शुक्ल ने बीते दस पंद्रह वर्षों में बच्चों और किशोरों के लिए ढेर सारा साहित्य लिखा है जो अब तक के प्रचलित और लोकप्रिय बाल साहित्य के खांचे में कहीं फिट नहीं बैठता है। यह हिन्दी का वैसा बाल साहित्य भी नहीं है जो सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत है।
अब उनकी एक अलक्षित कविता की बात भी इस नए वर्ष के प्रथम दिन जो विनोद कुमार शुक्ल का भी जन्मदिन है उस पर भी थोड़ी चर्चा हो जाए।
‘नजर लागी राजा’ विनोद कुमार शुक्ल की एक अलक्षित कविता है जिस पर किसी काव्य पारखी, गुणगाहक या समीक्षक की दृष्टि अब तक नहीं गई है। इस कविता से विनोद कुमार शुक्ल का नाम हटा दिया जाए तो पहचान करनी मुश्किल होगी कि यह विनोद कुमार शुक्ल की कोई कविता है। उनकी यह कविता अपनी अंतर्वस्तु, रूप और भाषा सबमें अलग और अनूठी है।
हिंदी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना यह मानते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता काव्य की दृष्टि से एक विलक्षण कविता है। वे यह भी मानते हैं कि 'नजर लागी राजा’ जैसी कविता समकालीन हिंदी कविता में अन्यत्र नहीं है। यह समकालीन हिंदी कविता की उपलब्धि है।
इस कविता का जिक्र करने पर स्वयं विनोद कुमार शुक्ल कुछ कम चकित नहीं होते हैं। उन्हें दुख है कि इस सुंदर कविता पर अब तक किसी की भी दृष्टि नहीं गई है।
विनोद कुमार शुक्ल की यह कविता उनके छठवें और अब तक अंतिम काव्य संग्रह 'कभी के बाद अभी’ (प्रकाशन वर्ष सन 2012) में संग्रहित है।
बहरहाल विनोद कुमार शुक्ल की कविता 'नजर लागी राजा’ उनके 88 वें जन्मदिवस 1 जनवरी 2025 के अवसर पर प्रस्तुत है:
नजर लागी राजा
नजर लागी राजा काले चश्में में
अब तू यह चश्मा उतार दे
मैं बहुत सांवली हूं
काले चश्मे से मैं नहीं दिखूंगी।
राजा! चश्मा उतार दे
और नजर मिला ले
अपने सांवलेपन में मैं अच्छी दिखूं
इसलिए मैं तेज धूप में खड़ी हूं।
काले चश्मे की बदली ने तुम्हारी
आंखों को
और मुझे और सांवला ढांक दिया है
काला चश्मा उतार कर मुझे पूरा उघार दे
और मुझे नजर लगा दे।
सचमुच तू यह चश्मा उतार दे
मैं बहुत सांवली
अंधेरी रात में तुमसे मिलना चाहती हूं
तेरे काले चश्मे से पूर्णिमा का गोरा चन्द्रमा भी
नहीं दिखता होगा
धूप का चश्मा लगाने वाले
चश्मा उतार दे
रात में कहीं धूप होती है?
मुझे और धूप को देखे हुए तुम्हें बहुत
दिन हो गये
मैं बहुत सांवली हूं
काला चश्मा उतार कर केवल मुझे देखोगे
तो लगेगा तुमने काला चश्मा नहीं उतारा।
राजा! प्रेम का संसार बुझ गया
मेरी छाती चकमक पत्थर की तरह कठोर और गोल हैं
तुम्हारे हाथ भी चकमक पत्थर की तरह कठोर हैं
हाथों के आघात से जो चिनगारी पैदा होगी
उसी की यह बुझता संसार प्रतीक्षा कर रहा है
कि जल उठे
और प्रेम की अग्नि को पा सके
परन्तु राजा! मैंने तुम्हारे ह्रदय को पत्थर नहीं कहा।
राजा! तुम्हारा काला चश्मा मैं क्यों चुराऊंगी
क्या तुम इसे पहने सो रहे?
कई रातों की जागी
तुममें जो मेरा मन बसा है
तुम तक मुझे बुलाता है
चलते-चलते तुम्हारी दूरी से थकी
एक दिन तुम्हारे बिछौने पर
तुम्हारे साथ सो जाऊंगी
तुम चश्मा पहने सो रहे होगे
और मैं तुमको चश्मा सहित चुरा लूंगी।
राजा! तेरे काले चश्मे में मेरी नजर लगी
अपनी अनदेखी देह का क्या करूं
मैं कैसे उजागर होऊं
कि केवल तुम मुझे देख सको
या तो चश्मा उतार कर फेंक दो
धूप में खड़ी मैं कोयला
तुम्हारी देह की हवा को छू लेने से
चिनगारी परच
अंगार होकर दहक गई हूं
देखो सूर्य बुझ गया है
और मैं सुलग रही हूं।
चश्मा मत उतारो।
जो गरमी है वह मेरा ताप है
तुम अब चश्मा मत उतारना
मेरे ताप में बहुत तेज धूप
जैसे तुम्हारी धूप में
मेरी धूप निकली है।
राजा! काले चश्मे में मेरी नजर लगी है
पर तुम्हारी धूप और ताप को मैं नहीं सह पाऊंगी
तुम काला चश्मा मुझे दे दो
मैं शृंगार करूंगी
हंसुली, पैरी, मुंदरी, पहनूंगी
स्नो-पाउडर लगाऊंगी
कीमती गहने की तरह काला चश्मा पहनकर
तुमको रिझा लूंगी।
तुम मेरे लिए मड़ई-मेले से
एक काला चश्मा खरीद देना
हम दोनों काला चश्मा लगाये मेला घूमेंगे
फोटो खिंचवायेंगे
परदे के हवाई जहाज के साथ
जिसमें दोनों काला चश्मा लगाये
सूरज तक उड़ेंगे।
-ग्राहम फ्रेजर
यह बात साल 1995 की है। उस साल बीबीसी के कार्यक्रम ‘टुमॉरोज वल्र्ड’ से जुड़े लोगों ने फ़ैसला किया कि वो 2025 में दुनिया कैसी होगी, इसकी भविष्यवाणी करेंगे।
इस शो में मशहूर वैज्ञानिक स्टीफऩ हॉकिंग भी थे। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि ‘2025 तक हम कई बड़े बदलावों की उम्मीद कर सकते हैं।’
इस कार्यक्रम की टीम ने भी भविष्य में दुनिया को हिला कर रख देने वाले आविष्कारों की संभावनाओं को लेकर उम्मीद जताई थी। इनमें होलोग्राम सर्जरी से लेकर अंतरिक्ष में फैले कबाड़ को सोख लेने वाले जेल जैसी चीजें बनाने की संभावना जाहिर की गई थी।
आइए देखते हैं कि 30 साल पहले लगाए गए अनुमान कितने सही साबित हुए हैं। इस आकलन के लिए हमने कुछ विशेषज्ञों की भी मदद ली है।
2005 के ‘साइबर स्पेस झगड़े’
1995 में, दुनिया भर में वर्ल्ड वाइड वेब का दायरा बढ़ रहा था। यह एक ऐसा विकास था, जिसे लेकर ‘टुमॉरोज वल्र्ड’ का मानना था कि ये भविष्य में परेशानी बढ़ाएगा।
उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि बिजनेस की दुनिया के दिग्गज और बैंक साल 2000 तक इंटरनेट पर नियंत्रण हासिल कर लेंगे। वो ‘सुपरनेट’ बना सकते हैं, जिस तक पहुंच को वो सीमित कर सकते हैं।
इससे हैकिंग, वायरस और यहां तक कि झगड़े को बढ़ावा मिलेगा।
हुआ क्या? - इंटरनेट आज भी ज़्यादातर खुला ही है। किसी तरह की कोई अराजकता भी देखने को नहीं मिली है । लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि हैकर्स के कारनामों ने लोगों की मुश्किलें बढ़ाई हैं
एक भविष्यवाणी जो इस कार्यक्रम में नहीं की गई थी, वो थी उत्तर कोरिया जैसे देश में ‘स्टेट हैकर्स’ की भूमिका की।
साइबर सुरक्षा सरकारों और कंपनियों के लिए बेहद अहम है। जिन लोगों को बैंकों पर संदेह है उन्होंने बिटक्वाइन जैसी क्रिप्टोकरंसी का समर्थन किया है।
अंतरिक्ष में मलबा और खनन की संभावना
इस कार्यक्रम में यह अनुमान भी लगाया गया था कि स्पेस माइनिंग एक आकर्षक उद्योग बन कर उभरेगा। कंपनियां पृथ्वी के नजदीक छोटे ग्रहों में बेशकीमती धातुओं के लिए खनन करवा सकती हैं। इस शो में यह कहा गया था कि अंतरिक्ष पर बढ़ता मलबा भी एक समस्या बन जाएगा। ये अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इन मलबों को विशालकाय फोम जेल के जरिये कम किया जा सकता है।
इस मलबे को रोकने के विकल्प के तौर पर एक विशाल फ़ोम जेल के बारे में बताया गया था।
हुआ क्या?- हालांकि ऐसी सुपर फोम जेल तो नहीं बन पाई है लेकिनअंतरिक्ष में मलबे की समस्या गंभीर बनी हुई है।
फिलहाल अंतरिक्ष में खनन उद्योग तो अस्तित्व में नहीं आया है लेकिन भविष्य में तस्वीर बदल सकती है।
भविष्यवादी टॉम चीजऱाइट इस बात को लेकर उम्मीद भरे हैं कि हमारी धरती से बाहर खनन हो सकता है।
उन्होंने कहा, ‘हमारे पास इससे पैसा कमाने की अथाह संभावना है। टेक्नोलॉजी पूरी तरह से हमारे काबू में है।’
सुपर सर्जन और उनके रोबोट
‘टुमॉरोज वल्र्ड’ ने कहा था कि 2004 तक ब्रिटेन के सभी अस्पतालों के लिए एक कानून पारित होगा, जिसके मुताबिक़ सर्जनों की सफलता दर पर एक तालिका प्रकाशित करना जरूरी होगा।
इसमें कहा गया था कि तब टॉप सर्जन बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो जाएंगे और उनके पास काफी पैसा होगा। इसके बाद उनके लिए मरीजों के पास जाने का कोई तुक नहीं होगा।
इसके बजाय उनके पास मरीजों की होलोग्राम इमेज भेजी जाएगी और सर्जन ‘विशेष दस्तानों’ का उपयोग करके उनका ऑपरेशन करेंगे। मरीजों के सामने बैठे रोबोट दूर बैठे डॉक्टरों के सर्जन के निर्देश पर ऑपरेशन करेंगे।
हुआ क्या?- बिल्कुल ऐसा तो नहीं हो पाया है लेकिन रोबोट अब सर्जरी के दौरान सर्जन की मदद तो कर ही रहे हैं।
फ्लोटिंग हेड वाला एक स्मार्ट स्पीकर
इस कार्यक्रम में भविष्य के एक व्यक्ति को दिखाया है जो वीआर हेडसेट पहने था। इसमें उसकी युवा पत्नी को भी दिखाया गया था और जगह आज के लंदन जैसी दिख रही थी।
इसके एक हिस्से में, विज़ुअल इफेक्ट की सहायता से दिखाया गया कि एक महिला का तैरता हुआ सिर ‘स्मार्ट स्पीकर’ से बाहर आता है और आदमी को बताता है कि ‘इंडो डिज़्नी’ में बिताई गई उसकी छुट्टियों को एक साल हो गया है।
फिर वो महिला उस शख़्स को शटल के जरिये बेंगलुरू पहुंच कर छुट्टी बिताने के लिए कहती है और कहती है कि वहां पहुँचने में केवल 40 मिनट लगेंगे।
हुआ क्या?- अल्ट्रा-फास्ट यात्रा हमेशा की तरह बहुत दूर की बात बनी हुई है। मगर, होलोग्राम, स्मार्ट स्पीकर्स और वीआर हेडसेट जैसी चीजें अब तेज़ी से प्रचलित हो रही हैं।
बाँह में माइक्रोचिप के ज़रिए बैंकिंग का इस्तेमाल
कार्यक्रम में भविष्य में बैंकिंग कैसी होगी, इसे लेकर भी बताया गया था।
इसमें दिखाया गया कि एक महिला बैंक जाती हैऔर शिकायत करती है कि वहां कोई नहीं है। और उसके बाद वह 100 ‘यूरो माक्र्स’ निकालती है। बैंक उसकी बाँह में लगी चिप को स्कैन करके उसे पैसे दे देता है।
हुआ क्या?- वैसे बैंकिंग अब और भी ज़्यादा ऑटोमेटेड हो चुकी है। और मानव शरीर के अंदर माइक्रोचिप के माध्यम से भुगतान करना एक वास्तविकता है लेकिन बैंकिंग में आजकल मुख्य रूप से फिंगरप्रिंट और फेस स्कैनिंग का इस्तेमाल अधिक हो रहा है।
कार्यक्रम के एंकरों की यादें
30 साल पहले टुमॉरोज़ वल्र्ड प्रोग्राम के प्रस्तुतकर्ताओं में से एक थे मॉन्टी डॉन।
उन्होंने शो में अपने हिस्से में जेनेटिक इंजीनियरिंग और बहुआयामी कृषि सुविधाओं के आधार पर ब्रिटिश वुडलैंड्स के दोबारा पनपने को लेकर भविष्यवाणी की थी, जिसके कारण वहां ब्राउन बियर समेत अन्य प्राणियों की भी वापसी हो सकती है।
अब इस बारे में बात करते हुए उन्होंने बीबीसी न्यूज़ को बताया कि कार्यक्रम में उनका हिस्सा ‘कल्पना से भरपूर’ था। इन कल्पनाओं में एक भोलापन भी था।
अगले तीस वर्षों की कल्पना करते हुए वो वर्तमान युवा पीढ़ी को लेकर बहुत खुश हैं। उनका मानना है कि ‘युवा पीढ़ी जलवायु परिवर्तन को लेकर संवेदनशील’ है।
और वह यह भी मानते हैं कि 2055 तक लोग अपने खाने की अधिकतर चीजों की खुद खेती करेंगे।
उन्होंने आगे कहा, ‘टुमारोज वल्र्ड कार्यक्रम इस बात पर केंद्रित था कि मानव जाति किस तरह दुनिया को बदल सकती है और इसे बेहतर बना सकती है। लेकिन हमने पाया है कि हमारी आदत चीजों को बदतर बनाने की है। खासकर पर्यावरण के मामले में। हमें प्रकृति को बदलने और नियंत्रित करने के बजाय उसके साथ काम करना होगा।’
एक और प्रस्तुतकर्ता थीं विविएन पैरी, जिन्होंने शो में दवाओं को लेकर एक हिस्सा प्रस्तुत किया था।
उनको इसका फिल्मांकन भी अच्छे से याद है। उन्होंने बताया, ‘मुझे एक दम स्थिर रहना था। मेरे पास चश्मों का एक सेट था। उसमें एक छोटा सा कैमरा लगा था। उसे काले चिपचिपे पदार्थ की एक बड़ी बूंद के माध्यम से मेरे चेहरे पर चिपकाया गया था।’
उन्होंने कहा, ‘गर्मी बहुत थी इसलिए काला पदार्थ मेरे चेहरे से टपकने लगा था। लेकिन मैं हिल नहीं सकती थी। फिर मेकअप वाले ने इसे हटाने की कोशिश की ताकि मैं इस दिक्कत से निपट सकूं।’
विविएना 2013 से जीनोमिक्स इंग्लैंड से जुड़ी हैं। वो बताती हैं कि 1995 में ‘टुमॉरोज वल्र्ड’ में की गई कुछ भविष्यवाणी सच साबित हुई हैं, जो जीनोमिक सिक्वेंसिंग से जुड़ी हैं। वो जेनेटिक स्थितियों का पता लगाने और उनका इलाज करने से जुड़े एक रिसर्च अध्ययन पर काम कर रही हैं।
तो 30 साल बाद कैसी होगी दुनिया?
भविष्यवादी ट्रैसी फ़ॉलोज़ मानती हैं कि यह बात सही है कि 1995 के कार्यक्रम के दौरान कई बड़े आइडियाज़ मिले थे।
लेकिन, उस दौरान बीते 30 सालों में जो दो बड़ी बातें हुईं, वो छूट गई थीं। इनमें से एक है बिग टेक। का प्रसार और दूसरा सोशल मीडिया।
वह मानती हैं कि 2055 तक लोग कुछ इस तरह से जुड़े होंगे, जहां मानव मस्तिष्क और प्रौद्योगिकी एक सर्वर के ज़रिए आइडियाज़ का आदान-प्रदान कर सकेंगे।
फॉलोज़ कहती हैं, ‘ब्रेनस्टॉर्मिंग वास्तविक रूप से संभव हो पाएगी, जहां मनुष्य अपना आइडिया दूसरे के साथ इस तरह भी शेयर कर पाएंगे।’
टॉम चीजऱाइट को लगता है कि अगले तीस सालों में दो रोमांचक संभावनाएं मैटेरियल साइंस और बायोइंजीनियरिंग से जुड़ी हो सकती हैं।
उन्होंने कहा, ‘धातुओं की दुनिया की बात करें तो और ज्यादा मजबूत, हल्के और पतले उपकरण दुनिया को बदल सकते हैं। जबकि सख्त नियमों से संचालित बायोइंजीनियरिंग से दवाओं में बहुत बदलाव आएगा। ये मानव जाति के सामने आज की बड़ी समस्याएं मसलन-डीकार्बनाइजेशन, साफ पानी की कमी और भोज जैसी समस्याओं को खत्म कर सकती हैं।
तो फिर अगले 30 साल में दुनिया कैसी होगी? आपका जवाब जो भी हो लेकिन यह सुनना अच्छा होगा
जो प्रोफेसर हॉकिंग ने तीन दशक पहले टुमॉरोज वल्र्ड में क्या कहा था।
उन्होंने कहा था, ‘इनमें से कुछ परिवर्तन बहुत रोमांचक हैं और कुछ चिंताजनक। एक बात जिसके बारे में हम निश्चित हो सकते हैं, वह ये कि बदलाव बहुत अलग होंगे। हम जैसी उम्मीद करते हैं शायद वैसा न भी हो।’(bbc.com/hindi)
अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को जब तालिबान ने अशरफ गनी की सरकार को सत्ता से बेदख़ल कर कमान अपने हाथ में ली थी तो पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि अफगानिस्तान के लोगों ने गुलामी की जंजीर को तोड़ दिया है।
इमरान खान ने तालिबान की जीत के एक दिन बाद ही यह बयान दिया था। पाकिस्तान की सरकार और सेना में जश्न का माहौल था।
पाकिस्तान में अशरफ गनी को भारत और अमेरिका समर्थक बताया जा रहा था। लेकिन अब पाकिस्तान की खुशी पीछे छूट गई है और वह तालिबान शासित अफगानिस्तान में हवाई हमले कर रहा है।
जिस तालिबान को पाकिस्तान से वर्षों तक मदद मिली, उसे लेकर अब हालात क्यों बदल गए?
पाकिस्तान की तालिबान नीति क्या नाकाम हो रही है? तालिबान क्या पाकिस्तान विरोधी हो गया है?
पिछले कुछ दिनों से यही बहस पाकिस्तानी मीडिया में जमकर हो रही है। पाकिस्तान के पत्रकार और पूर्व राजनयिक पाकिस्तान की तालिबान नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
अफगानिस्तान से रिश्ते खऱाब होने की वजह
अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हककानी ने पाकिस्तान के न्यूज चैनल समा टीवी से कहा, ‘जो रिटार्यड अधिकारी हैं, उनको मैं सलाह दूंगा कि वो गोल्फ खेलें और अपना रिटायरमेंट अच्छे से गुजारें। देखिए अगर इन लोगों को विदेश नीति समझ में आती तो पाकिस्तान को पिछले कुछ सालों में जिन चीज़ों का सामना करना पड़ा है, वो नहीं हुआ होता।’
उन्होंने कहा, ‘ये तो काबुल फ़तह कर सोच रहे थे कि तालिबान वहाँ आएगा और पाकिस्तान का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा लेकिन वो तो हमारे ही गले पड़ गए हैं। विदेश नीति को समझने वालों के नज़रिया ही देखना चाहिए। आप कभी किसी ब्रिगेड के कमांडर थे तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपको सब कुछ समझ में आ रहा होगा।’
भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित का कहना है कि अफग़़ानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की नीति बुरी तरह विफल रही है। इस बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं है।
वो कहते हैं कि एक ही समय पर दोनों देशों के बीच कारोबार और संबंध बढ़ाने की बात होती है और ठीक उसी समय पर हमले भी हो रहे होते हैं।
अब्दुल बासित अफग़़ानिस्तान से संबंध बिगडऩे के केंद्र में पाकिस्तान तालिबान (टीटीपी) को देखते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में आतंकवादी हमले बढ़े हैं और पाकिस्तान सरकार टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) के खिलाफ कार्रवाई कर रही है लेकिन टीटीपी के सुरक्षित पनाहगाह अफगानिस्तान में हैं। इस तरह से ये पूरा मामला बेहद संवेदनशील हो जाता है।
अब्दुल बासित ने पाकिस्तानी न्यूज चैनल एबीएन न्यूज से कहा, ‘ये बड़ा संवेदनशील मामला है। अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान पूर्व में सहयोग करते रहे हैं। पाकिस्तान ये भी चाहता है कि काबुल के साथ उसके संबंध अच्छे हों, लेकिन ये हमले भी मजबूरी बन जाते हैं क्योंकि तालिबान सरकार पाकिस्तान तालिबान के ख़िलाफ़ क़दम नहीं उठा रही है।’
वो कहते हैं, ‘इन तमाम चीज़ों के बाद भी अफगानिस्तान नीति नाकाम हो गई है। इस हमले से एक दिन पहले हमारे विशेष प्रतिनिधि काबुल में मौजूद थे, ट्रेड बढ़ाने की बात कर रहे थे और दूसरी तरफ़ हमले हो रहे थे। इसका मतलब है कि शीर्ष स्तर पर आपस में कोई सामंजस्य नहीं है। अगर हो भी तो वो दिख नहीं रहा है।’
अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने कहा है कि 24 दिसंबर की रात पकतीका के बरमल जि़ले में पाकिस्तानी हवाई हमले में 46 लोग मारे गए हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे।
पाकिस्तान की सरकार या सेना ने आधिकारिक तौर पर हमलों के बारे में कुछ नहीं कहा है, लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर संवाददाताओं से कहा कि उनकी सेना ने बरमल जिले में ‘आतंकवादियों’ पर हमला किया।
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने 28 दिसंबर को कहा कि उसने जवाबी कार्रवाई के तौर पर पाकिस्तानी इलाक़े में हमले किए हैं।
उसने दावा किया है कि इस हमले में पाकिस्तानी अर्द्धसैनिक बल के कम से कम एक जवान मारा गया है और सात घायल हो गए हैं।
अफग़़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा विवाद
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद भी है। अफगानिस्तानऔर पाकिस्तान के बीच की अंतरराष्ट्रीय सीमा को डूरंड लाइन नाम से जाना जाता है। अफगानिस्तान इसे अपनी सरहद के तौर पर स्वीकार नहीं करता।
ब्रिटिश इंडिया में उत्तर-पश्चिमी हिस्सों पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए 1893 में अफगानिस्तान के साथ 2640 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा खींची थी।
ये समझौता काबुल में ब्रिटिश इंडिया के तत्कालीन विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड और अमीर अब्दुर रहमान ख़ान के बीच हुआ था। लेकिन अफगानिस्तान की किसी भी सरकार ने डूरंड लाइन की मान्यता नहीं दी।
थिंक टैंक विल्सन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट डायरेक्टर माइकल कुगलमैन कहते हैं कि दरअसल पाकिस्तान का ये मानना कि तालिबान की अफगानिस्तान में सत्ता वापसी से उन्हें टीटीपी को रोकने में मदद मिलेगी, ये एक बड़ी विफलता है।
वो कहते हैं कि अगर ख़बरों की मानें तो पाकिस्तान के हालिया हमले में नागरिकों खास तौर पर बच्चों और महिलाओं की मौत हुई और पाकिस्तान टीटीपी के शीर्ष नेताओं को खत्म करने में विफल रहा । अगर ये सही है तो ये निश्चित तौर पर ये सामरिक और रणनीतिक विफलता होगी।
वो कहते हैं कि पाकिस्तान की स्थिति कठिन है। इसकी मुख्य वजह है कि अगस्त, 2021 में जब अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी हुई तो पाकिस्तान को लगा कि इससे उन्हें टीटीपी को रोकने में मदद मिलेगी जबकि सच्चाई यह है कि तालिबान ने कभी अपने मिलिटेंट सहयोगियों (अलकायदा) को पीठ नहीं दिखाई है, ख़ास तौर पर जब वो टीटीपी जैसे कऱीबी हों तो और भी नहीं।
पाकिस्तान को अपनी नीतियों को लेकर स्पष्ट होना होगा
भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित का कहना है कि पाकिस्तान को लगा था कि तालिबान के आने के बाद भारत को वो स्पेस नहीं मिलेगी अफग़़ानिस्तान में जो अशरफ गनी के समय मिल रही थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने कहा, ‘अब भी पाकिस्तान ने पूरी तरह अफगानिस्तान के साथ राजनयिक संबंध बहाल नहीं किए हैं। पाकिस्तान एक तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, तो बात ये है कि आप तालिबान पर दबाव नहीं बना सकते। इस मामले में सही कोशिश होनी चाहिए।’
वो कहते हैं कि जो कछ भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हो रहा है वो चिंता का विषय है और पाकिस्तान के साथ तालिबान भी इसके लिए जि़म्मेदार है। वो कहते हैं कि ऐसा लगता है कि भारत की तरह ही अफग़़ानिस्तान से भी दुश्मनी सी हो गई है। भारत के साथ भी सीमा के मसले रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं रहा है।
पाकिस्तान मामलों के रक्षा विशेषज्ञ एजाज़ हैदर कहते हैं, ‘दहशतगर्दी पर काबू पाना मुश्किल काम है। अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय मान्य सीमा को मानता नहीं है। वहीं, वो टीटीपी को पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। तालिबान पख्तून या अफगान राष्ट्रवाद की वजह से कर रहे हैं और ये टीटीपी को लेवरेज के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। एक मांग ये भी थी कि जो क़बाइली जि़ले हैं, उनका स्टेट्स पहले वाला बहाल करें।’
‘अफग़़ानिस्तान की अंतरिम सरकार चाहती है कि ये इलाका बफऱ ज़ोन के रूप में हो और टीटीपी के लोग इसके अंदर हों और पाकिस्तान की रियासत का यहां कोई दखल न हो और फिर ये इलाक़ा विचारधारा और धर्म के आधार पर धीरे-धीरे उनके पास आ जाएं।’
वो कहते हैं कि पाकिस्तान को नीतियां तैयार करते समय इन सारी बातों का ख़्याल रखना होगा। अपनी नीतियों को लेकर स्पष्ट होना होगा। इसमें पारदर्शिता होनी चाहिए।
पाकिस्तान के हमले के बाद अफग़़ानिस्तान ने जवाबी हमले किए थे। इस पर विश्लेषक साजिद तरार कहते हैं, ‘अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर जो हमला किया, वो कोई आम हमला नहीं था। इसमें जो हथियार इस्तेमाल हुआ है, वो आधुनिक हैं। ये अफगानिस्तान का पाकिस्तान पर हमला है, ये व्यक्तिगत हमला नहीं है। उन्होंने ये समझ लिया है कि पाकिस्तान कितना कमजोर है।’
पाकिस्तान के दूसरे देशों के साथ बिगड़ते रिश्ते
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी कहते हैं कि पाकिस्तान का रिश्ता दूसरे देशों के साथ अच्छे नहीं हो रहे हैं। उनका कहना है कि पड़ोसी देश भारत के साथ पहले से ही रिश्ते तनावपूर्ण हैं और अफगानिस्तान के साथ भी रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘आपके (पाकिस्तान) संबंध इस क्षेत्र में सिर्फ बांग्लादेश के साथ ही थोड़े ठीक हुए हैं, वो भी आपकी कोशिश की वजह से नहीं बल्कि उनके बांग्लादेश में आंतरिक घटनाक्रम की वजह से। बांग्लादेश में एंटी इंडिया भावनाओं की वजह से। पाकिस्तान के लिए ये एक बहुत अच्छी चीज़ हुई है। मगर बाक़ी जगह नकारात्मकता ही है।
नजम सेठी कहते हैं, ‘भारत के साथ रत्ती भर आपके ताल्लुकात अच्छे नहीं हुए हैं। अफग़़ानिस्तान के साथ संबंध और भी खऱाब हो गए हैं। बात ये है कि ईरान के साथ रिश्ते तो बेहतर हो नहीं रहे हैं, ईरान आप पर विश्वास ही नहीं करता है।’ (bbc.com/hindi)
- सुजाता साहा
समय निरंतर गतिमान है, वह अपनी गति से चलता रहता है न किसी के लिए चलता है और न रूकता है। वर्ष 2024 भी बीत गया। नया वर्ष 2025 आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। आपके रिश्तेदार, दोस्त, आपके अपने आपको नए वर्ष की शुभकामनाएं देने के लिए एसएमएस, ई-मेल, फोन के द्वारा आपको नूतन वर्ष के आने की खुशी में आपको शुभकामनाएं देंगे, आपकी भविष्य की सुख-समृद्धि के लिए दुआ करेंगे। यह क्षण प्रतिवर्ष आता है, और थोड़े समय बाद नियमित दिनचर्या पर चल पड़ती है, पर आप सोचे क्या आप पुराने साल में जो भी संकल्प लिए होंगे, क्या वह पूरे हो पाए, पारिवारिक खींचातानी में क्या आप अपने लिए समय निकाल पाए... क्या आपने कुछ ऐसा काम किया हो, जिससे आपको आत्मसंतुष्टि प्राप्त हुई हो, क्या आपने अपने स्वस्थ्य का ध्यान रखा... नहीं अगर आप चाहे तो 2025 का हर दिन खुशनुमा बना सकती हैं।
अंदरुनी क्षमताओं का मूल्यांकन
सुंदरता किसी भी व्यक्ति के जीवन का आवश्यक अंग हैं। अगर आप सुंदर हैं तो भाग्यशाली है किंतु यदि नहीं है तो कभी भी मन में हीन भावना न पनपने दें। क्योंकि शारीरिक सुंदरता के बजाए अपनी अंदरुनी क्षमताओं का मूल्यांकन करें, विश्लेषण करें। कोई न कोई कला कोई न कोई गुण आपके अंदर जरूर होगा। तो लग जाइए अपनी उस सुंदरता को निखारने में। इस वर्ष आप अपनी कार्यक्षमता, प्रतिभा को निखारने का प्रयास करके देखें। आपने तो सुना ही होगा' जहां चाह है वहीं राह' है। इसलिए हमेशा पाजीटिव सोच को अपनाएं।
प्रकृति से करें दोस्ती
अगर आप वास्तविक एवं आंतरिक खुशियां चाहती है तो प्रकृति' से दोस्ती करें। फूलों का स्पर्श करें, चिड़ियों का चहचहाना सुने, हरी घास पर टहले। शीतल, मंद बहती हुई हवा में कुछ पल धूमे। आप ऐसा करके जरूर देखें।
सप्ताह में एक बार अवश्य दूसरों की सहायता करे
मशीनी जीवन जीते हुए आप केवल अपने सुख-दुख में ही सुख-दुख की अनुभूति करती है, क्या किसी और के सुख-दुख का आप पर प्रभाव नहीं पड़ता ? यदि नहीं तो आप अपनी संवेदनशीलता का जीवंत रखे।संकल्प करें कि समय निकालकर सप्ताह में किसी भी दिन दीन-दुखी या जरूरतमंदों की सहायता करके देखें।
अपनों के लिए वक्त निकाले
अपने किसी पुराने मित्र को या करीबी रिश्तेदार को फोन कीजिए या अचानक मिलने पहुंच जाइए। आप अपनी जिदगी के कई सुनहरे पलों को याद कर पाएंगे। पुरानी यादों की ताजगी से आपका तन, मन खिल उठेगा। आज की व्यस्त जिंदगी में हमारे पास परिवार के लिए वक्त निकाल पाना कठिन हो गया है। तो फिर अपने रिश्तों में मिठास के लिए अपने परिवार के कुछ समय निकालें। आपके परिवार के साथ-साथ ही आपके जीवन में सुख-दुख के साथी सबसे पहले आपके पड़ोसी है अतः पड़ोसियों से हमेशा दोस्ताना व्यवहार यानि अच्छे संबंध बनाएं।
समय का मोल पहचानें
जो वक्त बीत गया वह कभी वापस नहीं आता। आप खुद ही महसूस कीजिए कि कितना समय मोबाइल, सोशल मीडिया पर बीताते हुए आज का काम कल पर टालती रहती है। हमें अपने टालने की प्रवृत्ति को छोड़कर अपने काम को तुरंत कर लेना चाहिए। अपने समय की कीमत को पहचानें और उसका सदुपयोग करें। तो आप भी तैयार है नए वर्ष में नई अभिलाषाओं, नई आकांक्षाओं और नए प्रण के साथ। अपने स्वयं का विश्लेषण करने, अपने समय को परखने के लिए कि क्या आपने सही में सालभर आशानुरूप समय बीता पाई हैं। यदि बीते साल में कुछ भी खास न कर पाई हो तो अब नए वर्ष में उसे कीजिए। आखिर हर नई सुबह एक नया संदेश साथ लाती है।
-वकार मुस्तफा
‘गाह’ के मोहना नहीं रहेज् बड़े पेड़ के नीचे गिल्ली-डंडा, कंचे और कबड्डी खेलते उनके बचपन के दोस्त उन्हें इस नाम से ही पुकारते थे।
जब वह सन् 1932 में ब्रितानी भारत के जि़ला झेलम के गांव में कपड़े के दुकानदार गुरमुख सिंह और उनकी पत्नी अमृत कौर के यहां पैदा हुए तो उनका नाम मनमोहन सिंह रखा गया था।
अब यह गांव पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 100 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित जि़ला चकवाल का हिस्सा है।
जब 2004 में मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने और अगले दस साल इसी पद पर रहे और कई आर्थिक सुधार किए तो उनके गांव के साथी शाह वली और राजा मोहम्मद अली के दिलों में उनके साथ गुजारे दिनों की यादें हिलोरे मारने लगीं।
‘मैं आज जो कुछ हूं, शिक्षा की वजह से ही हूं’
समाजशास्त्र विशेषज्ञ जॉर्ज मैथ्यू साल 2004 में ही गाह गए थे।
‘ट्रिब्यून इंडिया’ में लिखे गए उनके लेख के अनुसार यहां स्कूल रजिस्टर में मनमोहन सिंह का नंबर 187 था, पिता का नाम गुरमुख सिंह, जाति (पंजाबी खत्री) कोहली, पेशा- दुकानदार और एडमिशन की तारीख़ 17 अप्रैल 1937 दर्ज है।
गांव में मनमोहन सिंह के दोस्त शाह वली ने जॉर्ज मैथ्यू को बताया कि दो कच्चे कमरों का स्कूल था।
शाह वली का कहना था, ‘हमारे उस्ताद दौलत राम और हेड मास्टर अब्दुल करीम थे। बच्चियां और बच्चे इक_े पढ़ते थे।’
‘ट्रिब्यून पाकिस्तान’ में छपे एक लेख के अनुसार उनके दोस्त ग़ुलाम मोहम्मद ख़ान ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया था, ‘मोहना हमारे क्लास के मॉनिटर थे और हम इक_े खेलते थे।’
उनका कहना था, ‘वह एक शरीफ़ और होनहार बच्चा था। हमारे उस्ताद ने हमेशा हमें सलाह दी कि अगर हम कुछ समझ न पाएं तो उनकी मदद हासिल करें।’
चौथी क्लास पास करने के बाद मनमोहन अपने घर वालों के साथ अपने गांव से 25 किलोमीटर दूर चकवाल चले गए और 1947 में ब्रितानी हिंदुस्तान के भारत और पाकिस्तान विभाजन से कुछ पहले अमृतसर चले गए।
इस तरह उनके गांव के दोस्त शाह वली उन्हें फिर कभी न मिल सके। अलबत्ता मनमोहन सिंह की दावत पर उनके बचपन के दोस्त राजा मोहम्मद अली सन 2008 में उनसे मिले थे। बाद में सन 2010 में राजा मोहम्मद अली की मौत हो गई थी।
‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के अनुसार राजा मोहम्मद अली ने ‘मोहना’ को शॉल, चकवाली जूती और गांव की मिट्टी और पानी दिया और बदले में उन्हें पगड़ी और कढ़ाई वाली शॉल तोहफ़े में मिली।
सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के उस समय के शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ को खत लिखा जिसमें कहा गया कि ‘गाह’ गांव की तरक्की के लिए कोशिश की जाए।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के अनुसार 1 अप्रैल 2010 को असाधारण तौर पर भावनात्मक राष्ट्रीय संबोधन में सिंह ने कहा कि उन्होंने मिट्टी के तेल के चिराग की रोशनी में पढ़ाई की।
कांपती आवाज़ में उन्होंने कहा, ‘मैं आज जो कुछ हूं, शिक्षा की वजह से ही हूं।’
गाह के दोस्तों का इंतजार और अधूरी ख्वाहिश
मनमोहन सिंह ने कैंब्रिज और फिर ऑक्सफर्ड जाने से पहले भारत में अर्थशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी।
साल 1991 में जब वह भारत के वित्त मंत्री बने तो अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर थी मगर फिर 2007 तक भारत ने अपनी सर्वोच्च जीडीपी की दर हासिल कर ली।
गाह गांव में मनमोहन सिंह के दूसरे दोस्त इंतजार कर रहे थे कि कब वह पाकिस्तान का दौरा करें और वह उनसे मिलें क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान आने की दावत तो क़बूल कर ली थी, मगर किसी वजह से वह जा न सके।
उन्हें ‘मोहना’ के आने की उम्मीद इसलिए भी थी कि मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण सिंह का परिवार भी विभाजन से पहले पंजाब के जि़ला झेलम के गांव ढक्कू में रहता था।
भारत और पाकिस्तान के नेताओं का अजब रवैया होता है। मिलना हो तो बहाना ढूंढ लेते हैं, न मिलना हो तो पास से गुजरते हुए भी एक-दूसरे से आंख नहीं मिलाते।
साउथ एशियन एसोसिएशन फ़ॉर रीजनल कोऑपरेशन (सार्क) का सोलहवां शिखर सम्मेलन 2010 में भूटान में हुआ था।
मैं दक्षिण एशिया के पत्रकारों की एक कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए वहीं पर मौजूद था।
‘सार्क’ के दूसरे देश समझते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का होना और बातचीत न होना दक्षिण एशिया के विकास में रुकावट है और अपनी इन भावनाओं का उन्होंने बैठक में खुलकर इज़हार किया।
शायद इसीलिए शिखर सम्मेलन के मेज़बान भूटान ने राजधानी थिम्पू के ‘सार्क’ विलेज में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को हिमालय की ख़ुशगवार पहाड़ी हवा के बीच दो मंजिला विला में पड़ोसी बनाया।
शायद उन्हें उम्मीद थी कि आते-जाते वह दोनों दिन में किसी वक्त एक दूसरे से हाल-चाल पूछ ही लेंगे।
थिम्पू के एक टैब्लॉयड ‘भूटान टुडे’ के अनुसार सिंह और गिलानी को कम से कम पड़ोसियों की तरह मिलने पर मजबूर करने के लिए यह पुरानी, देहाती लेकिन प्रभावी भूटानी कोशिश थी।
लेकिन दोनों प्रधानमंत्रियों ने यह कोशिश नाकाम कर दी। जिन्हें नहीं मिलना था, वे नहीं मिले।
यहां तक कि ‘सार्क’ देशों के राष्ट्राध्यक्षों को एक दिन कहना पड़ा कि ढलते सूरज में वह दोनों एक तरफ होकर टहल लें।
फिर ‘सार्क’ प्रेस रिलीज के अनुसार उनकी जिद पर पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्रियों ने सार्क विलेज में एक साथ चहलकदमी की और बातचीत भी की।
बहरहाल, फिर मनमोहन सिंह और गिलानी की मुलाकात हुई जहां उन्होंने विश्वास बहाल करने के लिए बातचीत के रास्ते खुले रखने का फैसला किया।
भारत-पाकिस्तान रिश्तों को सुधारने
का मंसूबा पूरा नहीं हुआ
उस समय विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने सिंह की कांग्रेस सरकार पर पाकिस्तान के बारे में नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
जनवरी में अपनी अलविदाई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मनमोहन सिंह ने यह बताया कि उनकी सरकार परवेज़ मुशर्रफ सरकार से कश्मीर पर शांति समझौता करने के बहुत नजदीक पहुंच चुकी थी लेकिन फिर 2008 में मुंबई में आतंकवादी हमले हो गए।
सिंह की राय थी कि अगर भारत को अपनी आर्थिक इच्छाओं को पूरा करना है तो उसके लिए कश्मीर समस्या को हल करना होगा।
मुशर्रफ के बाद आने वाले राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से मनमोहन सिंह की मुलाकात न्यूयॉर्क में हुई।
साल 2011 में उस समय के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को पंजाब के शहर मोहाली में क्रिकेट वल्र्डकप का मैच देखने की दावत दी गई।
पत्रकार अभीक बर्मन ने लिखा कि भारत ने क्रिकेट में पाकिस्तान को हरा दिया लेकिन एक और मैदान ‘क्रिकेट डिप्लोमैसी’ में भारत और पाकिस्तान दोनों ही जीते हुए हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके पाकिस्तानी समकक्ष यूसुफ राजा गिलानी ने क्रिकेट मैच और डिनर के दौरान एक दूसरे से बिना रुकावट आठ घंटे बातचीत की।
साल 2012 में उस समय के भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और पाकिस्तानी विदेश मंत्री रहमान मलिक ने स्वतंत्र वीजा समझौते पर हस्ताक्षर किए जिससे दोनों तरफ के लोगों के लिए दूसरे देश में यात्रा वीजा हासिल करना आसान हो गया।
उसी साल पंजाब और बिहार के राज्यों के भारतीय राजनेताओं के एक शिष्टमंडल ने भी पाकिस्तान का दौरा किया।
वर्ष 2013 में मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली के मौके पर न्यूयॉर्क में मिले।
दोनों ने एक-दूसरे के देशों के दौरे की दावत भी कबूल की लेकिन कोई तारीख तय नहीं हुई।
उसी साल मई में नवाज शरीफ के पीएम चुने जाने के बाद यह उनकी पहले आमने-सामने की मुलाक़ात थी।
अगला साल मनमोहन सिंह की सरकार का आखिऱी साल था।
वर्ष 2019 में मनमोहन सिंह पाकिस्तान आए भी तो बक़ौल उनके वह ‘एक आम आदमी’ के तौर पर यात्रियों के पहले जत्थे में करतारपुर तक गए, जहां सिखों के लिए पवित्र गुरुद्वारा दरबार साहिब तक भारत से डेरा बाबा नानक के रास्ते आने के लिए कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ था।
उन्होंने उम्मीद जताई थी कि ‘करतारपुर मॉडल’ भविष्य के विवादों को हल करने में मदद कर सकता है।
उनका कहना था, ‘खुशहाल भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए शांति और सद्भावना ही आगे बढऩे का अकेला रास्ता है।’
लेकिन ‘मोहना’ की पाकिस्तान में अपने जन्म स्थान का दौरा करने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी। ((bbc.com/hindi)
-हृदयेश जोशी
ऐसा नहीं है कि डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते सब कुछ ठीकठाक था लेकिन वह मीडिया की परवाह करते थे और उनकी सरकार आलोचनात्मक रिपोर्टिंग का संज्ञान लेकर कदम उठाती थी। उनके दौर में कई मंत्रियों के (ए राजा, पवन बंसल, अश्विनी कुमार) इस्तीफे लिये। कुछ को (शशि थरूर) उनके बड़बोलेपन की सजा भुगतनी पड़ी। और मीडिया खुलकर सरकार के खिलाफ कैंपेन चला सकता था। चाहे आरटीआई कानून में बदलाव के खिलाफ या 2-जी और कोयला खदानों की नालानी को लेकर उठे सवालों पर। सीएजी रिपोर्ट आलोचनात्मक होती तो कई दिनों तक टीवी और अख़बारों में बैनर हेडलाइन चलती। संसद में हंगामा होता तो विपक्ष की आवाज़ को प्रमुखता मिलती।
अपनी तमाम आलोचनाओं के बाद भी डॉ मनमोहन सिंह पत्रकारों के सवालों का सामना सहजता से करते थे और बतौर वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री लगातार मीडिया से मुख़ातिब होते रहे। उनकी हर साल होने वाली प्रेस कांफ्रेंस के अलावा भी किसी मौके पर उनसे कोई भी कठिन सवाल पूछा जा सकता था।
इससे जुड़ा एक मेरा निजी अनुभव आज बताने लायक है।
बात वर्ष 2012 की है, जब असम में दंगे भडक़े थे और एनडीटीवी की ओर से मुझे उसे कवर करने के लिए भेजा गया। कोकराझार और चिरांग के इलाकों में। तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहत कैंपों का दौरा करने आये। कई शिविरों की हालत बहुत खऱाब थी जैसा कि इन घटनाओं के वक्त होता है। लोगों में काफी गुस्सा था और यहां शरणार्थियों की हालत देखकर बहुत बुरा लगा और हमने इसकी व्यापक रिपोर्टिंग भी की।
लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दौरे से पहले दो शिविरों को ( जिनमें से एक में बोडो और दूसरे में मुस्लिम शरणार्थी रह रहे थे) दुरुस्त किया गया। वहां सफाई की गई, लोगों के लिए ज़रूरी सामान, मेडिकल सहूलियत, पीने का पानी, पका हुआ भोजन आदि सब लाया गया।
स्वाभाविक रूप से उन दो कैंपों को मनमोहन सिंह के दौरे के लिए तैयार किया गया था ताकि प्रधानमंत्री को लगे कि राहत का काम अच्छा चल रहा है। इन्हीं में से एक कैंप के बाहर पीएम मनमोहन सिंह ने खड़े होकर पत्रकारों को संबोधित किया और तब प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी भी उनके साथ दिल्ली से आये थे।
पीएम के इंतज़ार में कई ओबी वैन खड़ी थी। बीसियों पत्रकार वहां जमा थे और दिल्ली से पत्रकारों का हुजूम पहली शाम वहां पहुंच गया था। यह पत्रकार वार्ता लाइव थी और सभी टीवी चैनलों पर इसका सीधा प्रसारण हो रहा था।
उस दिन करीब 5 फुट की दूरी से इस पत्रकार वार्ता में मैंने पीएम से ज़ोर से पूछा था कि प्रधानमंत्री जी आप इन दो कैंपों का दौरा कर रहे हैं लेकिन यहां से कुछ दूरी पर जाएंगे तो पता चलेगा कि लोगों के हालात बहुत खऱाब हैं। आपको पता है कि इन दो कैंपों को बस आपके मुआयने के लिए चमकाया गया है?
डॉ. मनमोहन सिंह अपने स्वभाव के मुताबिक जऱा भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने बस इतना कहा कि सभी कैंपों में सारी जरूरी सुविधाएं देने और हालात बेहतर करने के लिए आदेश दिये हैं और यह सुनिश्चित किया जायेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ‘ओजस्वी वक्ता’ नहीं थे लेकिन वह कभी सवालों से नहीं डरे और हर वक्त पत्रकारों में भेदभाव किये बिना उनके सवालों का सामना करते थे।
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
क्या हम नींद में हैं या उनींदे हैं या जाग रहे हैं लेकिन आँखें बंद करके पड़े हुए हैं? इसका अर्थ यह है कि हम अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को यूँ ही जाने दे रहे हैं. घड़ी की हर एक टिकटिक के साथ आपका जीवन कम होता जा रहा है. अपनी जागरूकता से इन अमूल्य पलों की महत्ता को समझा जा सकता है लेकिन प्रश्न यह है कि खुद को जागरूक कैसे करें?
सोना और जागना हमारे जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है. पूरे दिन का एक तिहाई समय सोने और दो तिहाई जाग कर रहने के लिए होता है. जाग कर रहने का मतलब केवल आंखें खोल कर रहना नहीं होता, मन को जागृत करके रखना होता है, हरेक गतिविधि पर सतर्कता कायम रखना होता है. जो भी हो रहा है, यदि हम बेहोशी में कर रही हैं तो इसका मतलब है कि हम कुछ नहीं कर रहे हैं, वह अपने-आप ही हो रहा है। टू-व्हीलर या फोर-व्हीलर चलाते समय हमारी मानसिक स्थिति गौर किया जाए तो हम लगभग बेहोशी में चलाते हैं, व्हील, एक्सीलरेटर और ब्रेक स्वाभाविक रूप से संचालित होते रहते हैं. हमारा ध्यान कहीं और रहता है। इस ध्यान की अनुपस्थिति का अर्थ है, मन का जागृत न होना।
मन को जागृत करने का अर्थ है, प्रत्येक क्रिया के प्रति मानसिक रूप से सतर्क रहना। जो भी हम कर रहे हैं या जो कुछ हमारे आसपास हो रहा है उसके प्रति सजग रहना. हमारे जीवन में एक क्रिया निरंतर होती है, श्वास लेने की। वह आती-जाती रहती है लेकिन एक मिनट के लिए यदि श्वांस को अवरुद्ध कर दिया जाए तो उसकी उपयोगिता समझ में आ जाएगी. हमारे शरीर के लिए इतनी अधिक आवश्यक क्रिया के प्रति हम सचेत नहीं रहते, उसे ध्यान से नहीं देखते. ऐसी अनेक लापरवाहियां हमारे साथ निरंतर घटती रहती हैं और हम उसके प्रति जरा भी गंभीर नहीं रहते।
जीवन एक खेल का मैदान है जिसमें हम एक खिलाड़ी हैं। हर खेल में जरूरी नहीं है कि हम जीतें लेकिन अच्छी तरह से खेलें, यह बेहद ज़रूरी है. छोटे-छोटे असंख्य खेलों का गुच्छा है यह जीवन। कुछ में जीतेंगे तो कुछ में हारेंगे लेकिन यदि लगातार हारते रहे तो जीतने की अभिलाषा क्षीण हो जाएगी और हमें नैराश्य घेर लेगा. मन पर निराशा का आक्रमण जीवन की सबसे बड़ी पराजय होती है, जीवन नीरस हो जाता है, मन उदास हो जाता है. मन की उदासी से शरीर में निष्क्रियता का आक्रमण होता है जो उसे हमेशा के लिए सुला देता है. शरीर में प्राण रहते हैं, सांसें चलती रहती हैं लेकिन जीवन से उत्साह दूर हो जाता है. ऐसी मनस्थिति में जीने से बड़ा दंड मनुष्य के लिए और क्या हो सकता है?
ऐसी नकारात्मक स्थिति का सामना करने के लिए हमें हर पल सजग रहना होगा. दिमागी नींद से बाहर निकलकर स्वयं को चैतन्य बनाना हमारा नियमित प्रयास होना चाहिए. मैंने अपने जीवन में इन दोनों पहलुओं का अनुभव लिया है। अपनी पचास वर्ष की उम्र मैंने यूँ ही बिता दी. जीवन जैसे खुद-ब-खुद आगे बढ़ता रहा। उसके बाद सन 2003 से 2009 के बीच मुझ पर कैंसर के तीन आक्रमण हुए, मैं बच गया तब मुझे समझ में आया कि जीत कैसे हासिल की जाती है. इस जानलेवा बीमारी ने मुझे जगाया, सचेत किया और मैं लेखन के क्षेत्र में लग गया। मैंने आत्मकथा लिखनी शुरू की, तीन खंड प्रकाशित हुए. उसके बाद विविध विषयों पर आठ और पुस्तकें आई। मैंने जीवन को समाप्त होते देखा, उस जीत के बाद मैं व्यापार के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में जीतने के लिए उद्यत हुआ और अब जीवन को सही मायने में जीते हुए जी रहा हूँ।
-सौत्विक बिस्वास
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का गुरुवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया। यह जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली ने दी।
एम्स ने प्रेस रिलीज में बताया कि 92 वर्षीय मनमोहन सिंह को गुरुवार की शाम घर पर ‘अचानक बेहोश’ होने के बाद गंभीर हालत में एम्स के आपातकालीन विभाग लाया गया था।
मनमोहन सिंह लगातार दो बार भारत के प्रधानमंत्री रहे और उनकी व्यक्तिगत छवि काफी साफ-सुथरी रही।
भारत में आर्थिक सुधारों का श्रेय उन्हें ही जाता है। फिर चाहे उनका 2004 से 2014 का प्रधानमंत्री का कार्यकाल रहा हो या फिर इससे पूर्व वित्त मंत्री के रूप में उनका कामकाज।
मनमोहन सिंह के नाम एक और उपलब्धि दर्ज है, वह जवाहरलाल नेहरू के बाद पहले भारतीय थे, जो लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख दंगों के लिए संसद में माफ़ी मांगी थी। 1984 में हुए सिख दंगों में लगभग 3000 सिख मारे गए थे।
मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल खासा चर्चित रहा। इस दौरान भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए। कई लोगों का मानना है कि इन घोटालों की वजह से ही 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
पंजाब में जन्म, कैंब्रिज से मास्टर्स
मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। यह हिस्सा अब पाकिस्तान में है। पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया और ऑक्सफॉर्ड से डी फिल किया।
मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि कैंब्रिज में पढ़ाई के दौरान उन्हें आर्थिक तंगी से गुजऱना पड़ा था। दमन सिंह ने लिखा था, ‘उनकी ट्यूशन और रहने का खर्च सालाना लगभग 600 पाउंड था। पंजाब यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप से उन्हें करीब 160 पाउंड मिलते थे, बाकी के लिए उन्हें अपने पिता पर निर्भर रहना पड़ता था। मनमोहन बेहद सादगी और किफायत से जीवन बिताते थे। डाइनिंग हॉल में सब्सिडी वाला भोजन अपेक्षाकृत सस्ता था, जिसकी कीमत दो शिलिंग छह पेंस थी।’
दमन सिंह ने अपने पिता को ‘घर के कामों में पूरी तरह असहाय’ बताते हुए कहा कि ‘वो न तो अंडा उबाल सकते थे और न ही टीवी चालू कर सकते थे।’
मनमोहन सिंह साल 1991 में भारत के वित्त मंत्री के तौर पर उभरे, ये ऐसा दौर था जब देश के आर्थिक हालात बहुत खऱाब थे।
उनकी अप्रत्याशित नियुक्ति ने उनके लंबे और सफल करियर को नई ऊंचाई दी। उन्होंने एक शिक्षाविद और नौकरशाह के रूप में तो काम किया ही, सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में भी योगदान किया और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रहे।
वित्त मंत्री के रूप में अपने पहले भाषण में उन्होंने विक्टर ह्यूगो का हवाला देते हुए कहा, ‘इस दुनिया में कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है।’
ये भाषण उनके महत्वाकांक्षी और अभूतपूर्व आर्थिक सुधार कार्यक्रम की शुरुआत थी। उन्होंने टैक्स में कटौती की, रुपये का अवमूल्यन किया, सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया।
इससे अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, उद्योग तेजी से बढ़े, बढ़ रही महंगाई पर काबू पाया गया और 1990 के दशक में विकास दर लगातार ऊंची बनी रही।
एक्सीडेंटल पीएम
मनमोहन सिंह को बहुत अच्छी तरह से पता था कि उनका राजनीतिक जनाधार नहीं है।
उन्होंने कहा था, ‘राजनेता बनना अच्छी बात है। लेकिन लोकतंत्र में राजनेता बनने के लिए आपको पहले चुनाव जीतना पड़ता है।’
लेकिन जब उन्होंने 1999 में लोकसभा का चुनाव जीतने की कोशिश की तो निराशा हाथ लगी। हालांकि कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा में भेजा।
2004 में भी ऐसा ही हुआ। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने से इनकार करने पर मनमोहन सिंह पीएम बने।
तब सोनिया गांधी पर उनके विदेशी मूल को लेकर सवाल उठाए गए थे।
हालांकि आलोचकों का कहना था कि भले ही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाए गए हों, लेकिन असली ताकत तो सोनिया गांधी के पास है।
मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी कामयाबी प्रधानमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका के साथ परमाणु समझौता था।
उनके समय में ये ऐतिहासिक समझौता हुआ और इसकी बदौलत अमेरिका की परमाणु टेक्नोलॉजी तक भारत की पहुंच बन गई। लेकिन इस सौदे की कीमत भी चुकानी पड़ी। मनमोहन सिंह सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दलों ने समर्थन वापस ले लिया।
कांग्रेस को बहुमत जुटाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। उसे दूसरी पार्टियों से समर्थन लेना पड़ा और इस दौरान कांग्रेस पर आरोप लगा कि उसने सांसदों का समर्थन खरीदने के लिए पैसे खर्च किए।
मनमोहन सिंह आम सहमति कायम करने के पक्षधर थे। उन्होंने उस दौरान गठबंधन सरकार का जिम्मा संभाला जब सहयोगी दलों को मनाना मुश्किल काम होता था। वो मुखर थे। मनमोहन सरकार को समर्थन देने वाली क्षेत्रीय पार्टियां भी अपनी मांग बढ़-चढ़ कर रखती थीं। दूसरी समर्थक पार्टियां भी इसमें पीछे नहीं थीं।
हालांकि मनमोहन सिंह को उनकी विश्वसनीयता और बुद्धिमत्ता की वजह से भरपूर सम्मान मिला।
उन्हें नरम व्यक्तित्व का माना जाता था और कहा जाता था कि वो निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। कुछ आलोचकों का कहना था कि उनके कार्यकाल में आर्थिक सुधारों की गति धीमी हो गई। वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने जिन आर्थिक सुधारों की गति दी थी उन्हें प्रधानमंत्री रहते आगे नहीं बढ़ा पाए।
मनमोहन सिंह ने दूसरी बार साल 2009 में कांग्रेस को निर्णायक चुनावी जीत दिलाई।
लेकिन जीत की चमक जल्द ही फीकी पडऩे लगी, और उनका दूसरा कार्यकाल ज्यादातर गलत कारणों से खबरों में रहा- उनके मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों पर घोटाले के आरोप लगे, जिनसे देश को कथित तौर पर अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। विपक्ष ने संसद को लगातार ठप रखा, और नीतिगत ठहराव के चलते देश को गंभीर आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सिंह को भारत का ‘सबसे कमजोर प्रधानमंत्री’ कहा। इस पर मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल का बचाव करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने देश और जनता के कल्याण के लिए ‘पूरी प्रतिबद्धता और समर्पण’ के साथ काम किया।
यथार्थवादी विदेश नीति
अपने विदेश नीति में, मनमोहन सिंह ने अपने दो पूर्ववर्तियों की व्यावहारिक राजनीति को आगे बढ़ाया। उन्होंने पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया जारी रखी, लेकिन इसमें उन हमलों के कारण रुकावट आई, जिनका आरोप पाकिस्तानी चरमपंथियों पर लगा।
इसका चरम नवंबर 2008 के मुंबई हमले और बम धमाके में देखने को मिला।
उन्होंने चीन के साथ सीमा विवाद खत्म करने की कोशिश की और 40 साल से अधिक समय से बंद नाथू ला दर्रा फिर से खोलने के लिए समझौता किया।
मनमोहन सिंह ने अफग़़ानिस्तान के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाई और लगभग 30 वर्षों में वहां जाने वाले पहले भारतीय नेता बने।
साथ ही, उन्होंने भारत के पुराने सहयोगी ईरान से रिश्ते खत्म करने का संकेत देकर कई विपक्षी नेताओं को नाराज़ भी किया।
सादगी से जीने वाले नेता
एक मेहनती पूर्व शिक्षक और नौकरशाह के रूप में, वो अपनी विनम्रता और शांत स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनका ट्विटर अकाउंट (एक्स) साधारण और नीरस पोस्ट्स के लिए जाना जाता था, जिसके फॉलोअर्स की संख्या भी काफी कम थी।
मनमोहन सिंह मितभाषी थे। वो हमेशा शांत नजऱ आते थे। उनके व्यक्तित्व के इन पहलुओं की वजह से उनके कई प्रशंसक थे।
कोयला खदानों के अवैध आवंटन से जुड़े अरबों डॉलर के घोटाले के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने इस मामले पर अपनी चुप्पी का बचाव करते हुए कहा था कि उनकी ‘ये चुप्पी हजारों शब्दों के जवाब से बेहतर है।’
2015 में उन्हें आपराधिक साजिश, भरोसा तोडऩे और भ्रष्टाचार से जुड़े अपराधों के आरोपों पर जवाब देने के लिए कोर्ट में बुलाया गया। इस दौरान परेशान मनमोहन सिंह ने संवाददाताओं कहा था, वो ‘जांच के लिए पूरी तरह से तैयार’ हैं। सच की जीत होगी।’
प्रधानमंत्री का अपना कार्यकाल ख़त्म करने के बाद बढ़ती उम्र के बावजूद वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के तौर पर विपक्ष की राजनीति में सक्रिय रहे।
अगस्त 2020 में उन्होंने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि कोविड महामारी से अर्थव्यवस्था को पहुंचे नुक़सान की भरपाई के लिए भारत को तीन कदम तुरंत उठाने चाहिए। इस महामारी ने भारत की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था।
उन्होंने कहा था कि सरकार को लोगों को कैश देना चाहिए। साथ ही कारोबारियों को पूंजी मुहैया करानी चाहिए और वित्तीय सेक्टर की दिक्कतों को दूर करना चाहिए। और आखऱि में इतिहास में मनमोहन सिंह को इस शख़्स के तौर पर याद किया जाएगा जिन्होंने भारत को आर्थिक और परमाणु अलगाव से बाहर निकाला। हालांकि कुछ इतिहासकार कहेंगे कि उन्हें काफी पहले रिटायर हो जाना चाहिए था।
2014 में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मेरा पूरा विश्वास है कि मौजूदा मीडिया और संसद में मौजूद विपक्षी पार्टियों की तुलना में इतिहास मेरे प्रति ज्यादा दयालु होगा।’
मनमोहन सिंह के परिवार में उनकी पत्नी और तीन बेटियां हैं। (bbc.com/hindi)
-अभिनव गोयल
‘राम मंदिर के साथ हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन राम मंदिर निर्माण के बाद कुछ लोगों को लगता है कि वो नई जगहों पर इसी तरह के मुद्दों को उठाकर हिंदुओं का नेता बन सकते हैं। ये स्वीकार्य नहीं है।’
ये बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने ऐसे समय पर कही है जब देश में मंदिर-मस्जिद वाले कई नए अध्याय लिखे जा रहे हैं।
उपासना स्थल अधिनियम पर चल रही बहस के बीच देश में संभल, मथुरा, अजमेर और काशी समेत कई जगहों पर मस्जिदों के प्राचीन समय में मंदिर होने का दावा किया जा रहा है।
गुरुवार, 19 दिसंबर को पुणे में 'हिंदू सेवा महोत्सव' के उद्घाटन के मौके पर बोलते हुए मोहन भागवत ने इस माहौल पर चिंता जाहिर करते हुए एक बार फिर मंदिर-मस्जिद वाले चैप्टर को बंद करने की बात कही है।
उन्होंने कहा, ‘तिरस्कार और शत्रुता के लिए हर रोज नए प्रकरण निकालना ठीक नहीं है और ऐसा नहीं चल सकता।’
मोहन भागवत के बयान के बाद ना सिर्फ राजनीतिक गलियारों में खींचतान शुरू हो गई है बल्कि कई साधु संतों ने भी उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
मोहन भागवत के इस भाषण के क्या मायने हैं? क्या वे संघ के काडर को अपनी दिशा बदलने की नसीहत दे रहे हैं?
कई साधु-संतों ने उठाए सवाल
मोहन भागवत के बयान पर स्वामी रामभद्राचार्य ने सवाल उठाए हैं।
समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘ये मोहन भागवत का व्यक्तिगत बयान हो सकता है। ये सबका बयान नहीं है। वो किसी एक संगठन के प्रमुख हो सकते हैं, हिंदू धर्म के वो प्रमुख नहीं हैं कि हम उनकी बात मानते रहें। वो हमारे अनुशासक नहीं हैं। हम उनके अनुशासक हैं।’
रामभद्राचार्य ने कहा, ‘हिंदू धर्म की व्यवस्था के लिए वो ठेकेदार नहीं हैं। हिंदू धर्म की व्यवस्था, हिंदू धर्म के आचार्यों के हाथ में हैं। उनके हाथ में नहीं हैं। वो किसी एक संगठन के प्रमुख बन सकते हैं। हमारे नहीं हैं। संपूर्ण भारत के वो प्रतिनिधि नहीं हैं।’
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद भी मोहन भागवत के बयान के बाद गुस्से में दिखाई दे रहे हैं।
एबीपी न्यूज चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘जो लोग आज कह रहे हैं कि हर जगह नहीं खोजना चाहिए, इन्हीं लोगों ने तो बात बढ़ाई है और बढ़ाकर सत्ता हासिल कर ली। अब सत्ता में बैठने के बाद कठिनाई हो रही है।’
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, ‘अब कह रहे हैं कि ब्रेक लगाओ। जब आपको जरूरत हो तो आप गाड़ी का एक्सीलेटर दबा दो और जब आपको जरूरत लगे तो ब्रेक दबा दो। ये सुविधा की बात हो गई। न्याय की जो प्रक्रिया है, वो सुविधा नहीं देखती। वो ये देखती है कि सच्चाई क्या है।’
उन्होंने कहना है, ‘हम चाहते हैं कि जहां-जहां के बारे में इस तरह की बातें आ रही हैं, उन पर विचार कर लिया जाए। क्यों नहीं अलग से एक प्राधिकरण बना दिया जाता है, जो इन्हीं बातों पर तेजी से विचार करे और प्रमाणों को देखकर सच्चाई का पता लगाकर सही कर दे।’
इस मुद्दे पर बाबा रामदेव ने भी अपनी राय रखी है। समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘ये सच है कि आक्रांताओं ने आकर हमारे मंदिर, धर्म स्थान, सनातन के गौरव चिन्हों को नष्ट भ्रष्ट किया है और इस देश को क्षति पहुंचाई है।’
बाबा रामदेव ने कहा कि तीर्थस्थलों और देवी देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित करने वालों को दंड देने का काम न्यायपालिका का है, लेकिन जिन्होंने ये पाप किए हैं उन्हें इसका फल मिलना चाहिए।
‘दिल्ली का आशीर्वाद’
ये पहली बार नहीं है जब संघ प्रमुख ने देश के मुसलमानों को साथ लेकर चलने और मस्जिदों में मंदिर ना ढूंढने की सलाह दी है।
नागपुर में साल 2022 में मोहन भागवत ने कहा था, ‘इतिहास वो है जिसे हम बदल नहीं सकते। इसे न आज के हिंदुओं ने बनाया है और न ही आज के मुसलमानों ने। ये उस समय घटाज्हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखनाज्अब हमको कोई आंदोलन करना नहीं है।’
साल 2024 में मोहन भागवत ने लोकसभा परिणाम के कारणों का विश्लेषण करते हुए एक बयान दिया था। उस समय भी यही समझा गया था कि उन्होंने बीजेपी के कथित अहंकार को लेकर यह बात कही थी।
उन्होंने कहा था, ‘जो मर्यादा का पालन करते हुए काम करता है, गर्व करता है लेकिन अहंकार नहीं करता, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है।’
लेकिन इस बार के बयान को राजनीतिक विश्लेषक अलग नजर से देखते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और दशकों से संघ को करीब से देखने वाले शरद गुप्ता कहते हैं कि इस बार उन्होंने एक वाक्य जोड़ा है कि राम मंदिर के बाद लोग राजनीति करके हिंदुओं का नेता बनना चाहते हैं।
शरद गुप्ता कहते हैं, ‘ये आलोचना या तो बीजेपी नेताओं के इशारे पर हो रही है, जो यह सह नहीं सकते कि कोई परोक्ष रूप से भी नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष करे।’
ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े भी करते हैं। वे कहते हैं, ‘जिस तरह से कथावाचक और धर्मगुरु, मोहन भागवत के बयान पर असहमति जता रहे हैं। सोशल मीडिया पर अंधभक्त उन्हें संघ छोडऩे को कह रहे हैं। ये सब बिना दिल्ली के आशीर्वाद के संभव नहीं है।’
वे कहते हैं, ‘अगर ये बात नरेंद्र मोदी ने कही होती तो क्या तब भी ऐसी ही आलोचना होती। ये साफ है कि मोहन भागवत के खिलाफ खुलकर फ्रंट खोला गया है। ये दिल्ली की सत्ता और मोहन भागवत की बीच सीधी लड़ाई है।’
वहीं दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार और आरएसएस पर किताब लिख चुके विजय त्रिवेदी का कहना है कि मोहन भागवत के बयानों का मतलब है कि जो इस वक्त देश में चल रहा है, वो उन्हें पसंद नहीं आ रहा है।
वे कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी के साथ उनकी कोई लड़ाई हो, ऐसा दिखाई नहीं देता है। उनके बयान पर शक करना बेईमानी है। ये सिर्फ आज की बात नहीं है, बल्कि वे लंबे समय से इस बात का समर्थन करते आ रहे हैं कि हिंदू-मुसलमानों को साथ लेकर चलने की जरूरत है।’
त्रिवेदी कहते हैं, ‘वो अच्छा बनने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं, ऐसा भी नहीं है। उनकी बातें उन सभी लोगों के लिए है जो सामाजिक समरसता को बिगाडऩे की कोशिश कर रहे हैं।’
संघ का प्रभाव
लोकसभा चुनाव 2024 के समय भी भारतीय जनता पार्टी और संघ के बीच मतभेद सामने आए थे।
शुरुआती कुछ चरणों के बाद प्रचार के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ‘बीजेपी को अब संघ की ज़रूरत नहीं है।’
वरिष्ठ पत्रकार अशोक वानखेड़े कहते हैं कि जेपी नड्डा के इस बयान के बाद मोहन भागवत आक्रामक हो गए थे।
वे कहते हैं, ‘हमेशा संगठन पर संघ का वर्चस्व रहा है। अटल बिहारी की सरकार के समय भी ऐसा ही था, लेकिन अब स्थिति इंदिरा गांधी की कांग्रेस जैसी हो गई है। सत्ता और संगठन एक ही व्यक्ति के हाथ में है, जिससे संघ को तकलीफ है। उन्हें डर है कि कहीं उनके हाथ से चीजें चली ना जाएं।’
वानखेड़े का मानना है कि सरसंघचालक का भाषण बहुत मायने रखता है और बहुत विचार-विमर्श और रणनीति के तहत बातें कही जाती हैं।
दूसरी तरफ वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का कहना है कि संघ में भी ऐसे कई लोग हैं जो मोहन भागवत की जगह नरेंद्र मोदी के पीछे खड़े हैं।
उनका मानना है कि संघ में मोहन भागवत की पकड़ भी कमजोर हो रही है, क्योंकि अब ये भी सवाल उठने लगे हैं कि वो संघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने में कितने सक्षम रह गए हैं।
गुप्ता कहते हैं, ‘पांचजन्य संघ का मुखपत्र है। इस बार के संपादकीय में इस बात की वकालत की गई है कि जहां पर भी हिंदू धर्म के प्रतीक छिपे हुए हैं, जहां हिंदू मंदिर तोड़े गए हैं, सबको वापस लेने की जरूरत है। अगर संघ का अपना मुखपत्र, अपने ही प्रमुख के विरोध में खड़ा होगा, तो इसे क्या कहेंगे?’
संघ प्रमुख के बयान का असर?
सवाल है कि क्या संघ प्रमुख के इस तरह के बयानों का कुछ असर जमीनी स्तर पर पड़ेगा? क्या संघ से जुड़े संगठन मोहन भागवत की बात को सुन रहे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं कि संघ प्रमुख का बयान कोई फतवा नहीं है कि हर कोई मानने लगेगा।
त्रिवेदी कहते हैं, ‘देश में संघ के स्वयंसेवकों की संख्या करीब एक करोड़ है, जबकि हिंदुओं की आबादी करीब 80 करोड़ है। ऐसे में हम मान लेते हैं कि हर हिंदू संघ से जुड़ा है, लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए भी यह जरूरी नहीं है कि मोहन भागवत के बयानों का सीधा असर जमीन पर दिखाई दे।’
वहीं शरद गुप्ता का कहना है कि संघ और बीजेपी ने मिलकर एक ऐसी सेना खड़ी कर दी है, जो अब चार्ज हो गई है, जिसे डिस्चार्ज करना आसान नहीं है।
वे कहते हैं, ‘हिंदुत्व, वो टाइगर है जिस पर चढऩा और उसकी सवारी करना तो आसान है, लेकिन उतरना बहुत मुश्किल है। दोनों ने मिलकर पूरे देश को हिंदुत्व की लहर में झोंक दिया है और अब उससे उतर नहीं पा रहे हैं और जो कोशिश कर रहे हैं उन्हें इस तरह की आलोचनाओं और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है और इसमें मोहन भागवत भी अछूते नहीं हैं।’
कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, ‘मोहन भागवत का बयान आरएसएस की ख़तरनाक कार्यप्रणाली को दर्शाता है - उनकी कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का अंतर है।’
‘आरएसएस का काम करने का तरीक़ा आज़ादी के वक्त जितना ख़तरनाक था, आज उससे भी ज़्यादा है। वे जो बोलते हैं, उसका उल्टा करते हैं।’
उन्होंने लिखा, ‘अगर मोहन भागवत को लगता है कि मंदिर-मस्जिद का मुद्दा उठाकर नेतागिरी करना ग़लत है तो उन्हें बताना चाहिए कि ऐसे नेताओं को उनका संघ संरक्षण क्यों देता है? क्या आरएसएस-बीजेपी में मोहन भागवत की बात नहीं मानी जाती?’
‘अगर वह सच में अपने बयान को लेकर ईमानदार हैं तो सार्वजनिक रूप से घोषित करें कि भविष्य में संघ कभी भी ऐसे नेताओं को सपोर्ट नहीं करेगा जिनके कारण समाजिक भाईचारे को ख़तरा पहुंचता है।’
‘लेकिन ये ऐसा नहीं कहेंगे क्योंकि मंदिर-मस्जिद संघ के इशारे पर ही हो रहा है। कई मामलों में ऐसे विभाजनकारी मुद्दे को भडक़ाकर दंगा करवाने वालों का कनेक्शन आरएसएस से निकलता है। ये बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या भाजपा से जुड़े होते हैं और संघ वकील दिलाने से लेकर मुकदमे तक में इनकी पूरी मदद करता है।’
उन्होंने लिखा, ‘स्पष्ट है- भागवत का बयान सिफऱ् समाज को गुमराह करने के लिए है। उन्हें लगता है कि ऐसी बातों से आरएसएस के पाप धुल जाएंगे और उनकी छवि अच्छी हो जाएगी, लेकिन उनकी वास्तविकता देश के सामने है।’ (bbc.com/hindi)
-अंशुल सिंह
जुलाई 2018 में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर लोकसभा में शिक्षा का अधिनियम, 2009 के संशोधन पर अपनी बात रख रहे थे।
इस दौरान उन्होंने कहा कि कई सरकारी स्कूल अब मिड डे मील स्कूल बन गए थे क्योंकि इनमें शिक्षा और सीखना गायब है।
उस समय केंद्र में नो डिटेंशन पॉलिसी थी जिसे अब केंद्र की मोदी सरकार ने पांचवीं और आठवीं कक्षा के लिए हटा दिया है।
मोदी सरकार के इस फ़ैसले के बाद अब पांचवीं और आठवीं कक्षा में पढऩे वाले छात्रों को फेल किया जा सकता है।
साल, 2010 में केंद्र की मनमोहन सरकार नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार, अधिनियम में संशोधन करके नो डिटेंशन पॉलिसी बनाई थी।
सोमवार को इस फैसले के बारे में जानकारी देते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के सचिव संजय कुमार ने कहा कि केंद्र सरकार ने बच्चों में सीखने के परिणाम में सुधार लाने के इरादे से यह फैसला लिया है।
संजय कुमार ने कहा, ‘हम लोगों ने यह निर्णय लिया है कि पांचवीं और आठवीं में हर प्रयास करने के पश्चात यदि डिटेंशन करने की आवश्यकता पड़े तो डिटेन किया जाए। लेकिन उसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि किसी भी बच्चे को हमारे स्कूलों से निष्कासित नहीं किया जाए। हम एक्सेस तो चाहते हैं लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत यह भी चाहते हैं कि हर बच्चे का लर्निंग आउटकम उम्दा हो।’
सरकार के इस फ़ैसले से केंद्र के अधीन चलने वाले लगभग 3000 स्कूल प्रभावित होंगे। इनमें केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय और सैनिक स्कूल शामिल हैं।
तमिलनाडु सरकार ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले का विरोध किया है। तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री अंबिल महेश पोय्यामोझी ने कहा है कि तमिलनाडु में आठवीं कक्षा तक नो-डिटेंशन पॉलिसी जारी रहेगी।
क्या है नो डिटेंशन पॉलिसी?
नो डिटेंशन पॉलिसी जब लाई गई थी तो उसका उद्देश्य स्कूलों में हो रहे ड्रॉपआउट को कम करना, सीखने की प्रक्रिया को आनंददायक बनाना और परीक्षा में फेल होने के डर को दूर करना था।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 छह से 14 साल के बच्चे के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है और इसके सेक्शन 16 में नो डिटेंशन पॉलिसी का विस्तार से जिक्र है।
इसके मुताबिक़, ‘नो डिटेंशन का प्रावधान इसलिए बनाया गया है क्योंकि परीक्षाओं का इस्तेमाल अक्सर खराब अंक पाने वाले बच्चों को बाहर करने के लिए किया जाता है। एक बार ‘फेल’ घोषित होने के बाद, बच्चे या तो कक्षा दोहराते हैं या फिर स्कूल ही छोड़ देते हैं। बच्चे को एक कक्षा दोहराने के लिए मजबूर करना हतोत्साहित करने वाला होता है। आरटीई अधिनियम में ‘नो डिटेंशन’ प्रावधान का मतलब बच्चों की शिक्षा का आकलन करने वाली प्रक्रियाओं को छोडऩा नहीं है।’
नो डिटेंशन पॉलिसी के तहत किसी भी छात्र को तब तक फ़ेल नहीं किया जा सकता है, जब तक कि वह कक्षा एक से लेकर आठवीं तक प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर लेता है।
इसका मतलब है कि अगर कोई छात्र फ़ेल होता है तो उसे अगली क्लास में प्रमोट कर दिया जाएगा।
इस पॉलिसी के तहत छात्रों का मूल्यांकन पारंपरिक परीक्षा प्रणाली से अलग सतत और व्यापक मूल्यांकन (सीसीई) के तहत किया जाता है। इसमें पेपर-पेंसिल टेस्ट, चित्र बनाना, पढऩा और मौखिक रूप से अभिव्यक्ति आदि शामिल है।
नए नियम में क्या है?
साल 2019 में शिक्षा के अधिकार अधिनियम में संशोधन किया गया था। इसके तहत राज्य सरकारों को यह अधिकार दिया गया था कि वो अपने राज्य में पांचवीं और आठवीं के बच्चों के लिए साल के अंत में वार्षिक परीक्षा आयोजित करवा सकती हैं।
अगर कोई छात्र इस परीक्षा में फ़ेल हो जाता है तो उसे उस कक्षा में रोक सकती हैं।
2018 में आरटीई अधिनियम में संशोधन का विधेयक लोकसभा में पेश किया गया था और तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था, ‘यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिल है और अधिकांश राज्य सरकारों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। यह हमारी प्रारंभिक शिक्षा में जवाबदेही लाता है। कई सरकारी स्कूल केवल मिड डे मील स्कूल बन गए हैं, क्योंकि शिक्षा और सीखना गायब है।’
संशोधन के बाद से लेकर अब तक 15 से ज़्यादा राज्य नो डिटेंशन पॉलिसी को हटा चुके हैं। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्य शामिल हैं।
वहीं आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और मणिपुर जैसे राज्यों में अभी नो डिटेंशन पॉलिसी लागू है।
नए नियमों में कहा गया है कि कक्षा पांच या आठ का कोई छात्र साल के अंत में होने वाली परीक्षा में फ़ेल होता है तो उसे एक और मौक़ा दिया जाएगा।
परीक्षा का परिणाम आने के बाद दो महीने के भीतर पुन: परीक्षा का मौक़ा दिया जाएगा। अगर छात्र इस परीक्षा में भी फेल हो जाता है तो उसे रोका जा सकता है।
ऐसे मामले में क्लास टीचर बच्चे के साथ-साथ अगर ज़रूरत है तो माता-पिता को भी गाइड करेंगे।
नियम में यह भी कहा गया है कि स्कूल के प्रमुख उन पीछे रहने वाले बच्चों की लिस्ट बनाएंगे और इसके कारण का जानने का प्रयास करेंगे।
परीक्षा और पुन: परीक्षा बच्चे के समग्र विकास को हासिल करने के लिए योग्यता-आधारित परीक्षाएँ होंगी न कि याददाश्त आधारित।
नियमों में स्पष्ट किया गया है कि प्रारंभिक शिक्षा पूरी होने तक किसी भी बच्चे को निष्कासित नहीं किया जाएगा।
क्या कहते हैं आंकड़ें?
शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 का असर स्कूली छात्रों के एडमिशन में और पढऩे-लिखने की क्षमता पर देखा जा सकता है।
एन्युअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) बच्चों के एडमिशन के साथ बुनियादी पढऩे और गणित समझने की क्षमता से संबंधित सर्वे है। यह सर्वे देश के लगभग हर जि़ले में एक स्थानीय संस्था के वॉलिंटियर्स के द्वारा किया जाता है।
एएसईआर के आंकड़ों के अनुसार, स्कूलों में दाखिला लेने वाले 7 से 16 साल की आयु के बच्चों की संख्या में वृद्धि हुई है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2008 में 7 से 16 वर्ष की आयु के लगभग 5।7 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, यह संख्या 2022 में घटकर 2।3त्न रह गई।
लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पढऩे और अंकगणितीय क्षमता के आधार पर सीखने के स्तर में भी इस अवधि के दौरान गिरावट आई है।
2008 में कक्षा 5 के 56 प्रतिशत छात्र कक्षा दो की किताब पढ़ सकते थे और 2010 में 53.4 फ़ीसद छात्र ऐसा कर पाए लेकिन उसके बाद के सालों में इस आंकड़े तक दोबारा नहीं पहुंचा जा सका।
2022 में कक्षा 5 के सिर्फ 42.8 फीसद छात्र ही कक्षा दो की किताब पढ़ सकते थे।
अगर कक्षा 8 के छात्रों के लिए सीखने के आंकड़े देखें तो इसमें और भी गिरावट देखने को मिलती है।
2008 में 84.8 फ़ीसद छात्र और 2010 में 82.9 फ़ीसद छात्र ऐसे थे जो कक्षा 2 की किताब पढ़ सकते थे लेकिन 2022 में यह आंकड़ा लगभग 70 प्रतिशत पर आ गया है।
समय के साथ बच्चों की गणितीय क्षमता पर भी असर पड़ा है।
सरकारी और निजी स्कूलों को मिलाकर बात करें तो 2008 में कक्षा 5 में पढऩे वाले पांच में से दो छात्र भाग कर पाते थे लेकिन 2022 आते-आते यह संख्या चार में से सिफऱ् एक रह गई।
नो डिटेंशन पॉलिसी की आलोचना
जब से नो डिटेंशन पॉलिसी लागू हुई थी तब से इस पर पुनर्विचार की बातें उठती रहती थीं। इसके प्रमुख कारण बताए जाते थे-
पॉलिसी को सपोर्ट के करने के लिए शिक्षा प्रणाली की कमियां
फ़ेल न करने की नीति बच्चों को कड़ी मेहनत करने से हतोत्साहित करती है
शिक्षकों की जवाबदेही में कमी और बच्चों को सिखाने में कम गंभीरता
सीसीई के उचित कार्यान्वयन और शिक्षक प्रशिक्षण के साथ इसके एकीकरण की कमी
2015 में सभी राज्यों से नो डिटेंशन पॉलिसी पर सुझाव मांगे गए थे। तब अधिकांश राज्यों ने नीति के मौजूदा स्वरूप में संशोधन का सुझाव दिया था।
साल 2023-24 से दिल्ली सरकार ने सरकारी स्कूलों में पांचवीं और आठवीं कक्षा में नो डिटेंशन पॉलिसी को लागू किया था। इसके बाद आठवीं कक्षा के जो परीक्षा परिणाम आये थे उनमें लगभग 20 प्रतिशत छात्रों को फेल होने के कारण आगे की कक्षा में नहीं जाने दिया गया था। जबकि कक्षा पांच के लिए यह आंकड़ा लगभग एक प्रतिशत था।
एक आरटीआई के जवाब में दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय ने बताया था कि कुल 2.34 लाख छात्रों ने कक्षा आठ की परीक्षा दी थी और इनमें से 46,662 छात्रों को उसी क्लास में रोक दिया गया था।
हालांकि नो डिटेंशन पॉलिस के पक्ष में तर्क देते हुए कहा जाता है कि
इससे फ़ेल होने के डर के बिना ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे स्कूल आएंगे
बच्चे काम पर जाने की वजह स्कूल आते हैं।
लड़कियों के स्कूल न छोडऩे की एक बड़ी वजह
बच्चों पर क्या असर पड़ेगा?
प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय के फ़ैसले पर कृष्ण कुमार कहते हैं, ‘मेरी समझ में यह शिक्षा के अधिकार क़ानून में थोड़ा सा विचलन है क्योंकि पुराने नियम के अनुसार हर साल हर बच्चे का सतत प्रक्रिया के तहत मूल्यांकन करना होता था। अब नए नियम के हिसाब से अगर किसी बच्चे को रोक लेते हैं तो उसका पूरा एक साल बर्बाद हो जाता है। आम तौर पर बच्चा एक या दो विषयों में कमजोर होता है तो उस विषय के चलते उसे रोक लिया जाता है।’
कृष्ण कुमार का कहना है, ‘पहले भी दिल्ली जैसे कई राज्य ऐसा कर चुके हैं। इस छोटी सी उम्र में परीक्षा लेना मेरी समझ में संसद से पारित हुए क़ानून में विचलन ही है और यह एक अच्छा संकेत नहीं है। अभी तक हर बच्चे का आठ वर्ष तक स्कूल में रहने का अधिकार होता था और यह मूलभूत अधिकार था।’
दिल्ली पेरेंट्स असोसिएशन की अध्यक्ष अपराजिता गौतम इस फैसले को सही ठहराती हैं और उनका मानना है कि इससे पढ़ाई का स्तर सुधरेगा।
अपराजिता गौतम कहती हैं, ‘पिछले कुछ समय से बच्चे पढ़ाई को गंभीरता से नहीं ले रहे थे क्योंकि उन्हें पता है कि आठवीं तक उन्हें कोई फेल नहीं कर सकता है। दूसरी ओर शिक्षक भी गंभीर नहीं थे क्योंकि बच्चे तो पास हो ही जाएंगे। इन दोनों चीज़ों से बच्चों की शिक्षा पर सीधे असर पड़ रहा था। ज़्यादातर ऐसी समस्याएं सरकारी स्कूलों में देखी गई हैं और प्राइवेट की तुलना में सरकारी स्कूल की संख्या ज़्यादा है।’
हालांकि अपराजिता गौतम को इस बात की आशंका है कि प्राइवेट स्कूल इसे आपदा में अवसर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।
सरोज यादव एनसीईआरटी की पूर्व डीन रही हैं और उनका कहना है कि वो सीसीई प्रणाली के पक्ष में हैं।
सरोज यादव कहती हैं, ‘ये जो फेल होने का डर होता है वो बच्चे के मन में बैठ जाता है अगर वो फैल होता है। इसके बाद फेल होने का एक साइन बच्चे के साथ पूरी जि़ंदगी भर चिपका रहता है। इसलिए ज़रूरत थी कि नियम को और मजबूती से लागू किया जाता। ऐसा कोई भी बच्चा नहीं है जो सीख नहीं सकता है।’
सरोज यादव का मानना है कि सिस्टम को सुधारने की ज़रूरत है लेकिन हम उसे दोबारा मौके देने की बात को प्राथमिकता दे रहे हैं। (bbc.com/hindi)
2024 धरती पर अब तक का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है और इसी साल कोयले की खपत सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ने की तैयारी कर रही है.
इस साल दुनिया के सबसे गर्म साल बनने की संभावना के बीच, कोयले की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की नई रिपोर्ट ‘कोयला 2024’ में बताया गया है कि इस साल दुनिया भर में कोयले की मांग 8।77 अरब टन तक पहुंचने की संभावना है। यह लगातार तीसरा साल होगा जब कोयले की खपत ने रिकॉर्ड बनाया है, जबकि इसे कम करने की जोरदार अपील की जा रही है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से होने वाले खतरनाक प्रभावों को रोकने के लिए इन्हें तेजी से घटाना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो धरती और मानवता पर इसके गंभीर परिणाम होंगे।
चीन में कोयले की खपत सबसे ज्यादा
दुनिया में सबसे ज्यादा कोयला चीन में जलाया जाता है। यहां की बिजली की बढ़ती मांग इसका बड़ा कारण है। 2024 में चीन की कोयले की खपत 4।9 अरब टन तक पहुंचने की संभावना है। यह भी एक नया रिकॉर्ड होगा। हालांकि चीन सौर और पवन ऊर्जा में बड़े निवेश कर रहा है, लेकिन उसकी ऊर्जा जरूरतों में कोयला अभी भी प्रमुख भूमिका निभा रहा है।
आईईए के ऊर्जा बाजार निदेशक केइसुके सदामोरी ने कहा, ‘मौसम से जुड़े कारक, खासकर चीन में, कोयले की मांग पर बड़ा असर डालेंगे। बिजली की मांग कितनी तेजी से बढ़ती है, यह भी बहुत अहम होगा।’
भारत और इंडोनेशिया भी कोयले की खपत बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। 2024 में भारत की कोयले की मांग 5 फीसदी बढक़र 1।3 अरब टन हो सकती है। वहीं, इंडोनेशिया ने कोयले का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा दिया है। चीन और भारत के साथ मिलकर इस साल वैश्विक उत्पादन 9 अरब टन से अधिक हो जाएगा।
विकसित देशों में कोयले की खपत घटी
इसके उलट, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे विकसित क्षेत्रों में कोयले की खपत कम हो रही है। हालांकि, गिरावट की रफ्तार धीमी हो गई है। 2024 में अमेरिका और यूरोप में कोयले की मांग क्रमश: 5 फीसदी और 12 फीसदी कम होने की उम्मीद है। पिछले साल यह गिरावट 17 फीसदी और 23 फीसदी थी। 2023 में जर्मनी में कार्बन उत्सर्जन 70 सालों में सबसे कम रहा था।
इस धीमी गिरावट के पीछे राजनीतिक अस्थिरता को बड़ा कारण माना जा रहा है। अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने से जलवायु नीतियों पर असर पड़ सकता है। ट्रंप पहले भी जलवायु परिवर्तन को ‘धोखा’ बता चुके हैं, जिससे वैश्विक प्रयासों पर खतरा मंडरा रहा है।2023 में भी ऊर्जा क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन ने रिकॉर्ड बनाया था।
आईईए ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के कारण डेटा सेंटरों की बिजली की खपत बढ़ रही है। इनमें ज्यादातर बिजली कोयले से चलने वाले संयंत्रों से आती है, खासकर चीन जैसे देशों में। यह चलन कोयले की खपत कम करने के प्रयासों को और मुश्किल बना सकता है।
कोयले की मांग में गिरावट कब आएगी?
हालांकि 2024 के लिए स्थिति गंभीर है, लेकिन आईईए का अनुमान है कि 2027 तक वैश्विक कोयला खपत अपने चरम पर पहुंच जाएगी। यह भविष्यवाणी इस बात पर निर्भर करती है कि नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और बिजली की मांग स्थिर हो सके।
सदामोरी ने कहा, ‘स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों का तेजी से उपयोग बिजली क्षेत्र को बदल रहा है। लेकिन 2027 तक कोयला खपत को चरम पर लाने के लिए लगातार प्रयास जरूरी हैं।’
कोयले की बढ़ती खपत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु की सुरक्षा के लिए किए जा रहे वादों के उलट है। पिछले साल दुबई में हुए कॉप28 सम्मेलन में देशों ने जीवाश्म ईंधन से दूर जाने का वादा किया था। लेकिन इस साल अजरबैजान में हुए कॉप29 सम्मेलन में खास प्रगति नहीं हुई।
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि इन वादों को नहीं निभाने से जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास खतरे में पड़ सकते हैं। यूरोपीय संघ के जलवायु मॉनिटर ने इस महीने की शुरुआत में कहा कि 2024 लगभग निश्चित रूप से अब तक का सबसे गर्म साल होगा। (dw.comhi)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
एक सप्ताह पहले मध्य प्रदेश सरकार अपने एक साल की उपलब्धियों के ढोल पीट रही थी। इसी के तुरंत बाद अब पिछले एक सप्ताह से तमाम अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया पर आयकर विभाग और लोकायुक्त की दो कार्यवाहियों से जिस तरह से काले धन , सोने, चांदी और बेनामी दिखती संपत्तियों और काली कमाई की डायरियों के समाचार प्रमुखता से प्रकाशित हो रहे हैं उससे साफ जाहिर हो रहा है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की सरकारी गर्जनाओं के बावजूद सरकार की नाक के नीचे राजधानी भोपाल में भ्रष्टाचार से अर्जित काले धन के ढेर घरों , दफ्तरों और जंगल किनारे बने फॉर्महाउस में छिपाई गई कार से निकल निकल कर सरकार के माथे पर कलंक की तरह चिपक रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में सरकार के साथ साथ सरकार की इंटेलीजेंस एजेंसीज, जांच एजेंसियों और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी कई प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। और इस सबके बावजूद सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री से लेकर संबंधित विभागों के मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी संगठन के पदाधिकारियों की चुप्पी चौंकाने वाली है। विपक्षी दल जरूर इस अवसर को भुनाने के लिए विधानसभा सत्र के दौरान इस मुद्दे पर सरकार के पूर्व चीफ सेक्रेटरी और परिवहन विभाग के मंत्रियों और अफसरों पर संगीन आरोप लगा रहे हैं। प्रदेश सरकार के साथ साथ काले धन की इतनी मात्रा में बरामदगी केंद्र सरकार के काले धन के खिलाफ की गई नोटबंदी समेत कई घोषणाओं का भी मखौल उड़ा रही है। ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ गई और किंकर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में है जहां यह समझ में नहीं आता कि इस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए! छापों के कई दिन बाद मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का वही घिसा पिटा राग अलापा है।
ज्यादा समय नहीं हुआ जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास ही नशे की सामग्री बनाने वाली बड़ी फैक्ट्री का भंडाफोड़ गुजरात की जांच एजेंसी द्वारा किया गया था। तब भी मध्य प्रदेश सरकार, उसकी खुफिया एजेंसियों और पुलिस प्रशासन पर निष्क्रियता के आरोप लगे थे। अब काले धन कांड ने मध्य प्रदेश की गरीब जनता को चौंका दिया है।
जिस प्रदेश की लगभग तीन चौथाई आबादी गरीबी का दंश झेलकर मुफ्त राशन की लाइन में लगने की जिल्लत उठा रही हो वहां कुल जमा छह सात साल परिवहन विभाग में सिपाही की नौकरी लेकर इस्तीफ़ा देने वाले युवा सौरभ शर्मा के यहां से सैकड़ों करोड़ की नगदी, सोना, चांदी और संपत्तियों का निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। सच तो यह है कि कोई सिपाही छह साल तो क्या अपने पूरे जीवन में भी भ्रष्टाचार कर सौ करोड़ नहीं कमा सकता। यह तभी संभव है जब उसे महकमे के बड़े अफसरान या मंत्रियों आदि का वृहदहस्त प्राप्त हो। जिस तरह की खबरें आ रही हैं उनसे यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि सौरभ शर्मा को बहुत ऊपर का संरक्षण मिल रहा था तभी वह धड़ल्ले से इनोवा कार पर हूटर और परिवहन विभाग की नेम प्लेट का इस्तेमाल कर रहा था। जो ट्रैफिक पुलिस जगह जगह चौराहों पर हेलमेट, सीट बेल्ट और पॉल्यूशन सर्टिफिकेट न होने या नंबर प्लेट का साइज सही न होने पर हजारों चालान काटती है वह पुलिस व्यक्तिगत नंबर की कार पर हूटर का चालान नहीं कर पाई।
ऐसे भी समाचार प्रकाशित हुए हैं कि पुलिस ने इस गाड़ी की तलाशी नहीं ली। यदि कोई गाड़ी संदिग्ध अवस्था में पाई जाती है तो उसकी तलाशी की ड्यूटी पुलिस की ही है। आयकर या अन्य विभाग को तभी बुलाया जाता है जब कार से कोई ऐसी चीज बरामद होती है जिसकी कार्यवाही का क्षेत्राधिकार पुलिस के पास नहीं होता। ऐसा प्रतीत होता है कि सौरभ शर्मा किसी शक्तिशाली व्यक्ति का मोहरा या बेनामी है तभी उसका ऐसा रुतबा है और इसी वजह से उसके पास से इतनी दौलत मिली है। ऐसे मामलों की जांच यदि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होगी तो इस मामले की सच्चाई सामने आने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।
ईरान ने महिलाओं के लिए सख्त हिजाब कानून लागू करने की प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है. इस कानून को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा है.
महसा अमीनी की मौत के बाद महिलाओं के हिजाब पहनने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध झेलने वाले ईरान ने विवादित हिजाब कानून का लागू करना फिलहाल टाल दिया है। संसद में पारित इस कानून की आलोचना इसलिए हो रही थी क्योंकि इसमें हिजाब ना पहनने वाली महिलाओं और ऐसे कारोबारों पर सख्त सजा का प्रावधान था जो उन्हें सेवाएं देते।
मंगलवार को उपराष्ट्रपति शहराम दबीरी ने कहा कि कानून को राजनीतिक नेतृत्व और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के पास दोबारा समीक्षा के लिए भेजा गया है। दबीरी ने अखबार ‘हममिहन’ को बताया, ‘फैसला हुआ है कि इस कानून पर फिलहाल आगे बढऩे की प्रक्रिया रोकी जाएगी।’
इस कानून में हिजाब ना पहनने पर भारी जुर्माना, सरकारी सेवाओं से वंचित करना और जेल भेजने तक का प्रावधान था। बार-बार नियम तोडऩे वालों के लिए 15 साल तक की जेल और संपत्ति जब्त करने का भी प्रस्ताव था। कारोबारियों को भी नियम ना मानने पर जुर्माना और दुकान बंद करने जैसी सजा का सामना करना पड़ सकता था।
राष्ट्रपति का विरोध
यह कानून दिसंबर के मध्य में लागू होना था, लेकिन मध्यमार्गी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इसे वीटो कर दिया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि इस कानून से देश में फिर से अशांति फैल सकती है। राष्टप्तपति ने कहा कि कानून में कई ‘सवाल और अस्पष्टताएं’ हैं।
पेजेश्कियान इसी साल देश के राष्ट्रपति बने हैं और पश्चिमी देशों के साथ परमाणु समझौतों पर बातचीत फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। वह कानून के सख्त प्रावधानों को लेकर चिंता जता चुके हैं। नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल अब इस कानून की समीक्षा करेगी। माना जा रहा है कि इसमें कुछ बदलाव किए जा सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि इस कानून को रोकना राष्ट्रपति पेजेश्कियान के लिए राजनीतिक जीत है। वह कट्टरपंथी नेताओं और न्यायपालिका के बीच संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि, उनके पास कानून को रोकने का अधिकार नहीं है, लेकिन वह देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खमेनेई को इस कानून को रद्द करने के लिए मना सकते हैं।
महिलाओं का बढ़ता विरोध
हालांकि हिजाब पहनना अभी भी ईरानी कानून का हिस्सा है, लेकिन बड़े शहरों में कई महिलाएं खुलेआम इसका विरोध कर रही हैं। वे बिना सिर ढके सार्वजनिक स्थानों पर जाती हैं। 2022 के ‘महसा अमीनी’ आंदोलन के बाद यह चलन और तेज हुआ है। महसा अमीनी की मौत के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। 22 साल की इस कुर्द महिला को पुलिस ने ठीक से हिजाब न पहनने के आरोप में गिरफ्तार किया था। पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई थी।
नए कानून में न केवल महिलाओं बल्कि उनके समर्थन करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान था। पहली बार हिजाब ना पहनने पर 800 डॉलर यानी लगभग 70 हजार रुपये का जुर्माना और दूसरी बार पर सवा लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाना था। तीसरी बार पर जेल की सजा का नियम था।
इसके अलावा, कारोबारियों और टैक्सी चालकों को ऐसी महिलाओं की रिपोर्ट करनी होती, जो हिजाब नहीं पहनतीं। ऐसा ना करने पर उन पर भी जुर्माना लग सकता था। इस कानून में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी करने और सजा तय करने का प्रावधान भी था।
आगे क्या होगा?
इस कानून पर रोक से साफ है कि ईरान के राजनीतिक नेतृत्व और समाज के बीच भारी मतभेद हैं। कट्टरपंथी नेता सख्ती के पक्ष में हैं, जबकि सुधारवादी नेता और जनता इसे मानने को तैयार नहीं।
महसा अमीनी की मौत ने महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया। इस घटना के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों में 500 से अधिक लोग मारे गए और 22,000 से अधिक गिरफ्तार हुए।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिजाब कानून की कड़ी आलोचना हुई है। मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक नेताओं ने ईरान से महिलाओं की आजादी का सम्मान करने की अपील की है।
फिलहाल, कानून पर रोक एक राहत की तरह है। लेकिन महिलाओं के अधिकारों और उनके विरोध के मुद्दे पर ईरान में बहस जारी है। नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की समीक्षा से देश के भविष्य पर असर पड़ सकता है। (dw.comhi)
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा से कहा है कि वह पनामा नहर की फीस कम करे या तो उस पर नियंत्रण अमेरिका को वापस कर दे।
ट्रंप ने आरोप लगाया कि मध्य अमेरिकी देश पनामा अमेरिकी मालवाहक जहाज़ों से ज़्यादा क़ीमत वसूल रहा है। रविवार को ट्रंप ने एरिज़ोना में अपने समर्थकों से कहा, ''पनामा अमेरिका से मनमानी फीस वसूल रहा है। यह पूरी तरह से अनुचित है। यह हमारे लिए काफ़ी महंगा है और हम इसे तत्काल रोकेंगे।''
ट्रंप के पास अगले महीने अमेरिका की कमान आने वाली है। ट्रंप ने टर्निंग पॉइंट यूएसए नाम के एक कंजर्वेटिव ग्रुप को संबोधित करते हुए यह बात कही है।
लेकिन पनामा के राष्ट्रपति होसे राउल मुनीलो ने ट्रंप को जवाब देने में देरी नहीं की।
राष्ट्रपति मुनीलो ने कहा, ‘पनामा नहर का हर वर्ग मीटर हमारा है और इसके चारों तरफ़ का इलाक़ा भी हमारा है। पनामा की संप्रभुत्ता और स्वतंत्रता पर कोई समझौता नहीं होगा।’
इस तरह की मिसाल कम ही देखने को मिलती है, जब एक अमेरिकी नेता कहे कि वह किसी देश के हिस्से को अपने नियंत्रण में ले लेंगे।
हालांकि ट्रंप ने ये नहीं बताया कि वह इसे कैसे अंजाम देंगे। ट्रंप 20 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति की कमान संभालेंगे और वह संदेश दे रहे हैं कि उनके कार्यकाल में विदेश नीति का रुख़ क्या होने जा रहा है।
पनामा नहर अहम क्यों?
इससे पहले ट्रंप ने कहा था कि पनामा नहर अमेरिका के लिए 'अहम राष्ट्रीय संपत्ति' हुआ करती थी। ट्रंप ने रविवार को कहा कि अगर पनामा ने शिपिंग की दरें कम नहीं कीं तो वह पनामा नहर पर नियंत्रण वापस करने की मांग करेंगे।
82 किलोमीटर लंबी पनामा नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ती है।
इसका निर्माण 1900 के दशक की शुरुआत में किया गया था। 1977 तक इस पर अमेरिका का नियंत्रण था। इसके बाद पनामा और अमेरिका का संयुक्त नियंत्रण हुआ लेकिन 1999 में इस पर पूरा नियंत्रण पनामा का हो गया था।
हर साल पनामा नहर से कऱीब 14 हज़ार पोतों की आवाजाही होती है। इनमें कार ले जाने वाले कंटेनर शिप के अलावा तेल, गैस और अन्य उत्पाद ले जाने वाले पोत भी शामिल हैं।
पनामा के अलावा ट्रंप मेक्सिको और कनाडा पर भी कथित अनुचित टैक्स के लिए हमला बोल चुके हैं। ट्रंप का कहना है कि कनाडा के ज़रिए अवैध प्रवासी और ड्रग्स अमेरिका आ रहे हैं।
1914 में पनामा नहर खोली गई थी। यानी इसके 110 साल हो चुके हैं। पनामा नहर को कुशल इंजीनियरिंग का नतीजा बताया जाता है और वैश्विक व्यापार में इसे क्रांतिकारी बदलाव के रूप में भी देखा जाता है।
पनामा सिटी गगनचुंबी इमारतों के लिए जाना जाता है। कई बार इसे लातिन अमेरिका की दुबई कहा जाता है। पनामा की तरक़्क़ी का इंजन उसकी यही नहर है।
पनामा के पास जब से नहर का नियंत्रण आया है, तब से उसके संचालन की तारीफ़ होती रही है। पनामा की सरकार को इस नहर से हर साल एक अरब डॉलर से ज़्यादा की ट्रांजिट फीस मिलती है।
हालांकि पनामा नहर रूट से कुल वैश्विक ट्रेड का महज पाँच फ़ीसदी करोबार ही होता है।
कहा जा रहा है कि पनामा नहर को ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। न्यू सुपरटैंक्स इस नहर के ज़रिए आवाजाही करने में सहज नहीं हैं।
इसके विस्तार के लिए पनामा अरबों डॉलर ख़र्च कर रहा है। कहा जा रहा है कि वैश्विक व्यापार में चीन के ताक़त के रूप में उभरने के बाद इसकी अहमियत बढ़ गई है। यह नहर चीन से अमेरिका के पूर्वी तट को जोड़ती है।
पनामा नहर की चुनौतियां
पनामा नहर को स्वेज़ नहर से भी चुनौती मिल रही है। स्वेज़ नहर का भी विस्तार किया जा रहा है। वहीं निकारगुआ अटलांटिक और प्रशांत महासागर के बीच अपनी नहर बना रहा है।
पनामा नहर की परियोजना का विचार सबसे पहले 15वीं सदी में दिया गया था। शुरुआती असलफताओं के बाद फ्रांस ने 1881 में इस परियोजना पर काम शुरू किया। लेकिन आर्थिक नुकसान, बीमारी और दुर्घटनाओं में लोगों के मरने की वजह से इसे बीच में अधूरा छोड़ दिया गया था।
इसके बाद 1904 में अमरीका ने इस परियोजना में दिलचस्पी लेनी शुरू की और काम शुरू हो गया। पनामा नहर में आवागमन 1914 में चालू हो गया था।
पनामा नहर से अमेरिकी पोतों की आवाजाही सबसे ज़्यादा होती है। पनामा कैनाल अथॉरिटी के अनुसार, पनामा नहर से लगभग 75 फ़ीसदी कारगो या तो अमेरिका जाते हैं या अमेरिका से आते हैं। कऱीब 270 अरब डॉलर का कारोबार इस रूट के ज़रिए हर साल हो रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में पनामा नहर में पानी कम होने का असर कारोबार पर सीधा पड़ा है।
2017 में पनामा ने ताइवान से राजनयिक संबंध ख़त्म कर चीन से कायम कर लिया था। जो देश ताइवान से राजनयिक संबंध रखते हैं, चीन उनसे नहीं रखता है क्योंकि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। चीन के भारी निवेश के कारण पनामा का अहम सहयोगी बन गया है।
पनामा नहर के दो पोर्ट्स का संचालन हॉन्ग कॉन्ग की एक कंपनी करती है। ट्रंप ने रविवार को कहा था कि पनामा नहर चीन के लिए नहीं है। उन्होंने कहा था कि यह नहर ग़लत हाथों में चली गई है। हालांकि पनामा के राष्ट्रपति ने कहा है कि इस नहर पर प्रत्यक्ष और या अप्रत्यक्ष रूप से चीन का नियंत्रण नहीं है। (bbc.com/hindi)



