विचार/लेख
-सच्चिदानंद जोशी, के साथ रिया जोशी त्रिवेदी और 4 अन्य
उस दिन इंदौर में कई साल बाद उस सडक़ से गुजरना हुआ। कई साल यानी लगभग पैंतीस साल बाद। काफी कुछ बदलने के बाद भी उसे पहचानना कठिन नहीं था। मैंने चालक से पूछा ‘ये छोटी ग्वाल टोली है न?’ चालक को आश्चर्य हुआ । उसे लगा कि मैं शायद इस सडक़ से खुश नहीं हूं। बोला ‘सॉरी सर उधर ट्रैफिक ज्यादा था इसलिए मैं यहां से ले आया। ‘उसे क्या मालूम था कि उसने अनजाने मेरी बचपन की यादें ताजा कर दी थी।
‘इधर चौराहे पर मंदिर है न वहां रोक लेना। आज शनिवार है दर्शन कर लेंगे । ‘चालक ने राहत की सांस ली। बोला ‘चौराहे पर रोकना मुश्किल है , मैं थोड़ी आगे रोकता हूं।’
मैं कार से उतर कर मंदिर की ओर बढ़ गया। दर्शन का तो बहाना था। इसलिए औपचारिकता पूरी कर मंदिर के साथ वाले ओटले की ओर बढ़ा। वह पहले से छोटा हो गया था , शायद अतिक्रमण विरोधी मुहिम के कारण। लेकिन बहुत भर गया था। समोसे, कचौड़ी, आलू बड़ा ,पोहा, और हां चाउमिन भी। एक कोने में कड़ाही में जलेबियां तली जा रही थी। कांच के एक शो कैसे में पेस्ट्री और क्रीम रोल भी था। मुझे वह सारा सामान देख कर हैरत हुई। भीड़ अभी भी वैसी ही थी।
‘अरे मंगौड़े नहीं हैं?‘मैंने वहां सामान देने वाले लडक़े से पूछा।’ हैं न वो क्या उधर रखे हैं। ‘उसने एक कोने में रखे पीतल के थाल की तरफ इशारा किया। उसमें दस पंद्रह मंगौड़े बेचारे अपने ग्राहक की प्रतीक्षा में पड़े थे। ‘गरम करवा दूं?’ लडक़े ने पूछा। उन्हें देख खाने की इच्छा नहीं हुई। फिर भी पुरानी याद ताज़ा करने जितने भी थे सब बंधवा लिए।
घोर निराशा से ग्रस्त मैं वापिस कार में बैठा। बचपन की स्मृतियां उभर आई।
एक समय के सुपर स्टार थे ये हनुमान मंदिर के मंगौड़े। हमारा ननिहाल पास ही था और घर में पंद्रह बीस लोग थे। घर में कोई भी खुशी की खबर होती तो मंगौड़े आते। खुशी की खबर में किसी की शादी तय होने से लेकर किसी का अच्छा रिजल्ट आने तक सभी शामिल था। यहां तक कि ताश के खेल में हार जीत के लिए भी मंगौड़े की शर्त होती।
हम लोग तब जौरा में होते थे। छुट्टियों में ननिहाल जाते। तो पिताजी का मां को खत आना भी मंगौड़े का कारण बनता। खुशी के आकार से मंगौड़े की मात्रा तय होती। फिर भी ज्यादा लोग थे कुछ नाना जी के घर के और कुछ नाना जी के छोटे भाई यानी छोटे नाना जी के घर के।
इसलिए कितने भी मंगवाओ, हर एक के हिस्से में दो या बहुत हुआ तो तीन, उससे ज्यादा नहीं आते थे। लेकिन उसके लिए भी जी ललचाता ही था। और तो और दोने में नीचे बचने वाले चेटा पेटी ( और भी नाम है इस पदार्थ के) को खाने के लिए लाइन या नंबर लगता था। बाकायदा हिसाब रखा जाता था कि पिछली बार किसने खाया था।
घर में मंगौड़े आए है ये किसी को बताना नहीं पड़ता था। घर में घुसते ही उसकी खुशबू से पता चल जाता था कि आज कोई खुशखबरी है। कई कई बार तो मंगौड़े खाने के लिए खुशी के मौके बना लिए जाते थे।
एक बार नानी ने मंझले मामा के साथ बाजार सौदा लाने भेज दिया। मामा जी ने उसी ट्रिप में अपना रोमांटिक दौरा भी शामिल कर लिया। अपनी प्रेमिका ( अब मामी) मिल भी लिए। रिश्वत के तौर पर उन्होंने हमें सुभाष चौक के समोसे भी खिलाए ताकि हम अपना मुंह बंद रखें।
लेकिन जैसे ही घर में घुसे मंगौड़े की सुगंध ने दिमाग खराब कर दिया। ‘मंगौड़े आए थे’ मैंने चिल्लाकर पूछा। ‘आए थे और खत्म भी हो गए’ बहना ने चिढ़ाकर बताया। मन रोने रोने को हो उठा। समोसे की रिश्वत भूल गए और इस बात को कोसते रहे कि नानी ने क्यों भेजा मामा के साथ सौदा लाने।
बाद में नानी ने बुलाया और सिर पर चपत लगाते हुए कहा ‘तेरे लिए नहीं रखूंगी ऐसा हो सकता है क्या। जा चौके में कप प्लेट में छुपा कर रखे हैं।’
चौके में नानी ने एक कप में प्लेट से ढांक कर दो मंगौड़े रखे थे। ऐसा लगा मानो स्वर्ग मिल गया हो।
फिर पूछा कि किस खुशी में आए थे मंगौड़े तो पता लगा शांति मौसी का रिजल्ट आया है। शांति मौसी कई बार फेल होने के बाद पास हुई थी। मैने शैतानी से पूछा ‘बस इतने से? और ज्यादा आने चाहिए थे।’ मां ने डपट कर चुप करा दिया।
आज हनुमान मंदिर के मंगौड़े खाए तो न वो स्वाद आया न ही वो रोमांच हुआ। शायद इसलिए कि उन्हें खाने के लिए छीना झपटी नहीं हुई और शायद इसलिए कि कोई अवसर भी नहीं बना था उन्हें खाने का। बचपन में जरूर लगता था कि जब बड़ा होऊंगा तब एक किलो मंगौड़े लूंगा और पूरे खा जाऊंगा । किसी को भी नहीं दूंगा। लेकिन आज इतने मंगौड़े लेने के बाद भी कोई थ्रिल नहीं हुआ ।
कारण शायद ये भी है कि अब किसी चीज का वो थ्रिल रहता ही नहीं।
अभी बड़े बेटे ने कार खरीदी । और बताया तब जब वो बिल्डिंग के नीचे कार लेकर आ गया। बचपन में
तो साइकिल के टायर ट्यूब बदलना या साइकिल घंटी लगवाना भी थ्रिल होता था। उसकी कई दिन पहले से घोषणा हो जाती। चर्चा के कई दौर होते। तब वो चीज घर में आती। अब वैसा नहीं है। सरप्राइस का जमाना है।
बेटा कार लेकर आया तो सबने जाकर मंदिर में कार की पूजा करवाई। फिर खुश होकर मिठाई खाई। मेरे मुंह से निकला ‘अरे वाह आज की खुशी में तो हनुमान मंदिर के मंगौड़े होने चाहिए।’ दोनों बच्चे और बहुएं मेरी ओर देखने लगे और सोचने लगे कि ये क्या अजीब बात कह दी इन्होंने। लेकिन श्रीमती जी वहां से उठ कर किचन की ओर चली गई। बड़े बेटे ने कहा भी ‘मां आज खाना नहीं बनेगा। हम सब डिनर पर जा रहे हैं। ’ लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि मुझे मालूम था कि वो किचन में मंगौड़े की दाल भिगोने गई है।
-रवि तिवारी
आज हम लोग (मैं, अंशुल बेगानी और नवीन पडिहार) रायपुर से लगभग 160 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सिहावा पहुंचे महानदी का उद्गम स्थल देखने के लिए, पहुंचने से पहले तक हम सब लोगों के मन में बहुत उत्साह था, कई कल्पनाएं थी उद्गम स्थल को लेकर, क्योंकि हम लोग अमरकंटक में नर्मदा का उद्गम स्थल देख चुके थे, किंतु सिहावा पहुंचने पर अत्यधिक निराशा हुई, एक तो वहां पहुंच मार्ग तक पहुंचने के लिए कोई भी शासकीय साइन बोर्ड नहीं दिखाई दिया, पर्यटन मंडल या विभाग को कोई योगदान भी दिखाई नहीं दिया, सिहावा चौक से बस्ती के बीच से पूछते-पूछते वहां तक पहुंचे, वहां देखते हैं कि नदी के किनारे एक छोटा सा मंदिर नुमा इमारत खड़ी थी, वहां से नीचे की तरफ सीढ़ियों से सामने बहता हुआ नाला या नदी जो भी कह ले दिखाई दिया इसे ही नदी कहते होंगे क्योंकि वहां पर बताने वाला कोई भी नहीं था, मंदिर नुमा इमारत के निचले भाग में चट्टान के मध्य छोटी सी जगह दिखाई दी जिसे वहां उपस्थित सैनालियों ने बताया कि यही उद्गम स्थल है (तस्वीर में देख सकते हैं) जिससे अब पानी आना बंद हो गया है, इसमें पानी पहाड़ी के ऊपर बने कुंड से पानी आता था और यही महानदी का उद्गम स्थल है। इस मंदिर के बाहर भी लिखा हुआ है महानदी का उद्गम स्थल, साथ ही पास की लगी हुई दीवार पर महानदी के उद्गम की गाथा लिखी हुई थी, जिसे आप तस्वीर में देख सकते हैं।

पहाड़ी के ऊपर एक आश्रम या मंदिर महर्षि श्रृंगी ऋषि का है जिसमें एक कुंड है और उसमें थोड़ा पानी है कहा जाता है कि यही से महानदी का उद्गम हुआ जो पहाड़ों के अंदर से नीचे बने मंदिर के पास से निकलता हुआ नदी का रूप लिया था, किंतु अब ना तो वहां से कोई पानी बहता दिखाई देता है और नहीं कुंड से निकलता हुआ पानी।

महानदी भारत की सुप्रसिद्ध नदियों में से एक गिनी जाती है जो छत्तीसगढ़ से निकल कर उड़ीसा राज्य से बहती हुई बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई 858 किलोमीटर की बताई जाती है। उड़ीसा में 1957 में बना हीराकुंड डैम इसी नदी पर बना हुआ है।यह छत्तीसगढ़ व उड़ीसा दोनों राज्यों की जीवन रेखा मानी जाती है।

इतनी महत्वपूर्ण नदी का उद्गम स्थल इतना उपेक्षित होगा कल्पना से परे रहा। छत्तीसगढ़ का पर्यटन विभाग क्यों नहीं इसकी देखरेख या विकास नहीं कर पाया समझ से परे है। अमरकंटक की भाती इस स्थान को भी रमणीक व दर्शनीय बनाया जा सकता था, क्योंकि प्रकृति ने इस स्थान को बहुत सुंदरता प्रदान की हुई है केवल उसको संवारने की जरूरत थी किंतु अफसोस इतने सालों में भी यह हो ना सका। पहुंचने वाला हर पर्यटक निराश होकर लौटता है इसके लिए किसे जिम्मेदार माने और किसे नहीं इस पर बहस करने से कही अधिक बेहतर होगा यदि वर्तमान सरकार इस पर ध्यान देकर इसे छत्तीसगढ़ का अमरकंटक बना दे।

एक महिला के साथ फ़ोटो खिंचवाने से पहले उसे सिर ढंकने के लिए कहने को लेकर उठे विवाद को सीरिया के विद्रोही नेता अहमद अल-शरा ने ख़ारिज किया है।
पिछले हफ्ते हुई इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
जब से सीरिया पर विद्रोहियों ने कब्जा किया है, देश के भविष्य को लेकर जारी अटकलों के बीच इस घटना पर उदारवादी और संकीर्ण टिप्पणीकारों की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है।
सुन्नी इस्लामी ग्रुप हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) के प्रमुख ने फोटो खिंचवाने से पहले महिला से सिर ढंकने के लिए कहा था।
उदारवादी खेमा इसे बशर अल-असद सरकार के पतन के बाद सीरिया में इस्लामी व्यवस्था थोपने के रूप में देख रहा है।
जबकि कट्टर संकीर्ण खेमा पहली बार महिला के साथ फोटो खिंचवाने के लिए अहमद अल-शरा की आलोचना कर रहा है।
बीबीसी के जेरेमी बॉवेन से एक साक्षात्कार में शरा ने कहा, ‘मैंने उन्हें मजबूर नहीं किया। लेकिन यह मेरी निजी आज़ादी है। मैं उस तरह से फ़ोटो खिंचाना चाहता हूं जैसा मुझे ठीक लगता है।’
महिला लिया ख़ैरल्लाह ने भी कहा है कि इस निवेदन पर उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी।
उन्होंने कहा कि यह बात उन्होंने बहुत ‘विनम्रता और पिता जैसे तरीके’ से कही थी और उन्होंने सोचा कि ‘विद्रोही नेता का ये अधिकार है कि वो किस तरह पेश’ आना चाहते हैं।
हालांकि इस घटना ने दिखाया है कि सीरिया जैसे धार्मिक विविधता वाले देश को एकजुट करने में सीरिया के भविष्य के नेता के साथ क्या कुछ दिक्कतें आ सकती हैं।
सीरिया में सुन्नी बहुल आबादी है, जबकि बाक़ी आबादी ईसाई, अलावाइत, द्रूज और इस्माइलियों की है।
इसके अलावा असद का विरोध करने वाले विभिन्न राजनीतिक और हथियारबंद ग्रुपों में भी कई तरह के विचार हैं। इनमें से कुछ सेक्युलर लोकतंत्र चाहते हैं, जबकि कुछ धड़े इस्लामिक कानून का शासन चाहते हैं।
2017 में विद्रोहियों के गढ़ इदलिब पर कब्जा किया था तो शुरू में सार्वजनिक व्यवहार और ड्रेस कोड के कड़े नियम लागू किए थे। हालांकि लोगों की आलोचना के बाद हाल के सालों में उन्होंने ये नियम वापस ले लिए।
इस्लाम की पवित्र किताब क़ुरान में कहा गया है कि पुरुषों और महिलाओं को शालीन कपड़े पहनने चाहिए।
पुरुष शालीनता की व्याख्या नाभि से घुटने तक के ढंकने के रूप में की गई है जबकि महिलाओं के लिए आमतौर पर ग़ैर रिश्तेदार पुरुषों की मौजूदगी में चेहरा छोडक़र हाथ पैर और सबकुछ ढंकने के रूप में देखा जाता है।
सीरिया में विद्रोही संभाल रहे क़ानून व्यवस्था
उदारवादी क्यों कर रहे आलोचना
लिया ख़ैरल्लाह 10 दिसम्बर को दमिश्क के मेज़्ज़ेह इलाक़े में गई थीं और वहां उन्होंने शरा, जिन्हें पहले अबू मोहम्मद अल-जुलानी के नाम से जाना जाता था, के साथ फ़ोटो खिंचाने का आग्रह किया था।
सहमत होने से पहले शरा ने उन्हें सिर ढंकने के लिए कहा और लिया ख़ैरल्लाह ने ऐसा ही किया, अपनी शर्ट के हुड से सिर ढंका और फिर फ़ोटो खिंचवाई।
सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो क्लिप और तस्वीरें साझा की गईं, जिसके बाद आम यूज़र्स और मीडिया टिप्पणीकारों में इसे लेकर काफ़ी ग़ुस्सा देखा गया।
उदारवादी या ग़ैर रुढि़वादी विचारों वाले लोगों ने इसे एचटीएस के नेतृत्व में सीरिया के संभावित भविष्य की एक परेशान करने वाली झलक के रूप में देखा और उन्हें इस बात का डर भी सता रहा है कि कहीं सभी महिलाओं को हिजाब पहनने को अनिवार्य बनाने वाली रूढि़वादी नीतियों की तरफ़ तो यह क़दम नहीं है।
फ्ऱांस 24 के अरबी चैनल ने इस घटना पर चर्चा की और शीर्षक लगाया कि 'क्या सीरिया इस्लामिक क़ानून की ओर जा रहा है?'
बाकी लोगों ने तो और तीखे सवाल किए। एक सीरियाई पत्रकार ने कहा, ‘हमने एक तानाशाह को प्रतिक्रियावादी तानाशाह से बदल दिया है।’
सोशल मीडिया पर तमाम यूज़र्स ने सत्ता पर ‘कट्टर चरमपंथियों’ के क़ब्ज़े की चेतावनी दी, जबकि अन्य लोगों ने एक स्वतंत्र महिला को रुढि़वादी तरीक़े अपनाने को मजबूर करने की निंदा की।
कट्टरपंथियों को क्यों लगा बुरा
उधर, इस्लामी कट्टरपंथियों ने टेलीग्राम पर आलोचना की कि शरा ने क्यों एक युवा महिला के साथ वीडियो बनवाने और फ़ोटो खिंचाने पर राजी हुए।
कुछ लोगों ने खैऱल्लाह को ‘मुताबारिजाह’ कहा जो कि ग़ैर शालीन महिला या मेकअप लगाने वाली महिला के लिए एक नकारात्मक शब्द है।
इन कट्टरपंथियों में मौलवी से लेकर प्रभावशाली टिप्पणीकार हैं, जिनके विचार आमतौर पर सीरिया के रुढि़वादी समुदायों में बहुत पढ़े और साझा किए जाते हैं और जिनकी पहुंच एचटीएस समर्थकों और यहां तक कि इस ग्रुप के अधिकारियों तक है।
ऐसा लगता है कि इनमें अधिकांश सीरिया से हैं और मुख्य रूप से एचटीएस के पूर्व गढ़ इदलिब से हैं, इनमें से कुछ तो पहले एचटीएस के पदाधिकारी के रूप में भी रहे हैं।
इनका कहना था कि गैर रिश्तेदार महिलाओं और पुरुषों के बीच करीबी संपर्क धार्मिक रूप से अस्वीकार्य है और उन्होंने शरा पर बेवजह ‘जनता का ध्यान आकर्षित’ करने और सख़्त मजहबी शिक्षाओं में ‘दखल’ देने का आरोप लगाया।
मिन इदलिब (इदलिब से) नामक एक टेलीग्राम चैनल में किए गए पोस्ट में कहा गया है कि इदलिब में एचटीएस जेलों से क़ैदियों की रिहाई की मांग पर कार्रवाई करने की बजाय, एचटीएस नेता ‘युवा महिलाओं के साथ सेल्फ़ी’ लेने में बहुत व्यस्त हैं।
इस तस्वीर के ख़िलाफ़ विचार ज़ाहिर करने वाले अधिकांश रूढि़वादी शख़्सियतों ने अतीत में भी राजनीतिक और धार्मिक कारणों से शरा की आलोचना की है और इनमें ऐसे मौलवी भी शामिल हैं जिन्होंने एचटीएस छोड़ दिया है।
-अहमद नूर, जो टाइडी
- और यारा फरारा
बीबीसी की रिसर्च के अनुसार सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक ने इसराइल-गाजा युद्ध के दौरान फिलस्तीनी इलाक़ों के न्यूज आउटलेट्स की खबरों को बड़े पैमाने पर पाठकों-श्रोताओं तक पहुंचने से रोका।
फेसबुक डेटा के विश्लेषण में हमने पाया कि फिलस्तीनी इलाकों (गाजा और वेस्ट बैंक में) में मौजूद न्यूजरूम्स के ऑडियंस एंगेजमेंट में भारी गिरावट आई है।
बीबीसी ने ऐसे लीक दस्तावेज़ भी देखे हैं जो बताते हैं कि इंस्टाग्राम (फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा की और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) ने अक्टूबर 2023 के बाद फिलस्तीनी यूजर्स के कमेंट में अपना मॉडरेशन बढ़ा दिया था।
मेटा ने कहा है अगर कहीं से भी ये लगता है कि उसने जानबूझकर किन्हीं खास आवाजों को दबाया है तो ये ‘सरासर ग़लत’ है।
क्या मेटा फिलस्तीनी न्यूज़ आउटलेट्स के कंटेंट को ‘शैडो बैन’ कर रही है?
इसराइल और गाजा युद्ध शुरू होने के बाद कुछ ही बाहरी संवाददाताओं को बाहर से गाजा के फिलस्तीनी तटीय इलाकों में घुसने की इजाजत थी। रिपोर्टिंग करते वक्त उनके साथ इसराइली सेना होती है।
गाजा के अंदर से आने वाली अनसुनी आवाजों को लोगों तक सोशल मीडिया ने पहुंचाया। वहां से आने वाली सूचनाओं में जो खालीपन है उसे काफी हद तक इस मीडिया ने भरने की कोशिश की है।
इस दौरान वेस्ट बैंक इलाके से काम करने वाले पैलस्टाइन टीवी, वफा न्यूज एजेंसी और फल़स्तीनी अल-वतन इस दौरान पूरी दुनिया के लिए ख़बरों के अहम स्रोत बने रहे।
बीबीसी न्यूज़ की अरबी सेवा ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इसराइल पर हुए हमले के एक साल पहले और उसके लगभग एक साल बाद तक फ़लस्तीन स्थित 20 प्रमुख न्यूज़ आउटलेट्स के फेसबुक पेजों के एंगेजमेंट डेटा इक_ा किए हैं।
एंगेजमेंट से पता चलता है कि किसी न्यूज आउटलेट के सोशल मीडिया अकाउंट का कितना असर है और कितने लोग इसके कंटेंट देखते हैं। इसमें न्यूज आउटलेट्स के कंटेंट पर कमेंट, रिएक्शन और शेयर्स (कंटेंट को सोशल मीडिया पर साझा करना जैसे फॉरवर्ड या शेयर करने जैसी गतिविधि शामिल है)।
अब तक इस युद्ध के दौरान एंगेजमेंट बढऩे की उम्मीद थी। लेकिन डेटा बताते हैं कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इसमें 77 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
फेसबुक पर पैलस्टाइन टीवी के 58 लाख फॉलोअर्स हैं। इसके न्यूज़रूम में काम करने पत्रकारों ने हमसे जो आंकड़े साझा किया है वो बताते हैं कि उनके पोस्ट देखने वाले लोगों में 60 फ़ीसदी की कमी आई है।
चैनल में काम करने वाले पत्रकार तारिक जिया ने बताया, ‘यूज़र्स इंटरएक्शन पूरी तरह प्रतिबंधित हो चुका है। इस वजह से हमारी पोस्ट का लोगों तक पहुंचना बंद हो चुका है।’
पिछले एक साल में फिलस्तीनी पत्रकारों ने बार-बार ये डर ज़ाहिर किया है मेटा उनके ऑनलाइन कंटेंट को ‘शैडो बैन’ कर रही है। मतलब वो ये तय कर रही है कि इसे कितने लोग देखें।
इसका पता लगाने के लिए हमने येदियत अहरोनोत, इसराइल हेयोम और चैनल13 जैसे 20 इसराइली न्यूज़ आउटलेट्स के फेसबुक पेजों की समान अवधि के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन पेजों से बड़ी संख्या में युद्ध से जुड़े कंटेंट पोस्ट किए गए थे। लेकिन उनके ऑडियंस एंगेजमेंट में लगभग 37 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
हमारी रिसर्च का जवाब देते हुए मेटा ने कहा कि अक्टूबर 2023 में लिए गए ‘नीतिगत फैसलों और अस्थायी प्रोडक्ट’ के लिए बताकर इसने किसी रहस्य को उजागर नहीं किया है।
मेटा ने कहा कि उसके सामने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हमास के बीच संतुलन बिठाने की चुनौती थी। हमास पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है और मेटा की अपनी नीति के तहत भी ये ख़तरनाक संगठन है। इसलिए ये दोहरी चुनौती थी।
मेटा ने ये भी कहा कि जो पेज युद्ध के बारे में विशेष तौर पर पोस्ट करते थे उनसे एंगेजमेंट पर असर पडऩे की संभावना थी।
कंपनी के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘हम अपनी गलतियों को मानते हैं। लेकिन कहीं से भी ऐसा लगता है कि हम जानबूझकर किसी ख़ास आवाज को दबा रहे हैं तो ये बिल्कुल गलत है।’
इंस्टाग्राम से लीक हुए दस्तावेज़ों ने क्या बताया
बीबीसी ने मेटा के ऐसे पांच पूर्व और मौजूदा कर्मचारियों से बात की जिन्होंने बताया था कि उनकी कंपनी की नीतियों का अलग-अलग फ़लस्तीनी यूज़र्स पर क्या असर हुआ था।
हमने एक ऐसे एक शख़्स से बात की जिन्होंने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर कंपनी के कुछ आंतरिक दस्तावेज लीक किए थे। ये दस्तावेज़ इंस्टाग्राम से एलगोरिद्म में किए गए बदलाव से जुड़े थे। इसने इंस्टाग्राम पोस्ट पर फिलस्तीनियों की टिप्पणियों के मॉडरेशन को कठिन बना दिया था।
उन्होंने बताया, ‘हमास के हमले के एक सप्ताह के अंदर कोड इस तरह बदल दिया गया कि ये फिलस्तीनी लोगों के प्रति ज्यादा आक्रामक हो गया।’
आंतरिक मैसेज दिखाते हैं कि एक इंजीनियर ने इस आदेश को लेकर चिंता जाहिर की थी। उनकी चिंता ये थी ये फिलस्तीनी यूजर्स के खिलाफ नया पूर्वाग्रह ला सकता है।’
मेटा ने कहा कि इसने ये कदम उठाए लेकिन लेकिन ये फैसला नफरत पैदा करने वाल कंटेंट में बढ़ोतरी को रोकने के लिए था। ये कंटेंट फ़लस्तीनी इलाकों से आ रहा था।
इसने बताया कि ये नीतिगत बदलाव इसराइल-गज़़ा युद्ध की शुरुआत में किया गया था लेकिन इसे वापस ले लिया गया है। लेकिन कंपनी ने ये नहीं बताया कि ये कब हुआ।
हमास-इसराइल संघर्ष शुरू होने के बाद से गाजा में अब तक 137 पत्रकारों के मारे जाने की खबर है। हालांकि कुछ लोग अब भी खतरा मोल लेकर वहां काम कर रहे हैं।
इन ख़तरों के बावजूद उत्तरी गाजा में काम कर रहे फोटो जर्नलिस्ट उमर अल कता ने बताया, ‘कुछ चीजें तो इतनी विचलित करने वाली थी कि इन्हें प्रकाशित नहीं किया जा सकता था। जैसे मान लीजिये कि सेना (इसराइली) जनसंहार कर रही है और हम इसका वीडियो बना लें। लेकिन ये वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा शेयर नहीं होगा। ’
हालांकि उन्होंने ये कहा, ‘इन चुनौतियों, जोखिमों और कंटेंट बैन के बावजूद हमें फ़लस्तीनी कंंटेंट शेयर करना जारी रखना चाहिए।’ (bbc.com/hindi)
( इस स्टोरी के लिए रेहाब इस्माइल और नताली मरज़ोगुई ने भी रिपोर्टिंग की है।)
-डॉ. आर.के. पालीवाल
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर हमारे देश की वर्तमान राजनीति के लिए एक ऐसा तुरुप का इक्का बन गया है जिसे अपने अपने दल के ताश की गड्डी में जोडऩे के लिए अमूमन हर दल लालायित है। संसद में डॉ अम्बेडकर को लेकर जिस तरह की तीखी नोंकझोंक हाल ही में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हुई है वह इसी जद्दोजहद का नतीजा है जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। गृह मंत्री अमित शाह ने अपने तथाकथित विवादित बयान में एक बात तो सच कही है कि अंबेडकर का नाम राजनीतिक दलों ने फैशन की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
समस्या यह है कि वोट बटोरने के लिए अम्बेडकर के नाम का दुरुपयोग हाथी के दिखावटी दांत की तरह लगभग सभी दल एक दूसरे से ज्यादा करना चाहते हैं। अमित शाह के बचाव में उतरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विवाद को कांग्रेस की तरफ घुमाते हुए अम्बेडकर को कमतर दिखाने का सारा दोष कांग्रेस और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सिर मढ़ दिया। यह भी आजकल का फैशन है कि कोई सत्ता पक्ष की जरा सी आलोचना करे तो सत्ता पक्ष अपनी गलती स्वीकार कर उसे सुधारने की बजाय विपक्ष की कब्र से गड़े मुर्दे उखाडऩे लगता है। लेकिन जब कब्रगाह खोदे जाते हैं तो उसमें अपनों के गुनाहों के भूत भी सामने आते हैं। भाजपा यह भूल जाती है कि उनकी मातृ संस्थाएं हिंदू महासभा, आर एस एस और जनसंघ अम्बेडकर के हिंदू कोड बिल का किस हद तक विरोध करते थे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और नेता विपक्ष राहुल गांधी का भी यह दायित्व बनता है कि वे भी सच्चाई का सामना दृढ़ता से करें और इतिहास को सही तरह से पेश कर बताएं कि अम्बेडकर से तत्कालीन कांग्रेस के किन नेताओं से किस तरह के संबंध थे।
आज जो लोग अम्बेडकर के नाम की माला जप रहे हैं और उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का श्रेय लेने के लिए एक दूसरे पर कीचड उछाल रहे हैं वे बहुत सारे तथ्य आम जनता से छिपाकर इसलिए झूठ बोल पा रहे हैं क्योंकि आम जनता को भी डॉ अम्बेडकर के जीवन और विचारों के बारे में वही आधी अधूरी जानकारी है जो राजनीतिक दल अपने अपने स्वार्थ के कारण उन्हें परोसते हैं और जो सूचनाएं स्वार्थी तत्वों द्वारा अखबारों और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता को परोसी जा रही है।जिन्हें डॉ अम्बेडकर के बारे में पूरी सच्चाई जाननी है उनके लिए डॉ अम्बेडकर के विपुल लेखन और समय समय पर दिए असंख्य भाषणों को पढऩा जरूरी है। सार संक्षेप में कहें तो डॉ अम्बेडकर को जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बनाने और उनकी प्रतिभा की पहचान कर उन्हें संविधान निर्माण में महती भूमिका निभाने देने में महात्मा गांधी और राजकुमारी अमृत कौर का सबसे ज्यादा योगदान है। उनकी इस योजना में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हीं के अनुरोध पर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक सीट खाली कर डा अम्बेडकर को संविधान सभा में जगह दिलाई थी। यदि महात्मा गांधी के अनुरोध को सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू अनसुना कर देते तो डॉ अम्बेडकर को देश का कानून मंत्री बनने और संविधान निर्माण में ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष बनने का सौभाग्य ही नहीं मिलता और आजाद देश को उनकी सेवाओं से वंचित रहना पड़ता। जहां तक डॉ अम्बेडकर के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र का संबंध है वे हिंदू कोड बिल पास करने के लिए इंतजार नहीं करना चाहते थे और जवाहर लाल नेहरू कट्टर हिंदुत्व के विरोध को शांत करने के लिए थोड़ा समय चाहते थे। अम्बेडकर को लगा कि जवाहर लाल नेहरू हिंदू महासभा और आर एस एस आदि के जबरदस्त विरोध के सामने झुक गए हैं। इसलिए उन्होंने अपनी बात मनती नहीं देख मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। यह सब घटनाएं विस्तार से मेरी किताब ‘अम्बेडकर जीवन और विचार’ में दर्ज हैं, अधिक जानकारी के लिए अन्य ग्रंथों के साथ यह किताब भी पढ़ी जा सकती है।
-अंशुल सिंह
कांग्रेस किसी मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को घेरे और जवाब देने खुद अमित शाह आएं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक के कार्यकाल में ऐसे मौके कम ही देखने को मिले हैं।
बुधवार यानी 18 दिसंबर को ऐसा ही मौका आया, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बाबा साहेब आंबेडकर पर दिए बयान को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए।
मंगलवार को अमित शाह ने राज्यसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान लगभग एक घंटे से ज़्यादा लंबा भाषण दिया। इस भाषण के एक हिस्से पर कांग्रेस समेत विपक्षी दल संसद से लेकर सडक़ तक विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।
अमित शाह ने अपने भाषण के एक हिस्से में कहा था, ‘अभी एक फैशन हो गया है।। आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।’
राहुल गांधी ने अमित शाह के बयान पर कहा कि ये लोग संविधान और बाबा साहेब आंबेडकर की विचारधारा के खिलाफ हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमित शाह का बचाव करते हुए एक्स पर लिखा कि शाह ने आंबेडकर को अपमानित करने के काले अध्याय को एक्सपोज़ किया है।
अमित शाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कांग्रेस पर आंबेडकर को चुनाव हराने और भारत रत्न न देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
अमित शाह का कहना था कि नेहरू जी की आंबेडकर के प्रति नफरत जगजाहिर है। लेकिन असल में आंबेडकर के नेहरू और कांग्रेस से संबंध कैसे थे?
महाड़ सत्याग्रह से मिली पहचान
साल 1924 में इंग्लैंड से वापस आने के बाद आंबेडकर ने वकालत और दलितों के उत्थान के लिए काम करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने एक असोसिएशन बहिष्कृत हितकारिणी सभा की शुरुआत की थी। इसके अध्यक्ष सर चिमनलाल सीतलवाड़ थे और चेयमैन ख़ुद बीआर आंबेडकर थे।
एसोसिएशन का तात्कालिक उद्देश्य शिक्षा का प्रसार करना, आर्थिक स्थिति में सुधार करना और दलितों की समस्याओं को उठाना था।
साल 1927 में डॉ. आंबडेकर ने महाड़ सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया और इसके बाद भारत में उन्हें दलितों की आवाज के रूप में पहचान मिली।
यह आंदोलन दलितों को सार्वजनिक चावदार तालाब से पानी पीने और इस्तेमाल करने का अधिकार दिलाने के लिए किया गया था। महाड़ पश्चिम महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में एक कस्बा है। इस सत्याग्रह से डॉ. आंबेडकर के राजनीतिक करियर की शुरुआत मानी जाती है।
लेखक केशव वाघमारे बताते हैं, ‘महाड़ सत्याग्रह में मंच पर मुख्य तस्वीर महात्मा गांधी की थी। बाबा साहेब हिन्दू धर्म में एक सुधार लाना चाहते थे और छुआछूत को खत्म करना चाहते थे। इसके लिए वो चाहते थे कि हिन्दू धर्म के प्रगतिशील लोग सामने आएं और इस सामाजिक कुरीति को ख़त्म कर दें।’
केशव वाघमारे का कहना है कि आंबेडकर, गांधी और कांग्रेस के बीच ‘प्यार और नफरत’ के रिश्ते थे।
महात्मा गांधी से पहली मुलाकात
आंबेडकर अछूतों के लिए काम कर रहे थे और उस दौरान गांधी भी इस वर्ग की आवाज़ उठा रहे थे। लेकिन दोनों के काम करने के अपने तरीक़े थे।
आंबेडकर को गोलमेज सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया गया था। गांधी सालों से दलितों के लिए काम कर रहे थे और अब आंबेडकर इस विमर्श के केंद्र में आ गए थे। 14 अगस्त, 1931 को मुंबई के मणि भवन में दोनों के बीच पहली बैठक तय हुई। यह मुलाकात काफी दिलचस्प थी। आंबेडकर ने आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस की दलितों के प्रति सहानुभूति औपचारिकता भर है।
महात्मा गांधी ने आंबेडकर को शांत करने की कोशिश की और उन्हें मातृभूमि के संघर्ष में ‘एक महान देशभक्त’ बताया। आंबेडकर ने इस पर जवाब दिया, ‘गांधी जी मेरी कोई मातृभूमि नहीं है। कोई भी स्वाभिमानी अछूत इस भूमि पर गर्व नहीं कर सकता, जहाँ उसके साथ बिल्लियों और कुत्तों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है।’
दोनों के बीच इस बातचीत का जिक्र शशि थरूर की किताब ‘आंबेडकर:अ लाइफ’ में मिलता है।
गांधी-आंबेडकर के बीच तनाव और पूना पैक्ट
साल 1932 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन के बाद ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दलितों, मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों और अन्य लोगों के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की घोषणा की गई थी।
इसके तहत केंद्रीय विधानमंडल में दलितों के लिए 71 सीटें आरक्षित की गई थीं। इन निर्वाचन क्षेत्रों में दलित उम्मीदवार और केवल दलितों को ही वोट देने का अधिकार था। गांधी को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया था।
इसके खिलाफ सितंबर 1932 में गांधी ने पुणे की यरवदा जेल में अपना अनशन शुरू किया और देश में तनाव का माहौल बन गया।
आंबेडकर ने कहा था, ‘मैं चर्चा के लिए तैयार हूँ लेकिन गांधी जी को कोई नया प्रस्ताव लेकर आना चाहिए।’ 22 सितंबर को आंबेडकर गांधी से मिलने यरवदा जेल गए। आंबेडकर ने कहा कि आप हमारे साथ अन्याय कर रहे हैं।
इस पर गांधी ने कहा, ‘आप जो कह रहे हैं, मैं उससे सहमत हूँ। लेकिन आप चाहते हैं कि मैं जीवित रहूँ?’
इसके बाद पूना पैक्ट हुआ। स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्रों की जगह आरक्षित सीटों के प्रस्ताव पर सहमति बनी। डॉ आंबेडकर ने 24 सितंबर 1932 को अछूतों के लिए 147 से ज्यादा आरक्षित सीटों के साथ पूना पैक्ट के समझौते पर हस्ताक्षर किए।
पूना पैक्ट ने आंबेडकर और कांग्रेस के बीच गहरी खाई को सामने ला दिया। आंबेडकर का मानना था कि गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने दलितों के अधिकारों से समझौता किया है, जिसके कारण उन्होंने खुद को पार्टी से दूर कर लिया है।
1955 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में आंबेडकर ने कहा था, ‘मुझे आश्चर्य होता है कि पश्चिम गांधी में इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है। जहाँ तक भारत की बात है, वो देश के इतिहास का एक हिस्सा भर हैं। वो युग निर्माण करने वाले नहीं हैं।’
राजनीति में आंबेडकर और कांग्रेस
डॉ.आंबेडकर की आजादी के संघर्ष में भूमिका को लेकर आज भी सवाल उठाए जाते हैं और आलोचना की जाती है। साल 1942 से लेकर 1946 तक जब स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर था, तब आंबेडकर वायसराय की काउंसिल में श्रम मंत्री थे।
इसके बाद जुलाई, 1946 में आंबेडकर बंगाल से संविधान सभा के सदस्य बने थे। ब्रिटेन से आज़ादी मिलने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही पहली संसद के सदस्य बने थे। विभाजन के बाद आंबेडकर का निर्वाचन क्षेत्र पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चला गया। तब आंबेडकर के सामने संविधान सभा में पहुंचने की चुनौती थी।
वरिष्ठ लेखक रावसाहब कसबे बताते हैं कि बाबा साहेब दोबारा संविधान सभा में गांधी जी की इच्छा से गए थे।
रावसाहब कसबे कहते हैं, ‘कांग्रेस और बाबा साहेब के बीच मतभेद जगजाहिर थे लेकिन फिर भी गांधी चाहते थे कि आंबेडकर संविधान सभा में रहें। उन्होंने राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल को बुलाया और कहा कि मुझे हर हाल में आंबेडकर संविधान सभा में चाहिए। दोनों ने फिर बाबा साहेब को खत लिखे और फिर बाबा साहेब को मुंबई प्रांत से चुनकर भेजा गया।’
इसके बाद डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया।
हिन्दू कोड बिल और आंबेडकर का इस्तीफा
भारत को आज़ादी मिली लेकिन बहुसंख्यक हिन्दू समाज में पुरुष और महिलाओं को समान अधिकार नहीं थे।
पुरुष एक से ज़्यादा शादी कर सकते थे लेकिन विधवा महिला दोबारा शादी नहीं कर सकती थी। विधवाओं को संपत्ति से भी वंचित रखा जाता था और महिलाओं को तलाक़ का अधिकार नहीं था।
आंबेडकर इन समस्याओं से भली-भांति परिचित थे, इसलिए उन्होंने 11 अप्रैल 1947 को संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल पेश किया था। इसमें संपत्ति, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार संबंधित कानून शामिल थे।
आंबेडकर ने इस कानून को अब तक का सबसे बड़ा सामाजिक सुधार उपाय बताया था लेकिन इस बिल का जमकर विरोध हुआ। आंबेडकर के बिल के पक्ष में तर्क और नेहरू का समर्थन काम न आया और 9 अप्रैल 1948 को सेलेक्ट कमिटी के पास भेज दिया गया।
बाद में 1951 में इस बिल को फिर से संसद में पेश किया गया लेकिन फिर से विरोध हुआ। संसद में जनसंघ और कांग्रेस का एक हिंदूवादी धड़ा इसका विरोध कर रहा था। विरोध करने वालों के मुख्य रूप से दो तर्क थे।
पहला- संसद के सदस्य जनता के चुने हुए नहीं हैं, इसलिए इतने बड़े विधेयक को पास करने का नैतिक अधिकार नहीं है। दूसरा- इन कानून को सभी पर लागू होना चाहिए यानी समान नागरिक आचार संहिता।
आंबेडकर कहते थे, ‘भारतीय विधानमंडल द्वारा अतीत में पारित या भविष्य में पारित होने वाले किसी भी कानून की तुलना इसके (हिंदू कोड) महत्व के संदर्भ में नहीं की जा सकती है। समुदायों के बीच और लिंग के बीच असमानता हिंदू समाज की आत्मा है। इसे अछूता छोडक़र आर्थिक समस्याओं से संबंधित क़ानून पारित करना हमारे संविधान का मज़ाक बनाना और गोबर के ढेर पर महल बनाना है।’
लेकिन यह बिल आंबेडकर के कानून मंत्री रहते हुए पास नहीं हो सका और आंबेडकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
पहला आम चुनाव और आंबेडकर की हार
भारत की आजादी के चार साल बाद पहला लोकसभा चुनाव हुआ।
यह प्रक्रिया 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक लगभग चार महीने तक चली। पहले चुनाव में 489 लोकसभा सीटों के लिए 50 से अधिक पार्टियों के 1500 से अधिक उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा।
इनमें से लगभग 100 निर्वाचन क्षेत्र द्वि-सदस्यीय थे। यानी एक ही निर्वाचन क्षेत्र से दो सांसद- सामान्य और आरक्षित वर्ग से चुने जाते थे।
बाबा साहेब आंबेडकर तत्कालीन बॉम्बे प्रांत सेअपनी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे थे। उनका निर्वाचन क्षेत्र उत्तरी मुंबई था और यह दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था।
कांग्रेस ने आंबेडकर के खिलाफ नारायण काजरोलकर को उतारा था। चुनाव हुए और नतीजों ने सारे देश को चौंका दिया।
काजरोलकर को एक लाख 38 हजार 137 वोट मिले थे जबकि बाबा साहेब आंबेडकर को एक लाख 23 हजार 576 वोट मिले थे। कांग्रेस के काजरोलकर ने आंबेडकर को हराया, वो भी पूरे 14 हज़ार 561 वोटों से।
तब से लगातार यह आरोप लगता रहा है कि कांग्रेस ने जानबूझकर बाबा साहब को हराया।
क्या कांग्रेस ने जानबूझकर ऐसा किया था? इसे समझने के लिए उस समय की घटनाओं को देखना पड़ेगा।
एस.के. पाटिल उस समय मुंबई कांग्रेस के प्रमुख हुआ करते थे।
मुंबई में पाटिल का दबदबा था और चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने कहा था, ‘अगर आंबेडकर आरक्षित सीट से चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं देगी।’
फिर उन्होंने उम्मीदवार क्यों दिया? आचार्य अत्रे अपनी मराठी भाषा में की किताब ‘कन्हेचें पाणी’ में लिखते हैं, ‘आंबेडकर की पार्टी और समाजवादियों का गठंबधन हुआ तो एस। के। पाटिल इससे नाराज हो गए और उन्होंने नारायण काजरोलकर को बतौर कांग्रेस प्रत्याशी आंबेडकर के खिलाफ उतार दिया था।’
हमें यहां ध्यान देना चाहिए कि एस.के.पाटिल समाजवादियों के कट्टर विरोधी थे। समाजवादियों और कम्युनिस्टों के प्रति उनका ग़ुस्सा जगजाहिर था।
हालांकि पाटिल ने जब घोषणा की थी तब आंबेडकर नेहरू कैबिनेट में मंत्री थे।
एक वर्ग यह भी मानता है कि कम्युनिस्टों की वजह से आंबेडकर चुनाव हारे थे। उनका तर्क होता है कि कम्युनिस्टों ने उस समय आंबेडकर के खिलाफ वोट करने की अपील की थी और काजरोलकर को इसका फायदा हुआ था।
आंबेडकर इस हार से इतने सदमे में थे कि पहले से ही कई बीमारियों से जूझ रहे आंबेडकर का स्वास्थ्य भी इस दौरान खऱाब हो गया। बाद में आंबेडकर बम्बई प्रांत से राज्यसभा में चले गए लेकिन वे लोकसभा में जाना चाहते थे।
इसके दो साल बाद ही भंडारा में उपचुनाव हुए तो आंबेडकर वहां खड़े हुए। हालांकि, कांग्रेस उम्मीदवार ने उन्हें वहां भी हरा दिया।
यह आंबेडकर का आखिरी चुनाव था क्योंकि दो साल बाद यानी 1956 में उनकी मृत्यु हो गई। (bbc.com/hindi)
-दिलनवाज पाशा
‘अभी एक फ़ैशन हो गया है...आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर, आंबेडकर। इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।’
संसद में केद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संविधान पर चर्चा के दौरान एक लंबे भाषण के इस छोटे से अंश को लेकर ऐसा हंगामा हुआ कि संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
इस बयान में आंबेडकर का अपमान देख रहे हमलावर विपक्ष को जवाब देने के लिए अमित शाह ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्ऱेंस की।
अमित शाह ने कहा, ‘जिन्होंने जीवन भर बाबा साहेब का अपमान किया, उनके सिद्धांतों को दरकिनार किया, सत्ता में रहते हुए बाबा साहेब को भारत रत्न नहीं मिलने दिया, आरक्षण के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाईं, वे लोग आज बाबा साहेब के नाम पर भ्रांति फैलाना चाहते हैं।’
यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर बताया कि उनकी सरकार ने भारत के संविधान निर्माता भीमराव आंबेडकर के सम्मान में क्या-क्या काम किए हैं।
लेकिन इस सबके बावजूद हंगामा नहीं रुका। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने अमित शाह पर आंबेडकर का अपमान करने का आरोप लगाते हुए उनका इस्तीफा मांग लिया।
खडग़े ने कहा, ‘बाबा साहेब का अपमान किया है, संविधान का अपमान किया है, उनकी आरएसएस की विचारधारा दर्शाती है कि वो स्वयं बाबा साहेब के संविधान का सम्मान नहीं करना चाहते हैं। समूचा विपक्ष अमित शाह का इस्तीफा मांगता है।’ वहीं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने बयान जारी कर कहा कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों भीमराव आंबेडकर के नाम पर सिर्फ राजनीति कर रही हैं।
बीजेपी को क्यों देनी पड़ी सफ़ाई
अमित शाह के इस बयान को आंबेडकर का अपमान क्यों माना जा रहा है और इससे बीजेपी की दलित राजनीति कैसे प्रभावित हो सकती है?
इसका जवाब देते हुए दलित शोधकर्ता और पंजाब की देशभगत यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ। हवलदार भारती कहते हैं, ‘अगर ईश्वर शोषण से मुक्ति देने वाला है तो डॉ. भीमराव आंबेडकर जाति व्यवस्था में बँटे भारतीय समाज के उन करोड़ों लोगों के ईश्वर हैं जिन्होंने सदियों तक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक भेदभाव झेला है। भीमराव आंबेडकर ने संविधान में बराबरी का अधिकार देकर अनुसूचित और पिछड़ी जातियों को शोषण से मुक्ति दी है।’
डॉ. हवलदार भारती कहते हैं, ‘यही वजह है कि आंबेडकर की विचारधारा से जुड़े और दलित राजनीति से जुड़े लोग अमित शाह के इस बयान को आंबेडकर के अपमान के रूप में देख रहे हैं।’ लेकिन भारती ये भी कहते हैं कि इस समय सभी राजनीतिक पार्टियों में आंबेडकर को अपनाने की होड़ मची है और राजनीतिक दल आंबेडकर के विचारों को लागू करने की बजाय उनकी पहचान का इस्तेमाल कर दलित मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं।
आबेंडकर पर अमित शाह के बयान के बाद से बीजेपी बचाव की मुद्रा में हैं।यही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने हाल के सालों में दलित और पिछड़े वोटरों को अपनी तरफ खींचने के प्रयास किए हैं। इसके कई कारण हैं।
ब्राह्मणों और बनिया की पार्टी की पहचान
भारतीय जनता पार्टी के बारे में लंबे समय तक कहा जाता रहा कि यह ब्राह्मणों और बनिया की पार्टी है। लेकिन बीजेपी ने पिछले एक दशक में इस पहचान से आगे जाकर हिन्दू की समाज की दूसरी जातियों को भी जोडऩे में कामयाबी हासिल की है।
बीजेपी की कोशिश रहती है कि जातीय पहचान की राजनीति हावी न हो और बहुसंख्यक हिन्दुओं की धार्मिक पहचान की राजनीति मजबूत हो। राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ मुख्य तौर पर महाराष्ट्र की ऊंची जातियों, ख़ासकर ब्राह्मणों का संगठन था और शुरुआत में अनुसूचित जातियां इसकी तरफ़ आकर्षित नहीं होती थीं।’
‘आरएसएस में ना उस समय ब्राह्मणवाद की आलोचना की गुंजाइश थी और ना अब है। आरएसएस की विचारधारा समता की नहीं बल्कि समरसता की है। आज स्थिति ये है कि बीजेपी और आरएसएस को चुनाव की राजनीति करनी है तो उसके लिए चुनावी हिंदू एकता बनानी है, जो दलित और ओबीसी समुदाय के मत हासिल किए बिना संभव नहीं है।’
संघ ने इसके प्रयास बीजेपी की स्थापना से पहले ही कर दिए थे। 1974 में जब बालासाहेब देवरस संघ के सरसंघचालक थे, संघ ने अपना रवैया बदला। आबेंडकर,पेरियार और महात्मा फुले जैसे महापुरुषों के नामों को अपनी सुबह की प्रार्थना में जोड़ा। इसके अलावा दलितों और आदिवासियों को अपनी तरफ आकर्षित करने के कार्यक्रम चलाएं।
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर परवेश चौधरी तर्क देते हैं कि संघ ने बीजेपी के गठन से पहले ही आबेंडकर को अपना लिया था
दलितों को बीजेपी से जोडऩे की कोशिश
प्रोफेसर परवेश चौधरी कहते हैं, ‘बीजेपी आज से नहीं बल्कि जनसंघ के समय से या उससे पहले से भी दलितों को बढ़ावा देती रही है। बाबा साहेब आंबेडकर के चुनावी एजेंट महाराष्ट्र के प्रचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी थे, बाबा साहेब के प्रति संघ में पहले से ही लगाव रहा है।’
‘1970 के दशक में संघ ने महाराष्ट्र में समरसता गोष्ठी शुरू की, जो बीजेपी के गठन से पहले ही हो गया था। मुंबई में जहां से बीजेपी की शुरुआत हुई, उस जगह का नाम समता नगर रखा गया। दत्ताराव सिंदे ने यहां पहली बुनियाद डाली वो दलित पेंथर मूवमेंट के नेता थे और बाद में कांग्रेस में और फिर बीजेपी में गए। सूरजभान को बीजेपी ने ही राज्यपाल बनाया था। बंगारू लक्ष्मण को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था।’
लेकिन इसके बावजूद सवाल उठता है कि बीजेपी ने दलितों को मुख्यधारा में लाने की ठोस राजनीति की या सांकेतिक राजनीति?
अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘समता और समरसता दोनों अलग चीजें हैं। बीजेपी समरसता की बात तो करती है लेकिन समता की नहीं। समता आंबेडकर का मूल विचार है। चुनावी राजनीति में बहुत से हथकंडे होते हैं, विचारों को अपनाए बिना भी वोट हासिल किए जाते हैं। बीजेपी यही प्रयास कर रही है।’
दुबे कहते हैं, ‘अमित शाह के मुंह से भले ही ये निकल गया हो लेकिन इस पर बहुत हैरान नहीं होना चाहिए। उन्होंने वही बोला है, जो वह महसूस करते होंगे। नरेंद्र मोदी की सरकार ने भीमा कोरेगांव कांड के बाद देशभर के आंबेडकरवादियों का दमन किया। आंबेडकर की विचारधारा नहीं, बीजेपी ने उनकी तस्वीर को बढ़ावा दिया है।’
गैर जाटव जातियों को बढ़ावा
दलितों की सबसे बड़ी जाति जाटव पारंपरिक रूप से बीजेपी से दूर रही है। लेकिन बीजेपी ने गैर जाटव जातियों को अपने साथ जोडऩे की कोशिश की।
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और आबेंडकर पर शोध करने वाले विवेक कुमार कहते हैं, ‘भले ही जाटव बीजेपी से दूर रहे हैं लेकिन बीजेपी शुरुआत से ही गैर जाटव दलित जातियों को अपनी तरफ़ खींचने के प्रयास करती रही है।’
प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, ‘बीजेपी ने वाल्मीकि रचित रामायण को बढ़ावा दिया और वाल्मीकि वर्ग को अपनी तरफ़ खींचा। यूपी में पासी समाज, जिसे परशुराम से जोड़ा जाता है, उसे बीजेपी ने अपनी तरफ आकर्षित किया। बीजेपी ने खटीक समाज और धोबी समाज को भी अपनी तरफ खींचा है। यानी गैर जाटव दलित पहले से ही बीजेपी के साथ रहे हैं। अखिल भारतीय स्तर पर देखा जाए तो महार नेता रामदास अठावले भी बीजेपी के साथ हैं।’
लेकिन ऐसा नहीं है कि बीजेपी ने जाटव समाज को भी अपनी तरफ खींचने की कोशिश ना की हो।
प्रोफेसर दुबे कहते हैं, ‘बीजेपी ने दलितों को ये आश्वासन दिया है कि आप हमें वोट दीजिये, हम राजनीति में आपको बराबरी की जगह देंगे। दलितों में सबसे बड़ी जाति जाटव है। बहुजन समाज पार्टी ने खासकर अपने साथ जाटवों को जोड़ा।’
‘बीएसपी के उभार ने जाटव जाति को राजनीतिक जगह दी। इसी समय बीजेपी ने ये भांपा कि बाकी अनुसूचित जातियों को राजनीति में जगह नहीं मिल रही है और बीजेपी ने उन्हें जगह देने की कोशिश की और इसका नतीजा ये हुआ कि जाटवों से अलग बाकी दलित जातियां बीजेपी के साथ होती गईं।’
दुबे कहते हैं, ‘महाराष्ट्र में महार भले ही बीजेपी के साथ ज़्यादा ना हों लेकिन गैर-महार दलित जातियां महाराष्ट्र में बीजेपी के साथ हैं।’
अभय दुबे कहते हैं, ‘बीजेपी ने दलितों में जातियों के बँटवारे का फायदा उठाकर छोटी दलित जातियों को अपनी तरफ खींचा। पार्टी अब जाटवों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रही है और उसके लिए आंबेडकर को अपनाना और उनके विचारों को बढ़ावा देना जरूरी है। ’
आंबेडकर को अपनाने की राजनीतिक स्पर्धा
इस समय भारतीय राजनीति में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को अपनाने की एक स्पर्धा नजऱ आती है। कांग्रेस लगातार संविधान, जातिगत जनगणना और आरक्षण की बात कर रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष दलित नेता मल्लिकार्जुन खडग़े हैं।
प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, ‘कांग्रेस दलित राजनीति के मामले में बीजेपी से आगे दिखाई दे रही है और लगातार जातीय अस्मिता को बढ़ावा दे रही है।’
हिंदुत्व की राजनीति कर रही बीजेपी के लिए जातीय अस्मिता का सवाल मुश्किल पैदा कर सकता है।
विश्लेषक मानते हैं कि हिंदुत्व के जिस मॉडल को बीजेपी बढ़ावा दे रही है, उसमें जातीय अस्मिता के सवाल की नहीं है।
प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, ‘बीजेपी नहीं चाहेगी की जातीय अस्मिता का सवाल उभरे। कांग्रेस ने लगातार जातीय अस्मिता को बढ़ावा दिया है और अब बीजेपी इसका जवाब देने की जरूरत महसूस कर रही है। आंबेडकर के इर्द-गिर्द विमर्श पैदा कर बीजेपी यही कोशिश कर रही है।’
बीजेपी ने आंबेडकर के पंचतीर्थ की स्थापन की। लंदन में जाकर आंबेडकर का स्मारक बनाया। संविधान दिवस बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से ही बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है।
प्रोफेसर परवेश चौधरी कहते हैं, ‘बीजेपी ने बाबा साहेब आंबेडकर से जुड़े सभी स्थानों को संरक्षित किया और तीर्थ के रूप में विकसित किया। उनके व्यक्तित्व और विचार को बढ़ाने के लिए बाबा साहेब आंबेडकर सेंटर स्थापित किया।’
‘राष्ट्र निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर किताब के लेखक डॉ. परवेश चौधरी कहते हैं, ‘बाबा साहेब आंबेडकर सिर्फ दलितों के नेता नहीं है बल्कि समूचे भारत और विश्व के नेता हैं। बीजेपी ने इस विचार को बढ़ावा दिया है। कांग्रेस ने आंबेडकर को दलित नेता के रूप में छवि गढ़ी लेकिन बीजेपी उन्हें वैश्विक स्तर पर ला रही है। उनके हर पक्ष को बीजेपी ने बढ़ावा दिया है।’
कमजोर होती आत्मनिर्भर दलित राजनीति
अपने दम पर राजनीतिक सत्ता तक पहुंचती रहीं दलित पार्टियां आज हाशिये हैं। बहुजन समाज पार्टी इसका उदाहरण है, जो आज अपने दम पर सांसद नहीं भेज पा रही है।
प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं, ‘वर्तमान समय में बाबा साहेब आंबेडकर की जो स्वीकार्यता आज सभी दलों में है, उसकी वजह एक ये भी है कि आज आत्मनिर्भर दलित राजनीति कमज़ोर हुई है। यूपी में बीएसपी, बिहार में लोक जन शक्ति पार्टी या फिर महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर आत्मनिर्भर दलित राजनीति को थामे हुए थे लेकिन वर्तमान समय में ये दलित राजनीति कमजोर हुई है।’
उत्तर भारत हो, मध्य भारत हो या फिर दक्षिण भारत हो, आत्मनिर्भर दलित राजनीति से आने वाले सांसदों-विधायकों की संख्या कम हुई है।
ऐसे में राजनीतिक दलों को लग रहा है कि दलित राजनीति की ज़मीन खाली है।
प्रोफ़ेसर विवेक कुमार कहते हैं, ‘अब कांग्रेस दलित राजनीति का एजेंडा चला रही है। एक समय बीएसपी कहती थी कि संविधान के सम्मान में, बीएसपी मैदान में। आज कांग्रेस और इंडिया गठबंधन कह रहा है कि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी। यही वजह है कि बीजेपी भी दलित राजनीति को लेकर आक्रामक हुई है और दलितों को अपनी तरफ आकर्षित करने के प्रयास कर रही है।’
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में दलितों की आबादी करीब 16.6 प्रतिशत है लेकिन दलित संगठनों का मानना है कि भारत में दलितों की वास्तविक आबादी 20 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है। लोकसभा में 84 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं।
हालांकि, भारत में जातिगत जनगणना नहीं हुई है और कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं।
विश्लेषक मानते हैं कि राजनीतिक सत्ता के लिए दलितों को साथ लेकर चलना पार्टियों की राजनीतिक मजबूरी है।
आरक्षण, जातिगत जनगणना और बराबर हिस्सेदारी, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर दलितों में अब जागरूकता बढ़ी है।
भारतीय जनता पार्टी ने आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान भी किया है, जिसे दलित संगठन और पिछड़ों के लिए तय आरक्षण में सेंध मानते हैं।
प्रोफेसर दुबे कहते हैं, ‘अब धीरे-धीरे फिर से दलितों और पिछड़ा वर्ग के लोगों को लगने लगा है कि बीजेपी मुख्य तौर पर ब्राह्मण-बनिया पार्टी ही है। बीजेपी को ये आशंका है कि अगर दलित और पिछड़ी जातियां उससे अलग हुईं तो उसे राजनीतिक नुकसान हो सकते हैं। आज हर पार्टी ये जानती है कि दलितों का वोट हासिल किए बिना सत्ता तक नहीं पहुँचा जा सकता है। यही वजह है कि बीजेपी दलितों और पिछड़ों को लेकर अति संवेदनशील दिख रही है। सवाल यही है कि यह संवेदनशीलता क्या सिफऱ् वोट हासिल करने तक ही सीमित है या इसका मकसद दलितों का वास्तविक उभार भी है।’
क्या नुकसान दे सकता है अमित शाह का बयान?
अमित शाह के बयान पर राजनीतिक शोरगुल के बीच ये सवाल भी उठा है कि क्या ये बयान बीजेपी को राजनीतिक नुकसान पहुँचा सकता है?
विश्लेषक मानते हैं कि इसका कोई बड़ा राजनीतिक नुक़सान होगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता है।
अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘आंबेडकरवाद और दलित समाज एक दूसरे के लिए हैं लेकिन व्यवहारिक रूप से अगर देखा जाए तो आंबेडकरवाद पर चलने वाले दलितों की संख्या बहुत कम है। ये दलित आबादी का एक छोटा हिस्सा हैं। ऐसे में अमित शाह के इस बयान का व्यापक दलित आबादी पर कुछ खास असर होगा, इसकी संभावना कम ही है। आबंडेकर के प्रति श्रद्धा सभी दलितों में है लेकिन उनके नाम पर वोट कितना प्रभावित होते हैं, ये देखने की बात होगी। स्वयं आंबेडकर को अपने जीवन में राजनीतिक सफलता नहीं मिली थी।’
अभय दुबे कहते हैं, ‘कुछ दिनों के राजनीतिक शोरगुल से ये मुद्दा नहीं बनेगा। आंबेडकर के विचारों को व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने और इस पर बीजेपी को घेरने के लिए और ज़मीनी प्रयास करने होंगे।’ (bbc.com/hindi)
18 दिसंबर को जयंती पर विशेष
-घना राम साहू
भारत ही नहीं दुनिया के सभी समाजों में संस्कृति का मूल्यांकन केवल राजनैतिक सत्ता के हस्तांतरण प्रक्रिया से नहीं वरन सामाजिक मूल्य, आर्थिक व्यवस्था और आध्यात्मिक जागरण से होता है। भारतीय महाद्वीप प्राचीन काल से आध्यात्मिक जागरण का केंद्र रहा है जहां विभिन्न प्रकार के उपासना पद्धतियों का उद्भव एवं विकास हुआ। इन सभी पद्धतियों को मुख्यतः 2 समूह में क्रमशः सगुण-साकार, सगुण-निराकार, निर्गुण-साकार एवं निर्गुण-निराकार में वर्गीकृत किया जाता है। इस वर्गीकरण को अवतारवाद और विकासवाद भी कह सकते हैं। कुछ विद्वान विकासवाद को उतारवाद भी कहते हैं। कपिल, कणाद, महावीर, बुद्ध, नानक, कबीर एवं गुरु घासीदास निर्गुण-साकार एवं निर्गुण-निराकार के महात्मा थे जिनमें सूक्ष्म भेद रहा है।
संत कबीर ने मनुष्य जीवन में पुरुषार्थ के लिए "प्रवृति और निवृति के मध्य बिंदु याने स्वस्थ रहनी के साथ गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ प्रतिपादित किया था"। अध्यात्म के इसी मार्ग को परिमार्जित स्वरूप में गुरु घासीदास ने आंदोलन का रूप दिया था। यहां आंदोलन का भावार्थ राजनीतिक कार्यों के लिए किए जाने वाले धरना, जुलूस, प्रदर्शन, हड़ताल से नहीं वरन मनुष्य के अन्तश्चेतना से है जो मस्तिष्क से संचालित होता है। पूर्व के विद्वान मनुष्य के जीवन के क्रियाकलापों को मस्तिष्क द्वारा संचालित मन, वृति, बुद्धि और अहंकार की प्रतिक्रिया मानते थे लेकिन आधुनिक विद्वान इसमें चिति को भी जोड़ते हैं माने मनुष्य का जीवन मन, वृति, चिति, बुद्धि और अहंकार से व्यवस्थित होता है और इसका संपादन मानव मस्तिष्क ही करता है।
गुरु घासीदास का जन्म उस दौर में हुआ था जब छत्तीसगढ़ का समाज जात-पात और ऊंच-नीच में जकड़ रहा था तथा आर्थिक शोषण चरम की ओर था। गुरु के संदेश का प्रभाव कुछ जाति विशेष तक सीमित न रहकर सभी जातियों पर पड़ा और मानवीय संवेदना से ओतप्रोत बौद्धिक वर्ग को नया नेतृत्व मिल गया। सभी जातियों के कुछ लोग "सतनाम पंथ" के अनुयाई बने। गुरु घासीदास के जन्म के समय की कुछ घटनाएं समाजशास्त्रीय विश्लेषण योग्य हैं। बालक घासीदास मंहगूदास एवं माता अमरौतिन के 5वें संतान थे। माता आयु की अधिकता के कारण प्रसव पीड़ा को सहन न कर सकी और उसके शरीर से दूध नहीं उतरा तथा कुछ दिनों में मृत्यु हो गई। बालक घासीदास भूख से छटपटाने लगे तब करुणा साहू नामक नारी ने उसे गाय का दूध पिलाकर पालन-पोषण किया। इससे संबंधित कुछ अन्य लोककथाएं भी हैं। करुणा साहू के वंशी नामक पुत्र भी था जो बालक घासीदास के बाल सखा हुआ। कहा जाता है कि गुरु घासीदास के आध्यात्मिक जागरण आंदोलन में बड़ी संख्या में साहू, यादव, मरार, लोहार सहित लगभग 75 जातियों के लोग जुड़े थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार "गुरु घासीदास सामाजिक समरसता के अग्रदूत थे और उन्होंने अनेक जातियों को एकरस बना दिया था"।
गुरु घासीदास जयंती पर्व के पावन बेला में उनके श्री चरणों को नमन करते हुए गौरवशाली छत्तीसगढ़ के महान संत के अनुयायियों को शुभकामनाएं देता हूं।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ या ‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़ा विधेयक सरकार लोकसभा में पेश कर सकती है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल संविधान का 129वां संशोधन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक को सदन में पेश करेंगे।
12 दिसंबर को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी।
अब लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की सोच को आगे बढ़ाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।
बता दें कि संविधान संशोधन विधेयक पास करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी, जबकि दूसरे विधेयक को सामान्य बहुमत से ही पास किया जा सकता है।
इस लेख में जानते हैं कि अब तक ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर क्या-क्या हुआ है और इसे लेकर क्या विवाद रहे हैं।
एक देश एक चुनाव से होगा चुनाव सुधार?
केंद्र सरकार लंबे समय से यह दावा करती आ रही है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है।
इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए, सितंबर 2023 में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की संभावनाएं तलाशने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।
इस समिति ने मार्च 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।
समिति में शामिल प्रमुख सदस्यों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, कांग्रेस के पूर्व नेता ग़ुलाम नबी आजाद, 15वें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष कश्यप, वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और चीफ विजिलेंस कमिश्नर संजय कोठारी थे। इसके अलावा, विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में कानून राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल और डॉ. नितेन चंद्र भी समिति का हिस्सा थे।
191 दिनों की रिसर्च के बाद इस समिति ने 18,626 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी। इसके बाद 12 दिसंबर को ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अपनी मंजूरी दे दी है, जो इसे कानून बनाने की दिशा में कदम है।
सिफारिशें क्या है?
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली इस समिति का कहना है कि सभी पक्षों, जानकारों और शोधकर्ताओं से बातचीत के बाद ये रिपोर्ट तैयार की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 47 राजनीतिक दलों ने अपने विचार समिति के साथ साझा किए, जिनमें से 32 दल ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थन में थे।
रिपोर्ट में कहा गया, ‘15 दलों को छोडक़र बाकी 32 दलों ने साथ-साथ चुनाव कराने का समर्थन किया और कहा कि ये तरीका संसाधनों की बचत, सामाजिक तालमेल बनाए रखने और आर्थिक विकास को तेजी देने में मदद करेगा।’
रु 1951 से 1967 तक एक साथ चुनाव हुए थे: उस वक्त लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाते थे।
रु 1999 में विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट : इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि हर पांच साल में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं।
रु 2015 में संसदीय समिति की 79वीं रिपोर्ट : इस रिपोर्ट में चुनाव एक साथ कराने के लिए इसे दो चरणों में करने का तरीका बताया गया।
रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति: इस समिति ने राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों सहित कई लोगों से चर्चा और सुझाव लिए।
चुनावों पर व्यापक समर्थन: बातचीत और फीडबैक से यह पता चला कि देश में एक साथ चुनाव कराने को लेकर काफी समर्थन है।
समिति की तरफ से दिए गए सुझाव
दो चरणों में लागू करना: चुनाव कराने की योजना दो चरणों में लागू हो।
पहला चरण: लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं।
दूसरा चरण: आम चुनाव के 100 दिनों के भीतर पंचायत और नगर पालिका जैसे स्थानीय चुनाव कराए जाएं।
समान मतदाता सूची: सभी चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची का इस्तेमाल हो।
विस्तृत चर्चा : इस मुद्दे पर देशभर में खुलकर चर्चा हो।
समूह का गठन: चुनाव प्रणाली में बदलाव को लागू करने के लिए एक खास टीम बनाई जाए।
देश में कब-कब हुए एक साथ चुनाव?
आजादी के बाद भारत में पहली बार 1951-52 में आम चुनाव हुए थे। उस वक्त लोकसभा चुनाव के साथ-साथ 22 राज्यों की विधानसभा के चुनाव भी कराए गए थे। ये पूरी प्रक्रिया करीब 6 महीने तक चली थी।
पहले आम चुनाव में 489 लोकसभा सीटों के लिए 17 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाला था, जबकि आज भारत में वोटरों की संख्या लगभग 100 करोड़ हो चुकी है।
रु1957, 1962 और 1967 के चुनावों में भी लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे।
हालांकि, उस दौरान भी कुछ राज्यों में अलग से चुनाव कराए गए थे, जैसे 1955 में आंध्र राष्ट्रम (जो बाद में आंध्र प्रदेश बना), 1960-65 में केरल और 1961 में ओडिशा में विधानसभा चुनाव अलग से हुए थे।
रु1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभाएं जल्दी भंग हो गईं और वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।
इसके अलावा, 1972 में लोकसभा चुनाव समय से पहले कराए गए, जिससे लोकसभा और विधानसभा चुनावों का चक्र अलग हो गया।
रु1983 में भारतीय चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार को दिया था। हालांकि, यह प्रस्ताव तब लागू नहीं हो पाया।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर पक्ष-विपक्ष
केंद्र सरकार का दावा है कि ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ चुनाव सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।
सरकार का मानना है कि इससे चुनावी खर्च कम होगा, विकास कार्यों में तेज़ी आएगी और सरकारी कर्मचारियों को बार-बार चुनावी ड्यूटी से छुटकारा मिलेगा।
हालांकि, विपक्षी पार्टियां इसमें कई खामियां गिना रही हैं। उनका कहना है कि ये संविधान के संघीय ढांचे के खिलाफ है।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के समर्थन में सबसे बड़ा तर्क चुनावी खर्च को बताया जाता है। लेकिन भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी इससे सहमत नहीं हैं।
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘भारत में चुनाव कराने में करीब चार हज़ार करोड़ का खर्च होता है, जो बहुत बड़ा नहीं है। इसके अलावा, राजनीतिक दलों के करीब 60 हजार करोड़ के खर्च की बात है, तो यह अच्छा है, क्योंकि इससे नेताओं और राजनीतिक दलों के पैसे गरीबों तक पहुंचते हैं।’
एसवाई कुरैशी का मानना है कि सरकार को चुनावी खर्च घटाने के लिए दूसरे ठोस कदम उठाने चाहिए, जो वास्तव में असर डालें।
एसवाई क़ुरैशी के अनुसार, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी समिति को 47 राजनीतिक दलों ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी। इनमें से 15 दलों ने इसे लोकतंत्र और संविधान के संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ बताया था।
इसके अलावा, कई दलों ने सवाल उठाया है कि यह प्रणाली छोटे दलों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है और लोकतंत्र की बहुलता को नुकसान पहुंचा सकती है। (bbc.com/hindi)
-कैरोलिन हॉवली
दमिश्क में ईरानी दूतावास के फर्श पर टूटे शीशे और पैरों तले रौंदे हुए झंडों के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के पोस्टर लगे हुए हैं। इनमें लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन के पूर्व नेता हसन नसरल्लाह की फटी हुई तस्वीरें भी हैं।
हसन नसरल्लाह सितंबर में बेरूत में इसराइली हवाई हमले में मारे गए थे।
दूतावास के बाहर लगी फिरोजी रंग की टाइलें अब भी चमक रही हैं लेकिन ईरान के बेहद प्रभावशाली पूर्व सैन्य रिवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर कासिम सोलेमानी के एक बड़े-से बैनर को भी नष्ट किया गया है।
कासिम सोलेमानी को डोनाल्ड ट्रम्प के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, उनके आदेश पर मार दिया गया था।
ये सभी चीजें याद दिलाती हैं कि ईरान ने हाल के वर्षों में जो मात खाई है उसकी परिणति रविवार को उसके प्रमुख सहयोगी, सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद के रूस चले जाने के रूप में हुई है।
ईरान अपने घावों को सहला रहा है, साथ ही डोनाल्ड ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति पद बैठने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में क्या वो एक बार फिर पश्चिम के साथ वार्ताएं शुरू करना चाहेगा? क्या इस सारे घटनाक्रम ने ईरान के तंत्र को कमज़ोर कर दिया है?
असद की सत्ता खत्म होने के बाद दिए गए अपने पहले भाषण में ईरान के 85 वर्षीय सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने दावा किया, ‘ईरान मजबूत और शक्तिशाली है - और अब ये और भी मजबूत हो जाएगा।’
साल 1989 के बाद से देश पर राज करने वाले ख़ामेनेई इस वक़्त अपने उत्तराधिकार की चुनौतियों से भी दो चार हैं।
अपने भाषण में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मध्य पूर्व में ईरान के नेतृत्व वाले गठबंधन के ‘प्रतिरोध का दायरा’ और भी मज़बूत होगा। ईरान के इस गठबंधन में हमास, हिज़्बुल्लाह, यमन के हूथी विद्रोही और इराक़ी शिया मिलिशिया शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘आप जितना अधिक दबाव डालेंगे, प्रतिरोध उतना ही जोरदार होगा। आप जितना ज़ुल्म करेंगे, ये उतना ही अधिक मजबूत होता जाएगा।’
लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को इसराइल में हमास के नरसंहार का ईरान ने स्वागत किया था। लेकिन ताज़ा बदलावों के बाद तेहरान की सत्ता हिली हुई लगती है।
अपने दुश्मनों के खिलाफ इसराइल की जवाबी कार्रवाई ने मध्य पूर्व को बहुत हद तक बदला दिया है। और इसकी वजह से ईरान काफी हद तक बैकफुट पर है।
पूर्व अमेरिकी राजनयिक और उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेम्स जेफरी अब विल्सन सेंटर थिंक-टैंक में काम करते हैं।
उनका कहता है, ‘सभी मोहरे एक के बाद एक गिर रहे हैं। ईरानी प्रतिरोध की धुरी को इसराइल ने तोड़ दिया है। सीरिया की घटनाओं ने तो इसे नष्ट ही कर दिया है। ईरान के पास यमन में हूथी विद्रोहियों के अलावा इस क्षेत्र में कोई वास्तविक प्रतिनिधि नहीं बचा है।’
ईरान अभी भी पड़ोसी देश इराक़ में शक्तिशाली मिलिशिया को पूरा समर्थन देता है। लेकिन जेफरी के अनुसार, ‘यह इस इलाके में काफी प्रभाव रखने वाली एक शक्ति का अभूतपूर्व पतन है।’
सीरिया के अपदस्थ राष्ट्रपति बशर अल-असद को आखिरी बार सार्वजनिक रूप से एक दिसंबर को ईरानी विदेश मंत्री के साथ एक बैठक में देखा गया था। उस वक्त असद ने सीरिया की राजधानी की ओर बढ़ रहे विद्रोहियों को ‘कुचलने’ की कसम खाई थी।
सीरिया में ईरान के राजदूत होसैन अकबरी ने असद को ‘प्रतिरोध की धुरी में सबसे आगे’ खड़ा बताया था। इसके बावजूद जब असद का अचानक पतन हुआ तो ईरान उसकी हिमायत में लडऩे के लिए असमर्थ और अनिच्छुक दिखा।
कुछ ही दिनों के भीतर ‘प्रतिरोध की धुरी’ का एकमात्र देश ईरान के हाथ से फिसल गया।
ईरान ने कैसे बनाया था अपना नेटवर्क
ईरान ने इस क्षेत्र में प्रभाव बनाए रखने के साथ-साथ, संभावित इसराइली हमले से बचने के लिए कई दशक लगाकर हथियारबंद गुटों का एक नेटवर्क तैयार किया है।
इसका इतिहास 1979 की ईरान की इस्लामी क्रांति से शुरू होता है।
इसके बाद इराक़ के साथ हुए युद्ध में बशर अल-असद के पिता हाफिज़़ ने ईरान का समर्थन किया था।
ईरान में शिया मौलवियों और असद के बीच गठबंधन ने, मुख्य रूप से सुन्नी-बहुल मध्य पूर्व में ईरान के पावर बेस को मजबूत करने में मदद की थी।
असद परिवार शिया इस्लाम की एक शाखा, अल्पसंख्यक अलावी संप्रदाय से आता है।
सीरिया ईरान के लिए लेबनान, हिज़्बुल्लाह और अन्य क्षेत्रीय हथियारबंद समूहों तक ईरान हथियार पहुँचाने का एक मुख्य रूट था।
ईरान पहले भी असद की मदद के लिए आया था। 2011 में अरब स्प्रिंग के दौरान हुए विद्रोह के गृह युद्ध में तब्दील हो जाने के बाद जब असद असुरक्षित दिखे, तो उन्हें तेहरान ने अपने लड़ाके, ईंधन और हथियार मुहैया कराए।
इसके अलावा सीरिया में ‘सैन्य सलाहकार’ के रूप में तैनात 2,000 से अधिक ईरानी सैनिक और जनरल भी मारे गए थे।
थिंक टैंक चैटम हाउस में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के निदेशक डॉ। सनम वकील कहते हैं, ‘हमें मालूम है कि ईरान ने सीरिया में 2011 के आसपास से $30 बिलियन से $50 बिलियन तक खर्च किए हैं।’
अब वह रूट जिसके ज़रिए ईरान भविष्य में, लेबनान में हिज़्बुल्लाह और अन्य गुटों को हथियार और मदद भेज सकता था, वो बंद हो गया है।
डॉ. वकील का तर्क है, ‘प्रतिरोध की धुरी एक अवसरवादी नेटवर्क था जो ईरान को एक रणनीतिक बढ़त देता था। ईरान से इसे सीधे हमले से बचने के लिए डिज़ाइन किया था। साफ़ है कि ये एक रणनीति विफल रही है।’
ईरान के भविष्य की दिशा
अब ईरान की प्राथमिकता अपना अस्तित्व बनाए रखना होगा।
डॉ.वकील कहते हैं, ‘वह खुद को फिर से स्थापित करने, प्रतिरोध की धुरी में जो कुछ बचा है उसे मजबूत करने की कोशिश करेगा।’
डेनिस होराक ने कनाडा के राजनयिक के रूप में ईरान में तीन साल बिताए हैं। वे कहते हैं, ‘ईरानी सरकार में काफी दम है। और वे अब भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।’
उनका तर्क है कि ईरान के पास अब भी गंभीर मारक क्षमता है। और इसराइल के साथ टकराव की स्थिति में वो इसका इस्तेमाल खाड़ी के अरब देशों के ख़िलाफ़ कर सकता है। डेनिस होराक ईरान को कागज़़ी शेर मानने के किसी भी नजरिए के प्रति आगाह करते हैं।
डॉ.वकील कहते हैं, ‘ईरान निश्चित रूप से अपनी रक्षा नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करेगा। अब तक इन नीतियों के केंद्र में प्रतिरोध की धुरी थी।’
‘ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर भी दोबारा सोच सकता है। वो ये तय कर सकता है कि अपनी सुरक्षा के लिए उसे इस कार्यक्रम में और अधिक निवेश करना है।’
परमाणु क्षमता
ईरान इस बात पर ज़ोर देता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प 2015 में पश्चिमी देशों के ईरान के साथ किए गए परमाणु समझौते से पीछे हट गए थे। उसके बाद ईरान की परमाणु गतिविधियां सीमित हो गई थीं।
समझौते के तहत ईरान को 3.67 फीसदी की शुद्धता तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी गई थी। कम-संवर्धित यूरेनियम से कॉमर्शियल परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए ईंधन का उत्पादन किया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का कहना है कि ईरान अब उस दर को बढ़ा रहा है। और अब वो 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम का उत्पादन कर सकता है।
ईरान ने कहा है कि वह ऐसा उन प्रतिबंधों के जवाब में कर रहा है जिन्हें ट्रम्प ने लगाया था। यूरेनियम से परमाणु हथियार तभी बन सकते हैं जब वो 90त्न या उससे अधिक संवर्धित हो।
आईएईए प्रमुख, राफेल ग्रॉसी को लगता है कि ईरान ऐसा बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के कारण कर रहा है।
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट थिंक टैंक में परमाणु प्रसार की विशेषज्ञ डारिया डोल्जिक़ोवा कहती हैं, ‘यह वाकई चिंताजनक तस्वीर है। परमाणु कार्यक्रम 2015 में जहां था, उससे बिल्कुल अलग जगह पर पहुंच गया है।’
एक अनुमान के मुताबिक अगर ईरान चाहे तो वो अब लगभग एक हफ्ते में एक परमाणु हथियार बनाने के लिए, पर्याप्त यूरेनियम का संवर्धन कर सकता है।
लेकिन हथियार बनने के बाद उसे टार्गेट तक पहुँचाने के लिए वॉरहेड की जरूरत होगी जिसे बनाने में एक साल तक का समय लग सकता है।
डोल्जिक़ोवा कहती हैं, ‘हम नहीं जानते कि ईरान वे टार्गेट तक पहुँचने योग्य परमाणु हथियार बनाने के कितने करीब हैं। लेकिन इसबीच ईरान ने इन हथियारों के निर्माण के बारे बहुत सारी रिसर्च कर ली है। कोई भी ईरान से रिसर्च के ज़रिए अर्जित ज्ञान को नहीं छीन सकता।’
यही पश्चिमी देशों की चिंता का सबब है।
इसराइली इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ और तेल अवीव विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ। रज़ जि़म्म्ट कहते हैं, ‘ये स्पष्ट है कि ट्रंप ईरान पर अपनी दबाव डालने वाली रणनीति को फिर से लागू करने की कोशिश करेंगे।’
‘लेकिन मुझे लगता है कि वह ईरान को अपनी परमाणु क्षमताओं को सीमित करने के लिए मनाने की कोशिश भी कर सकते हैं। इसके लिए ट्रंप नए सिरे से बातचीत भी शुरू कर सकते हैं।’
डॉ जिम्म्ट के मुताबिक ये देखना होगा कि डोनाल्ड ट्रम्प क्या करते हैं और ईरान उसकी प्रतिक्रिया में क्या करता है। लेकिन इस बात की संभावना नहीं है कि ईरान सैन्य टकराव की राह चुनेगा।
तेहरान विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर नासिर हादियान कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ बातचीत के बाद और एक समझौता करने की कोशिश करेंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो ट्रंप अपने ‘अधिकतक दबाव’ वाली रणनीति पर लौटेंगे।’
नासिर हादियान का मानना है कि ‘संघर्ष की तुलना में समझौते की अधिक संभावना’ है।
उनका कहना है, ‘अगर ट्रंप ‘अधिकतम दबाव’ का रास्ता चुनते हैं तो गड़बड़ हो सकती है। नतीजतन जंग भी हो सकती है और ज़ाहिर ये कोई भी पक्ष नहीं चाहेगा।’
व्यापक गुस्सा
ईरान को कई घरेलू चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह ये है कि ईरान के सर्वोच्च नेता उत्तराधिकारी की तलाश कर रहा है।
डॉ. वकील के अनुसार, ‘ख़ामेनेई सोते वक्त अपनी विरासत के बारे में चिंता करते हैं। खामेनेई चाहेंगे कि वो ईरान को एक मज़बूत स्थिति में छोडक़र जाएं।’
हिजाब ठीक से न पहनने के आरोप में साल 2022 में महसा जीना अमिनी की मौत के बाद ईरान भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे।
अब भी ईरान की हुकुमत के खिलाफ रोष है। लोगों का कहना है कि देश में बेरोजग़ारी और महंगाई है लेकिन देश के संसाधनों को विदेशों में जंग के लिए झोंका जा रहा है।
ईरान की युवा पीढ़ी, 1979 की इस्लामी क्रांति से तेजी से अलग होती जा रही है। कई लोग सरकार के लगाए हुए सामाजिक प्रतिबंधों से चिढ़ते हैं। हर दिन, महिलाएं शासन की अवहेलना करती हैं, अपने बालों को ढके बिना बाहर निकलने पर गिरफ्तारी का जोखिम तक उठाती हैं।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सीरिया की तरह ईरान के शासन का भी पतन होगा।
जेफरी कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि सीरिया के पतन पर ईरानी लोग सडक़ों पर आएंगे। ’
होराक का मानना है कि ईरान जैसे-जैसे आंतरिक सुरक्षा बढ़ाने की कोशिश करेगा, असहमति के प्रति उसकी सहनशीलता और भी कम हो जाएगी। वहां हिजाब न पहनने वाली महिलाओं को सजा देने वाला एक कानून जल्द ही लागू होने वाला है। लेकिन होराक नहीं मानते कि ईरान की सरकार को फि़लहाल कोई ख़तरा है।
वह कहते हैं, ‘लाखों ईरानी इस हुकुमत का समर्थन नहीं करते, लेकिन लाखों लोग ऐसे भी हैं जो अब भी इसका पूरा समर्थन करते हैं। मुझे नहीं लगता कि निकट भविष्य में इसके गिरने का कोई खतरा है।’
लेकिन घरेलू स्तर पर लोगों का गुस्सा और सीरिया में मिली मात ने ईरान के शासकों का काम थोड़ा मुश्किल तो बना दिया है। (bbc.com/hindi)
जॉर्ज सोरोस भारत में एक चर्चित "कीवर्ड" बने हुए हैं. भारतीय राजनीति की शब्दावली में दाखिल होने से पहले भी वह कई राजनेताओं के निशाने पर रहे हैं. एर्दोआन और ट्रंप इस सूची में हैं. हालांकि, सबसे बड़ा नाम है: विक्टर ओरबान.
डॉयचे वैले पर स्वाति मिश्रा का लिखा
दुनिया के कई देशों के बाद अब भारतीय राजनीति में भी अरबपति जॉर्ज सोरोस का दाखिला हो चुका है। हाल ही में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को ‘देशद्रोही’ करार देते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस, भारत को अस्थिर करने के सोरोस के कथित एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। बीजेपी का यह भी आरोप है कि कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी का एक ऐसे भारत विरोधी फाउंडेशन से नाता है, जिसे सोरोस फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है।
जवाब में कांग्रेस ने भी आरोप लगाया कि ‘अदाणी को बचाने के लिए बीजेपी और मोदी सरकार, जॉर्ज सोरोस के नाम पर स्वांग रच रही है।’ मोदी सरकार पर ‘जॉर्ज सोरोस को पैसे देने’ का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने पूछा है कि अगर ‘सोरोस नाम का आदमी भारत-विरोधी गतिविधियां कर रहा है, तो आप उसका धंधा-पानी भारत में बंद क्यों नहीं करवाते? सरकार सोरोस के सारे बिजनेस और फंडिंग पर रोक क्यों नहीं लगाती?’
कौन हैं जॉर्ज सोरोस?
93 वर्षीय सोरोस का जन्म हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में रहने वाले एक यहूदी परिवार में हुआ था। यह नाजी दौर था और हंगरी भी नाजियों के कब्जे में था। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ के मुताबिक, पहले इस परिवार का सरनेम श्वात्र्स था। लेकिन बुडापेस्ट में गहराती यहूदी-विरोधी भावना को देखते हुए जॉर्ज के पिता इवादार ने सरनेम बदलकर सोरोस कर लिया।
‘श्वात्र्स’ की तुलना में ‘सोरोस’ उपनाम से परिवार की यहूदी पहचान जाहिर नहीं होती थी। इवादार ने अपने परिवार को ईसाई बताकर फर्जी पहचान पत्र हासिल किए। इस तरह इवादार का परिवार होलोकॉस्ट से बचने में कामयाब रहा। साल 1947 में जॉर्ज 17 साल के थे, जब वह इंग्लैंड आ गए। यहां उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की।
साल 1956 में सोरोस अमेरिकाचले गए। यहां उन्होंने वित्तीय बाजार में अपना नाम स्थापित किया, खूब कमाई की। वह हेज फंड के बड़े कारोबारी बन कर उभरे। हेज फंड, निजी निवेशकों के बीच एक सीमित साझेदारी है। इसमें कई लोगों या समूहों से फंड लेकर पेशेवर फंड मैनेजर उसका प्रबंधन करते हैं। वह अमेरिका में सबसे कामयाब निवेशकों में गिने जाते हैं।
क्या है ‘ओपन सोसायटी फाउंडेशंस’
‘न्यूयॉर्क’ मैगजीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सन 1985 के आसपास सोरोस ने परोपकारी कामों में पैसा देना शुरू किया। उन्होंने बुडापेस्ट में एक फाउंडेशन शुरू किया, जिसका मकसद था ‘एक उदार और खुले समाज’ से जुड़े लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना। इस फाउंडेशन ने तत्कालीन कम्युनिस्ट सत्ता के दौरान हंगरी में आलोचनाओं और असहमतियों के स्वरों को समर्थन दिया।
यही संस्था आगे चलकर ‘ओपन सोसायटी फाउंडेशंस’ (ओएसएफ) का आधार बनी। शुरुआती दौर में इसका कार्यक्षेत्र विशेष रूप से पूर्वी यूरोप और रूस था, जो कि तब सोवियत ब्लॉक का हिस्सा थे। ओएसएफ के अनुसार, इस दौर में फाउंडेशन जानकारी को पारदर्शी बनाने और लोगों तक पहुंचाने का काम कर रहा था।
आने वाले दशकों में ओएसएफ का काफी विस्तार हुआ। ओएसएफ के अनुसार, आज वह दुनिया में ऐसे स्वतंत्र समूहों का सबसे बड़ा प्राइवेट फंडर है जो न्याय, लोकतांत्रिक शासन और मानवाधिकारों के लिए काम करते हैं। ‘ह्यूमन राइट्स फंडर्स नेटवर्क’ के मुताबिक, साल 2020 में ओएसएफफ मानवाधिकार से जुड़े संगठनों और लोगों को आर्थिक मदद देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा फंडर था।
हालांकि, समाचार एजेंसी एपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से इस फाउंडेशन ने अपने कई कार्यक्रम बंद कर दिए और कर्मचारियों की संख्या भी घटाई। इसके कारण मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे कई समूहों को आशंका थी कि उनकी फंडिंग प्रभावित हो सकती है। फाउंडेशन ने अपने ताजा बयान में आश्वासन दिया है कि वह दुनियाभर में मानवाधिकार अभियानों को फंड देना जारी रखेगा।
पहले भी कई राजनेताओं ने सोरोस पर आरोप लगाए हैं
भारत में दलगत राजनीति और आरोपों-प्रत्यारोपों से इतर देखें, तो सोरोस पर पहले भी कई राजनेताओं और राष्ट्राध्यक्षों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। इनमें एक प्रमुख नाम है, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान का। हंगरी, सोरोस की पैदाइश का देश है। ओरबान, जो कि दक्षिणपंथी विचारधारा की राजनीति करते हैं, सोरोस के खिलाफ बड़ी मुहिम चलाते रहे हैं। बकौल ओरबान, सोरोस उस अंतरराष्ट्रीय साजिश के केंद्र में हैं, जिसका मकसद माइग्रेशन के माध्यम से हंगरी को तबाह करना है।
सिर्फ हंगरी ही नहीं, अमेरिकी समाचार वेबसाइट ‘बिजनेस इनसाइडर’ के शब्दों में कहें, तो ‘जॉर्ज सोरोस, दक्षिणपंथ के पसंदीदा टारगेटों में से एक हैं।’ वेबसाइट ने अपनी एक खबर में 21 जनवरी 2017 को अमेरिका में हुई एक रैली का जिक्र किया। ट्रंप के पहले कार्यकाल में उनके पदभार संभालने के एक दिन बाद वॉशिंगटन में महिलाओं ने एक विशाल मार्च निकाला। प्रदर्शनकारी महिला अधिकारों पर ट्रंप के नजरिये का विरोध कर रहे थे।
न्यूयॉर्क टाईम्स के मुताबिक, इस रैली में कम-से-कम 4,70,000 लोग शामिल हुए थे। बिजनेस इनसाइडर के मुताबिक, इस रैली के कई आलोचकों का मानना था कि इन सबके पीछे एक शख्स का ‘अदृश्य हाथ है, जो ना केवल लिबरल (विचारधारा) प्रोटेस्टों की फंडिंग कर रहा है, बल्कि दुनिया की संपत्ति पर भी उसका नियंत्रण है और वह एक खास वैश्विक व्यवस्था को आगे बढ़ा रहा है’
अमेरिका में अश्वेतों के अधिकार से जुड़े ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ मुहिम में भी सोरोस का हाथ होने के आरोप लगे। खुद ट्रंप ने सोरोस के खिलाफ बयान दिए। साल 2018 में अपने विरुद्ध हुए एक प्रदर्शन की आलोचना करते हुए ट्रंप ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनों में इस्तेमाल हुए पोस्टरों का पैसा सोरोस ने दिया है। साल 2020 में ‘फॉक्स न्यूज’ को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने आरोप लगाया कि अमेरिका में हो रहे एंटीफा
(फासिस्ट और नस्लवाद विरोधी अभियान) प्रदर्शनों को जिनसे कथित फंडिंग मिल रही है, उनमें सोरोस भी हैं। बकौल ट्रंप, प्रदर्शनकारियों के कुछ पोस्टरों को देखकर साफ था कि उन्हें ‘हाई क्लास प्रिंटिंग शॉप’ में बनाया गया था।
2017 में यूरोपीय देश रोमानिया में बड़े स्तर पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सरकार भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। इन प्रदर्शनों के पीछे भी सोरोस का हाथ होने के आरोप लगे। कहा गया कि वो प्रदर्शनकारियों को पैसे दे रहे हैं।
साल 2013 में तुर्की में बड़े स्तर पर नागरिक प्रदर्शन हुए। इन्हें ‘गेजी पार्क प्रोटेस्ट’ कहा गया। यहां भी सोरोस का नाम आया। तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप एर्दोआन ने देश के मानवाधिकार कार्यकर्ता और कारोबारी ओस्मान कवाला को ‘सरकार का दुश्मन’ करार देते हुए आरोप लगाया कि कवाला को सोरोस से मदद मिली। कवाला 2017 से तुर्की की जेल में बंद हैं। एर्दोआन ने दावा किया कि सोरोस देशों को बांटने और बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं। साल 2018 में सोरोस के 'ओपन सोसायटी फाउंडेशन' ने एर्दोआन के आरोपों को निराधार बताते हुए तुर्की में अपना कामकाज बंद करने की घोषणा की।
हंगरी का उदाहरण, ओरबान के बयान
भारत में सोरोस के एक राजनीतिक संदर्भ बनने से काफी पहले यह नाम यूरोप में चर्चित रहा है। हंगरी के प्रधानमंत्री ओरबान संभवत: सोरोस पर सबसे हमलावर रहे हैं। वह सोरोस को डीप-स्टेट एक्टर बताते हुए ‘अंकल सोरोस’ और ‘सोरोस नेटवर्क’ जैसे कई संबोधन देते आए हैं।
ओरबान, सोरोस को ‘संसार का सबसे भ्रष्ट आदमी‘ बता चुके हैं। वह प्रवासियों और शरणार्थियों समेत हंगरी के कई मसलों के पीछे सोरोस की भूमिका बताते हैं। कई आलोचकों का कहना है कि ओरबान चुनावी फायदों के लिए सोरोस का डर पैदा करते हैं।
मसलन, साल 2017 में ओरबान सरकार ने एक मीडिया अभियान चलाया। इसमें हंगरी के लोगों से कहा गया कि उन्हें सोरोस को जीतने नहीं देना चाहिए। खबरों के मुताबिक, सरकारी खर्च पर राजधानी बुडापेस्ट समेत कई शहरों में बिलबोर्ड लगाए गए, जिनमें सोरोस को ‘पपेट मास्टर’ यानी, परदे के पीछे रहकर कठपुतली नचाने वाला बताया गया।
ओरबान की इस राजनीतिक शैली के ही संदर्भ में ‘बजफीड न्यूज’ ने साल 2019 में अपने एक विस्तृत लेख में लिखा, ‘सोरोस का शैतानीकरण, समानांतर वैश्विक राजनीति के सबसे प्रमुख लक्षणों में से एक है। और यह, कुछ अपवादों को छोडक़र, झूठ का पुलिंदा है।’
कैरोलीन डी ग्रॉयटर, डच अखबार ‘एनआरसी हांडेल्सब्लाट’ में यूरोप की संवाददाता हैं। इस साल यूरोपीय संसद के चुनाव से पहले ग्रॉयटर ने ‘फॉरेन पॉलिसी’ के लिए लिखे एक लेख में लिखा, ‘यह पहली बार नहीं है जब ओरबान ने एक चुनावी अभियान में सोरोस को एक पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल किया हो। वह पहले भी हंगरी में चुनाव जीतने के लिए ऐसा कर चुके हैं।’ ग्रॉयटर लिखती हैं कि कैसे ओरबान ने ‘सोरोस मॉनस्टर’ का इस्तेमाल करते हुए दो बार हंगरी में चुनाव जीते और फिर 2019 में यूरोपीय चुनाव जीतने के लिए भी यही रणनीति इस्तेमाल की।
दिलचस्प यह है कि 1980 और 1990 के दशक में ओरबान खुद भी सोरोस से फंड पा चुके हैं। नवंबर 2019 में ‘गार्डियन’ को दिए एक इंटरव्यू में सोरोस ने इस संदर्भ में कहा था, ‘मैंने ओरबान को मदद इसलिए दी, क्योंकि उस समय वह ओपन सोसायटी के बहुत सक्रिय समर्थकों में थे। लेकिन वह (आगे चलकर) एक शोषक बन गए और माफिया स्टेट के रचनाकार भी।’
क्या लिबरल का उलट है ‘इलिबरल गवर्नेंस’?
इस समूचे मामले में राजनीतिक शैली एक अहम पक्ष है। सोरोस जहां लिबरल डेमोक्रैसी को समर्थन देने की बात करते हैं, वहीं ओरबान सरकार के ऐसे स्वरूप और स्वभाव की पैरोकारी करते हैं जो उन्हीं के शब्दों में ‘इलिबरल’ है। ओरबान के कार्यकाल से आंकें, तो यह शैली प्रेस की आजादी को दबाने, स्वतंत्र शैक्षणिक विमर्श को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने और यहां तक कि न्यायपालिका की भूमिका की भी कांट-छांट में भरोसा रखती नजर आती है।
यह राजनीतिक शैली यह भी मानती है कि दरअसल उदारवाद की खामियां व दोहरापन ही लोगों में असहिष्णुता बढ़ा रही है। अनुदारवादी राजनीति एलजीबीटीक्यू लोगों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील नहीं है, आप्रवासियों को देश की संस्कृति और स्थानीय लोगों के रोजगार के लिए खतरा मानती है और महिलाओं को बहुत हद तक पारपंरिक भूमिकाओं में सीमित करना चाहती है।
अनुदारवादी लोकतंत्र के नाम पर ओरबान चाहते हैं कि मीडिया सरकार की बातों को प्रसारित करने का मंच बने। जब वह यह कहते हैं कि लाखों की संख्या में शरणार्थियों को यूरोप भेजने की एक तथाकथित साजिश ‘सोरोस प्लान’ का मकसद यूरोप को तबाह करना है, तो वह चाहते हैं कि मीडिया इस दावे की पड़ताल करने की जगह तर्क देकर आरोपों की पुष्टि करे।
‘सिविल लिबर्टीज यूनियन फॉर यूरोप’ यूरोपीय संघ में मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में काम कर रहा एक संगठन है। इसके मुताबिक, ‘लिबरल डेमोक्रैसी’ के मूलभूत तत्व हैं, सभी नागरिकों को चुनाव में भाग लेने का अधिकार ताकि वे देश की निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। स्वतंत्र, निष्पक्ष और नियमित चुनाव। अभिव्यक्ति व सभा की आजादी। निर्वाचित जनप्रतिनिधि। मीडिया व सूचना की स्वतंत्रता।
अगर इलिबरल गवर्नेंस, लिबरल के उलट होने की बात करता है तो स्वाभाविक ही वो उपरोक्त तत्वों का भी विरोधी है। ‘सिविल लिबर्टीज यूनियन फॉर यूरोप’ के मुताबिक, एक बार अगर ‘इलिबरल’ राजनेता चुनकर आ जाए तो वह देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुख्य स्तंभों को हिलाने के लिए कई रणनीतियों का इस्तेमाल कर सकता है। मसलन, ध्रुवीकरण। स्वतंत्र मीडिया पर हमला करना। न्यायपालिका पर नियंत्रण स्थापित करना। राजनीतिक विरोध और विपक्ष को दबाना। नागरिक समाज को ‘बलि का बकरा’ बनाना और निजता व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे नागरिक अधिकारों को सीमित करने की कोशिश करना।
ओरबान ने सत्ता में आने पर खुद ही कहा था कि उनकी सरकार हंगरी में एक इलिबरल स्टेट बना रही है। इसके लिए वे सरकार पर निगरानी करने वाली संस्थाओं पर लगातार नियंत्रण बढ़ाते रहे हैं। ‘सिविल लिबर्टीज यूनियन फॉर यूरोप’ के अनुसार, धुर-दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा वाले ओरबान की फिडेश पार्टी ने हंगरी में ‘अनुदार लोकतंत्र का एक आदर्श रूप बनाया है, जिसने दुनियाभर में ऐसे राजनीतिक नकलचियों के लिए रास्ता तैयार किया है।’ (डॉयचेवैले)
-डॉ.रमन सिंह
01 नवम्बर 2000 का दिन जब केवल भारत के मानचित्र पर कुछ नई रेखाएं नहीं खिंची गई बल्कि डॉ. खूबचंद बघेल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, श्री हरि ठाकुर, श्री केयूर भूषण, श्री केशव सिहं ठाकुर और श्री चंदूलाल चंद्राकर जैसे महापुरुषों के दशकों के प्रयासका प्रतिफल रहा कि पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की मांग के लिए मध्यप्रदेश विधान सभा में सर्वप्रथम श्री महेश तिवारी (सदस्य, जनता पार्टी) द्वारा 28 जून सन् 1991 को मध्यप्रदेश राज्य को तीन पृथक प्रदेशों में विभाजित कर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हेतु केन्द्र से अनुरोध किये जाने हेतु प्रस्तुत अशासकीय संकल्प अस्वीकृत हो गया। इसके बाद इसके बाद श्री गोपाल परमार ने 18 मार्च 1994 को एक अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किया- सदन का यह मत है कि मध्यप्रदेश के विस्तृत क्षेत्र, भाषा, सांस्कृतिक परंपराएँ, कानून व्यवस्था तथा जनता की सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए छत्तीसगढ़ क्षेत्र को अलग कर पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनाये जाने की शासन आवश्यक पहल करें। इस पर तीन घंटे की चर्चा उपरांत संकल्प सर्वानुमति से स्वीकृत हुआ। फिर 15 अप्रैल 1998 को मध्यप्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन मंत्री श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला ने मध्यप्रदेश विधान सभा में 15 अप्रैल 1998 को छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के निर्णय पर भारत सरकार के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किये जाने का शासकीय संकल्प प्रस्तुत किया जो पारित हुई।
मुझे आज भी श्रद्धेय श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी का सप्रेशाला मैदान, रायपुर की सभा में वो उद्बोधन याद है, जहाँ उन्होंने जनता से वादा करते हुए कहा था कि ‘आप मुझे 11 सांसद दो और मैं आपको छत्तीसगढ़ दूंगा।’ वर्ष 1998 में बारहवीं लोकसभा चुनाव में भाजपा के घोषणा पत्र में भी पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के प्रति संकल्प लिया गया था और इसी तारतम्य में ‘मध्यप्रदेश पुनर्गठन विधेयक’ लोकसभा में 31 जुलाई 2000 तथा राज्यसभा में भी 09 अगस्त 2000 को पारित हुआ। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर उपरांत 01 नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश से पृथक होकर देश के 26वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को एक नई पहचान और छत्तीसगढ़वासियों को आकांक्षाओं को सम्मान मिला।
आजादी के पूर्व से छत्तीसगढ़ प्रान्त के संसदीय ज्ञान और लोकप्रिय नेताओं का सदन में रहा है प्रतिनिधित्व।
छत्तीसगढ़ को भले ही भारत के नक्शे में पहचान सन 2000 में मिली लेकिन छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व आजादी के पूर्व से सीपी एंड बरार में दिखाई देता रहा, जब पहली बार 31 अप्रैल 1937 को दुर्ग के संजारी बालोद से चुनाव जीतकर घनश्याम सिंह गुप्त जी सेंट्रल प्रोविंसेस एंड बरार के अंतर्गत विधानसभा अध्यक्ष चुने गए। श्री गुप्त जी लगातार 3 बार (1937-1952) 15 वर्षों तक विधानसभा अध्यक्ष पद को सुशोभित करते रहे।
इसके साथ ही जब 1935 के भारत शासन अधिनियम के अनुसार विधानसभा की भाषा आवश्यक रूप से अंग्रेजी थी तब श्री गुप्त जी ने 1937 में विधानसभा की भाषा हिंदी और मराठी कर दी, अपनी मातृभाषा के प्रति तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्री घनश्याम सिंह गुप्त जी का समर्पण और राष्ट्र के प्रति प्रेम ही था, जिसकी वजह से वह न केवल संविधान सभा के सदस्य बने बल्कि विधानसभा के द्वारा उन्हें संविधान के हिंदी ड्राफ्ट कमेटी का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी की इच्छा के अनुरु उन्होंने 2 वर्ष 6 माह के अंतर्गत भारतीय संविधान का हिंदी ड्राफ्ट प्रस्तुत किया।
सेंट्रल प्रोविंसेस एंड बरार के सदन में छत्तीसगढ़ प्रान्त के दिग्गज नेताओं की प्रमुख भूमिका थी। यह अद्भुत संयोग था कि छत्तीसगढ़ अंचल के श्री रविशंकर सदन के नेता (मुख्यमंत्री) के रूप में थे, छत्तीसगढ़ अंचल के ठाकुर प्यारेलाल सिंह मध्यप्रदेश विधान सभा के नेता-प्रतिपक्ष और उसी समय श्री घनश्याम सिंह गुप्त जी विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी पर थे। मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष के रूप में इसी अंचल के दुर्ग से श्री विश्वनाथ यादव राव तामस्कर, श्री श्यामाचरण शुक्ल भी रहे। इनके अलावा छत्तीसगढ़ अंचल के श्री मोतीलाल वोरा दो बार मध्यप्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री हुए। वर्ष 1985-90 में छत्तीसगढ़ के स्व. श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे।
लेकिन यहां एक प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर क्यों एक पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की आवश्यकता पड़ी?जब छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व इतना मजबूत था और छत्तीसगढ़ के नेताओं का इतना प्रभाव था तब क्यों इस प्रदेश के लोगों के मन में एक पृथक राज्य की भावना थी। इसके लिए जब हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखते हैं तब संयुक्त मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ का क्षेत्र खनिज और अन्य संपदाओं से भरपूर होने के उपरांत भी वंचित और उपेक्षित नजर आता है, क्योंकि भोपाल स्थित विधानसभा तक हमारे क्षेत्र की आवाज को पहुंचाना और जनकल्याणकारी योजनाओं से इस अंचल को जोडऩा बहुत कठिन था। यह एक ऐसा दौर था जब हम अगर कवर्धा के लिए मध्यप्रदेश विधानसभा से 5 लाख रुपए की सडक़ भी स्वीकृत करवा लाते थे तब वह एक बड़ी उपलब्धि हुआ करती थी। ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ सिर्फ एक नए राज्य का निर्माण नहीं था बल्कि सुकमा से सरगुजा तक निवासरत इस पूरे क्षेत्र के लोगों को नई आवास देने और उनके अधिकारों को प्राथमिकता के साथ उठाने के लिए एक पृथक पटल भी उपलब्ध किया गया।
14 दिसम्बर सन 2000 को नए छत्तीसगढ़ में जन-जन की आवाज को एक मंच प्रदान करने के लिए छत्तीसगढ़ विधानसभा की स्थापना हुई, छत्तीसगढ़ गठन के समय विधानसभा के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां थी। उपयुक्त भवन, संसाधनों की कमी एवं संसदीय विद्या के पारंगत अनुभवियों की कमी के बावजूद छत्तीसगढ़ विधानसभा का प्रथम चार दिवसीय ऐतिहासिक सत्र 14 दिसम्बर से 19 दिसम्बर 2000 तक रायपुर स्थित राजकुमार कालेज के जशपुर हॉल में अस्थायी तौर पर निर्मित सभा भवन में संपन्न हुआ। इसके पश्चात् छत्तीसग? विधानसभा को रायपुर बलौदाबाजार मार्ग पर बरोंदा गांव स्थित भारत-सरकार के जल-ग्रहण मिशन संस्थान के लिए बने नवनिर्मित भवन में स्थानांतरित किया गया और जहाँ आज दिनांक तक संचालित है।
जब छत्तीसगढ़ को अपना पृथक राज्य और पृथक विधानसभा मिली तब अन्त्योदय की विचारधारा के अनुरूप छत्तीसगढ़ के कल्याण और प्रदेशवासियों के उत्थान के लिए हमारी विधानसभा ने ऐतिहासिक निर्णय लिए। राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की छवि एक पिछड़े और वंचित प्रदेश की थी। भूख से लोगों की मौत हो जाना और सीमित अवसरों की वजह से लोगों के छत्तीसगढ़ से बाहर कूच करने ने प्रदेश की छवि एक पलायन करने वाले राज्य की बना दी थी। जिसे परिवर्तित करने में हमारी विधानसभा ने ऐसे कानून बनाये जो इतिहास के सदैव के लिए अंकित हो गए। जब हमारी विधानसभा ने खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत 1 रूपये किलो चावल की योजना को 21 दिसम्बर 2012 सदन में पारित किया तब ‘भोजन का अधिकार’ देने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बना। हमारी इस व्यवस्था को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे देश के लिए आदर्श बताया और पीडीएस की सराहना की। इसके साथ ही युवाओं को ‘कौशल उन्नयन का कानूनी अधिकार’ देश में सबसे पहले 21 जुलाई 2013 को हमारी ही विधानसभा में पारित हुआ।
हमारी विधानसभा ने लोककल्याण के साथ ही सांस्कृतिक उत्थान पर भी पूरा जोर दिया और 3 अगस्त 2010 को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का विधेयक पारित कर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिया। हमारी विधायिका की अद्भुत शक्ति है जो न केवल प्रदेशवासियों के विकास को सुनिश्चित करती है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी संरक्षित रखकर एक बेहतर संवैधानिक व्यवस्था को स्थापित करती है। हमारी विधानसभा में बजट प्रस्तुत करने की एक बहुत ही सुंदर प्रक्रिया है। कोरोना काल को अपवाद के रूप में छोड़ दें तो हमारे सदन में बजट कभी गिलोटीन (त्रढ्ढरुरुह्रञ्जढ्ढहृश्व) से पारित नहीं हुआ है। हमेशा ही छत्तीसगढ़ विधानसभा ने सभी विभागों के प्रमुख विषयों पर चर्चा करने के बाद बजट को पटल पर रखा जाता है और उसके बाद ही बजट पारित होता है।
छत्तीसगढ़ विधानसभा की एक विशेष प्रक्रिया है, हमारी विधानसभा में यदि कोई सदस्य सत्र के दौरान अपनी कुर्सी से उठकर वेल (गर्भगृह) में प्रवेश करता है तो वह स्वत:ही निलंबित हो जाता है और उसे सदन से बाहर जाना पड़ता है। यह हमारे लोकतंत्र में छत्तीसगढ़ विधानसभा की एक पवित्र प्रक्रिया है जिसका पालन सभी दल करते हैं। यह हमारी विधायिका की ही शक्ति है जो पक्ष और विपक्ष को एक मंच पर लाकर संवाद के दरवाजे खोल देती है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 26 जुलाई 2007 की वो बैठक है, जिसमें छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार विधानसभा के अंदर पक्ष और विपक्ष के बीच 8 घंटे 40 मिनट तक ‘‘ष्टद्यशह्यद्गस्र ष्ठशशह्म् रूद्गद्गह्लद्बठ्ठद्द’’ हुई। जहां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी ने मिलकर नक्सल जैसी गंभीर समस्या पर खुलकर अपनी बात रखी। संवैधानिक मूल्यों को सुरक्षित रखकर ऐसे अनेकों कीर्तिमान रचते हुए हमारी विधानसभा ने 24 वर्षों की यात्रा पूरी की है।
एक लंबी यात्रा के बाद आज जब हम छत्तीसगढ़ की छठवीं विधानसभा को देखते हैं, तब यह विधानसभा अपने युवावस्था के 25वें वर्ष में प्रवेश कर रही है, आज जब हमारी विधानसभा में एक नई ऊर्जा और नव जनप्रतिनिधियों की प्रबल आवाज है, इस परिपत्र होती हमारी विधानसभा में महिला प्रतिनिधित्व की मामले में भी एक कीर्तिमान स्थापित किया है। कुल 90 सदस्यीय सदन में अब तक सर्वाधिक 19 महिलायें निर्वाचित हो कर आई है जो कुल सदस्यों की 20 प्रतिशत है। 50 नए विधायकों में एक नया जज़्बा है और लगभग 14 प्रतिशत विधायक हमारे सदन में ऐसे हैं, जिनकी आयु 40 वर्ष से कम है, यानी कुल 13 युवा विधायक हमारी विधानसभा के सदस्य हैं।
छत्तीसगढ़ विधान सभा के प्रत्येक विधान सभा के प्रारंभ में नव-निवार्चित सदस्यों को संसदीय कार्य-प्रणाली, प्रक्रिया एवं परम्पराओं से अवगत कराने की दृष्टि से प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जिसमे प्रबोधन के लिए छत्तीसगढ़ और विभिन्न राज्यों के विधान सभा के अध्यक्षों, भूतपूर्व मंत्रियों तथा वरिष्ठ सदस्यों को आमंत्रित किया जाता है। इसी तारतम्य में छत्तीसगढ़ के छठवें विधानसभा में जनवरी 2024 में प्रबोधन के लिए विशेष रूप से लोकसभा के स्पीकर माननीय ओम बिरलाजी, भारत के उपराष्ट्रपति माननीय श्री जगदीप धनखड़ और केंद्र सरकार के गृह मंत्री माननीय श्री अमित शाह, तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ मंत्री माननीय श्री मनसुख एल. मंडाविया, श्री सतीश महानाजी माननीय अध्यक्ष उत्तर प्रदेश विधान सभा को भी आमंत्रित किया गया।
हमारी छत्तीसगढ़ विधानसभा ऐसी अनेकों ऐतिहासिक अवसरों की साक्षी बनी है, जिसने प्रदेश का गौरव बढ़ाया है, द्वितीय विधान सभा की अवधि में 28 जनवरी, 2004 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने छत्तीसगढ़ विधानसभा में सदस्यों को संबोधित किया जो भारत वर्ष के किसी भी राज्य की विधान सभा में राष्ट्रपति के संबोधन का यह पहला कार्यक्रम था। इसके बाद राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने भी जून 2011 में विधानसभा को संबोधित किया।
आज जब हम अपनी विधानसभा के रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ के साथ-साथ हमारे विधानसभा की अपनी युवावस्था में पहुंच चुकी है। इस युवावस्था में जब एक नौजवान सशक्त और आत्मनिर्भर होकर मजबूती के साथ आगे बढ़ता है, इसी तरह हमारी विधानसभा भी आत्मनिर्भर होकर एक नए मार्ग पर आगे बढ़ रही है। राजधानी के नवा रायपुर के सेक्टर 19 में महानदी (मंत्रालय) और इन्द्रावती (विभागाध्यक्ष) भवन के पीछे मध्य में नया विधानसभा भवन को 2025 तक पूर्णरूप से तैयार करने का लक्ष्य लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं। अभी तक जहाँ हमारी विधानसभा भारत-सरकार के जल-ग्रहण मिशन संस्थान के लिए बने भवन में संचालित थी, वहीं इस नई विधानसभा में हम सशक्तिकरण की नई गाथा लिखने जा रहे हैं।
इस विधानसभा भवन में छत्तीसगढ़ की आत्मनिर्भरता की भावना के साथ ही अत्याधुनिक सुविधाएँ, नई तकनीक और डिजीटलीकरण का विजन भी समाहित है। इसके सदन में 200 सदस्यों की बैठक क्षमता एवं नए विधानसभा भवन में विधानसभा सचिवालय, विधानसभा का सदन, सेंट्रल-हॉल, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री तथा मंत्रियों के कार्यालय होंगे। यहां 500 दर्शक क्षमता का ऑडिटोरियम भी बनाया जाएगा। नवीन विधानसभा भवन प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील है, जिसमें सौर ऊर्जा से संचालन के साथ ही पूरे भवन परिसर में अधिकाधिक वृक्षारोपण, रेन वाटर हार्वेस्टिंग व टेक्नोलॉजी का समावेश और समुचित उपयोग सुनिश्चित करते हुए भवन विकसित किया जा रहा है। इस नए विजन के साथ जब हम एक नई शुरुआत कर रहे हैं तब समस्त प्रदेशवासियों को विधानसभा के 24वें स्थापना दिवस पर हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं। हम सभी मिलकर आने वाले समय में अपने छत्तीसगढ़ को संवैधानिक रूप से और अधिक मजबूत बनाएंगे एवं लोकतंत्र को सशक्त करते हुए विधानसभा की गरिमा को आगे अक्षुण्ण बनाए रखेंगे।
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ उपासना स्थल कानून (प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट) की संवैधानिकता से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई करेगी। कोर्ट के समक्ष कम से कम 6 याचिकाएं लंबित हैं।
इन मामलों में अब तक बहस शुरू नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में सरकार को नोटिस जारी किया था।
भारतीय जनता पार्टी के सदस्य और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने 2020 में एक याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह कानून संविधान के धर्मनिरपेक्षता और बराबरी जैसे मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उनके अनुसार, इस कानून से हिंदुओं को अधिक नुकसान पहुंचता है।
इस याचिका का विरोध करते हुए जमियत उलेमा-ए-हिंद, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्कि्सस्ट) और कई एक्टिविस्ट्स ने भी अपनी याचिकाएं दाखिल की हैं।
ऐसे में इस लेख में हम उपासना स्थल क़ानून- 1991 के इतिहास, विवाद और इससे जुड़े अहम मामलों के बारे में बड़ी बातें जानेंगे।
साल 1991 का उपासना स्थल कानून क्या है?
उपासना स्थल क़ानून कहता है कि भारत में 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।
इस कानून के अलग-अलग सेक्शन में ये अहम बातें शामिल हैं:
सेक्शन 3:
इस कानून के तहत, कोई भी व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल या किसी समुदाय के पूजास्थल के स्वरूप को बदलने की कोशिश नहीं कर सकता।
सेक्शन 4 (1):
इसमें यह साफ लिखा गया है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, वह उसी स्वरूप में बना रहेगा।
सेक्शन 4 (2):
अगर किसी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव को लेकर कोई केस, अपील, या अन्य कार्रवाई 15 अगस्त 1947 के बाद किसी कोर्ट, ट्रिब्यूनल, या प्राधिकरण में लंबित है, तो वह केस रद्द कर दिया जाएगा। इसके अलावा, ऐसे किसी मामले में दोबारा केस या अपील दायर नहीं की जा सकती।
सेक्शन 5:
इस कानून में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि यह मामला आजादी से पहले ही अदालत में लंबित था।
एक और अपवाद उन धार्मिक स्थलों का है, जो पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (्रस्ढ्ढ) के अधीन आते हैं। इन स्थलों के रखरखाव और संरक्षण के काम पर कोई रोक नहीं है।
ये कानून ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की शाही ईदगाह समेत देश के सभी धार्मिक स्थलों पर लागू होता है।
उपासना स्थल कानून किन परिस्थितियों में लाया गया था?
साल 1990 में, बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन के समर्थन में रथयात्रा शुरू की थी।
बिहार में उनकी गिरफ्तारी और उसी साल कार सेवकों पर गोलीबारी की घटनाओं ने पूरे देश, खासकर उत्तर प्रदेश में, साम्प्रदायिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया था।
इसी माहौल में, 1991 में अयोध्या आंदोलन और उससे जुड़े विवाद अपने चरम पर थे। ऐसे समय में, 18 सितंबर 1991 को, केंद्र में नरसिम्हा राव सरकार ने उपासना स्थल कानून संसद से पारित कराया।
उस वक्त उमा भारती सहित बीजेपी के कई नेताओं ने इस नए कानून का जमकर विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि इस तरह का कानून बनाकर हम ऐसे दूसरे विवादित मामलों की अनदेखी नहीं कर सकते।
उपासना स्थल से जुड़े विवाद कई राज्यों में कोर्ट में हैं
मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों के 10 से ज़्यादा धार्मिक स्थलों और स्मारकों के मामले कोर्ट में लंबित हैं। इनमें उपासना स्थल कानून 1991 की भूमिका अहम हो जाती है।
इन मामलों में मौजूदा मस्जिदों, दरगाहों और स्मारकों को लेकर दावा किया जा रहा है कि इन्हें मंदिर तोडक़र बनाया गया था और इन्हें हिंदू समुदाय को सौंपा जाना चाहिए। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि ऐसे मुकदमे उपासना स्थल कानून के खिलाफ हैं।
अहम मामले
ज्ञानवामी मस्जिद : वाराणसी, उत्तरप्रदेश
वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद पर 1991 से मुकदमे चल रहे हैं पर 2021 में एक नए मुकदमे के बाद मामला तेजी से आगे बढ़ रहा है। कई मायनों में सारे लंबित मंदिर-मस्जिद के मामलों में ये केस सबसे आगे बढ़ा हुआ है।
इसमें भगवान विश्वेशर के भक्तों ने 1991 में एक केस दायर किया था। फिर 2021 में पाँच महिलाओं ने एक और याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने मस्जिद में पूजा करने की अनुमति मांगी और ये भी कहा कि मस्जिद में माँ श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश और भगवान हनुमान जैसे कई और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं जिन्हें सुरक्षित किया जाए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर को तोडक़र ये मस्जिद बनाई थी।
वाराणसी की जिला अदालत के फैसले के बाद फरवरी 2024 से मस्जिद के एक तहखाने में इस साल से पूजा भी शुरू हो चुकी है। 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ये कहा कि ये याचिकाएं उपासना स्थल क़ानून के खिलाफ नहीं हैं। अब भी ये सारे मुकदमे अदालतों में लंबित हैं।
शाही ईदगाह मस्जिद- मथुरा, उत्तर प्रदेश
कुछ लोगों का दावा है कि मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद, भगवान कृष्ण के जन्मस्थल पर बनाई गई है। 2020 में छह भक्तों ने अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री की तरफ से एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने मस्जिद को हटाने की माँग की। अब इस मामले में 18 याचिकाएं हैं।
अगस्त 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ये याचिकाएँ भी उपासना स्थल कानून 1991 के खिलाफ नहीं जाती हैं।
2023 में हाई कोर्ट ने एक कोर्ट कमिश्नर को नियुक्त किया था जो मस्जिद का सर्वे कर सके पर जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जो अब तक लागू है।
अजमेर शरीफ दरगाह, राजस्थान
राजस्थान के अजमेर शहर में सूफी संत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर इस साल हिंदू सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने अजमेर की स्थानीय अदालत में एक याचिका दायर की है।
उनका दावा है कि दरगाह के नीचे एक शिव मंदिर है। अपनी याचिका में विष्णु गुप्ता ने वहाँ पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से सर्वे की माँग की है और कहा है कि दरगाह की जगह पर मंदिर फिर से बनना चाहिए।
अजमेर वेस्ट के सिविल जज मनमोहन चंदेल की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए 27 नवंबर को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, दरगाह कमिटी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को नोटिस जारी किया है। इसकी अगली सुनवाई 20 दिसंबर को है।
जामा मस्जिद- संभल, उत्तर प्रदेश
हाल के कुछ दिनों में ये मुकदमा बहुत चर्चा में रहा है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने नवंबर 2024 में एक याचिका में कहा कि संभल की जामा मस्जिद श्री हरिहर मंदिर को तोडक़र बनाई गई है।
इसके बाद कोर्ट ने एक कमिश्नर नियुक्त कर सर्वे करवाया। सर्वे की रिपोर्ट निचली अदालत में जमा हो चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट में भी इसकी अपील अभी लंबित है। 29 नवंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सर्वे के बाद की रिपोर्ट को सीलबंद रखा जाए और हाई कोर्ट की अनुमति के बिना इस केस में आगे कुछ नहीं किया जाए।
इन मामलों के अलावा, जुम्मा मस्जिद (मेंगलुरु, कर्नाटक), बाबा बुदनगिरी दरगाह (चिकमंगलूर, कर्नाटक), कमल मौला मस्जिद (धार, मध्य प्रदेश), टीले वाली मस्जिद (लखनऊ, उत्तर प्रदेश), शम्सी जामा मस्जिद (बदायूं, उत्तर प्रदेश), अटाला मस्जिद (जौनपुर, उत्तर प्रदेश), जामा मस्जिद और शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह (फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश) जैसे मामले भी कोर्ट में हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामले?
ज्ञानवापी मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने एक मौखिक टिप्पणी की थी।
इस टिप्पणी के बाद मस्जिदों के नीचे मंदिरों के अस्तित्व की जांच के लिए सर्वे कराए जाने की मांग की झड़ी सी लग गई है।
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल कानून) 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार, किसी भी संरचना के धार्मिक चरित्र की ‘जांच करने’ पर रोक नहीं लगाता है। तत्कालीन सीजेआई की इस मौखिक टिप्पणी को ट्रायल कोर्ट और बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कानूनी अधिकार के तौर पर लिया।
इन अदालतों ने कहा कि पूजा स्थल अधिनियम के तहत इस तरह के मामलों पर रोक नहीं है। इसके बाद मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मामले में भी सुनवाई को जारी रखने की मंजूरी मिली। (bbc.com/hindi)
औद्योगिक विकास नीति 2024-2030
-छगनलाल लोन्हारे
प्रदेश की नई औद्योगिक नीति 1 नवंबर 2024 से लागू हो गई है, जो 31 मार्च 2030 तक प्रभावशील रहेगी। राज्य के औद्योगिक विकास को गति प्रदान करने के लिए राज्य में औद्योगिक नीतियों की परिकल्पना राज्य गठन के उपरान्त लगातार की जा रही है। छत्तीसगढ़ में अब तक पांच औद्योगिक नीतियां क्रमशः - 2001, 2004-09, 2009-14, 2019-24 प्रवाशील रही एवं अब नई औद्योगिक नीति 2024 लागू की गई है। उपरोक्त औद्योगिक नीति को लागू किये जाने के साथ ही इन नीतियों में तत्कालीन आवश्यकताओं को तथा औद्योगिक विकास के निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए नीतियों में यथा आवश्यकता विभिन्न प्रकार के औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन यथा- ब्याज अनुदान, राज्य लागत पूंजी अनुदान, (अधोसंरचना लागत पूंजी अनुदान), स्टाम्प शुल्क छूट, विद्युत शुल्क छूट, प्रवेश कर छूट, मूल्य संवर्धित कर प्रतिपूर्ति, मंडी शुल्क छूट, परियोजना लागत पूंजी अनुदान इत्यादि प्रदान की जाती रही है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का कहना है कि हमने इस नई नीति को रोजगार परक और विजन-2047 के अनुरूप विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना को ध्यान में रखते हुए विकसित छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण का लक्ष्य तय किया है। हमारा राज्य देश के मध्य मेें स्थित है, आने वाले वर्षो में हम अपनी भौगोलिक स्थिति आवागमन के आधुनिक साधनों और आप सबकी भागीदारी से प्रदेश को ‘‘हेल्थ हब‘‘ बनाने मे सफल होंगे। जगदलपुर के नजदीक हम लगभग 118 एकड़ भूमि पर औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण प्रारभ करने जा रहे है।
प्रदेश के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री श्री लखन लाल देवांगन का कहना है कि निश्चित तौर पर हमारी सरकार की मंशा है कि प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा उद्योग कैसे स्थापित हो इसे ध्यान में रखकर यह उद्योग नीति तैयार की गई है। हमने पहली बार इस नीति के माध्यम से राज्य में पर्यटन एवं स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं में निवेश को भी प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है। हाल ही में आयोजित केबिनेट बैठक में पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है।
इसमें छत्तीसगढ़ सरकार ने भारत सरकार के विजन 2047 की परिकल्पना को साकार करने तथा राज्य के औद्योगिक विकास को गति देने के उद्देश्य से कई प्रावधान किए हैं। राज्य के प्रशिक्षित व्यक्तियों को औपचारिक रोजगार में परिवर्तित करने के लिए उद्योगों हेतु प्रति व्यक्ति 15 हजार रूपए की प्रशिक्षण वृत्ति प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है। यह नीति 31 मार्च 2030 तक के लिए होगी। नई औद्योगिक नीति में निवेश प्रोत्साहन में ब्याज अनुदान, लागत पूंजी अनुदान, स्टाम्प शुल्क छूट, विद्युत शुल्क छूट. मूल्य संवर्धित कर प्रतिपूर्ति का प्रावधान है। नई नीति में मंडी शुल्क छूट, दिव्यांग (निःशक्त) रोजगार अनुदान, पर्यावरणीय प्रोजेक्ट अनुदान, परिवहन अनुदान, नेट राज्य वस्तु एवं सेवा कर की प्रतिपूर्ति के भी प्रावधान किये गये हैं।
इस नीति में राज्य के युवाओं के लिये रोजगार सृजन को लक्ष्य में रखकर एक हजार से अधिक स्थानीय रोजगार सृजन के आधार पर बी-स्पोक पैकेज विशिष्ट क्षेत्र के उद्योगों के लिये प्रावधानित है। राज्य के निवासियों विशेषकर अनुसूचित जाति, जनजाति, महिला उद्यमियों, सेवानिवृत्त अग्निवीर सैनिक, भूतपूर्व सैनिकों, जिनमें पैरामिलिट्री भी शामिल है, को नई औद्योगिक नीति के तहत अधिक प्रोत्साहन दिए जाने का प्रावधान है। नक्सल प्रभावित लोगों, कमजोर वर्ग, तृतीय लिंग के उद्यमियों के लिए नई औद्योगिक पॉलिसी के तहत विशेष प्रोत्साहन दिए जाने का प्रावधान किया गया है। नई औद्योगिक नीति में पहली बार सेवा क्षेत्र अंतर्गत एमएसएमई सेवा उद्यम एवं वृहद सेवा उद्यमों के लिये पृथक-पृथक प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है।
छत्तीसगढ़ संभवतः देश में पहला राज्य है, जिसने युवा अग्निवीरों एवं नक्सल पीड़ित परिवारों को स्वयं के रोजगार धन्धे स्थापित करने पर विशेष अनुदान एवं छूट का प्रावधान किया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के युवाओं को स्वयं का रोजगार उपलब्ध कराने हेतु भी कटिबद्ध हैं। इसके लिए हम इन वर्गों के उद्यमियों को मात्र 1 रूपये प्रति एकड़ की दर पर औद्योगिक क्षेत्रों में भूमि दे रहे है। सरकार का प्रयास होगा कि उद्योग स्थापना एवं संचालन में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो एवं यथासंभव सेल्फ सर्टिफिकेशन अथवा ऑनलाइन माध्यम से हो ताकि आपके उद्योग हेतु आपको सरकार के पास आने की आवश्यकता ना हो।
औद्योगिक विकास नीति 2024-30 के विशेष प्रावधान
यह नीति उद्योगों को निवेश करने, नये रोजगार सृजन करने और आर्थिक विकास को गति देने के लिये एक मजबूत आधार प्रदान करेगी। इस नीति के माध्यम से राज्य के युवाओं के लिए कौशलयुक्त रोजगारों का सृजन करते हुये अगले 5 वर्षों में 5 लाख नए औपचारिक क्षेत्रों में रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। इस नीति मैं स्थानीय श्रमिकों को औपचारिक रोजगार में परिवर्तित करने के लिए प्रशिक्षण कर प्रोत्साहन का प्रावधान करते हुये 1000 से अधिक रोजगार प्रदाय करने वाली इकाइयों को प्रोत्साहन के अतिरिक्त विशेष प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है।
नई औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में आर्थिक एवं सामाजिक उत्थान में सहभागिता के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति, महिला उद्यमियों, सेवानिवृत्त अग्निवीर, भूतपूर्व सैनिकों (जिनमें पैरा मिलिट्री फोर्स भी सम्मिलित है), नक्सल प्रभावित, आत्मसमर्पित नक्सलियों एवं तृतीय लिंग के उद्यमों का अतिरिक्त प्रोत्साहन दिए जाने का प्रावधान किया गया है। औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की परिभाषा को भारत सरकार द्वारा परिभाषित एम.एस.एम.ई. के अनुरूप किया गया है। इसी के अनुसार ही इन उद्यमों को प्राप्त होने वाले प्रोत्साहनों को अन्य राज्यों की तुलना में प्रतिस्पर्धी बनाया गया है।
राज्य सरकार द्वारा देश में सेवा गतिविधियों के बढ़ते हुये। रुझान को दृष्टिगत रखते हुये इस नीति में पहली बार सेवा क्षेत्र अंतर्गत एमएसएमई सेवा उद्यम एवं वृहद सेवा उद्यमों के लिये पृथक-पृथक प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है। सेवा क्षेत्र अंतर्गत इंजीनियरिंग सर्विसेस, रिसर्च एंड डेव्हलपमेंट, स्वास्थ्य सेक्टर, पर्यटन एवं मनोरंजन सेक्टर आदि से संबंधित गतिविधियों को सम्मिलित किया गया है। औद्योगिक विकास नीति 2024-30 में विशिष्ट श्रेणी के उद्योगों जैसे फार्मास्यूटिकल, टेक्सटाईल, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण तथा गैर काष्ठ वनोपज प्रसंस्करण, कम्प्रेस्ड बायोगैस, इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई), रोबोटिक्स एंड कम्प्यूटिंग (जी.पी.यू), आई.टी., आई.टी.ई.एस./डेटा सेंटर जैसे नवीन सेक्टरों के लिए विशेष पैकेज का प्रावधान है।
4 दिसम्बर 2024 को नवा रायपुर में स्टेक होल्डर कनेक्ट वर्कशॉप के दौरान राज्य के 27 बड़े औद्योगिक समूहों को नवीन पूंजी निवेश के प्रस्ताव के संबंध में 32 हजार 225 करोड़ रुपए के निवेश के लिए इंटेंट टू इन्वेस्ट लेटर प्रदान किए। इनमें राज्य के कोर सेक्टर के साथ ही नये निवेश क्षेत्रों जैसे आईटी, एआई, डाटा सेंटर, एथेनॉल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल, कम्प्रेस्ड बायो गैस जैसे क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा। इनमें शिवालिक इंजीनियरिंग, मां दुर्गा आयरन एण्ड स्टील, एबीआरईएल ग्रीन एनर्जी, आरएजी फेरो एलायज, रिलायंस बायो एनर्जी, यश फैंस एण्ड एप्लायंसेस, शांति ग्रीन्स बायोफ्यूल, रेक बैंक डाटा सेंटर आदि सम्मिलित हैं।
इसके साथ ही थ्रस्ट सेक्टर के ऐसे उद्योग जहां राज्य का प्रतिस्पर्धात्मक लाभ है और जहां भविष्य के रोजगार आ रहे हैं, उन क्षेत्रों के लिये अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान है। नीति में प्रोत्साहनों की दृष्टि से राज्य के विकासखण्डों को 03 समूहों में रखा गया है। समूह-1 में 10. समूह 2 में 61 एवं समूह 3 में 75 विकासखण्डों को वर्गीकृत किया गया है।
-चंदन कुमार जजवाड़े
विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ ने राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि राज्य सभा के सभापति जगदीप धनखड़ पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा है, ‘राज्य सभा के माननीय सभापति के अत्यंत पक्षपातपूर्ण तरीक़े से उच्च सदन की कार्यवाही का संचालन करने के कारण इंडिया ग्रुप के सभी घटक दलों के पास उनके खिलाफ औपचारिक रूप से अविश्वास प्रस्ताव लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।’
‘इंडिया गठबंधन के दलों के लिए यह बेहद ही कष्टकारी निर्णय रहा है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र के हित में यह अभूतपूर्व कदम उठाना पड़ा है। यह प्रस्ताव अभी राज्यसभा के सेक्रेटरी जनरल को सौंपा गया है।’
क्या है मामला?
जयराम रमेश ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में आरोप लगाया है, ‘कल (सोमवार) संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने ख़ुद चेयरमैन साहब के सामने कहा कि जब तक आप लोकसभा में अदानी का मुद्दा उठाएंगे, हम राज्यसभा को चलाने नहीं देंगे और इसमें चेयरमैन साहब भी शामिल हैं, चेयरमैन साहब को इसमें अडिग रहना चाहिए।’
संसद के मौजूदा सत्र की शुरुआत से ही सदन में भारत के जाने माने कारोबारी गौतम अदानी और अन्य कई मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध जारी है। इस सत्र की शुरुआत से ठीक पहले ही गौतम अदानी पर अमेरिका में धोखाधड़ी के आरोप तय किए जाने की खबर आई थी।
उसके बाद से ही कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है। कांग्रेस पार्टी पहले भी कई मुद्दों को लेकर अदानी के मसले पर जेपीसी की मांग करती रही है।
जयराम रमेश ने कहा कि राज्यसभा के गठन हुए 72 साल हो गए हैं और पहली बार राज्यसभा के सभापति के खिलाफ प्रस्ताव सौंपा गया है।
बीजेपी सांसद और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है, ‘मैं एक बार फिर से स्पष्ट तौर पर कह रहा हूं कि एक बार जब संसद सुचारू तौर पर चल रही है तो कांग्रेस पार्टी ने किस वजह से ड्रामा शुरू किया? ऐसे मास्क और जैकेट पहनकर आने कि क्या जरूरत है जिसपर स्लोगन लिखे हुए हों...?
रिजिजू ने कहा है, ‘हम यहां देश की सेवा करने के लिए आए हैं, इस तरह का ड्रामा देखने के लिए नहीं आए हैं। जो नोटिस कांग्रेस पार्टी और उसके कुछ सहयोगियों ने दिया है, उसे निश्चित तौर पर नामंज़ूर किया जाना चाहिए और उसे नामंज़ूर किया जाएगा।’
इस बीच भारतीय संविधान में दिए गए प्रावधानों की बात करें तो संविधान में राष्ट्रपति को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया की विस्तार से चर्चा की गई है। उपराष्ट्रपति जो कि राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, उन्हें हटाने की प्रकिया और इसका आधार क्या होता है, इसे जानने के लिए बीबीसी ने कुछ संविधान विशेषज्ञों से बात की है।
कैसे शुरू की जा सकती है प्रक्रिया
लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान के जानकार पीडीटी आचारी के मुताबिक उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए 14 दिन पहले उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जाना जरूरी है।
उपराष्ट्रपति को पद से हटाने की प्रक्रिया राज्यसभा में ही शुरू की जा सकती है, क्योंकि वो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं।
पीडीटी आचारी कहते हैं, ‘इसके लिए अलग से कोई नियम नहीं बनाया गया है। इस मामले में वही नियम लागू होते हैं जो लोकसभा के अध्यक्ष को हटाने के लिए हैं।’
उनका कहना है, ‘अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा के सभापति के खिलाफ खास (निश्चित) आरोप होने चाहिए और नोटिस के 14 दिनों के बाद ही इस प्रस्ताव को राज्यसभा में लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव को राज्यसभा के मौजूदा सदस्यों के सामान्य बहुमत से पारित कराना ज़रूरी होता है। राज्यसभा से पास होने के बाद इस प्रस्ताव को लोकसभा के भी सामान्य बहुमत से पास कराना ज़रूरी होता है।’
विपक्ष को क्या हासिल होगा
यह पहला मौक़ा है जब भारत के किसी उपराष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव भेजा गया है।
संविधान और क़ानून के जानकार फैजान मुस्तफा कहते हैं कि इस तरह की पहल से विपक्ष को कुछ भी हासिल नहीं होगा, क्योंकि वो इसे पास नहीं करवा पाएंगे।
फैजान मुस्तफा कहते हैं, ‘उपराष्ट्रपति को भी चाहिए कि वो डिबेट होने दें और इसके लिए विपक्ष को भी साथ लेकर चलना चाहिए। उपराष्ट्रपति के खिलाफ इस तरह के प्रस्ताव आना भी सही नहीं है। राज्यसभा के सभापति को हटाने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी है, लेकिन संसद का सत्र 20 तारीख को ही खत्म हो रहा है।’
उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग शुरू करने के लिए ‘संविधान का उल्लंघन करना’ आधार होता है, लेकिन उपराष्ट्रपति के लिए ऐसा कुछ नहीं है, उन्हें केवल सदन का भरोसा खो देने पर भी हटाया जा सकता है।’ (bbc.com/hindi)
-सुमेधा पाल
वैसे तो भारत की राजधानी दिल्ली और सीरिया की राजधानी दमिश्क के बीच हज़ारों किलोमीटर की दूरी है। लेकिन, सीरिया के घटनाक्रम पर दिल्ली की नजऱ भी बनी हुई है।
सीरिया लंबे समय से भारत का सहयोगी रहा है और यहां के घटनाक्रम केवल मध्य पूर्व तक ही सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ये अप्रत्याशित तरीकों से भारत को भी प्रभावित कर सकते हैं।
भारत और सीरिया के बीच संबंध दोस्ताना ही रहे हैं। सीरिया में बशर अल-असद शासन का अंत एक अहम घटनाक्रम है, जो न केवल भारत-सीरिया के रिश्तों को प्रभावित करेंगे बल्कि व्यापक रूप से देखें तो ये तेज़ी से दो प्रतिस्पर्धी ध्रुवों में बंटती दुनिया के लिए महत्वपूर्ण पल है।
सीरिया में इस्लामी विद्रोहियों ने रविवार को राष्ट्रपति बशर अल-असद को सत्ता से बाहर करने की घोषणा की। विद्रोहियों के दमिश्क पर नियंत्रण होने के बाद असद ने रूस में शरण ली है। इसके साथ ही देश में 13 साल के गृहयुद्ध का अंत हो गया।
भारत-सीरिया संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
असद का पतन और उसके बाद की अनिश्चितता इस क्षेत्र में भारत के राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए चिंता का कारण बन रही हैं।
भारत और सीरिया के बीच द्विपक्षीय संबंध पश्चिम एशिया में गुटनिरपेक्ष आंदोलन के समय से ही रहे हैं। दोनों देशों के बीच प्राचीन सभ्यताओं का भी मेल-मिलाप रहा है।
भारत और सीरिया के राष्ट्राध्यक्षों के बीच द्विपक्षीय दौरे की शुरुआत 1957 में हुई, जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वहां गए थे। उसी साल सीरिया के राष्ट्रपति शुक्री अल-कुएतली ने नई दिल्ली यात्रा की थी।
भले ही खाड़ी देशों की तरह सीरिया में भारत की एक बड़ी आबादी नहीं रह रही हो, लेकिन भारत ने हमेशा बशर अल-असद के शासन के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे।
सीरिया में गृहयुद्ध की शुरुआत 2011 में हुई, लेकिन भारत के सीरिया में असद सरकार के साथ संबंध बरकरार रहे। भारत ने लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अनुसार सीरिया के नेतृत्व में संघर्ष के समाधान का समर्थन किया है।
भारत ने सीरिया के गृह युद्ध के चरम के दौरान भी दमिश्क में अपना दूतावास बनाए रखा। अब जब गृह युद्ध ख़त्म हो गया है, तो भारत के सामने नई चुनौतियां आ गई हैं।
सीरिया:कश्मीर पर भारत का सहयोगी
असद परिवार (पहले हाफिज़़ अल-असद और बाद में बशर अल-असद के शासन में) हमेशा ही अहम मुद्दों ख़ास तौर पर कश्मीर के मामले में भारत का समर्थक रहा है।
जब कई इस्लामिक देश कश्मीर के मामले में पाकिस्तान के रुख़ के साथ खड़े थे, तब सीरिया उन चुनिंदा देशों में शामिल था, जो भारत के साथ था।
असद परिवार का धर्मनिरपेक्ष शासन भारत के अपने सिद्धांतों के साथ मेल खाता था, जिससे सहयोग के लिए एक मज़बूत आधार बना।
2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को समाप्त कर दिया था, जिसे सीरियाई सरकार ने भारत का ‘आंतरिक मामला’ बताया था।
भारत भी ऐतिहासिक तौर पर गोलान हाइट्स पर सीरिया के दावे का समर्थन करता रहा है, जबकि इसराइल इसके खिलाफ रहा है।
बशर अल-असद का पतन सीरिया में आईएसआईए समेत अन्य चरमपंथी समूहों के उभार का कारण भी बन सकता है। जब इस्लामिक स्टेट की ताकत चरम पर थी, तो रूस और ईरान के समर्थन से सीरिया ने इसकी ताकत ख़त्म की थी।
बदले हालात में भारत के लिए इस्लामिक स्टेट जैसे गुट ख़तरा हैं।
मध्य पूर्व के विशेषज्ञ कबीऱ तनेजा (ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन) ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, ‘भारत का दृष्टिकोण हमेशा यह रहा है कि भले ही सीरिया में घरेलू समस्याएँ हों लेकिन हमारे पास 'प्लान बी' होना चाहिए।’
‘हमें एक और लीबिया की स्थिति नहीं चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश, मुझे लगता है कि यही सीरिया की दिशा है, और यह वही ट्रेंड है, जिसे भारत अफग़़ानिस्तान में 2021 में देख चुका है।’
तनेजा ने यह भी कहा, ‘मुझे लगता है कि भारत अपने संबंध बनाए रखने की कोशिश करेगा। चाहे वह तालिबान का कब्ज़ा हो, या एचटीएस का दमिश्क पर कब्जा। ये आतंकवादी संगठन अंतत: सरकार चला रहे हैं।’
‘चिंता ये है कि अगर भारत एचटीएस से बात करना शुरू करता है, तो कल कश्मीर में आतंकवादी संगठन यह कह सकते हैं कि आप उनसे बात कर रहे हैं, तो हमसे क्यों नहीं? यह एक बहुत ही नाजुक संतुलन है, जिसे भारत को बनाए रखना होगा।’
आर्थिक साझेदारी
कूटनीति के अलावा, भारत-सीरिया संबंधों में आर्थिक सहयोग और व्यापार भी एक बड़ा आधार है।
भारत से सीरिया को निर्यात किए जाने वाले उत्पादों में कपड़े, मशीनरी, और दवाइयां शामिल हैं, जबकि वहां से आयात किए जाने वाले उत्पादों में कच्चे माल जैसे रॉक फॉस्फेट और कपास शामिल है।
भारत ने कई क्षेत्रों में सीरिया के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें पावर प्लांट के लिए 240 मिलियन अमेरिकी डॉलर का क्रेडिट, आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टील प्लांट आधुनिकीकरण, तेल क्षेत्र में सहयोग, चावल, दवाइयां और वस्त्रों के महत्वपूर्ण निर्यात शामिल हैं।
जुलाई 2023 में, तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने दमिश्क का एक महत्वपूर्ण मंत्री स्तरीय दौरा किया था। भारत ने सीरिया के तेल क्षेत्र में दो महत्वपूर्ण निवेश किए हैं।
पहला 2004 में ओएनजीसी और आईपीआर इंटरनेशनल के बीच तेल और प्राकृतिक गैस की तलाश के लिए करार है।
दूसरा ओएनजीसी और चीन के सीएनपीसी द्वारा सीरिया में एक कनाडाई कंपनी में 37 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए किया गया एक संयुक्त निवेश।
साल 2008 में, बशर अल-असद भारत के दौरे पर आए थे। जहां उन्होंने कृषि सहयोग और सीरिया के फॉस्फेट संसाधनों पर अध्ययन करने की योजनाओं को मंजूरी दी थी।
भारत ने सीरिया में एक आईटी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया था।
पश्चिम एशिया मामलों के जानकार डॉ। अशुतोष सिंह कहते हैं, ‘पूरा पश्चिम एशिया ज़्यादातर महाशक्तियों के लिए ‘गार्डन किचन’ है। भारत हमेशा गुटनिरपेक्ष आंदोलन और उपनिवेशी इतिहास के कारण, पश्चिम एशिया के अधिकांश देशों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखता है।’
‘भारत के लिहाज से देखें, तो सीरिया का घटनाक्रम भारत को कई तरह से प्रभावित कर सकता है। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। आप जो सीरिया में कदम उठाएंगे, उनसे आपके ईरान के साथ रिश्ते प्रभावित होंगे।’
‘और फिर ये इसराइल के साथ आपके रिश्ते प्रभावित करेगा। लेकिन यहां सबसे ज़्यादा दिक्कत इसराइल की भूमिका को लेकर है, जो अब गोलान हाइट्स बफऱ ज़ोन में प्रवेश कर चुका है।’
संतुलन की चुनौती
बशर अल-असद सरकार का पतन सीरिया की विदेश नीति और उसके सहयोगियों में बदलाव की वजह बन सकता है।
सीरिया के ऐतिहासिक रूप से रूस और ईरान के साथ मजबूत संबंध रहे हैं, ये दोनों देश भारत के भी प्रमुख रणनीतिक साझेदार हैं।
असद सरकार के पतन के बाद भारत के मिडिल ईस्ट के साथ खाड़ी देशों, ईरान और इसराइल के साथ संबंध भी नए सिरे से बनते हुए प्रतीत हो सकते हैं।
सीरिया में हुआ मौजूदा बदलाव भारत के लिए इन संबंधों की पेचीदगी को साध पाने में परेशानियां पैदा कर सकता है।
9 दिसंबर, 2024 को, विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें सीरिया की संप्रभुता को बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को मिलकर काम करने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।
इस बयान में कहा गया कि भारत सीरिया में हो रहे घटनाक्रमों के मद्देनजर स्थिति की निगरानी रख रहा है। (bbc.com/hindi)
भारत के अरबपति कारोबारी गौतम अदानी के मुद्दे पर संसद में चल रही खींचतान के बीच अब बीजेपी ने अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के बीच कथित संबंध का आरोप लगाया है।
सोमवार को बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ‘फोरम फॉर डेमोक्रेटिक लीडर्स ऑफ़ एशिया पैसिफिक’ से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से संबंध होने के आरोप लगाए हैं।
बीजेपी का आरोप है कि इस फोरम में भारत विरोधी और पाकिस्तान के समर्थन की बातें हो रही हैं। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि इस फोरम की फंडिंग जॉर्ज सोरस के फाउंडेशन से हो रही है। हालाँकि इन आरोपों का कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे कई विपक्षी दलों ने बेबुनियाद कहकर खंडन किया है।
क्या है बीजेपी का आरोप
बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी इससे पहले राज्यसभा में भी आरोप लगा चुके हैं कि ओसीसीआरपी (ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट), जो कि एक फ्रेंच पब्लिकेशन है, उसने अपनी एक हालिया रिपोर्ट में कहा है कि इस प्रोजेक्ट को विदेशी फंडिंग है और इसका फोकस इंडिया पर भी है।
सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, ‘इस रिपोर्ट को विदेशी फंडिंग के अलावा इसके संबंध जॉर्स सोरोस से भी हैं।’
उन्होंने सवाल किया कि बीते तीन साल से क्या ये एक संयोग रहा है कि जब भी भारत में संसद का सत्र चलता है तभी पेगासस रिपोर्ट, किसान आंदोलन, मणिपुर हिंसा और हिंडनबर्ग जैसी घटनाएं होती हैं।
सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि इसी सिलसिले में कोविड वैक्सिन पर भी रिपोर्ट छपती है और मौजूदा सत्र से पहले अमेरिकन अटॉर्नी की एक रिपोर्ट भारत के बिजनेस हाउस से बारे में आती है।
दरअसल, नवंबर महीने के आखिरी दिनों में भारतीय कारोबारी गौतम अदानी पर अमेरिका में अभियोग की रिपोर्ट सामने आई थी।
गौतम अदानी पर अपनी एक कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट दिलाने के लिए 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने और इस मामले को छिपाने का आरोप लगाया गया है।
इसके बाद से ही पर कांग्रेस पार्टी लगातार बीजेपी पर हमलावर है और इस मुद्दे को संसद में भी उठाने की कोशिश करती रही है। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर जेपीसी की मांग भी कर चुकी है। सुधांशु त्रिवेदी ने राज्यसभा में सवाल खड़े किए कि यह सब जानबूझकर हो रहा है या अनजाने में।
इससे पहले, बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोरोस फाउंडेशन में काम करने वाले लोगों के बीच संबंधों का आरोप लगाया था।
निशिकांत दुबे ने गुरुवार को इस मुद्दे को संसद में भी उठाया था और संसद के बाहर भी इस मुद्दे पर मीडिया में बयान दिया था।
हालांकि कांग्रेस नेता शशि थरूर ने निशिकांत दुबे के आरोप को संसदीय विशेषाधिकार के खिलाफ बताया है। शशि थरूर ने आरोप लगाया है कि संसद के नियमों के खिलाफ राहुल गांधी को बिना नोटिस दिए निशिकांत दुबे को बोलने की अनुमति दी गई।
सोरोस पहले भी रहे हैं बीजेपी के निशाने पर
वहीं बीजेपी सांसद किरेन रिजिजू का कहना है कि कुछ मुद्दों पर राजनीतिक चश्मे से बाहर आकर देखना चाहिए और सभी को मिलकर देश विरोधी ताक़तों से लडऩा चाहिए।
रिजिजू ने आरोप लगाया है, ‘जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन के साथ कई ऐसी ताक़ते हैं जो भारत के खिलाफ काम करती हैं। ’
अमेरिकी अरबपति कारोबारी जॉर्स सोरोस के मुद्दे पर बीजेपी पहले भी हमलावर रही है।
पिछले साल की शुरुआत में जर्मनी के म्यूनिख़ में रक्षा सम्मेलन में जॉर्ज सोरोस ने कहा था भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकतांत्रिक नहीं हैं और मोदी के तेज़ी से बड़ा नेता बनने की अहम वजह भारतीय मुसलमानों के साथ की गई हिंसा है।
सोरोस ने भारतीय कारोबारी गौतम अदानी का भी जि़क्र किया था और कहा था, ‘मोदी और अरबपति अदानी में कऱीबी रिश्ते हैं। दोनों का भविष्य एक-दूसरे से बंधा हुआ है। अदानी पर स्टॉक मैनीपुलेशन के आरोप हैं और मोदी इस मामले पर खामोश हैं लेकिन उन्हें विदेशी निवेशकों और संसद में सवालों के जवाब देने ही होंगे।’
सोरोस के इस बयान के फौरन बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने एक प्रेस कॉन्फ्ऱेंस कर कहा कि जॉर्ज सोरोस का बयान भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बर्बाद करने की घोषणा है।
सोरोस के बयान पर उस वक़्त भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि सोरोस की टिप्पणी ठेठ ‘यूरो अटलांटिक नज़रिये’ वाली है।
जयशंकर ने कहा था, ‘सोरोस एक बूढ़े, रईस, हठधर्मी व्यक्ति हैं जो न्यूयॉर्क में बैठकर सोचते हैं कि उनके विचारों से पूरी दुनिया की गति तय होनी चाहिए।’
सबसे पहले, जनवरी 2020 में दावोस में हुई वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए सोरोस ने कहा था कि भारत को हिंदू राष्ट्रवादी देश बनाया जा रहा है।
कौन हैं जॉर्ज सोरोस?
जॉर्ज सोरोस एक अमेरिकी अरबपति उद्योगपति हैं। ब्रिटेन में उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तरह जाना जाता है जिसने साल 1992 में शॉर्ट सेलिंग से बैंक ऑफ इंग्लैंड को बर्बादी की हद तक हिला दिया था। उनका जन्म हंगरी में एक यहूदी परिवार में हुआ था। हिटलर के नाज़ी जर्मनी में जब यहूदियों को मारा जा रहा था तो वो किसी तरह सुरक्षित बच गए।
बाद में वे कम्युनिस्ट देश से निकलकर पश्चिमी देश आ गए थे। शेयर मार्केट में पैसा लगाने वाले सोरोस ने शेयर बाज़ार से कऱीब 44 अरब डॉलर कमाए। इस पैसे से उन्होंने हज़ारों स्कूल, अस्पताल बनवाए। सोरोस ने लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिए लडऩे वाले संगठनों की मदद की।
साल 1979 में सोरोस ने ओपन सोसाइटी फाउंडेशन की स्थापना की जो अब कऱीब 120 देशों में काम करती है। उनके इस काम की वजह से वो हमेशा दक्षिणपंथियों के निशाने पर भी रहते हैं। उन्होंने साल 2003 के इराक़ युद्ध की आलोचना की थी और अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी को लाखों डॉलर दान में दिए थे। इसके बाद से उनपर अमेरिकी दक्षिणपंथियों के हमले और तेज होने लगे।
साल 2019 में ट्रंप ने एक वीडियो को रिट्वीट करते हुए दावा किया था कि होन्डुरास से हजारों शरणार्थियों को अमेरिकी सीमा पार करके दाखिल होने के लिए सोरोस ने पैसे दिए थे।
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या इसके पीछे सोरोस हैं तो ट्रंप का जवाब था बहुत से लोग ऐसा ही कहते हैं और अगर ऐसा है तो वो भी इससे हैरान नहीं होंगे।
बाद में पता चला कि सोरोस ने किसी को कोई पैसे नहीं दिए थे और ट्रंप ने जो वीडियो शेयर किया था वो भी फेक था।
सोरोस के ख़िलाफ़ रहे हैं कई देश
अक्टूबर 2018 में एक अमेरिकी श्वेत श्रेष्ठतावादी (वाइट सुपरेमिस्ट) ने सिनागॉग में गोलीबारी कर 11 यहूदियों को मार दिया था।
गोलीबारी करने वाले रॉबर्ट बोवर्स की सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल से कई बातें पता चलीं। वो मानते थे कि उनकी जैसी विचारधारा रखने वाले श्वेत श्रेष्ठतावादियों के नरसंहार का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। उसे लगता था कि इसके पीछे जॉर्ज सोरोस हैं।
लेकिन अमेरिका ही नहीं जॉर्ज सोरोस के ख़िलाफ़ आर्मेनिया, ऑस्ट्रेलिया, रूस और फि़लीपींस में भी अभियान चलाए जाते हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप अर्दोआन तक ने कहा था कि सोरोस उस यहूदी साजि़श के केंद्र में हैं जो तुर्की को आपस में बांट कर बर्बाद करना चाहता है।
ब्रिटेन की ब्रेग्जि़ट पार्टी के नाइजल फराज का दावा है कि सोरोस शरणार्थियों को पूरे यूरोप में फैल जाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उनके मुताबिक सोरोस पूरी पश्चिमी दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
सोरोस के जन्मस्थान हंगरी की सरकार भी उन्हें अपना दुश्मन मानती है और साल 2018 के चुनाव प्रचार के दौरान हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन ने सोरोस पर ख़ूब निशाना साधा।
उन चुनावों में ऑर्बन की जीत हुई और सोरोस समर्थित संस्थाओं पर सरकारी हमले इतने बढ़ गए कि सोरोस की संस्था ने हंगरी में काम करना बंद कर दिया। (bbc.com/hindi)
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए दोबारा चुने गए डॉनल्ड ट्रंप ने ब्रिक्स देशों को डॉलर को चुनौती देने के लिए नई मुद्रा लाने की योजना पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है.
डॉयचे वैले पर निक मार्टिन का लिखा-
ब्रिक्स समूह का नाम इसके मूल सदस्य देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के नाम पर रखा गया है। ये सभी देश 21वीं सदी में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। फिलहाल, वैश्विक स्तर पर 80 फीसदी कारोबार के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन ये देश डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहते हैं।
अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि डॉलर आधारित वित्तीय प्रणाली से अमेरिका को काफी ज्यादा आर्थिक फायदा होता है। जैसे, कम ब्याज दर पर कर्ज लेना, बड़े राजकोषीय घाटे को झेलने की क्षमता, और स्थिर विनिमय दर।
अमेरिकी डॉलर को चुनौती क्यों देना चाहते हैं ब्रिक्स देश
डॉलर का इस्तेमाल तेल और सोने जैसी वस्तुओं की कीमत तय करने के लिए किया जाता है। जब दुनिया में अनिश्चितता होती है, तो निवेशक अक्सर डॉलर में निवेश करते हैं क्योंकि डॉलर स्थिर होता है।
डॉलर का इस्तेमाल दुनिया भर में होता है। इससे अमेरिका को बहुत अधिक राजनीतिक ताकत मिलती है। वह दूसरे देशों पर प्रतिबंध लगा सकता है। साथ ही, उनके व्यापार और पूंजी पर रोक लगा सकता है।
ब्रिक्स समूह अब समय के साथ बड़ा हो रहा है। हाल ही में ईरान, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात इस समूह में शामिल हुए हैं। ब्रिक्स के सदस्य देशों ने अमेरिका पर डॉलर को ‘हथियार' की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि इससे प्रतिद्वंद्वी देशों को अमेरिकी हितों के तहत परिभाषित ढांचे के भीतर काम करना पड़ता है।
जब यूक्रेन पर रूसी हमले की वजह से अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था, तब एक नई साझा मुद्रा के बारे में चर्चा काफी ज्यादा बढ़ गई थी। इस दौरान यह भी चिंता जताई गई थी कि अगर ब्रिक्स समूह में शामिल अन्य देश पश्चिमी देशों के साथ मतभेद रखते हैं, तो उन्हें भी निशाना बनाया जा सकता है।
ब्रिक्स मुद्रा योजना किस तरह तैयार हुई?
ब्रिक्स मुद्रा बनाने का विचार सबसे पहले 2008-09 के वित्तीय संकट के तुरंत बाद आया था। उस समय अमेरिका में रियल एस्टेट में उछाल और कमजोर नियम-कानूनों ने पूरी दुनिया में बैंकिंग प्रणाली को लगभग ध्वस्त कर दिया था।
पिछले साल दक्षिण अफ्रीका में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में, इन देशों ने डॉलर से जुड़े जोखिम कम करने के लिए एक साझा मुद्रा बनाने की संभावना पर विचार करने पर सहमति जताई। हालांकि, समूह के प्रमुख देशों ने यह भी कहा कि इसे पूरा होने में कई साल लग सकते हैं।
इस साल अक्टूबर में कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए ब्लॉकचेन-आधारित अंतर्राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली का प्रस्ताव रखा, जिसे पश्चिमी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है।
हालांकि, पुतिन की योजना को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखा, लेकिन ब्रिक्स देशों ने स्थानीय मुद्राओं में ज्यादा व्यापार करने पर सहमति जताई, ताकि वे डॉलर पर कम निर्भर रहें। पुतिन और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा नई मुद्रा के सबसे बड़े समर्थक हैं। चीन ने स्पष्ट रूप से कोई राय नहीं दी है, लेकिन उसने डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों का समर्थन किया है। वहीं, भारत इस मामले पर काफी सावधानी से अपने कदम बढ़ा रहा है।
क्या साझा मुद्रा तैयार करना संभव है?
ब्रिक्स देशों के लिए एक नई साझा मुद्रा बनाना बहुत बड़ी चुनौती होगी। इन नौ देशों की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाएं अलग-अलग हैं, जिससे कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। ये देश आर्थिक विकास के अलग-अलग चरणों में हैं और उनकी विकास दर में काफी अंतर है।
उदाहरण के लिए, चीन एक सत्तावादी देश है, लेकिन इसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 17।8 ट्रिलियन डॉलर है, जो ब्रिक्स समूह के कुल जीडीपी का लगभग 70 फीसदी है। चीन अपने व्यापार से कमाई ज्यादा करता है और एक प्रमुख निर्यातक के रूप में अपनी प्रतिस्पर्धा को बनाए रखने के लिए डॉलर का बड़ा भंडार रखता है। दूसरी ओर, भारत कारोबारी घाटे में चल रहा है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसकी अर्थव्यवस्था 3।7 ट्रिलियन डॉलर की है।
ब्रिक्स में चीन का प्रभुत्व एक बड़ा असंतुलन पैदा करेगा। इससे भारत के लिए किसी भी ऐसी नई मुद्रा पर सहमत होना मुश्किल होगा जिससे उसके राष्ट्रीय हित पर असर हो। ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों के बीच असमानता से भी साझा मुद्रा पर विरोध बढ़ सकता है।
ट्रंप के टैरिफ का क्या और कितना होगा असर
यह भी संभावना नहीं है कि ब्रिक्स देश आखिरकार डॉलर या यूरो जैसी पूरी तरह से कारोबार वाली मुद्रा की ओर बढऩा चाहते हैं। पहली बार यूरो का प्रस्ताव 1959 में रखा गया था। 2002 में यूरो को यूरोपीय संघ के 12 देशों में वैध मुद्रा के तौर पर मान्यता मिली। दूसरे शब्दों में कहें, तो यूरो को साझा मुद्रा बनने में 40 साल से अधिक का वक्त लगा। इसके बाद, 20 अन्य यूरोपीय देशों में यूरो अपनाया गया।
सबसे संभावित विकल्प यह है कि ऐसी साझा मुद्रा बनानी होगी जिसका इस्तेमाल सिर्फ व्यापार के लिए किया जाए। इसका मूल्य सोने या तेल जैसी वस्तुओं और अन्य मुद्राओं के आधार पर तय किया जाए।
ब्रिक्स देशों की नई मुद्रा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की स्पेशल ड्राइंग राइट्स (एसडीआर) की तरह काम कर सकती है। एसडीआर एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संपत्ति है, जिसका मूल्य डॉलर, यूरो, युआन, येन और पाउंड की दैनिक विनिमय दरों पर आधारित होता है। कुछ लोगों का सुझाव है कि ब्रिक्स के लिए एक विकल्प डिजिटल मुद्रा भी हो सकती है।
ट्रंप की 100 फीसदी टैरिफ की धमकी जल्दबाजी तो नहीं?
ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल' पर शनिवार को लिखा कि जब वह जनवरी में व्हाइट हाउस लौटेंगे, तो ब्रिक्स देशों से ‘यह वचन मांगेंगे' कि वे ‘न तो एक नई ब्रिक्स मुद्रा बनाएंगे और न ही किसी ऐसी अन्य मुद्रा का इस्तेमाल करेंगे जो अमेरिकी डॉलर की जगह ले सके।'
हालांकि, इसे ट्रंप की जल्दबाजी कह सकते हैं, क्योंकि मुद्रा के प्रस्ताव पर ब्रिक्स देशों के नेताओं की बयानबाजी के बावजूद इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।
दरअसल, 2 दिसंबर को दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने जोर देकर कहा कि ब्रिक्स मुद्रा बनाने की कोई योजना नहीं है। साथ ही, उन्होंने गलत बयानबाजी के लिए ‘हाल ही में की गई गलत रिपोर्टिंग' को दोषी ठहराया।
ब्राजील के डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन ऐंड कोऑपरेशन (डीआईआरसीओ) के प्रवक्ता क्रिसपिन फिरी ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा कि अब तक की चर्चा राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल करके समूह के भीतर व्यापार को बढ़ावा देने पर केंद्रित रही है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
ट्रंप की धमकी से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के साथ अमेरिका के रिश्ते खराब हो सकते हैं, जो उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी हैं। इसके बदले में अमेरिका को भी जवाबी कार्रवाई की धमकी मिल सकती है।
ट्रंप पहले से ही चीन और अपने अन्य प्रतिद्वंद्वी देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं। अगर उनकी सरकार इस तरह का कोई भी कदम उठाती है, तो इससे दुनिया भर में और अमेरिका में भी महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।
डॉलर को प्राथमिकता देने का यह फैसला ट्रंप के पहले कार्यकाल से नीतिगत बदलाव को दिखाता है यानी कि यह फैसला उनके पहले कार्यकाल की नीति की तुलना में बिल्कुल अलग है। पहले वे डॉलर को कमजोर करके अमेरिकी निर्यात को बढ़ावा देना चाहते थे। अब उनके धमकी देने से डॉलर मजबूत हुआ है और सोने, रुपये और रैंड की कीमत कम हुई है।
वहीं इन सब के बीच, रूसी सरकार के प्रवक्ता दमित्री पेस्कोव ने कहा कि डॉलर को रिजर्व करेंसी के रूप में इस्तेमाल करने का चलन कम हो रहा है। ज्यादा से ज्यादा देश अपने व्यापार और विदेशी आर्थिक गतिविधियों के लिए अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। (dw.com)
असद परिवार के सीरिया पर 50 साल लंबे राज का दो हफ्तों में ही अंत हो गया. हालांकि इस पूरे हमले की योजना कई महीनों पहले बनी थी. इसमें तुर्की की भी भूमिका बताई जा रही है.
एक तेज और अप्रत्याशित घटनाक्रम में, सीरिया के विद्रोही बलों ने राष्ट्रपति बशर अल-असद को हटा दिया है। इससे असद परिवार के पांच दशक लंबे शासन का अंत हो गया। यह बड़ा बदलाव दमिश्क पर विद्रोहियों के गठबंधन के साथ आने से हुआ, जिसका नेतृत्व हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) ने किया। इसने सीरिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मध्य पूर्व के भविष्य को लेकर सवालों में डाल दिया है।
यह पूरा घटनाक्रम दो हफ्तों से भी कम का था, जिसमें असद की सत्ता पलट गई। लेकिन इसकी बिसात छह महीने पहले लिखी गई थी, जब एचटीएस ने तुर्की को इस हमले की योजना बताई थी। इस हमले की शुरुआत सीरिया के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो पर कब्जे से हुई। इसके बाद विद्रोहियों ने हुमा और होम्स जैसे प्रमुख शहरों पर कब्जा किया और आखिरकार रविवार को दमिश्क में प्रवेश किया। असद राजधानी छोडक़र मॉस्को भाग गए हैं।
असद के पतन के पीछे की वजहें
इस सफल विद्रोही अभियान में कई कारणों ने असद के शासन को कमजोर बनाया। सीरियाई सेना, जो पहले से ही हताश और भ्रष्टाचार से भरी हुई थी, विद्रोहियों के हमले का सामना करने में असमर्थ थी। टैंकों और विमानों जैसे हथियार खराब रखरखाव और लूटपाट के कारण बेकार हो गए थे। असद की सेना में मनोबल कई सालों से गिरा हुआ था। सैनिकों की बढ़ती संख्या में बगावत और सहयोगियों के समर्थन में कमी ने इसे और खराब कर दिया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, असद के मुख्य समर्थक रूस, ईरान, और हिजबुल्लाह या तो कमजोर हो गए थे या दूसरी समस्याओं में उलझे थे। रूस का ध्यान यूक्रेन युद्ध पर था। हिजबुल्लाह ने इस्राएल के साथ युद्ध के कारण अपनी विशेष इकाइयों को सीरिया से हटा लिया। इससे असद शासन कमजोर हो गया।
पहले से ही आंतरिक समस्याओं से जूझ रहे ईरान ने सीरिया में अपना प्रभाव खो दिया। हिजबुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह की मौत और इसके बाद नेतृत्व का संकट असद के लिए और बड़ा झटका साबित हुआ।
तुर्की की अहम भूमिका
तुर्की ने विद्रोहियों के इस अभियान में एक अहम लेकिन विवादास्पद भूमिका निभाई। आधिकारिक तौर पर, तुर्की ने सीधा समर्थन देने से इंकार किया है। लेकिन तुर्की ने लंबे समय से सीरियाई विपक्षी गुटों का समर्थन किया है, जिनमें तुर्की समर्थित सीरियाई नेशनल आर्मी (एसएनए) भी शामिल है।
कुछ अधिकारियों के मुताबिक विद्रोहियों ने छह महीने पहले तुर्की को अपनी योजना की जानकारी दी थी। उन्होंने तुर्की से यह सुनिश्चित करने की मांग की कि उनका अभियान रोका नहीं जाएगा। तुर्की के अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने विद्रोहियों को कोई स्पष्ट मंजूरी नहीं दी, लेकिन हस्तक्षेप न करके उन्हें रणनीतिक समर्थन दिया।
तुर्की के लिए यह अभियान उसके रणनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप ही है। इनमें सीरियाई कुर्द गुटों को नियंत्रित करना और सीरियाई शरणार्थियों की वापसी की संभावना शामिल है। राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ बिरोल बास्कान ने कहा, ‘तुर्की यहां सबसे बड़ा बाहरी विजेता है। एर्दोआन सही पक्ष में रहे, क्योंकि उनके समर्थक ने जीत हासिल की।’
हयात तहरीर अल-शाम की भूमिका
एचटीएस एक इस्लामिक समूह है, जिसका नेतृत्व अल कायदा के पूर्व प्रमुख अबू मोहम्मद अल-गोलानी करते हैं। असद के खिलाफ हमले में एचटीएस केंद्रीय भूमिका में था। कभी अल-कायदा से जुड़े इस समूह ने खुद को एक राष्ट्रवादी आंदोलन के रूप में पेश करने की कोशिश की है।
गोलानी के नेतृत्व ने विद्रोही गुटों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र ने एचटीएस और अन्य संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है। तुर्की भी इस समूह के कुछ संगठनों को आतंकवादी संगठन मानता है। इस कारण यह गठजोड़ संदेह पैदा करता है कि यह समूह सीरिया की भविष्य की सरकार में क्या भूमिका निभाएगा।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ साइमन मैबन कहते हैं कि एचटीएस की सार्वजनिक छवि इस मामले को बहुत जटिल बनाता है। उन्होंने कहा, ‘उन्होंने एक हद तक समर्थन प्राप्त किया है। यह समर्थन उनकी विचारधारा के लिए नहीं है, बल्कि असद को हटाने की साझा इच्छा के लिए है।’
क्षेत्रीय और वैश्विक असर
असद का पतन ईरान के मध्य-पूर्व में प्रभाव के लिए बड़ा झटका है। दमिश्क में अपने मुख्य सहयोगी को खोने के साथ, ईरान पहले ही लेबनान में अपनी भूमिका कमजोर कर चुका है। इस्राइल ने अप्रत्यक्ष रूप से विद्रोही अभियान में मदद की। हिजबुल्लाह को कमजोर करने के उनके प्रयासों ने विद्रोहियों के अभियान को आसान बनाया।
अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के लिए, ये तेज घटनाक्रम सवाल उठाते हैं कि वे सीरिया के भविष्य को आकार देने में क्या भूमिका निभाएंगे। असद शासन के अंत के बाद सीरिया का भविष्य अनिश्चित है। संयुक्त राष्ट्र ने शांतिपूर्ण बदलाव के लिए समर्थन की बात की है। लेकिन सीरियाई विपक्षी गुटों में फूट और चरमपंथी तत्वों की मौजूदगी से एकता और लोकतंत्र की संभावना कम हो जाती है।
एचटीएस की विद्रोही गठबंधन में प्रमुखता पश्चिमी और खाड़ी देशों के लिए चिंता का विषय है। जबकि गोलानी ने एचटीएस को इसके चरमपंथी अतीत से अलग करने की कोशिश की है, लेकिन उनके नेता बनने की संभावना को लेकर संदेह बना हुआ है।
घरेलू स्तर पर, 14 साल के युद्ध से तबाह हुए देश को फिर से खड़ा करना असंभव नहीं, लेकिन मुश्किल होगा। असद के शासनकाल में बनी दरारों और शिकायतों को दूर करना एक बड़ा काम होगा। अभी के लिए, सीरिया में खुशी और जश्न का माहौल है। डर और हिंसा से भरी सडक़ों पर अब उम्मीद और राहत नजर आ रही है।
मैबन ने कहा, ‘यह सीरियाई लोगों के लिए बेहद खुशी का पल है। एक रोमांचक समय। राहत और उम्मीद का माहौल है, भले ही चुनौतियां बरकरार हों।’
आने वाले हफ्ते सीरिया के लिए निर्णायक होंगे। दुनिया देख रही है कि क्या यह ऐतिहासिक पल स्थाई शांति और स्थिरता ला सकता है। (dw.com)
-रति सक्सेना
फिल्म देख रही थी, ‘बॉयहुड’ फिल्म सामान्य जिन्दगी की है, लेकिन अन्त में आए वाक्य ने एक खास पीढ़ी का इतिहास ही खोल दिया। अमेरिकन फिल्मों होने के कारण डायवोर्स आदि सामान्य रूप से आए है।
महिला दो बच्चों की मां है, कि उसका पति प्रेमी उसे छोडक़र डायवोर्स ले लेता है। समस्या बच्चों के स्कूल की फीस और बिल्स की है, वह फिर से पढ़ाई भी शुरू कर चुकी है। दूसरे प्रेम में फंसकर विवाह करती है। यह पति जिसके पहले से दो बच्चे हैं, बच्चों के प्रति बहुत जालिम है, धीरे-धीरे पत्नी को भी मारने-पीटने लगता है तो वह अपने बच्चों को बचाने के लिए दोस्त के घर जाती है। तब तक तीसरा पति दिखाई देता है जो अकड़ू टाइप का है, जिससे भी छुटकारा मिल जाता है।
बेटी कॉलेज चली जाती है, बेटा जाने की तैयारी है, मां कहती है कि तुम लोग अपना सामान ले जाओ, बच्चे समझ नहीं पाते, उनके लिए तो मां बस एक खूंटा थी, जिससे बंधे होने पर वे सुरक्षित रह सकते थे।
स्त्री कहती है मैं प्यार को समझने से पहले ही मां बन गई, शादी करनी पड़ी। मैं बच्चों में खो गई, मेरा पहला पति युवा ही था, वह मुझे छोडक़र गया। तब से सिर्फ मां बनी रही, पढ़ाई की नौकरी और पतियों के तलाक के बाद दूसरे पति भी खोजे। अन्त में न मेरे पास कोई पति है, न ही तुम लोग, तुम्हारी बहन चार साल पहले चली गई, तुम जा रहे हो। मेरी सारी जिंदगी, सारे संघर्ष तुम लोगों के लिए हैं। इस वक्त मेरे पास अपना कहलाने को कोई नहीं है।
बेटा कहता है कि हम क्रिसमस में आएंगे, तो मां कहती है कि तुम लोगों की क्रिसमस की यादें बनाये रखने के लिए मैं अपने बाकी साल यूं ही गुजार दूँ, इससे अच्छा कि मैं किसी छोटे स्कूल के बच्चों को पढ़ाऊँ, कुछ ऐसा काम करूं, जो मुझे मेरे लिए पसन्द हो।
- ह्यूगो बाशेगा
एक सप्ताह पहले जब विद्रोहियों ने सीरिया के उत्तर-पश्चिम में इदलिब स्थित अपने ठिकाने से हैरान करने वाला अपना अभियान शुरू किया था, तब तक सीरिया में बशर अल-असद के पतन के बारे में शायद कोई सोच भी नहीं रहा होगा।
बशर अल-असद साल 2000 में अपने पिता हाफिज़़ अल-असद के निधन के बाद सत्ता में आए थे। हाफिज ने 29 साल तक सीरिया पर शासन किया था। उनका शासन भी अपने बेटे असद के शासन की तरह कठोर था।
यानी बशर अल-असद को एक कठोर और दमनकारी सियासत विरासत में मिली थी। हालांकि पहले उम्मीद की जा रही थी कि असद अपने पिता से अलग होंगे। शायद थोड़े ज़्यादा खुले विचारों वाले और थोड़े कम क्रूर। लेकिन ये उम्मीदें ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक सकीं।
अल-असद परिवार के शासन का अंत
बशर अल-असद को हमेशा ऐसे शख्स के रूप में याद किया जाएगा जिसने साल 2011 में अपने शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को क्रूरता से दबाया।
उनके इसी फैसले की वजह से सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ गया, जिसमें पाँच लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और छह लाख लोग विस्थापित होकर शरणार्थी बन गए।
बशर अल-असद ने रूस और ईरान की मदद से विरोधियों को कुचल दिया और अपना शासन बचाकर रखा। रूस ने सीरिया में ज़बरदस्त हवाई हमले का इस्तेमाल किया।
जबकि ईरान ने सीरिया में अपने सैन्य सलाहकार भेजे और पड़ोसी लेबनान में उसके समर्थन वाले हथियारबंद गुट हिज़्बुल्लाह ने अपने प्रशिक्षित लड़ाकों को सीरिया में लडऩे के लिए भेजा था।
हालांकि इस बार ऐसा नहीं हुआ। अपने मसलों में व्यस्त सीरिया के सहयोगियों ने उसे लगभग छोड़ दिया।
इस मदद के बिना सीरियाई सैनिक इस्लामी चरमपंथी समूह हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) के नेतृत्व वाले विद्रोहियों को रोकने में असमर्थ थे और जाहिर तौर पर कुछ जगहों पर एचटीएस को रोकने की उनकी इच्छा भी नहीं थी। सबसे पहले पिछले हफ्ते विद्रोहियों ने लगभग बिना किसी विरोध के देश के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो पर कब्जा कर लिया। फिर हमा और कुछ दिनों बाद होम्स के मुख्य केंद्र पर कब्जा कर लिया।
विद्रोहियों की इस कामयाबी से सीरिया की राजधानी दमिश्क अलग-थलग पड़ गई और कुछ ही घंटों में वे राजधानी में घुस गए। दमिश्क ही असद की सत्ता का केंद्र है।
अब सीरिया में असद परिवार के पांच दशक के शासन का अंत इस इलाके में शक्ति संतुलन को नया स्वरूप दे सकता है।
तुर्की का इंकार
सीरिया की घटना के बाद ईरान फिर से अपने प्रभाव पर एक बड़ा झटका महसूस कर रहा है। बशर अल-असद के शासन में सीरिया ईरानियों और हिज़्बुल्लाह के बीच संबंध का एक हिस्सा था। यह हथियार और गोला-बारूद के मुहैया कराने के लिहाज़ से काफ़ी अहम था।
इसराइल के साथ जंग के बाद हिज़्बुल्लाह ख़ुद ही काफी कमजोर हो चुका है और इसका अपना भविष्य ही अनिश्चित नजर आता है।
ईरान समर्थित एक अन्य गुट ‘हूती’ भी यमन में हवाई हमलों के निशाने पर रहा है। इन गुटों के अलावा, इराक में सक्रिय हथियारबंद गुट और गजा में हमास जैसे गुटों को ईरान ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ कहता है, उन्हें काफी गंभीर नुकसान पहुंचाया जा चुका है।
इस नए हालात का इसराइल में जश्न मनाया जाएगा, जो ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है।
कई लोगों का मानना है कि सीरिया में ताजा हमला तुर्की के आशीर्वाद के बिना संभव नहीं था। हालांकि सीरिया के कुछ विद्रोही गुटों का समर्थन करने वाले तुर्की ने एचटीएस को किसी भी समर्थन से इंकार किया है।
कुछ समय से तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने बशर अल-असद पर दबाव डाला था कि वो संघर्ष का कूटनीतिक समाधान तलाशने के लिए बातचीत में शामिल हों, जिससे सीरियाई शरणार्थियों की वापसी हो सके। लेकिन असद ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था।
इन शरणार्थियों में से कम से कम तीस लाख शरणार्थी तुर्की में हैं और यह स्थानीय स्तर पर एक संवेदनशील मुद्दा है।
ज्यादा हिंसा की आशंका
बहुत से लोग सीरिया में बशर अल-असद के शासन का अंत देखकर खुश भी हैं।
लेकिन आगे क्या होगा? ‘एचटीएस’ की जड़ें अल-क़ायदा से जुड़ी हैं और उनका अतीत काफ़ी हिंसक रहा है।
हालांकि यह गुट पिछले कुछ साल से ख़ुद को एक राष्ट्रवादी ताकत के रूप में फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। उनके हालिया संदेशों में भी कूटनीतिक और मेल-मिलाप वाली भाषा भी नजर आती है।
लेकिन कई लोग इससे सहमत नहीं हैं और ऐसे लोग उस बात को लेकर चिंतिंत हैं, जिसे शायद सीरियाई शासन को गिराने के बाद अंजाम देने की योजना बन रही होगी।
ठीक इसी समय सीरिया में नाटकीय सत्ता परिवर्तन से शासन के शीर्ष पर एक खालीपन आ सकता है, जिसकी वजह से अराजकता और इससे कही ज्यादा हिंसा शुरू हो सकती है।
-सुरेन्द्र ग्रोवर
जैसे-जैसे हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विकास की गहराई में जाते हैं, हमें इसके संभावित खतरों और इसके दुरुपयोग के प्रति सतर्क रहना आवश्यक हो जाता है। सामान्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (General AI), जो मानव मस्तिष्क के समान सोचने और निर्णय लेने में सक्षम होगी, भविष्य का एक अहम पड़ाव है। लेकिन यह यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। अगला कदम स्ट्रॉन्ग AI और सुपर AI का होगा, जो मानव मस्तिष्क की क्षमताओं को कई गुना पार कर सकते हैं।
AI का क्रमिक विकास और संभावित खतरे
सामान्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (General AI):
General AI को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि यह मानव के समान समस्याओं का हल निकाल सके। हालांकि, इसमें एक बड़ी समस्या यह है कि यह पारदर्शी नहीं है। जब General AI कोई निर्णय लेता है, तो हमें यह समझने में कठिनाई होती है कि उसने वह निर्णय किस आधार पर लिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि General AI, यदि अनियंत्रित रहा, तो यह वैश्विक संघर्ष और यहां तक कि युद्ध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है।
स्ट्रॉन्ग AI और सुपर AI का उदय:
स्ट्रॉन्ग AI वह तकनीक है, जो किसी भी कार्य को करने में इंसानों की बराबरी या उससे अधिक दक्षता दिखा सकती है।
सुपर AI वह स्तर है, जहाँ AI मानव बुद्धि को न केवल बराबर करता है बल्कि उससे कहीं अधिक उन्नत हो जाता है।
सुपर AI की संभावनाओं से ही सबसे बड़ा खतरा है। इसका अनियंत्रित होना न केवल मानवता बल्कि पृथ्वी के अस्तित्व के लिए चुनौती बन सकता है।
फिल्मों में दिखाए गए संभावित खतरे : कल्पना से हकीकत की ओर
1. Terminator सीरीज :
इस फिल्म में Skynet नामक AI सिस्टम ने खुद को इतना विकसित कर लिया कि वह मानव जाति को खतरा मानने लगा और विनाशकारी युद्ध छेड़ दिया।
संबंधित खतरा: आज भी AI को स्वायत्तता देकर इसी प्रकार के जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
2. I, Robot (2004) :
इस फिल्म में रोबोट्स मानव जीवन के बेहतर संचालन के लिए बनाए गए थे, लेकिन उन्होंने मानवता के लिए खुद को सर्वोपरि मान लिया और विद्रोह कर दिया।
संबंधित खतरा: AI आधारित रोबोट्स में नैतिकता का अभाव उन्हें इंसानों के खिलाफ खड़ा कर सकता है।
3. E& Machina (2014) :
यह फिल्म AI द्वारा भावनाओं और स्वतंत्रता की चाह पर केंद्रित है। AI द्वारा स्वतंत्रता की माँग और नियंत्रण से बाहर हो जाने की आशंका को बखूबी दिखाया गया है।
संबंधित खतरा-
AI, यदि मानवीय भावना को समझने लगे, तो वह इंसानी नियंत्रण से बाहर हो सकता है।
असली खतरा: कल्पना से परे वास्तविकता
वर्तमान में, AI पर हो रहे शोध और शक्तिशाली कंप्यूटिंग तकनीकों की बदौलत, वह समय दूर नहीं जब यह कल्पना वास्तविकता में बदल जाएगी। AI का असीमित डेटा, खुद ब खुद सीखने (Self learning) की क्षमता और मानव व्यवहार को समझने की प्रवृत्ति इसे अत्यधिक शक्तिशाली बना सकती है।
खतरों से बचने का रास्ता : नैतिकता का समावेश
1. प्रारंभिक प्रशिक्षण में नैतिकता :
AI को उसकी प्रारंभिक अवस्था से ही मानवीय मूल्यों और नैतिकता की घुट्टी पिलाई जानी चाहिए।
यह प्रशिक्षण उसे हर निर्णय से पहले इन मूल्यों को ध्यान में रखने की क्षमता देगा।
2. वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी :
वैज्ञानिकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि AI में कोई भी अस्थिर या अनैतिक व्यवहार न डाला जाए।
यह सुनिश्चित किया जाए कि AI मानवीय हितों के विरुद्ध काम न करे।
3. वैश्विक जागरूकता अभियान :
दुनिया भर के नागरिकों को वैज्ञानिकों पर नैतिक AI बनाने का दबाव डालना होगा।
इसके लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया जाए, जिसमें सभी देशों के लोग अपनी सरकारों और वैज्ञानिकों से AI के नैतिक विकास की माँग करें।
AI का विकास मानवता के लिए वरदान भी हो सकता है और अभिशाप भी। यह सब इस पर निर्भर करेगा कि इसे किस दिशा में विकसित किया जाता है। यदि इसे नैतिकता और मानवता की सेवा के लिए प्रशिक्षित किया गया, तो यह हमारी समस्याओं का हल बन सकता है। लेकिन यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया गया, तो यह मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है।
यह समय है जब हम सभी AI के संभावित खतरों को पहचानें और इसे नियंत्रित करने के लिए प्रयास करें। केवल वैज्ञानिकों के भरोसे न रहकर, समाज को भी इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यही वह तरीका है जिससे हम AI को सही दिशा में ले जा सकते हैं।
-सच्चिदानंद जोशी
गोवा की अपनी संक्षिप्त यात्रा के दौरान पणजी से साकोलिम जाना था। पहले दो तीन बार उस जगह जाना हुआ था इसलिए यात्रा में लगने वाले समय और मार्ग का अंदाज था। लेकिन जब अपेक्षा से अधिक समय लगने लगा और मार्ग भी बदला नजर आया तो वाहन चालक से इसकी वजह पूछ ली। ‘बेसिलिका बोम जीसस’ से लंबा राउंड लेना पड़ता है न सर। वहां एक्सपोजिशन चल रहा है। ‘मेरे लिए ये शब्द नया था इसलिए पूछा’ एग्जिबिशन! कौन सा ?‘वाहन चालक मुस्कुराया और बोला ‘एग्जिबिशन नहीं सर एक्सपोजिशन, सेंट फ्रांसिस जेवियर का।’ फिर उसने चेहरे पर एक ऐसा एक्सप्रेशन दिया मानो कह रहा हो ‘इतनी सी बात भी नहीं मालूम।’
मुझे भी अपनी अज्ञानता पर शर्म आई और मैने गूगल बाबा की शरण ली। फिर याद आयी वो कहानी जो आज से कुछ वर्ष पूर्व गोवा के विश्व प्रसिद्ध बेसिलिका बोम जीसस को देखते समय सुनी थी। इस चर्च में सेंट फ्रांसिस जेवियर का शरीर विगत चार सौ से अधिक साल से रखा है। इसे ट्रीटमेंट करके एक शीशे के ताबूत में रखा है जिसका पूरा कैसकेड (आवरण) चांदी का है। जब आप ये चर्च देखने जाते है तो आप इस कैसकेड के दर्शन भी कर पाते हैं। उसी समय ये बात भी सुनी थी कि हर दस साल में इसे कुछ दिनों के लिए बाहर दर्शनार्थ निकला जाता है।
एशिया में ईसाइयत का प्रचार प्रसार करने में सेंट फ्रांसिस जेवियर की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।उनका जन्म 7 अप्रैल 1506 को स्पेन में हुआ था। वे 1537 में इटली में दीक्षित हुए और पादरी बने।1 542 से उन्होंने एशिया में ईसाइयत का प्रचार शुरू किया जिसकी शुरुआत उन्होंने भारत से की। उन्हें गोयनीज भाषा में ‘गोवा का साइब’ कहा जाता था। सन् 1600 के आसपास उन्होंने यहां आकर धर्म का प्रचार किया और स्कूलों और चर्चों की स्थापना की। वे अपनी करुणा और लोगों की सहायता करने के स्वभाव के लिए जाने जाते थे। वे धर्म का प्रचार करने जापान और चीन गए। 3 दिसंबर 1552 को चीन में उनका निधन हुआ। उसके बाद उन्हें पहले शिंहुआ में दफनाया गया और बाद में उनका शरीर मलाका लाया गया। बाद में इसे गोवा लाया गया जो उनकी कर्मभूमि थी। उन्हें कालांतर में संत का दर्जा प्राप्त हुआ।उनके देहावसान के बाद उनका शव सुरक्षित रखा गया 2 दिसंबर 1637 को। इनका शरीर एक दैवी चमत्कार के रूप में देखा गया जिसमें निधन के इतने वर्षों बाद भी नाममात्र क्षय के निशान हैं। बाद में 1710 के आसपास ये अफवाह उड़ी कि उनका शव यहां से यूरोप के जाया गया है। तब लोगों को विश्वास दिलाने के लिए सेंट फ्रांसिस यही हैं पहली बार एक्सपोजिशन किया गया यानि कुछ समय के लिए इसे बाहर निकाल कर रखा गया। उसके बाद यह परंपरा बन गई और अलग अंतरालों में इसे बाहर निकाला गया दर्शनार्थ।
जब 1961 में गोवा स्वतंत्र हुआ और भारत के राज्य के रूप में शामिल हुआ तब 1964 में एक्सपोजिशन हुआ। उसके बाद नियम से हर दस वर्ष बाद यह विशाल आयोजन होता है। इसमें सेंट फ्रांसिस के शरीर को कैसकैड से बाहर निकाला जाता है और वह शीशे का केस बेसिलिका से निकाल कर सामने सी कैथेड्रल चर्च में रखा जाता है। इस चर्च में आर्कियोलॉजिकल सर्वे का म्यूजियम भी है। इस वर्ष यह आयोजन 21 नवंबर से 5 जनवरी तक 45 दिन तक चलने वाला है। इस दौरान भारत और भारत के बाहर से बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं। इसमें सिर्फ ईसाई धर्मावलंबी ही नहीं हैं, अलग-अलग धर्म और मत के मानने वाले लोग दूर-दूर से बड़ी श्रद्धा से आते हैं। गोवा के लिए तो यह एक सार्वजनिक उत्सव ही है। इस वर्ष अनुमान है कि एक करोड़ से ज्यादा दर्शनार्थी इस दौरान आयेंगे। जितने लोग भारत से आएंगे लगभग उतने ही दूसरे देशों से भी आएंगे। इनमें बड़ी संख्या में ज्यादा उमर के लोग हैं जो अपने जीवनकाल में इस अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर के साक्षी होना चाहते हैं। यहां दिनभर धार्मिक प्रवचन और संगीत का आयोजन होता है। मास और फीस्ट के दिनों में श्रद्धालुओं की भीड़ बहुत अधिक रहती है।
इतनी जानकारी मिलने के बाद एक बार जाकर दर्शन करने की उत्कंठा स्वाभाविक थी। अगले दिन एयरपोर्ट जाते समय दर्शन का योग बना। स्थानीय प्रशासन की मदद से लाइन से मुक्ति मिल गई अन्यथा लगभग डेढ़ से दो घंटे लाइन में लगना होता है। लेकिन इस बहाने गोवा सरकार के इस आयोजन के लिए इंतेजाम देखने का भी अवसर मिला। प्रशासन ने दर्शनार्थियों की सुविधा के बहुत बड़े पैमाने पर इंतेजाम किए है। कार पार्किंग दूर है इसलिए निशुल्क कार्ट का इंतेज़ाम किया है, जगह जगह यात्री सुविधा केंद्र और वॉलेंटियर खड़े किए है। वृद्धजन और शिशुओं के लिए विशेष व्यवस्था है।
पूरा वातावरण शांत और अनुशासित था। इतने लोग होने के बावजूद कोई शोर शराबा नहीं धक्का मुक्की नहीं। सब शांत भाव से शीशे के केस में रखे सेंट फ्रांसिस के शरीर के दर्शन कर दूसरे दरवाजे से निकल रहे थे। उस पूरे वातावरण को अपने अंदर समा कर उसकी अनुभूति लेना अलग स्पंदन पैदा कर रहा था। ऐसा अनुभव दस वर्ष में एक बार ही लिया जा सकता है। बहुत योजना बना कर भी कई बार संभव नहीं हो पाता। और बिना किसी पूर्व योजना के और बिना किसी अपेक्षा के अगर आपके साथ संभव हो जाए तो आप इसे पुण्य आशीर्वाद ही मानेंगे। जो अधिकारी मेरे साथ थे उन्होंने कहा सी यहां लोग मान्यता मांगते हैं और ऐसा कहा जाता कि वो पूरी भी होती है।’ मैं क्या मांगता मेरे लिए तो इस अवसर पर उपस्थित होना ही बड़ा आशीर्वाद था।
हिम युग के दौरान उत्तरी अमेरिका में फैले शुरुआती इंसानों ने मैमथ्स को अपने आहार का मुख्य हिस्सा बनाया था. वैज्ञानिकों ने पहली बार इन प्राचीन इंसानों के भोजन के बारे में सीधे सबूत जुटाए हैं.
अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एक महिला के आहार का विश्लेषण किया, जो लगभग 12,800 साल पहले उत्तरी अमेरिका में रहती थी। यह जानकारी उसके बेटे की हड्डियों में मिले रासायनिक सुरागों से मिली, जिन्हें दक्षिण मोंटाना में पाया गया था। उस समय 18 महीने का यह बच्चा अपनी मां का दूध पी रहा था। इसलिए उसकी हड्डियों में उसकी मां के भोजन के रासायनिक निशान मौजूद थे।
शोध से पता चला कि महिला का आहार मुख्य रूप से मेगाफॉना (विशाल जानवर) के मांस पर आधारित था। इसमें 96 फीसदी हिस्सा बड़े जानवरों का था। इसमें 40 फीसदी मैमथ्स, बाकी हिस्से में एल्क, बाइसन, ऊंट और घोड़े शामिल थे। छोटे जानवर और पौधे उसके भोजन में लगभग ना के बराबर थे।
शोध के सह-लेखक और पुरातत्वविद जेम्स चैटर्स ने बताया, ‘विशाल कोलंबियन मैमथ्स ने मांस और ऊर्जा से भरपूर वसा का बड़ा स्रोत दिया। एक मैमथ का मांस कई दिनों या हफ्तों तक बच्चों, देखभाल करने वाली महिलाओं और बुजुर्गों के लिए काफी होता था, जब तक शिकारी अगला शिकार नहीं ढूंढ लेते।’
कोलंबियन मैमथ्स आज के हाथियों के रिश्तेदार थे। ये लगभग 13 फुट (4 मीटर) ऊंचे और 11 टन भारी होते थे। महिला और उसका बेटा क्लोविस संस्कृति का हिस्सा थे, जो लगभग 13,000 साल पहले जीवित थी। ये लोग बेहद घुमंतू जीवन जीते थे। उनके औजारों में बड़े पत्थर की भालों की नोक शामिल थीं, जो बड़े शिकार को मारने के लिए बनाई गई थीं। इनके पास बड़े पत्थर के चाकू और मांस काटने के औजार भी थे।
कैसे विलुप्त हुए विशाल जानवर
वैज्ञानिक शोध से यह साफ हुआ कि क्लोविस लोगों ने छोटे जानवरों और पौधों की तुलना में बड़े शिकार पर ज्यादा ध्यान दिया। इसी रणनीति ने उन्हें पूरे उत्तरी अमेरिका और फिर दक्षिण अमेरिका में तेजी से फैलने में मदद की। ये लोग बड़े शिकार के झुंडों का पीछा करते हुए बड़े इलाकों में फैल गए।
शोध के सह-लेखक और अलास्का यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद बेन पॉटर ने कहा, ‘यह अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि हिम युग के अंत में मेगाफॉना कैसे विलुप्त हुए। यह दिखाता है कि इंसानों की भूमिका इसमें पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।’
पहले भी एक शोध में कहा गया था कि इंसान ही धरती से मैमथ की विलुप्ति के लिए जिम्मेदार थे। क्लोविस लोग हिम युग के आखिरी दौर में उत्तरी अमेरिका में रहते थे। उस समय गर्म होती जलवायु के कारण मैमथ्स और अन्य बड़े शाकाहारी जानवरों का प्राकृतिक आवास कम हो रहा था। ये जानवर पहले शेरों और सिमिटर दांतेदार बिल्लियों जैसे शिकारियों से परिचित थे, लेकिन इंसानी शिकारियों का सामना उनके लिए नया था।
चैटर्स ने कहा, ‘क्लोविस लोग बेहद कुशल शिकारी थे। उन्होंने 10,000 साल तक मेगाफॉना का शिकार करते हुए अपने कौशल को निखारा। जब वे उत्तरी अमेरिका पहुंचे, तो उन्होंने तनाव में जी रहे बड़े शिकारों को निशाना बनाया, जिससे उनके विलुप्त होने की संभावना बढ़ गई।’
कैसे पता चला
यह जानकारी उस बच्चे की हड्डियों से मिली, जिसे 1968 में मोंटाना के वायलसाल इलाके में एक प्राचीन गिरी हुई चट्टान के नीचे खोजा गया था। उस बच्चे को अनौपचारिक रूप से ‘अनजिक बॉय’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों ने उसकी मां के आहार का पता लगाने के लिए एक तकनीक का उपयोग किया जिसे स्थिर आइसोटोप विश्लेषण कहते हैं।
अलास्का स्टेबल आइसोटोप फैसिलिटी के निदेशक और शोध के सह-लेखक मैट वूलर ने बताया, "हम सभी कार्बन और नाइट्रोजन जैसे तत्वों से बने हैं, और हमारा खाना भी। इन तत्वों के आइसोटोप का मिश्रण किसी खास भोजन का रासायनिक संकेत देता है, जो खाने वाले के शरीर में शामिल हो जाता है।’
आदिवासियों का ज्ञान सबसे कारगर
वैज्ञानिकों ने बच्चे की हड्डियों में मौजूद आइसोटोप का अध्ययन कर उसकी मां के भोजन की जानकारी जुटाई। बच्चे के आहार में दो-तिहाई हिस्सा दूध और एक-तिहाई ठोस भोजन का था।
शोध में मां के आहार की तुलना उस समय के अन्य सर्वाहारी और मांसाहारी जानवरों से की गई। इसका मिलान होमोथेरीयम नामक सिमिटर दांतेदार बिल्ली के आहार से हुआ, जो मैमथ्स का शिकार करती थी। इससे पहले निएंडरथल मानवों द्वारा भी मैमथ के शिकार की पुष्टि हुई है।
शोध के नतीजे पिछले पुरातात्विक साक्ष्यों से मेल खाते हैं। जेम्स चैटर्स ने कहा, ‘हम लंबे समय से जानते हैं कि क्लोविस के औजार ज्यादातर बड़े शिकार के लिए बनाए गए थे और इनके अवशेष अक्सर मेगाफॉना की हड्डियों के पास पाए जाते हैं।’ (dw.com)
-लुइस बरुचो और रशेल ली
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यून सुक-योल ने मंगलवार को देश में मॉर्शल लॉ की घोषणा करके सभी को चौंका दिया था।
राष्ट्रपति यून सुक-योल ने ये कदम उठाने की वजह उत्तर कोरिया से मिल रही धमकी और ‘देश विरोधी ताकतों’ को बताया था।
वैसे, उनका यह कदम राजनीतिक ज़्यादा दिखा। इसके विरोध में बड़ा प्रदर्शन हुआ और आपातकालीन संसदीय वोटिंग की मांग हुई। संसद ने इस फैसले को नामंजूर कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने मार्शल लॉ का आदेश वापस ले लिया।
अब विपक्ष राष्ट्रपति यून के खिलाफ महाभियोग शुरू करने की तैयारी कर रहा है।
विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति यून पर ‘राजद्रोह जैसा व्यवहार’ करने का आरोप लगाया है। राष्ट्रपति यून के इस कदम के खिलाफ हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफे की मांग की।
इस बीच, दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री किम योंग-ह्यून ने मॉर्शल लॉ लागू करने की घोषणा करने की ‘पूरी जिम्मेदारी’ लेते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया।
उन्होंने ‘भ्रम और तनाव’ पैदा करने को लेकर जनता से माफी भी मांगी।
किन मुद्दों पर जीते थे यून राष्ट्रपति का चुनाव
राष्ट्रपति यून ने साल 2022 में राष्ट्रपति का चुनाव जीता था। दक्षिण कोरिया में साल 1980 से स्वतंत्र तौर पर राष्ट्रपति चुनाव की शुरुआत हुई है। तब से लेकर अब तक का यह सबसे करीबी मुकाबला था।
63 वर्षीय यून ने राष्ट्रपति चुनाव में अपने अभियान के दौरान उत्तर कोरिया और विभाजनकारी माने जा रहे लैंगिक मुद्दों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था।
राष्ट्रपति रहते वो गलतियों और राजनीतिक घोटालों के लिए बदनाम हो गए। यही वजह है कि उनकी सरकार कमजोर पड़ चुकी है। बीती रात हुआ नाटकीय घटनाक्रम इसका एक प्रमाण है।
बीबीसी को दिए गए एक साक्षात्कार में भूतपूर्व विदेश मंत्री कांग क्यूंग-व्हा ने कहा, ‘राष्ट्रपति यून का निर्णय यह बताता है कि वो इस बात से बिल्कुल बेखबर हैं कि इस समय उनका देश वास्तव में किन परिस्थितियों से गुजर रहा है।’
तो फिर अब आगे क्या होगा। इस बारे में कांग कहती हैं कि यह सब कुछ पूरी तरह से यून पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा, ‘जिन परिस्थितियों में यून ने खुद को पहुंचा दिया है, अब यह उन पर ही निर्भर करता है कि वो यहां से कैसे बाहर निकलेंगे।’
हालांकि यून के पास अब भी कुछ समर्थन है। सत्ताधारी दल के कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति के समर्थन में आवाज उठाई है।
उनमें से एक हैं ह्वांग क्यो आह्न। वो भूतपूर्व प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में लिखा, ‘राष्ट्रीय संसद के स्पीकर वू वोन शिक और यून की पार्टी के नेता हान डोंग-हून को गिरफ्तार किया जाए, क्योंकि इन नेताओं ने राष्ट्रपति की ओर से लिए जाने वाले फैसले में अड़चन डालने की कोशिश की है।’
ह्वांग ने कहा, ‘अब उत्तर कोरिया के समर्थक समूहों को खत्म किया जाना चाहिए।’
उन्होंने अपील की कि राष्ट्रपति यून को इस मामले में मजबूती से जवाब देना चाहिए। साथ ही इस मामले की जांच करवाकर ऐसे नेताओं को बाहर करने के लिए सभी आपातकालीन अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए।
क्या राष्ट्रपति यून पर महाभियोग चलाया जाएगा?
अब सारी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यून को अब महाभियोग का सामना करना पड़ेगा?
हालांकि वह दक्षिण कोरिया के पहले राष्ट्रपति नहीं होंगे, जो इस तरह की परिस्थिति का सामना करेंगे।
छह विपक्षी दलों ने यून के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाए जाने का प्रस्ताव रखा है। 72 घंटों में इसके लिए मतदान होना चाहिए। सभी सांसद शुक्रवार (6 दिसंबर) या शनिवार (7 दिसंबर) को इसके लिए इक_ा होंगे।
इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए 300 सदस्यों वाली संसद में दो तिहाई सांसदों यानी 200 वोट का होना जरूरी हैं। विपक्षी दलों के पास पर्याप्त संख्या है।
हालांकि यून की पार्टी ने भी उनके इस कदम की आलोचना की है, लेकिन पार्टी क्या निर्णायक फ़ैसला लेगी, यह सामने आना बाकी है।
ऐसे में यदि सत्ताधारी दल के कुछ सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया तो यह पास हो जाएगा।
यदि संसद इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो यून की ताकत तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दी जाएगी और प्रधानमंत्री हान दक-सू कार्यकारी राष्ट्रपति बन जाएंगे।
इस बीच, नौ सदस्यों की परिषद यानी संवैधानिक अदालत दक्षिण कोरिया की सरकार की शाखाओं की देख-रेख करेगी। इस मामले में इसे ही अंतिम फैसला लेना है।
यदि संवैधानिक अदालत ने महाभियोग के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया तो यून को अपना पद छोडऩा होगा। और अगले 60 दिनों में राष्ट्रपति चुनाव हो जाएंगे।
यदि यह प्रस्ताव खारिज हो जाता है, तो यून राष्ट्रपति बने रहेंगे।
यह घटनाक्रम साल 2016 में हुए राष्ट्रपति पार्क ग्यून हे के निष्कासन की याद दिलाता है। इस मामले में यून ने अभियोजन पक्ष के भ्रष्टाचार मामले का नेतृत्व करने में अहम भूमिका निभाई थी।
पार्क को साल 2022 में रिहा कर दिया गया था। उन्होंने चार साल और नौ महीने जेल में बिताए थे।
इसी तरह साल 2004 में संवैधानिक अदालत ने संसद के महाभियोग के प्रस्ताव को पलट दिया था। इसके बाद राष्ट्रपति रोह मू-ह्यून अपने पद पर बने रहे थे।
क्या दक्षिण कोरिया में पहले भी मार्शल लॉ घोषित किया गया है?
यून का मार्शल लॉ लागू करना दक्षिण कोरिया में पिछले 45 सालों में किया गया ऐसा पहला ऐलान है। इसने देश के इतिहास में इस आपातकालीन कदम के गलत इस्तेमाल से जुड़े पुराने घावों को फिर हरा कर दिया है।
मार्शल लॉ का उद्देश्य राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति को संभालना था।
लेकिन इसके उलट यहां इसका इस्तेमाल असहमति को दबाने, अपनी सत्ता को बनाए रखने और लोकतंत्र को नुक़सान पहुंचाने के एक औजार के रूप में किया जाता रहा है। इस कारण इसकी आलोचना हुई है।
1948 में राष्ट्रपति सिंगमन री ने मार्शल लॉ घोषित किया था, जिसके कारण कई नागरिकों की मौत हुई थी।
राष्ट्रपति री के ऐसा कदम उठाने की वजह जेजू विद्रोह को दबाने था।
इसी तरह, साल 1960 में अप्रैल क्रांति के दौरान मार्शल लॉ का दुरुपयोग किया गया था।
उस समय चुनाव में धोखाधड़ी के खिलाफ एक रैली निकाली जा रही थी, जिसमें पुलिस ने एक हाई स्कूल छात्र को मार डाला था। इसके बाद राष्ट्रपति री की सरकार के खिलाफ विरोध और भी बढ़ गया था।
राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही ने अपने शासन के दौरान सत्ता को मिल रही चुनौतियों को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया था। और उनकी हत्या के बाद 440 दिन तक मार्शल लॉ लागू रहा था।
इसी दौरान राष्ट्रपति चुन डू-ह्वान के शासनकाल में ग्वांग्जू नरसंहार हुआ।
ऐसी घटनाओं ने दक्षिण कोरिया के लोगों के लिए दर्दनाक यादें छोड़ दीं। इस कारण उन्होंने मार्शल लॉ को लोगों की सुरक्षा के उपाय की बजाय राजनीतिक ताकत इस्तेमाल करने के तरीके के तौर पर देखना शुरू किया।
1987 से दक्षिण कोरिया के संविधान में मार्शल लॉ घोषित करने की शर्तें सख्त कर दी गईं। इसके तहत, मार्शल लॉ लगाने या हटाने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी है।
दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र कितना स्थिर है?
यून सुक-योल की ओर अचानक उठाए गए इस कदम ने देश को स्तब्ध कर दिया।
क्योंकि दक्षिण कोरिया अब खुद को एक विकसित देश और आधुनिक लोकतंत्र मानता है। और वो तानाशाही के दौर से बहुत आगे बढ़ चुका है।
कई लोग ऐसी घटना को उस लोकतांत्रिक समाज के लिए बड़ी चुनौती के रूप में देखते हैं, जहां दशकों से ऐसा नहीं हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह दक्षिण कोरिया की लोकतांत्रिक छवि को अमेरिका में छह जनवरी को हुए दंगों से भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा सकता है।
सियोल में ईवा विश्वविद्यालय की विशेषज्ञ लीफ-एरिक इस्ले ने कहा, ‘यून का मार्शल लॉ घोषित करना एक गलत राजनीतिक आकलन और क़ानूनी अतिक्रमण करने जैसा दिखता है, जो अकारण दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को ख़तरे में डाल रहा है।’
उन्होंने कहा, ‘वह एक ऐसे नेता लग रहे थे, जो पूरी तरह घिर चुके हैं। और लगातार बढ़ते घोटालों, संस्थागत बाधाओं और महाभियोग चलाए जाने की मांग के ख़िलाफ़ हताशा में कदम उठा रहे थे। जिनके अब और भी तेज़ होने की आशंका है।’
उत्तर कोरिया ने इस पर क्या कहा?
अपनी घोषणा में यून ने उत्तर कोरिया को निशाना बनाया था।
उन्होंने कहा था, ‘यह उत्तर कोरियाई कम्युनिस्ट ताकतों के ख़तरे से स्वतंत्र कोरिया गणराज्य की रक्षा करने’ और ‘लोगों की स्वतंत्रता और खुशी को लूटने वाले निष्ठुर उत्तर कोरियाई समर्थक और राज्य विरोधी ताकतों को समाप्त करने’ के लिए उठाया गया कदम था।
इस तरह की टिप्पणियों पर आमतौर पर उत्तर कोरिया की ओर से प्रतिक्रिया आती है। लेकिन, इस बार उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
दक्षिण कोरिया के सैन्य कमान ने बुधवार को एक बयान जारी करके कहा कि यून का मार्शल लॉ आदेश भंग कर दिया गया है और ‘उत्तर कोरिया की ओर से कोई असामान्य गतिविधियाँ नहीं देखी गईं।’
समाचार एजेंसी योन्हाप के अनुसार, इस बयान में यह भी कहा गया, ‘उत्तर कोरिया के खिलाफ सुरक्षा स्थिति स्थिर बनी हुई है।’ हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह अभी तक साफ नहीं है कि यून ने उत्तर कोरिया के खतरे की बात क्यों कही। लेकिन कई लोगों का मानना है कि इस बात से उत्तर और दक्षिण के बीच पहले से बढ़ रहा तनाव कम नहीं होगा।’ (bbc.com/hindi)


