राजपथ - जनपथ
पशुओं का भाईचारा...
शहरी कॉलोनियों में जहां-जहां लोग गाय या सांड को खाना देते हैं, वे वहीं पर बस जाते हैं, और बुढ़ापा आने के साथ-साथ उनका चलना-फिरना घट जाता है, और वे एक ही कॉलोनी के होकर रह जाते हैं। ऐसी ही एक कॉलोनी इतने सांडों से भर गई है कि वहां बच्चों को अकेले सडक़ पर निकलते डर लगता है, और अंधेरे में कई बार लोग टकराकर गिरते भी हैं। लेकिन गोवंश की आलोचना अब इस देश में जानलेवा हो सकती है, इसलिए उस बारे में अधिक बात नहीं करनी चाहिए।
राजधानी रायपुर की एक महंगी कॉलोनी के बाशिंदे हो चुके एक सांड और वहां की सडक़ों के कई कुत्तों के बीच संबंध इतने मधुर हो गए हैं कि सडक़ घेरकर खड़े सांड को घेरकर खड़े कुत्ते बारी-बारी से उसे चाटकर सुख दे रहे थे!
शिकायत का तो हक ही नहीं...
ईडी ने डीएमएफ घोटाले में कोरबा जिले में काम करने वाले एक एनजीओ के ‘मालिक’ मनोज कुमार द्विवेदी को गिरफ्तार किया है, जो कि कलेक्टर को 40-45 फीसदी रिश्वत देता था। यह भारत सरकार की जांच एजेंसी ईडी अखिल भारतीय सेवा का एक अफसर के खिलाफ अदालत में कह रही है, तो इसमें हम क्या कह सकते हैं? लेकिन अगर 45 फीसदी रिश्वत एक कलेक्टर को मिल रही थी, और बाकी अमला तो है ही, कई जगहों पर मंत्री, सांसद, विधायक भी अपना हिस्सा रखते हैं, तो फिर लोगों को डीएमएफ जैसे फंड से होने वाले काम में किसी भी क्वालिटी की उम्मीद क्यों करनी चाहिए? ऐसे कलेक्टरों की निजी सम्पत्ति में हिरण जैसी उछाल अगर न आए, तो लोगों को हैरानी जरूर होनी चाहिए।
आनंद और विजय-भाव देने वाला गांजा!

भारत में सबसे लोकप्रिय एक नशे, गांजे के बारे में हम कई बार लिखते हैं कि इस देश में विदेशी शराब बेचने में तो तमाम सरकारें लगी हैं, लेकिन हजारों बरस से चले आ रहे इस देसी नशे, गांजे के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बना दिया गया है, इसलिए कि इससे दारू कारखानों के पेट पर लात पड़ती है। आज अमरीका और जर्मनी जैसे बहुत से देश गांजे को कानूनी बनाते चल रहे हैं, और हिन्दुस्तान विदेशी शराब बेचकर खुश है।
अभी करण मधोक की लिखी हुई एक किताब आई है जो पूरी की पूरी भारत में गांजे पर ही है। इस किताब में हमारी कई बार की लिखी गई, और यूट्यूब पर कही गई बात को स्थापित किया है कि भारत में गांजा भारतीय सभ्यता जितना ही पुराना है, और इस देश में लिखी गई कुछ सबसे पुरानी बातों में भी गांजे का जिक्र मिलता है। किताब में गांजे के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, चिकित्सकीय, और मनोरंजन के पहलुओं की चर्चा की गई है, और गांजे को आनंद और विजय-भाव देने वाला बताया गया है। इस किताब में यह भी बताया गया है कि आन्ध्र-ओडिशा, इलाके में गांजे की शीलावंती किस्म मिलती है, जो कि आज देश में सबसे अधिक तस्करी वाली किस्म है। यह किताब अस्पतालों और दवाओं में गांजे के इस्तेमाल से लेकर शिवभक्तों के बीच चलने वाली चिलम तक हर पहलू कवर करती है। आनंद नाम की यह किताब गांजा न पीने वालों को भी आनंद दे सकती है।
पुराने किस्से जिंदा रहते हैं
एक आदिवासी जिले के एक कलेक्टर, और एडिशनल कलेक्टर की जुगलबंदी की खूब चर्चा हो रही है। दोनों ही पहले महासमुंद और बालोद जिले में साथ काम कर चुके हैं। उस वक्त दोनों अलग-अलग पदों पर थे। कलेक्टर सीधे साधे हैं, और ज्यादा लफड़े में नहीं पड़ते। एक तरह से प्रशासन की बागडोर एडिशनल कलेक्टर ही संभालते हैं।
एडिशनल कलेक्टर जमीन संबंधी प्रकरणों को निपटाने के मामले में चर्चा में रहे। उन्होंने तहसीलदार पर दबाव बनाकर एक प्रकरण को निपटाने की कोशिश की, लेकिन तहसीलदार के अड़ जाने की वजह से आगे की कार्रवाई नहीं हो पाई। एडिशनल कलेक्टर पहले जिस जिले में पदस्थ थे वहां भी एक बड़े बिल्डर को फायदा पहुंचाने के लिए फाइल चलाई थी। फाइल के मुताबिक आगे फैसला भी हो गया। नया प्रकरण पर तो कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन पुराना प्रकरण उन्हें भारी पड़ सकता है। देखना है आगे क्या होता है।
तबादलों का इंतजार
नगरीय निकाय, और पंचायत के चुनाव साथ-साथ होने जा रहे हैं। चुनाव तारीखों की घोषणा विधानसभा सत्र निपटने के बाद होगी। चर्चा है कि चुनाव से पहले पुलिस और प्रशासन में भी फेरबदल हो सकता है।
तीन-चार जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। कुछ इसी तरह का बदलाव पुलिस में भी हो सकता है। पुलिस में एसपी, और आईजी स्तर के अफसरों को इधर से उधर किया जा सकता है।
प्रशासनिक फेरबदल को लेकर यह कहा जा रहा है कि विशेषकर पंचायत के चुनाव थोड़ा लंबा चल सकता है। इन सबको देखते हुए कुछ जिलों में जहां शिकायतें ज्यादा आ रही हैं, वहां के कलेक्टरों को बदला जा सकता है। इसके लिए स्थानीय नेताओं का भी दबाव है। फिलहाल तो सूची का इंतजार चल रहा है।


