राजपथ - जनपथ
महिला संसदीय सचिव?
चर्चा है कि भाजपा महिलाओं को हर स्तर पर उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए रणनीति बना रही है। निगम-मंडलों में तो पद दिए ही जा रहे हैं, और अब महिला विधायकों को संसदीय सचिव भी बनाया जाएगा। भाजपा के 54 विधायकों में से 8 महिला विधायक हैं। इनमें से एक लक्ष्मी राजवाड़े मंत्री बन चुकी हैं। लता उसेंडी, और गोमती साय को क्रमश: बस्तर और सरगुजा प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया गया है। दोनों को ही कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है।
कहा जा रहा है कि बाकी पांच में से 4 महिला विधायकों को संसदीय सचिव बनाया जा सकता है। एक विधायक पूर्व केन्द्रीय मंत्री रेणुका सिंह भी हैं, जो कि किसी निगम-मंडल में पद लेने की इच्छुक नहीं है। वो मंत्री पद ही चाहती हैं, जिसकी संभावना फिलहाल कम नजर आ रही है। चूंकि केन्द्रीय मंत्री के साथ-साथ रमन सरकार में मंत्री रह चुकी हैं, ऐसे में उन्हें संसदीय सचिव बनाया जाएगा या फिर वो खुद बनना चाहेंगी इसकी संभावना नहीं के बराबर है। सबकुछ ठीक रहा, तो निकाय चुनाव के बाद बाकी चारों महिला विधायकों को संसदीय सचिव बन सकती है।
फिलहाल की हसरत
बीते पांच आठ वर्ष में छत्तीसगढ़ की नौकरशाही की छवि को लेकर अफसर चिंतित हैं। यह चिंता वे लोग ही कर रहे हैं जो दाल में नमक बराबर हिस्सेदारी निभाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कार्यरत अभा संवर्ग के तीनों सर्विसेस के पांच सौ अफसरों में कुछ ऐसे भी है जो स्वयं को गवर्नमेंट बिजनेस रूल से बांधकर डटे हुए हैं। इनकी संख्या उंगलियों में ही गिनी जा सकती है।
इसके एवज में उन्हें बार-बार तबादले लूप लाइन पोस्टिंग में स्वीकारना पड़ रहा है?। वहीं बदनाम लोगों में पुरूषों के साथ महिला अफसर भी बराबर का कदमताल कर रही हैं। एक-दो तो सीधे जेल में है और कुछ और पर भी कई छींटें हैं, बस बची हुई हैं। ऐसे कुछ अफसर एक कार्यक्रम में कुछ नेताओं के बीच थे। गपशप के दौर में उनकी मनोकामना सुन कर नई सरकार के नेता हतप्रभ से ठिठक गए। कहने लगे भाई साहब बस अब छवि सुधारनी है। बहुत सुन रहे हैं ये चोर वो चोर आदि-आदि। बस जहां हूं वहां काम करना हैं।
पूर्व के वर्षों में कलेक्टर, फेडरेशन, निगम में रहे इन साहबों की डंडी के बड़े चर्चे रहे हैं। और अब जिस विभाग में हैं, पिछले कुछ महीनों से काम भी कर रहे हैं रूल के मुताबिक। सच बात यह है कि साहब अभी जिस विभाग में हैं वहां गुंजाइश ही नहीं है। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी यही सोचकर साहब ने मनोकामना जता दी। और जब साहब को कोई नया विभाग मिलेगा तब देखना होगा मनोकामना का क्या हाल है।
चुनाव है या मनोनयन?
भाजपा का सदस्यता अभियान 30 नवंबर तक पूरा होना था, लेकिन निर्धारित 60 लाख सदस्यों का लक्ष्य हासिल न होने के कारण इसे आगे बढ़ा दिया गया। इसके बाद बूथ अध्यक्षों का चुनाव हुआ और 15 दिसंबर तक मंडल अध्यक्षों का चुनाव भी तय कार्यक्रम के अनुसार होना था। हालांकि, अब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है, जिसके चलते जिला अध्यक्षों के चुनाव भी आगे बढ़ गए हैं।
संगठन में अहम पद पाने की उम्मीद में कई दावेदारों ने सदस्यता अभियान में जोर-शोर से भाग लिया, लेकिन अधिकांश जिलों में चुनाव के बजाय मनोनयन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। चुनाव के लिए बैठकों का आयोजन किया जा रहा है, लेकिन उनमें भी मनोनयन को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रदेश में अब तक 80 प्रतिशत से अधिक मंडल अध्यक्षों का चयन हो चुका है, और इसे सर्वसम्मति का नाम दिया जा रहा है।
चुनाव अधिकारियों का कहना है कि चुनाव की नौबत ही नहीं आई क्योंकि सभी नाम सर्वसम्मति से तय हो गए। दरअसल, बताया यह जा रहा है कि आगामी नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों में कार्यकर्ताओं के बीच मनमुटाव और खींचतान से बचने के लिए यह रास्ता चुना गया। खुली प्रतिस्पर्धा से गुटबाजी और भितरघात की आशंका बढ़ सकती थी, जो पार्टी समर्थित प्रत्याशियों के लिए मुश्किलें खड़ी करती। अब सवाल यह है कि क्या जिला अध्यक्षों का चयन भी इसी तरह शांति से निपट जाएगा, या कहीं से विरोध के स्वर उठेंगे?
कबाड़ के धंधे में नवाचार

विनोद ओल्ड पेपर मार्ट-इस गाड़ी के बोर्ड पर लिखा यह नाम अपने आप में एक नई सोच और आत्मसम्मान की मिसाल है। रद्दी अखबार और पुराने कागज खरीदने वालों को अक्सर हेय दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन यहां इसे एक ‘मार्ट’ की तरह पेश कर, इस व्यवसाय को सम्मान और व्यवस्थित रूप देने की कोशिश की गई है। जहां कई लोग इस काम को छोटा समझते हैं, वहीं यह व्यवसाय पर्यावरण संरक्षण और रिसाइक्लिंग में बड़ा योगदान देता है।
विनोद की झलकती सादगी संदेश देती है कि हर काम में सम्मान और नई सोच जोडऩे की गुंजाइश होती है। विनोद कहना चाहते हैं कि काम कोई भी हो, उसे गरिमा के साथ किया जा सकता है। भले ही इसके लिए हिंदी की जगह अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल क्यों न करना पड़े।


