विचार/लेख
-अर्पित द्विवेदी
मैं यूरोप ट्रिप पर था। ट्रेन से यात्रा कर रहा था। ट्रेन लगभग खाली सी थी। मैंने एक चीज नोटिस की, ट्रेन में जो भी यात्री चढ़ता वह किसी यात्री के पास बैठने के बजाय कोई एकांत जगह ही तलाशता। वहीं कोई किताब खोलकर पढऩे लगता या अपने मोबाइल या लैपटॉप में लग जाता।
यही परिस्थिति अगर भारत में होती तो अधिकांश लोग ऐसी जगह चुनते जहाँ उन्हें कोई बतियाने को मिल जाये। आप किसी भी सार्वजनिक परिवहन से यात्रा कीजिए या किसी समारोह में जाइये कुछ ही देर में आपके आस पास के अनजान लोग आपसे बतियाने लगेंगे। थोड़ी ही देर में वो आपके व्यक्तित्व जीवन के बारे में पूछने लगेंगे। आप जरूरत भर की बात करेंगे तो आपसे कहेंगे कि आप बहुत कम बोलते हैं। क्या आप ऐसे ही चुप चुप रहते हैं या कोई समस्या है?
इनको लगता है कि जो इनकी तरह बात नहीं कर रहा वह असामान्य है। उसे कोई मानसिक समस्या है। शायद अवसाद से पीडि़त है। या बहुत घमंडी है।
पर्सनल स्पेस क्या होता है, उसका क्या महत्व है और किसी के पर्सनल स्पेस का कैसे सम्मान किया जाए ये हमें नहीं आता। हम तो पूरे अधिकार के साथ धड़धड़ाते हुए किसी के भी पर्सनल स्पेस में घुस जाते हैं।
आप देखिए यहां लोग किसी को कभी भी बिना सोचे फोन मिला देते हैं। अगर वह न उठाए तो बुरा मान जाते हैं। जबकि कायदा यह कहता है कि अगर कोई इमरजेंसी नहीं है तो एक बार मैसेज पर पूछ लें कि यह काम है अथवा आपसे बात करने का मन था, आपसे किस समय बात हो सकती है।
मुझे लगता है यहां अधिकांश लोगों को अपने साथ कैसे जिया जाए ये आता ही नहीं है। अगर इन्हें कुछ समय अकेले रहना पड़े, कोई बात करने को न मिले तो ये बेचैन हो जाते हैं। इन्हें कोई न कोई चाहिए खोपड़ी चाटने को।
असल में यहां लोगों की जिंदगियों में कोई रचनात्मकता नहीं है। अधिकांश एक ढर्रे पर चले जा रहे हैं। उन्हें लगता है यही जीवन है। सुख साधन जमा करके, शानो-शौकत का दिखावा करके खुद को बेहतर दिखाने ही अंतहीन दौड़ में दौड़ते रहना ही इनके लिए जीवन का उद्देश्य है।
जिन समाजों में रचनात्मकता होती है वो खुद के साथ ज्यादा समय बिताते हैं। दूसरों से बतियाने में ही नहीं बल्कि अपने विचारों में भी आनंदित रहते हैं। और इसीलिए वो पर्सनल स्पेस को महत्व देते हैं। क्योंकि ये किसी के आनंद में दखल देने जैसा है।
-इमरान कुरैशी
भारत के पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड के एक शख़्स दक्षिण भारत के केरल में स्वास्थ्य सुविधाओं के ब्रांड एम्बेसडर बन गए हैं। ये शख़्स हैं डॉ. विसाज़ो कीची, जिनका मलयालम में बनाया गया वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।
विभिन्न उत्पादों के ब्रांड एम्बेसडरों के लिए ये कोई अनोखी बात नहीं है कि वो अपने वीडियो को कई स्थानीय भाषाओं में डब करते हैं। लेकिन नगालैंड की राजधानी कोहिमा के रहने वाले 29 साल के डॉ. विसाज़ो कीची का मामला कुछ अलग है। वे धाराप्रवाह मलयालम बोलते हैं। हालांकि वो यह भी मानते हैं कि ये बहुत कठिन भाषा है।
कीची ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘अगर आप डॉक्टर हैं तो ये मजबूरी हो जाती है क्योंकि आपको अपने मरीजों से बात करने के लिए भाषा सीखनी पड़ती है।’
जब अगस्त 2013 में डॉ. कीची कोझिकोड पहुंचे तो सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस कोर्स में एडमिशन लेने वाले वो पूर्वोत्तर के पहले व्यक्ति थे। इसके दो साल बाद ही पूर्वोत्तर से लोगों का वहां आना शुरू हुआ। कई लोगों के लिए ये ‘दूसरा घर’ बन गया है।
केरल में प्रवासी मजदूर
केरल के बारे में उनकी हिचक तब गायब हो गई जब उनके अध्यापक और सहपाठी बहुत मददगार साबित हुए, जैसा कि कोहिमा में उनके मलयाली पड़ोसी ने उन्हें आश्वस्त किया था।
डॉ. कीची ने कोझिकोड में अपना एमबीबीएस कोर्स पूरा किया और तिरुवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सर्जरी की पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री में दाखिला लिया। उनके लिए केरल शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में मॉडल राज्य है।
वे कहते हैं, ‘अगर किसी के पास पैसा नहीं है तो वो भी अस्पताल में बेधडक़ जा सकता है और राज्य कि विभिन्न योजनाओं के तहत अपना इलाज करा सकता है।’
लेकिन जो बात डॉ। कीची को ब्रांड एम्बेसडर बनाती है, वो है केरल का ख़ुद को एक ऐसे राज्य के रूप में दिखाने का दृढ़ संकल्प जहां ‘किसी भी भारतीय के पढऩे, काम करने और रहने का स्वागत है।’
जैसा कि एक अधिकारी ने कहा, यह राज्य बार-बार साबित करना चाहता है कि यह ‘ईश्वर का अपना देश है’, जो कि राज्य की लोकप्रिय टैगलाइन भी है।
‘सभी का स्वागत’
एक्सपर्ट केरल सरकार के इस नीतिगत फैसले के पीछे कई कारण बताते हैं।
मुख्यमंत्री पिनराई विजयन प्रवासी मज़दूरों को मेहमान वर्कर बताते हैं। सभी के स्वागत वाला बोर्ड लगाना राज्य की मजबूरी है ताकि राज्य से बाहर जाने वाली मलयाली मजदूरों की आबादी के साथ यहां आने वाले प्रवासी मजदूरों का संतुलन बिठाया जा सके।
केरल से लोग, खासतौर पर 20 से 40 साल की उम्र वाले, दूसरे देशों में रोजग़ार के लिए जाते हैं और वहां से वो पेट्रोडॉलर या अन्य विदेशी मुद्राएं भेजते हैं जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था चलती है और यह सालाना एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये की राशि है।
केरल में उनके परिवारों को घर बनाने, बिजली के काम करने, बढ़ई, खेत और औद्योगिक मजदूर आदि के रूप में मानव संसाधन की जरूरत है।
1980 के दशक से 2000 की शुरुआत तक केरल में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से प्रवासी मजदूर आते थे। बीते दो दशक से यहां बंगाल, असम, बिहार, पूर्वोत्तर और उत्तरी राज्यों के लोग आने लगे हैं।
सेंटर फॉर माइग्रेशन एंड इन्क्लूसिव डेवलपमेंट के डायरेक्टर बेनॉय पीटर ने बीबीसी हिंदी से कहा, ‘दिहाड़ी मज़दूरों में 40 प्रतिशत बंगाल से और 20 प्रतिशत असम से आते हैं जबकि बाकी ओडिशा और अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों जैसे त्रिपुरा, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय आदि से आते हैं।’
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एसोसिएट प्रोफेसर जजाति के पारिदा बताते हैं कि क्यों अन्य राज्यों से कुशल और अकुशल मजदूर केरल आ रहे हैं।
वे कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश, ओडिशा, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जो लोग कृषि में रोजगार खो रहे हैं, वे ही प्रवास कर रहे हैं।’
‘वे केरल में मजदूरी को लेकर भी आकर्षित हो रहे हैं। अगर ओडिशा की बात करें तो वहां के मुकाबले केरल में करीब-करीब चार से पांच गुना मजदूरी है।’
अन्य राज्यों से अधिक मजदूरी
पारिदा ने कहा, ‘अगर ओडिशा में 200 रुपये दिहाड़ी है तो केरल में 800 रुपये है। बड़े पैमाने पर मजदूरों के यहां आने की प्रमुख वजह यही अंतर है। केरल की अर्थव्यस्था में उनका बड़ा योगदान है। उनके बिना, केरल की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।’
पारिदा ने केरल प्लानिंग बोर्ड के सदस्य डॉ. रवि रमन के साथ मिलकर 2021 में एक अध्ययन ‘ऑन माइग्रेशन, इनफॉर्मल एम्प्लायमेंट एंड अरबनाइजेशन इन केरला’ का सह लेखन किया।
पारिदा ने कहा कि अध्ययन दिखाता है, ‘बहुत कम जगहें हैं जहां औसत आमदनी थोड़ी बहुत कम थी। कुछ जगहें ऐसी थीं जहां स्थानीय लोगों का बर्ताव प्रवासी मज़दूरों के साथ अच्छा नहीं था लेकिन कुल मिलाकर संबंध अच्छे थे। चंद जगहों पर स्थानीय लोगों को प्रवासी मज़दूर स्थानीय मजदूरों के मुक़ाबले अधिक बेहतर लगे। प्रवासी मज़दूर 30 मिनट ज़्यादा काम करते थे जबकि स्थानीय मज़दूर इनकार कर देते थे।’
पीटर ने कहा कि 2017-18 में केरल में 31 लाख प्रवासी मज़दूर थे। 17.5 लाख प्रवासी मजदूर निर्माण में, 6.3 उद्योग में, 3 लाख खेती और उससे जुड़ी सेवाओं में, 1.7 लाख सेवा क्षेत्र में, एक लाख रिटेल या होलसेल व्यापार में और 1.6 लाख अन्य नौकरियों में थे।
अध्ययन के मुताबिक, ‘औसतन भुगतान की सूचनाओं के आधार पर अनुमान है कि केरल से हर साल 7.5 अरब रुपये अन्य राज्यों को जाता है।’
लेकिन पीटर केरल सरकार के ताजा प्रस्ताव से असहमति जताते हैं, ‘ऐसी खबरें हैं कि पुलिस प्रवासी मजदूरों से उनके राज्य से क्लीयरेंस सर्टिफिकेट चाहती है। ये सिर्फ इसलिए कि बमुश्किल एक या दो प्रतिशत लोग अपराध में संलिप्त होते हैं। केरल को ये नहीं करना चाहिए। उसे दुनिया को दिखाना चाहिए कि बाकी जगहों पर मलयालियों के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए।’
प्रवासी स्टूडेंट
जब बीती तीन मई को मणिपुर में हिंसा शुरू हुई तब भी केरल सरकार ने ‘सबका स्वागत’ वाली नीति को जारी रखा।
एंथ्रोपोलॉजी (मानव शास्त्र) के 25 साल की पीएचडी स्डूडेंट किमशी लहैनीकिम ने मणिपुर की राजधानी इम्फ़ाल में ‘भयावह अनुभव’ के बाद एक महीने पहले ही कन्नूर विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।
उन्होंने बीबीसी को बताया, ‘जब हिंसा शुरू हुई उस समय मैं एक किराए के कमरे में रहती थी जबकि मेरे माता पिता चुराचांदपुर में थे। हमने ऐसे नारे सुने कि सभी कुकी को मार डालो। चार मई को हम डीजीपी के घर पहुंच गए। हम 300 लोग थे और इसके बावजूद हम पर दिनदहाड़े हमला हुआ। शाम को जब डीजीपी लौटे, हम सभी को मणिपुर राइफल्स कैंप में भेज दिया गया।’
किमशी ने बताया, ‘बहुत सारे लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को विदाई देना शुरू कर दिया क्योंकि हमें यकीन नहीं था कि हम भीड़ के हाथों बच पाएंगे।’
किमशी और उनके दूसरे साथी किसी तरह 9 मई को इम्फाल से निकलने में कामयाब होकर दिल्ली पहुंचे जहां उन्होंने नौकरी तलाश करनी शुरू कर दी।
उन्होंने बताया, ‘मुझे एक कॉल सेंटर में नौकरी भी मिल गई। कुकी स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन की अपील पर केरल पहला राज्य था जिसका जवाब आया। बिना दोबारा सोचे मैं अपना अध्ययन पूरा करने कन्नूर चली आई। मैंने कभी सुना था कि मेरे हाईस्कूल के कुछ टीचर यहीं के थे।’
किमशी और 34 अन्य छात्रों को उनके मोबाइल पर मौजूद दस्तावेजों के आधार पर एडमिशन दे दिया गया, ‘फीस अदा करने के लिए हमारे पास पैसे नहीं थे।’
किमशी को जो सबसे अच्छी बात लगी कि यहां के लोग ‘बहुत सरल और मेहमानवाज़ हैं। और हम यहां सुरक्षित महसूस करते हैं। केरल सरकार और विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और स्कूलों ने जो हमें मौके मुहैया कराए हम उसके बहुत आभारी हैं। यहां के लोगों ने जो प्यार बरसाया, उसके लिए हम उनका शुक्रगुजार हैं।’
राज्य में 81 प्रतिशत प्रवासी मजदूरों के बच्चों को शिक्षा मिलती है। हाल के महीनों में पायल कुमारी ने प्रवासी समुदाय का नाम ऊंचा किया जब उन्होंने कुछ महीने पहले डिग्री परीक्षा में पहला रैंक हासिल किया। अर्नाकुलम में एक पेंट शॉप में सेल्समैन का काम करने वाले की बेटी पायल का जन्म बिहार में हुआ और पालन पोषण केरल में हुआ क्योंकि उनके पिता यहीं बस गए थे।
पायल ने बीबीसी हिंदी को बताया, ‘जब पत्रकारों ने मेरा साक्षात्कार लिया तो वो ये देख कर हैरान हुए और खुश हुए कि मैं मलयालम बोल लेती हूं। एक बार आपको मलयालम आ गई तो आप यहां स्वीकार लिए जाते हैं।’
पायल का भाई एक एनजीओ में फ़ाइनेंस अधिकारी है और उनकी बहन पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई कर रही है। पायल इस समय सिविल सेवा की तैयारी कर रही हैं।
डॉ.कीची ने कहा, ‘मैं हमेशा कहता हूं कि केरल को अनुभव करने के लिए आपको यहां की संस्कृति और भाषा सीखनी पड़ेगी।’ अगले महीने भारतीय रेलवे में नौकरी जॉइन करने के लिए वो वडोदरा, गुजरात जा रहे हैं। (bbc.com/hindi)
अपूर्व गर्ग
रविश कुमार ने सवाल उठाया कुत्ते हिंसक क्यों हो रहे? उन्होंने कुत्तों के हमला करने की पेपर कतरनें भी पोस्ट की।
पहली बात क्या कुत्ते इंसान से ज़्यादा हिंसक हुए ?
दूसरी बात, आज की दुनिया में घर से बाहर पैर रखते ही मौजूदा वातावरण में हमारा दिल-दिमाग, तेवर कैसे बदल जाते हैं। बीपी बढऩे के प्रकरण बताते हैं इंसान कितना परेशान, तनाव में और घुटन में जी रहा है।
शहर में आम आदमी के खुल कर सांस लेने की जगह नहीं बची।
बगीचे प्लाट बन गए, खेल के मैदान काम्प्लेक्स, व्यावसायिक मैदान बन चुके । बच्चे खेल नहीं सकते, बुजुर्ग आजादी से घूम नहीं सकते।
जरूरत से ज्यादा औद्योगिकीकरण ने धूल, धूप और हवा में जहर घोल दिया। बाकी जो बचा वो डीजे, तेज हॉर्न जैसे ध्वनि प्रदूषण ने पूरा कर दिया ।
सुनिए , ये दुनिया पागलखाना बन चुकी है । आज की भाषा न हिंदी है न उर्दू न इंग्लिश। आज सिफऱ् एक भाषा में बात लोग समझते हैं , वो है , पूँजी की भाषा। लालच, लूट, हवस, मुनाफे की।
शोषण कर सकते हैं तो आप इस दुनिया में फिट हैं वरना ये दुनिया जेल से भी बदतर हो चुकी।
इस दुनिया ने चैन, अमन, आराम,प्यार, मोहब्बत, दोस्ती-यारी, मुस्कराहट, ठहाके, स्वास्थ्य सब छीन लिया।
न तालाब छोड़े न पेड़, न समुद्र को बख़्शा न नदियों पर रहम किया, पहाड़ों को तो मटियामेट कर अपनी कब्र ही खोद डाली!
मैं आपको पर्यावरण, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ध्वनि के आतंवाद पर कोई निबंध नहीं पढ़ाना चाहता।
मैं तो सिर्फ ये बता रहा हूँ कि दुनिया का पागलपन चरम पर पहुँच चुका जहाँ इंसान भयानक हिंसक हो चुका और ठीक ऐसे दौर में ऐसे वातावरण में ऐसे पागलों के बीच रहते हुए अगर कुत्ते हिंसक न होंगे तो क्या अहिंसा का आंदोलन करेंगे ?
इंसानों के लिए ही नहीं मयस्सर खाना-पानी-छाया-मैदान तो कुत्ते जाएँ तो जाएँ कहाँ ?
परेशान इंसान आत्महत्या कर सकता है पर कुत्ते हिम्मत नहीं हारते वो आवाज उठाते हैं ,भौकते हैं और बेहद -बेहद विपरीत परिस्थितियों में होने के बाद काटते हैं ।
उनकी हिंसा को उनका प्रतिरोध समझिये और समीक्षा कुत्तों की नहीं सर्जरी इंसानों के बनाए इस पागलखाने की करिये।
कुत्ते तो बुनियादी तौर पर परिवार के सदस्य होते हैं।
वो इंसानों से ज़्यादा प्यार करते हैं।
उनके दिल में नफरत की एक बूँद नहीं सिर्फ मोहब्बत होती है । उनसे मोहब्बत चाहिए तो खुद को बदलिये और इस दुनिया को बदलिए ।
जगदीश्वर चतुर्वेदी
गाजा: संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने अस्पतालों और स्कूलों पर बमबारी को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए निंदा की, नरसंहार की रोकथाम का आह्वान किया-
जिनेवा (19 अक्टूबर 2023) - संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने आज गाजा शहर के अल अहली अरब अस्पताल में हुए घातक हमले के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया, जिसमें मंगलवार (17) को 470 से अधिक नागरिक मारे गए और सैकड़ों लोग मलबे में फंस गए। यह हमला कथित तौर पर इजऱाइल द्वारा जारी की गई दो चेतावनियों के बाद हुआ कि अगर अस्पताल के अंदर के लोगों को बाहर नहीं निकाला गया तो अस्पताल पर हमला आसन्न था।
‘अल अहली अरब अस्पताल के खिलाफ हड़ताल एक अत्याचार है। हम उसी दिन अल मगाजी शरणार्थी शिविर में स्थित यूएनआरडब्ल्यूए स्कूल पर हुए घातक हमले से समान रूप से नाराज हैं, जिसने लगभग 4000 विस्थापित लोगों और साथ ही दो घनी आबादी वाले शरणार्थी शिविरों को आश्रय दिया था,’ विशेषज्ञों ने कहा।
विशेषज्ञों ने इस बात पर गंभीर मानवीय और कानूनी चिंता जताई कि इजरायल ने एन्क्लेव और उसकी आबादी पर 16 साल से चली आ रही घेराबंदी और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे के कारण 2.2 मिलियन लोगों को आवश्यक भोजन, ईंधन, पानी, बिजली और दवा से वंचित कर दिया है। गाजा में अनुमानित 50,000 गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल की सख्त जरूरत है। गाजा पट्टी में आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की संख्या लगभग दस लाख होने का अनुमान है।
उन्होंने याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने युद्ध के एक तरीके के रूप में नागरिकों की भुखमरी के उपयोग की बार-बार निंदा की है, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय और आपराधिक कानून के तहत निषिद्ध है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि मानवीय पहुंच से गैरकानूनी इनकार और नागरिकों को उनके अस्तित्व के लिए अपरिहार्य वस्तुओं से वंचित करना भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन है।
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र में स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर 136 से अधिक हमलों का दस्तावेजीकरण करने के बाद सभी मानवीय कार्यकर्ताओं की सुरक्षा का आह्वान किया, जिसमें गाजा पट्टी पर 59 हमले भी शामिल थे, जिसके परिणामस्वरूप लोगों की मौत हो गई। 7 अक्टूबर को शत्रुता की शुरुआत के बाद से कम से कम 16 स्वास्थ्य कार्यकर्ता। गाजा पर इजरायली बमबारी में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कार्य एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) के 15 कर्मचारी और एक एम्बुलेंस में सवार चार फिलिस्तीन रेड क्रिसेंट पैरामेडिक्स भी मारे गए हैं। इजराइल में मैगन डेविड एडोम के एक एम्बुलेंस ड्राइवर की घायल लोगों के इलाज के लिए गाड़ी चलाते समय जान चली गई।
‘अव्यवहार्य निकासी आदेशों और जबरन जनसंख्या स्थानांतरण के साथ गाजा की पूरी घेराबंदी, अंतरराष्ट्रीय मानवीय और आपराधिक कानून का उल्लंघन है। यह अकथनीय रूप से क्रूर भी है, ‘विशेषज्ञों ने कहा।
उन्होंने याद दिलाया कि नागरिक घरों और बुनियादी ढांचे का जानबूझकर और व्यवस्थित विनाश, जिसे ‘डोमिसाईड’ के रूप में जाना जाता है, और पीने के पानी, दवा और आवश्यक भोजन में कटौती करना अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के तहत स्पष्ट रूप से निषिद्ध है।
‘हम खतरे की घंटी बजा रहे हैं: इजराइल द्वारा लगातार अभियान चलाया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप गाजा में मानवता के खिलाफ अपराध हो रहे हैं। इजराइली राजनीतिक नेताओं और उनके सहयोगियों द्वारा दिए गए बयानों को ध्यान में रखते हुए, गाजा में सैन्य कार्रवाई और वेस्ट बैंक में गिरफ्तारियों और हत्याओं में वृद्धि के साथ, फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ नरसंहार का भी खतरा है,’ विशेषज्ञों ने कहा।
‘ऐसे अपराधों के लिए कोई औचित्य या अपवाद नहीं हैं। हम जुझारू युद्धोन्माद के सामने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता से भयभीत हैं, ‘विशेषज्ञों ने कहा।
विशेषज्ञों ने कहा,‘गजान की आबादी, जिनमें से आधे बच्चे हैं, पहले से ही कई दशकों तक गैरकानूनी क्रूर कब्जे का सामना कर चुकी है और 16 साल तक नाकाबंदी में रही है।’
‘यह तुरंत आग बंद करने और भोजन, पानी, आश्रय, दवा, ईंधन और बिजली सहित आवश्यक मानवीय आपूर्ति तक तत्काल और अबाधित पहुंच सुनिश्चित करने का समय है। विशेषज्ञों ने कहा, नागरिक आबादी की भौतिक सुरक्षा की गारंटी दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘कब्जा खत्म होना चाहिए और फि़लिस्तीनियों के लिए पूर्ण न्याय की दिशा में मुआवज़ा, पुनस्र्थापन और पुनर्निर्माण होना चाहिए।’
डॉ. लखन चौधरी
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने देश की शीर्षस्थ एवं बेहद लोकप्रिय कोचिंग संस्थाओं के प्रचार एवं कामकाज के तरीके पर सवाल खड़ा करते हुए एक बेहद जरूरी और समसामयिक विमर्श खड़ा किया है कि देश की दशा-दिशा तय करने वाली नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर चयनित होने वाले अभ्यर्थियों को प्रभावित करने के लिए किस-किस तरह के भ्रामक विज्ञापनों का सहारा लिया जा रहा है। सरकार के नाक के नीचे हो रहे इस तरह के कारनामे युवाओं को कितना प्रभावित करते हैं, यह तो वक्त तय करेगा लेकिन इस मसले पर स्वत: संज्ञान लेकर सीसीपीए ने जो कार्रवाई की है; वह सराहनीय है। यदि देश की तमाम सरकारी संस्थाएं इसी तरह स्वत: संज्ञान लेकर सचेत होकर काम करती रहें तो लोकतंत्र की लगातार गिरती साख के बीच सुकून का अहसास होता है।
सीसीपीए यानि केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने विशेषकर संघ लोक सेवा आयोग की आईएए, आईपीएस, आईआरएस, आईएफएस जैसी देश की सर्वोच्च पदो ंके लिए परीक्षाओं की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों को प्रभावित करने के लिए टॉपर और सफल उम्मीदवारों के नाम तथा तस्वीरों का उपयोग करने के भ्रामक विज्ञापनों और अनुचित कारोबारी प्रथाओं के लिए 20 आईएएस कोचिंग सेंटरों के खिलाफ जांच चल रही है। यूपीएससी 2022 के अंतिम परिणाम में 933 उम्मीदवारों का चयन हुआ लेकिन 20 कोचिंग संस्थानों ने 3,500 से अधिक पूर्व छात्रों के चयनित होने का दावा किया है। यही वजह है कि इन कोचिंग संस्थाओं को पिछले डेढ़ साल में सफल छात्रों के बारे में जानबूझकर अहम जानकारी छिपाने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। सीसीपीए का कहना है कि भविष्य में नीट, जेईई परीक्षाओं की तैयारियां करा रहे संस्थानों पर भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती है।
सीसीपीए ने भ्रामक दावे करने वाले वाजीराव एंड रेड्डी इंस्टीट्यूट, चहल अकादमी, खान स्टडी ग्रुप आईएएस, एपीटीआई प्लस, एनालॉग आईएएस, शंकर आईएएस, श्रीराम आईएएस, बायजूस आईएएस, अनअकैडमी, नेक्स्ट आईएएस, दृष्टि आईएएस, इकरा आईएएस, विजन आईएएस, आईएएस बाबा, योजना आईएएस, प्लूटस आईएएस, एएलएस आईएएस, राव आईएएस स्टडी सर्किल आदि 20 कोचिंग संस्थानों को नोटिस जारी किया है। जबकि भ्रामक दावों और अनुचित कारोबारी प्रथाओं के लिए पांच सेंटरों राव आईएएस, स्टडी सर्किल, इकरा आईएएस, चहल अकादमी और आईएएस बाबा पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
सीसीपीए अध्यक्ष का कहना है कि संघ लोक सेवा आयोग के परिणाम घोषित होते ही कोचिंग संस्थान विज्ञापनों की होड़ में लग जाते हैं। कई संस्थान अहम जानकारी छिपाकर अपने कोचिंग संस्थान के छात्रों के समान रैंक धारक होने का दावा करते हैं। वे यह नहीं बताते हैं कि सफल अभ्यर्थी ने उनके यहां किस विषय में दाखिला लिया था। सीसीपीए के अनुसार इस समय देश में कोचिंग संस्थाएं उद्योग के तौर पर काम कर रही हैं। कोचिंग सस्थाओं का एक फलता-फूलता कारोबार है, जिसका मौजूदा बाजार राजस्व करीब 58-60 हजार करोड़ रुपये है। कोचिंग के लिए 2 लाख छात्र सालाना राजस्थान के कोटा जाते हैं। वहीं, दिल्ली यूपीएससी-सीएसई कोचिंग का गढ़ मानी जाती है।
भारत में अब ऐसे आईएएस कोचिंग सेंटर चलाने वाले की खैर नहीं है जो बेईमानी से कामयाबी दर का झूठा दावा कर लोगों को लुभाकर कोचिंग संस्थान चला रहे हैं। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण इनके खिलाफ हरकत में आ चुका है। बड़े पैमाने पर धड़ल्ले से गलत तरीके से अधिकतर आईएएस कोचिंग संस्थान अपने विज्ञापनों में उन छात्रों को दिखाकर यूपीएससी परीक्षा में अपनी ‘सफलता दर’ का दावा करते हैं, जिन्होंने उनके केंद्रों पर केवल मॉक इंटरव्यू दिए थे न कि पूरा सिलेबस पढ़ा था।
कोचिंग सेंटर के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों का पैमाना इस कदर बड़ा है कि कोचिंग संस्थाएं, यूपीएससी को ही झूठे साबित करते नजर आते हैं। हालांकि दो संस्थानों ने सीसीपीए की कार्रवाई को चुनौती दी है। जुर्माने के आदेश के खिलाफ राउज आईएएस स्टडी सर्किल ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटान आयोग में अपील दायर की है, तो वहीं ‘आईएएस बाबा’ ने इसके खिलाफ स्टे ले लिया है। सीसीपीए के मुताबिक भ्रामक विज्ञापन आईएएस बनने के इच्छुक उम्मीदवारों के फैसले पर असर डालते हैं। उसने कोचिंग सेंटर्स से अपने दावों को साबित करने के लिए कहा है और उन पाठ्यक्रमों या विषयों के बारे में ईमानदार खुलासा भी करने को कहा है जिनके लिए सफल छात्रों ने उनसे कोचिंग ली है।
सीसीपीए की मुख्य आयुक्त निधि खरे के मुताबिक ’पिछले डेढ़ साल में कोचिंग सेंटर्स को अपने सफल छात्रों के बारे में जानबूझकर अहम जानकारी छिपाने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। हम उनके विज्ञापनों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उन्हें सभी जानकारी ईमानदारी से देनी चाहिए। यदि सही खुलासे होंगे तो धोखा कम होगा। उन्होंने आगे कहा कि सीसीपीए ने ऐसे विज्ञापनों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28) के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए इन सेंटर्स के खिलाफ नोटिस जारी किया है।’ उनके अनुसार सीसीपीए के कोचिंग सेंटर्स को उनके दावों का विवरण मांगने के लिए जारी स्वत: संज्ञान नोटिस के जवाब में अधिकांश ने जवाब दिया हैं। इसमें उन्होंने स्वीकार किया है कि उनके विज्ञापनों में दिखाए गए यूपीएससी के कामयाब उम्मीदवारों केवल मॉक इंटरव्यू और इंटरव्यू गाइडेंस प्रोग्राम में शामिल हुए थे।
सीसीपीए ने पाया कि कोचिंग सेंटर्स यह सब मुफ्त में करते हैं क्योंकि यह उनके (सेंटर्स) फायदे में है। खरे ने आगे बताया किसी भी विज्ञापन में यह जिक्र नहीं है कि सफल उम्मीदवारों ने केवल मॉक इंटरव्यू दिए। इससे ऐसी धारणा बनती है जैसे कि परीक्षा पास करने वाले सभी लोगों ने इन सेंटर्स में पूरा कोर्स किया है, जो भ्रामक है। सीसीपीएके अधिकारियों ने कहा कि आईएएस कोचिंग सेंटर प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के बाद शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों को मुफ्त मॉक इंटरव्यू सत्र के लिए आमंत्रित करते हैं, ताकि उनके सफल होने के वो उनके सेंटर के पूर्व छात्र होने का दावा कर सकें। कई मामलों में ये मॉक इंटरव्यू मुश्किल से कुछ घंटों के लिए होते हैं। ऐसे में कोचिंग संस्थाओं की साख और विश्वसनीयता पर सवाल उठना-उठाना लाजिमी है।
अणु शक्ति सिंह
अनुभव से सोचने-प्रतिक्रिया देने का अंदाज बदलता है। बहुत दिन नहीं हुए जब मैं औरतों को उनकी किसी आस्था/कंडीशनिंग/परम्परा को जस्टिफाई करते देखती थी तो खीझ जाती थी।
पढ़ी-लिखी औरतों से मेरी उम्मीद हमेशा थोड़ी अधिक रही है। पढऩे-लिखने का मूल अर्थ ही पीटी जा रही परिपाटी को बदलना है। नई हिम्मत लाना हैज् पर क्या यह हिम्मत इतनी आसान और सहज उपलब्ध चीज है? जवाब है ‘नहीं’!
मैं अपनी जिंदगी खास तरीके से जीती हूँ। मेरे अपने उतार-चढ़ाव रहे हैं पर क्या कोई हिम्मत वाला तब ही होगा जब मेरे अंदाज से जिंदगी जियेगा? इसका भी उत्तर है, ‘नहीं’!
मर्दों के दबदबे वाले समाज ने औरतों से बहुत सारी चीजें छीनी हैं। सबसे पहली दो चीजें जो औरतों ने खोई वे हिम्मत और आत्म-विश्वास थीं। इन दोनों चीजों का खोना उम्मीद का बदल जाना भी था।
उनसे हिम्मत और आत्मविश्वास लेकर उन्हें परंपरा की थाती थमा दी गई। औरत यह करेगी तो परम्परा चलेगी। मर्द इन परंपराओं में एक्स्ट्रा की तरह रहे। उनसे हो पा रहा है तो करें, नहीं तो औरतें कर ही लेंगी।
होते-होते वे परम्परा/रिवाज उन औरतों की उम्मीद वाली जगह स्थापित हो गये। आस्था भी वहीं रही। वह कुछ व्रत करती है तो बेटे जिएँगे। कोई उपवास रखती है कि पति की उम्र लंबी रहे।
पितृ-सत्ता ने यही तो किया। औरतों का अपना वजूद खत्म कर दिया। उसकी मुक्ति की चाबी पति/पुत्र के हाथों में थमा दी और उम्मीद व्रत-उपवास में कि ये दोनों न सही ईश्वर तो सुनेगा।
रिवाज और पूजा-पाठ उनकी आखिरी उम्मीद रहे। मैंने सबसे दुखी स्त्रियों को सबसे अधिक व्रत रखते देखा है जैसे व्रत न हो, ईश्वर की कृपा की कोई कुञ्जी हो।
कुछ समय पहले तक ऐसी स्त्रियों पर मैं कुढ़ जाती थी। उनसे सीधा कहती कि इन उपवासों का कोई फायदा नहीं। उनमें कई सिटपिटा जातीं। कुछ मुझे बेवकूफ कह डाँट दिया करतीं।
धीरे-धीरे मैंने अपने पाँव उनकी चप्पलों में रखनी शुरू की। एहसास हुआ कि उनकी चप्पलों का तला मेरे जूतों जितना साबुत नहीं। उतना नर्म भी नहीं। जमीन पर चलते हुए उनके पाँव ठीक रहें इसलिए जरूरी है कि पहले उनके फटे जूतों और चप्पलों की मरम्मत हो। उनके पाँव के घाव साफ हों।
उनकी तरह से चीजों को सोचा जाए। समझा जाए। उन्हें उनके ‘स्व’ का भान करवाया जाए। धीरे-धीरे।
वह जो दु:ख में भी पति के लिए उपवास रखती हुई स्त्री है उससे अगर हौले से कहा जाए कि यह तीन चीजें तुम पति के लिए कर लेना, पर एक चीज अपने लिए कर लो कि खाना वक्त पर और अपनी पसंद का खाना तो वह किसी भी बात को अधिक गौर से सुनेगी। उससे हठात् या बलात् कहा जाए कि तुम जो यह कर रही हो कुछ और नहीं बेवकूफी है। पितृसत्ता का षडय़ंत्र है तो वह मेरी बात सुनने से पहले ही उखड़ जाएगी।
बात होगी नहीं तो बनेगी कैसे। मेरा कई सालों का अनुभव डेवलपमेंट कम्युनिकेशन का है। वह दुनिया जो लोगों के जीवन को लगातार बेहतर करने के लिए प्रयासरत है। समाज से अंधविश्वास हटाने में जुटा हुआ है। उनकी एक बात देखी है मैंने और चूँकि उनके कैंपेन के लिए लिखती रही हूँ, यह समझ पाई हूँ कि वे अधिकतम सहृदयता से काम करते हैं। लोगों के साथ मिल-जुलकर उनकी भावनाओं को समझते हुए छोटे-छोटे बदलाव लाते हैं।
छोटे बदलाव ही बड़े परिवर्तनों की भूमिका होते हैं। यह सहृदयता से ही सम्भव हुआ है कि भारत के पिछड़े इलाकों में माँओं के स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाने लगा।
आरोपित करने से जवाब केवल अदालतों में मिलते हैं। पहले से बंद समाज इसके बाद अपने दरवाज़े और बंद कर लेता है। कोई तरीका नहीं बचता है।
वहाँ जरूरत उंगली दिखाकर दोष बताने की नहीं है। हाथ पकडक़र बाहर बाहर निकाल लाने की है। उनके मन को समझते हुए उन्हें बारगेन करना सिखाने की है। अपने बेहतर भविष्य के लिए रास्ता खोजने की है।
हर क्रांति तोड़-फोडक़र नहीं होती। कुछ क्रांतियाँ हौले से मूल में चीजों को बदलते हुए हो जाती हैं। बात जब भी समाज के उस तबके की औरतों की हो जिनकी जिंदगी परिवार में भी तय कर दी गई है, सजग औरतों को हद से अधिक सहृदय होना होगा।
सहृदय तो उनके लिए भी होना ही होगा, जिनके बैरियर पढऩे-लिखने के बाद भी नहीं टूटे और आस्था वाली कंडीशनिंग बरकरार है। यह समझना जरूरी है कि परिवार और समाज की जकड़ में कई बार वे भी बारगेन करती हैं।
उन्हें समझकर उनका साथ दिया जाए तो शायद वह स्थिति धीरे-धीरे जगह लेने लग जाए जिनमें उत्सव का अर्थ ‘भूखा रहना’ नहीं होगा। और औरतें पति-बेटों को धता बताकर अपने आप को आगे रखने लग जाएँ।
जेरेमी बोवेन
बीते कुछ दिनों में मैंने दक्षिण इसराइल में गाजा से सटी उसकी सीमा के पास का दौरा किया और वेस्ट बैंक में बसाए गए कट्टर यहूदी लोगों से मुलाकात की।
इसके अलावा एक रिफ्यूजी शिविर में इसराइली सेना के हमले में मारे गए दो फिलस्तीनी युवाओं के जनाजे को भी मैंने करीब से देखा।
तेल अवीव की एक ऊंची इमारत में मैंने एक पूर्व इसराइली नेता से उनके दफ्तर में मुलाकात की, साथ ही मैंने रामल्ला में एक वरिष्ठ फिलस्तीनी अधिकारी से उनके दफ्तर में बात की।
एक प्रदर्शन के दौरान मैंने एक इसराइली पिता से बात की जिन्होंने मुझसे कहा कि उनकी बेटी का बर्थडे केक उस वक्त फ्रिज में रखा हुआ था जब उनकी पत्नी और उनके तीन बच्चों को हमास के बंदूकधारियों ने अगवा कर लिया था। वो कहते हैं वो केक अब भी फ्रिज में रखा हुआ है।
जो काम मैं अब तक नहीं कर सका वो है गजा में प्रवेश कर पाना। अब तक गाजा में प्रवेश कर पाने वालों में राहत सामग्री की कुछ गाडिय़ां हैं और कुछ इसराइली सैनिक हैं जो टोह लेने पहुंचे हैं।
बीते ढाई हफ्तों में यहां और अधिक फिलस्तीनियों और इसराइलियों की मौत हुई है। मरने वालों की ये संख्या साल 2000 से शुरू होकर 2004 में खत्म हुए दूसरे फिलस्तीनी इंतिफादा या फिलस्तीनी हथियारबंद संघर्ष में मरने वालों से अधिक हो गई है।
जिन अलग-अलग तरह के लोगों से मेरी मुलाकात हुई उनमें इसराइली और फ़लस्तीनी लोगों के अलावा विदेशी नागरिक शामिल हैं। इन सबसे बात कर के मेरे जेहन में एक ही तस्वीर साफ हुई।
सभी को ये एहसास है कि लंबे वक्त से चले आ रहे इसराइल-फिलस्तीनी संघर्ष में आखिरी इंतिफादा के बाद आम जिंदगी जीने का लोगों का एक तरीका-सा बन गया था। लेकिन सात अक्तूबर की घटना के बाद जो कुछ हुआ वो इतना बड़ा है कि उसने पुरानी बातों को हमेशा के लिए बदल दिया। अब हर तरफ ये डर है कि इसके बाद जो भी होगा वो और भी बुरा होगा।
इसराइल के कब्जे वाले इलाकों में गाजा, पूर्वी यरूशलम समेत वेस्ट बैंक शामिल हैं।
1967 के मध्य पूर्व युद्ध के दौरान इसराइल ने सीरिया के गोलन हाइट्स पर कब्जा कर लिया था। और इसी वक्त इसराइल ने इन फिलस्तीनी इलाकों पर भी कब्जा कर लिया था।
इसराइल के इतिहास में ये अब तक की सबसे तेज़ और सबसे बड़ी जीत थी, जिसे उसने केवल छह दिनों में हासिल कर लिया था।
1948 में आजादी की लड़ाई के 19 साल के बाद हुई 1967 की अरब-इसराइल युद्ध को फिलस्तीनी तबाही या अल-नकबा करार देते हैं।
यही वो लड़ाई है जिसने उन स्थितियों को जन्म दिया जिस कारण पैदा हुए हालात आज के संघर्ष के लिए जिम्मेदार हैं।
बीते कुछ सालों से इसराइल और फ़लस्तीन के बीच जारी संघर्ष पर नजऱ रखने वालों की तरह मेरा भी यह मानना था कि कभी भी कोई बड़ा संघर्ष छिड़ सकता है।
14 मई 2018 को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल अवीव में मौजूद अमेरिका के दूतावास को वहां से बंद करने और यरूशलम में खोलने का फैसला किया, तो इस मुद्दे पर हिंसा शुरू हो गई। मुझे लगा कि ये एक बड़े संघर्ष की शुरुआत है।
ट्रंप के फैसले के बढ़ा तनाव
यरूशलम की विवादित स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय समझौते को मानने से ट्रंप ने इनकार कर दिया था। इसराइल यरूशलम को अपनी अविभाजित राजधानी मानता है, जबकि फिलस्तीनी पूर्वी यरूशलम को अपने भावी राष्ट्र की राजधानी मानते हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइल के दावे का समर्थन किया। वहीं, ब्रिटेन समेत इसराइल के दूसरे सहयोगियों के दूतावास अभी भी तेल अवीव में हैं।
जिस वक्त डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप दूतावास का उद्घाटन कर रही थीं, उस वक्त टेलीविजन स्क्रीन दो हिस्सों में बांटकर, पहले हिस्से में उद्घाटन का फुटेज और दूसरे हिस्से में इसराइल और गाजा में सीमा पर जारी भीषण हिंसा का फुटेज दिखाया जा रहा था।
हमास के ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ की अपील के बाद सीमा पर लगी बाड़ के पास हजारों फिलस्तीनी विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे और इसराइली सैनिक उन पर गोलियां चला रहे थे।
प्रदर्शनकारियों में से कुछ ने बाड़ तोडऩे की कोशिश की। इस घटना में 59 फिलस्तीनियों की मौत हुई जबकि हज़ारों घायल हुए।
अमेरिका का समर्थन पाने वाले इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि उनका देश सीमा पर होने वाले किसी भी हमले का कड़ा जवाब देगा।
इसके एक सप्ताह बाद दिनचर्या पटरी पर वापस लौट आई। बिन्यामिन नेतन्याहू और ट्रंप प्रशासन में उनके सहयोगी एक-दूसरे को ये बधाई देने लगे कि उन्होंने फिलस्तीनियों को काबू कर लिया है।
शायद यही वो वक्त था जब हमास ने इसराइल पर हमला करने की योजना बनानी शुरू कर दी थी और इसका नतीजा वो हुआ जो हमने सात अक्तूबर को देखा।
कहां चूक गए बिन्यामिन नेतन्याहू ?
अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद बिन्यामिन नेतन्याहू ने फैसला किया कि वो इस संघर्ष को नजरअंदाज कर दूसरे मसलों पर ध्यान देंगे। उनकी ये गलत धारणा बन गई थी कि इसराइल इस मसले पर अपना नियंत्रण रखते हुए दुनिया के दूसरे मसलों की तरफ अपना ध्यान केंद्रित कर सकता है। लेकिन ये उनकी बहुत बड़ी रणनीतिक गलती थी।
वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनी क्षेत्र की राजधानी माने जानेवाले रामल्ला में मैं साबरी सायदाम से मुलाकात करने पहुंचा। साबरी की पढ़ाई लंदन के इंपीरियल कॉलेज में हुई है। वो फिलस्तीनी प्रशासन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के सलाहकार रह चुके हैं और फतह पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं।
फिलस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख रहे यासिर अराफात की बनाई फतह पार्टी अभी भी वेस्ट बैंक के उन हिस्सों पर शासन करती है जिन पर इसराइल ने अब तक कब्जा नहीं किया है।
1990 के दशक में ओस्लो शांति प्रक्रिया के तहत फ़लस्तीनी क्षेत्र को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए जो फ़लस्तीनी प्रशासन बना महमूद अब्बास उसके प्रमुख हैं।
ये प्रशासन अब नौकरियां पैदा करने वाली योजना बनकर रह गया है, जो एक म्यूनिसिपालिटी की तरह की भूमिका निभा रहा है। ये भ्रष्टाचार और अक्षमता की मिसाल बन कर रह गया है। प्रशासन के प्रमुख के पद के लिए साल 2006 से कोई चुनाव नहीं हुए हैं, यानी महमूद अब्बास प्रशासन के प्रमुख तो हैं लेकिन 2006 से वो कभी चुनावों में खड़े नहीं हुए हैं।
साबरी सायदाम ने कहा कि उन्होंने बिन्यामिन नेतन्याहू की धारणा को लेकर अमेरिका को पहले ही चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि नेतन्याहू को लगता है कि वो फिलस्तीन के मुद्दे पर नियंत्रण रखते हुए अमेरिका की मदद से खाड़ी के बेहद धनी अरब तेल उत्पादक देशों के साथ अपने रिश्ते सामान्य कर लेंगे।
वो कहते हैं, ‘इसे लेकर प्रतिक्रिया आएगी, इसका जवाब आएगा, किसी को नहीं पता कब, कैसे और किस पैमाने पर ये होगा। हमने बैठकों के दौरान कई बार अमेरिकियों को चेतावनी दी थी कि फिलस्तीनी इस पर प्रतिक्रिया देंगे, मामले को मझधार में नहीं छोडऩा चहिए। आपको हस्तक्षेप करना चाहिए और शांति प्रक्रिया के बारे में गंभीर रुख अपनाना चाहिए।’
उन्होंने उन खबरों से इंकार किया जिनमें कहा गया था कि हमास आम लोगों का इस्तेमाल मानव ढाल के रूप में कर रहा है। उन्होंने कहा कि जो इसराइल कर रहा है वो ‘जनसंहार है’।
इसराइल-फिलस्तीन संघर्ष का समाधान
संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के अनुसार इलाक़े में दशकों से जारी संघर्ष को कम करने के लिए एक स्वतंत्र फिलस्तीनी राष्ट्र के साथ-साथ एक स्वतंत्र इसराइल राष्ट्र बनाने की कोशिश की जानी थी। लेकिन अब शांति प्रक्रिया इस दिशा में सालों से नाकाम हुई बातचीत के बाद बच गई एकमात्र कोशिश है।
हमास के हमले के बाद से इस मुद्दे पर सामने आने वाले और इसराइल का दौरा करने वाले राष्ट्राध्यक्षों ने एक बार फिर कहा है कि ये ‘दो राष्ट्र समाधान’ इस संघर्ष के निपटारे का वास्तविक हल है।
इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रितानी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक, फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और दूसरे राष्ट्राध्यक्ष शामिल हैं। लेकिन इसके साथ मुश्किल ये है कि फिलहाल कोई शांति प्रक्रिया जारी ही नहीं है। आखिरी बार करीब एक दशक पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसे फिर से शुरू करने की कोशिश की थी, लेकिन वो इसमें कामयाब नहीं हो सके। इसके बाद ‘दो राष्ट्र समाधान’ के लिए बातचीत केवल एक स्लोगन बनकर रह गया।
बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रतिद्वंद्वी
इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक से मुलाकात करने के लिए मैं तेल अवीव की एक ऊंची इमारत में मौजूद कांच की दीवारों से बने उनके दफ्तर पहुंचा।
1973 में एक युवा कमांडर के तौर पर उन्होंने लेबनान पर हमले की न केवल योजना बनाई बल्कि उसे अमलीजामा भी पहनाया। इसराइल इस अभियान को ‘स्प्रिंग ऑफ यूथ’ कहता है।
बराक ने अपना भेष बदला और मेक-अप और विग लगाकर एक लडक़ी का रूप लिया। वो घातक लड़ाकों की एक टुकड़ी लेकर बेरुत में प्रवेश कर गए।
बाद में एहुद बराक इसराइली सेना में कमांडर बने और फिर 1999 से 2001 तक इसराइल के प्रधानमंत्री रहे। बिन्यामिन नेतन्याहू के कार्यकाल के दौरान एहुद बराक रक्षा मंत्री भी रहे, जो इससे पहले इसराइली सेना की स्पेशल फोर्स यूनिट में जूनियर अधिकारी थे। ये स्पेशल फोर्स यूनिट ब्रिटेन के स्पेशल एयर सर्विस (एसएएस) की तरह काम करती है।
तब से एहुद बराक और बिन्यामिन नेतन्याहू एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्विंद्वी बन गए हैं। बराक नेतन्याहू पर आरोप लगाते रहे हैं कि उन्होंने हमास के हमलों के लिए इसराइल को कमजोर किया है। वो मानते हैं कि अगर सेना को हमास से निपटने की जिम्मेदारी दी जाए तो प्रधानमंत्री का लंबा कार्यकाल खत्म हो जाएगा।
बराक ने मुझसे कहा, ‘युद्ध जीतने में वक्त लगता है और फिर इस मुहिम में जो खून और पसीना बहेगा उसे उचित ठहराना आसान नहीं होगा। जब युद्ध खत्म हो जाएगा, या फिर खत्म होने वाला होगा, मुझे लगता है कि लोगों का गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ेगा और वो सरकार को सत्ता से बेदखल कर देंगे।’
नेतन्याहू के लिए मुश्किल फैसला
इसराइल पर हमास का हमला सात अक्तूबर को हुआ था। इसके बाद इसराइल ने जबाबी कार्रवाई शुरू की और गाजा पर हवाई हमले किए। लेकिन हमास के पास 200 से अधिक इसराइली नागरिक बंधक के तौर पर हैं, जिनमें से अधिकांश आम नागरिक हैं। इसलिए गाजा में जमीनी कर्रवाई करने से वो हिचक रहे हैं।
हमले के दौरान हमास के लड़ाके इसराइली नागरिकों को अपने साथ बंधक बना कर ले गए ताकि वो इसराइल पर दबाव बना सकें और अपनी इस रणमनीति में कामयाब भी हो रहे हैं।
दोनों पक्षों के बीच एक तरह की मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी जारी है और इसमें चार बंधक छोडऩा और फिर कुछ और बंधकों को छोडऩा एक कारगर तरीका बन गया है। इसराइल के भीतर से आवाजें उठने लगी हैं और लोगों की मांग है कि सरकार किसी भी तरह के हमले से पहले हमास के पास मौजूद बंधकों को छुड़ाए।
एहुद बराक मानते हैं कि हमास को पूरी तरह से खत्म करने के लिए बिन्यामिन नेतन्याहू को अपनी सेना को गाजा के भीतर जाने का आदेश देना चाहिए।
वो कहते हैं कि उनके और उनकी वॉर कैबिनेट के सामने बेहद मुश्किल फैसला है। वो कहते हैं, ‘अगर कोई रास्ता न बचा तो हमें ये करना होगा। क्योंकि ऐसा नहीं किया तो हम मानवता के खिलाफ अपराध करने वाले और 1,400 लोगों की हत्या करने वाले बर्बर आतंकियों को विकल्प दे देंगे। नेतन्याहू को मुश्किल फैसला लेना है।’
‘हम युद्ध में हैं’
इस सप्ताह दो दिन मैंने वेस्ट बैंक के उन इलाकों का दौरा किया जो इसराइल के सख्त कंट्रोल में है। मैं एक जगह पहुंचा जहां बेहद अधिक तनाव था।
यहां के फिलस्तीनी गांवों के आसपास हजारों इसराइली सैनिकों को युद्ध के लिबास में तैनात किया गया है और रास्तों पर अवरोध बनाए गए हैं। वो यहां बसाए गए यहूदी गांवों की सुरक्षा कर रहे हैं। इस गांवों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जा रहा है लेकिन इसराइल इस बात से इंकार करता है।
हेब्रॉन के बाहरी इलाके में बसावट से दूर एक आउटपोस्ट पर मुझे एक कट्टरपंथी यहूदी राष्ट्रवादी दिखे। हथियार लिए इन व्यक्ति ने मुझे बताया कि वो उस मौके का इंतजार कर रहे हैं जब वो अपने हथियारों का इस्तेमाल फिलस्तीनियों के खिलाफ कर सकें।
आउटपोस्ट के आसपास हथियार के साथ उनके नेता मीर सिमचा चहलकदमी कर रहे थे। उनके पास एक बड़ा धारदार चाकू था जो चमड़े के म्यान में रखा हुआ था। उन्होंने कहा कि 7 अक्तूबर को हमास के हमले से कई इसराइलियों को आश्चर्य हुआ लेकिन इस उन्हें इससे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
उन्होंने कहा कि ये शर्म की बात है कि जो बात पहले से पता है, मुख्यधारा के इसराइल को वो दिखाने के लिए कई यहूदियों को अपनी जान देनी पड़ी।
वो कहते हैं, ‘युद्ध में आपके पास एक बंदूक होती है और उस पर एक ट्रिगर होता है। और जो लोग अब तक ये नहीं समझ पाए, मैं बता दूं कि हम युद्ध में हैं। एक ऐसा युद्ध जिसके एक पक्ष दूसरे पक्ष के लिए कोई दया नहीं दिखाता और हमें भी यही करने का जरूरत है। इसमें हमारे पास चुनने जैसा कुछ नहीं है।’
‘वेस्ट बैंक में इसराइल ले रहा बदला’
वेस्ट बैंक के और उत्तर की तरफ जब मैं रामल्ला के बाहरी इलाके में बनाए गए जालाजोन शरणार्थी शिविर में पहुंचा, मैं माहौल में दुख, डर और गुस्से का एहसास कर पा रहा था। यहां इसराइली आर्मी के गिरफ्तारी अभियान में मारे गए दो फिलस्तीनी युवाओं का जनाजा निकाला जा रहा था।
मारे गए एक व्यक्ति महमूद सैफ इसराइलियों पर पत्थरबाजी कर रहे थे। उनके कजन मुस्तफा अल-अयान कहते हैं कि पुलिस संदिग्धों को गिरफ्तार करने नहीं आई थी बल्कि सात अक्तूबर को हमास ने जो किया उसकी सजा देने के लिए यहां आई थी।
हम वहां खड़े हैं जहां से हम देख सकते थे कि कब्र के ऊपर मिट्टी डाली जी रही है। मुस्तफा अल-अयान कहते हैं, ‘वो बदला लेने के लिए वेस्ट बैंक आए थे क्योंकि गाजा में विद्रोह करने वाले गुटों ने उन्हें बड़ी चोट पहुंचाई है। इसलिए वो अब वेस्ट बैंक में लोगों पर हमले कर रहे हैं। गाजा और वेस्ट बैंक में मारे गए शहीदों की आत्मा को ईश्वर शांति दे।’
फिलस्तीनी नागरिक एक डर ये भी जता रहे हैं कि इसराइल अपने गुस्से में इस संकट के बहाने 1948 की तर्ज पर एक और नकबा या तबाही बरपाने की कोशिश कर सकता है।
वो कहते हैं कि इसराइल ने गाजा के लाखों लोगों को वादी गाजा के उत्तर काा इलाका छोडक़र दक्षिण की तरफ जाने को कहा है, ये इस बात का सबूत है कि इसराइल तबाही लाना चाहता है। वो ये भी कहते हैं कि कुछ इसराइली नेताओं ने धमकी दी है कि वो गाजा को और छोटा कर देंगे और उसके कुछ इलाके में जमीन को बफर जोन बनाएंगे।
भविष्य को लेकर डर
रामल्ला में मौजूद फतह के अधिकारी साबरी सायदाम कहते हैं कि सितंबर में नेतन्यााहू ने संयुक्त राष्ट्र में एक मानचित्र दिखाया था जिसमें वेस्ट बैंक और गाजा को इसराइल के हिस्से के तौर पर दिखाया गया था।
वो कहते हैं, ‘सभी को इसका अंदाज़ा है क्योंकि नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में जो मानचित्र दिखाया था उसमें न तो वेस्ट बैंक था और न ही गाजा। इसलिए लोगों में ये आम धारणा है कि नेतन्याहू फ़लस्तीनियों को डिपोर्ट करेंगे, उन्हें विस्थापित करेंगे और गाजा पर इसराइल कब्जा कर लेगा।’
दोनों ही तरफ लोगों की धारणा का आधार अतीत की घटनाओं पर टिका है।
इसराइल के लिए हमास का ताजा हमला उन्हें नाजी जर्मनी के हाथों यूरोप में यहूदियों के बड़े पैमाने पर हत्याओं की याद दिलाता है।
सात अक्तूबर को हुए हमास के हमले में मारे गए लोगों को लेकर इसराइल ने कहा कि होलोकॉस्ट के बाद से यहूदियों के लिए ये सबसे बुरा दिन था। (bbc.com/hindi)
राघवेंद्र राव
दृश्य 1: भारत के हर जि़ले में साल 2014 से लेकर अब तक की सरकारी उपलब्धियों का प्रचार करते हुए रथ यात्रा निकल रही है और हर रथ का प्रभारी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का एक अधिकारी है।
दृश्य 2: अपनी सालाना छुट्टी पर घर आया हुआ एक भारतीय सैनिक स्थानीय लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारियाँ दे रहा है।
अगर केंद्र सरकार की मंशा पूरी हुई, तो ये दोनों दृश्य जल्द ही हकीकत में बदलते नजर आएँगे।
दरअसल केंद्र सरकार पिछले नौ साल की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए आईएएस अधिकारियों को रथ प्रभारी के तौर पर तैनात करने की तैयारी में है।
दूसरी ओर हाल ही में रक्षा मंत्रालय के एक निर्देश में कहा गया कि छुट्टी पर जा रहे भारतीय सेना के सैनिकों को राष्ट्र-निर्माण के काम में हिस्सा लेना चाहिए और स्थानीय समुदाय के साथ रचनात्मक तरीके से जुडऩा चाहिए और ये काम करते हुए सरकारी योजनाओं का प्रचार करना चाहिए।
इन दोनों ही बातों को लेकर राजनीति गरमा गई है और इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या नौकरशाही और सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है।
‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ और ‘रथ प्रभारी’
18 अक्तूबर को वित्त मंत्रालय के एक पत्र में सामने आया कि विभागों से जिला रथ प्रभारी के रूप में तैनाती के लिए संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर के अधिकारियों का नामांकन माँगा गया है।
इस पत्र में कहा गया कि 20 नवंबर 2023 से 25 जनवरी 2025 तक ग्राम पंचायत स्तर पर सूचना के प्रसार, जागरूकता और सेवाओं के विस्तार के लिए पूरे देश में विकसित भारत संकल्प यात्रा के माध्यम से भारत सरकार की पिछले 9 वर्षों की उपलब्धियों का प्रदर्शन और उत्सव आयोजित करने का प्रस्ताव है।
इन जिला रथ प्रभारियों की तैनाती सभी 765 जिलों में की जानी है, जिनमें 2.69 लाख ग्राम पंचायतें कवर हो जाएँगी।
साथ ही पत्र में कहा गया कि रथ यात्रा की तैयारियों, योजना, कार्यान्वयन, निगरानी के लिए समन्वय स्थापित करने के लिए भारत सरकार के संयुक्त सचिवों, निदेशकों, उप सचिवों को रथ प्रभारी (विशेष अधिकारी) के रूप में तैनात करने का निर्णय लिया गया है।
इस चि_ी पर कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स (जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पर लिखा, ‘सिविल सर्वेन्ट्स को चुनाव में जाने वाली सरकार के लिए राजनीतिक प्रचार करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है?’
पवन खेड़ा के ट्वीट पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद जयराम रमेश ने लिखा, ‘यह नरेंद्र का एक और अहंकारोन्मादी आदेश है।’
सरकार ने भी विपक्ष को इस मुद्दे पर आड़े हाथ लिया है।
भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स पर लिखा, ‘मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि कांग्रेस पार्टी को योजनाओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ज़मीनी स्तर तक पहुँचने वाले लोक सेवकों से दिक्कत है। अगर ये शासन का मूल सिद्धांत नहीं है, तो क्या है?’
नड्डा ने आगे लिखा, ‘शायद कांग्रेस पार्टी के लिए यह एक अनजान अवधारणा है लेकिन सार्वजनिक सेवा प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है। अगर मोदी सरकार सभी योजनाओं की संतृप्ति सुनिश्चित करना चाहती है और सभी लाभार्थियों तक पहुँचना सुनिश्चित करना चाहती है तो गऱीबों के हित को ध्यान में रखने वाले किसी भी व्यक्ति को समस्या नहीं हो सकती है। लेकिन कांग्रेस की रुचि केवल गऱीबों को गऱीबी में रखने में है और इसलिए वे विरोध कर रहे हैं।’
खडग़े का सरकार पर निशाना
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मोदी सरकार के लिए सभी सरकारी एजेंसियाँ, संस्थान, विंग और विभाग अब आधिकारिक तौर पर ‘प्रचारक’ हैं ! हमारे लोकतंत्र और हमारे संविधान की रक्षा के मद्देनजर यह जरूरी है कि उन आदेशों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए जो नौकरशाही और हमारे सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण को बढ़ावा देंगे।’
खडग़े ने इस विषय पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा। पत्र में उन्होंने कहा कि सरकार की रथ प्रभारी बनाने की योजना केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो निर्देश देते हैं कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेगा।
खडग़े ने कहा, ‘हालाँकि सरकारी अधिकारियों के लिए सूचना का प्रसार करना स्वीकार्य है, लेकिन उपलब्धियों का ‘जश्न मनाना’ और ‘प्रदर्शन’ करना उन्हें स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देता है।’
कांग्रेस अध्यक्ष ने ये भी कहा कि चूँकि सिर्फ पिछले नौ वर्षों की ‘उपलब्धियों’ की बात की जा रही है तो ये साफ़ है कि ये पाँच राज्यों के चुनाव और 2024 के आम चुनावों पर नजर रखते हुए एक राजनीतिक फैसला है।
उन्होंने कहा, ‘अगर विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को वर्तमान सरकार की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए नियुक्त किया जा रहा है तो हमारे देश का शासन अगले छह महीनों के लिए ठप हो जाएगा।’
खडग़े ने रक्षा मंत्रालय के हाल ही में निकाले गए उस आदेश की भी बात की ‘जिसमें वार्षिक अवकाश पर गए सैनिकों को सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने में समय बिताने का निर्देश दिया गया है, जिससे वे ‘सैनिक-राजदूत’ बन जाएँगे’।
उन्होंने कहा, ‘सेना प्रशिक्षण कमान को हमारे जवानों को देश की रक्षा के लिए तैयारी करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, वो सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने के तरीकों पर स्क्रिप्ट और प्रशिक्षण मैनुअल तैयार करने में व्यस्त हैं।’
खडग़े ने कहा, ‘लोकतंत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सशस्त्र बलों को राजनीति से दूर रखा जाए।’
उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि ‘हर जवान की निष्ठा देश और संविधान के प्रति है।’
वे बोले, ‘हमारे सैनिकों को सरकारी योजनाओं का मार्केटिंग एजेंट बनने के लिए मजबूर करना सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण की दिशा में एक ख़तरनाक क़दम है। इसके अलावा हमारे देश के लिए कई महीनों या वर्षों की कठिन सेवा के बाद हमारे जवान अपनी वार्षिक छुट्टी पर अपने परिवारों के साथ समय बिताने और निरंतर सेवा के लिए ऊर्जा बहाल करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता के पात्र हैं। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उनकी छुट्टियों पर डाका नहीं डाला जाना चाहिए।’
‘सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे’
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी इस मामले पर सरकार का पक्ष रखा और विपक्ष के विरोध का जवाब दिया।
मालवीय ने ङ्ग पर लिखा, ‘किसने कहा कि भारत सरकार में नौकरशाहों को कार्यान्वित कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में बात करने का अधिकार नहीं है? क्या उन्हें सिर्फ दफ्तरों में बैठना चाहिए और प्रभाव का आंकलन करने के लिए ज़मीन पर नहीं होना चाहिए? नौकरशाहों का कर्तव्य है कि वे लोगों की सेवा करें, जैसा निर्वाचित सरकार उचित समझे।’
मालवीय के मुताबिक ‘सिर्फ इसलिए कि पाँच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और आम चुनाव सात महीने दूर हैं, क्या हमें शासन करना छोड़ देना चाहिए? गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी, हर साल, चुनाव की परवाह किए बिना, मोदी जी ने सुनिश्चित किया कि उनके नौकरशाह जून-जुलाई के दौरान मैदान में जाएँ, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूल जाने वाले सभी बच्चों का नामांकन हो। इसने गुजरात में सार्वभौमिक शिक्षा सुनिश्चित की।’
मालवीय ने कहा कि इसी तरह पीएम मोदी चाहते हैं कि पीएम आवास योजना (ग्रामीण), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, पीएम किसान, फसल बीमा योजना, पोषण अभियान, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जनऔषधि योजना, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी कल्याणकारी योजनाएँ अगले छह महीने में पूरी तरह लागू हो जाएँ।
‘पूरी सरकार ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ नामक एक मेगा संतृप्ति अभियान के तहत 2.7 लाख पंचायतों में फैलेगी, संभावित लाभार्थियों तक पहुंचेगी और उनका नामांकन करेगी। इसलिए सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे।’
‘नौकरशाही न्यूट्रल होती है’
प्रोफेसर अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं।
वे कहते हैं, ‘जिसे आप आधुनिक राज्य कहते हैं, उसकी एक ख़ासियत बताई जाती है नौकरशाही। नौकरशाही वो है जो पॉलिटिकल एक्जिक्यूटिव से एक दूरी पर रहती है। यानी वो राजनीतिक तौर पर तटस्थ है। तो जहाँ लोकतांत्रतिक स्टेटस है वहां नौकरशाही राज्य का जरूरी हिस्सा तो है पर वो पॉलिटिकली न्यूट्रल है।’
साथ ही वे यह भी कहते हैं कि भारत में एक ऐसी प्रक्रिया से चुनकर नौकरशाह आते हैं जो ऑब्जेक्टिव है और किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से आजाद है।
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं, ‘वे राजनीतिक नेतृत्व के प्रतिनिधि नहीं होते हैं। उनका काम नीतियाँ बनाना और उनका क्रियान्वयन करना ज़रूर है, लेकिन उनका काम प्रचार करना नहीं है। पिछले 75 वर्षों में ये पहली बार हो रहा है। पहले कभी भी नौकरशाही ने योजनाओं का प्रचार करने का काम नहीं किया।’
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक नौकरशाही का जो पहले से चला आ रहा तरीक़ा था वो टूट गया है।
वे कहते हैं, ‘अब राजनीतिक वैचारिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच पूर्ण तालमेल है जबकि नौकरशाही को वैचारिक झुकाव से अलग रहना चाहिए।’
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि ‘अगर नौकरशाही किसी एक विचारधारा का अनुसरण करने लग गई तो वो किसी नई सरकार के आने पर उस सरकार के लिए बाधा बन जाएगी।’
वे कहते हैं, ‘या तो वो उस सरकार को काम नहीं करने देगी या बाधाएं डालेगी या एक अप्रत्यक्ष रूप से तख्तापलट करेगी। तो ये काफी खतरनाक है क्योंकि ये लोकतंत्र और लोकतांत्रिक राज्य का विनाश होने जैसा है।’
‘ये सेंटर-स्टेट रिलेशन्स का मामला है’
प्रोफेसर आशुतोष कुमार चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं।
वे कहते हैं, ‘इस तरह की कोशिश राजीव गाँधी ने भी की थी जब वो पंचायती राज से जुड़ा 64वाँ संविधान संशोधन संसद में लाए थे। उससे पहले उन्होंने जि़ला मजिस्ट्रटों के साथ मीटिंग करनी शुरू की थी। तो विपक्षी राज्य सरकारों को लगा कि उन्हें बाइपास किया जा रहा है। साल 1989 चुनावी साल था और 1988 में राजीव गाँधी ने ये काम शुरू किया था। तो विपक्षी दलों ने इस बात पर काफी हल्ला मचाया और ये संशोधन राज्य सभा में पास नहीं होने दिया।’
प्रोफेसर आशुतोष कहते हैं, ‘मोदीजी के बारे में भी कहा जाता है कि वो सीधे तौर पर आल इंडिया सर्विसेज में कार्यरत अधिकारियों से जुडऩे ने कोशिश करते हैं। और अभी केंद्र सरकार ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि ऑल इंडिया सर्विसेज के लोग हमारे लोग हैं और वो सेंट्रल सर्विसेज रूल्स के तहत काम करते हैं।’
वे कहते हैं कि ‘ये मामला सेंटर-स्टेट रिलेशन्स’ यानी केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों से जुड़ा है। उनके मुताबिक केंद्र सरकार आईएएस अफसरों से सीधा राब्ता बनाने की कोशिश कर रही है।
वे कहते हैं, ‘तो कोशिश ये है कि आप सीधे आल इंडिया सर्विसेज की सेवाओं का उपयोग करें और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। लेकिन केंद्र सरकार जो करने जा रही है उस पर राज्यों की सरकारें बहुत हल्ला करेंगी।’
‘सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही खतरनाक’
प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही ख़तरनाक है।
वे कहते हैं, ‘आर्मी का काम न तो राष्ट्रवाद और न किसी विचारधारा का प्रोपगैंडा करना है। और न ही आर्मी सरकार के बात की प्रचारक होती है। लेकिन हमने पिछले कुछ सालों में देखा है कि जो हमारे आम्र्ड फोर्सेज के चीफ हैं वो विचारधारा से जुड़े स्टेटमेंट देने लगे हैं। ये भी बहुत खतरनाक है।’
वे कहते हैं, ‘अमेरिका मेंं ट्रंप के समय पुलिस चीफ ने खड़े होकर बयान दिया था कि वो संविधान से बंधे हुए हैं न कि किसी पद से। तो ये स्वतंत्रता होती है।’
प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक भारत की सेना एक प्रोफेशनल सेना के तौर पर मशहूर रही है और भारत की आर्मी पर भारत की जनता यकीन करती है, हर धर्म के लोग यकीन करते हैं कि वो संकट की स्थिति में बिना किसी भेदभाव के खड़ी होगी।
सैनिकों के सरकारी योजनाओं के प्रचार की बात पर प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, ‘अगर ऐसा किया जा रहा है तो बहुत गलत है। इस तरह की बातें हताशा और सत्ता से बाहर हो जाने का डर दिखाती हैं। इंडिया गठबंधन बनने के बाद सरकार की हठ बहुत बढ़ गई है। पता नहीं अभी और क्या क्या किया जाएगा।’
अंग्रेजी अखबार डेक्कन हेराल्ड में रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सिंह ने लिखा कि कहा ये जा रहा है कि इस कवायद का मक़सद राष्ट्र-निर्माण है लेकिन ‘सेना मुख्यालय द्वारा उल्लिखित हर एक योजना में मोदी सरकार की विशिष्ट छाप है। अन्यथा, इसमें यूपीए-युग की एनआरईजीएस जैसी या विपक्ष द्वारा संचालित राजस्थान, केरल या पंजाब जैसे राज्यों की योजनाओं को भी सूचीबद्ध किया गया होता।’
सुशांत सिंह लिखते हैं कि स्पष्ट रूप से यह एक पूरी तरह से राजनीतिक पहल है जिसमें सेना अपने सैनिकों को मोदी सरकार के राजदूत के रूप में कार्य करने पर सहमत हुई है।
वे कहते हैं, ‘राजनीतिक मकसद साफ है। 2014 के बाद से मोदी ने जनता के मन में सेना और सैनिकों के साथ अपनी और अपनी पार्टी की पहचान बनाने की पुरजोर कोशिश की है।’
सुशांत सिंह लिखते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल जानबूझकर सेना को समाज से अलग रखने पर आधारित है लेकिन ये बात अब खत्म हो गई है। ‘इन सैनिकों को अब भाजपा के लिए अर्ध-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, या अधिक सटीक रूप से, मोदी के राजनीतिक राजदूतों में बदल दिया जाएगा।’
नौकरशाही के राजनीतिकरण पर बहस
नौकरशाही का राजनीतिकरण एक ऐसा मुद्दा है जो दशकों से चर्चा का विषय रहा है।
पिछले वर्षों में हुए कई चुनावों में ऐसी खबरें आम थीं कि रिटायर्ड आईएएस या आईपीएस अधिकारी चुनाव लडऩे की उम्मीद में राजनीतिक दलों के चक्कर काटते दिखे।
हाल ही में ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी वीके पांडियन सुखिऱ्यों में तब आ गए जब वॉलन्टरी रिटायरमेंट या स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के एक दिन बाद ही उन्हें ओडिशा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दे दिया गया। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि पांडियन ओडिशा के मुख्यमंत्री के करीबी रहे हैं और आने वाले समय में उन्हें और बड़ी जि़म्मेदारियां दी जा सकती हैं।
ऐसे राजनेताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है जो पहले नौकरशाह थे और बाद में राजनीति में आ गए। इनमें से कुछ जाने-माने नाम हैं यशवंत सिन्हा, नटवर सिंह, डॉ एस जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी, अजीत जोगी, मणिशंकर अय्यर, मीरा कुमार और अरविंद केजरीवाल।
बहस का विषय ये भी रहा है कि क्या नौकरी करते वक्त नौकरशाह राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होते हैं।
सेवानिवृत होने के बाद जब कोई ब्यूरोक्रेट किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है तो ये इल्जाम भी लगते हैं कि क्या वो ब्यूरोक्रेट सेवा में रहते वक्त उसी राजनीतिक दल के हितों की रक्षा करता था?
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि हर किसी की राजनीतिक राय हो सकती है और राजनीतिक राय होगी तभी तो कोई वोट देगा।
वे कहते हैं, ‘नौकरशाह भी वोट देते हैं और ज़रूरी नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी को ही दें। यही तो खास बात है कि जो भी उसकी अपनी राजनीतिक राय है वो इस बात के आड़े नहीं आनी चाहिए कि वो सरकार के लिए काम कर रहा है। अगर आपने उसे प्रॉपगैंडिस्ट (प्रचारक) बना दिया तो वो किसी भी और विचारधारा की सरकार के लिए बाधा बन जाएगा।’ (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
देश के मतदाताओं के लालच ने लोकतांत्रिक सत्ता को टैक्स पर ऐश करने का साधन बनाकर रख दिया है। करदाताओं के टैक्स पर तीन वर्ग सबसे ज्यादा ऐश करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा ऐश नेता और अफसर करते हैं जो टैक्स की रकम को अपना माल समझ कर खर्च करते हैं। प्रधानमंत्री के लिए बड़ा सुसज्जित आवास, बड़ा दफ्तर, बड़ा हवाई जहाज और मुख्यमंत्रियों के लिए नए-नए हेलीकॉप्टर और मंत्रियों के बड़े बड़े बंगलों की साज सज्जा इसी टैक्स के बूते होती है। अफसरों के गाड़ी घोड़े और बंगलों की भी रौनक का स्रोत भी यही टैक्स है।सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार का नीव से शिखर तक का पूरा पिरामिड भी इसी टैक्स से बनता है, जिसकी ईद के चांद सी थोडी सी झलक कभी कभार सी बी आई, एंटी करप्शन ब्यूरो, लोकायुक्त, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के छापों में दिखाई देती है। सरकारी कार्यों का ठेका लेने वाले लाखों छोटे बड़े ठेकेदारों की ऐश भी इसी रकम से होती है जिसमें मंत्रालयों से सांठ गांठ कर लोहे को पीतल और पीतल को सोने के भाव बेचकर अपना और अपने आकाओं के गणपति से बड़े उदर भरे जाते हैं। इसी से आलसी होती हट्टे कट्टे लोगों की बडी फौज को प्रधानमन्त्री का मुस्कुराता फोटो चिपकाकर मुफ़्त राशन का झोला दिया जाता है। होना तो यह चाहिए कि मुफ्त राशन के झोलों पर उन टैक्स देने वालों की तरफ से एक अपील होनी चाहिए कि जिस तरह हम अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कड़ी मेहनत कर आपको भी मुफ्त राशन उपलब्ध करा रहे हैं, उसी तरह हम चाहते हैं कि आप भी यथाशीघ्र लेने वालों की कतार से निकलकर हमारी तरह देने वालों की कतार में आ जाएं। इस अपील से कम से कम संवेदनशील लोगों को कुछ शर्म आएगी। अभी तो वे समझते हैं कि हमने जिन नेताओं को वोट दिया है वे हमे मुफ्त की रेवडिय़ों की सौगात दे रहे हैं।
कांग्रेस इस मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को भी पछाड़ती दिखाई दे रही है। मध्य प्रदेश में हाल ही में जारी हुए मेनिफेस्टो, जिसे वचन पत्र का नाम दिया गया है, में कई अहम वर्गों को तरह तरह के लालच दिए गए हैं। इसमें कोई दो राय नही कि इस घटिया खेल की शुरुआत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी।समाज में जितनी ज्यादा असमानता और तनाव होते हैं वर्तमान पीढ़ी के अधिकांश नेताओं के लिए वह स्वर्णिम दौर हो जाता है जिसमें जनता के किसी बड़े वर्ग की भावनाओं से खिलवाडक़र आसानी से सत्ता हासिल की जा सकती है। हमारे देश मे जहां तरह तरह की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विषमताएं हैं और उसी के परिणाम स्वरूप तरह तरह के तनाव और कई राजनीतिक दल हैं वहां स्वार्थी नेताओं के लिए सत्ता हथियाना इसलिए भी आसान हो जाता है क्योंकि बहु कोणीय मुकाबलों में मात्र तीस प्रतिशत वोट पाकर भी शत-प्रतिशत लोगों पर हुकूमत की जा सकती है।
दु:ख की बात यह है कि मध्य प्रदेश सहित ज्यादातर राज्यों की आर्थिक हालत काफी नाजुक है। राज्यों के बजट में होने वाले खर्च आय से अधिक होने के कारण उन्हें लगातार कजऱ् लेना पड़ रहा है लेकिन राज्य कजऱ् में डूबने के बावजूद नेता मुफ्त की रेवडिय़ों पर अंकुश लगाना तो दूर उन्हें बढ़ावा देकर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना चाहते हैं।मध्य प्रदेश इस मामले में नित नए उदाहरण पैदा कर रहा है।हमारी संस्कृति के अनुसार यदि हम किसी की सहायता करते हैं तो वह चुपचाप होनी चाहिए।
कहावत है कि बाएं हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए कि दाएं ने किसी की मदद की है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अखबारों में विज्ञापन पर विज्ञापन देकर, जगह जगह पोस्टर लगाकर, पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर पूरे सरकारी तंत्र को लाडली बहना योजना के बड़े बड़े आयोजनों के लिए भीड़ जुटाने पर लगाकर न केवल करदाताओं के टैक्स की गाढ़ी कमाई स्वाहा की है बल्कि विकास के सडक़ मरम्मत जैसे जरूरी कार्यों की भयंकर अवहेलना की है। यह सब सत्ता हासिल करने के लिए हुआ है ताकि अगले पांच साल भी पहले की तरह ऐश की जा सके।
दीपाली अग्रवाल
इस दौर के कितने ही शायर अपनी प्रेमिका को अमृता कहते हैं और साहिर की चौखट पर खुद को खड़ा करते हैं। हर गजल कहने वाला चाहता है कि उसकी कलम में साहिर का गम बहे, जि़न्दगी का अब्दुल हई से वास्ता है या नहीं ये दूर की बात है। वैसी जि़न्दगी तो आसान नहीं है लेकिन इश्क में किसी को अमृता कह देना आसान है। सो वहीं खुद को साहिर के कद से नापने की कोशिश करते हैं।
यक़ीनन साहिर सिर्फ जिस्म से ही लंबे नहीं थे उनकी कलम आसमान की सातवीं परत के भी तारे खोज लायी थी। अब्दुल हई जो बाद में साहिर लुधियानवी हो गए अजीयतों के तमाम दौर से गुजरे। तल्खिय़ों का शायर लिफ्ट से डरता था, अकेलेपन से घबराता था, उसे अपने लिए कपड़े चुनने में मुश्किल होती थी। लेकिन जब उसकी रौशनाई बहती तो दुनिया भर के कितने किस्से उसमें उछाल खाते थे।
चकलाघर से लेकर जंग टालने तक साहिर ने वो सब कुछ कहा जो कहा जाना था और जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जैसा तब था। सिर्फ नज्में और गजलें नहीं गीत भी। ‘हमने सुना है एक है भारत’ कईयों बार फेसबुक फीड में दिखा। 1959 में लिखा गीत जो खासतौर पर अपने बोलों की वजह से वायरल है। उसमें दूरदर्शिता है, जहन की बारीकी है। साहिर के हर गीत में यही तासीर है।
मैं सोचती हूँ साहिर अगर शायर या गीतकार न होते तो एक अच्छे दार्शनिक भी हो सकते थे।
‘ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया’
‘संसार की हर शय का इतना ही फसाना है
इक धुँद से आना है इक धुँद में जाना ह’
एक शेर में जिन्दगी के पूरे फसाने को समझाने वाले इस शायर जैसा फिर कौन न होना चाहेगा। लेकिन आज के दौर के प्यारे शायरों प्रेमिका को अमृता कहने से काम न चल पावेगा, वो जब जाएगी इमरोज के पास तो तुम कहोगे
‘मह़िल से उठ जाने वालो तुम लोगों पर क्या इल्ज़ाम
तुम आबाद घरों के वासी मैं आवारा और बदनाम’
साहिर की चौखट से कब तक काम चलाओगे। साहिर ने तो अपनी मोहब्बत के खुलासे कभी खुल कर नहीं किए, ये तमाम बातें तो अमृता की इक तरफा दास्तान हैं। हाँ, तुम अगर भीतर आँगन तक जाने की हिम्मत करो तो शायद कुछ राज़ खुलें।
राघवेंद्र राव
दृश्य 1: भारत के हर जि़ले में साल 2014 से लेकर अब तक की सरकारी उपलब्धियों का प्रचार करते हुए रथ यात्रा निकल रही है और हर रथ का प्रभारी भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का एक अधिकारी है।
दृश्य 2: अपनी सालाना छुट्टी पर घर आया हुआ एक भारतीय सैनिक स्थानीय लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारियाँ दे रहा है।
अगर केंद्र सरकार की मंशा पूरी हुई, तो ये दोनों दृश्य जल्द ही हकीकत में बदलते नजर आएँगे।
दरअसल केंद्र सरकार पिछले नौ साल की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए आईएएस अधिकारियों को रथ प्रभारी के तौर पर तैनात करने की तैयारी में है।
दूसरी ओर हाल ही में रक्षा मंत्रालय के एक निर्देश में कहा गया कि छुट्टी पर जा रहे भारतीय सेना के सैनिकों को राष्ट्र-निर्माण के काम में हिस्सा लेना चाहिए और स्थानीय समुदाय के साथ रचनात्मक तरीके से जुडऩा चाहिए और ये काम करते हुए सरकारी योजनाओं का प्रचार करना चाहिए।
इन दोनों ही बातों को लेकर राजनीति गरमा गई है और इस बात पर बहस छिड़ गई है कि क्या नौकरशाही और सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है।
‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ और ‘रथ प्रभारी’
18 अक्तूबर को वित्त मंत्रालय के एक पत्र में सामने आया कि विभागों से जिला रथ प्रभारी के रूप में तैनाती के लिए संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव स्तर के अधिकारियों का नामांकन माँगा गया है।
इस पत्र में कहा गया कि 20 नवंबर 2023 से 25 जनवरी 2025 तक ग्राम पंचायत स्तर पर सूचना के प्रसार, जागरूकता और सेवाओं के विस्तार के लिए पूरे देश में विकसित भारत संकल्प यात्रा के माध्यम से भारत सरकार की पिछले 9 वर्षों की उपलब्धियों का प्रदर्शन और उत्सव आयोजित करने का प्रस्ताव है।
इन जिला रथ प्रभारियों की तैनाती सभी 765 जिलों में की जानी है, जिनमें 2.69 लाख ग्राम पंचायतें कवर हो जाएँगी।
साथ ही पत्र में कहा गया कि रथ यात्रा की तैयारियों, योजना, कार्यान्वयन, निगरानी के लिए समन्वय स्थापित करने के लिए भारत सरकार के संयुक्त सचिवों, निदेशकों, उप सचिवों को रथ प्रभारी (विशेष अधिकारी) के रूप में तैनात करने का निर्णय लिया गया है।
इस चि_ी पर कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया एक्स (जो पहले ट्विटर के नाम से जाना जाता था) पर लिखा, ‘सिविल सर्वेन्ट्स को चुनाव में जाने वाली सरकार के लिए राजनीतिक प्रचार करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है?’
पवन खेड़ा के ट्वीट पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता और सांसद जयराम रमेश ने लिखा, ‘यह नरेंद्र का एक और अहंकारोन्मादी आदेश है।’
सरकार ने भी विपक्ष को इस मुद्दे पर आड़े हाथ लिया है।
भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स पर लिखा, ‘मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि कांग्रेस पार्टी को योजनाओं की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ज़मीनी स्तर तक पहुँचने वाले लोक सेवकों से दिक्कत है। अगर ये शासन का मूल सिद्धांत नहीं है, तो क्या है?’
नड्डा ने आगे लिखा, ‘शायद कांग्रेस पार्टी के लिए यह एक अनजान अवधारणा है लेकिन सार्वजनिक सेवा प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है। अगर मोदी सरकार सभी योजनाओं की संतृप्ति सुनिश्चित करना चाहती है और सभी लाभार्थियों तक पहुँचना सुनिश्चित करना चाहती है तो गऱीबों के हित को ध्यान में रखने वाले किसी भी व्यक्ति को समस्या नहीं हो सकती है। लेकिन कांग्रेस की रुचि केवल गऱीबों को गऱीबी में रखने में है और इसलिए वे विरोध कर रहे हैं।’
खडग़े का सरकार पर निशाना
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने आक्रामक तेवर अपनाते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मोदी सरकार के लिए सभी सरकारी एजेंसियाँ, संस्थान, विंग और विभाग अब आधिकारिक तौर पर ‘प्रचारक’ हैं ! हमारे लोकतंत्र और हमारे संविधान की रक्षा के मद्देनजर यह जरूरी है कि उन आदेशों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए जो नौकरशाही और हमारे सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण को बढ़ावा देंगे।’
खडग़े ने इस विषय पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री को एक पत्र भी लिखा। पत्र में उन्होंने कहा कि सरकार की रथ प्रभारी बनाने की योजना केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो निर्देश देते हैं कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेगा।
खडग़े ने कहा, ‘हालाँकि सरकारी अधिकारियों के लिए सूचना का प्रसार करना स्वीकार्य है, लेकिन उपलब्धियों का ‘जश्न मनाना’ और ‘प्रदर्शन’ करना उन्हें स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देता है।’
कांग्रेस अध्यक्ष ने ये भी कहा कि चूँकि सिर्फ पिछले नौ वर्षों की ‘उपलब्धियों’ की बात की जा रही है तो ये साफ़ है कि ये पाँच राज्यों के चुनाव और 2024 के आम चुनावों पर नजर रखते हुए एक राजनीतिक फैसला है।
उन्होंने कहा, ‘अगर विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को वर्तमान सरकार की मार्केटिंग गतिविधियों के लिए नियुक्त किया जा रहा है तो हमारे देश का शासन अगले छह महीनों के लिए ठप हो जाएगा।’
खडग़े ने रक्षा मंत्रालय के हाल ही में निकाले गए उस आदेश की भी बात की ‘जिसमें वार्षिक अवकाश पर गए सैनिकों को सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने में समय बिताने का निर्देश दिया गया है, जिससे वे ‘सैनिक-राजदूत’ बन जाएँगे’।
उन्होंने कहा, ‘सेना प्रशिक्षण कमान को हमारे जवानों को देश की रक्षा के लिए तैयारी करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, वो सरकारी योजनाओं को बढ़ावा देने के तरीकों पर स्क्रिप्ट और प्रशिक्षण मैनुअल तैयार करने में व्यस्त हैं।’
खडग़े ने कहा, ‘लोकतंत्र में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सशस्त्र बलों को राजनीति से दूर रखा जाए।’
उन्होंने साथ ही ये भी कहा कि ‘हर जवान की निष्ठा देश और संविधान के प्रति है।’
वे बोले, ‘हमारे सैनिकों को सरकारी योजनाओं का मार्केटिंग एजेंट बनने के लिए मजबूर करना सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण की दिशा में एक ख़तरनाक क़दम है। इसके अलावा हमारे देश के लिए कई महीनों या वर्षों की कठिन सेवा के बाद हमारे जवान अपनी वार्षिक छुट्टी पर अपने परिवारों के साथ समय बिताने और निरंतर सेवा के लिए ऊर्जा बहाल करने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता के पात्र हैं। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उनकी छुट्टियों पर डाका नहीं डाला जाना चाहिए।’
‘सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे’
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने भी इस मामले पर सरकार का पक्ष रखा और विपक्ष के विरोध का जवाब दिया।
मालवीय ने ङ्ग पर लिखा, ‘किसने कहा कि भारत सरकार में नौकरशाहों को कार्यान्वित कार्यक्रमों और योजनाओं के बारे में बात करने का अधिकार नहीं है? क्या उन्हें सिर्फ दफ्तरों में बैठना चाहिए और प्रभाव का आंकलन करने के लिए ज़मीन पर नहीं होना चाहिए? नौकरशाहों का कर्तव्य है कि वे लोगों की सेवा करें, जैसा निर्वाचित सरकार उचित समझे।’
मालवीय के मुताबिक ‘सिर्फ इसलिए कि पाँच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और आम चुनाव सात महीने दूर हैं, क्या हमें शासन करना छोड़ देना चाहिए? गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी, हर साल, चुनाव की परवाह किए बिना, मोदी जी ने सुनिश्चित किया कि उनके नौकरशाह जून-जुलाई के दौरान मैदान में जाएँ, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूल जाने वाले सभी बच्चों का नामांकन हो। इसने गुजरात में सार्वभौमिक शिक्षा सुनिश्चित की।’
मालवीय ने कहा कि इसी तरह पीएम मोदी चाहते हैं कि पीएम आवास योजना (ग्रामीण), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, पीएम किसान, फसल बीमा योजना, पोषण अभियान, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, जनऔषधि योजना, पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी कल्याणकारी योजनाएँ अगले छह महीने में पूरी तरह लागू हो जाएँ।
‘पूरी सरकार ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ नामक एक मेगा संतृप्ति अभियान के तहत 2.7 लाख पंचायतों में फैलेगी, संभावित लाभार्थियों तक पहुंचेगी और उनका नामांकन करेगी। इसलिए सरकार को काम करने दीजिए, चुनाव तो जब होंगे तब होंगे।’
‘नौकरशाही न्यूट्रल होती है’
प्रोफेसर अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग में कार्यरत हैं और एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं।
वे कहते हैं, ‘जिसे आप आधुनिक राज्य कहते हैं, उसकी एक ख़ासियत बताई जाती है नौकरशाही। नौकरशाही वो है जो पॉलिटिकल एक्जिक्यूटिव से एक दूरी पर रहती है। यानी वो राजनीतिक तौर पर तटस्थ है। तो जहाँ लोकतांत्रतिक स्टेटस है वहां नौकरशाही राज्य का जरूरी हिस्सा तो है पर वो पॉलिटिकली न्यूट्रल है।’
साथ ही वे यह भी कहते हैं कि भारत में एक ऐसी प्रक्रिया से चुनकर नौकरशाह आते हैं जो ऑब्जेक्टिव है और किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से आजाद है।
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद कहते हैं, ‘वे राजनीतिक नेतृत्व के प्रतिनिधि नहीं होते हैं। उनका काम नीतियाँ बनाना और उनका क्रियान्वयन करना ज़रूर है, लेकिन उनका काम प्रचार करना नहीं है। पिछले 75 वर्षों में ये पहली बार हो रहा है। पहले कभी भी नौकरशाही ने योजनाओं का प्रचार करने का काम नहीं किया।’
प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद के मुताबिक नौकरशाही का जो पहले से चला आ रहा तरीक़ा था वो टूट गया है।
वे कहते हैं, ‘अब राजनीतिक वैचारिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच पूर्ण तालमेल है जबकि नौकरशाही को वैचारिक झुकाव से अलग रहना चाहिए।’
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि ‘अगर नौकरशाही किसी एक विचारधारा का अनुसरण करने लग गई तो वो किसी नई सरकार के आने पर उस सरकार के लिए बाधा बन जाएगी।’
वे कहते हैं, ‘या तो वो उस सरकार को काम नहीं करने देगी या बाधाएं डालेगी या एक अप्रत्यक्ष रूप से तख्तापलट करेगी। तो ये काफी खतरनाक है क्योंकि ये लोकतंत्र और लोकतांत्रिक राज्य का विनाश होने जैसा है।’
‘ये सेंटर-स्टेट रिलेशन्स का मामला है’
प्रोफेसर आशुतोष कुमार चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाते हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं।
वे कहते हैं, ‘इस तरह की कोशिश राजीव गाँधी ने भी की थी जब वो पंचायती राज से जुड़ा 64वाँ संविधान संशोधन संसद में लाए थे। उससे पहले उन्होंने जि़ला मजिस्ट्रटों के साथ मीटिंग करनी शुरू की थी। तो विपक्षी राज्य सरकारों को लगा कि उन्हें बाइपास किया जा रहा है। साल 1989 चुनावी साल था और 1988 में राजीव गाँधी ने ये काम शुरू किया था। तो विपक्षी दलों ने इस बात पर काफी हल्ला मचाया और ये संशोधन राज्य सभा में पास नहीं होने दिया।’
प्रोफेसर आशुतोष कहते हैं, ‘मोदीजी के बारे में भी कहा जाता है कि वो सीधे तौर पर आल इंडिया सर्विसेज में कार्यरत अधिकारियों से जुडऩे ने कोशिश करते हैं। और अभी केंद्र सरकार ये दिखाने की कोशिश कर रही है कि ऑल इंडिया सर्विसेज के लोग हमारे लोग हैं और वो सेंट्रल सर्विसेज रूल्स के तहत काम करते हैं।’
वे कहते हैं कि ‘ये मामला सेंटर-स्टेट रिलेशन्स’ यानी केंद्र और राज्यों के बीच के संबंधों से जुड़ा है। उनके मुताबिक केंद्र सरकार आईएएस अफसरों से सीधा राब्ता बनाने की कोशिश कर रही है।
वे कहते हैं, ‘तो कोशिश ये है कि आप सीधे आल इंडिया सर्विसेज की सेवाओं का उपयोग करें और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। लेकिन केंद्र सरकार जो करने जा रही है उस पर राज्यों की सरकारें बहुत हल्ला करेंगी।’
‘सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही खतरनाक’
प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक सेना को वैचारिक बनाना बहुत ही ख़तरनाक है।
वे कहते हैं, ‘आर्मी का काम न तो राष्ट्रवाद और न किसी विचारधारा का प्रोपगैंडा करना है। और न ही आर्मी सरकार के बात की प्रचारक होती है। लेकिन हमने पिछले कुछ सालों में देखा है कि जो हमारे आम्र्ड फोर्सेज के चीफ हैं वो विचारधारा से जुड़े स्टेटमेंट देने लगे हैं। ये भी बहुत खतरनाक है।’
वे कहते हैं, ‘अमेरिका मेंं ट्रंप के समय पुलिस चीफ ने खड़े होकर बयान दिया था कि वो संविधान से बंधे हुए हैं न कि किसी पद से। तो ये स्वतंत्रता होती है।’
प्रोफेसर अपूर्वानंद के मुताबिक भारत की सेना एक प्रोफेशनल सेना के तौर पर मशहूर रही है और भारत की आर्मी पर भारत की जनता यकीन करती है, हर धर्म के लोग यकीन करते हैं कि वो संकट की स्थिति में बिना किसी भेदभाव के खड़ी होगी।
सैनिकों के सरकारी योजनाओं के प्रचार की बात पर प्रोफेसर आशुतोष कुमार कहते हैं, ‘अगर ऐसा किया जा रहा है तो बहुत गलत है। इस तरह की बातें हताशा और सत्ता से बाहर हो जाने का डर दिखाती हैं। इंडिया गठबंधन बनने के बाद सरकार की हठ बहुत बढ़ गई है। पता नहीं अभी और क्या क्या किया जाएगा।’
अंग्रेजी अखबार डेक्कन हेराल्ड में रक्षा मामलों के जानकार सुशांत सिंह ने लिखा कि कहा ये जा रहा है कि इस कवायद का मक़सद राष्ट्र-निर्माण है लेकिन ‘सेना मुख्यालय द्वारा उल्लिखित हर एक योजना में मोदी सरकार की विशिष्ट छाप है। अन्यथा, इसमें यूपीए-युग की एनआरईजीएस जैसी या विपक्ष द्वारा संचालित राजस्थान, केरल या पंजाब जैसे राज्यों की योजनाओं को भी सूचीबद्ध किया गया होता।’
सुशांत सिंह लिखते हैं कि स्पष्ट रूप से यह एक पूरी तरह से राजनीतिक पहल है जिसमें सेना अपने सैनिकों को मोदी सरकार के राजदूत के रूप में कार्य करने पर सहमत हुई है।
वे कहते हैं, ‘राजनीतिक मकसद साफ है। 2014 के बाद से मोदी ने जनता के मन में सेना और सैनिकों के साथ अपनी और अपनी पार्टी की पहचान बनाने की पुरजोर कोशिश की है।’
सुशांत सिंह लिखते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल जानबूझकर सेना को समाज से अलग रखने पर आधारित है लेकिन ये बात अब खत्म हो गई है। ‘इन सैनिकों को अब भाजपा के लिए अर्ध-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, या अधिक सटीक रूप से, मोदी के राजनीतिक राजदूतों में बदल दिया जाएगा।’
नौकरशाही के राजनीतिकरण पर बहस
नौकरशाही का राजनीतिकरण एक ऐसा मुद्दा है जो दशकों से चर्चा का विषय रहा है।
पिछले वर्षों में हुए कई चुनावों में ऐसी खबरें आम थीं कि रिटायर्ड आईएएस या आईपीएस अधिकारी चुनाव लडऩे की उम्मीद में राजनीतिक दलों के चक्कर काटते दिखे।
हाल ही में ओडिशा कैडर के आईएएस अधिकारी वीके पांडियन सुखिऱ्यों में तब आ गए जब वॉलन्टरी रिटायरमेंट या स्वैच्छिक सेवानिवृति लेने के एक दिन बाद ही उन्हें ओडिशा सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दे दिया गया। ये बात भी किसी से छिपी नहीं है कि पांडियन ओडिशा के मुख्यमंत्री के करीबी रहे हैं और आने वाले समय में उन्हें और बड़ी जि़म्मेदारियां दी जा सकती हैं।
ऐसे राजनेताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है जो पहले नौकरशाह थे और बाद में राजनीति में आ गए। इनमें से कुछ जाने-माने नाम हैं यशवंत सिन्हा, नटवर सिंह, डॉ एस जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी, अजीत जोगी, मणिशंकर अय्यर, मीरा कुमार और अरविंद केजरीवाल।
बहस का विषय ये भी रहा है कि क्या नौकरी करते वक्त नौकरशाह राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होते हैं।
सेवानिवृत होने के बाद जब कोई ब्यूरोक्रेट किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है तो ये इल्जाम भी लगते हैं कि क्या वो ब्यूरोक्रेट सेवा में रहते वक्त उसी राजनीतिक दल के हितों की रक्षा करता था?
प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि हर किसी की राजनीतिक राय हो सकती है और राजनीतिक राय होगी तभी तो कोई वोट देगा।
वे कहते हैं, ‘नौकरशाह भी वोट देते हैं और ज़रूरी नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी को ही दें। यही तो खास बात है कि जो भी उसकी अपनी राजनीतिक राय है वो इस बात के आड़े नहीं आनी चाहिए कि वो सरकार के लिए काम कर रहा है। अगर आपने उसे प्रॉपगैंडिस्ट (प्रचारक) बना दिया तो वो किसी भी और विचारधारा की सरकार के लिए बाधा बन जाएगा।’ (bbc.com/hindi)
आर.के.पालीवाल
रहीमदास कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के टिकिटार्थियो की दशा देखते तो अपने पानी वाले दोहे को संशोधित कर कहते ‘टिकिट बिना सब सून’, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं के लिए टिकिट ही सबसे ज्यादा जरूरी हो गया। टिकिट नही मिला तो सब सूना है। जिसे टिकिट मिल गया उसके घर, दफ्तर, खेत, खलिहान ,फार्म हाउस और बागान में रौनक ही रौनक है लेकिन जिस पर टिकिट की किरपा नहीं बरसी उसके चहुं और चंबल के बीहड़ जैसा सुनसान पसरा है। कल तक जो चेले चपाटे गुड के इर्द गिर्द भिनभिनाती मख्यियों की तरह दिन रात घेरे रहते थे वे टिकिट नही मिलने पर रातोरात गायब हो जाते हैं। वर्तमान दौर के नेताओं ने यह गूढ़ रहस्य जान लिया है कि सरपंच,
पार्षद, विधायक और सांसद बने बगैर जन सेवा नहीं हो सकती। जनता की सेवा के लिए टिकट सबसे जरूरी है। टिकिट नहीं मिलने पर जनता ऐसे हिकारत भाव से देखती है जैसे टी टी बिना टिकिट सवारी को देखता है।
वैसे तो चुनाव जीतने पर भी वर्तमान तंत्र में कोई खास सेवा तब तक संभव नहीं होती जब तक जीतने के बाद मंत्री परिषद में चयन नहीं हो जाता।मंत्री बनने के बाद भी सेवा की ज्यादा संभावना तभी दिखती है जब मुख्यमंत्री की कुर्सी मिले और मुख्यमंत्री नहीं तो उप मुख्यमंत्री का पद हासिल हो और साथ में राजस्व या पी डब्लू डी जैसे किसी जानदार मंत्रालय का कैबिनेट प्रभार मिले।दरअसल टिकट ऐसा ताबीज है जो नेताजी को कुर्सी और दरी बिछाने, मंच सज्जा करने, भीड़ बढ़ाने और जिन्दाबाद मुर्दाबाद के कानफोडू नारे लगाने वाले आम कार्यकर्ताओं से अलग कर खास की श्रेणी में प्रविष्ट कराता है इसीलिए टिकट के लिए इतनी मारामारी मचती है।
आजकल मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के टिकिट को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में घमासान मचा हुआ है। टिकिट बांटने वालों के कपड़े फाड़े जा रहे हैं, समर्थकों द्वारा पार्टी कार्यालय में धरना और शक्ति प्रदर्शन के साथ साथ ध्यानाकर्षण के लिए कार्यकर्ताओं द्वारा शीर्षासन तक किया जा रहा है। बड़े नेताओं का घेराव और धक्का मुक्की हो रही है, टिकिट नही मिलने की स्थिती में निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में उतरने की धमकियां दी जा रही हैं और ब्रह्मास्त्र के रुप में बरसों से दबी कुचली आत्मा की आवाज सुनकर दल बदलने की तैयारी हो रही है। नेता टिकिट पाने के लिए तरह तरह के पापड़ बेलने को तैयार हैं। टिकिट खरीदने के लिए मोटी रकम का जुगाड किया जा रहा है, अपने फेवर में आए सर्वे का हवाला दिया जा रहा है, अपने अपने गॉडफादर और गॉड मदर की चरण वंदना की जा रही है और हाई कमान की सिफारिश के लिए कोई मजबूत डोरी खोजी जा रही है।
टिकिटों को लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकिटार्थियों और उनके समर्थकों द्वारा जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह विगत चुनावों की तुलना में काफी ज्यादा है। इसका एक कारण यह भी है कि पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस में सबसे ज्यादा जोर आजमाइश मध्य प्रदेश में हो रही है। दोनों ने जिताऊ उम्मीदवारों को चुनने के चक्कर में कई पुराने नेताओं के टिकिट काटे हैं इसलिए टिकिट कटने वाले उम्मीदवार बौखलाए हुए हैं।
भाजपा ने जहां जहां सिंधिया के साथ दल बदल कर कांग्रेस से आए नेताओं को टिकिट दी है वहां संघ और भाजपा के पुराने लोग बगावत कर रहे हैं और जहां कांग्रेस ने भाजपा से पाला बदलकर आए लोगों को प्राथमिकता दी है वहां पुराने कांग्रेसी बागी हो रहे हैं। इसके अलावा दोनों दलों में कई उप समूह भी हैं, जैसे भाजपा में शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया के उपसमूह हैं तो कांग्रेस में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के कैंप हैं। हर उपसमूह अपने ज्यादा से ज्यादा विधायक चाहता है ताकि जीतने पर मंत्रिमंडल गठन में ज्यादा अहमियत मिल सके। इस वजह से भी बागियों को बड़े नेताओं की शह मिल रही है जिससे वे उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं।
संजय वर्मा
मेरे एक मित्र की रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी। मित्र खुले विचारों के थे और उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी! उन्होंने अपनी पत्नी को प्रोत्साहित किया कि वह व्यापार में उनकी मदद करे।
भाभी जी ने दुकान पर बैठना शुरू किया। पर एक अजीब मुश्किल हो गई। सबसे नजदीकी सार्वजनिक शौचालय एक किलोमीटर दूर था। हर कुछ घंटे में उन्हें दुकान के कर्मचारी की मोटरसाइकिल पर बैठकर वहां तक जाना पड़ता। यह उनके लिए बहुत एंब्रेसिंग था।
कुछ ही महीनों में उन्होंने दुकान जाना बंद कर दिया । एक संभावना खत्म हो गई!
क्लाउडिया गोल्डिन को क्या यह पता है की हम अब तक यह टॉयलेट जैसी बुनियादी समस्या ही हल नहीं कर पाए हैं , उनकी रिसर्च पर क्या बात करें?
भारत में कामकाजी महिलाओं की कम तादाद के लिए टॉयलेट सबसे बड़ी वजह है।
कुछ साल पहले जब मैंने अपनी एक छोटी सी फैक्ट्री शुरू की तो मैं चाहता था मेरी फैक्ट्री में महिलाएं भी काम करें।
संयोग से उस इलाके में बहुत सी महिला मजदूर दूसरे कारखानों में काम करती थीं। जल्दी ही हमारे यहां स्त्री पुरुष अनुपात समान हो गया।
मैं खुश था। महिला मजदूर न गुटखा खाने का ब्रेक लेती थी न सुपरवाइजर से झगड़ा करती थीं। हमारे पुरुष कामगार जल्दी-जल्दी नौकरी छोडक़र चले जाते थे पर महिलाएं टिकी रहती।
मैंने एक दिन अपने सुपरवाइजर पूछा इसकी वजह क्या है? उसने कहा-सर ये महिलाएं हमारे यहां से काम कभी नहीं छोड़ेंगी क्योंकि हमारे यहां टॉयलेट है..!
मैंने कहा वह तो दूसरे कारखानों में भी होता होगा? उसने कहा- नहीं दूसरे कारखानों में महिलाएं पास के किसी खाली प्लाट में जाती हैं , एक घेरा बना लेती हैं, या फिर एक साड़ी को परदे की तरह दो महिलाएं पकड़ कर खड़ी हो जाती हैं और इस तरह काम निपटाया जाता है।
उस दिन मुझे अपने पुरुष होने और एंप्लॉयर बिरादरी का सदस्य होने के नाते बहुत शर्म आई।
इस बात को 15 साल बीत चुके हैं। अब स्थिति बेहतर हुई है । मगर आज भी किसी महिला सिपाही को चौराहे पर खड़ा देखता हूं तो मन में पहला सवाल यही आता है कि इसे टॉयलेट जाना होगा तो ये क्या करेगी?
टॉयलेट नहीं होने की वजह से ज्यादातर महिलाएं पानी नहीं पीती या दबाव को लगातार बर्दाश्त करती हैं। जाहिर है अपनी सेहत की कीमत पर!
मेरी बड़ी इच्छा थी कि मेरे दफ्तर में भी महिला कर्मचारियों को काम पर रखूं। मगर मेरी कोई बड़ी कंपनी नहीं बस एक छोटी सी दुकान थी, वह भी एक ऐसे इलाके में जो थोड़ा शेडी है।
आम दुकानों की तरह मेरी दुकान में भी दिन भर लोग एक दूसरे को गालियां देते थे (मैं शामिल)! 2010 के आसपास मैंने एकाउंटस के लिए एक लडक़ी को काम पर रखा। पर एक नई मुश्किल आने लगी।
हमारे ग्राहक सप्लायर ट्रांसपोर्टर उसे लगातार घूरते रहते। असल में वे अभी तक जिस तरह की दुकानों में जाते थे वहां कोई महिला कर्मचारी नहीं होती थी । बावले गांव में ऊंट आ गया। वे बेवजह उससे बात करने की कोशिश करते।
एक सप्लायर तो इतना ढीठ था कि काम खत्म होने के बाद भी बैठा रहता। मुझे उसे लगभग हकालना पड़ता। कुछ ही समय में वह लडक़ी चली गई।
मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने अपने यहां की भाषा सुधारी, माहौल सुधारा। समय लगा, लेकिन आज मेरे यहां पर चार लड़कियां काम करती हैं जिनमें से एक फैक्ट्री सुपरवाइजर है।
मुझे उन लोगों से चिढ़ है जो लड़कियों को सजी-धजी गुडिय़ा की तरह ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए काम पर रखते हैं या उनसे टेलीकॉलिंग करवाते हैं।
मैं चाहता था मेरी लड़कियां जमीनी काम करें। वे बच्चियां जो कभी किराने का सामान लेने भी अकेले नहीं गई थीं , मैंने उन्हें हौसला दिया ,काम सिखाया।
अब वे हमारे बैंक मैनेजर से बहस करने जाती हैं कि चेक अभी तक खाते में क्रेडिट क्यों नहीं हुआ? ट्रक वालों से भाड़े को लेकर झगड़ती हैं , वकीलों के दफ्तर में जाती हैं, ऑडिट रिपोर्ट बनवाती हैं , लोडिंग रिक्शा में माल लोड करवाती हैं, मजदूरों को तनख्वाह बांटती हैं ।
यह सच है कि इसकी शुरुआत मेरे भीतर के एक्टिविस्ट ने की थी, मगर यह आर्थिक रूप से भी मेरे लिए बहुत फायदेमंद रहा।
लड़कियां बहुत अच्छी एम्पलाई होती हैं। वे चोरी नहीं करती। मक्कारी नहीं करतीं । लंबे समय तक एक ही कंपनी में टिकती हैं। शायद इसलिए क्योंकि उन पर खुद को साबित करने का दबाव लडक़ों के मुकाबले ज्यादा होता है। उन्हें बड़ी मुश्किल से काम करने , बाहर निकलने का जो मौका मिला है वे इसे गंवाना नहीं चाहतीं।
यदि आपकी भी दुकान ऑफिस या कोई कारखाना है तो मेरी आपको सलाह है लड़कियों को काम पर रखिए। बस उन्हें एक साफ टॉयलेट और सुरक्षित माहौल दीजिए फिर देखिए वे आपके लिए क्या कमाल कर दिखाएंगी।
न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका की भूमिका अपने हाथों में नहीं ले सकती है, लेकिन हस्तक्षेप कर सकती है। अदालतें ऐसी जगह बन रही हैं जहां लोग समाज के लिए अभिव्यक्ति को बुलंद आवाज देने के लिए आते हैं। तात्पर्य यह हैं कि न्याय एवं न्याय प्रणाली से टूटता भरोसा लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट की ओर इशारा करता है।
डॉ. लखन चौधरी
भारतीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने विगत दिनों भारतीय न्याय व्यस्था यानि भारतीय कानूनी प्रणाली के बारें में जो बातें कहीं हैं, वह वाकई बहुत गंभीर है। आजादी के 75 सालों में भारतीय न्याय व्यस्था यानि भारतीय कानूनी प्रणाली से आम आदमी वाकई निराश हुआ है। अब तो न्याय की उम्मीद रखना ही एक तरह से बेमानी होती जा रही है। सत्ता, कुर्सी, बड़े एवं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग सही-गलत, उचित-अनुचित, जायज-नाजायज, कानून एवं न्याय आदि की व्याख्याएं अपनी सहूलियत एवं अपने बचाव के हिसाब से करने लगे हैं। ऐसे में आम जनता के लिए न्याय की उम्मीद पालना या न्याय पर भरोसा करना ही निरर्थक सा लगता है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ का कथन है कि ‘इतिहास में लीगल सिस्टम यानि कानूनी प्रणाली का मिसयूज या कहें कि एक तरह से दुरूपयोग हुआ है या अनुचित उपयोग किया गया है। दरअसल में कानूनी प्रणाली अन्याय-भेदभाव के लिए एक तरह से हथियार की तरह होती है लेकिन इसी कानूनी प्रणाली ने हाशिए पर रह-रहे बहुसंख्यक समुदायों को नुकसान पहुंचाने का काम किया है।’
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का कहना है कि लीगल सिस्टम को अक्सर समाज के हाशिए पर रहे समुदायों को दबाने के हथियार के लिए इस्तेमाल किया गया है। अमेरिका में भेदभाव करने वाले कानूनों के बनने से गुलामी प्रथा को बढ़ावा मिला। अमेरिका और भारत दोनों देशों में लंबे समय तक कई समुदायों को वोट डालने का अधिकार नहीं दिया गया। इस तरह कानून का इस्तेमाल ताकतवर संरचना तंत्र को बनाए रखने और भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए किया गया। इसका खामियाजा हाशिए पर रहे समुदायों को लंबे समय तक उठाना पड़ा। समाज में होने वाले भेदभाव और अन्याय को धीरे-धीरे सामान्य माना जाने लगा, जिससे कुछ समुदाय समाज की मुख्य धारा से अलग होते चले गए, इसके चलते हिंसा और बहिष्कार की घटनाएं बढ़ती चली गईं।
ऐसे वक्त में कानूनी प्रणाली ने भी हाशिए पर रह-रहे समुदायों के खिलाफ इतिहास में हुई गलतियों को कायम रखने में अहम भूमिका निभाई। गुलामी की प्रथा के चलते लाखों अफ्रीकन लोगों को अपना देश छोडऩा पड़ा। अमेरिका के स्थानीय लोगों को अपनी जमीन छोडक़र जाना पड़ा। भारत में जाति प्रथा के चलते निचली जातियों के लाखों लोगों को शोषण का शिकार होना पड़ा। महिलाओं और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को दबाया गया। इतिहास अन्याय के ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है। आज अधिकार मिलने के बाद भी महिलाओं के साथ हिंसा हो रही हैं। भारत में आजादी के बाद शोषण सहने वाले समुदायों के लिए कई नीतियां बनाई गईं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रतिनिधित्व के अवसर दिए गए।
हालांकि संवैधानिक अधिकारों के बावजूद समाज में महिलाओं को भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव पर बैन लगने के बाद भी पिछड़े समुदायों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं। सीजेआई ने कहा कि बुरा संविधान भी अच्छा बन सकता है, बशर्ते उसे चलाने वाले अच्छे लोग हों। अंबेडकर कहते थे कि ‘संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर वे लोग खराब निकलें, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाएगा तो संविधान का खराब साबित होना तय है। वहीं, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, अगर जिन लोगों को इसे अमल में लाने की जिम्मेदारी दी गई है, वे अच्छे हैं तो संविधान का अच्छा साबित होना तय है।’ भले ही न्यायाधीशों को जनता नहीं चुनती, लेकिन समाज में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, न्यायपालिका का समाज के विकास में ’स्थिर प्रभाव’ है।
समाज में अदालतों की भूमिका पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा, समाज प्रौद्योगिकी के साथ तेजी से बदल रहा है। भारत बहुलतावादी समाज, न्यायाधीशों का तटस्थ रहना बेहद जरूरी होता है। न्यायाधीशों को ’समय के उतार-चढ़ाव’ से परे रहना चाहिए। भारत जैसे बहुलवादी समाज के संदर्भ में कोर्ट को सभ्यताओं, संस्कृतियों की समग्र स्थिरता में भूमिका निभानी है। सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के हिस्से के रूप में अदालतें नागरिक समाज और सामाजिक परिवर्तन की खोज के बीच जुड़ाव का केंद्र बिंदु बन गई हैं। लोग केवल नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि संवैधानिक परिवर्तन की प्रक्रिया में आवाज उठाने के लिए भी अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं। यद्यपि यह एक जटिल सवाल है कि लोग अदालतों में क्यों आते हैं ? और इसके कई कारण हैं।
दरअसल में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका जज नहीं निभाते हैं, लेकिन लोगों का कोर्ट में आना अदालतों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में शासन की कई संस्थाएं हैं। संविधान में निश्चित रूप से शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत है। न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका की भूमिका अपने हाथों में नहीं ले सकती है, लेकिन हस्तक्षेप कर सकती है। अदालतें ऐसी जगह बन रही हैं जहां लोग समाज के लिए अभिव्यक्ति को बुलंद आवाज देने के लिए आते हैं। तात्पर्य यह हैं कि न्याय एवं न्याय प्रणाली से टूटता भरोसा लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। यदि समय रहते सरकार इस पर गंभीरता से विमर्श नहीं करती है, तो आने वाले दिनों में समाज में अराजकता की स्थिति निर्मित होने को रोक पाना असंभव हो सकता है।
पत्रकारिता का एकमात्र ध्येय सेवा होना चाहिए। समाचारपत्रों के पास बड़ी भारी शक्ति है, लेकिन जिस प्रकार अनियंत्रित बाढ़ का पानी पूरी बस्तियों को डूबा देता है और फसलों को नष्ट कर देता है, इसी प्रकार अनियंत्रित लेखनी की सेवा भी विनाशकारी होती है। यदि उसका नियंत्रण बाहर से किया जाए तो वह नियंत्रणहीनता से भी अधिक अनिष्टकारी सिद्ध होता है। प्रेस का नियंत्रण तभी लाभकारी हो सकता है जब प्रेस उसे स्वयं अपने ऊपर आरोपित करे। अगर यह तर्क सही है तो दुनिया के कितने पत्र इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? लेकिन जो पत्रिकाएं निकम्मी हैं, उन्हें कौन रोके? अच्छाई और बुराई की तरह निकम्मी और उपयोगी भी साथ-साथ चलेंगी और मनुष्य को अपना चुनाव खुद करना होगा।
पत्रकारिता का सही काम लोकमानस को शिक्षित करना है उसे वांछित-अवांछित विचारों से भरना नहीं। इसलिए अखबार में क्या बात देनी है और कब देनी है, इसका निर्णय प्तपत्रकार को अपने विवेक से करना चाहिए।आज स्थिति यह है कि पत्रकार केवल तथ्य देकर संतोष का अनुभव नहीं करते। पत्रकारिता ‘घटनाओं की प्रबुद्ध पूर्व अपेक्षा’ की कला बन गयी है।
-महात्मा गांधी
सिद्धार्थ ताबिश
80-85 साल की उम्र के लोगों को में कहते हुए देखता हूं कि ‘आप कहते हैं कि प्रकृति के बीच जा कर रहो, शहर से दूर.. रहो ज़मीन लेकर.. मगर वहां मेडिकल की सुविधा कैसे मिलेगी?’
मैं सच में समझ नहीं पाता हूं कि 80-85 साल को उम्र में भी मनुष्य ‘बचने’ के बारे में सोचा करता है? इतनी उम्र में पहुंचने के बाद भी उसने मरने की कोई तैयारी ही नहीं की?
और आप अगर अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि जिस व्यक्ति को बड़ी लंबी उम्र तक जीने की लालसा होती है उसके जीवन में कुछ भी ख़ास नहीं होता है.. वही सुबह उठना, खाना खाना, पार्क में जा कर योग करना, हगना और मूतना फिर सो जाना और इस रूटीन को जारी रखने के लिए उसे और 15 साल जीने की इच्छा रहती है.. ये थकते ही नहीं है इस रूटीन से कभी.. दवा खा खा के चलना है किसी तरह.. बस जीते जाना है.. क्यों?
एक उम्र हो जाने पर मरने के लिए तैयार हो जाइए.. क्यों ये सोचना कि जंगल में चले गए और हार्ट अटैक आ गया तो क्या होगा.. कुछ नहीं होगा आप बस मर जायेंगे.. आप परेशान इसलिए हैं क्योंकि आप मरने के लिए तैयार नहीं है.. क्यों इतनी उम्र में मेडिकल सुविधा चाहिए? क्यों नहीं अब इस उम्र में बिना किसी भय के जोखिम में साथ जी सकते हैं आप? कभी सफऱ खत्म करेंगे अपना या बस रास्ते पर चलते ही जाने का जुनून बनाए रहेंगे?
जोखिम ले कर, स्वयं के साथ, प्रकृति पर विश्वास करके अगर आप दो साल भी जी लिए तो आप जान जाएंगे कि असल में जीना कहते किसे हैं और फिर आप मरने के लिए तैयार हो जाएंगे।
आर.के.पालीवाल
देश की बड़ी आबादी भले ही फ्री राशन पर पल रही हो, करोड़ों लोग भले ही गरीबी की भारी रेखा के भार तले दशकों से कराह रहे हों, लेकिन सरकार हमेशा चाक चौबंद, हष्ट-पुष्ट और तंदरुस्त रहती है और हरी भरी दिखती है। केंद्र सरकार ने गांव गांव सरकारी रथ दौड़ाकर पैदल धक्के खाती विरथ जनता को अपनी उपलब्धियों का बखान करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। इसे विकसित भारत संकल्प यात्रा नाम दिया गया है। इस यात्रा को रथों के माध्यम से देश की ढाई लाख़ से अधिक ग्राम पंचायतों में घुमाया जाएगा। अभी तक चकाचक कारों में सवार होने वाले केन्द्र सरकार के बड़े बड़े सरकारी अधिकारी इन सरकारी रथों के प्रभारी बनकर देश की दशों दिशाओं में निकलेंगे। यह एक तरह से पुराने राजा महाराजाओं और चक्रवर्ती सम्राटों के अश्वमेध यज्ञ की तरह है। उसमें राजा के घोड़े अलग अलग दिशाओं में राजा का डंका पीटते हुए निकलते थे, इस योजना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार के रथों पर सवार सरकारी अफसर सरकार के कार्यों का ढिंढोरा पीटने निकलेंगे।
दो-तीन प्रमुख कारणों से केन्द्र सरकार की इस योजना का विरोध हो रहा है। विपक्षी राजनीतिक दल इसलिए इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि नवम्बर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसे में सरकारी अधिकारियों का सरकार के पक्ष मे प्रचार करना आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना जा रहा है। विरोध का दूसरा कारण सरकार के इस सिविल अभियान में भारतीय सेना के अधिकारियों को शामिल करने पर है क्योंकि सेना का परंपरागत कार्य सीमा पर सुरक्षा या बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की आपात स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ही होता रहा है न कि किसी राजनीतिक दल की सरकार की योजनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए।
इस अभियान की जितनी जानकारी अभी तक सामने आई है उसके अनुसार देश के तमाम जिलों में पहुंचने वाले रथों के प्रभारी के रुप में केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के डिप्टी सेक्रेटरी से लेकर ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर के उच्चाधिकारियों की स्पेशल ड्यूटी लगाई जानी है। इस स्तर के अधिकारियों की अक्सर वैसे ही सरकार में काफी कमी रहती है।विभागों की नीतियों के क्रियान्वयन में इन अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है, इसलिए यदि यह अधिकारी लंबे समय तक अपने विभाग के तमाम जरूरी काम छोडक़र सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार का कार्य करेंगे तब केंद्र सरकार के कार्यालयों के जरूरी कार्यों में लंबा व्यवधान होने से सामान्य प्रशासनिक कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। इस दृष्टि से भी सरकार का यह निर्णय दूरदृष्टि से वंचित है। लगता है आनन फानन में पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर यह महत्वाकांक्षी योजना बनी है जिसमें जनहित कम और सत्ताधारी दल का राजनीतिक हित ज्यादा दिखाई देता है। यही कारण है कि कांग्रेस ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और इसकी शिकायत केंद्रीय चुनाव आयोग को भी हो रही है। निकट भविष्य में यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है जो चुनाव पूर्व वर्ष में वोटरों को लुभाने वाली विविध योजनाओं के मामले पर सुनवाई कर रहा है।
वर्तमान सदी इंटरनेट सदी है जहां पलक झपकते कोई भी खबर दुनियां के इस कोने से उस कोने तक पहुंच जाती है। केंद्र सरकार खुद डिजिटल इंडिया पर इतना जोर देती है। ऐसे में सरकारी योजनाओं का रथों से प्रचार पूर्णत: प्रतिगामी कदम है। यह न केवल सरकारी संसाधनों की बरबादी है अपितु उच्चाधिकारियों के समय की भी बरबादी है। वैसे ही सरकार जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई को चुनाव के पहले अंधाधुंध विज्ञापन जारी कर बेरहमी से लुटाती है।अब रथों में अधिकारियों को प्रभारी बनाकर भेजना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगता। यही कारण है कि विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ प्रबुद्ध जन भी इस योजना की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।
सनियारा खान
कहीं पर पढ़ा था कि जब अपनी शक्ति पर ज़्यादा घमंड हो जाए तब अक्सर युद्ध करने का जी करता है। और जब युद्ध खत्म हो जाता है तब उसके परिणाम की घोषणा करने वाला कोई भी इंसान जिंदा नहीं बच पाता है। सिर्फ आम लोग ही नहीं, युद्ध करने वाले सैनिक भी अपने घर परिवार का कोई न कोई सदस्य जरूर खो देते है। तो इस बदला लेने की प्रक्रिया में हर कोई पाने की होड़ में खोता ज्यादा है।
राजा अशोक ने युद्ध और हत्या का वीभत्स रूप देख कर पश्चाताप करते हुए शांति का मार्ग अपनाया था। लेकिन अब अशोक की राह को अपनाने वाले कम ही हैं। अब तो हम प्रगति के शिखर पर बैठ कर भी आदिम पाशविकता की तरफ कुछ ज़्यादा ही आकर्षित होते जा रहे हैं। दो दो विश्व युद्ध के परिणामों को देख कर भी हम सबक नहीं सीख रहे हैं। बस ‘हम ही सब से ताकतवर’ ये आत्ममुग्धता में जीते हुए हम मौत की तरफ जैसे भागे जा रहे हैं।
भारत पाकिस्तान, अमेरिका वियतनाम, इस्लामिक देशों की लड़ाई, इजराइल पेलेस्टाइन,रशिया यूक्रेन सभी मुल्क युद्ध के साए में जी ही रहे हैं। अब हमास ने इजराइल पर बर्बर हमला कर दिया। प्रतिक्रिया स्वरूप इजराइल भी तो पलट कर बर्बर हमला ही कर रहा है। चाहे यूएन में सभी देश एकजुट होकर आतंक के खिलाफ कितनी भी बड़ी बड़ी बातें करे.... युद्ध हो कर ही रहता है। आपसी रिश्तों को देख कर या फिर आगे पीछे का नफा नुकसान देख कर जिनको जो सही लगता है उन्हीं के साथ हो लेते हैं या अलग हो जाते हैं। इंसानियत की जगह इन सभी के बीच एक तरह से आपसी सौदा होना कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
ये भी कटु सत्य है कि हथियार खरीदने बेचने वाले देश कभी नहीं चाहेंगे कि युद्ध बंद हो। अमेरिका और चीन जैसे हथियारों के सौदागरों के लिए ये अच्छी बात नहीं होगी। अगर दुनिया में सब से प्रख्यात माने जाने वाला मोसाद को धोखे में रख कर उसकी नाक के नीचे से इतना बड़ा आतंकी हमला किया जा सकता है तो फिर बाकी एजेंसियों को क्या ही कहें! अब तो विश्व का कोई भी देश सीना तान कर ये नहीं कह सकता हैं कि उसे कोई डर नहीं है चाहे कितना भी शक्तिशाली देश हो तो भी नहीं। साथ-साथ ये बात भी सच है कि दूध का धुला हुआ कोई भी नहीं है।
हर देश ने नफरत के लिए जगह बचा कर रखी है। ये नफऱत ही धीरे धीरे युद्ध में रूपांतरित हो जाती है। हिरोशिमा मानव इतिहास का एक बेहद कलंकित अध्याय है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतने सालों में भी छोटे बड़े कितने युद्ध होते ही रहे हैं। विश्व भर में शांति स्थापना करने के उद्देश्य से ही राष्ट्र संघ गठन किया गया था। लेकिन पिछले 75 सालों से राष्ट्र संघ किसी भी लड़ाई को रोक नहीं पाया। पहले की वियतनाम और अमेरिका की लड़ाई, इराक ईरान की लड़ाई, रवांडा और बोस्निया में गृह युद्ध के साथ साथ व्यापक नर संहार के समय भी राष्ट्र संघ कमजोर दर्शक बना रहा। बहुत से मानवाधिकार कर्मी भी राष्ट्र संघ को ले कर हताश है।
मलेशिया के भूत पूर्व प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने भी पेलेस्टाईन और इजरायल के बीच इस हद तक बात बिगडऩे के लिए राष्ट्र संघ को ही दोषी ठहराया। यही नहीं यूक्रेन की राष्ट्रपति जेलेनेस्की का भी कहना है कि राष्ट्र संघ में गलत लोगों की राजनैतिक आधिपत्य हो गया है। कई विशेषज्ञ भी यही मानते हैं कि अमेरिका,चीन, रशिया, ब्रिटेन और फ्रांस की विशेषाधिकार ताकत के सामने राष्ट्र संघ चाह कर भी अपनी मजऱ्ी से कुछ कर नहीं सकता है।
इतना सब कुछ होने के बाद फिर गांधी जी को ही याद करना जरूरी हो जाता है। क्यों कि उन्होने ही समझाया था कि हथियार की जगह शांति वार्ता से हल निकालने की कोशिश होनी चाहिए। अगर हथियार से समस्याएं सुलझा सकते होते तो अब तक विश्व की हर जगह शांति ही शांति होती। अफगानिस्तान कहे या इराक में ताकतवर हो कर भी अमेरिका कामयाब नही हो पाया। तो अब एक बार युद्ध की जगह शांति को तरजीह देकर हमें देखना चाहिए कि युद्ध से शांति को पाया जा सकता है या फिर शांति से युद्ध को हराया जा सकता है! तृतीय विश्व युद्ध शुरू होने से पहले ही इस दिशा में हम सब आगे बढ़ पाए तो शायद विश्व बच जाए।
इजराइली लेखक युवाल नोआ हरारी को सुना जाए तो हर देश के लिए ये जरूरी है कि आतंकी गतिविधियों को खत्म करने के साथ साथ ये भी ध्यान रखा जाए कि आम लोगों को एक बेखौफ और सुकून का माहौल दे सके। हालाकि उम्मीद बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक शिकागो में एक मकान मालिक ने अपनी किरायेदार महिला और उसके छ: साल के बेटे पर इसलिए हमला कर दिया कि वे फिलीस्तीनी मूल के मुसलमान थे। महिला को उसने चाकू से दर्जन भर वार किए और बच्चे को 26 बार गोदा। बच्चे की मौत हो गई और मां अस्पताल में है।
समझ में नहीं आ रहा है कि कौन कितना ज़्यादा हिंसक या कम हिंसक है, इसे नापने का कोई पैमाना भी है क्या! अन्त में साहिर लुधियानवी जी की बात याद आ रही है.....
जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी.....
दिनेश आकुला
एक उच्च दांव वाले राजनीतिक खेल में, हाइपरलोकल रणनीति कांग्रेस की आस पास की तश्तरी हो सकती है, एक सूत्र जिसे छत्तीसगढ़ में अपनी मौजूदगी को पुनर्जीवित करने और पुनर्निर्माण करने के लिए बना सकता है।
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक दृष्टिकोण में, कांग्रेस पार्टी समय के साथ एक जटिल स्थिति में है। इसे अन्याय-अवकाश के बढ़ते संकेत और भाजपा में एक महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी का सामना करना है, इस दिग्गज पार्टी को रणनीतिक मेकओवर की बहुत जरुरत है। अपनी शासनाद्वितीयता को बनाए रखने और शक्ति पुन: प्राप्त करने के लिए, कांग्रेस को आगामी चुनावों के लिए ‘हाइपरलोकल’ दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है।
हाइपरलोकल प्रचार
हाइपरलोकल रणनीति का पहला और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि प्रत्येक विधानसभा संसदीय क्षेत्र में एक संघर्ष कक्ष की स्थापना होनी चाहिए। इस कदम से पारंपरिक प्रचार दृष्टिकोण से बाहर निकलकर नीचे की ओर जाने की आवश्यकता को जोर दिया गया है।
कांग्रेस के प्रावधान में मतदाताओं की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने और पार्टी की संभावनाओं को मजबूत करने के लिए हर सौ मतदाताओं के लिए एक प्रभारी की नियुक्ति करनी चाहिए। उनकी प्रमुख जिम्मेदारी यह होगी कि मतदाताओं को गति दी जाए और सुनिश्चित किया जाए कि चुनावी मतदान का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस पार्टी के साथ खड़ा हो। प्रभावी तौर पर, इससे कांग्रेस के पैर के सैनिकों का मतलब है कि राज्य के हर कोने-कोने के दरवाजों पर डूंघते हुए द्विलक्ष प्रम स्रद्गस्रद्बष्ड्डह्लद्गस्र श्चड्डह्म्ह्ल4 2शह्म्द्मद्गह्म्ह्य की एक सेना होगी। इसका यह प्राप्ति करने के लिए एक डेटाबेस बनाने का एक समग्र प्रयास है, जिसमें छत्तीसगढ़ के हर परिवार की राजनीतिक धारणाओं को दर्ज करने का प्रयास है।
भाजपा: प्रमुख प्रतिद्वंद्वी
राजनीतिक युद्ध के दृष्टिकोण को समझना महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के लिए यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। यह स्वीकृति महत्वपूर्ण है क्योंकि 7 और 17 नवंबर को आने वाले हैं, तो यह अधिकांश अन्याय-अवकाश के भावना को बड़े से बड़े खंडन करने के रूप में खुलकर नहीं बाटने की संभावना है। कांग्रेस से वोट की किसी भी शिफ्ट का अर्थ है कि भाजपा को ही इसका लाभ होगा। चुनावी गणना की जटिलताओं के तंतु में, मिलकर योजना बनाने की महत्वपूर्ण मांग को जोर दिया जा रहा है।
मतदाताओं की श्रेणिकरण
हाइपरलोकल रणनीति को प्रभावी ढंग से पूर्ण करने के लिए, कांग्रेस को हर संसदीय क्षेत्र में मतदाताओं को तीन विशिष्ट श्रेणियों में विभाजित करनी चाहिए- ए, बी, और सी।
श्रेणी ्र: कांग्रेस के समर्थन को अखंड रूप से देने वाले मतदाता।
श्रेणी क्च: वोट करने या न करने के मतदाता को सम्मिलित करता है और राजकीय पार्टी के खिलाफ अवकाश के कारण आपत्ति रख सकता है।
श्रेणी ष्ट: उन्हें विपक्ष के लिए मतदान करने का निश्चित रूप से इरादा है।
सफलता की कुंजी इस बात में है कि श्रेणी क्च के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा श्रेणी ्र में स्थानांतरित किया जाए। इसमें मतदाताओं की व्यक्तिगत परिस्थितियों में प्रवेश करने और उनके समस्याओं का समाधान करने की एक न्यायिक दृष्टिकोण शामिल है। उदाहरण के लिए, कांग्रेस को यह पहचानने की आवश्यकता है कि क्या किसी परिवार को सरकारी भलाइयों का लाभ है या क्या वहां सेवा वितरण में कोई कमी है जिसका सुधारणा चाहिए। यह एक बात की जांच की जरूरत है जिसके लिए हर मतदाता के लिए एक विशिष्ट दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
युवा कारक
एक महत्वपूर्ण जनवर्ग जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, विशेष रूप से 18 से 35 वर्ष की आयु के व्यक्ति हैं। हालांकि, इसे ध्यान में रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह समूह होमोजेनस नहीं है। जो युवा मुख्य शहरों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाते हैं, वे अधिक संभावना से कांग्रेस की ओर मोड़ सकते हैं। विपरीत रूप से, युवा जो सरकारी क्षेत्र में रोजगार पर निरंतरता कर रहे थे और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में हुए गड़बड़ से निराश हो गए हैं, वे मतदान कक्ष में अपनी भडक़ी हुई आवाज़ प्रकट करने की संभावना हैं।
निष्कर्षण
हाइपरलोकल रणनीति बस किसी चुनाव प्रक्रिया का एक संगठनिक तरीका नहीं है; यह वोटर भावना के व्यक्तिगत विवरण को समझने और उनके साथ गहरे से जुडऩे का एक समग्र दृष्टिकोण है। यह मानता है कि छत्तीसगढ़ के लिए युद्ध बड़े अवलोकन के बारे में ही नहीं है, बल्कि वोटर भावना की जटिल विवरणों के बारे में है। कांग्रेस पार्टी जब छत्तीसगढ़ में अपनी शासनाद्वितीयता को बनाए रखने और पुन: शक्ति प्राप्त करने का प्रयास कर रही है, तो इसे इस हाइपरलोकल मंत्र को अपनाने की आवश्यकता है।
युद्ध कक्ष स्थापित करके, मतदाताओं को श्रेणिबद्ध करके, और युवाओं की समस्याओं का समाधान करके, कांग्रेस अन्याय-अवकाश को प्रो-अवकाश लहर में परिवर्तित करके राज्य के राजनीतिक दृष्टिकोण में फिर से अपनी जगह सुनिश्चित कर सकती है।
एक उच्च दांव वाले राजनीतिक खेल में, हाइपरलोकल रणनीति कांग्रेस की आस पास की तश्तरी हो सकती है, एक सूत्र जिसे छत्तीसगढ़ में अपनी मौजूदगी को पुनर्जीवित करने और पुनर्निर्माण करने के लिए बना सकता है।
- विष्णु नागर
आपने शायद कभी जैली फिश देखी हो, उसके बारे में कुछ जानते हों। गूगल ज्ञान के अनुसार वह भारत सहित दुनिया में सब जगह पाई जाती है। कोई सब जगह पाया जाए, अपनी ईश्वरीयता का बोध कराए तो उससे सावधान हो जाना चाहिए। कुछ तो बड़ी गड़बड़ी है उसमें।इस मछली ने युगों-युगों से जो अब हमारे शासकों की भी विशेषता बन चुकी है न कभी दिल का झंझट पाला, न दिमाग का। न आंखों से वास्ता रखा, न रीढ़ की हड्डी से। और तो और, उसका वास्ता तो शरीर में अमूमन पाए जाने वाले खून से भी नहीं रहा। वह 95 प्रतिशत तक पानी और केवल पानी है, महज पांच प्रतिशत शेष जो भी है, इसलिए मछली है।
ऐसी मछली हो या आदमी, बेहद सुखी होते हैं। सभी प्रकार की आपदाओं-विपदाओं से मुक्त होते हैं। इन्हें कष्ट केवल इतना होता है कि शिकार सामने आ जाए तो उसे जहरीला डंक मारकर गपागप निगल जाना होता है। इतना कष्ट तो बड़े- बड़े सम्राटों को भी युगों-युगों तक करना पड़ा है। इक्कीसवीं सदी के दो दशक से अधिक बीत गए,तकनालाजी का इतना विकास हो चुका है मगर आजतक भी आज के सम्राटों को भी इससे मुक्ति नहीं मिली है!
शिकार को डंक मार कर बेहोश करके ही आदिम पद्धति से खाना-निगलना पड़ता है।इससे उनका भी बचाव नहीं और उन्होंने इसकी कामना भी नहीं की! भगवान नामक कुछ होता है वह यह तकलीफ नहीं उठाते तो उनकी तरफ से हमें यह कष्ट करना पड़ता है। उन्हें चढ़ाया माल स्वयं ग्रहण करना पड़ता है! यह कष्ट मुझ जैसे नास्तिक को भी झेलना पड़ता है। इसके लिए मुंह को कष्ट देना पड़ता है। दांतों और आंतों को इसके लिए मनाना पड़ता है!
यह तकलीफ़ हमें इस कारण भोगनी पड़ती है कि हमारा दिल है और दिमाग भी। शरीर में खून भी है और अंतत: दिल चाहे न चाहे, दिमाग माने न माने, हमें मरना भी पड़ता है जबकि बताते हैं कि जैली फिश की कुछ प्रजातियों को तो मरने का कष्ट भी नहीं उठाना पड़ता! यह शरीर में 95 तक पानी होने का यह कमाल है!
ऐसा सुखी-संतुष्ट जीव ही अजर-अमर होने की सभी अर्हताएं रखते हैं। पृथ्वी का सबसे पुराना जीव होने का गौरव पाते हैं। डायनोसर से भी पुराने माने जाते हैं, सात-आठ करोड़ वर्ष पुराने ! भारी-भरकम डायनोसर तो फिर भी विलुप्त हो गए मगर 95 फीसदी पानी वाली जैली फिश करोड़ों वर्षों से दनादना रही है। प्राचीनता का भार सहज ही उठा रही है और देखिए इस‘महानता’ पर वह जरा भी इतराती नहीं!
और हमारे जैसे संकीर्ण लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि मनुष्य हो या कोई और जीव, अगर उसके पास दिमाग है , दिल है, रीढ़ की हड्डी है और आंखें हैं तो देश के सबसे बड़ी तोप को भी, जंगल की सारी जड़ी-बूटियां खाकर भी, समस्त योग-भोग करके भी, अपने को जवान समझकर भी, आज नहीं तो कल बुढ़ापे से तंग होना ही पड़ता है, बीमारियों से मुठभेड़ करनी ही पड़ती है! वह कितना ही अपने को अजर-अमर समझे, इसके लिए कितना भी कुछ करता रहे, मंदिर-मंदिर, जय श्री राम, जय श्री राम करता रहे, कैलाश पर्वत पर फोटो खिंचवाता रहे, तो भी एक न एक दिन, किसी न किसी बहाने उसका भी हमारी तरह आखिरी हिसाब होकर रहता है!
संभव है कि दुनिया के बाकी देशों में ऐसी केवल मछलियां पाई जाती हों। हमारे यहां ऐसे मनुष्य अधिक पाए जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में तो एक्सपोर्ट क्वालिटी के बहुत ही ज्यादा हैं! कुछ तो डायनासोर हो चुके हैं मगर इनमें भी केवल पानी ही पानी है। खून का एक कतरा तक नहीं। चूंकि ये राक्षसाकार हैं, जैली फिश के आकार के नहीं, इसलिए झूठ भी खूब आराम से बोलते हैं। दिल की बात करके दिल न होने की गवाही देते रहते हैं। कदम-कदम पर बिन मांगे, दिमाग की अनुपस्थिति के प्रमाण देते रहते हैं। खून क्या होता है,वे यह जानकर भी नहीं जानते। केवल सत्ता के पानी को जानते हैं और उसी नशे में दिन- रात डूबे रहते हैं। आज का अखबार देखिए। आज भी इसका सबूत आपको मिलेगा।
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की गंभीर शिकायत करते हुए एक कारोबारी ने संसदीय समिति को ‘हलफनामा’ भेजा है।
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा का नाम बीते पांच दिनों से मीडिया की सुर्खियों में छाया हुआ है।
ये सब कुछ शुरू हुआ बीते रविवार से जब महुआ मोइत्रा पर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया है कि वह हीरानंदानी समूह के सीईओ दर्शन हीरानंदानी से ‘कैश और महँगे तोहफों लेकर’ संसद में सवाल पूछती हैं, और उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला से महुआ मोइत्रा को निलंबित करने की माँग की।
शुक्रवार को मामला तब और गरम हो गया जब संसद की एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष विनोद सोनकर ने टीवी चैनल एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में इस बात की पुष्टि की कि उन्हें ‘दर्शन हीरानंदानी का एक हलफनामा मिला है और जरूरत पडऩे पर महुआ मोइत्रा को तलब किया जा सकता है।’
यहाँ यह बताना जरूरी है कि अभी कुछ महीनों पहले अदानी समूह ने एनडीटीवी का अधिग्रहण किया है। महुआ मोइत्रा ने इन आरोपों को झूठा बताया है और कहा है कि वो अपना जवाब जाँच समिति को देंगी। बीबीसी ने महुआ मोइत्रा से इस मामले पर उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया।
मोइत्रा ने एक मैसेज के जरिए बीबीसी से इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने ‘झूठी, दुर्भावना से प्रेरित रिपोर्टिंग’ का आरोप लगाते हुए 15 मीडिया कंपनियों को कानूनी नोटिस भेजा है।
स्पीकर को लिखी निशिकांत दुबे की चि_ी में आरोप लगाया गया है कि ‘महुआ मोइत्रा को हीरानंदानी ग्रुप के सीईओ दर्शन हीरानंदानी ने पैसे और मंहगे गिफ्ट दिए और इसके बदले में महुआ ने उनके सवाल संसद में पूछे।’
चार पन्ने जिन्हें ‘हलफऩामा’ बताया जा रहा है
सोशल मीडिया पर अंग्रेजी में लिखे चार पन्ने सर्कुलेट हो रहे हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि वह दर्शन हीरानंदानी का ‘हलफनामा’ है उनमें मोइत्रा पर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
सोशल मीडिया पर जो दस्तावेज पढ़ा जा सकता है उसमें लिखा गया है कि महुआ मोइत्रा ने संसद की वेबसाइट के लॉगइन और पासवर्ड दर्शन हीरानंदानी को दिए थे, जिसके ज़रिए वे महुआ की ओर से सवाल लिखते थे जिनका जवाब संबंधित मंत्रालयों से माँगा जाता था।
एनडीटीवी से एक्सक्लूसिव बातचीत में एथिक्स कमेटी के अध्यक्ष ने कहा है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की शिकायत पर 26 अक्तूबर को सुनवाई होगी। विनोद सोनकर ने यह भी कहा कि दुबे से सबूत पेश करने को कहा गया है।
सोशल मीडिया और मीडिया में चल रही बयानबाजिय़ों में कई किरदार शामिल हैं और जितने किरदार हैं उतनी ही ज़्यादा परतें हैं।
ये मामला शुरू कैसे हुआ और अभी क्या कुछ हो रहा है इसे पूरी तरह समझने के लिए उन किरदारों के साथ ये विवाद समझना ज़रूरी है।
यह सब कुछ शुरू कैसे हुआ
रविवार को निशिकांत दुबे ने महुआ मोइत्रा पर पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का आरोप लगाया और उनके खिलाफ संसद के स्पीकर से जांच कर उन्हें सस्पेंड करने की अपील की।
निशिकांत दुबे ने ये आरोप सुप्रीम कोर्ट के वकील जय अनंत देहाद्रइ की शिकायत पर लगाए हैं।
जय अनंत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ये बात मानी है कि उनकी शिकायत पर निशिकांत दुबे ने ये आरोप लगाया है।
इन आरोपों का जवाब देते हुए महुआ ने एक्स पर कई पोस्ट किए हैं।
रविवार को महुआ ने एक्स पर लिखा, ‘फर्जी डिग्रीवाले और बीजेपी के कई लोगों के खिलाफ कई विशेषाधिकारों के उल्लंघन का मामला लंबित है। स्पीकर मामलों पर कार्यवाही समाप्त करने के तुरंत बाद मेरे खिलाफ जाँच शुरू करें, मैं भी उस जांच का स्वागत करूँगी। साथ ही, इंतजार है कि ईडी भी मेरे दरवाजे पर आने से पहले अदानी कोयला घोटाले में एफआईआर दर्ज करेगी।’
कौन हैं जय अनंत देहाद्राइ?
सबसे पहले जानते हैं कि वो शख्स कौन है जिनकी शिकायत निशिकांत दुबे की चि_ी का आधार है यानी जिनके इनपुट पर ये पूरा मामला शुरू हुआ।
महुआ मोइत्रा ने जय अनंत देहाद्राइ को ‘जिल्टेड एक्स’ यानी निराश पूर्व प्रेमी कहा है।
जय अनंत की उम्र 35 साल है। जय अनंत की लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के अनुसार वो सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और उन्होंने पूर्व एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एएनएस नाडकर्णी के चैंबर में काम किया है।
वह अब अपनी प्रैक्टिस चलाते हैं जिसका नाम है- लॉ चैंबर्स ऑफ जय अनंत देहद्राइ। उन्होंने अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया से एलएलएम की पढ़ाई की है।
वह टाईम्स ऑफ इंडिया में ‘द इर्ररेवरेंट लॉयर’नाम से अपने लेख भी लिखते रहे हैं।
उनके सोशल मीडिया अकाउंट एक्स को हमने खंगाला तो जय अनंत की कई तस्वीरें महुआ मोइत्रा के पालतू कुत्ते हेनरी के साथ मिलीं।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि हेनरी को अपने पास रखने के लिए महुआ मोइत्रा और जय अनंत के बीच विवाद चल रहा है।
जय अनंत की एक्स फ़ीड बताती है कि वह राजनीतिक मुद्दे पर अपनी राय रखने में जरा भी नहीं हिचकते हैं।
अपने ट्वीट में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को एक दूरदर्शी नेता बताया है तो एक ट्वीट में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को फर्जी हस्ताक्षर विवाद मामले में ‘बेशर्म’ कहा है।
हीरानंदानी का ‘हलफनामा’ क्या है
रविवार को जब ये आरोप सामने आए तो उसके एक दिन बाद हीरानंदानी ग्रुप ने बयान जारी कर बीजेपी सांसद के ‘आरोपों को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए बेबुनियाद’ बताया।
लेकिन गुरुवार को दुबई में रहने वाले दर्शन हीरानंदानी के एक ‘हलफनामे’ की चर्चा शुरू हो गई जिसकी पुष्टि शुक्रवार को एथिक्स कमेटी के प्रमुख ने की।
महुआ मोइत्रा ने इन आरोपों पर जवाब देते हुए कहा है कि ये पूरा ‘हलफनामा’ ही ‘मजाक’ है, और इसका ड्राफ्ट ‘पीएमओ में तैयार किया गया है।’
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक हीरानंनदानी ग्रुप के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन विभाग ने इस इस दस्तावेज को मीडिया में जारी किया है। लेकिन बीबीसी इस दस्तावेज के प्रामाणिक ‘हलफनामा’ होने की पुष्टि नहीं कर सका है।
अदानी कनेक्शन क्या है
जिन पन्नों को ‘हलफनामा’ बताया जा रहा है उनमें दर्शन हीरानंदानी ने कहा है, ‘जब मैंने मोइत्रा को अदानी ग्रुप पर सवालों का पहला सेट संसद में पूछने के लिए दिया तो उन सवालों पर उन्हें विपक्ष और मीडिया के एक वर्ग से खूब समर्थन मिला। इसके बाद उन्होंने (महुआ मोइत्रा ने) मुझसे कहा कि मैं उन्हें अदानी ग्रुप के खिलाफ सवाल पूछने में मदद करता रहूँ। इसके लिए उन्होंने मुझे संसद का अपना लॉगइन और पार्सवर्ड भी दे दिया ताकि मैं सीधे महुआ मोइत्रा की ओर से सवाल पोस्ट कर सकूँ।’
इन्हीं पन्नों में दर्शन हीरानंदानी ने कुछ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर भी आरोप लगाया है कि वो महुआ मोइत्रा के संपर्क में थे और महुआ इन पत्रकारों से लगातार बातचीत करती रहती थी।
किसी सांसद और पत्रकारों के एक-दूसरे के संपर्क में रहने की बात में क्या अनैतिक या अनुचित है, या संपर्क में रहकर क्या किया गया, इन सबका इसमें कोई जिक्र नहीं है।
इन पन्नों में लिखा है, ‘अदानी समूह पर संसद में सवाल पूछने के लिए वह कई लोगों जैसे सुचेता दलाल, शार्दुल श्रॉफ और पल्लवी श्रॉफ से मदद लेती थीं। ये लोग महुआ को अप्रमाणिक जानकारियां देते थे। राहुल गांधी भी उन्हें अदानी समूह पर संसद में सवाल पूछने में मदद करते थे। महुआ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों फाइनेंशियल टाइम्स, द न्यूयॉर्क टाईम्स और बीबीसी के पत्रकारों से भी अक्सर बातचीत करती रहती थीं।’
अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों का केवल जिक्र भर है, लेकिन कहीं कोई तथ्य, नाम, प्रमाण, विवरण या सबूत नहीं दिए गए हैं, पत्रकारों के सांसद से बातचीत करने को अनूठी घटना की तरह बताया गया है।
सुचेता दलाल वरिष्ठ बिजनेस पत्रकार हैं और वे हर्षद मेहता घोटाले सहित कई बड़े स्कैम को उजागर कर चुकी हैं, उन्होंने इस मामले में उनका नाम शामिल करने पर ट्वीट किया है।
सुचेता ने लिखा, ‘मैं महुआ मोइत्रा को निजी रूप से नहीं जानती हूँ। मैंने उनके ट्वीट कभी रिट्वीट किए होंगे। मैं पल्लवी श्रॉफ को भी नहीं जानती, बहुत पहले मैं शार्दुल श्रॉफ को जानती थी। मैं चुनौती देती हूं कि कोई भी मेरे और उनके बीच कोई लिंक साबित करे।’
एक दूसरे ट्वीट में सुचेता दलाल ने 27 फरवरी, 2023 को लिखी गई अपनी रिपोर्ट का हवाला दिया है। ये रिपोर्ट एस्सार समूह के कर्ज को माफ किए जाने को लेकर है।
सुचेता दलाल ने इस रिपोर्ट को जब ट्विटर पर शेयर किया था तो महुआ मोइत्रा ने इस पर कमेंट करते हुए लिखा था, ‘सुचेता रिपोर्ट की जानकारी मेरे साथ शेयर करें।’
इसके बारे में जानकारी देते सुचेता ने शुक्रवार को लिखा, ‘महुआ मोइत्रा के जानकारी मांगने के बावजूद मैंने इससे जुड़ी जानकारी उनसे साझा नहीं की।’
महुआ मोइत्रा ने अब तक क्या कहा है
रविवार से लेकर गुरुवार तक, हर दिन इस मामले में एक के बाद एक आरोप सामने आ रहे हैं। महुआ मोइत्रा जो संसद में बेबाक तरीके से सवाल पूछने के लिए जानी जाती हैं।
महुआ उन चंद सांसदों में शामिल हैं जो गौतम अदानी की कंपनी अदानी समूह से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं पर मुखर होकर सवाल पूछती हैं।
इस पूरे विवाद पर महुआ मोइत्रा ने दावा किया है कि ‘बीजेपी चाहती है कि वो किसी तरह मुझे लोकसभा से निलंबित कर दे और अदानी पर मेरे सवालों को लेकर मेरा मुंह बंद कर दे।’
हीरानंदानी समूह का जवाब आने के बाद महुआ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर विस्तृत बयान जारी किया है।
महुआ ने लिखा है, ‘तीन दिन पहले हीरानंदानी समूह ने प्रेस रिलीज़ जारी कर कहा था कि उनके खिलाफ आरोप बेबुनियाद हैं। आज उन्होंने आरोपों पर सहमति जताते हुए हलफऩामा दायर कर दिया। ये हलफनामा एक सादे सफेद कागज पर लिखा है, जिस पर समूह का लेटरहेड भी नहीं है। बयान के आखिर में एक हस्ताक्षर है और ये भी नहीं दर्ज है कि हलफनामा कहां पर और किस वक्त लिखा गया है।’
आम तौर पर इस तरह के कानूनी और आधिकारिक दस्तावेज कंपनी के लेटरहेड पर लिखे जाते हैं और उनके आखिर में लिखने वाले का नाम, हस्ताक्षर, लिखने वाले का पता या ईमेल और कंपनी की आधिकारिक मुहर होती है।
अदानी समूह ने भी इस मामले पर बयान जारी किया है।
बयान में कहा गया है, ‘सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील जय अनंत ने सीबीआई को भेजी गई शिकायत में ये बताया है कि कैसे सांसद महुआ मोइत्रा और हीरानंदानी ग्रुप के सीईओ दर्शन हीरानंदानी ने मिलकर एक आपराधिक साजिश के तहत अदानी ग्रुप और गौतम अदानी को निशाना बनाया। ये शिकायत हमारे 9 अक्टूबर को जारी किए गए बयान को सही साबित करता है कि कुछ समूह और लोग हमारे नाम और साख को नुकसान पहुंचाने के लिए ओवरटाइम काम कर रहे हैं।’
महुआ मोइत्रा ने सीबीआई जाँच की मांग पर कहा है, ‘मेरे खिलाफ कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस में सीबीआई की जाँच का स्वागत है, लेकिन उससे पहले सीबीआई को अदानी के ऑफशोर मनी ट्रेल, बिलिंग, बेनामी खातों की जाँच पूरी करनी चाहिए और इसके तुरंत बाद मेरी जाँच करें।’
कांग्रेस नेता अधीरंजन चौधरी ने कहा कि सरकार एक खास व्यक्ति या एक ख़ास उद्योगपति के कारण मुश्किलों का सामना कर रही है।
‘सरकार एक विशेष उद्योगपति को बचाने के लिए इतना तत्पर क्यों है, कोई भी अगर ये सवाल पूछता है तो हो सकता है कि उसे देश का दुश्मन बता दिया जाए। खुद राहुल गांधी ने जब एक विशेष उद्योगपति के मुनाफे पर सवाल खड़ा किया तो उन पर भी कार्रवाई की गई। मैंने इस तरह एथिक्स कमेटी बनाकर आनन फानन में जांच शुरू करने का मामला मैंने कभी नहीं देखा है।’
शिवसेना (यूबीटी) के नेता अरविंद सावंत ने कहा, ‘अगर आपमें (बीजेपी) में साहस है तो उनसे लडि़ए। वो एक शेरनी है। संसद में वो खुलकर बोलती हैं। ये सत्तारूढ़ी पार्टी को लगता है। उसका जवाब देने के लिए उनके पास कुछ नहीं है। इसीलिए अब वे चरित्र हनन पर उतर आए हैं। मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं।’
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा, ‘पैसे लेकर सवाल पूछे जाते हैं और महुआ मोइत्रा के ऊपर ऐसे आरोप लगे हैं। इससे पहले भी एक स्टिंग आपरेशन हुआ था जिसमें कई सांसदों के नाम आए थे। अगर महुआ ने ऐसा कुछ किया है तो उनपर कार्रवाई होनी चाहिए।’ (bbc.com/hindi)
-सीटू तिवारी
पटना यूनिवर्सिटी की पहचान आज़ादी के बाद कुछ दशकों तक भारत के प्रमुख शैक्षणिक केंद्र के तौर पर होती रही।
साल 1917 में पटना में गंगा नदी के तट पर इस यूनिवर्सिटी के कैम्पस का निर्माण हुआ था। उस दौर में यह विश्वविद्यालय न केवल बिहार (संयुक्त बिहार में झारखंड भी शामिल था) बल्कि ओडिशा और नेपाल तक के प्रतिभाशाली छात्रों का अड्डा माना जाता था।
दुनिया के पहले गणतंत्र वैशाली से निकटता के चलते राजनीतिक तौर पर भी यह विश्वविद्यालय राजनीतिक हलचलों का केंद्र रहा। इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1974 के छात्र आंदोलन में दिखी थी।
इस आंदोलन से ही लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे छात्रों ने राजनीति में कदम रखा।
पटना यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले छात्रों के लिए बने हॉस्टलों की भी अपनी पहचान रही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में यूनिवर्सिटी की शैक्षणिक पहचान भी गिरावट की ओर है। हॉस्टल की व्यवस्थाओं को लेकर लगातार निराशाजनक खबरें आती रही हैं।
अभी कुछ महीने पहले ही पटना कॉलेज के इकबाल और जैक्सन हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के बीच बमबाजी की खबर आई थी। यह घटना इस साल जुलाई की है। इसके तुरंत बाद पटना यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पटना कॉलेज के तीनों हॉस्टलों को खाली करवाकर उन्हें सील कर दिया था।
यूनिवर्सिटी प्रशासन के इस कदम ने उन छात्रों के लिए मुसीबत पैदा कर दी जिन्हें हॉस्टल में जगह मिली हुई थी।
ऐसे में यूनिवर्सिटी प्रशासन और छात्रों के बीच एक बैठक हुई। इसमें पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रो तरुण कुमार भी मौजूद रहे।
प्रो तरुण कुमार ने बीबीसी को बताया, ‘प्रशासन की ओर से बैठक में प्रस्ताव रखा गया था कि मिंटो, जैक्सन और इकबाल हॉस्टल (पटना कॉलेज के हॉस्टल) का नाम बदलकर हॉस्टल संख्या 1, 2 और 3 कर दिया जाए। इसके साथ जातीय और धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर हॉस्टल आबंटित किए जाएँ। यानी हॉस्टल 1 (मिंटो) किसी भी जाति और धर्म के छात्रों को एलॉट हो। लेकिन छात्रों ने यह मानने से इनकार कर दिया।’
जातीय और धार्मिक लड़ाई का अड्डा बने हॉस्टल
दरअसल पटना यूनिवर्सिटी के कुछ हॉस्टलों में बीते कई दशकों से छात्रों को जाति और धार्मिक पहचान के आधार पर जगह मिलती रही है। हालाँकि विश्वविद्यालय प्रशासन इससे इनकार करता है। इनमें 1917 में स्थापित पटना यूनिवर्सिटी के पटना कॉलेज और बीएन कॉलेज के हॉस्टल शामिल हैं।
ये ऐसी परंपरा बन गई है जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन चाह कर भी नहीं तोड़ पा रहा है। इसकी वजह यह है कि ऐसी किसी पहल को छात्रों का समर्थन नहीं मिलता है।
पटना यूनिवर्सिटी में कुल 25 हॉस्टल हैं। इनमें करीब एक हजार छात्र -छात्राएँ रहते हैं। इनमें से पटना कॉलेज में तीन, साइंस कॉलेज में पाँच, मगध महिला कॉलेज में तीन और लॉ कॉलेज में एक हॉस्टल है।
इसके साथ ही बीएन कॉलेज में दो, पटना ट्रेनिंग कॉलेज में दो, आर्ट एंड क्रॉफ़्ट कॉलेज में एक, यूनिवर्सिटी कैम्पस में पाँच पीजी और छात्राओं के लिए तीन हॉस्टल हैं।
इसके अलावा पटेल हॉस्टल है, जिसे कुर्मी हितकारिणी न्यास ने 1941 में अवधिया (उपजाति) कुर्मी छात्रों के लिए खोला था। साल 1970 में इसे सभी कुर्मी छात्रों के लिए खोल दिया गया।
कानून व्यवस्था के लिहाज से सबसे ज्यादा दिक्कत पीजी रानीघाट, पटना कॉलेज (मिंटो, जैक्सन, इकबाल हॉस्टल), बीएन कॉलेज (मेन, सैदपुर हॉस्टल नंबर पाँच) और पटेल हॉस्टल में पैदा होती रही है।
इनका जातीय पैटर्न देखें, तो बीएन कॉलेज भूमिहार बहुल और पीजी रानीघाट यादव बहुल हॉस्टल है।
इसके साथ ही इकबाल हॉस्टल में सिर्फ मुस्लिम छात्रों और पटेल हॉस्टल में सिर्फ कुर्मी जाति के छात्र रह सकते हैं।
वहीं, मिंटो और जैक्सन हॉस्टल में दलित और पिछड़े वर्गों से आने वाले छात्र ज़्यादा संख्या मेंं रहते आए हैं।
क्या जाति देखकर आबंटित होते हैं हॉस्टल?
यूनिवर्सिटी प्रशासन जातीय आधार पर हॉस्टल का आबंटन नहीं करता, तो फिर हॉस्टल जातीय अड्डे कैसे बन गए?
इस सवाल पर पटना यूनिवर्सिटी के डीन स्टूडेंट वेलफेयर (डीएसडब्लू) प्रो अनिल कुमार किसी तरह की आधिकारिक टिप्पणी करने से इंकार कर देते हैं, लेकिन वो यह स्वीकार करते हैं कि ये हॉस्टल अवैध तरीके से रह रहे लोगों के अड्डा जरूर बन गए हैं।
वो कहते हैं, ‘जिस छात्र को कमरा आबंटित होता है, उसे हॉस्टल में अवैध ढंग से रह रहे लोग मारपीट कर भगा देते हैं। हमारी कोशिश है कि हॉस्टलों में छात्र रहें लेकिन हर हॉस्टल में पुलिस खड़ी करना संभव नहीं है।’
साल 1993-94 में पटना यूनिवर्सिटी के डीएसडब्लू रहे और सैदपुर हॉस्टल नंबर पाँच के अधीक्षक रहे प्रो. पीके पोद्दार बताते हैं, ‘उस समय छात्र अपनी ही जाति के दूसरे छात्रों को हॉस्टल का कमरा किराए पर दे देते थे। इसके दो नतीजे हुए। पहला हॉस्टल की जातीय गोलबंदी-अपराधीकरण हुआ और दूसरा मेधावी लडक़ों ने हॉस्टल में रहने से तौबा कर ली।’
तीन दशकों से यूनिवर्सिटी को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ‘जस हॉस्टल में जो जाति हावी है वो दूसरी जाति के छात्र को रहने ही नहीं देती। अगर दूसरी जाति का छात्र वर्चस्व वाली जाति के टर्म और कंडीशन का पालन करेगा, तभी वो हॉस्टल में रह पाएगा। ये हॉस्टल्स का अलिखित संविधान बन गया है।’
छात्र संगठन अखिल भारतीय स्टूडेंट फेडरेशन (एआईएसएफ) के पटना जिला सचिव रहे विश्वजीत कुमार भी साल 2008 में घटी ऐसी एक घटना का जिक्र करते हैं।
वो कहते है, ‘बीएन कॉलेज के मेन हॉस्टल में एक छात्र को कमरा अलॉट हो गया था लेकिन उसे भूमिहार छात्रों ने घुसने नहीं दिया। वो हमारे पास आया तो इसकी शिकायत स्थानीय पीरबहोर थाने में दर्ज कराई गई। इसके बाद ग़ुस्साए भूमिहार जाति के छात्रों ने मुझको बीएन कॉलेज ग्रांउड में अकेले बुलाकर हमला किया।’
क्या कहते हैं छात्र
पटना यूनिवर्सिटी के ये हॉस्टल जातीय और धार्मिक लिहाज से बँटे हुए हैं। हालाँकि ज़्यादातर छात्र इस पर खुलकर नहीं बोलते। इसकी दो वजहें है। पहली तो ये कि वो व्यक्तिगत तौर पर ख़ुद को जातीय संकीर्णता में बँधे छात्र की तरह पेश नहीं करना चाहते।
दूसरा ये कि इन हॉस्टल में उन छात्रों का रहना ही मुश्किल है, जिन्हें ये हॉस्टल आबंटित हुआ है। जैसा कि डीएसडब्लू अनिल कुमार बताते है, ‘अभी हमने मिंटो, जैक्सन और इकबाल का आबंटन किया है। लेकिन वहाँ से शिकायतें मिलनी शुरू हो गई है कि वहाँ अवैध तरीके से रह रहे लोग छात्रों को घुसने ही नहीं दे रहे हैं।’
इक़बाल हॉस्टल में रहने वाले नफीस अंसारी कहते है, ‘यूनिवर्सिटी से ज्यादा कॉस्टिज्म कहीं नहीं होता है। दूसरे हॉस्टल में तो दूसरी जातियों के मठाधीश रहते हैं। हम लोग अपनी सुरक्षा के लिहाज से इकबाल में ही रहेंगे। बाकी अगर बदलाव हो, तो वो दूसरे हॉस्टल से शुरू हो। इकबाल के पीछे सब क्यों पड़े है।’
एक अन्य छात्र विमल कुमार कहते हैं, ‘सैदपुर में तो ज़्यादातर भूमिहार रहते हैं। बाक़ी हमारा एडजैस्टमेंट सबसे ज़्यादा भूमिहार के साथ होता है। तो हम सैदपुर में रहना चाहते हैं। दूसरी जाति के लोग भी यहाँ नहीं आना चाहते और मुसलमान तो यहाँ आएगा ही नहीं। उसके रहने से पूजा पाठ में दिक़्क़त हो जाएगी।’
बीएन कॉलेज में सेकेंड इयर के छात्र और सैदपुर में रहने वाले हर्ष राज सिंह कहते हैं, ‘अगले 50 साल तक यहाँ भूमिहार ही डॉमिनेट करेगा। हम लोगों को अपने लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है।’
बीए थर्ड ईयर के छात्र और मिंटो हॉस्टल में रहने वाले सन्नी कुमार कहते हैं, ‘हम लोगों ने मिंटों में नया नियम बना लिया है। जैसे ही कोई छात्र को यहाँ रूम आबंटित होता है हम लोग उसका जातिगत पहचान हटा देते है। जैसे मेरा दोस्त रवि गुप्ता जब यहाँ आया तो उसका नाम रवि कुमार हो गया।’ हालाँकि मिंटो के ही एक पुराने छात्र कहते हैं, ‘हॉस्टल में जातियों का ये प्रभुत्व आपको पॉलिटिकल पार्टीज के चश्मे से देखना होगा। वो बाँटकर रखेगी नहीं तो उन्हें फ़ायदा कैसे होगा?’
श्रीकृष्ण बाबू से नीतीश कुमार तक
क्या पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल्स का इतिहास यही रहा है? थोड़े दिनों पहले पटना कॉलेज के प्राचार्य तरुण कुमार ने एक सार्वजनिक अपील की थी। इसमें लिखा है कि पटना कॉलेज के 115-116 साल पुराने छात्रावासों में हर कमरे से आईएएस-आईपीएस निकलते थे।
गौरतलब है कि पटना कॉलेज का मिंटो छात्रावास 1907 और जैक्सन छात्रावास 1908 में स्थापित हुआ था। मिंटो छात्रावास के लिए तो कहा ही जाता था, ‘मिंटोनीयन्स रूल इंडिया।’
पटना यूनिवर्सिटी के इन छात्रावासों में रहे छात्रों में बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, भूतपूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे और अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी जैसे नाम गिने जा सकते हैं।
इसके साथ ही पटना कॉलेज के मौजूदा प्राचार्य तरुण कुमार, बिहार के मुख्य सचिव आमिर सुबहानी, जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह, धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रहे किशोर कुणाल, आईपीएस मनोज नाथ, विष्णु दयाल राम और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गुप्तेश्वर पांडेय जैसे छात्र भी यहीं से निकले हैं।
कभी इन हॉस्टल में रहते थे टॉपर
अर्थशास्त्री और पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो नवल किशोर चौधरी साल 1964 में जैक्सन हॉस्टल के आबंटी थे। अपनी बीमारी के चलते वो दस दिन की देरी से हॉस्टल गए थे।
वो बताते है, ‘हॉस्टल अधीक्षक प्रो राम प्रवेश सिंह ने मुझे डाँटा और कहा कि यहाँ एक-एक रूम के लिए मिनिस्टर की पैरवी लगी रहती है। लेकिन मैं टॉपर था इसलिए मुझे टॉपर के लिए आबंटित कमरा नंबर 54 दिया गया। उस समय फस्र्ट टॉपर जैक्सन में और सेकेंड टॉपर मिंटो हॉस्टल में रहता था। ग्रेजुएशन में टॉप करने वाले को पीजी हॉस्टल रानीघाट आबंटित होता था।’
धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष रहे और आईपीएस किशोर कुणाल भी बताते है, ‘मेरा कमरा टॉपर का कमरा था और उसके ऊपर एसपी (सीनियर प्रीफेक्ट) लिखा हुआ था तो सब मजाक में कहते थे कि मैं पुलिस वाला बनूँगा। हमारे वक्त में हमारे हॉस्टल हमारा गौरव थे।’
इसी तरह राजद के प्रवक्ता और पटना यूनिवर्सिटी के छात्र रहे चितरंजन गगन बताते है, ‘अभी सरकार में मुख्य सचिव आमिर सुबहानी सैदपुर में रहते थे और उनको आप अपने कमरे से बाहर नहीं देख सकते थे। वहीं दूसरी तरफ़ गुप्तेश्वर पांडेय शायद पीजी रानीघाट में रहते थे और वो मस्तमौला मिजाज के स्टूडेंट थे।’
दिलचस्प है कि उस वक्त नवल किशोर चौधरी इकबाल हॉस्टल में रहे, जो मौजूदा दौर में मुमकिन नहीं होता। प्रो. नवल ने यहीं रहते हुए पोस्टग्रेजुएशन किया और इसके यूनियन के सेक्रेटरी भी रहे।
वो बताते हैं कि उस वक्त इकबाल में दो तरह की मेस चलती थी, हिंदू और मुस्लिम मेस। यूनियन सेक्रेटरी रहते हुए उन्होंने इसे बदलकर वेज और नॉन वेज मेस किया।
अब उसी इक़बाल हॉस्टल में सिर्फ मुस्लिम छात्र रहते हैं।
इकबाल के एक आबंटी इस्माइल रहमान बीबीसी से कहते हैं, ‘हम अपने कल्चर वाले लोगों के साथ रहकर पढ़ाई करेंगे। उनके (हिंदू) साथ रहेंगे तो झगड़ा होगा।’
ठीक यही बात सैदपुर के छात्र हर्ष राज सिंह कहते हैं, ‘मुस्लिम यहाँ नहीं टिक पाएगा। हिंदू में भी हम सबसे अच्छे से भूमिहार के साथ एडजस्ट हो जाते हैं।’
हॉस्टल का राजनीतिक इस्तेमाल
इस तरह के जातीय और धार्मिक वर्गीकरण के चलते हॉस्टल्स के बीच लड़ाई होना आम बात है।
कभी-कभी ये लड़ाई पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल वर्सेज आउटसाइडर की भी हो जाती है।
अखबार ‘प्रभात खबर’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2023 में जुलाई तक पटना यूनिवर्सिटी कैम्पस में 15 बार बमबाजी और फायरिंग की घटनाएँ हुईं।
बिहार सरकार में उच्च शिक्षा के निदेशक रहे नागेश्वर प्रसाद शर्मा की किताब ‘बिहार का सिसकता शिक्षा तंत्र’ में ये जिक्र है कि 70 के दशक के आरंभ से ही बिहार के विश्वविद्यालयों का पतन तेजी से हुआ। किसी भी कुलपति ने अपनी तीन साल की अवधि पूरी नहीं की, राज्य सरकार में बदलाव के साथ ही कुलपति बदल जाते थे।
यानी 70 का दशक ही वो था जब विश्वविद्यालय में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा। 80 का दशक आते-आते पटना यूनिवर्सिटी कैम्पस और हॉस्टल में मारपीट और हत्याओं का दौर शुरू हुआ।
दिसंबर 1982 में यूनिवर्सिटी के हथुआ हॉस्टल में पिपरा नरसंहार के दोषी ललन सिंह की हत्या सबसे ज़्यादा सुर्खियों में रही।
पत्रकार लक्ष्मीकांत सजल बताते हैं, ‘उसके बाद तो हॉस्टल में पिस्टल और बम की बरामदगी कोई नई बात नहीं रही। नेता और उफान मारती जातीय राजनीति के संरक्षण में हॉस्टल अवैध लोगों के रहने के अड्डा बने। इनका इस्तेमाल जातीय राजनीति में सहायक कारक के तौर पर हुआ, जो अब भी जारी है।’
प्रो. तरुण कुमार इस बात को विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, ‘जब मैंने जनवरी में कॉलेज की जि़म्मेदारी संभाली तो स्थापना दिवस पर सभी राजनीतिक दलों को शामिल होने का न्यौता दिया। भाकपा माले के प्रतिनिधि को छोडक़र कोई स्थापना दिवस में नहीं आया। लेकिन सरस्वती पूजा के वक्त सभी पार्टियों के नेता इन हॉस्टल में हाजिरी लगाने आते हैं।’
खंडहर बने हॉस्टल
पटना यूनिवर्सिटी के हॉस्टल बदहाल हैं। बारिश के दिनों में कमरों में पानी टपकता है, कमरों के दरवाज़े टूटे हुए हैं, कॉमन रूम लापता हैं और हॉस्टल लाइब्रेरी खंडहर बन गई है। ज़्यादातर हॉस्टल में मेस नहीं चलते और अधीक्षकों के लिए बने क्वार्टर वीरान पड़े हैं। लेकिन ये बदहाल हॉस्टल भी पटना यूनिवर्सिटी के छात्रों का बड़ा सहारा हैं।
छात्र अमन कुमार लाल कहते हैं, ‘हॉस्टल बार-बार बंद कर दिए जाते हैं और हम लोगों को गंगा घाट पर रात गुज़ारनी पड़ती है। प्रशासन को छात्रहित में हॉस्टल की स्थिति सुधारनी चाहिए।’
यूनिवर्सिटी के डीएसडब्लू प्रो अनिल कुमार कहते हैं, ‘हॉस्टल का इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत खराब है जिसे स्टेट एजुकेशनल इंफ्रास्ट्रक्टर डिवेलपमेंट की ओर से ठीक किया जाना है। वहीं, यूनिवर्सिटी में छात्राओं के हॉस्टल की संख्या बढ़ाई जानी है, क्योंकि अब यूनिवर्सिटी में छात्राएँ 65 प्रतिशत हैं।’ लेकिन हॉस्टल के इंफ्रास्ट्रक्चर से इतर हॉस्टल का कल्चर कैसे सुधरेगा, इस सवाल का ठोस जवाब किसी के पास नहीं है। (bbc.com/hindi)
डॉ. आर.के. पालीवाल
जलवायु परिर्वतन के लिए किसान सबसे कम जिम्मेदार है लेकिन इसका कहर सबसे ज्यादा किसान पर ही टूट रहा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी दुष्ट अपराधी के अपराधों की सजा निर्दोष लोगों को मिले।करे कोई और भरे कोई।
अक्तूबर मध्य में अचानक तेज हवा के साथ आधा घंटे जोर की बारिश ने लगभग अधपके धान के खेतों को धरती पर औंधे मुंह लिटा दिया। जिस धान के खेत मे जितना ज्यादा बड़ा और अच्छा धान था उसमें उतना ही ज्यादा नुक्सान हुआ है। यह हमारी आपबीती भी है और धान के असंख्य अन्य किसानों की भी। हम भी अपने खेत के जिस सबसे अच्छे धान की क्यारी को रोज निहार कर खुश हो रहे थे कि अगले हफ्ते इससे खुशबूदार धान और चावल मिलेगा, उसका नुक्सान देखकर आहत हैं।
करीब चार पांच दशक पहले जब परंपरागत प्राकृतिक खेती होती थी तब किसानों की फसलें मौसम की प्रतिकूलताओं को काफी हद तक झेल जाती थी। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि किसान ज्यादातर ऐसी फसल उगाते थे जो मौसम के उतार चढ़ाव को बर्दाश्त कर सकें। मोटे अनाज और स्थनीय देशी बीजों में अपने इलाके के मौसम से तालमेल की क्षमता होती है। इधर सरकार और सरकार से ज्यादा बाजार किसानों को हाइब्रिड बीजों से ऐसी नकदी फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जिनसे ज्यादा पैदावार हो। ऐसी फ़सल एक तरफ मौसम की प्रतिकूलता बर्दाश्त नहीं कर पाती और दूसरी तरफ़ उसमें कीट काफी नुकसान पहुंचाते हैं जिनके नियंत्रण के लिए जहरीले कीटनाशक का प्रयोग करना पड़ता है।
बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के कारण किसानों को अतिरिक्त लागत लगानी पड़ती है लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अक्सर फसल की बुवाई के तुरंत बाद या जब फसल पकने के कगार पर होती है ऐसे में बारिश, ओले और आंधी फसल का बड़ा हिस्सा बर्बाद कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर इस बार मध्य प्रदेश में पहले मई में असामान्य बारिश हुई, फिर जून जुलाई में लंबा सूखे का असामान्य दौर रहा और सितंबर के अंतिम सप्ताह में असामान्य बारिश हुई और अब अक्तूबर मध्य में तेज हवा के साथ असामान्य बारिश ने मक्का, उड़द, सोयाबीन और धान की फसलों को काफी नुक्सान किया है। बरसात के एक सीजन में तीन चार बार मौसम का असामान्य होना अब आम होता जा रहा है।
किसानों की साक्षरता और जागरूकता औसत से बहुत कम है। ऐसी विषम परिस्थितियों से निबटना अल्प आय वाले किसानों के लिए असंभव है। इन्ही परिस्थितियों से दुखी होकर किसानों की आत्महत्या बढ़ रही हैं।
किसानों के लिए अब पानी सर के ऊपर आ चुका है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से भारतीय किसानों को बचाने के लिए किसी महत्वाकांक्षी योजना बनाना बहुत जरूरी हो गया है। इस योजना में सभी फसलों की उचित कीमत, बाजार के अभाव में सरकार की शत प्रतिशत खरीदी की गारंटी, सरकार समर्थित हर सीजन की फसल का अनिवार्य बीमा और फ़सल खराब होने की स्थिति में त्वरित सर्वे कर त्वरित मुआवजे की अदायगी ऐसे जरूरी कदम हैं जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाना चाहिए। किसानों को भी पारंपरिक और प्राकृतिक खेती की तरफ लौटने की जरुरत है। जो किसान इस दिशा में पहल करते हैं सरकार को उन्हें विशेष प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों को होने वाली परेशानियों से बचाया जा सके और देश की बडी आबादी को उचित मात्रा में जहर मुक्त अन्न, दलहन, तिलहन, सब्जी और फलों की अबाधित आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। प्राकृतिक खेती से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण भी होगा और जैविक आहार मिलने से लोगों का स्वास्थ भी ठीक रहेगा।
अपूर्व गर्ग
जिस तरह मैंने इस जिंदगी में मोबाइल का प्रयोग नहीं किया, वैसे ही कभी पान नहीं खाया।
मैं नहीं जानता पान का स्वाद क्या होता है ! पर कुछ-कुछ जानता हूँ, इसका स्वाद क्या होता है, खाकर जब लोग जब चबाते बड़ा सा वृत्ताकार मुँह बनाकर बात करते हैं तो कुछ छींटें उडक़र स्वाद बता जाते हैं।
इसलिए पान चबाने वालों को देखकर मेरे दाँतों में भी अजब सी हल-चल जरूर मचती है।
मैंने देखा है,
प्रति घंटे की दर से पान चबाने वालों की शक्ल ही नहीं विचार भी बहुत मिलते हैं ।
इनके लगातार हिलते दांतों पर गौर करिये बिलकुल हमशक्ल दीखते हैं, भाई ! इसलिए मुझे शक होता है, ये लोग
एक जैसा ही सोचते हैं ।
मुँह में पान चबाते सहमति में सिर ज़्यादा हिलाते दीखते हैं ।
पान पर कुछ टोकाटोकी कर दो तो विद्वान लोग इसके उद्भव स्थल मलाया से लेकर मुगलों से होकर गुजरते शैलेन्द्र के गीत पान खाएँ सैंया हमारो। सब कुछ एक सांस में बता देते हैं।
दरअसल, जिस तरह मोबाइल पर बात करने का अनुशासन की बात की जाती है वैसे पान खाने वालों पर भी ये बात लागू होती है और दोनों नहीं सुधरेंगे।
न चाह कर भी मोबाइल धारी के सारे वार्तालाप का साक्षी बनना पड़ता है, न चाह कर भी पान का स्वाद भीतर लेना होता है।
इससे पहले कोई पान के वैज्ञानिक -सांस्कृतिक महत्व बताये मैं बताना चाहूंगा मैं कतई इसके विरोध में नहीं। पान में चूना ही तो लगता है और चूना लगने के तो हम आदी हैं।
जो ये कहते हैं पान स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है , मैं उनसे सहमत हूँ पर इससे आगे बढक़र कहना चाहता हूँ, ये स्वास्थ्य के लिए तब और भी अच्छा है जब आप इसके जूस का भी वमन की जगह सेवन करें। जैसे रसीले फलों को चबाकर जूस निगल जाते हैं वैसे ही पान भी चबाकर इसका जूस पी जाइये तो वो सारे विटामिन पेट में चले जाएंगे जो पान खाने वाले गिनाते हैं। इससे खाने वाला खुश, सामने वाला खुश।
पान खाने का बड़ा उद्योग है, रोजगार का जरिया है और इससे ज्यादा रोजगार मिलता है पान खाने के बाद की प्रक्रिया से।
दन्त चिकित्सक , दवा व्यापारी, सफाई कर्मी, लांड्री, पेंटर और पेंट उद्योग। को पान का बड़ा सहारा है।
जिस तरह शराब पीकर झूम -झूमकर कविताएँ -शायरी हुई हैं वैसे ही पान खाकर भी लोग कम बहके नहीं हैं ।
पान की लाली महबूब के होंठों पर देखकर खुद भी लोग लाल गुलाबी होते रहे ।
अकबर इलाहबादी तो पहले नंबर पर ही रहेंगे न-
‘लगावट की अदा से उन का कहना पान हाजिर है
कयामत है सितम है दिल फिदा है जान हाजिर है’
वाकई पान की एक अलग दुनिया है ,अलग किस्से हैं , यारियाँ हैं ,गिलौरियाँ हैं जिसका अलग भाईचारा है ।।
शायद यही वजह है मुझे पान चबाने वाले हमशक्ल दीखते हैं!
मोहम्मद हनीफ
भारत-पाकिस्तान का मैच होगा तो तनाव तो होगा ही और अगर मैच वर्ल्ड कप में हो तो टेंशन अधिक होगी।
जब मैच भारत में हो तो ऐसा लगता है कि महायुद्ध शुरू हो गया है।
भले ही क्रिकेट के जानकार हमें समझाते रहे हों कि पाकिस्तान विश्व कप में भारत से कभी भी नहीं जीता है। पर फिर भी शौकीनों को रात को नींद नहीं आती ।
जो मैच हुआ उसे देखने के लिए डेढ़ अरब लोग टीवी के सामने बैठे थे और स्टेडियम में भी सवा लाख लोग मौजूद थे।
इन सवा लाख लोगों में सिर्फ ढाई या तीन ही पाकिस्तानी होंगे, वो भी ऐसे लोग होंगे जिनकी लॉटरी निकल आई और अंत में उन्हें भारत का वीज़ा मिल गया।
पाकिस्तान-भारत का एक मैच स्टेडियम के बाहर भी होता है। ये मैच टॉस से पहले ही शुरू हो जाता है और पाकिस्तान के हारने पर भी ख़त्म नहीं होता है।
यह मैच होता है लतीफ़ों का, परेशान करने का, एक दूसरे को चिढ़ाने का, किसी पुरानी जीत की स्मृति का, किसी अविस्मरणीय हार का।
भारत-पाकिस्तान के नागरिकों के मिलने पर इतने सारे प्रतिबंध हैं, मुझे संदेह है कि बहुत से लोग यह देखने के लिए मैच देखते हैं कि जब 11 पाकिस्तानी और 11 भारतीय मिलेंगे तो क्या तमाशा होगा।
किसने किससे हाथ मिलाया, किसने गले लगाया, किसने थपथपाया, कौन हंसा और किसने घूरकर देखा।
पाकिस्तान के गेंदबाज शाहिद अफरीदी ने भारतीय गेंदबाज जसप्रीत बुमराह के पिता बनने पर एक छोटा सा तोहफा दिया।
क्रिकेट खेल के साथ व्यापार भी
क्रिकेट खेल के साथ-साथ एक व्यापार भी है और जाहिर सी बात है कि भारत-पाकिस्तान प्रतिद्वंद्विता सबसे बड़ा व्यवसाय है। जो भी माल बेचना है इसके नाम पर बेच दो।
भारत में एक पूरे पेज का विज्ञापन छपा, जिसमें कहा गया था कि ‘पाकिस्तानियों आपने हारना ही है लेकिन आप जितनी बुरी तरह से हारोगे हम आप को उतनी बड़ी छूट देंगे।’
हर मैच से पहले कुछ अंदाज लगाए जाते हैं और लगने भी चाहिए। पाकिस्तान लंबे समय से ‘मौका-मौका’ के विज्ञापन देख रहा है और आंनद भी ले रहा है, लेकिन पाकिस्तानियों को हारने पर मिलने वाली छूट कि बात कुछ लोगों को ज्यादा अच्छी नहीं लगी है।
कुछ ने कहा, ‘इस बैड टेस्ट पर मेहमानों के साथ ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।’ किस्से पर हंसी तो आती है, लेकिन किस्से के भीतर का किस्सा जो कि न ही डिस्काउंट देने वालों को समझ आया और न ही उस पर आपत्ति जताने वाले को।
वो ये था कि किस मेहमान पर कौन सा बैड टेस्ट, भारत सरकार ने तो किसी भी पाकिस्तानी को वीजा नहीं दिया है। न ही कोई कारण बताया और न ही कोई समझ आई।
दो-चार सौ-हजार पाकिस्तानी झंडों के साथ अगर नरेंद्र मोदी स्टेडियम में पहुंच जाते तो उन्होंने कौन सी पाकिस्तान की ओर से शतक (सैकड़ा) लगा देने थे, या फिर कैच पकड़ लेना था।
‘भ्रम ये कि वल्र्ड कप भी हमारा है’
जीतने वालों को भी अधिक मजा आता कि वे हारने वालों को सामने बिठाकर शोर मचाते, वाहवाही करते, पर यहां मामला डिस्काउंट पर फंस गया।
बात यहीं तक नहीं रुकी और विज्ञापन देने वालों ने कहा कि ‘हमने विज्ञापन दिया ही नहीं है। हम इतने बड़े देशभक्त हैं कि किसी पाकिस्तानी को अपनी संपत्ति में घुसने ही न दें।’
जैसा कि लाहौर के भाई कहते हैं, ‘गुड हो गया’।
पहले भारत के बारे में कहा जाता था कि यह इतना बड़ा देश है, यहां कई मजहब हैं, लेकिन सबसे बड़ा धर्म क्रिकेट है। अब धर्म भी कोई धर्म नहीं।
मैच में नारे सुनकर तो यही लगता है कि द्रोह ही सबसे बड़ा धर्म है। भारतीय टीम भी मजबूत है और भारतीय क्रिकेट बोर्ड सबसे मजबूत है।
‘दूसरी टीमें भी खेलने आई हैं, डिस्काउंट लेने नहीं’
लेकिन जिस तरह से विश्व कप चल रहा है, उससे मुझे बचपन के क्रिकेट की याद आ जाती है।
आपने भी गली-मोहल्ले में क्रिकेट खेला होगा, एक थोड़ा सा सुंदर, थोड़ा सा अमीर लडक़ा होता है।
बैट-बॉल और विकेट वह लेकर आता है। कहता है कि पहले मैं बारी लूंगा, अगर वह आउट हो जाता है तो मानता ही नहीं और जब बारी देने की बारी आती है तो वह बैट-बॉल और विकेट लेकर घर चला जाता है और कहता है कि अब खेल कर दिखाओ।
बैट-बॉल भी भारत का, स्टेडियम भी भारत का, इसके साथ भ्रम भी कि वल्र्ड कप भी हमारा है। लेकिन दूसरी टीमें भी खेलने आई हैं, डिस्काउंट लेने नहीं आईं हैं।
अफगानिस्तान ने क्रिकेट के माँ-बाप इंग्लैंड को हरा दिया है। बाकी मैच देखें, आनंद लें। बाकी धर्म भी यहीं और भ्रम भी यहीं। (bbc.com/hindi)


