विचार / लेख
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डॉ. आर.के. पालीवाल
कभी कभी व्यक्ति या संस्थाओं की एक गलती इतनी बड़ी हो जाती है जिसका खामियाजा बहुत दूर तक भुगतना पड़ता है क्योंकि उसके कलंक के स्याह दाग को धोना असंभव हो जाता है। बिल्किस बानो मामला गुजरात का ऐसा ही मामला बन गया है जिसने न केवल गुजरात बल्कि आजादी के बाद देश का नाम भी बदनाम किया है। पहले तो बहुत साल तक यह मामला गुजरात पुलिस और सीबीआई की जांच में अटका रहा, फिर न्यायालयों की अनंत भूल-भुलैया में भटकता हुआ कई साल बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सुनवाई के लिए गुजरात राज्य के बाहर मुंबई के कोर्ट में स्थानांतरित होने के बाद ही अंतिम परिणति तक पहुंच पाया था। बहुत लंबे विलंब के बावजूद कई आरोपियों को सजा होने पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर लोगों का थोड़ा विश्वास जमा था। यह मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय में सुना जा रहा है।
पिछले साल इस मामले का सच फिर एक बार शर्मिंदा हुआ था जब गंभीर आरोपों के सिद्ध होने के बावजूद अधिकांश सजायाफ्ता अपराधियों के प्रति गुजरात सरकार पंद्रह अगस्त को मेहरबान हो गई थी और जनहित में उन्हें समय के पहले जेल से आजादी दे दी थी। उस समय गुजरात सरकार पर वैसे ही आरोप लगे थे जैसे बिहार में आनंद मोहन सिंह की समय से पहले रिहाई पर लग रहे थे कि यह सब चुनावों की वोट बैंक राजनीति के मद्देनजर हो रहा है। हद तो तब हो गई थी जब रिहाई के बाद इन लोगों का फूल मालाओं से इस तरह स्वागत किया गया था मानों ये देश हित में कोई महान काम करके आए हैं।
पहले गुजरात सरकार सर्वोच्च न्यायालय में इन सजायाफ्ता अपराधियों की समय से पहले रिहाई की फाइल दिखाने में आनाकानी कर रही थी। यदि इन अपराधियों की रिहाई जनहित में की गई है तो जनहित में इसे सार्वजनिक भी किया जाना चाहिए। जनहित में किए गए कार्यों का एक तरफ केंद्र और राज्यों की सरकार बेतहाशा जन धन खर्च कर विज्ञापन करती हैं और दूसरी तरफ कुछ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में भी प्रस्तुत करने से भी गुरेज करती हैं। इसी से यह आभास होता था कि दाल में काफी कुछ काला है। दैनिक भास्कर में छपी एक खोजी रिर्पोट मे कई ऐसे पहलू उद्घाटित हुए हैं जिनसे अब यह कयास सच लगता है कि यह रिहाई के लिए उचित मामला नहीं लगता।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने संगीन अपराध के सजायाफ्ता अपराधियों को छोडऩे के गुजरात और बिहार सरकार के दो बहुत संवेदनशील मामले लंबित है। यह भी एक संयोग ही है कि बिल्किस बानो का मामला केंद्र सरकार में सत्ताशीन भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार का है और दूसरा गोपालगंज के तत्कालीन जिला कलेक्टरजी कृष्णैया की हत्या के अपराधी आनंद मोहन सिंह की रिहाई का है, जहां विपक्षी दलों की गठबंधन सरकार है। इन दोनों मामलों की समानता और विशेषता यह है कि इनमें याचिकाकर्ता दो महिलाएं हैं जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संगीन अपराधों का दंश झेला है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह आम नागरिकों की सरकारों के निर्णय से नाराजगी है जिन्हें हमारा समाज और कानून मानता है। यही कारण है कि आम जनता की सहानुभूति, जो सोसल मीडिया के माध्यम से मुखर हो पाई है, खुलकर सामने आ रही है। सर्वोच्च न्यायालय के सामने एक साथ आए इन दो मामलों में यह समान बात है कि अधिकांश राजनीतिक दल भले ही खुद को महिलाओं और आम लोगों के लिए समर्पित कहें लेकिन वे चुनावों में टिकट देकर, मंत्री बनाकर और सजा से मुक्ति देकर विविध रुप में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त लोगों की मदद करते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय से ही इन दोनों मामलों में न्याय की उम्मीद है। इन मामलों में जो भी निर्णय आएंगे वे ऐतिहासिक महत्व के होंगे क्योंकि उनमें वह मापदंड निश्चित होने की संभावना है जो देश भर में कैदियों की रिहाई के लिए दिशा निर्देश की तरह कार्य करेंगे और अपराधियों के प्रति प्रदेश सरकारों की मनमानी पर कुछ अंकुश लगाएंगे।


