राजपथ - जनपथ
राहुल, सिंहदेव की बैठक
प्रदेश में जिला कांग्रेस के बाद ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति भी हो गई। अब बारी प्रदेश कांग्रेस संगठन में बदलाव की है। महामंत्री, और संयुक्त महामंत्री के कई पद खाली हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के भविष्य को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही है। इन सबके बीच पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की दिल्ली में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लंबी चर्चा हुई है।
बुधवार को राहुल के साथ सिंहदेव की करीब डेढ़ घंटे बैठक चली। इस बैठक में कुछ देर पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक भी रहे। बाद में वो निकल गए। बैठक में मुख्य रूप से तमिलनाडु, और पुडुचेरी के विधानसभा प्रत्याशी चयन पर चर्चा हुई। सिंहदेव दोनों ही प्रदेश के लिए पार्टी की स्क्रीनिंग कमेटी के चेयरमैन है। कांग्रेस, डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लडऩे जा रही है। चर्चा है कि बैठक में जल्द से जल्द प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया शुरू करने पर जोर दिया गया।
राहुल के साथ चर्चा में सिंहदेव की छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की गतिविधियों पर भी चर्चा हुई है। हालांकि औपचारिक रूप से सिंहदेव ने इसको लेकर कुछ नहीं कहा है। मगर राहुल के साथ सिंहदेव की बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। कुछ लोगों का अंदाजा है कि प्रदेश कांग्रेस में कुछ भी बदलाव चार राज्यों के चुनाव के बाद ही होगा। देखना है आगे क्या होता है।
2.5 करोड़ के टॉयलेट, अब 2500 करोड़ की सडक़
जंबूरी के आयोजन में 2.5 करोड़ रुपये टॉयलेट पर खर्च करने पर अभी सरकार की तरफ से कोई जवाब आया भी नहीं है कि पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता ननकीराम कंवर ने 2500 करोड़ रुपये का सवाल उठा दिया है। कोरबा कलेक्टर को हटवा कर दम लेने के बाद अब कंवर ने प्रधानमंत्री ग्राम सडक़ योजना फेस-4 की निविदाओं पर उंगली रखी है।
उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों की सडक़ों के लिए स्वीकृत करीब ढाई हजार करोड़ रुपए की निविदाओं में शर्तों से खेल किया जा रहा है। प्रभारी प्रमुख अभियंता केके कटारे नियमों को ताक पर रखकर कुछ खास ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की तैयारी में हैं। कंवर ने यह शिकायत मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पहुंचाई है और कहा है कि सीबीआई जांच होनी चाहिए। कंवर के आरोप सही हो सकते हैं। उनको भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री देवेंद्र माहला का समर्थन मिला है। बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी टेंडर शर्तों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि देश के किसी भी टेंडर में इस तरह की शर्तें नहीं हैं, जो फेस-4 की सडक़ों के लिए जोड़ दी गई हैं। मगर, विधानसभा के भीतर और बाहर भाजपा के ही सीनियर्स सरकार को आए दिन कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। पीएम सडक़ का मामला तो प्रक्रियागत गड़बड़ी हो सकती है, पर जंबूरी और कोरबा कलेक्टर को हटाने का मामला तो व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जुड़े सवाल है। अपने ही नेता बार-बार सार्वजनिक रूप से सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, तो अंदरखाने क्या सुलग रहा है? चर्चा यह भी है कि कुछ बड़ा होने वाला है, पर, क्या होने वाला है- अभी उस पर ठोस कोई कुछ नहीं कह रहा। इसलिए प्रतीक्षा करें।
केंद्र ने और आईपीएस मांगे

केंद्रीय गृह विभाग ने राज्यों से और भी आईपीएस अफसर प्रतिनियुक्ति पर मांगें हैं। ताकि केंद्रीय सुरक्षा बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों में अफसरों की कमी पूरी की जा सके। इससे उम्मीद की जा रही है कि छत्तीसगढ़ से अभी कुछ और आईपीएस दिल्ली भेजे जा सकते हैं। छत्तीसगढ़ आईपीएस कैडर में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का कोटा 31 अफसरों का हैं इसके विरुद्ध 10 अफसर ही भेजे गए हैं। इनमें जयदीप प्रसाद, मयंक श्रीवास्तव, आरएन दास, आशुतोष सिंह, नीतू कमल, डी श्रवण, जितेंद्र शुक्ला, पुष्कर शर्मा प्रमुख हैं। वहीं मोहित गर्ग इंतजार कर रहे हैं।
बहरहाल केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने राज्यों को सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज और सेंट्रल पुलिस ऑर्गेनाइजेशन में मिडिल से सीनियर पदों को भरने के लिए ज़्यादा इंडियन पुलिस सर्विस अधिकारियों को सेंट्रल डेपुटेशन पर भेजने के लिए लिखा है। इसमें सीबीआई, एनआईए, और एनसीबी शामिल हैं।
यह पत्र पिछले पहले हफ़्ते में भेजा गया था। जो छत्तीसगढ़ गृह विभाग को भी मिला है। गृह सचिव के पत्र में कहा गया है कि हर कैडर में 40 प्रतिशत सीनियर ड्यूटी पद सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व के तौर पर रखे गए हैं। हालांकि, यह अनुभव रहा है कि कुछ राज्य/ कैडर सेंट्रल डेपुटेशन के लिए पर्याप्त संख्या में नॉमिनेशन नहीं भेजते हैं। इस कमी को पूरा करने केंद्र ने यह भी प्रयास किया था कि वह अच्छे सीआर वाले अफसरों को स्वयं बुला लें लेकिन राज्य उन्हें रिलीव नहीं कर रहे थे।
यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में 28 अक्टूबर, 2025 को खारिज केंद्र की उस रिव्यू पिटीशन के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है जिसमें कोर्ट के 23 मई, 2025 के फैसले के खिलाफ सीएएफ में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) या इंस्पेक्टर-जनरल के रैंक तक आईपीएस अधिकारियों के डेपुटेशन को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी।
अभी, सीएएफ में डीआईजी के रैंक में 20 प्रतिशत पद और आईजी के रैंक में 50 प्रतिशत पद आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं। कोर्ट के फैसले का मकसद सीएएफ में आईएफएस के दबदबे को काफी कम करना है। इस फैसले से लगभग 13,000 सीएपीएफ अधिकारियों को फायदा होने की उम्मीद है, जिससे उन्हें तेजी से प्रमोशन मिलेगा और ठहराव की समस्या खत्म होगी। गृह मंत्रालय सीएपीएफ और आईपीएस दोनों का कैडर-कंट्रोलिंग अथॉरिटी है। दिसंबर तक,बीएसएफ, सीआरपीएफ , सीआईएसएफ आईटीबीपी, एसएसबी में आईजी , डीआईजी स्तर के 188 पदों में से जो आईपीएस अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं, उनमें से 36 पद खाली हैं। इस याचिका पर सुनवाई को लेकर हम इस कॉलम में सतत जानकारी देते रहे हैं।
पानी कम होगा, तभी पंख फैलाएंगे मेहमान

कोपरा जलाशय को हाल ही में रामसर साइट का दर्जा मिला है। यह बिलासपुर ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद उम्मीद जगी कि यहां देश-विदेश से प्रवासी पक्षियों की रौनक लौटेगी। लेकिन टैग मिल जाने से पक्षी नहीं आते। आते हैं तो आहार और अनुकूल परिस्थितियों के भरोसे।
सात-आठ साल पहले का कोपरा में जब पानी कम था, मकर संक्रांति के आसपास यहां रडी शेलडक, रेड क्रेस्टेड पोचर्ड, बार-हेडेड गूज, कूट, पेंटेड स्टॉर्क, वूली-नेक्ड स्टॉर्क, ब्लैक-हेडेड आइबिस, ग्रे-लेग गीज़, पर्पल हेरन, ग्रे हेरन, किंगफिशर, गार्गेनी, गडवाल जैसी कई प्रजातियां डेरा डाली हुई थीं। मगर इस मकर संक्रांति में कोपरा में पानी जरूरत से ज्यादा भरा दिख रहा है। नतीजा यह कि यहां वही पक्षी दिख रहे हैं जिनकी टांगें लंबी हैं, चोंच गहरी है, और जो ज्यादा पानी में भी खड़े रह सकते हैं। उथले पानी और कीचड़ वाले टीलों की कमी है। यह कमी प्रवासी पक्षियों की संख्या को सीमित कर रही है।
दरअसल, कोपरा प्रजनन स्थल नहीं, बल्कि आहार स्थल है; यहां पक्षी पेट भरने आते हैं, ठहरने नहीं। इसलिए जल स्तर का संतुलन सबसे अहम है।
अधिक पानी में केवल चुनिंदा प्रजातियां ही टिक पाती हैं- जैसे रेड क्रेस्टेड पोचर्ड या कॉमन कूट। ये गोताखोरी कर या मछली पकडक़र आहार जुटा लेती हैं। ये पक्षी आज भी दिखते हैं, लेकिन गिनती में। जबकि बत्तख जैसी टांगों वाले पक्षी, हेरन-स्टॉर्क समूह और किनारों पर भोजन खोजने वाले पक्षी तब आते हैं, जब पानी पीछे हटे, जमीन के टीले दिखें और उथले हिस्से बनें। लंबे पैरों वाले पक्षी किनारों पर खड़े होकर भोजन खोजते हैं, जबकि बत्तख जैसे पैरों वाले पक्षी उथले पानी में सहजता से आहार पा लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों से पानी लगातार ज्यादा भर रहा है; नतीजा, पक्षी कम और दृश्य सीमित।
अब जब कोपरा रामसर साइट है, तो वन विभाग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। यहां जल प्रबंधन ऐसा हो कि सर्दियों में निश्चित स्तर तक पानी घटे, टीले उभरें, किनारे सांस लें। तभी प्रवासी और गैर-प्रवासी पक्षियों की आमद बढ़ेगी। यही संतुलन सैलानियों को भी खींचेगा और स्थानीय जैव विविधता को मजबूती देगा। भरतपुर का केवला देव राष्ट्रीय उद्यान और ओडिशा का चिल्का (मंगलाजोड़ी), दोनों रामसर साइट हैं और दोनों की सफलता का सूत्र एक ही है- मौसम के अनुसार जल स्तर का सटीक प्रबंधन। कोपरा भी वही रास्ता अपनाए, तो पंखों की सरसराहट फिर लौटेगी।


