विचार / लेख
आर.के.पालीवाल
देश की बड़ी आबादी भले ही फ्री राशन पर पल रही हो, करोड़ों लोग भले ही गरीबी की भारी रेखा के भार तले दशकों से कराह रहे हों, लेकिन सरकार हमेशा चाक चौबंद, हष्ट-पुष्ट और तंदरुस्त रहती है और हरी भरी दिखती है। केंद्र सरकार ने गांव गांव सरकारी रथ दौड़ाकर पैदल धक्के खाती विरथ जनता को अपनी उपलब्धियों का बखान करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। इसे विकसित भारत संकल्प यात्रा नाम दिया गया है। इस यात्रा को रथों के माध्यम से देश की ढाई लाख़ से अधिक ग्राम पंचायतों में घुमाया जाएगा। अभी तक चकाचक कारों में सवार होने वाले केन्द्र सरकार के बड़े बड़े सरकारी अधिकारी इन सरकारी रथों के प्रभारी बनकर देश की दशों दिशाओं में निकलेंगे। यह एक तरह से पुराने राजा महाराजाओं और चक्रवर्ती सम्राटों के अश्वमेध यज्ञ की तरह है। उसमें राजा के घोड़े अलग अलग दिशाओं में राजा का डंका पीटते हुए निकलते थे, इस योजना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार के रथों पर सवार सरकारी अफसर सरकार के कार्यों का ढिंढोरा पीटने निकलेंगे।
दो-तीन प्रमुख कारणों से केन्द्र सरकार की इस योजना का विरोध हो रहा है। विपक्षी राजनीतिक दल इसलिए इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि नवम्बर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और आचार संहिता लागू हो चुकी है। ऐसे में सरकारी अधिकारियों का सरकार के पक्ष मे प्रचार करना आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना जा रहा है। विरोध का दूसरा कारण सरकार के इस सिविल अभियान में भारतीय सेना के अधिकारियों को शामिल करने पर है क्योंकि सेना का परंपरागत कार्य सीमा पर सुरक्षा या बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की आपात स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ही होता रहा है न कि किसी राजनीतिक दल की सरकार की योजनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए।
इस अभियान की जितनी जानकारी अभी तक सामने आई है उसके अनुसार देश के तमाम जिलों में पहुंचने वाले रथों के प्रभारी के रुप में केन्द्र सरकार के विभिन्न विभागों के डिप्टी सेक्रेटरी से लेकर ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर के उच्चाधिकारियों की स्पेशल ड्यूटी लगाई जानी है। इस स्तर के अधिकारियों की अक्सर वैसे ही सरकार में काफी कमी रहती है।विभागों की नीतियों के क्रियान्वयन में इन अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है, इसलिए यदि यह अधिकारी लंबे समय तक अपने विभाग के तमाम जरूरी काम छोडक़र सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार का कार्य करेंगे तब केंद्र सरकार के कार्यालयों के जरूरी कार्यों में लंबा व्यवधान होने से सामान्य प्रशासनिक कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। इस दृष्टि से भी सरकार का यह निर्णय दूरदृष्टि से वंचित है। लगता है आनन फानन में पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर यह महत्वाकांक्षी योजना बनी है जिसमें जनहित कम और सत्ताधारी दल का राजनीतिक हित ज्यादा दिखाई देता है। यही कारण है कि कांग्रेस ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और इसकी शिकायत केंद्रीय चुनाव आयोग को भी हो रही है। निकट भविष्य में यह मामला भी सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है जो चुनाव पूर्व वर्ष में वोटरों को लुभाने वाली विविध योजनाओं के मामले पर सुनवाई कर रहा है।
वर्तमान सदी इंटरनेट सदी है जहां पलक झपकते कोई भी खबर दुनियां के इस कोने से उस कोने तक पहुंच जाती है। केंद्र सरकार खुद डिजिटल इंडिया पर इतना जोर देती है। ऐसे में सरकारी योजनाओं का रथों से प्रचार पूर्णत: प्रतिगामी कदम है। यह न केवल सरकारी संसाधनों की बरबादी है अपितु उच्चाधिकारियों के समय की भी बरबादी है। वैसे ही सरकार जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई को चुनाव के पहले अंधाधुंध विज्ञापन जारी कर बेरहमी से लुटाती है।अब रथों में अधिकारियों को प्रभारी बनाकर भेजना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगता। यही कारण है कि विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ प्रबुद्ध जन भी इस योजना की कड़ी आलोचना कर रहे हैं।


