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वारदात के बाद जागते रहो कहने वाले रखवाले
22-Jul-2023 4:16 PM
वारदात के बाद जागते रहो कहने वाले रखवाले

 प्रकाश दुबे

नोट बंदी के अगले सप्ताह बांग्लादेश के संसद भवन में लोकसभा अध्यक्ष ने कहा-आपने बहुत देर से नोट बंदी की। भारतीय होने के नाते चौंकने की बारी मेरी थी। उन्होंने बात साफ की-नकली नोट कई रास्तों से भारत में पहुंचते हैं। बांग्लादेश में भारतीय नकली मुद्रा की छपाई कहीं नहीं होती। कहा यही जाता है कि बांग्लादेश से भारी मात्रा में मुद्रा की तस्करी होती है। उसी रात कुछ घंटों बाद भारत में रह चुके बांग्लादेश के नामी पत्रकार ने उलाहना दिया -दोनों देशों के बीच विश्वास के अभाव के कई कारण है। आपने महात्मा गांधी को खोया। वे संत थे।

बांग्लादेश के संस्थापक प्रधानमंत्री के लगभग पूरे परिवार का खून कर दिया गया। हमारी सरकार धार्मिक कट्?टरवादियों से जूझती है। इसके बावजूद मानव तस्करी, पशु तस्करी सहित हर गड़बड़ी के लिए बांग्लादेश पर अंगुली उठाई जाती है। मैंने सहज भाव से पूछा-भारत से कितने लोग लुकाछिपी से बांग्लादेश आते हैं? उत्तेजित होने के बजाय उन्होंने प्रश्न का उत्तर प्रश्न में दिया-हमारे देश में बेरोजगारी है। बेहतर भविष्य की उम्मीद में लोग गैरकानूनी तरीके से प्रवेश करते हैं। आपके अर्ध सुरक्षा बल सीमा पर पहरेदारी करते हैं। इसके बावजूद भारी संख्या में अवैध तरीके से प्रवेश कैसे संभव होता है? न जानते हों, तो जाकर पूछिए कि इनमें महिलाओं की संख्या अधिक क्यों होती है?

सिले हुए कपड़ों और ऐसे ही अन्य रोजगार के कारण बांग्लादेश से गैरकानूनी आवाजाही पर अंकुश लगा है। कुछ प्रश्नों का उत्तर दोनों देशों की पुलिस और अर्धसैनिक सुरक्षा दल से मिल सकता है-जैसे अवैध निकासी कैसे होती है? लुकछिप कर आने वाली महिलाओं को क्या कीमत चुकानी पड़ती है? भारत में उन्हें क्या रोजगार मिलता है? म्यांमार में सैनिक तानाशाही आने के बाद सीमा पार कर नागालैंड, मणिपुर से लेकर मेघालय तक पहुंचने वाले रेलों को कहां ठौर मिला? गांजा-अफीम जैसे मादक पदार्थ उपजाने और उनकी तस्करी करने में उनकी, भारत की सीमा पर बसे जनजाति समूहों और देश भर में भेजकर कमाई करने वाले चेहरों की पहचान में किस प्रकार की दिक्कत है? मेरे भारत महान में सीमा की सुरक्षा की सौगंध खाना आसान है। कुछ महीने पहले केंद्रीय गृहमंत्री ने मणिपुर पहुंचकर मादक पदार्थों की तस्करी करने वालों को चेतावनी दी थी। भारी संख्या में तैनात केंद्रीय बल और पुलिस रोकने में असमर्थ क्यों है?

सीमा की हिफाजत का जिम्मा किसका है? कितनी निगरानी है? इस बात पर संसद में चर्चा होती है। अचरज इस बात का है कि जिस दिन संसद के नए भवन का गृह प्रवेश समारोह होता है उस दिन राजधानी में पहलवानी करने वाली, कुश्ती लडऩे वाली बेटियों की पिटाई होती है। नए सजे-संवरे भवन में जब पावस सत्र का शुभारंभ होता है तब खबर आती है कि यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह की अंतरिम जमानत को स्थायी जमानत में बदल दिया गया है। कुश्ती संघ की कमान भले छोडऩी पड़ी हो, उनकी लंगोटा फटकार हुंकार में कोई अंतर नहीं आया। मामले की जांच करने वाली पुलिस के वकील से पूछा गया-आप अभियुक्त को जमानत देने का विरोध करते हैं? भरी अदालत में उत्तर मिला-हम न जमानत देने का समर्थन करते हैं, न विरोध। अदालत जैसा ठीक समझे। अपराध की जांच करने वाली पुलिस के इस जवाब का मतलब अनपढ़ भी जानता है।

पुलिस, सुरक्षा बल, अदालतें आम आदमी की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध हैं। इसके बावजूद बर्बरता और नृशंसता से लदे फदे सैकड़ों हिंसक महिलाओं की पारदर्शिता नोंचते हैं। किसी मूर्ख ने नहीं, बल्कि एक मुख्यमंत्री ने बेझिझक कहा-हमने (4 मई की घटना पर 80 दिन बाद) स्वयमेव संज्ञान लेकर कार्रवाई की। किसे अपना रखवाला मानेंगे? केंद्र सरकार ने सीमावर्ती राज्यों में प्रदेश सीमा के अंदर भी पुलिस के अधिकार अर्धसैनिक बलों को सौंप दिए थे। उसे भी भनक नहीं लगी। जंजीर में जकड़ देने के बावजूद आशंकित होने पर श्वान भौंकता अवश्य है। रखवालों को रोबोट बना देने पर वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ताकत के बावजूद सक्षम नहीं हो सकते। पराजित राज्य का महानिदेशक सीधे सीबीआई की कुर्सी पा जाता है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश समेत अनेक राज्यों में परिणाम भुगत चुके हैं। महिला और विशेषकर जनजातीय समुदायों के रखवालों की संख्या कम नहीं है। आदिवासी के मुख पर मूत्रदान करने वाले विधायक-निकटवर्ती के प्रदेश में गुजरात के अनुभवी आदिवासी राज्यपाल हैं । मणिपुर में लज्जा के चीरहरण कांड में पहरेदार की सक्रियता से देश की प्रथम नागरिक से लेकर संबंधित प्रदेश की आदिवासी राज्यपाल तक परिचित हुए। इस तरह के सांकेतिक प्रतिनिधित्व के नफा-नुकसान पर वोट देते समय विचार नहीं किया जाता है।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


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