विचार / लेख
-अर्पित द्विवेदी
मैं यूरोप ट्रिप पर था। ट्रेन से यात्रा कर रहा था। ट्रेन लगभग खाली सी थी। मैंने एक चीज नोटिस की, ट्रेन में जो भी यात्री चढ़ता वह किसी यात्री के पास बैठने के बजाय कोई एकांत जगह ही तलाशता। वहीं कोई किताब खोलकर पढऩे लगता या अपने मोबाइल या लैपटॉप में लग जाता।
यही परिस्थिति अगर भारत में होती तो अधिकांश लोग ऐसी जगह चुनते जहाँ उन्हें कोई बतियाने को मिल जाये। आप किसी भी सार्वजनिक परिवहन से यात्रा कीजिए या किसी समारोह में जाइये कुछ ही देर में आपके आस पास के अनजान लोग आपसे बतियाने लगेंगे। थोड़ी ही देर में वो आपके व्यक्तित्व जीवन के बारे में पूछने लगेंगे। आप जरूरत भर की बात करेंगे तो आपसे कहेंगे कि आप बहुत कम बोलते हैं। क्या आप ऐसे ही चुप चुप रहते हैं या कोई समस्या है?
इनको लगता है कि जो इनकी तरह बात नहीं कर रहा वह असामान्य है। उसे कोई मानसिक समस्या है। शायद अवसाद से पीडि़त है। या बहुत घमंडी है।
पर्सनल स्पेस क्या होता है, उसका क्या महत्व है और किसी के पर्सनल स्पेस का कैसे सम्मान किया जाए ये हमें नहीं आता। हम तो पूरे अधिकार के साथ धड़धड़ाते हुए किसी के भी पर्सनल स्पेस में घुस जाते हैं।
आप देखिए यहां लोग किसी को कभी भी बिना सोचे फोन मिला देते हैं। अगर वह न उठाए तो बुरा मान जाते हैं। जबकि कायदा यह कहता है कि अगर कोई इमरजेंसी नहीं है तो एक बार मैसेज पर पूछ लें कि यह काम है अथवा आपसे बात करने का मन था, आपसे किस समय बात हो सकती है।
मुझे लगता है यहां अधिकांश लोगों को अपने साथ कैसे जिया जाए ये आता ही नहीं है। अगर इन्हें कुछ समय अकेले रहना पड़े, कोई बात करने को न मिले तो ये बेचैन हो जाते हैं। इन्हें कोई न कोई चाहिए खोपड़ी चाटने को।
असल में यहां लोगों की जिंदगियों में कोई रचनात्मकता नहीं है। अधिकांश एक ढर्रे पर चले जा रहे हैं। उन्हें लगता है यही जीवन है। सुख साधन जमा करके, शानो-शौकत का दिखावा करके खुद को बेहतर दिखाने ही अंतहीन दौड़ में दौड़ते रहना ही इनके लिए जीवन का उद्देश्य है।
जिन समाजों में रचनात्मकता होती है वो खुद के साथ ज्यादा समय बिताते हैं। दूसरों से बतियाने में ही नहीं बल्कि अपने विचारों में भी आनंदित रहते हैं। और इसीलिए वो पर्सनल स्पेस को महत्व देते हैं। क्योंकि ये किसी के आनंद में दखल देने जैसा है।


