राजपथ - जनपथ
मनमोहन और छत्तीसगढ़
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की कई यादें छत्तीसगढ़ से जुड़ी है। डॉ. सिंह अपने पहले कार्यकाल में रायपुर आए थे, और उन्होंने कवर्धा जिले के भोरमदेव में तालाबों-पुराने बांधों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय सरोवर-धरोहर योजना का भी शुभारंभ किया था। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के प्रवास के दौरान कांग्रेस नेताओं के बीच काफी खींचतान हुई थी। रंग मंदिर के कार्यक्रम में तो जमकर नारेबाजी भी हुई थी, लेकिन वो शांत भाव से सारा नजारा देखते रहे।
डॉ. सिंह प्रधानमंत्री रहते वर्ष-2005-06 में रायपुर आगमन हुआ था। भोरमदेव में उनका सरकारी कार्यक्रम था। प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को लेकर विशेषकर कांग्रेस कार्यकर्ता काफी उत्साहित थे। मगर उनके आते ही एयरपोर्ट में तमाशा शुरू हो गया। उस समय प्रदेश के इकलौते लोकसभा सांसद अजीत जोगी इस बात से नाराज थे कि भोरमदेव के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ हेलीकॉप्टर से जाने वालों में उनका नाम नहीं है। इस पर उन्होंने एयरपोर्ट पर ही अपना सारा गुस्सा पार्टी के सीनियर नेता मोतीलाल वोरा पर निकाला। वोरा सफाई देते दिखे, लेकिन जोगी इतने जोर-जोर से बोल रहे थे कि आवाज दूर तक सुनाई दे रही थी। वोराजी हेलीकॉप्टर से भोरमदेव के लिए निकल गए।
जोगी इस कार्यक्रम में शिरकत नहीं कर सके। इसके बाद रंग मंदिर में कांग्रेस के कार्यकर्ता सम्मेलन में उनके समर्थकों ने प्रधानमंत्री के सामने ही जोगी जिंदाबाद के नारे लगाए। मंच पर मौजूद मोहसिना किदवई, और कई नेता जोगी समर्थकों को शांत रहने की अपील करते नजर आए। इस दौरान प्रधानमंत्री डॉ. सिंह हल्की मुस्कान बिखेरते कांग्रेस कार्यकर्ताओं का तमाशा देखते रहे। बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं को संबोधित भी किया। कुल मिलाकर जोगी समर्थकों के हंगामे की वजह से डॉ. मनमोहन सिंह का पहला छत्तीसगढ़ प्रवास सुर्खियों में रहा।
कांग्रेस की शिकायत की राजनीति
कांग्रेस के दर्जनभर जिलाध्यक्षों को बदलने पर विचार चल रहा है। दो दिन दिल्ली में प्रदेश के प्रमुख नेताओं की बैठक भी हुई है। यह खबर सामने आ रही है कि रायपुर शहर जिलाध्यक्ष बदलने को लेकर काफी खींचतान भी हुई है।
शहर जिलाध्यक्ष गिरीश दुबे को तीन साल से अधिक हो चुके हैं। लिहाजा, उनकी जगह लेने के लिए पार्टी के एक युवा नेता काफी मेहनत कर रहे हैं। वो हफ्तेभर से दिल्ली में डटे हैं। चर्चा है कि युवा नेता को प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज का भी समर्थन है। युवा नेता अभी संगठन में महासचिव भी है। उनके दिल्ली में सक्रियता की खबर आई, तो उनके विरोधी एक प्रमुख पदाधिकारी भी वहां पहुंच गए।
उन्होंने युवा नेता के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों को दिया है। युवा नेता पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ काम करने का आरोप भी है। अब पार्टी युवा नेता के खिलाफ शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेती है, यह तो जिलाध्यक्षों की सूची जारी होने के बाद ही पता चलेगा।
किस बात की जल्दी है
विदा होते दिसंबर और आते जनवरी में सरकारी विभागों में अधिकारी कर्मचारियों की पदोन्नति की होड़ ही नहीं आनन फानन भी रहती है।ऐसे ही जानवरों के एक विभाग में न जाने किस बात की जल्दबाजी है। मैडम ने कह दिया है कि उप संचालकों के 21 पदों पर अगले तीन दिनों में पदोन्नति दे देनी है। और हालत यह है कि दावेदारों के दस्तावेज अधूरे हैं। जो दावेदार नहीं है वो बताते हैं कि किसी का सीआर नहीं है तो किसी ने अचल संपत्ति विवरण नहीं दिया है तो कुछ की पुरानी जांच पूरी नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि यह कमी एक वर्ष की है,बल्कि कई वर्षों से अधूरी है। सुनने में आया है करीब 17-18 साल से। इस वजह से प्रमोशन की नोट शीट पहुंचते ही संचालक तक ने मार्गदर्शन मांगा है कि ऐसे में कैसे कर सकते हैं ।
फिर पता नहीं क्यों सचिव मैडम जल्दबाजी में है। वैसे मैडम नियम कानून सेक्रेटेरिएट बिजनेस रूल की पक्की हैं। इसके लिए उनकी कसमें खाई जाती हैं। इस जल्दबाजी के पीछे मैडम का मैलाफाइड इंटरेस्ट तो हो ही नहीं सकता। सोच भी नहीं सकते। बहुत खोजबीन के बाद पता चला कि कोई दावेदार मैडम के मातहत काम करता है। बस उसी ने ही सभी बैचमेट की ओर से यह जिम्मेदारी ली है। और लोग उसका इंटरेस्ट रेट तलाश रहे हैं। बस मैडम ने भी लंबित अवधि पर आश्चर्य जताते हुए 4 दिन का टाइम लिमिट तय कर दिया है। मैडम ने यहां तक कह दिया है कि वह विभाग के मुखिया से अनुमोदन ले लेंगी। अब प्रमोशन आर्डर का इंतजार है।
बाघों की देखभाल कर पाएगा छत्तीसगढ़?
मध्यप्रदेश ने छत्तीसगढ़ को बाघों का उपहार देने की घोषणा की है। छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या में वृद्धि अब तक निराशाजनक रही है। अभी कान्हा नेशनल पार्क से विचरण करने आए 6 बाघ पहुंचे हैं। इन्हें सरकार से किसी तरह की मंजूरी नहीं लेनी पड़ी, कॉरिडोर अनुकूल मिला और चले आए। प्रदेश के वन अधिकारी इस समय उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। यह स्पष्ट किया गया है कि उन्हें मध्यप्रदेश के वन क्षेत्र में खदेड़ा नहीं जाएगा, पर उनकी स्वतंत्र आवाजाही में कोई दिक्कत न हो इसका ध्यान दिया जाएगा। यह एक शानदार मौका है जब छत्तीसगढ़ में मध्यप्रदेश से आए बाघ विचरण कर रहे हैं और वहां की सरकार और बाघों का उपहार देने जा रही है। थोड़ी गंभीरता और सावधानी छत्तीसगढ़ को भी बाघों का स्टेट बना सकता है। बाघों को छत्तीसगढ़ में पनपने का मौका नहीं मिला, इसके कई कारण बताये जाते हैं। सबसे बड़ी बात तो यही है कि यहां पर वन विभाग के लिए अधिकृत पशु विशेषज्ञों की भारी कमी है। पशु चिकित्सकों से ही अधिकांश अभयारण्यों से रेस्क्यू किए जाने वाले जानवरों का इलाज होता है। आए दिन करंट लगाने जंगलों में हाथियों और दूसरे वन्यप्राणियों की मौत बताती है कि गश्ती दलों की बड़ी कमी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में बाघों के प्राकृतिक आवास की स्थिति में और सुधार की आवश्यकता है। वन क्षेत्रों में जल स्रोत बढ़ाना, शिकार के लिए पर्याप्त वन्यजीव होना और मानव हस्तक्षेप को न्यूनतम करना जरूरी है। बाघों को शिकारियों और अवैध शिकार से बचाने के लिए आधुनिक सुरक्षा उपाय अपनाने होंगे। कैमरा ट्रैप, ड्रोन निगरानी और वन रक्षकों की सतर्क उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। बाघ संरक्षण को लेकर स्थानीय समुदायों को जागरूक करना बेहद महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों को इस प्रक्रिया में भागीदार बनाना होगा। बाघों की संख्या बढऩे का मतलब बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को सुदृढ़ करने का प्रयास होता है। इसके लिए घास के मैदानों का रखरखाव, खाद्य शृंखला का संतुलन और वन्यजीवों की विविधता पर ध्यान भी देना होगा। मध्यप्रदेश ने बाघ संरक्षण में असाधारण सफलता हासिल की है। उनके विशेषज्ञों और संरक्षण मॉडलों का उपयोग छत्तीसगढ़ में भी किया जा सकता है।


