विचार / लेख
शुभ्रांशु चौधरी
पिछले लगभग तीन माह से हम लोग एक गोंडी शांति यात्रा पर निकले हैं। हम लगभग 15 लोग जगह जगह जाकर गोंडी के शब्द तलाशते हैं और साथ में लोगों से बस्तर में सुख और शांति कैसे आए इस पर बातचीत भी करने का प्रयास करते हैं। कहावत है चार कोस में पानी बदले, आठ कोस में बानी तो थोड़ी थोड़ी दूर में गोंडी भी हर भाषा की तरह बदल जाती है।पर दूरदराज के लोगों से बातचीत करने के लिए जैसे हम मानक हिंदी का प्रयोग करते हैं ( हिंदी की 49 बोलियाँ हैं जैसे भोजपुरी, बुंदेलखंडी, बघेलखंडी आदि)। गोंडी शब्द संग्रह के बाद एक मानक गोंडी शब्दकोश बनाने का प्रयास है जिससे कहीं के भी गोंडी बोलने वाले लोगों के साथ बातचीत हो सके।
मध्य भारत में माओवादियों की सम्पर्क भाषा गोंडी है। यदि उनसे बात करना है तो मानक गोंडी ज़रूरी है।जब भी मैंने माओवादियों के साथ समय बिताया लगभग हर बैठक में मैंने यह पूछा आपमें से कितने लोग हिंदी समझते हैं। अक्सर बहुत कम हाथ ही उठे।बस्तर में दो तरह के आदिवासी हैं एक सडक़ किनारे रहने वाले और हिंदी बोलने वाले और दूसरे जंगल में रहने और गोंडी बोलने वाले। अधिकतर इस दूसरी तरह के लोग माओवादियों के साथ जुड़े। माओवादियों में लगभग 50त्न लड़ाके लड़कियाँ हैं और उनमे से अधिकतर सिर्फ गोंडी जानती हैं। यदि इस समस्या को हल करना है तो इन सभी से बात करना बहुत ज़रूरी है।
इस यात्रा के दौरान हम लोगों ने सडक़ किनारे शहरों में ही लोगों से बात करने की कोशिश की यह जानने के लिए कि उनके अनुसार इस समस्या का समाधान कैसे हो सकता है। सभी ने एक सुर में कहा कि बातचीत के सिवाय और कोई तरीका नहीं है। हमें किसी तरह दोनों लड़ रहे पक्षों के बीच बातचीत शुरू करवानी पड़ेगी।लोगों ने इन बैठकों में प्रस्ताव भी पारित किए। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सरकार को यह याद दिलाना चाहा है कि उन्होंने पिछले चुनाव के पहले ‘इस समस्या के समाधान के लिए बातचीत के गम्भीर प्रयास करने’ का वादा किया था। उन्होंने इन प्रस्तावों में माओवादियों से भी यह आग्रह किया है कि वे ‘आदिवासी अधिकार’ को लेकर बातचीत करें
लोगों का सोचना है कि भारतीय संविधान आदिवासियों के लिए काफ़ी है यदि उसके आदिवासी समर्थक कानून जैसे पेसा, पाँचवी अनुसूची आदि सही रूप से लागू हो जाएँ, जिसे माओवादी सरकार से बात कर वास्तविकता बना सकते हैं। नेपाल में जब बातचीत हुई थी तो माओवादियों ने नेपाली लोगों के लिए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र हासिल किया था (इससे पहले नेपाल एक हिंदू राष्ट्र और राजतंत्र था) वैसे ही अगर यहाँ बदले में माओवादी हिंसा छोडऩे का वादा करें तो भारतीय संविधान में लिखे आदिवासी समर्थक क़ानून भी यहाँ वास्तविकता बन सकते हैं। लोगों का सोचना है कि पिछले 40 सालों में आदिवासी ने माओवादियों के साथ लड़ते हुए कुर्बानी दी है जिसके बदले में माओवादियों को आदिवासियों के लिए यह करना चाहिए।
पर थोड़े दिन पहले माओवादियों ने एक पर्चा निकालकर कहा है कि लोगों को चैकले मांदी (सुख शांति के लिए बैठकों) में नहीं जाना चाहिए।हममें असहमति हो सकती है जो सामान्य है। असहमतियों को बातचीत से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।इस बातचीत के दौर में हम उन लोगों के पास भी गए जो लम्बे लम्बे समय से जल, जंगल, जमीन और अन्य कई जायज़ माँगों को लेकर धरने में बैठे हैं। उनसे हमारी अच्छी बात हुई। लगभग विषयों पर हमारी सहमति भी है, कुछ विषयों पर असहमति है जिस पर हमने और बात करने का निर्णय लिया। वे लोग भी बस्तर में शांति चाहते हैं
माओवादियों ने हमेशा कहा है कि उनको वार्ता में सरकार से धोखा हुआ है पर वे हमेशा बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बीच में यह बयान भी दिया कि जेल में बंद वरिष्ठ माओवादी नेता बातचीत कर सकते हैं। पर वे लोगों को बातचीत से क्यों रोक रहे हैं यह समझ नहीं आया। क्या लोग इतने नादान हैं कि उनको बरगलाया जा सकता है? हमारी समझ के अनुसार माओवादी जगह जगह लोगों को धरने पर बैठाकर संयुक्त मोर्चा का प्रयोग कर रहे हैं जिसकी अगली कड़ी दोनों पक्षों के बीच आधिकारिक बातचीत होती है। सरकार को इसका सम्मान करना चाहिए। बातचीत शुरू करने के लिए सरकार की शर्तें वास्तविकता से परे लगती हैं।
बस्तर की जनता अब थक गयी है। वे कह रहे हैं कि हिंसा अब बहुत हो गई। दोनों पक्षों को जनता की बात सुननी चाहिए। तमाम असहमतियों के बीच विभिन्न तरह की बातचीत चाहे वह लम्बे समय से चल रहे धरना स्थलों पर हो या शहरों में, बातचीत चलती रहनी चाहिए। हमारी बंदूक़ें आपस में बात करें इससे हमेशा यह बेहतर है कि हम असहमति के बीच भी बात करने की कोशिश करें और समस्याओं का समाधान ढूँढने का प्रयास करें। चैकले मांदी बैठकों में बार-बार यही निकलकर आया कि बस्तर की जनता दोनों पक्षों से यही चाहती है। आशा है दोनों पक्ष उनकी इच्छा का सम्मान करेंगे।
( लेखक नई शांति प्रक्रिया के संयोजक हैं)


