राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : साव की टिप्पणी से हलचल
16-May-2026 7:59 PM
राजपथ-जनपथ : साव की टिप्पणी से हलचल

साव की टिप्पणी से हलचल

प्रदेश भाजपा कार्यसमिति में डिप्टी सीएम अरूण साव की एक टिप्पणी ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। साव ने कहा था कि भाजपा अब बनिया-जैन पार्टी नहीं रही, बल्कि उसकी स्वीकार्यता व्यापक हो चुकी है और देश के 73 फीसदी हिस्सों में पार्टी का विस्तार हो चुका है। उनकी इस टिप्पणी को लेकर संगठन के भीतर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। खासकर बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेता इसे गैरजरूरी टिप्पणी मान रहे हैं।

दरअसल, अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में कांग्रेस के बड़े नेता भाजपा को अक्सर बनिया-जैन पार्टी कहकर निशाना बनाते थे। उस समय सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे और लखीराम अग्रवाल प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे। सरकार जाने के बाद भी पार्टी की यह छवि लंबे समय तक बनी रही। हालांकि भाजपा को केवल बनिया-जैन पार्टी ही नहीं, बल्कि सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी के तौर पर भी देखा जाता रहा, जहां ओबीसी और दूसरे वर्गों को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिलने की चर्चा होती थी।

महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार को कभी सेठजी-भट्टजी की सरकार कहा जाता था। शरद पवार ने उस दौर में मुख्यमंत्री मनोहर जोशी पर लगातार जातीय समीकरणों को लेकर निशाना साधा था। इसके बावजूद मौजूदा समय में देवेन्द्र फडणवीस जैसे ब्राह्मण नेता मराठा बहुल महाराष्ट्र में लंबे समय तक प्रभावशाली बने रहे। इससे परे पिछड़े तेली समाज से आने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने ओबीसी और अन्य वर्गों में भी मजबूत पकड़ बनाई।

छत्तीसगढ़ में भाजपा संगठन की कमान समय-समय पर ताराचंद साहू, लखीराम अग्रवाल, डॉ. रमन सिंह, शिवप्रताप सिंह, विष्णुदेव साय, धरमलाल कौशिक और अरूण साव जैसे नेताओं के हाथों में रही है। रमन सरकार के दौरान बनिया-जैन समाज से आने वाले बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत और गौरीशंकर अग्रवाल जैसे नेता कैबिनेट मंत्री और स्पीकर रहे। आबादी के अनुपात में इस समाज को मिले बड़े प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर सवाल भी उठते रहे, लेकिन इन नेताओं की संगठन और सरकार में मजबूत पकड़ तथा  स्वीकार्यता के कारण यह मुद्दा ज्यादा नहीं उभरा।

अब हालात बदल चुके हैं। मौजूदा सरकार में बनिया समाज से अकेले राजेश अग्रवाल मंत्री हैं, जबकि संगठन में दूसरे वर्गों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। ऐसे माहौल में अरूण साव की टिप्पणी ने पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। बनिया-जैन समाज से जुड़े कुछ नेताओं की नाराजगी भी सामने आ रही है। उनका कहना है कि पार्टी को खड़ा करने और विस्तार देने में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में कांग्रेस की पुरानी टिप्पणियां एक बार फिर चर्चा में आ गई है।

देखें छत्तीसगढ़ के कितने अनुकरणीय

अब राज्यों में गुड गवर्नेंस या नवाचार के नाम पर सचिव के विभाग में रहते या कलेक्टर के जि़ले में पोस्टिंग रहते तक नहीं चलेंगे। उनकी कंटीन्यूटी के लिए भी  केंद्र सरकार मेकेनिज्म बनाने जा रही है। इसके लिए पहले राज्यों में चल रही ऐसी योजनाओं या कार्यक्रमों को केंद्र ने मंगाया है।

केंद्रीय कैबिनेट सेक्रेटरी डॉ. टी वी सोमनाथन ने सभी केंद्रीय सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिव को एडमिनिस्ट्रेटिव एक्सीलेंस को इंस्टीट्यूशनल बनाने और क्रॉस-स्टेट लर्निंग को बढ़ावा देने  'इनोवेटिव गवर्नेंस प्रैक्टिस' को डॉक्यूमेंट करने का निर्देश दिया है। नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी ) की अगुवाई में, इस स्टडी का मकसद देश भर में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की अलग-अलग सफलता की कहानियों को मॉडल के रूप में बदलना है।

भारत सरकार के सेक्रेटरी और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के चीफ सेक्रेटरी को लिखे एक लेटर में, सोमनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऑल इंडिया, सेंट्रल और स्टेट सर्विसेज़ में अधिकारियों का बहुत ज़्यादा अनुभव देश के लिए बहुत कीमती है।  सभी  अधिकारियों को आगामी 31 मई, तक अपनी एंट्री जमा करने के लिए कहा गया है। अधिकारी इंग्लिश, हिंदी या किसी भी क्षेत्रीय भाषा में नोट्स जमा कर सकते हैं। हालांकि फ़ॉर्मेट फ्लेक्सिबल है, लेकिन नोट्स टाइप किए हुए होने चाहिए (हाथ से लिखे नहीं) और ज़्यादा से ज़्यादा सात पेज के होने चाहिए। एंट्री पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के किसी भी एरिया को कवर कर सकती हैं, जिसमें आसान वर्कफ़्लो में बदलाव से लेकर बड़े डिजिटल बदलाव तक शामिल हैं। सरकार ने एक सख्त मल्टी-टियर वेटिंग प्रोसेस बताया है ताकि यह पक्का हो सके कि सिफऱ् सबसे असरदार प्रैक्टिस ही आर्काइव की जाएं।

एनसीजीजी  पहले नोट्स की रेलिवेंस और इंपॉर्टेंस की जांच करेगा।सबमिशन में किए गए क्लेम का इंडिपेंडेंट वेरिफिकेशन किया जाएगा। कैबिनेट सेक्रेटेरिएट में सीनियर अधिकारियों का एक हाई-लेवल पैनल फाइनल रिव्यू करेगा। चुनी हुई प्रैक्टिस को कैबिनेट सेक्रेटेरिएट और एनसीजीजी के ऑफिशियल पोर्टल पर साथियों के लिए रेफरेंस गाइड के तौर पर अपलोड किया जाएगा। यह पत्र महानदी भवन को भी मिला है। अब देखना यह है कि छत्तीसगढ़ से कितनी एंट्रियां जाती हैं और कितने एनसीजीजी की फेहरिस्त में शामिल होती हैं। क्योंकि यहां भी हर जिले में कई नवाचार चल रहे हैं और उन्हें अनुकरणीय बताया जा रहा है।

राजधानी के लिए कब तक होगी ईंधन की बर्बादी

छत्तीसगढ़ की राजधानी अटल नगर-नया रायपुर को विकसित हुए लगभग 20 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अभी भी इसे न तो मंत्री और न ही अफसर राजधानी मानते हैं। पुरानी राजधानी रायपुर से नया रायपुर की 17 से 28 किलोमीटर है, जो एक्सप्रेसवे पर 30-45 मिनट का सफर है। रोजाना हजारों कर्मचारी, अधिकारी और मंत्रालयीन स्टाफ निजी वाहनों, सरकारी गाडिय़ों तथा काफिलों के साथ आना-जाना करते हैं। ईंधन संकट के इस दौर में  भी इस बर्बादी को रोकन के का उपाय नहीं सोचा जा रहा है। 

अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं और लोग पैनिक हो रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मितव्ययिता आह्वान पर अपने काफिले को कम किया है और सरकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक वाहनों में बदलने की घोषणा की है। मंत्रियों ने भी प्रतीकात्मक कदम उठाए, लेकिन निचले स्तर पर अफसरों से अभी काफी कुछ अमल कराना बाकी है। कुछ अफसरों ने साइकिल पर दफ्तर जाते हुए फोटो खिंचवाई है लेकिन जिनका घर दफ्तर से 25 किलोमीटर दूर हो, वह कैसे कर पाएगा।

इधर भाजपा के पूर्व विधायक देवजी भाई पटेल ने कहा है कि अधिकारियों को कार पूलिंग का निर्देश दिया जाए। हर रोज सैकड़ों गाडिय़ां 40-50 किमी राउंड ट्रिप करती हैं। यदि औसतन 10-12 किमी प्रति लीटर माइलेज मानें तो एक गाड़ी प्रतिदिन 5 लीटर ईंधन खपत करती है। हजारों वाहनों को जोडक़र देखें तो लाखों रुपये का ईंधन रोजाना बर्बाद हो रहा है।

वैसे समस्या की जड़ गहरी है। नया रायपुर में मंत्रालय, सचिवालय और अन्य सरकारी इमारतें बन चुकी हैं, लेकिन अधिकांश अधिकारी और कर्मचारी पुराने रायपुर में ही रहते हैं। मंत्रियों का शिफ्ट होना हुआ, पर उनका स्टाफ और अफसर नहीं। आवासीय कॉलोनियों का विकास हुआ है, लेकिन आवंटन और रहना जरूरी नहीं किया। शाम होते ही नया रायपुर जगमगाती रोशनी के बीच घोस्ट सिटी बन जाती है। असल में पेट्रोल डीजल की खपत तब घटेगी जब आवंटित बंगलों, आवासों में अधिकारियों, कर्मचारियों को रहना अनिवार्य किया जाएगा। जिनको आवास नहीं मिले हैं, उन्हें जल्दी आवंटित किया जाना चाहिए। तब तक कार पूलिंग जरूरी करना चाहिए। जिन अफसरों को फिर भी अपनी गाड़ी से ही 50 किलोमीटर आना जाना हो, उनके इंधन और गाड़ी का खर्च सरकार मत उठाए। अधिकारियों, कर्मचारियों के फेडरेशन ने वर्क फ्रॉम होम का सुझाव दिया है, या कहें मांग रखी है। मगर, बहुत सी फाइलें अब भी डिजिटल नहीं हैं, सरकारी दफ्तरों में लोगों का आना-जाना लगा रहता है जो कर्मचारी- अधिकारी से मिलकर ही संतुष्ट हो पाते हैं। पर, सप्ताह के कुछ दिनों के लिए लागू हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आजमाया जा सकता है कि किन कामों को घर से किया जा सकता है। इन सबके बीच, छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से नवा रायपुर, काम के लिए आने वालों की परेशानी कम नहीं हुई है। वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना चाहते हैं, पर इनकी संख्या और स्टापेज कम हैं। इनके लिए नि:शुल्क और रियायती बसें अधिक संख्या में होनी चाहिए। बैटरी चलित बसों का छत्तीसगढ़ के कई शहर इंतजार कर रहे हैं। घोषणा पूरी ही नहीं हुई है।


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