राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : दल-बदल वालों का समायोजन
18-Mar-2026 6:32 PM
राजपथ-जनपथ : दल-बदल वालों का समायोजन

दल-बदल वालों का समायोजन

प्रदेश भाजपा की नई कार्यकारिणी सूची कई मायनों में राजनीतिक संदेश देती नजर आ रही है। इस जंबो सूची में न सिर्फ पार्टी के पुराने चेहरों को जगह मिली है, बल्कि कांग्रेस से आए नेताओं और रिटायर्ड अफसरों को भी संगठन में अहम जिम्मेदारी देकर संतुलन साधने की कोशिश की गई है। सबसे चौंकाने वाला नाम पूर्व राज्यपाल रमेश बैस का है, जिन्हें प्रदेश कार्यसमिति में स्थान दिया गया है।

सूची में  पूर्व महापौर वाणी राव, पूर्व मंत्री विधान मिश्रा, चंद्रशेखर शुक्ला और बसपा से आई पूर्व विधायक कामदा जोल्हे जैसे नेताओं को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। ये सभी लोकसभा चुनाव से पहले  भाजपा में शामिल हुए थे, जिससे साफ है कि पार्टी दल-बदल कर आए नेताओं को भी संगठन में समायोजित करने की रणनीति पर काम कर रही है।

 इसी कड़ी में पूर्व आईएएस अफसर आरपीएस त्यागी और पूर्व आईएफएस एसएसडी बडग़ैय्या को भी प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दी गई है। त्यागी पहले कांग्रेस से भी जुड़े रहे, लेकिन वहां अपेक्षित भूमिका न मिलने के बाद भाजपा में आ गए और अब संगठन में उन्हें स्थान मिल गया है। वहीं बडग़ैय्या रिटायरमेंट के बाद भाजपा में सक्रिय रहे। लोरमी से टिकट की दावेदारी के बावजूद मौका नहीं मिला, लेकिन संगठन में उनकी सक्रियता का लाभ अब उन्हें कार्यकारिणी में जगह के रूप में मिला है। कुल मिलाकर, भाजपा की यह कार्यकारिणी सूची राजनीतिक संतुलन, विस्तार और नए-पुराने चेहरों के समन्वय की रणनीति को दर्शाती है।

धान का कटोरे में अफीम का जाल

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते हैं , लेकिन दुर्ग और बलरामपुर जैसे जिलों में हुई छापेमारी से पता चलता है कि यहां धान के मुकाबले हजारों गुना अधिक मुनाफा देने वाले अफीम की भी चोरी-छिपे खेती हो रही है। लेकिन इस छापेमारी के बाद एक नई बहस फिर सामने आ गई है। क्या अफीम की खेती को वैध कर देना चाहिए? ऐसा किया गया तो किसानों को आमदनी का नया स्रोत मिलेगा और अवैध कारोबार पर लगाम लगेगी। मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नियंत्रित लाइसेंस के तहत अफीम की खेती होती भी है, जिससे दवा उद्योग को कच्चा माल मिलता है। देश में करीब 22 जिले हैं जहां अफीम की खेती की जाती है पर लाइसेंस जारी करने के बाद ही यह छूट मिलती है। माना जाता है कि वैध खेती से भी अफीम का एक हिस्सा काले बाजार में पहुंच जाता है। सीमित लाइसेंस के बाद भी अन्य राज्यों में सरकार पूरी तरह निगरानी नहीं रख पा रही है। छत्तीसगढ़ में भी ऐसी ही समस्या सामने आ सकती है। पहले से ही शराब की घोर बिक्री और गांजे की भरपूर तस्करी वाले राज्य में नशे का एक नया कारोबार शुरू हो जाएगा। नशे के कारण होने वाले अपराध भी और बढ़ जाएंगे।

अफीम अपने मूल स्वरूप में थोड़ी सस्ती है पर उससे बनने वाली हेरोइन बेहद महंगे और खतरनाक हैं। अमेरिका जैसे देश ओपिओइड संकट से जूझ रहे हैं और लाखों लोग लत के शिकार हो रहे हैं। अपने यहां एक कटु सत्य की चर्चा होती है कि सरकारी राशन, खासकर चावल को बेचकर कुछ लोग शराब की तलब पूरी कर रहे हैं। मगर, अफीम से यह मुमकिन नहीं होगा। दवाओं के नाम मिलने वाले लाइसेंस का दुरुपयोग जरूर कुछ लोगों को मालामाल बना देगा।

पार्षद बनने का इंतजार

सरकारी उपक्रमों और संगठन के सभी मोर्चा प्रकोष्ठों में सभी तरह की नियुक्तियां हो चुकी हैं। इनमें नियुक्ति से बचे देवतुल्य कार्यकर्ता अब राजनीति की पहली सीढ़ी कहे जाने वाले मनोनीत पार्षद पद पर नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं।  छत्तीसगढ़ नगर निगम/पालिका अधिनियम 1956 की धारा-9 के तहत नगरीय निकायों में एल्डरमैन और दिव्यांग मनोनीत सदस्य नियुक्त किए जाते है। निगमों में आठ, पालिकाओं में पांच और नगर पंचायतों में तीन एल्डरमैन नियुक्त किए जाते हैं। ये भले चुनकर न सही, मनोनीत होकर भी पार्षद के रूप में कथित जनसेवा कर सकते हैं। प्रदेश के 10 निगमों में 80, 49 पालिकाओं में 245 और 114 नगर पंचायतों 342  एल्डरमैनों की नियुक्ति की जानी है। इस प्रकार प्रदेश में कुल 667 कार्यकर्ता एल्डरमैन बन सकते हैं। अब देखना होगा कि सरकार  इनकी नियुक्ति कब तक होती है।

वैसे सभी निर्वाचित निकायों का एक साल हो गया है। और कई में तो उपचुनाव की भी तैयारी है। यानी स्पष्ट है कि उप चुनाव तक तो इंतजार करना होगा। सरकार में और सरकार के निगम-मंडल, आयोग- प्राधिकरणों में जमीन पर संघर्षशील नहीं लेकिन संगठन के बड़े नेताओं, मंत्रियों की परिक्रमा करने वाले पद पाने में सफल रहे । देवतुल्य कार्यकर्ता  को अब तक सिर्फ इंतजार कर रहे हैं।

 वैसे बता दें कि पिछली सरकार ने भी दो वर्ष बाद में नियुक्ति की थी। संभव हो परंपरा बनी रही।

स्वागत के तरीके में बदलाव की कोशिश

2019 बैच की महाराष्ट्र कैडर की आईएएस अधिकारी मीनल करनवाल ने जिला पंचायत नांदेड़ के सीईओ पद का कार्यभार संभालने के दौरान स्वागत की संस्कृति में बदलाव की कोशिश की। जहां आमतौर पर अधिकारियों को गुलदस्ते और बुके भेंट किए जाते हैं, वहीं उन्होंने कहा कि मुझे रजिस्टर, कॉपियां, पेन, पेंसिल, स्केच पेन और जियोमेट्री बॉक्स जैसे सामान भेंट करें। करनवाल ने इन उपहारों को जिले के सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचा दिया।

किस-किस ने फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति देखी है?

छत्तीसगढ़ के एक सबसे पुराने न्यूज-फोटोग्राफर, गोकुल सोनी जो आज भी सक्रिय हैं, उन्होंने रायपुर को ‘खूबसूरत’ं बनाने के सरकारी नज़रिए के बारे में लिखा है. आज उन्होंने फेसबुक पर दो तस्वीरें पोस्ट की हैं, और कहा है- साथियो, आज जो आप ये दो तस्वीरें देख रहे हैं, उनके पीछे सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे शहर की यादों, इतिहास और लापरवाही का पूरा किस्सा छिपा हुआ है।

पहली तस्वीर आजादी से पहले की है—कोतवाली चौक के पास की। उस समय वहाँ एक बड़ी गोल पानी की टंकी हुआ करती थी, जिसके बीचों-बीच एक खूबसूरत फव्वारा लगा था। और उस फव्वारे के केंद्र में थी दो बच्चों की बेहद प्यारी मूर्ति। जब फव्वारा चलता था, तो ऐसा लगता था मानो वे दोनों बच्चे खुशी-खुशी पानी में नहा रहे हों—जैसे बचपन खुद मुस्कुरा रहा हो। समय बदला और किसी कारणवश वह फव्वारा वहाँ से हटा दिया गया। लेकिन उन बच्चों की मूर्ति को बचाकर मोतीबाग में स्थापित कर दिया गया (दूसरी तस्वीर)। हम जैसे कई लोगों का बचपन उन मूर्तियों को पानी में नहाते हुए देखते-देखते बीता है।

फिर आया शहर को सुंदर बनाने का दौर, और यहीं से असली कहानी शुरू होती है। शहर सजाने की जिम्मेदारी जिनके हाथों में थी, उन्होंने शायद ‘सुंदरता’ं  का मतलब कुछ ज्यादा ही आधुनिक तरीके से समझ लिया। धीरे-धीरे पुरानी धरोहरें हटती गईं और उनकी जगह ले ली ‘मीना बाजार’ जैसी सजावट ने। और उसी क्रम में, उन दो मासूम बच्चों की ऐतिहासिक मूर्ति भी ‘सजावट के बोझ’ में कहीं गायब हो गई। कहाँ गई? किसी को नहीं पता। शायद किसी कोने में या फिर कचरे में!

जहाँ इतिहास को संभालकर रखा जाना चाहिए था, वहाँ उसे अनावश्यक सामान समझकर हटा दिया गया। आज शायद ही कोई फेसबुक मित्र होगा जिसने कोतवाली चौक का वह पुराना फव्वारा देखा हो—क्योंकि बात आजादी से पहले की है। जिनसे मैंने यह तस्वीर प्राप्त की, वे प्रदेश के बहुत पुराने फोटोग्राफर गोडबोले जी थे। यह तस्वीर उनके पिताजी ने खींची थी। कभी-कभी लगता है कि हमारे शहर के कुछ जिम्मेदार लोग इतिहास को संभालने नहीं, बल्कि साफ करने के मिशन पर थे—जैसे पुरानी चीजें नहीं, कोई फालतू फाइलें हों जिन्हें हटाकर जगह खाली करनी हो।

खैर यह सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसी न जाने कितनी धरोहरें चुपचाप हमसे छिन गईं, और हमें पता भी नहीं चला। आपमें से किस-किस ने मोतीबाग वाले फव्वारे पर उन बच्चों की मूर्ति को देखा है? अपनी यादें जरूर साझा करें...


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