राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : बचे हुए, बिखरे हुए, कितना खतरा?
14-Apr-2026 5:45 PM
राजपथ-जनपथ : बचे हुए, बिखरे हुए, कितना खतरा?

बचे हुए, बिखरे हुए, कितना खतरा?

प्रदेश में 27 सौ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किए हैं। इनमें नक्सल नेता भी शामिल हैं। सरकार नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा कर चुकी है। नक्सल प्रभावित इलाकों में फिलहाल शांति का माहौल है, लेकिन सुरक्षा बल अब भी अलर्ट मोड में हैं।

अंदाजा लगाया जा रहा है कि करीब 5 सौ से अधिक नक्सली सुरक्षा बलों के दबाव के चलते देश के अलग-अलग शहरों में चले गए हैं और सामान्य जीवन में काम-धंधे से जुड़ गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि ये नक्सली देर-सबेर फिर सक्रिय हो सकते हैं। हालांकि बड़ी संख्या में नक्सलियों ने समर्पण किया है और भारी मात्रा में हथियार व नगदी भी बरामद हुई है, लेकिन यह शंका भी जताई जा रही है कि काफी हथियार और नगदी अब भी जंगलों में छिपाकर रखी गई हो सकती है। राजनांदगांव इलाके में कुछ आत्मसमर्पित नक्सलियों से पुलिस ने पूछताछ की है, लेकिन अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाया है। पुलिस लगातार सर्चिंग अभियान चला रही है, हालांकि अभी तक कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है। नक्सलवाद के खात्मे के दावों के बावजूद प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती फिलहाल यथावत रखी जाएगी। अब देखना यह है कि आगे स्थिति किस दिशा में जाती है।

सूची आई, राजनीति गरमाई

शहर जिला कांग्रेस के वार्ड अध्यक्षों की सूची आखिरकार जारी हो गई, लेकिन इसके साथ ही संगठन के भीतर नई खींचतान भी खुलकर सामने आ गई है। पहले शहर जिलाध्यक्ष श्रीकुमार मेनन की जारी सूची को पीसीसी ने खारिज कर दिया था। बाद में संशोधन कर नई सूची जारी की गई, जिसमें आठ नाम बदले गए। इन बदलावों को लेकर पार्टी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कहा जा रहा है कि कुछ स्थानीय नेताओं के दबाव में फेरबदल हुआ, जो इन दिनों पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज के करीबी माने जा रहे हैं। नई सूची में अजीत कुकरेजा, सुबोध हरितवाल और एजाज ढेबर की पसंद को जगह मिलने की भी चर्चा है। कुकरेजा तो दो वार्डों में अपनी पसंद के अध्यक्ष बनवाने में सफल बताए जा रहे हैं।

विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन दावेदार नेता अभी से अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। वार्ड अध्यक्षों की नियुक्ति उसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है। हालांकि सूची जारी हो गई है, लेकिन नामों के फेरबदल से स्थानीय नेताओं के बीच असंतोष बढ़ गया है।

मामला अब प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट तक पहुंच गया है। उनके रायपुर दौरे के दौरान कुछ नेता सीधे मुलाकात कर अपनी नाराजगी जताने की तैयारी में हैं। देखना है कि आगे क्या कुछ होता है।

टाइटैनिक त्रासदी से जुड़ी एक स्मृति

14-15 अप्रैल 1912 की रात दुनिया का सबसे भव्य जहाज आरएमएस टाइटैनिक अटलांटिक महासागर में समा गया। उस त्रासदी के साथ छत्तीसगढ़ के जांजगीर का भी एक भावनात्मक अध्याय जुड़ गया।

सन् 1906 में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया से भारत आईं एनी क्लेमर फंक उस दौर में जांजगीर पहुंचीं, जब लड़कियों की शिक्षा लगभग असंभव मानी जाती थी। 1907 में उन्होंने भीमा तालाब के पास एक किराए के कमरे में सिर्फ 17-18 बच्चियों के साथ स्कूल शुरू किया। वे घर-घर जाकर परिवारों को समझातीं और कहती थी, बेटियों को पढ़ाना जरूरी है। उनके इस प्रयास से जांजगीर में महिला शिक्षा की नींव पड़ी।

फरवरी 1912 में उन्हें एक टेलीग्राम मिला। उनकी मां गंभीर रूप से बीमार थीं। वे नैला से मुंबई और फिर इंग्लैंड पहुंचीं। कोयला मजदूरों की हड़ताल के कारण उनका पहला जहाज रद्द हो गया। जल्द घर पहुंचने की बेचैनी में उन्होंने 13 पाउंड अतिरिक्त देकर टाइटैनिक का सेकेंड क्लास टिकट खरीदा। उस टिकट का नंबर 237671। हादसे के दो दिन पहले 12 अप्रैल 1912 को उन्होंने जहाज पर अपना 38वां जन्मदिन मनाया और 14–15 अप्रैल की रात जहाज हिमखंड से टकरा गया। कहा जाता है कि अफरा-तफरी के बीच उन्हें एक लाइफबोट में जगह मिल गई थी। मगर, उन्होंने एक मां को अपने बच्चों के लिए रोते देखा। उन्होंने बिना एक पल सोचे अपनी सीट उस महिला को दे दी और खुद पीछे हट गईं। और कुछ ही घंटों बाद जहाज के साथ समुद्र में समा गईं। उनका शव कभी नहीं मिला।

उनकी स्मृति में 1918 में जांजगीर में फंक मेमोरियल स्कूल का निर्माण किया गया। मिशन कंपाउंड में आज भी इसके अवशेष और शिलालेख मौजूद हैं। एनी फंक की कहानी हर पढ़ी-लिखी बेटी की मुस्कान है।

सोशल मीडिया ने लोगों को बड़ा कल्पनाशील बना दिया है।

नाम छूट गया था...

कल सोमवार को इसी कॉलम में बाटा जूते-चप्पल पर 99 पैसों तक के रेट वाली सामग्री प्रदेश के वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर गोकुल सोनी की लिखी हुई थी। उनका नाम गलती से छूट गया था।

-संपादक


अन्य पोस्ट