विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
देश के मतदाताओं के लालच ने लोकतांत्रिक सत्ता को टैक्स पर ऐश करने का साधन बनाकर रख दिया है। करदाताओं के टैक्स पर तीन वर्ग सबसे ज्यादा ऐश करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा ऐश नेता और अफसर करते हैं जो टैक्स की रकम को अपना माल समझ कर खर्च करते हैं। प्रधानमंत्री के लिए बड़ा सुसज्जित आवास, बड़ा दफ्तर, बड़ा हवाई जहाज और मुख्यमंत्रियों के लिए नए-नए हेलीकॉप्टर और मंत्रियों के बड़े बड़े बंगलों की साज सज्जा इसी टैक्स के बूते होती है। अफसरों के गाड़ी घोड़े और बंगलों की भी रौनक का स्रोत भी यही टैक्स है।सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार का नीव से शिखर तक का पूरा पिरामिड भी इसी टैक्स से बनता है, जिसकी ईद के चांद सी थोडी सी झलक कभी कभार सी बी आई, एंटी करप्शन ब्यूरो, लोकायुक्त, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के छापों में दिखाई देती है। सरकारी कार्यों का ठेका लेने वाले लाखों छोटे बड़े ठेकेदारों की ऐश भी इसी रकम से होती है जिसमें मंत्रालयों से सांठ गांठ कर लोहे को पीतल और पीतल को सोने के भाव बेचकर अपना और अपने आकाओं के गणपति से बड़े उदर भरे जाते हैं। इसी से आलसी होती हट्टे कट्टे लोगों की बडी फौज को प्रधानमन्त्री का मुस्कुराता फोटो चिपकाकर मुफ़्त राशन का झोला दिया जाता है। होना तो यह चाहिए कि मुफ्त राशन के झोलों पर उन टैक्स देने वालों की तरफ से एक अपील होनी चाहिए कि जिस तरह हम अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कड़ी मेहनत कर आपको भी मुफ्त राशन उपलब्ध करा रहे हैं, उसी तरह हम चाहते हैं कि आप भी यथाशीघ्र लेने वालों की कतार से निकलकर हमारी तरह देने वालों की कतार में आ जाएं। इस अपील से कम से कम संवेदनशील लोगों को कुछ शर्म आएगी। अभी तो वे समझते हैं कि हमने जिन नेताओं को वोट दिया है वे हमे मुफ्त की रेवडिय़ों की सौगात दे रहे हैं।
कांग्रेस इस मामले में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी को भी पछाड़ती दिखाई दे रही है। मध्य प्रदेश में हाल ही में जारी हुए मेनिफेस्टो, जिसे वचन पत्र का नाम दिया गया है, में कई अहम वर्गों को तरह तरह के लालच दिए गए हैं। इसमें कोई दो राय नही कि इस घटिया खेल की शुरुआत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी।समाज में जितनी ज्यादा असमानता और तनाव होते हैं वर्तमान पीढ़ी के अधिकांश नेताओं के लिए वह स्वर्णिम दौर हो जाता है जिसमें जनता के किसी बड़े वर्ग की भावनाओं से खिलवाडक़र आसानी से सत्ता हासिल की जा सकती है। हमारे देश मे जहां तरह तरह की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विषमताएं हैं और उसी के परिणाम स्वरूप तरह तरह के तनाव और कई राजनीतिक दल हैं वहां स्वार्थी नेताओं के लिए सत्ता हथियाना इसलिए भी आसान हो जाता है क्योंकि बहु कोणीय मुकाबलों में मात्र तीस प्रतिशत वोट पाकर भी शत-प्रतिशत लोगों पर हुकूमत की जा सकती है।
दु:ख की बात यह है कि मध्य प्रदेश सहित ज्यादातर राज्यों की आर्थिक हालत काफी नाजुक है। राज्यों के बजट में होने वाले खर्च आय से अधिक होने के कारण उन्हें लगातार कजऱ् लेना पड़ रहा है लेकिन राज्य कजऱ् में डूबने के बावजूद नेता मुफ्त की रेवडिय़ों पर अंकुश लगाना तो दूर उन्हें बढ़ावा देकर किसी भी तरह सत्ता हासिल करना चाहते हैं।मध्य प्रदेश इस मामले में नित नए उदाहरण पैदा कर रहा है।हमारी संस्कृति के अनुसार यदि हम किसी की सहायता करते हैं तो वह चुपचाप होनी चाहिए।
कहावत है कि बाएं हाथ को भी पता नहीं चलना चाहिए कि दाएं ने किसी की मदद की है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अखबारों में विज्ञापन पर विज्ञापन देकर, जगह जगह पोस्टर लगाकर, पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर पूरे सरकारी तंत्र को लाडली बहना योजना के बड़े बड़े आयोजनों के लिए भीड़ जुटाने पर लगाकर न केवल करदाताओं के टैक्स की गाढ़ी कमाई स्वाहा की है बल्कि विकास के सडक़ मरम्मत जैसे जरूरी कार्यों की भयंकर अवहेलना की है। यह सब सत्ता हासिल करने के लिए हुआ है ताकि अगले पांच साल भी पहले की तरह ऐश की जा सके।


