राजपथ - जनपथ
चौड़ीकरण के बाद अब फ्लाईओवर...
विधानसभा में मंगलवार को जब वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने तात्यापारा से शारदा चौक तक फ्लाईओवर निर्माण की घोषणा की, तो सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी बेंचों पर भी हलचल दिखी। वजह साफ है—इसी मार्ग के लिए पिछली सरकार सडक़ चौड़ीकरण की योजना को मंजूरी दे चुकी थी और सर्वे का काम भी हो चुका है। ऐसे में फ्लाईओवर की नई घोषणा ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
शहर के सबसे व्यस्त मार्गों में से एक आमापारा से जयस्तंभ चौक तक ट्रैफिक दबाव कम करने के लिए डॉ. रमन सिंह सरकार के समय चौड़ीकरण की योजना बनी थी। पहले कार्यकाल में आमापारा से तात्यापारा तक काम पूरा भी हुआ, लेकिन तात्यापारा से शारदा चौक तक भारी मुआवजे के कारण मामला अटक गया।
बाद में भूपेश बघेल सरकार ने चौड़ीकरण के लिए बजट में 2 करोड़ का प्रावधान किया, पर जमीन पर प्रगति नहीं हो सकी। मौजूदा विष्णुदेव साय सरकार ने इस योजना को आगे बढ़ाते हुए प्रभावित मकानों-दुकानों का सर्वे भी करा लिया। अब चौड़ीकरण के बजाए फ्लाईओवर के लिए करीब 10 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी रखा गया है।
अब फ्लाईओवर की घोषणा से स्थिति उलझती दिख रही है। जानकारों का मानना है कि यदि समग्र ट्रैफिक प्लान के बिना फ्लाईओवर बनाया गया, तो आमापारा-जयस्तंभ चौक के जंक्शन पर दबाव और बढ़ सकता है। सवाल यह भी है कि क्या फ्लाईओवर, पहले से स्वीकृत चौड़ीकरण योजना की जगह लेगा या दोनों साथ-साथ चलेंगे?
सरकार के एक बोर्ड पदाधिकारी ने इस संवाददाता से अनौपचारिक चर्चा में संकेत दिया है कि भाषण में ‘फ्लाईओवर’ शब्द आ गया है, जबकि प्रस्ताव चौड़ीकरण का था। ऐसे में देर-सबेर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी ही होगी। देखना है आगे क्या कुछ होता है।
‘अपनों’ के आगे मंत्री बेबस
विधानसभा के पहले तीन दिनों की कार्यवाही में सरकार के मंत्री विपक्ष से ज्यादा अपनी ही पार्टी के विधायकों के सवालों से घिरते नजर आए। संसदीय कार्यमंत्री पर सदन में फ्लोर मैनेजमेंट की जिम्मेदारी होती है, लेकिन हालात ऐसे बने कि उन्हें खुद ही असहजता झेलनी पड़ी।
रायपुर दक्षिण के विधायक सुनील सोनी ने राजधानी की ट्रैफिक समस्या को जोरदार तरीके से उठाया। ट्रैफिक का मुद्दा केवल परिवहन विभाग तक सीमित नहीं है—यह नगरीय प्रशासन, पीडब्ल्यूडी और गृह विभाग से भी जुड़ा है—फिर भी जवाब देने के लिए परिवहन मंत्री केदार कश्यप को ही खड़ा होना पड़ा।
दो बार रायपुर के महापौर रह चुके सुनील सोनी ने अपने कार्यकाल में सस्ती सार्वजनिक परिवहन सुविधा के लिए 40 सिटी बसें शुरू कराई थी, जो बाद में धीरे-धीरे बंद हो गईं। उन्होंने ‘राइट्स’ सर्वे एजेंसी का हवाला देते हुए कहा कि रायपुर और नवा रायपुर में 2025 तक 440 बसें संचालित होनी थीं, लेकिन इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हुई।
स्थिति यह रही कि सत्ता पक्ष के हमलों से मंत्री अधिक असहज दिखे। पार्टी संगठन के दो प्रमुख चेहरे—क्षेत्रीय महामंत्री (संगठन) अजय जम्वाल और पवन साय—प्रदेश से बाहर हैं। ऐसे में विधायकों की स्थानीय नाराजगी सदन में खुलकर सामने आ रही है।
पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने तो तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार सडक़ दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को नहीं रोक पा रही है, तो जनकल्याणकारी योजनाओं का क्या अर्थ रह जाता है।
एंग्लो-इंडियन विधायक और उपाध्यक्ष
छत्तीसगढ़ की छठी विधानसभा के जारी बजट सत्र में दो नियुक्तियों पर पक्ष विपक्ष में चर्चा हो रही है। पहली मनोनीत विधायक और दूसरी उपाध्यक्ष की। अब तक गठित छह विधानसभाओं में से पहली तीन विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय से इंग्रिड मैक्लॉड, बर्नाड जोसेफ और रोज़लिन बैकमैन विधायक मनोनीत रहीं। उसके बाद की इन तीन विधानसभाओं में सत्ता पक्ष ने अपने स्पष्ट बहुमत के चलते मनोनयन की जरूरत नहीं समझी या संख्या बल बढ़ाने के लिए जरूर नहीं रही।
हालांकि इन्हें भी निर्वाचित विधायक की तरह सभी अधिकार होते हैं। पहले डा रमन सिंह के तीसरे कार्यकाल, फिर भूपेश बघेल ने मनोनयन नहीं किया और अभी भी इसकी कोई हलचल नहीं है। वैसे इस बीच संसद से संविधान संशोधन विधेयक भी पारित कर दिए जाने से ऐसी नियुक्ति को अनिवार्य नहीं बताया जा रहा। यही वजह है कि षष्ठम विधानसभा में भी नियुक्ति नहीं होती दिख रही।
कुछ ऐसी ही स्थिति विधानसभा उपाध्यक्ष को लेकर भी समझी जा रही है। पहले पांच विधानसभाओं में उपाध्यक्ष नियुक्त होते रहे हैं। जो सत्ता पक्ष से ही रहें हैं। हालांकि यह पद मप्र के समय से विपक्ष को देने की परंपरा और दृष्टांत भी हैं। छत्तीसगढ़ में पहली ही विधानसभा में यह परंपरा टूटी । जब स्व बनवारी लाल अग्रवाल को हटाकर तत्समय कांग्रेस विधायक रहे धर्मजीत सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया।और उसके बाद स्व.बद्रीधर दीवान, फिर नारायण चंदेल, संतराम नेताम सत्ता पक्ष से मनोनीत किए जाते रहे हैं। यह एक तरह से वरिष्ठ विधायक को पद देकर पावर बैलेंस की दलील, रणनीति के हिस्से का भी रूप रहा।
छठवीं विधानसभा के कार्यकाल के ढाई साल बीत गए हैं और सत्तारूढ़ भाजपा में उपाध्यक्ष चुनाव को लेकर कोई हलचल नहीं दिख रही। इस पर स्वयं स्पीकर रमन सिंह भी कह चुके हैं कि चालू बजट सत्र में विस उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं होगा। समझा जा सकता है कि मानसून सत्र में नियुक्ति की जाए। ऐसे में पांचवीं विधानसभा के उपाध्यक्ष नेताम की तरह नए उपाध्यक्ष को भी कार्यकाल कम मिलेगा। उपाध्यक्ष, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सदन का संचालन करते हैं। उपाध्यक्ष न होने पर यह जिम्मेदारी सभापति की होती है। उपाध्यक्ष दबंग दमदार हो तो फ्लोर मैनेजमेंट में दिक्कत नहीं होती है। ऐसे में मानसून सत्र तक इंतजार करना होगा।
एआई का दौर और छत्तीसगढ़ का कोयला
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग आ चुका है। इसे रोका नहीं जा सकता। इसे न रोका जा सकता है और न ही इससे दूरी बनाकर विकास संभव है। इसी कारण 24 फरवरी को छत्तीसगढ़ के बजट में एआई का उल्लेख होना स्वाभाविक था और जरूरी भी। बजट के मुताबिक ट्रिपल आईटी में 20 करोड़ रुपये की लागत से एआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस तैयार किया जाएगा। इससे पहले केंद्र सरकार नवा रायपुर में देश का पहला एआई आधारित डेटा सेंटर पार्क 1000 करोड़ की लागत से स्थापित करने का ऐलान कर चुकी है।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में सैकड़ों डेटा सेंटर पहले से काम कर रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ भी इस दौड़ में शामिल हो रहा है। उम्मीद है कि इससे सैकड़ों रोजगार पैदा होंगे और राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। डेटा सेंटर पॉलिसी में पावर सब्सिडी, एसईजेड और अन्य प्रोत्साहन दिए जाएंगे, जिससे निवेश को आकर्षित किया जा सके।
लेकिन इस विकास के साथ एक समस्या भी जुड़ी है। वह है, बिजली की भारी खपत। आम लोगों को शायद यह पता न हो कि एआई का बड़ा आधार डेटा सेंटर ही हैं। इन विशाल परिसरों में हजारों सर्वर और कंप्यूटर 24 घंटे चलते हैं। एक बड़े डेटा सेंटर की बिजली खपत 80 से 150 मेगावाट तक हो सकती है, जो हजारों घरों की जरूरत के बराबर है। नवा रायपुर के प्रस्तावित पार्क में जितने ज्यादा डेटा सेंटर तैयार होंगे, बिजली की उतनी ही ज्यादा जरूरत होगी।
कहा जा रहा है कि भारत में 2030 तक डेटा सेंटरों की कुल बिजली मांग 130 गीगावाट तक पहुंच जाएगी, जो राष्ट्रीय बिजली खपत की लगभग 12 प्रतिशत होगी। यही आंकड़ा छत्तीसगढ़ जैसे कोयला उत्पादक राज्य के लिए मायने रखता है। राष्ट्रीय कोयला उत्पादन में छत्तीसगढ़ की हिस्सेदारी 18 से 20 प्रतिशत है। 2030 तक देश की कोयला मांग 1,462 मिलियन टन और 2047 तक 1,755 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। राज्य में 44,483 मिलियन टन कोयला भंडार है, इसलिए नए प्रोजेक्ट तेजी से आ रहे हैं।
इधर, हसदेव अरण्य सहित कई इलाकों में जल, जंगल, जमीन बचाने का संघर्ष जारी है। परसा ईस्ट केते बासन खदान में 137 हेक्टेयर जंगल में हजारों पेड़ कट चुके हैं, जबकि परसा खुली खदान में 800 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित है। आगे लगभग 3.99 लाख पेड़ अतिरिक्त खतरे में हैं। इससे हाथियों के आवास उजड़ रहे हैं, जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं और स्थानीय स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। भविष्य में केवल हसदेव अरण्य क्षेत्र में 18 हजार लोग प्रभावित हो सकते हैं और 6 गांव पूरी तरह विस्थापित हो सकते हैं। सैकड़ों परिवार पहले ही उजड़ चुके हैं। खेती और वनोपज पर निर्भर गोंड और उरांव बेदखली का सामना कर रहे हैं। मुआवजा और पुनर्वास को लेकर असंतोष है। फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के उल्लंघन हो रहा है, ग्राम सभा की सहमति नहीं ली जाती। विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां भी बढ़ गई हैं।
एक ओर नवा रायपुर के डेटा सेंटरों से लगभग 2,000 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार की संभावना है, तो दूसरी ओर एआई तकनीक की नई जरूरतों से अनजान हजारों परिवारों का भविष्य दांव पर लग सकता है। एआई और डेटा सेंटर छत्तीसगढ़ के लिए नए अवसरों के दरवाजे खोल रहे हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ के कोयले का दोहन बढ़ेगा, जिसका पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव बड़े पैमाने पर होगा।


