विचार / लेख

टिकिट बिना सब सून
25-Oct-2023 4:15 PM
टिकिट बिना सब सून

 आर.के.पालीवाल

रहीमदास कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के टिकिटार्थियो की दशा देखते तो अपने पानी वाले दोहे को संशोधित कर कहते ‘टिकिट बिना सब सून’, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेताओं के लिए टिकिट ही सबसे ज्यादा जरूरी हो गया। टिकिट नही मिला तो सब सूना है। जिसे टिकिट मिल गया उसके घर, दफ्तर, खेत, खलिहान ,फार्म हाउस और बागान में रौनक ही रौनक है लेकिन जिस पर टिकिट की किरपा नहीं बरसी उसके चहुं और चंबल के बीहड़ जैसा सुनसान पसरा है। कल तक जो चेले चपाटे गुड के इर्द गिर्द भिनभिनाती मख्यियों की तरह दिन रात घेरे रहते थे वे टिकिट नही मिलने पर रातोरात गायब हो जाते हैं। वर्तमान दौर के नेताओं ने यह गूढ़ रहस्य जान लिया है कि सरपंच,

पार्षद, विधायक और सांसद बने बगैर जन सेवा नहीं हो सकती। जनता की सेवा के लिए टिकट सबसे जरूरी है। टिकिट नहीं मिलने पर जनता ऐसे हिकारत भाव से देखती है जैसे टी टी बिना टिकिट सवारी को देखता है।

वैसे तो चुनाव जीतने पर भी वर्तमान तंत्र में कोई खास सेवा तब तक संभव नहीं होती जब तक जीतने के बाद मंत्री परिषद में चयन नहीं हो जाता।मंत्री बनने के बाद भी सेवा की ज्यादा संभावना तभी दिखती है जब मुख्यमंत्री की कुर्सी मिले और मुख्यमंत्री नहीं तो उप मुख्यमंत्री का पद हासिल हो और साथ में राजस्व या पी डब्लू डी जैसे किसी जानदार मंत्रालय का कैबिनेट प्रभार मिले।दरअसल टिकट ऐसा ताबीज है जो नेताजी को कुर्सी और दरी बिछाने, मंच सज्जा करने, भीड़ बढ़ाने और जिन्दाबाद मुर्दाबाद के कानफोडू नारे लगाने वाले आम कार्यकर्ताओं से अलग कर खास की श्रेणी में प्रविष्ट कराता है इसीलिए टिकट के लिए इतनी मारामारी मचती है।

आजकल मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के टिकिट को लेकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में घमासान मचा हुआ है। टिकिट बांटने वालों के कपड़े फाड़े जा रहे हैं, समर्थकों द्वारा पार्टी कार्यालय में धरना और शक्ति प्रदर्शन के साथ साथ ध्यानाकर्षण के लिए कार्यकर्ताओं द्वारा शीर्षासन तक किया जा रहा है। बड़े नेताओं का घेराव और धक्का मुक्की हो रही है, टिकिट नही मिलने की स्थिती में निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में उतरने की धमकियां दी जा रही हैं और ब्रह्मास्त्र के रुप में बरसों से दबी कुचली आत्मा की आवाज सुनकर दल बदलने की तैयारी हो रही है। नेता टिकिट पाने के लिए तरह तरह के पापड़ बेलने को तैयार हैं। टिकिट खरीदने के लिए मोटी रकम का जुगाड किया जा रहा है, अपने फेवर में आए सर्वे का हवाला दिया जा रहा है, अपने अपने गॉडफादर और गॉड मदर की चरण वंदना की जा रही है और हाई कमान की सिफारिश के लिए कोई मजबूत डोरी खोजी जा रही है।

टिकिटों को लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकिटार्थियों और उनके समर्थकों द्वारा जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह विगत चुनावों की तुलना में काफी ज्यादा है। इसका एक कारण यह भी है कि पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस में सबसे ज्यादा जोर आजमाइश मध्य प्रदेश में हो रही है। दोनों ने जिताऊ उम्मीदवारों को चुनने के चक्कर में कई पुराने नेताओं के टिकिट काटे हैं इसलिए टिकिट कटने वाले उम्मीदवार बौखलाए हुए हैं।

भाजपा ने जहां जहां सिंधिया के साथ दल बदल कर कांग्रेस से आए नेताओं को टिकिट दी है वहां संघ और भाजपा के पुराने लोग बगावत कर रहे हैं और जहां कांग्रेस ने भाजपा से पाला बदलकर आए लोगों को प्राथमिकता दी है वहां पुराने कांग्रेसी बागी हो रहे हैं। इसके अलावा दोनों दलों में कई उप समूह भी हैं, जैसे भाजपा में शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया के उपसमूह हैं तो कांग्रेस में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के कैंप हैं। हर उपसमूह अपने ज्यादा से ज्यादा विधायक चाहता है ताकि जीतने पर मंत्रिमंडल गठन में ज्यादा अहमियत मिल सके। इस वजह से भी बागियों को बड़े नेताओं की शह मिल रही है जिससे वे उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं।


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