विचार/लेख
इस्राएल और हमास के बीच जारी जंग में फंसे लाखों लोग गाजा में लगातार बमबारी झेल रहे हैं. ऐसे में बहुत से लोग ये सवाल पूछ रहे हैं कि पड़ोसी मिस्र और जॉर्डन इन लोगों को शरण क्यों नहीं दे रहे हैं.
मिस्र ने गुरुवार को गाजा से लगती सीमा खोलने पर सहमति जतायी ताकि लोगों की मदद के लिए सामग्री लाये ट्रक सीमा पार कर सकें. लेकिन लोगों को सीमा पार कर सुरक्षित इलाकों में जाने देने पर फिलहाल कोई प्रगति नहीं हो पायी है.
मिस्र की सीमा गाजा से लगती है जबकि जॉर्डन की सीमा वेस्ट बैंक से लगती है. दोनों ही देशों ने गाजा से शरणार्थियों को लेने से साफ इनकार कर दिया है.
ना मिस्र तैयार, ना जॉर्डन
बुधवार को मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी ने कहा कि यह युद्ध सिर्फ हमास के खिलाफ नहीं है बल्कि "लोगों को नागरिकों को बाहर धकेलने, मिस्र में भेज देने के लिए है.” उन्होंने चेतावनी दी कि यह क्षेत्र की शांति को अस्थिर कर सकता है.
जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला द्वीतीय ने भी मंगलवार को ऐसा ही बयान देते हुए कहा था, "ना मिस्र कोई शरणार्थी लेगा, ना जॉर्डन.” चूंकि दोनों देश मुस्लिम बहुल हैं और जॉर्डन में फलीस्तीनी लोगों की बड़ी आबादी रहती है, इसलिए बहुत से लोगों के मन में यह सवाल है कि ये दोनों देश फलीस्तीनियों को अपने यहां शरण देने से क्यों इनकार कर रहे हैं.
इसकी एक वजह तो उस डर से जुड़ी है कि इस्राएल फलीस्तीनियों को स्थायी तौर पर निकाल देना चाहता है ताकि उनकी अपने देश की मांग कमजोर हो जाए.
अल-सिसी ने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में लोगों के आने से मिस्र से सिनाई प्रायद्वीप में भी उग्रवादियों के आने का खतरा बढ़ जाएगा, जहां से वे इस्राएल पर हमले कर सकते हैं और दोनों देशों के बीच 40 साल पहले हुई शांति संधि खतरे में पड़ सकती है.
ऐतिहासिक पलायन
पलायन फलीस्तीन के इतिहास का एक अहम अध्ययाय रहा है. 1948 में जब इस्राएल अस्तित्व में आया, तब सात लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे. फलीस्तीनी उस पलायन को नकबा के नाम से याद करते हैं, जिसका अर्थ होता है विनाश.
उसके बाद 1967 में अरब-इस्राएल युद्धमें इस्राएल ने वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया और तीन लाख से ज्यादा फलीस्तीनियों को विस्थापित कर दिया. इनमें से अधिकतर जॉर्डन चले गये थे.
1948 के बाद से ही इस्राएल ने फलीस्तीनी शरणार्थियों को घर नहीं लौटने दिया है और वह किसी भी शांति संधि में इन लोगों की वापसी पर सहमत नहीं हुआ. उसे डर है कि इससे यहूदी बहुमत खतरे में पड़ सकता है.
इन विस्थापितों और उनकी संतानों की आबादी अब मिलकर 60 लाख हो चुकी है. अधिकतर लोग वेस्ट बैंक, गाजा, लेबनान, सीरिया और जॉर्डन के शरणार्थी कैंपों में रह रहे हैं. बहुत से लोग शरणार्थी शिविरों को छोड़कर अन्य देशों में जा बसे हैं. बड़ी संख्या में शरणार्थियों ने खाड़ी देशों में अपनी नयी जिंदगी शुरू कर ली.
मिस्र को डर है कि अगर वह शरणार्थियों को लेता है तो इतिहास एक बार फिर से दोहराया जाएगा और गाजा के लोग उसके यहां सदा के लिए रह जाएंगे. इसकी एक वजह तो यह है कि मौजूदा युद्ध किस तरह खत्म होगा, इसका कोई अनुमान संभव नहीं हो पा रहा है.
युद्ध के बाद क्या?
इस्राएल का कहना है कि उसका मकसद हमास का समूल नाश है. हालांकि ऐसा हो पाएगा या नहीं, इस बारे में पुख्ता तौर पर कोई कुछ नहीं कह सकता. और अगर ऐसा होता भी है तो उसके बाद गाजा पर किसका अधिकार और शासन होगा, इस बारे में इस्राएल ने कोई संकेत नहीं दिया है.
इस कारण अरब देशों को डर है कि इस्राएल गाजा पर कब्जा कर लेगा, जिससे विवाद और बढ़ सकता है. हालांकि इस्राएली सेना ने कहा है कि उसके कहने पर जो लोग गाजा छोड़कर जाएंगे, उन्हें युद्ध के बाद लौटने दिया जाएगा. लेकिन मिस्र इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रहा है.
अल-सिसी ने कहा कि अगर इस्राएल ने कह दिया कि उसने हमास उग्रवादियों का पूरी तरह सफाया नहीं किया है तो युद्ध बरसों तक खिंच सकता है. उन्होंने सुझाव दिया है कि इस्राएल गाजा के लोगों को नेगेव मरुस्थल में स्थान दे, जो गाजा पट्टी से लगता है.
क्राइसिस ग्रुप इंटरनेशनल के उत्तर अफ्रीका में प्रोजेक्ट निदेशक रिकार्डो फाबियानी कहते हैं, "इस्राएल की मंशा में स्पष्टता ना होना अपने आप में एक समस्या है. इस कारण पड़ोसियों में डर है.”
मिस्र खुद आर्थिक संकट से गुजर रहा है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि उसके यहां करीब 90 लाख शरणार्थी रह रहे हैं जिनमें से करीब तीन लाख इसी साल सूडान में जारी युद्ध के कारण आए हैं.
हमास को लेकर चिंताएं
मिस्र को अपने यहां उग्रवादियों के आने का डर भी सता रहा है. उसका कहना है कि अगर उग्रवादी उसके यहां आ गये और इस्राएल के खिलाफ वहीं से युद्ध करने लगे तो उसके अपने यहां भी अशांति फैल सकती है.
2007 में हमास द्वारा गाजा पर शासन शुरू करने के बाद से ही मिस्र ने गाजा में इस्राएल की नाकाबंदी का समर्थन किया है. उसने हमास और अन्य फलीस्तीनियों द्वारा सीमा पर बनायी सुरंगों को नष्ट किया है जो वे लोग सामान और लोगों को लाने-ले जाने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे.
मिस्र सिनाई में लंबे समय तक इस्लामिक स्टेट से जूझता रहा है. फाबियानी कहते हैं कि अब सिनाई में काफी हद तक शांति है और मिस्र नहीं चाहेगा कि उसके दोबारा भड़कने की जरा भी गुंजाइश पैदा हो.
वीके/सीके (एपी)
डॉ. आर.के. पालीवाल
आजादी के बाद से धीरे धीरे हमारे समाज के बहुत बड़े तबके में तिहरी दरिद्रता प्रवेश कर गई है। हमे ऊपर सतह पर दिखने वाली भौतिक संसाधनो की दरिद्रता तो साफ दिखाई पड़ती है लेकिन बाकी दो और भी ज्यादा खतरनाक दरिद्रता मन की दरिद्रता और दिमाग की दरिद्रता हैं जो अक्सर सतह पर दिखाई नहीं देती। मन की दरिद्रता के दो बड़े कारण हमारा बढ़ता लालस और आलस हैं। हम मेहनत मशक्कत से जी चुराने वाले नागरिक बनते जा रहे हैं। हम सरकारी नौकरी या सफेद कॉलर प्राइवेट नौकरी को सभ्य समाज में प्रवेश का द्वार मानते हैं, चाहे वह घूस देकर मिले, नकल करके मिले, फर्जी डिग्री या फर्जी जाति प्रमाण पत्र से मिले या किसी बड़े नेता या अफसर की सिफारिश का जुगाड करके मिले। हम शॉर्ट कट से आनन फानन में मंजिल पर पहुंचना चाहते हैं , चाहे उसके लिए कितने ही अनुचित साधन क्यों न इस्तेमाल करने पड़ें। विभिन्न जातियों और समुदायों के आरक्षण के लिए होने वाले आंदोलन भी इसी मानसिक दरिद्रता का राजनीतिक नमूना हैं।
हमारी दरिद्रताओं में दिमाग की दरिद्रता सबसे ज्यादा खतरनाक है। हमारा दिमाग विवेक का इस्तेमाल कर यह सोचना बंद कर देता है कि क्रिकेट में पाकिस्तान को हराने पर हमें ऐसा क्यों लगने लगता है कि हम खुशियों के एवरेस्ट के शिखर पर पहुंच गए। जब हम विवेक अग्निहोत्री की फिल्म कश्मीर फाइल के चार सौ करोड़ या शाहरुख ख़ान की फिल्म जवान द्वारा आठ सौ करोड़ कमाने पर नाचने लगते हैं ,और जब हम असली नायकों की उपेक्षा कर राजनीतिज्ञों, बॉलीवुड के कलाकारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों को भगवान मानने लगते हैं, तब हम दिमागी दरिद्र होने लगते हैं।
इसके बरक्स जागरूक नागरिक के रुप में हमारे प्रश्न होने चाहिएं कि जो नेता दिन रात हमारे कल्याण की योजनाओं की गर्जना करते रहते हैं और अखबारों में इन्हीं योजनाओं के विज्ञापन प्रकाशित कराते रहते हैं, उनके शासन काल में हम क्यों दिन ब दिन कंगाल होते जा रहे हैं और अंबानी और अडानी आदि क्यों दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर मालामाल होते जा रहे हैं! हमे सोचना चाहिए कि आखिर बड़े नेताओं के क्रिकेट का ककहरा नही समझने वाले बच्चे ही क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पदाधिकारी क्यों बन रहे हैं !
हमें इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि लालू प्रसाद यादव के जेल जाने पर राष्ट्रीय जनता दल के अनेक वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं के बजाय राजनीति की एबीसीडी नही समझने वाली राबड़ी देवी को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया और बाद में उनके नौसिखिया पुत्र तेजप्रताप को ही क्यों उप मुख्यमंत्री बनाया गया। मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में दशकों से सक्रिय अपने दो भाइयों रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव और आजम खान जैसे विश्वसनीय नेता के होते हुए पुत्र अखिलेश यादव को ही क्यों पार्टी की कमान और मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपी।अजीत सिंह के दल की कमान जयंत चौधरी को ही क्यों मिली!
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों की सबसे बडी घोषणा मल्लिकार्जुन खडग़े, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के रहते प्रियंका गांधी ने क्यों की!आखिर नरेंद्र मोदी में ऐसा क्या है कि हमारे लिए लिए मोदी है तो सब मुमकिन हो जाए ! फिर क्यों उन्हें किसान आंदोलन के सामने हथियार डालने पड़े और कृषि बिल वापस लेने पड़े। क्यों वे डबल इंजन सरकार होते हुए मणिपुर की हिंसा पर लगाम नहीं लगा सके। क्यों उनके कई फैसलों को सर्वोच्च न्यायालय को बदलना पड़ा और कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी।
दरअसल सत्ता और बाजार के जबरदस्त गठजोड़ ने विज्ञापन और प्रोपेगंडा से हमारे चारों तरफ तर्क, विवेक और विचार शून्यता पैदा कर ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जो हमारा मन भटकाता है।उसकी भ्रामक चकाचौंध में हम आम नागरिक भूल जाते हैं कि हमारे शरीर में दिमाग नाम की भी कोई चीज मौजूद है। हम अपने दिमाग का इस्तेमाल करना भूलते जा रहे हैं। जब हम दिमाग को इस्तेमाल करना कम करते जाते हैं वह धीरे धीरे कुंद होता जाता है और हम दूसरों के हिसाब से चलने लगते हैं। इसी वजह से आजकल अधिकांश लोग मानसिक दरिद्र होकर राजनीति के गुलाम बन रहे हैं।
ध्रुव गुप्त
देशमें महिषासुर-मर्दिनी देवी दुर्गा की आराधना का नौ दिवसीय पर्व नवरात्र मनाया जा रहा है। महिषासुर को हमारी संस्कृति में आमतौर पर एक बलवान भैंसा, दुराचारी शासक या शैतानी ताकत के रूप में चित्रित किया जाता है जिसे सभी देवताओं की सम्मिलित शक्ति की प्रतीक देवी दुर्गा ने मार डाला था। बात इतनी सीधी नहीं है। महिषासुर के बारे में यह भ्रम संभवत: इस शब्द का गलत अर्थ करने की वजह से ही पैदा हुआ है। उसका नाम महिष और असुर शब्दों के योग से बना है। महिष का प्राचीन अर्थ महा शक्तिमान है। रानी को आज भी महीषी ही कहा जाता है। महिष को भैंसा के अर्थ में प्रयोग बाद में पुराणों में हुआ है। असुर शब्द का प्राचीन अर्थ भी नकारात्मक शक्ति नहीं है। वैदिक कोश के अनुसार ‘असुराति ददाति इति असुर’-अर्थात जो असु (प्राण) दे, वह असुर (प्राणदाता) है। महिषासुर प्राचीन काल का एक लोकप्रिय असुर नायक था। देश के असुर जनजाति के लोगों में प्राचीन काल से ही उसके कल्याणकारी और शूरवीर रूपों की अनेक कहानियां कही-सुनी जाती रही है। स्वयं पुराण भी स्वीकार करते हैं कि वह अपने समय का सबसे बड़ा आर्येतर योद्धा था। अपने विस्तार के क्रम में देवता कहे जाने वाले आर्य राजाओं ने उसे पराजित करने की कई कोशिशें की, लेकिन असफल रहे। उलटे महिषासुर ने ही उन्हें कई बार पराजित कर उनके स्वर्ग अर्थात वैभवशाली नगरों पर अधिकार कर लिया था।
दुर्गा और महिषासुर के बीच संग्राम के संबंध में कई पुराणों की कथाओं की तार्किक व्याख्या करें तो पता चलता है कि कई बार पराजित और हताश देवताओं ने अंतत: इस तथ्य का पता लगा लिया कि स्त्रियों और पशुओं की रक्षा के लिए कृतसंकल्प महिष उन पर कभी हथियार नहीं उठाता। उसके चरित्र के इसी उज्जवल पक्ष का लाभ उठाते हुए देवताओं ने युद्ध में वीरांगना देवी दुर्गा को भेजकर महिषासुर को पराजित कर उसे मार डालने में सफलता हासिल की। युद्ध में बड़ी संख्या में असुर जनजाति के दूसरे योद्धा भी मारे गए थे। असुर जनश्रुतियों के अनुसार महिषासुर के पराजित समर्थकों और अनुयायियों ने असुरों के भीषण नरसंहार के पांच दिनों बाद शरद पूर्णिमा को विशाल सभा आयोजित की। सभा में उन्होंने अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को जीवित रखने का संकल्प लिया था। इसी संकल्प की याद में असुर जनजाति के लोग दशहरा के पांच दिनों बाद शरद पूर्णिमा को ‘महिषासुर शहादत दिवस’ के तौर पर मनाते हैं। महिषासुर लोगों में कितना लोकप्रिय था इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि हजारों साल बाद भी झारखंड में उसकी जनजाति के लोग उसकी पूजा करते हैं। बुंदेलखंड में महोबा से लगभग सत्तर किमी की दूरी पर ग्राम चौका सोरा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित एक प्राचीन महिषासुर स्मारक मंदिर भी मौजूद है।
हमारा राष्ट्र पिछले हजारों वर्षों में हजारों जातियों, आस्थाओं और संस्कृतियों के बीच संघर्ष और समन्वय की विराट कोशिशों से ही बना है। हमारी संस्कृति में युद्ध में जीतने वालों को ही नहीं, युद्ध में पराजित होने और मरने वाले योद्धाओं को भी सम्मान देने की परंपरा रही है। यहां देवी दुर्गा की भी पूजा होती रही है और महिषासुर की भी। राम की भी और रावण की भी। नाग जनजाति के सबसे बड़े विनाशक जनमेजय की भी और नागों के जातीय नायकों-वासुकि, कालिय और शेषनाग की भी। यही सांस्कृतिक विविधता हमारे देश की खूबसूरती है। देवी दुर्गा आर्यों की महान नायिका और महिष असुर जनजाति के महान नायक रहे हैं।
ये दोनों ही हमारे आदरणीय हैं। हमारा प्राचीन इतिहास आर्येतर जातियों ने नहीं, आर्यों अर्थात देवों के पुरोहितों द्वारा लिखा गया है। आश्रयदाताओं के महिमामंडन के उद्देश्य से उनके विपक्षियों को शैतान और बुराईयों के प्रतीक के तौर पर चित्रित करना उनकी मजबूरी थी। हमारे आगे वैसी विवशता नहीं। हमारे लिए वीरांगना देवी दुर्गा वंदनीय हैं लेकिन असुर जनजाति के प्रतापी जननायक महिष के लिए भी हमारे मन में सम्मान होना चाहिए।
हालिया हुई पत्रकारों की गिरफ्तारी के कारण कुछ जनसमर्थक प्रेस संस्थानों ने भारत के चीफ जस्टिस को यह चिट्ठी लिखी है:-
3 अक्टूबर 2023 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने न्यूज पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ के 46 पत्रकारों, संपादकों, लेखकों और इससे किसी न किसी तरह से जुड़े लोगों के घरों पर छापा मारा। छापेमारी में दो व्यक्तियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया और उनके डेटा की सलामती सुनिश्चित किए बिना- एक बुनियादी प्रोटोकॉल जो उचित प्रक्रिया के लिए जरूरी है, उनके मोबाइल फोन और कंप्यूटर आदि को जब्त कर लिया गया। यूएपीए लगाया जाना विशेष रूप से डराने वाली बात है। पत्रकारिता पर ‘आतंकवाद’ का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
जिस प्रकार पुलिस संविधान द्वारा गिरफ्तारी का आधार बताने के लिए बाध्य है, उसी प्रकार पूछताछ के लिए भी यह एक पूर्व शर्त होनी चाहिए। इसकी गैर-मौजूदगी में, जैसा कि हमने न्यूजक्लिक के मामले में देखा है, किसी अनाम अपराध की जांच को लेकर किए गए अस्पष्ट दावे, पत्रकारों से अन्य बातों के साथ-साथ, किसान आंदोलन, सरकार की कोविड महामारी से निपटने और नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन की उनकी कवरेज के बारे में सवाल करने का आधार बन गए हैं।
हमें डर इस बात का है कि मीडिया के खिलाफ सरकार की कार्रवाइयां हद से ज्यादा बढ़ गई हैं, और अगर यह सब जिस दिशा में जा रहा है, उसे वहां जाने दिया गया, तो किसी सुधारात्मक कदम के लिए बहुत देर हो जाएगी। इसलिए, हम सभी का सोचना यह है कि अब उच्च न्यायपालिका को मीडिया के खिलाफ जांच एजेंसियों के बढ़ते दमनकारी इस्तेमाल को खत्म करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए।
विशेष रूप से, अगर अदालतें हमारी निम्न गुजारिशों पर गौर करेंगी, तो हम उनके आभारी रहेंगे:-
पत्रकारों के फोन और लैपटॉप कीअचानक जब्ती को हतोत्साहित करने के लिए मानक तैयार करना। प्रसिद्ध शिक्षाविदों- राम रामास्वामी और अन्य बनाम भारत सरकार, डब्ल्यू.पी. (सीआरएल) क्रमांक 138ध्2021- द्वारा दायर एक रिट याचिका के संबंध में सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और मामले में भारत सरकार द्वारा दायर हलफनामों से संतुष्ट नहीं है। जहां एक तरफ न्याय की लड़ाई जारी है, वहीं सरकार दंडमुक्ति के साथ अपनी कार्रवाइयां जारी रख रही है। उपकरणों की जब्ती से हमारे पेशेवर काम के साथ समझौता होता है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने (पेगासस मामले में) खुद कहा है कि स्रोतों की सुरक्षा मीडिया की स्वतंत्रता का एक ‘महत्वपूर्ण और जरूरी हिस्सा’ है। लेकिन लैपटॉप और फोन अब सिर्फ आधिकारिक कामकाज के लिए इस्तेमाल होने वाले डिवाइस नहीं रह गए हैं। वे मूलत: किसी व्यक्ति का ही विस्तार बन गए हैं। ये डिवाइस हमारे पूरे जीवन से जुड़े हुए हैं और इनमें महत्वपूर्ण व्यक्तिगत जानकारी शामिल हैं- बातचीत से लेकर तस्वीरों तक, परिवार और दोस्तों के साथ हुई बातें भी। ऐसा कोई कारण या औचित्य नहीं है कि जांच एजेंसियों को ऐसी सामग्री तक पहुंच मिलनी चाहिए।
0 पत्रकारों से पूछताछ और उनसे जब्ती के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन्हें महज किसी तरह की जानकारी जुटाने के किसी अभियान तौर पर इस्तेमाल जाए, जिसका वास्तविक अपराध से कोई लेना-देना न हो।
0 उन सरकारी एजेंसियों और व्यक्तिगत अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के तरीके खोजना जो कानून का उल्लंघन करते पाए जाते हैं या पत्रकारों के खिलाफ उनके पत्रकारीय कार्यों के लिए अस्पष्ट और बिना किसी समय सीमा या उद्देश्यहीन जांच के जरिये अदालतों को जान-बूझकर गुमराह करते हैं।
पिछले कुछ सालों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब सरकारों द्वारा स्वतंत्र प्रेस पर हमलों को लेकर न्यायिक दखल की जरूरत पड़ी है, और हम ऐसे मामलों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे। लेकिन पिछले दो दिनों के घटनाक्रम के बाद हमारे पास बहुत विकल्प नहीं बचे हैं, सिवाय इसके कि आपसे अपील करें कि आप इस बाबत संज्ञान लें और हस्तक्षेप करें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए और एक निरंकुश पुलिस स्टेट किसी तरह का कायदा बनकर सामने आ जाए।‘‘
क्या गलत किया इन पत्रकारों ने जिनके खिलाफ लचर और गैरकानूनी घटिया नस्ल की पुलिस कार्यवाही की गई है? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नौजवान छात्रों की धडक़न का केन्द्र है। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय भी उसी तरह छात्र चेतना का बौद्धिक प्रतीक है। अपने हक हुकूक के लिए लडऩे वाली षाहीन बाग में आंदोलनरत रही महिलाओं के बारे में रिपोर्टिंग नहीं करना तो अपराध होता। यह अपराध इन पत्रकारों ने नहीं किया। देश का गौरव बनी महिला पहलवान बेटियां लंबे अरसे तक एक कथित बलात्कारी अधिकारी के खिलाफ आंदोलनरत रहीं। सरकार उन पर ही लाठियां बरसाती रही। भारतीय कुश्ती फेडरेशन की मान्यता रद्द कर दी गई। फिर भी उस भाजपाई सांसद का बाल बांका नहीं हुआ। उसने तो संविधान, महिला सम्मान और देश की राजनीति को ही चुनौती दे रखी थी। वह वोट बैंक मजबूत करने का एक एजेंट समझा जाता है। हैदराबाद का छात्र रोहित वेमुला हो। केरल का पत्रकार कप्पन हो। दिल्ली का षरजील इमाम हो। भीमा कोरेगांव के एक्टिविस्ट आंदोलनकारी हों। पारदर्शी पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट का मामला हो। ऐसे दर्जनों, सैकड़ों मामले देष में हैं। वहां मोदी सरकार की गफलत के कारण भारत का गौरवशाली इतिहास पनाह मांग रहा है। उन्हें कोस रहा है। फिर भी प्रधानमंत्री के चेहरे पर न तो षिकन है और न मुंह से कोई आवाज निकलती है। ऐसा नहीं है कि उन्हें वाचालता नहीं आती। वे भारत के ताजा इतिहास के सबसे ज्यादा वाचाल राजनीतिक नेता हुए हैं। वे कम बोलना तो जानते ही नहीं। खासकर उन सब मुद्दों पर जहां उन्हें अपनी गुडविल और टी आर पी बढ़ाने की तबियत होती है। व्यापक इंसानी मसलों पर वे चुप्पी काढ़ लेते हैं। भले ही लोगों का कितना ही नुकसान क्यों न हो जाए। हो भी रहा है।
देश के सबसे लाड़ले पत्रकार रवीष कुमार का मामला कौन नहीं जानता? एनडीटीवी के चैनल पर रात को नौ बजे रवीष का प्राइम टाइम देखना समझदार भारतीयों की आदत और जरूरत बन गई थी। मोदी-अडानी जोड़ेे की तमाम तरह की कुटिल हरकतों के चलते आखिरकार एन. डी. टी.वी. के मालिक प्रणय राय और उनकी पत्नी को इस तरह फांसा गया और आर्थिक कुप्रबंधन के नाम से ऐसी साजिषें की गईं कि रवीष कुमार ने अपना आत्मसम्मान बरकरार रखते एनडीटीवी से इस्तीफा दे दिया। साजिशकर्ताओं को लगता था रवीश त्रिशंकु की तरह हो जाएंग। अपने दमखम और कलम की प्रतिबद्धता के सिपाही रहते रवीष ने अपना यू-ट्यूब चैनल खड़ा किया। लाखोंं लोग आज उनके मुरीद, दर्शक और श्रोता हैं। पत्रकारिता के इतिहास में रवीष नया परिच्छेद हैं। यही साहस तो अभिसार षर्मा भी कर रहे हैं। वे हर मुद्दे पर अपनी साफगोई, तार्किकता और संप्रेशणीयता जैसे हथियारों के साथ सरकार की एक एक बदनीयती का पर्दाफाश कर रहे हैं। विपरीत परिस्थिति में भी अभिसार शर्मा की हिम्मत है। इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली के संपादक रहे प्रणंजय ठाकुर गुहार्ता को मैनेजमेंट पर मोदी अडानी दबाव के कारण इस्तीफा देेने पर मजबूर किया। यह धाकड़, पारदर्शी, तार्किक और सिलसिलेवार पत्रकारिता करने वाला कलमवीर अपनी सीरत के साथ समझौता नहीं कर सकता। वह आज भी मोर्चे पर डटा हुआ है। पुण्य प्रसून बाजपेयी को भी एक साजिश के तहत उनके नियोक्ता चैनल से हटने पर मजबूर होना पड़ा। अब वे भी अपने साथियों की तरह यू ट्यूब पर बेहद सक्रिय, संघर्षशील और दो टूक कहने की हिम्मत और आदत रखते हैं। कभी मैंने उनसे विनोद में कहा था कि उत्तर भारत में जातिवाद के खिलाफ सबसे पहला संघर्ष कबीर और रैदास के गुरु स्वामी रामानंद ने किया था। यह संयोग है कि स्वामी रामानंद के पिता का नाम भी पुण्यप्रसून बाजपेयी ही था।
इतिहास अभिसार शर्मा के साथ काम कर रही भाषा सिंह, संजीव चौधरी, अजीत अंजुम तथा न्यूज 24 जैसे चैनलों को कैसे भूल सकता है? उनका साहस किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं है। वे अपने आपमें प्रमाणित हैं। उर्मिलेश जैसा उद्यमशील, अध्ययनप्रिय, खोजी और यायावर पत्रकार किसी सरकारी नियम कायदे या पुलिस की गिरफ्त में आने की हालत में कैसे हो सकता है? एक साधारण परिवार में पैदा होकर छात्र जीवन से अपने आदर्षों को कर्म में बदलने की कोशिश करते उर्मिलेश ने बहुत महत्वपूर्ण लेखन किया है। उनकी हालिया किताब ‘मेम का बाड़ा’ और ‘गोडसे की गली’ में उद्यम विस्तार के साथ गोडसे और सावरकर के परिवारों के सदस्यों से लंबी जिरह और प्रतिपरीक्षण करते अपने इतिहास ज्ञान और कलम के प्रति प्रतिबद्धता के साथ जो अब तक अज्ञात रहे तथ्यों का खुलासा किया है। उन सबको पढक़र तो सहजता के सबसे ऊंचे दरबार में उर्मिलेश के खिलाफ , खफा, खौफ और नफरत का आभास तो आया होगा। निजी चैनल ‘न्यूज़ क्लिक’ में वे मानसेवी तरह की प्रतिभागिता करते रहे। वहां चीन से आर्थिक सहायता प्राप्त होने का उसके मालिक प्रवीर पुरकायस्थ के खिलाफ तितम्मा खड़ा किया गया। उर्मिलेष का भी नाम उसमें संबंद्ध करने संदेह पैदा किया गया। इन सभी पत्रकारों से बिल्कुल नियम विरुद्ध उनके लैपटॉप, टेलीफोन, कम्प्यूटर, किताबें वगैरह जबरिया जप्त कर लिए गए। ताकि उनके खिलाफ कोई सबूत जुटा सकें। यही तो हुआ था भीमा कोरेगांव के मामले में जब उनमें एक आरोपी रोना विल्सन के लैपटॉप से छेड़छाड़ कर कथित रूप से पुलिस ने उसमें ऐसी कई प्रविष्टियां भर दीं जो आरोपी विल्सन को फंसाने के लिए की गई थीं। इस बात का खुलासा अमेरिका की एक उच्च ज्ञान प्राप्त रिसर्च संस्था ने किया। उसका जवाब आज तक पुलिस देने में आनाकानी कर रही है, बल्कि पीठ दिखा रही है।
उपरोक्त चि_ी एक तरह का बचाव मांगती है लेकिन पत्रकारों को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रेस की आजादी को नहीं लिखते लगभग सरकार समर्थक स्थितियां बना दी गई थीं। उनको लेकर भी दो सदस्यों ने बहुमूल्य सुझाव दिए गए थे। वे आज भी कारगर हो सकते हैं। अधिकतर सरकार के समर्थन में रहते जागरूक सदस्य टी. टी. कृष्णमाचारी ने अनुच्छेद 19 (1) में एक तरह की सीमित नागरिक आज़ादी को लेकर सरकार का बचाव किया। साथ ही उन्होंने कहा कि अभी हमारा पिछला अनुभव ब्रिटिश हुकूमत के समय बहुत कड़वा रहा है। तब लोगों की आजादी को पूरी तरह कुचला गया है। सरकार भी उन्हीं के पदचिन्हों के आधार पर फिलक्त तो बनी है लेकिन इतिहास गतिषील होता है। एक आजाद देश में नागरिकों में आत्मविश्वास भी तो आ रहा है। पिछली सरकार का जनता से कोई संबंध नहीं था। वह तो नौकरशाही के दम पर हुकूमत करती थी। यह मानसिकता तो बदलेगी क्योंकि हमारे नेता बहुत नामचीन लोग हैं। खासतौर पर प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के जरिए लाखों लोगों की जरूरतेें सुलझाई जा सकती हैं। हमें ऐसे नेताओं से उम्मीद है जो मौजूदा व्याख्याओं को जनसुलभ बनाएंगे। कृष्णमाचारी का यह आश्वासन तत्कालीन परिस्थितियों के कारणों पर आधारित था अर्थात यदि माहौल बदलता है। तो संविधान के अनुच्छेद को परिवर्तित करते हुए उसकी व्याख्या की जा सकती है। इसी तरह एक सदस्य श्यामनंदन सहाय ने बेहतर व्यावहारिक सुझाव दिया था कि यदि सरकार को नागरिक आजादी को प्रतिबंधित करने के लिए कोई कानून बनाना पड़े। तो ऐसे कानूनों की लागू करने की वैधता समय बाधित होनी चाहिए। साफ -साफ उल्लेख होना चाहिए कि ऐसा प्रतिबंध एक सुनिश्चित अवधि तक ही रहेगा। यदि इस तरह के सुझाव मान लिए गए होते या आज भी उन्हें लागू किया जाए। तो प्रेेस की आजादी पर लगे वहषी कानून नागरिक आज़ादी को ख्ंाडित करने में कठिनाई महसूस करेंगे।
यह भी उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध विचारक और पत्रकार अभय कुमार दुबे के अनुसार चीफ जस्टिस को कुछ राहत देने संबंधी पत्र लिखने के साथ साथ मीडिया को भी चाहिए कि वह खुद या जनहित याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर करे जिसमे वांछित अनुतोश मांगे जाएं। सुप्रीम कोर्ट यह नहीं कह सकता कि वह सरकार को कानूनों में संषोधन या लचीलापन लाने के लिए सलाह नहीं दे सकता। संविधान के अनुच्छेद 44 में अम्बेडकर ने साफतौर पर वायदा किया था कि समान नागरिक संहिता तभी लागू की जाएगी जब उससे संभावित रूप में प्रभावित होने वाले लोग अपनी सहमति प्रदान करें। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सरला मुद्गल सहित चार पांच मुकदमों में बार बार केन्द्र सरकार को सलाह दी है कि वह समान नागरिक संहिता बनाने की दिशा में आगे बढ़े। ऐसी राय मिलने के बाद ही केन्द्र की मौजूदा सरकार और भाजपा नियंत्रित कुछ राज्य सरकारें अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ते हुए समान नागरिक संहिता लाने के लिए लगातार आत्मप्रचार कर रही हैं। ऐसी हालत में सुप्रीम कोर्ट नागरिक आज़ादी को बचाए रखने के लिए सरकार से अनुच्छेद 19 में प्रेस का अधिकार एक आधार के रूप में षामिल करने के लिए क्यों नहीं कह सकता। वैसे भी बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने लिखित नोट में इसकी तजबीज तो की थी लेकिन बहुमत के सामने वे चुप रहे थे।
कोलकाता से प्रकाषित अंगरेजी अखबार ‘टेलीग्राफ’, प्रसिद्ध अखबार ‘हिन्दू’, कभी कभार ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ वगैरह में सरकार को आईना दिखाने वाले समाचार रहते हैं। ‘टेलीग्राफ’ ने ठीक लिखा कि नरेन्द्र मोदी ने बहुत कुशलतापूर्वक देष की मीडिया को दो फांकों में बांट दिया है। एक अखबार कई झूठी खबरें छापकर जनता की तकलीफों को देखने के बदले सोता रहता है। अपना नाम लेकिन ‘जागरण’ रखता है। एक अखबार सूर्य की तरह उजाला करने की कोशिश में ‘भास्कर’ कहलाता है। कभी-कभी सरकारी दबाव के कारण उन बादलोंं में छिप जाता है जिनमें भारतीय सेना के राडार प्रधानमंत्री के अनुसार छिप जाते हैं। फिर पाकिस्तान की फौजें राडार को देख नहीं पातीं। ‘न्यूज क्लिक’ से जुड़ी छापेमारी के खिलाफ रोष प्रदर्शित करने में प्रेस क्लब की बैठक में बड़े अखबारों के सम्पादक गायब थे। जबकि 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के विरोध मार्च में कुलदीप नैयर, बी.जी. वगीज, अरुण शौरी वगैरह जैसे शीर्ष पत्रकार शामिल हुए थे।
जनता को जम्हूरियत में जानने का तो पूरा हक है। यही तो भारत के कई पत्रकार अपनी लेखनी और रपट के जरिए मणिपुर की जनता और देष के नागरिक अधिकारों को लेकर कर रहे थे। कोई जवाब नहीं है देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पास कि संविधान का अनुच्छेद 78 कहता है कि प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह देश के कार्यकाल के प्रशासन संबंधी सभी विषयों की जानकारी राष्ट्रपति के मांगने पर उन्हें दें। देश जानना चाहता है, बल्कि दुनिया जानना चाहती है कि मणिपुर में क्या हो रहा है। कैसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हेंं वहां तबाही और कत्लेआम की घटनाएं होने पर जाने तक की फुर्सत नहीं मिलती? अलबत्ता वह अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार और विदेश यात्रा तथा कई मनोरंजन कार्यक्रमों में जाने का समय निकालते रहते हैं। मणिपुर की घटनाएं इतिहास में मोदी शासन पर कलंक हैं। सरकारी प्रशासन का कोढ़ हैं। इक्कीसवीं सदी में मनुष्य जानवर से भी ज़्यादा गया बीता हो गया है। इसी का सबूत मणिपुर ही तो है।
डॉ. आर.के. पालीवाल
गांधी आज़ादी के आंदोलन के दौरान अपने नेतृत्व में चलने वाले सत्याग्रह और ग्राम स्वराज के रचनात्मक कार्यों में संसाधन जुटाते समय सबसे ज्यादा जोर साधनों की शुचिता पर देते थे। यह दो तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है।सबसे आसान तरीका यह है कि हम अपने और अपने रचनात्मक कार्यों के लिए साधनों की आवश्यकता कम से कम करने का हर संभव प्रयास करें और साथ ही साधनों की आत्म निर्भरता का प्रयास भी करें।
फिर भी यदि बाहरी साधनों की बहुत आवश्यकता महसूस हो तो आने वाले साधनों के स्रोत की शुचिता की यथासंभव जानकारी अवश्य सुनिश्चित करनी चाहिए। चाहे तिलक फंड का मामला हो या हरिजन सेवा फंड अथवा कस्तूरबा फंड हो गांधीजी की कोशिश रहती थी कि फंड का अधिकांश हिस्सा आम जनता की छोटी छोटी राशि से एकत्र हो और फंड एकत्र करने वाले पूरी पारदर्शिता के साथ दानदाताओं का लेखा जोखा बनाएं। वर्तमान राजनीतिक दल इस मामले में हद दर्जे की लापरवाही बरतने लगे हैं। यही कारण है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर अडानी समूह को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस पर विगत में अंबानी समूह से नजदीकियों के आरोप लगते रहे हैं और समाजवादी पार्टी पर सहारा समूह की नजदीकियों का सार्वजनिक प्रदर्शन आम रहा है। यही हाल अन्य क्षेत्रीय दलों का भी है। उन पर भी अपने प्रदेश के कुछ खास औद्योगिक घरानों से सांठगांठ के आरोप लगते रहते हैं। यह दूसरी बात है कि सरकारों के सरंक्षण में होने वाले घोटालों में पक्के सबूत जुटाना जांच एजेंसियों के लिए भी मुश्किल काम है।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की नजदीकियां भी शराब घोटाले में लिप्त व्यवसाईयों और रेस्टोरेंट चेन वालों से सामने आई है जिसमें पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सांसद संजय सिंह जेल में पहुंचे हैं और अरविंद केजरीवाल पर भी इसमें शरीक होने के आरोप लग रहे हैं। भले ही आम आदमी पार्टी यह कहे कि केंद्रीय एजेंसियां चुन चुन कर विपक्षी दलों का उत्पीडऩ कर रही हैं, लेकिन इस कथन में यह सच्चाई तो प्रतीत होती है कि केंद्रीय एजेंसियों और विशेष रूप से प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के निशाने पर अधिकांश मामले विपक्ष से संबंधित हैं परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि विपक्षी दल दूध के धुले हैं।
मनीष सिसोदिया को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अभी तक कोई राहत नहीं मिलने से यह तो स्पष्ट है कि जांच एजेंसियों का केस एकदम हवाई नहीं है अन्यथा मनीष सिसोदिया बड़े वकीलों की फौज के बावजूद जमानत तो पा ही सकते थे।
राजनीतिक दलों में साधनों की शुचिता के प्रति हद दर्जे की लापरवाही इस कदर फैल गई है कि इसमें उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक पूरे देश में सडऩ की स्थिति है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली शराब कांड के तार भी उत्तर से दक्षिण तक के शराब सिंडिकेट से जुड़े हैं। दक्षिण में ही अवैध खनन के आरोपी रेड्डी बंधुओं से भारतीय जनता पार्टी की नजदीकियां और भगौड़े विजय माल्या को राज्य सभा सांसद बनाने में कई दलों द्वारा दिए गए सहयोग के मामले भी बहुत पुराने नहीं हैं।
आजकल छत्तीसगढ़ से महादेव लॉटरी सट्टे, जिसके तार दाऊद इब्राहिम और पाकिस्तान तक से जुड़े बताए जा रहे हैं, में राज्य की कांग्रेस सरकार और पुलिस प्रशासन के जुड़े होने की खबरें आ रही हैं।उपरोक्त तमाम मामलों में सभी राजनीतिक दल कम या अधिक इसी अपराध के दोषी हैं कि उन्होंने सत्ता प्राप्ति के लिए अपने दलों के आर्थिक संसाधनों को बेतहासा बढ़ाने के लिए आर्थिक साधनों की शुचिता के गांधी विचार को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। इसी के चलते राजनीति की छवि बेहद धूमिल हो चुकी है और उसका सेवा तत्व कम होकर नगण्य रह गया है। लोकतंत्र और देश के लिए यह खतरनाक स्थिति है।
कनुप्रिया
अजीब है कि जो कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की त्रासदी पर जार-जार रोते हैं, उनके लिए इंसाफ को माँग करते हैं, उन्हें फलीस्तीनियों का दुख समझ नही आता।
ये भी कि जो कल हिटलर के सताए थे और बुरी तरह बदनाम किए गए, लाखों की संख्या में गैस चेम्बरों में मारे गए, विस्थापित हुए, वो आज फलीस्तीनियों को जानवर के जैसा बोलते हैं, उनके मारे जाने के पक्ष में हैं, उनपर व्हाइट फॉस्फोरस गिराया जा रहा है ,अब उन्हें अपने पुरखों की पीड़ा और अपमान याद नहीं।
मतलब बात किसी क़ौम या धर्म की है ही नहीं, जिसके पास भी पावर होती है वो उसका गलत इस्तेमाल कर लेता है, और भूल जाता है कि जब वो पावर नही रहेगी तो क्या होगा, तब वो भी इंसाफ, इंसानियत, हक और सद्भाव की ही माँग करेंगे। जो सत्ता हाथ मे होने पर दूसरों को बुलडोजर से कुचल देते हैं वो भी पावर न होने पर रोते हुए दिख जाते हैं कि मुझे मार दिया जाएगा, मेरी सुरक्षा का इंतजाम हो।
लिंकन ने सही कहा था, Nearly all men can stand adversity, but if you want to test a men's character, give him power
अजीब ये भी है कि आतंकी संगठन होते हैं, मगर आतंकी स्टेट्स नहीं, भले वो दूसरे देशों को नेस्तनाबूद कर दें, जापान, इराक, यूक्रेन, और फलस्तीन जैसी कार्रवाई अंजाम दें। उनके हमलों को आतंकी हमला तक करार नही दिया जाता, उसे युद्ध कह दिया जाता है, भले वो एकतरफा हमला हो।
और हमारे देश में तो सब ही अजीब है। देश का प्रधान एक स्टैंड लेता है, देश का विदेश मंत्रालय दूसरा, जो कल तक देश के स्टैंड के खिलाफ बोलने को देशद्रोह कह रहे थे, वो गोदी एंकर और भक्त गण सोशल मीडिया पर अब भी उस स्टैंड के खिलाफ धड़ल्ले से बोल रहे हैं और अब ये देशद्रोह नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।
यानी सब कुछ सत्ता से तय हो रहा है, लाठी और भैंस की तर्ज पर तय हो रहा है, और हम कहते हैं कि हम बहुत सभ्य हो गए हैं।
कुमार प्रशांत
साल भर से ज्यादा हुए। मन बेतरह घायल है। कान यूक्रेन की चीख से गूंजते रहते हैं। अपनी असहायता का तीखा बोध लगातार चुभता रहता है। यह शर्म भी कम नहीं चुभती है कि हमारा देश भी नागरिकों की इस जघन्य हत्या में भागीदार है, और यूक्रेन व रूस में बहते खून में से तेल छान कर जमा करने में लगा है। यह सब था कि तभी 7 अक्तूबर 2023 आया। फिलीस्तीनी हमास ने इजरायल पर ऐसा पाश्विक हमला कर दिया कि जिसने शर्म से झुके माथे पर टनों बोझ लाद दिया। शर्म से झुका वह सर लगातार झुकता ही जा रहा है क्योंकि यह गुस्सा नहीं, आत्मग्लानि का बोझ है। असहमति, विवाद, गुस्सा, प्रतिद्वंद्विता, बदला, घृणा, कायरता व क्रूरता सबकी अपनी जगह है लेकिन इंसानियत की भी तो जगह है न ! सिकुड़ते-सिकुड़ते वह जगह अब सांस लेने लायक भी नहीं बची है।
सारी दुनिया में प्रकृति फुफकार रही है। बाढ़, आग, भूकंप से ले कर तरह-तरह के भूचालों से दुनिया घिरती जा रही है। ऐसा लगता है कि प्रकृति अपने साथ हुए दव्र्यवहार का एक-एक कर जवाब दे रही है। वह अब रोके नहीं रुकेगी। बची-खुची कमी नेता बन बैठे लोग पूरी किए दे रहे हैं। सारी दुनिया में नागरिक पिस रहा है। सारी दुनिया में सत्ता आदमखोर बनी हुई है। यह हमारी सभ्यता की सबसे अंधी व अंधेरी गुफा है। इसे हम कैसे और कब पार कर सकेंगे? जवाब देने के लिए भी सर उठता नहीं है।
फिलिस्तीन-इसरायल समस्या का इतिहास बहुत लंबा व पुराना है- उतना ही पुराना जितना मानव जाति की मूढ़ता का इतिहास है। यहां उसे दोहराने का अवकाश नहीं है। आंकड़ों और तारीखों का अब कोई संदर्भ भी नहीं रह गया है। कोरोना के आंकड़ों की तरह ही ये आंकड़े भी सच को बताते कम, छिपाते अधिक हैं। हमास ने जिस तरह इसरायल पर हमला किया वह उसकी मूढ़ता, ह्रदयहीनता व अदूरदर्शिता का प्रमाण है। हमास के शीर्ष राजनीतिक नेता खालिद मशाल ने कहा कि हम ऐसी चोट मारना चाहते थे कि इजरायल बिलबिला कर रह जाए; और वही हुआ। लेकिन खालिद को अब यह नहीं दीख रहा है क्या कि दोनों तरफ के सामान्य निर्दोष नागरिक बिलबिला रहे हैं ? आज उनके साथ कोई नहीं है सिवा विनाश व मौत के!
एक बात यह भी कही जा रही है कि इसरायल व अरब देशों में जैसी आर्थिक नजदीकियां बढ़ रही थीं, उसे तोडऩे के लिए फिलीस्तीन ने हमास द्वारा यह आत्मघाती कदम उठाया। अब अरबों के लिए इसरायल की तरफ हाथ बढ़ाना संभव नहीं रह जाएगा। यह सच हो तो यह कूटनीति भी कितनी अमानवीय है!
भारत के प्रधानमंत्री ने तुरंत बयान दे डाला कि भारत इसरायल के साथ खड़ा है। ऐसा कहने का अधिकार उन्हें कैसे मिला? वे जिस संसद की कृपा से प्रधानमंत्री हैं क्या उस संसद में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित हुआ? क्या इस बारे में संसद में कोई विमर्श हुआ? क्या कु र्सी पर बैठा एक आदमी देश होता है?
आजादी से पहले से इस विवाद के संदर्भ में भारत की भूमिका स्पष्ट रही है। महात्मा गांधी ने स्वंय इस मामले में हमारी विदेश-नीति की बुनियाद बना दी थी। उसे बदलने का अधिकार केवल भारत की जनता का है। किसी भी सरकार को अधिकार नहीं है कि वह अपने खोखले बहुमत के घमंड में राष्ट्रीय नीतियों से खिलवाड़ करे। प्रधानमंत्री ने जो कह दिया, अब जा कर विदेश मंत्रालय ने दबी-ढंकी जुबान में उस पर लिपापोती कर रहा है। उसने बयान दिया है कि भारत हमास की हिंसा का निषेध करता है लेकिन फिलिस्तीनों की आजादी पर किसी भी तरह के हमले को समर्थन नहीं देता है। प्रधानमंत्री और उनके विदेश-मंत्रालय के बीच की ऐसी खाई कैसे बनी? इसलिए बनी कि प्रधानमंत्री सोचते कम और बोलते अधिक हैं; किसी कि सुनते नहीं हैं, बस अपनी सुनाते हैं- मन की बात!
इधर देखिए कि सारा अमरीकी खेमा, पश्चिम के आका मुल्क इजरायल के समर्थन में खड़े हो गए हैं जैसे हमें पता ही नहीं है कि यही वह खेमा है जिसने फलीस्तीन के सीने पर खंजर की नोक से इजरायल लिखा था। महात्मा गांधी ने तब भी कहा था कि हमें एक-एक यहूदी अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा है लेकिन पश्चिमी शैतानी का सहारा ले कर वे फलिस्तीनी घर में घुस जाएं, इसका हम समर्थन नहीं कर सकते। 1938 में उन्होंने एक विस्तृत आलेख में भारत का रुख साफ कर दिया था- ‘मेरी सारी सहानुभूति यहूदियों के साथ है। मैं दक्षिण अफ्रीका के दिनों से उनको करीब से जानता हूं। उनमें से कुछ के साथ मेरी ताउम्र की दोस्ती है और उनके ही माध्यम से मैंने उनकी साथ हुई ज्यादतियों की बावत जाना है। ये लोग ईसाईयत के अछूत बना दिए गए हैं। अगर तुलना ही करनी हो तो मैं कहूंगा कि यहूदियों के साथ ईसाईयों ने जैसा व्यवहार किया है वह हिंदुओं ने अछूतों के साथ जैसा व्यवहार किया है, उसके करीब पहुंचता है।
दोनों के साथ हुए अमानवीय व्यवहारों के संदर्भ में धार्मिक आधारों की बात की जाती है। निजी मित्रता के अलावा भी यहूदियों से मेरी सहानुभूति के व्यापक आधार हैं। लेकिन उनसे मेरी गहरी मित्रता भी मुझे न्याय का पक्ष देखने से रोक नहीं सकती है, और इसलिए यहूदियों की ‘अपना राष्ट्रीय घर’ की मांग मुझे जंचती नहीं है। इसके लिए बाइबल का आधार ढूंढा जा रहा है और फिर उसके आधार पर फलीस्तीन लौटने की बात उठाई जा रही है। लेकिन जैसे संसार में सभी लोग करते हैं वैसा ही यहूदी भी क्यों नहीं कर सकते कि वे जहां जनमे हैं और जहां से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं, उसे ही अपना घर मानें ?
‘फलीस्तीन उसी तरह अरबों का है जिस तरह इंग्लैंड अंग्रेजों का है याकि फ्रांस फ्रांसीसियों का है। यह गलत भी होगा और अमानवीय भी कि यहूदियों को अरबों पर जबरन थोप दिया जाए। आज फिलीस्तीन में जो हो रहा है उसका कई नैतिक आधार नहीं है। पिछले महायुद्ध के अलावा उसका कोई औचित्य नहीं है। गर्वीले अरबों को सिर्फ इसलिए दबा दिया जाए ताकि पूरा या अधूरा फिलीस्तीन यहूदियों को दिया जा सके, तो यह एकदम अमानवीय कदम होगा।
‘उचित तो यह होगा कि यहूदी जहां भी जनमे हैं और कमा-खा रहे हैं वहां उनके साथ बराबरी का सम्मानपूर्ण व्यवहार हो। जैसे फ्रांस में जनमे ईसाई को हम फ्रांसीसी मानते हैं वैसे ही फ्रांस में जनमे यहूदी को भी फ्रांसीसी माना जाए; और अगर यहूदियों को फिलीस्तीन ही चाहिए तो क्या उन्हें यह अच्छा लगेगा कि उन्हें दुनिया की उन सभी जगहों से जबरन हटाया जाए जहां वे आज हैं? याकि वे अपने मनमौज के लिए अपना दो घर चाहते हैं? ‘अपने लिए एक राष्ट्रीय घर’ के उनके इस शोर को बड़ी आसानी से यह रंग दिया जा सकता है कि इसी कारण उन्हें जर्मनी से निकाला जा रहा था।’
आजादी के बाद से कमोबेश हमारी विदेश-नीति की यही दिशा रही है। प्रधानमंत्री ने सांप्रदायिकता से दूषित नजर से इसे देखा और कच्ची गोली खेल दी जिसे विदेश मंत्रालय संभालने की कोशिश कर रहा है।
अमरीकी व पश्चिमी खेमे की कुल कोशिश यही है कि युद्ध भी हमारी ही मु_ी में रहे, विराम भी हमारी ही मु_ी में रहे! हमने देखा है कि दोनों ही कमाई के अंतहीन अवसर देते हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे इसरायल के विफल प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने मौके का फायदा उठा कर इसरायल के राजनीतिक नेतृत्व को अपने साथ ले लिया है। यह घटिया अवसरवादिता है। जब पूरा इसराइल उनके खिलाफ खड़ा था और वे न्यायपालिका को अपनी मु_ी में करने का भद्दा खेल खेल रहे थे, तब उनके हाथ ऐसे अवसर आ गया जिसने उन्हें नई बेईमानी का मौका दे दिया है। यह पूरी कहानी बेईमानी से ही शुरू हुई थी और बेईमानी से ही आज तक जारी है। यह नया भारत है जो इस बेईमानी में साझेदारी कर रहा है।
रास्ता क्या है? यह इतना आसान है कि बहुत कठिन लगता है। 5 मई 1947 को ‘रायटर’ के दिल्ली स्थित संवाददाता डून कैं पबेल ने गांधी का ध्यान फिर से इस तरफ खींचा- ‘फिलीस्तीनी समस्या का आप क्या उपाय देखते हैं ?’
गांधी- ‘यह ऐसी समस्या बन गया है कि जिसका करीब-करीब कोई हल नहीं है। अगर मैं यहूदी होता तो मैं उनसे कहता : ‘ऐसी मूर्खता मत करना कि इसके लिए तुम आतंकी रास्ता अख्तियार कर लो।
ऐसा कर के तुम अपने ही मामले को बिगाड़ लोगे जो वैसे न्याय का एक मामला भर हैज् अगर यह मात्र राजनीतिक खींचतान है तब तो मैं कहूंगा कि यह सब व्यर्थ हो रहा है। आखिर यहूदियों को फिलीस्तीन के पीछे इस तरह क्यों पड़ जाना चाहिए? यह महान जाति है। इसके पास महान विरासतें हैं। मैं दक्षिण अफ्रीका में बरसों इनके साथ रहा हूं। अगर इसके पीछे उनकी कोई धार्मिक प्यास है तब तो निश्चित ही इस मामले में आतंक की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यहूदियों को आगे बढक़र अरबों से दोस्ती करनी चाहिए और ब्रिटिश हो कि अमरीकी हो, किसी की भी सहायता के बिना, यहोवा के उत्तराधिकारियों को उनसे मिली सीख और उनकी ही विरासत संभालनी चाहिए।’
(बाकी पेज 8 पर)
लेकिन किसी को, किसी की विरासत तो संभालनी नहीं है । सबको संभालनी है गद्दी ! गांधी सत्ता की यह भूख पहचान रहे थे और इसलिए कैं पबेल से कहते-कहते कह गए- ‘यह एक ऐसी समस्या बन गया है कि जिसका करीब-करीब कोई हल नहीं है।’ गांधी ने जो आशंका प्रकट की थी, उसके करीब 76 साल पूरे होने को हैं लेकिन युद्ध व विराम के बीच पिसते फलस्तीनी-इस्रायली किसी हल के करीब नहीं पहुंचे हैं। विश्व की महाशक्तियां व दोनों पक्षों के सत्ताधीश पीछे हट जाएं तो येरूशलम की संतानें अपना रास्ता खुद खोज लेंगी। लेकिन सत्य, प्रेम, करुणा के ऐसे रास्ते पर उन्हें कौन चलने देगा ? ( 15।10।2023)
-डॉ. लखन चौधरी
अर्थशास्त्र का 2023 का नोबेल पुरस्कार महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में हुए महत्वपूर्णं शोध-कार्य के लिए हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर क्लाउडिया गोल्डिन को दिया गया है। गोल्डिन ने अपने शोध में सदियों से महिलाओं की आमदनी और श्रम बाजार के परिणामों पर व्यापक शोधपरक विवरणात्मक अध्ययन किया है। महिला श्रम एवं कार्यबल यानि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी एवं सहभागिता की किसी भी परिवार या देश की अर्थव्यवस्था में विशिष्ट भूमिका होती है, जिसकी अक्सर उपेक्षा या अनदेखी की जाती है। यह एक ऐसा मसला रहा है जिसकी अवहेलना भारत ही नहीं अपितु दुनियाभर में होती रही है। महिलाओं की इसी योगदान को रेखांकित करने वाले इस बेहद महत्वपूर्णं शोध कार्य के लिए गोल्डिन को यह नोबेल पुरस्कार दिया गया है, जो महिला श्रम-कार्यबल की सराहना करता है।
अमेरिका की गोल्डिन को अर्थशास्त्र का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार मिलना एक तरह से दुनिया की आधी आबादी के नजऱंदाज़ कर दिये गये महिला श्रम-कार्यबल को सराहना एवं पुरस्कृत करना है। प्रो. गोल्डिन ने पिछली लगभग दो सदियों के आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर उन कारणों का पता लगाया है, जिनके चलते श्रम के मामले में महिलाएं पक्षपात का शिकार होती आती रहीं हैं। विभिन्न कारणों से महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम पारिश्रमिक मिलता है। वैश्विक श्रम बाजार में महिलाओं का प्रतिनिधित्व चिंताजनक रूप से अत्यंत कम है। अध्ययन बतलाता है कि कमाई और रोजगार दरों में लिंग अंतर कैसे और क्यों बदलता चला आ रहा है। उल्लेखनीय है कि अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में दिया जाने वाला अर्थशास्त्र का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार अब तक 92 अर्थशास्त्रियों को मिल चुका है।
‘आर्थिक इतिहासकार और श्रम अर्थशास्त्री के रूप में गोल्डिन के शोध में महिला श्रम शक्ति, कमाई में लैंगिक अंतर या भेदभाव, तकनीकी परिवर्तन, शिक्षा और आप्रवासन सहित अनेक महत्वपूर्ण विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। नोबेल समिति ने पुरस्कार की घोषणा के दौरान कहा कि ’गोल्डिन ने अपने शोध से सदियों से महिलाओं की कमाई और श्रम बाजार के परिणामों का पहला व्यापक विवरण प्रदान किया है। उनके शोध से नए पैटर्न का पता चलता है, परिवर्तन के कारणों की पहचान होती है और जेंडर गैप के बारे में भी जानकारी मिलती है।’ दरअसल में महिला श्रम से संबंधित निष्कर्ष यद्यपि सदियों इसके बावजूद वास्तविकता के निकट हैं कि महिलाएं भारी भेदभाव की शिकार हैं। अविकसित, विकासशील या विकसित तीनों ही तरह की अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं के साथ भेदभाव जारी है। काम के दौरान वेतन, भत्ते, छुट्टी के मामलों में उनके साथ गैरबराबरी पूर्ण व्यवहार होता ही है।
भारत सहित दुनियाभर में पितृसत्तात्मक व सामंती सामाजिक व्यवस्था की वजह से कामकाजी महिलाएं उपहास, आलोचना एवं भेदभाव की शिकार होती रहीं हैं। यह किसी एक धर्म की बात नहीं है, कमोबेश सभी धर्मों, समुदायों एवं सम्प्रदायों में यही स्थिति है। सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 से 2022-23 के बीच 31 लाख में से मात्र 5 लाख पुरूष जबकि 26 लाख महिलाओं ने पक्की नौकरियां खोई हैं। महिलाओं के सन्दर्भ में गोल्डिन के शोध बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब तक आधी आबादी के लिये आर्थिक दृष्टिकोण से समानतापूर्णं वातावरण नहीं बनाया जाता, विकास का लक्ष्य पहुंच से बाहर ही रहेगा।
यहां पर उल्लेखनीय है कि ’पावर ऑफ दि पिल: ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव्स एंड वीमेन्स करियर एंड मैरिज डिसीजन्स-2002’ के सह-लेखक गोल्डिन को महिलाओं के श्रम बाजार परिणामों की सामान्य समझ को आगे बढ़ाने के लिए अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में स्थापित अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार मिला है। गोल्डिन का काम ऐतिहासिक विकास को समझने और मापने से संबंधित है कि महिलाएं ऐतिहासिक रूप से श्रम बाजारों को कैसे बदलती हैं और अमेरिका और यूरोप में कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी कैसे बदल गई है। इस महत्वपूर्ण शोधकार्य का सार है कि कैसे जन्म नियंत्रण की गोली यानि गर्भ-निरोधक के आने से 1960 और 70 के दशक में अधिक प्रजनन स्वायत्तता के कारण अमेरिका भर में कार्यबल में नामांकन करने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
गोल्डिन और काट्ज़ का निष्कर्ष गर्भनिरोधक गोली की मंजूरी के बाद महिलाओं के आर्थिक जीवन में आए बदलावों को रेखांकित करता है। अमेरिकी कॉलेज ग्रेजुएट महिलाओं की आजीविका और उनकी पहली शादी की उम्र दोनों उस पीढ़ी के साथ बदल गए जो 1950 और उसके आसपास पैदा हुई थी। 1970 में कानून के प्रथम वर्ष के छात्रों में महिलाओं की संख्या 10 प्रतिशत थी, लेकिन अवांछित गर्भधारण को रोकने की गोली की क्षमता के कारण 1980 में यह संख्या 36 प्रतिशत हो गई। लेखकों ने लिखा है कि ’गोली ने महिलाओं को सेक्स के गर्भावस्था के परिणामों के बारे में कहीं अधिक निश्चितता प्रदान करके दीर्घकालिक कैरियर निवेश में शामिल होने की लागत को सीधे कम कर दिया है।’
श्रम बाजार की महिलाओं में गर्भनिरोधक गोली के सकारात्मक परिणाम का नतीजा यह रहा कि विवाहित अमेरिकियों के बाद, गोली का उपयोग एकल महिलाओं के बीच तेजी से फैल गया। इस अवधि के दौरान अधिकांश अमेरिकी राज्यों में सहमति के लिए कानूनी उम्र को घटाकर 18 वर्ष कर दिया। शोध में महिलाओं के बीच गोली के प्रसार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभावों का भी पता लगाया गया है। 1960 के दशक से पहले तक जो युवा जोड़े यौन संबंध बनाते थे और लडक़ी के गर्भवती हो जाने पर अक्सर तुरंत शादी कर लेते थे, गर्भनिरोधक गोली ने इस धारणा को बदल कर रख दिया, इससे एक सामाजिक गुणक प्रभाव पैदा हुआ। इसका अर्थ है कि गर्भनिरोधक गोली ने अधिकाधिक महिलाओं को विलंब विवाह और कॅरियर चुनने में धेर्य के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे महिला श्रमबल की भागीदारी में बढ़ोतरी होती चली गई।
इधर पिछले दिनों जोरशोर से महिला आरक्षण बिल पारित तो कर दिया गया, लेकिन उसे भविष्य की अनिश्चितताओं के साथ लटका कर रख दिया गया है। जनगणना, परिसीमन की बाध्यताओं की सीमाओं में बांध कर महिला बिल को पारित करना पूर्णंत: राजनीतिक पैंतरा साबित हुआ। तात्पर्य यह है कि एक तरफ दुनिया में महिला सशक्तिकरण एवं महिला सहभागिता एवं भागीदारी पर शोध-कार्यों को दुनिया का नोबेल जैसा सर्वोच्च सम्मान मिल रहा है, तो भारत में महिलाओं को लेकर भी सियासत थमने का नाम नहीं ले रहा है। सवाल है कि क्या इसी तरह हमारी सरकार आधी आबादी को उनका हक देने जा रही है ? लेकिन कब देगी? और यह अनुत्तरित कब तक रहेगा? सबसे बड़ा सवाल है।
-दिलनवाज पाशा
इसराइल-हमास संघर्ष को अब आठ दिन हो गए हैं। इस संघर्ष में अब तक 1300 से अधिक इसराइली और 2300 से अधिक फिलीस्तीनी मारे जा चुके हैं।
इसराइल की सेना गजा में जमीनी अभियान चलाने के लिए सीमा पर तैयार खड़ी है और गजा में रहने वाले लोगों को उत्तरी इलाके छोड़ देने की चेतावनी दी गई है।
फिलीस्तीनी, इसराइली और मध्य पूर्व के मीडिया के अलावा दुनियाभर के मीडिया की कवरेज इससे जुड़े घटनाक्रमों पर ही केंद्रित है।
इस संघर्ष के आठवें दिन फ़लस्तीनी मीडिया की कवरेज गजा में हो रही इसराइल की बमबारी और उससे जुड़ी तबाही और जानी नुकसान पर केंद्रित रही।
इसराइल ने गजा के लोगों को शनिवार शाम तक उत्तरी गजा छोडऩे का अल्टीमेटम दिया। इससे जुड़े कई विश्लेषण भी प्रकाशित हुए हैं।
वहीं इसराइल के अंग्रेज़ी और हिब्रू मीडिया की कवरेज इसराइल की सैन्य तैयारियों, गजा में प्रस्तावित जमीनी अभियान और हमास के हमले में मारे गए लोगों पर केंद्रित रही।
हमास के अगवा किए गए लोगों के परिजनों ने तेल अवीव में प्रदर्शन किए हैं, इसराइली मीडिया ने इससे जुड़ी रिपोर्टें भी प्रकाशित की हैं।
इसराइल की सेना ने गजा के अस्पतालों को भी खाली करने का नोटिस दिया है। गजा के अल-क़ुद्स अस्पताल को इसराइल की सेना ने शाम चार बजे तक खाली करने की चेतावनी दी है। फ़लस्तीनी मीडिया में इससे जुड़ी कई रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं।
इसराइल के हारेत्ज़ अख़बार में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है, ‘इसराइल: सरकार से वंचित आघात झेल रहा एक देश।’
इस लेख में 7 अक्तूबर को हुए हमास के घातक हमले के बाद देश के राजनीतिक हालात का विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि ‘इसराइल में जो अराजकता पैदा हुई है वो एक तरह से पूरे देश को प्रेरित कर रही है। नेतन्याहू के लिए विभाजन कोई समस्या नहीं है, बल्कि ये उनकी स्थायी विशेषता है।’
वहीं इसराइल में विपक्ष के नेता याइर लेपिड ने आपातकालीन सरकार को आपदा कहा है। हारेत्ज़ ने हमले को लेकर चल रही कॉन्सपिरेसी थ्योरी पर भी एक लेख प्रकाशित किया है और आशंका ज़ाहिर की है कि इस हमले में भीतरी लोग भी शामिल हो सकते हैं।
इसराइली सेना की नाकामी
इस लेख में अख़बार ने लिखा है कि कई कट्टरपंथी इसराइली गजा युद्ध को आईडीएफ (इसराइली सेना) के शीर्ष अधिकारियों की नाकामी बता रहे हैं। इसराइल में इस समय ‘भीतरघातियों’ के बारे में भी ख़ूब सर्च किया जा रहा है।
इसराइल के चर्चित अख़बार टाइम्स ऑफ इसराइल ने एक संपादकीय में लिखा है कि ‘इसराइल राष्ट्र को नजरअंदाज किया गया।’
इस लेख में कहा गया है कि इस संकट के लगभग हर पहलू में इसराइली ये महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है और सरकार की खाली जगह को वो स्वयं भरने का प्रयास कर रहे हैं।
इसराइल ने संकेत दिए हैं कि वो अगवा किए गए लोगों की परवाह किए बिना ही गजा में जमीनी अभियान शुरू कर सकता है।
टाईम्स ऑफ इसराइल ने अपने लेख में कहा है, ‘हमें नहीं पता कि गजा में कुल कितने अपहृत और शव हैं। अग़वा किए गए लोगों के परिजन अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं कि उन्हें स्पष्टीकरण दिया जाए, एक समय तो उनसे एक शीर्ष अधिकारी ने यह तक कह दिया कि अग़वा किए गए लोगों के विषय पर युद्ध के बाद बात होगी।’
‘अब ये लोग उन इलाक़ों पर इसराइल की बमबारी देखने के लिए मजबूर हैं जहां उनके अपनों को अग़वा करके रखा गया होगा। ये अकल्पनीय स्थिति है।’
इस लेख में कहा गया है कि फिलीस्तीनियों के साथ क़ैदियों की अदला-बदली के लिए समझौते के विचार को इसराइल में इस समय बहुत समर्थन हासिल नहीं है। सिर्फ अगवा किए गए लोगों के परिवार ही अकेले नहीं हैं बल्कि जो लोग मारे गए हैं, उनके लिए भी राष्ट्र नदारद है।
इस लेख में कहा गया है कि अब तक हर अंतिम संस्कार में शामिल होते रहने वाले इसराइल के मंत्री इस बार अंतिम यात्राओं में जाने से बच रहे हैं क्योंकि शायद वो लोगों के ग़ुस्से का सामना करने से डर रहे हैं।
बुधवार सुबह पूर्व विज्ञान मंत्री इज़हार शाई के बेटे यारोन शाई के अंतिम संस्कार में इकोनॉमी मंत्री नीर बारकात शामिल हुए। उनकी मौजूदगी में शाई के भाई ओफिर ने इसराइल के प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर भड़ास निकालते हुए कहा, ‘आपने सैनिकों को अकेला छोड़ दिया है, आपने गज़़ा की सीमा पर रहने वाले लोगों को अकेला छोड़ दिया। आपने इसराइल राष्ट्र को अकेला छोड़ दिया। आपने मेरे प्यारे भाई को अकेला छोड़ दिया।’
इसराइल के मीडिया में शुक्रवार शाम अचानक टीवी पर नेतन्याहू के दिए राष्ट्र के नाम संदेश को लेकर भी आलोचना हो रही है।
नेतन्याहू ने फैलाई बेचैनी
टाइम्स ऑफ़ इसराइल ने एक लेख में कहा है कि नेतन्याहू ने अचानक राष्ट्र के नाम संदेश की घोषणा की लेकिन इसमें कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं था।
अखबार ने लिखा, ‘नेतन्याहू की घोषणा से देश में बेचैनी फैल गई, लेकिन उनके भाषण में कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे तुरंत राष्ट्र को बताये जाने की जरूरत थी।’
अभी तक सिर्फ एक इसराइली राष्ट्रपति ने ही शबात के दिन राष्ट्र को संबोधित किया है। यहूदी शुक्रवार को आराम करने का दिन मानते हैं। नेतन्याहू के अलावा 1994 में प्रधानमंत्री इत्ज़ाक रबिन ने अग़वा किए गए सैनिक नैकशॉन वॉश्मैन को छुड़ाने के अभियान के नाकाम होने की जानकारी शबात को दिए संदेश में दी थी।
हिब्रू भाषा की सबसे चर्चित मीडिया वेबसाइट वाईनेट ने गज़़ा पर ज़मीनी हमले से पहले इसराइल की तैयारियों के बारे में विस्तार से लिखा है।
इस लेख में कहा गया है, ‘जनरल स्टाफ ने यूनिटों को ज़मीनी हमले की योजना से जुड़े निर्देश देने शुरू कर दिए हैं, तब तक एयरफोर्स हमास के कमांड सिस्टम और जवाबी हमले की क्षमता को नष्ट कर रही है। हिज़बुल्लाह अभी पीछे है लेकिन एक बार गजा में इसराइल के घुसने के बाद उसके इरादों की परीक्षा होगी। इसराइल की रक्षात्मक क्षमता को पहुंची चोट की पृष्ठभूमि में अमेरिका से मिलने वाली मदद बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिका मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने और ईरानी मिलिशिया पर हमला करने के लिए तैयार हैं, ताकि आईडीएफ गजा में अपने अभियान पर ही केंद्रित रहे।’
शनिवार को इसराइल की वायुसेना ने गजा के लोगों को उत्तरी इलाक़ा खाली करने की चेतावनी भी दी।
वाईनेट ने लिखा है कि ये चेतावनी ‘गजा में हमले को वैधता देने के लिए दी गई है ताकि इसराइल बाइडन प्रशासन और पश्चिमी देशों को ये तर्क दे सके कि इसराइल अंतरराष्टीय कानूनों का पालन करते हुए कार्रवाई कर रहा है।’
फिलीस्तीनी मीडिया में क्या चल रहा है?
फिलीस्तीनी मीडिया में इसराइली हमलों में मरने वालों की बढ़ती संख्या, गजा में पैदा हो रहे मानवीय संकट और वैश्विक प्रतिक्रियाओं का जिक्र है।
पेलेस्टाइन क्रॉनिकल ने ‘हमास के इसराइली बच्चों की हत्या करने के दावों’ पर सीएनएन की रिपोर्टर के माफी मांगने से जुड़ी खबर प्रकाशित की है।
सीएनएन की रिपोर्टर सारा सिडनर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर माफी मांगते हुए कहा था कि उन्हें इसराइल के इस दावे की और सतर्कता से पड़ताल करनी चाहिए थी।
फिलीस्तीनी मामलों पर नजऱ रखने वाली वेबसाइट मोंडोवाइज में अपना अनुभव लिखते हुए एक रिपोर्टर ने लिखा है, ‘मैंने नकबा के बारे में बहुत सी कहानियां लिखीं थीं, आज मैंने नकबा का अनुभव किया।’
नकबा शब्द का मतलब होता है त्रासदी और फिलीस्तीनी लोग इसे 1948 में अपनी जमीनों से जबरदस्ती हटाये जाने की घटनाओं से जोडक़र देखते हैं।
रिपोर्टर तारिक एजाज ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘शुक्रवार सुबह इसराइल की सेना के घर छोडक़र चले जाने के कॉल के साथ हमारी आंख खुली।’
एजाज लिखते हैं, ‘शुक्रवार सुबह इसराइल के एक नंबर से मुझे फोन आया। मैंने ये फोन नहीं उठाया क्योंकि मैं एक बहुत अशांत रात से उबरने की कोशिश कर रहा था। जिस घर में खौफजदा बच्चे हों उसमें नींद लेना आसान नहीं है। हर गिरते बम पर वो चीखते हैं। आसपास जो हो रहा है, उसे समझना मुश्किल हो जाता है। मैं जानना चाहता हूं कि बम कहां गिरा, कौन मरा, लेकिन मुझे बच्चों को शांत करना पड़ता है।’
इस रिपोर्ट में लिखा है, ‘कुछ मिनट बाद फिर से फोन आया, इस बार मैंने उठा लिया और इसराइली सेना का संदेश सुना- तुम्हें अपना घर खाली करना होगा, दक्षिण की तरफ जाओ। अपनी जि़ंदगी के लिए तुम ही जि़म्मेदार हो।’
‘मैं फिर से सो गया, बाद में मेरी आंख एक भीषण धमाके से खुली। इसके बाद जो घटनाक्रम हुआ वो बम धमाके से भी ज़्यादा ख़तरनाक था। 1948 में जो लोगों ने अनुभव किया था, उसे आज मैंने जिया। ये दूसरा नकबा है।’
‘खामोश लोगों का नरसंहार’
हमास और इस्लामिक जेहाद से जुड़ी वेबसाइट कुद्स न्यूज नेटवर्क ने अपनी एक रिपोर्ट में हिजबुल्लाह के शेबा फाम्र्स इलाके पर ‘बड़े हमले’ का जिक्र किया है।
इस रिपोर्ट में हिजबुल्लाह के हवाले से इसराइली सेना के कई ठिकानों पर हमले का दावा करते हुए कहा गया है कि रॉकेट निशाने पर लगे। इसके बाद हिजबुल्लाह और इसराइली सेना के बीच गोलीबारी और बमबारी भी हुई। वहीं अपने आप को स्वतंत्र मीडिया बताने वाली फलस्तीनी मुद्दों पर केंद्रित और शिकागो से संचालित वेबसाइट इलेक्ट्रॉनिक इंतीफादा ने अपना कवरेज फिलीस्तीन के मानवीय संकट पर केंद्रित रखा है। वेबसाइट ने अपने एक लेख में लिखा है, ‘खामोश लोगों का नरसंहार।’
इस लेख में रिपोर्टर ने लिखा है, ‘जब गजा की तरफ से इसराइल पर हमला हुआ तब मैं निश्चिंत था कि समूचे गजा को इसकी कीमत चुकानी होगी। इसराइल के प्रधानमंत्री ने गजा के लोगों को तुरंत यहां से चले जाने की चेतावनी दी, लेकिन हम कहां जाएं। हम राफा चौकी की तरफ गए, वहां भी हमले हुए। लाखों लोग प्रभावित हैं, लेकिन उनके पास कहीं जाने की जगह नहीं है। गजा में जो हो रहा है, वह खामोश लोगों का नरसंहार है।’ (bbc.com/hindi)
एक बड़े अध्ययन का निष्कर्ष है कि यूरोप में अब एक-तिहाई आबादी परम्परागत प्रजातंत्र वाले दलों या उम्मीदवारों के बदले लोकलुभावनवादी दलों या फिर कट्टर दक्षिणपंथी या फिर कट्टर वामपंथी दलों या उम्मीदवारों के समर्थन में मतदान करती है। यूरोप के 31 देशों के 100 से अधिक राजनैतिक विशेषज्ञों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि अब गैर-परम्परागत और निरंकुश सत्ता का समर्थन और वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। पिछले वर्ष, यानि 2022 में यूरोप में जितने भी चुनाव हुए उसमें 32 प्रतिशत मत गैर-परम्परागत प्रजातंत्र के विचार वाले दलों और उम्मीदवारों को दिए गए, जबकि वर्ष 2000 के शरुआती दशक में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत से कम और 1990 के दशक में महज 12 प्रतिशत ही था।
इस अध्ययन के निष्कर्ष वैश्विक स्तर पर प्रजातंत्र के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। परम्परागत प्रजातंत्र के मजबूत गढ़ रहे हमारे देश में वर्ष 2014 के बाद से प्रजातंत्र के सभी संकेत विलुप्त होते जा रहे हैं और अब हम एक निरंकुश शासन में हैं जो राजशाही जैसा है। डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के प्रजातंत्र को चार वर्षों के भीतर ही राष्ट्रवादी और लोकलुभावनवादी सत्ता में बदल दिया। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अधिकतर देशों में प्रजातंत्र दम तोड़ रहा है। ऐसे में यूरोप के कुछ देश और ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड जैसे देशों में ही परम्परागत प्रजातंत्र का अस्तित्व बचा था, पर अब यूरोप में भी यह खतरे में है।
अमेरिका के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन ने भारत समेत दुनिया के 30 देशों में व्यापक सर्वेक्षण कर बताया है कि सत्ता के तौर पर प्रजातंत्र लोकप्रिय तो है, पर असमानता और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्याओं का कोई हल न निकल पाने के कारण युवा वर्ग प्रजातंत्र से विमुख होता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर 86 प्रतिशत लोगों ने प्रजातंत्र का समर्थन किया जबकि 20 प्रतिशत लोगों ने निरंकुश या तानाशाही का समर्थन किया। 18 से 35 वर्ष के आयुवर्ग के 57 प्रतिशत प्रतिभागियों ने ही प्रजातंत्र का समर्थन किया जबकि 56 वर्ष से अधिक आयुवर्ग में 71 प्रतिशत प्रतिभागियों ने प्रजातंत्र का समर्थन किया था।
दूसरी तरफ 18 से 35 वर्ष के प्रतिभागियों में से 42 प्रतिशत ने सैन्य शासन का समर्थन किया। जबकि दूसरे आयु वर्गों में से महज 20 प्रतिशत ने ही इसका समर्थन किया था। युवा प्रतिभागियों में से 35 प्रतिशत ऐसे भी हैं जिन्हें ऐसा निरंकुश शासक चाहिए जिसे चुनाव की जरूरत ही ना पड़े और जो संविधान से ना बंधा हो। इस रिपोर्ट का नाम है, कैन डेमोक्रेसी डेलीवर।
जाहिर है, पीढी-दर-पीढी प्रजातंत्र से लोगों का मोहभंग हो रहा है। यह मोहभंग प्रजातंत्र की संरचना से नहीं है बल्कि लोगों को इसके परिणाम से परेशानी है। वैश्विक स्तर पर एक बड़ी आबादी को यह महसूस होने लगा है कि प्रजातंत्र से उनका जीवन स्तर नहीं सुधर रहा है और सामाजिक और आर्थिक समस्याएं विकराल होती जा रही हैं। यह एक विरोधाभास ही है कि प्रजातंत्र से विमुख होती आबादी भी मानवाधिकार चाहती है, इसे खोना नहीं चाहती। सर्वेक्षण के दौरान हरेक भौगोलिक क्षेत्र में 85 से 95 प्रतिशत आबादी ने मानवाधिकार को सुरक्षित रखने पर जोर दिया, इसकी साथ ही वर्ण, जाति और लिंग आधारित भेदभाव का विरोध किया।
इस सर्वेक्षण ने सबसे प्रमुख वैश्विक समस्याएं गरीबी और असमानता, जलवायु परिवर्तन और भ्रष्टाचार उभर कर सामने आया है। कुल 23 प्रतिशत प्रतिभागियों ने भ्रष्टाचार, 21 प्रतिशत ने गरीबी और असमानता, 7 प्रतिशत ने विस्थापन और प्रवासी को सबसे बड़ी समस्या बताया। 53 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अपने देश के सन्दर्भ में बताया कि उनकी देश गलत दिशा में जा रहा है और लगभग एक-तिहाई प्रतिभागियों ने बताया कि सत्ता में बैठे लोग जनता के आकांक्षाओं की उपेक्षा कर रहे हैं।
सत्ता की नजर में आबादी कितनी उपेक्षित है, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 49 प्रतिशत प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि पिछले वर्ष कम से कम एक दिन ऐसा था, जब पैसे की कमी के कारण उन्हें भूखा रहना पड़ा। कुल 58 प्रतिशत प्रतिभागियों को लगता है कि राजनैतिक अस्थिरता से हिंसा के संभावना बढ़ जाती है। लगभग 42 प्रतिशत लोगों के अनुसार उनके देश में नागरिकों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त क़ानून नहीं हैं।
सर्वेक्षण में 70 प्रतिशत लोगों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन भविष्य का सबसे बड़ा खतरा है, जिससे वे और उनका रोजगार प्रभावित होगा। बांग्लादेश के 90 प्रतिशत प्रतिभागी, तुर्की के 85 प्रतिशत, केन्या ए 83 प्रतिशत, भारत के 82 प्रतिशत, चीन के 45 प्रतिशत, रूस के 48 प्रतिशत और यूनाइटेड किंगडम के 54 प्रतिशत प्रतिभागी जलवायु परिवर्तन को भविष्य का सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।
सर्वेक्षण में 45 प्रतिशत प्रतिभागियों की राय थी कि चीन की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ उनके देश में सुधार होंगें। पहले पसंद के देशों में सबसे आगे 29 प्रतिशत प्रतिभागियों ने अमेरिका का नाम लिया, दूसरे स्थान पर 27 प्रतिशत के साथ यूनाइटेड किंगडम, तीसरे पर 20 प्रतिशत के साथ फ्रांस, छठे स्थान पर साउथ अफ्रीका 17 प्रतिशत, पांचवें स्थान पर चीन 15 प्रतिशत, छठे स्थान पर 12 प्रतिशत के साथ रूस और सातवें स्थान पर 10 प्रतिशत के साथ भारत है।
इस सर्वेक्षण से इतना तो स्पष्ट है कि आज का युवा प्रजातंत्र से विमुख होता जा रहा है, उसे प्रजातंत्र के सिद्धांतों से समस्या नहीं है पर उसे लगता है कि प्रजातंत्र जीवन स्तर सुधारने में असफल रहा है। वैश्विक स्तर पर लोगों की द्विविधा यह है कि उन्हें मानवाधिकार तो प्रिय है, पर सैन्य शासन और तानाशाही से भी उन्हें परहेज नहीं है।
पूरी दुनिया में जीवंत प्रजातंत्र मृतप्राय हो चला है और निरंकुश प्रजातंत्र का दौर चल रहा है। पिछले एक दशक के दौरान जीवंत प्रजातंत्र 41 देशों से सिमट कर 32 देशों में ही रह गया है, दूसरी तरफ निरंकुश शासन का विस्तार 87 और देशों में हो गया है। दुनिया की महज 8.7 प्रतिशत आबादी जीवंत प्रजातंत्र में है। प्रजातंत्र का सबसे अधिक और अप्रत्याशित अवमूल्यन जिन देशों में हो रहा है, उनमें भारत, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका भी शामिल हैं। हंगरी, तुर्की, फिलीपींस भी ऐसे देशों की सूचि में शामिल हैं जहां प्रजातंत्र के आधार पर निरंकुश सत्ता खडी है। जीवंत प्रजातंत्र की मिसाल माने जाने वाले यूनाइटेड किंगडम में आज के दौर में जन-आंदोलनों को कुचला जा रहा है और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश है।
प्रजातंत्र के अवमूल्यन का सबसे बड़ा कारण निरंकुश सत्ता द्वारा देशों के राजनैतिक ढांचे को खोखला करना, चुनावों में व्यापक धांधली, निष्पक्ष मीडिया को कुचलना, संवैधानिक संस्थाओं पर अधिकार करना और न्यायिक व्यवस्था पर अपना वर्चस्व कायम करना है। स्टॉकहोम स्थित इंस्टिट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्शन असिस्टेंस के अनुसार दुनिया में जितने देशों में प्रजातंत्र है उनमें से आधे में इसका अवमूल्यन होता जा रहा है। कुल 173 देशों की शासन व्यवस्था के आकलन के बाद रिपोर्ट में बताया गया है कि महज 104 देशों में प्रजातंत्र है और इसमें से 52 देशों में इसका अवमूल्यन होता जा रहा है। इनमें से 7 देश– अमेरिका, एल साल्वाडोर, ब्राज़ील, हंगरी, भारत, पोलैंड और मॉरिशस - ऐसे भी हैं, जिनमें यह अवमूल्यन सबसे तेजी से देखा जा रहा है।
दुनिया के 13 देश ऐसे हैं जो निरंकुशता या तानाशाही से प्रजातंत्र की तरफ बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ 27 ऐसे देश हैं जो प्रजातंत्र हैं पर तेजी से निरंकुशता की तरफ बढ़ रहे हैं। अफग़़ानिस्तान, बेलारूस, म्यांमार, कम्बोडिया, कोमोरोस और निकारागुआ में प्रजातंत्र था, पर अब नहीं है और जनता का दमन सत्ता द्वारा किया जा रहा है। एशिया में महज 54 प्रतिशत आबादी प्रजातंत्र में है। अफ्रीका में निरंकुश सत्ता वाले देश बढ़ते जा रहे हैं, पर अधिकतर देशों में जनता प्रजातंत्र चाहती है और इसके लिए आन्दोलन भी कर रही है। गाम्बिया, नाइजर, ज़ाम्बिया, घाना, लाइबेरिया, सिएरा लियॉन जैसे अफ्रीकी देशों में जनता में प्रजातंत्र स्थापित कर लिया है। यूरोप में 17 देश ऐसे हैं, जहां प्रजातंत्र का अवमूल्यन हो रहा है। मध्य-पूर्व में केवल तीन देशों- इराक, लेबेनान और इजरायल में प्रजातंत्र है, पर तीनों ही देशों में यह खतरे में है।
जाहिर है, विगत वर्ष को प्रजातंत्र के अवमूल्यन के वर्ष के तौर पर याद किया जाएगा, पर यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले वर्षों में यह परंपरा बने रहेगी, या फिर जीवंत और परम्परागत प्रजातंत्र वापस आएगा। (navjivanindia.com)
-प्रभाकर मणि तिवारी
भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीती थीं। इस जीत के साथ ही उसने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती पेश की थी। भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने के मकसद से 2020 में धूमधाम से दुर्गा पूजा का आयोजन किया था। यह राज्य में किसी राजनीतिक पार्टी के बैनर तले आयोजित होने वाली पहली पूजा थी।
उस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल तरीके से उद्घाटन समारोह को संबोधित किया था।
हालांकि विधानसभा चुनाव में उसे इसका कोई फायदा नहीं मिल सका। वह लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने में नाकाम रही। उसे महज़ 77 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।
उसके बाद 2021 और 2022 में पार्टी की पूजा पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे थे। लेकिन अब आर्थिक दिक्कत की दलील देकर वह इस साल पूजा का आयोजन नहीं कर रही है।
हालांकि इस बार भी ईस्टर्न ज़ोनल कल्चरल सेंटर में पूजा का आयोजन हो रहा है। लेकिन अबकी बार भाजपा इसमें शामिल नहीं है। उसकी बजाय पार्टी के कुछ कार्यकर्ता इसका आयोजन कर रहे हैं। भाजपा ने अपनी पूजा वहीं से शुरू की थी।
इस साल कौन कर रहा है पूजा का आयोजन
इस साल इसे भारतीय संस्कृति मंच के बैनर तले आयोजित किया जा रहा है। सीधे पूजा आयोजित करने की बजाय अगले साल के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को राज्य भर में कम से कम सौ आयोजन समितियों के साथ सक्रियता से जुडऩे का निर्देश दिया है।
दुर्गा पूजा बंगाल में सियासी दलों के लिए जनसंपर्क का सबसे बड़ा मंच रहा है। इस मौके पर तमाम पार्टियां प्रमुख पूजा पंडालों के आसपास अपने स्टॉल लगा कर अपनी नीतियों और उपलब्धियों का प्रचार करती रही हैं।
राज्य में छोटी-बड़ी करीब तीस हज़ार पूजा आयोजित की जाती है। इनमें से तीन हज़ार से कुछ ज्यादा तो कोलकाता और आसपास के इलाकों में ही होती हैं।
पहले दुर्गा पूजा षष्ठी से लेकर नवमी यानी चार दिनों तक ही मनाई जाती थी। लेकिन अब यह दस दिनों तक चलती है। राज्य के इस सबसे बड़े त्योहार पर सियासत का रंग लगातार चटख होता जा रहा है।
वाममोर्चा के दौर में भी कई नेता विभिन्न पूजा समितियों के साथ जुड़े थे। लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद सियासत का रंग और गहरा हो गया।
भाजपा की कोशिश क्या थी?
विश्लेषकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस की तजऱ् पर भाजपा ने भी इस त्योहार का सियासी फायदा उठाने की कोशिश के तहत ही पूजा का आयोजन शुरू किया था।
बीते कुछ वर्षों से पार्टी के केंद्रीय नेता कोलकाता में कई पूजा पंडालों का उद्घाटन करते रहे हैं। इस साल भी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोलकाता में राम मंदिर की थीम पर बनने वाली एक पूजा का आयोजन करेंगे। इस आयोजन समिति के प्रमुख भाजपा नेता सजल घोष हैं।
वर्ष 2020 में भाजपा के बैनर तले दुर्गा पूजा की शुरुआत तृणमूल कांग्रेस से आने वाले नेता मुकुल रॉय और सब्यसाची दत्त ने की थी। लेकिन बाद में दोनों तृणमूल में लौट गए। बीते दो साल किसी तरह खींचतान कर पूजा के आयोजन के बाद भाजपा ने इस बार उससे हाथ खींचने का फैसला किया। अब पूजा छोटे स्तर पर आयोजित की जाएगी।
भाजपा इस बार पूजा का आयोजन क्यों नहीं कर रही है? इस सवाल पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सुकांत मजूमदार कहते हैं, ‘आर्थिक दिक्कतों के कारण हमने इसे जारी नहीं रखने का फैसला किया। कोई भी पूजा शुरू करने पर उसे कम से कम तीन साल तक करना होता है। इसलिए तीन साल तक इसके आयोजन के बाद हमने पार्टी के बैनर तले पूजा नहीं करने का फैसला किया। अब उसकी जगह पार्टी के कुछ कार्यकर्ता पूजा का आयोजन कर रहे हैं।’
मजूमदार का कहना था कि पूजा आयोजित नहीं करने का फैसला पिछले साल ही कर लिया गया था।
तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की राजनीति
वहीं तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि दुर्गा पूजा से कोई सियासी फायदा नहीं मिलते देख कर ही भाजपा ने इसके आयोजन से नाता तोडऩे का फैसला किया है।
पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, ‘भाजपा के फैसले से साफ हो गया है कि उसने 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी फायदे के लिए ही पूजा की शुरुआत की थी। लेकिन जब उसका कोई फायदा नहीं मिला तो किरकिरी होने के डर से और दो साल करने के बाद उसे बंद कर दिया गया। इससे साफ है कि पार्टी बंगाल और बंगालियों की मानसिकता भांपने में नाकाम रही है।’
घोष कहते हैं, ‘हमारे लिए दुर्गा पूजा बांग्ला संस्कृति, विरासत और इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। पार्टी इसे उत्सव के तौर पर मनाती है। वह दुर्गा पूजा के नाम पर राजनीति नहीं करती। लेकिन भाजपा ने अब धर्म और दुर्गा पूजा के नाम पर सियासत शुरू कर दी है।’
दूसरी ओर भाजपा ने उल्टे तृणमूल पर पूजा को सियासी रंग में रंगने का आरोप लगाया है। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, ‘तृणमूल कांग्रेस ने ही इस उत्सव को अपनी पार्टी के कार्यक्रम में बदल दिया है।’
उनका कहना है कि ममता बनर्जी के सत्ता में आने से पहले तक दुर्गा पूजा महज़ एक धार्मिक और सामाजिक उत्सव था। लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे एक राजनीतिक मंच में बदल दिया है।
विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव के समय से ही भाजपा को बाहरी बताते हुए उस पर हमले शुरू किए थे। इस तमगे से निजात पाने के लिए ही पार्टी ने बंगाल के सबसे बड़े त्योहार में सक्रिय हिस्सेदारी करने और एक पूजा के आयोजन का फैसला किया था।
राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर मईदुल इस्लाम कहते हैं, ‘दरअसल, भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव की कामयाबी के बाद 2021 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बंगाल में अपनी जड़ें मज़बूती से जमाने के लिए ही पूजा के आयोजन का फैसला किया था। वर्ष 2021 के चुनाव से पहले यानी 2020 की पूजा तो भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच राजनीतिक युद्धक्षेत्र में बदल गई थी।’ (bbc.com/hindi)
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
अमूमन अभिताभ बच्चन की अभिनयकला पर कम उनके संवाद शैली पर ज्यादा बातें होती हैं। इसी तरह कंटेंट में एंग्री यंगमैन प्रमुख है। एंग्री यंगमैन से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक अमिताभ की साझा इमेज की धुरी है रीयल हिन्दी भाषा। एंग्री यंगमैन की इमेज को उन्होंने विगत 20 सालों में सचेत रूप से बदला है और कन्वेंशनल पात्रों की भूमिका निभाई है। कन्वेंशनल चरित्रों वे संरक्षक-अभिभावक के रूप में सामने आए।यह एंग्रीयंग मैन की बागी इमेज से एकदम उलट इमेज है। वहीं पर कौन बनेगा करोड़पति में उनका व्यक्तित्व इन दोनों से भिन्न नजर आता।
इसमें अमिताभ बच्चन उदार मित्र के रूप में सामने आते हैं यह ऐसा उदार व्यक्ति है जिसके लिबरल विचारों और हाव-भाव को सहजता के साथ महसूस कर सकते हैं।एंग्री यंगमैन को पीडि़तजन,कन्वेंशनल को परंपरागत लोग और कौन बनेगा करोड़पति की इमेज को युवा और औरतें बेहद पसंद करते हैं।कौन बनेगा करोड़पति में वे एंग्रीमैन एवं कन्वेंशनल चरित्र की इमेजों से भिन्न नजर आते हैं।
असल में इन तीनों में साझा तत्व है उनकी बेहतर संवादशैली और हिन्दी भाषा पर अद्भुत मास्टरी।हिन्दी भाषा और संवादशैली के बिना अमिताभ बच्चन की कोई निजी पहचान नहीं बनती। अमिताभ ने अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्में की हैं लेकिन पहचान हिन्दी फिल्मों से बनी है।
अमिताभ को एक आइकॉन के रूप में देखेंगे तो वे इस क्रम में वे तीन काम करते हैं प्रथम, वे एक आइकॉन के रूप में अपनी इमेज बनाते हैं,इसमें वे अपने अभिनय के जरिए श्रोता-दर्शक से एकीकरण करते हैं ,उसकी अनुभूतियों को स्पर्श करते हैं। दर्शक जब उनको देखता है तो उसके दिमाग में पहले से उनकी इमेज रहती है। दूसरा काम वे यह करते हैं कि अपने को प्रतीक या साइन बनाते हैं।
अमिताभ बच्चन आज साख के प्रतीक हैं,भरोसे के प्रतीक हैं। इमेज बनाने के क्रम में अमिताभ ने अपने शरीर को सामान्य रखा है। शरीर का खास किस्म का गठन बनाने की कभी कोशिश नहीं की। इस क्रम में यथार्थ में जैसे दिखते हैं वैसा ही शरीर वे अभिनय में भी रखते हैं। अत: उनके एक्शन,भाव-भंगिमाएं और विचार बहुत ही आसानी से दर्शक को सम्प्रेषित हो जाते हैं । इस प्रक्रिया वे दर्शक के लिए प्रेरक बन जाते हैं। तीसरा, इस तरह की प्रस्तुति की आंतरिक विशेषता है कि अभिनय में जो चीजें नजर आती हैं उनका निषेध भी साथ ही साथ सम्प्रेषित होता जाता है। या यों कहें वे अपना विचारधारात्मक विलोम भी बनाते हैं।इसके कारण अभिनय सुंदर लगता है।फलत: अमिताभ तो अच्छा लगता है लेकिन चरित्र नहीं।
असल में दृश्यभाषा कोड रहित होती है। इटली के प्रमुख सिनेमा आलोचक पीर पाब्लो पासोलिनी का मानना है कि सिनेमा ,यथार्थ की भाषा पर निर्भर करता है।यह मनुष्य के एक्शन की भाषा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ स्क्रीन पर जो भाषा बोलते हैं वह यथार्थ पात्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। यह भाषा सिनेमा कला के विभिन्न अंगों के जरिए व्यक्त होती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अमिताभ बच्चन ने अपने व्यक्तित्व में सिनेमा की भाषा को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। सिनेमा की भाषा यथार्थ की भाषा होती है। इसमें भाषिक कोटियों की निर्णायक भूमिका होती है। वे सिनेमा में भाषा के नायक हैं।
डॉ. आर.के. पालीवाल
तरह तरह की सुख सुविधाओं के गुलाम हो चुके वर्तमान नेताओं को सत्ता प्राप्ति के लिए सेवा का मार्ग बहुत लंबा और दुरूह लगता है। अब उन्हें रेल या सडक़ से यात्रा करने में भी कष्ट होता है और यह डर भी कि आम जनता के बीच यात्रा करते वक्त जनता उनसे बहुत से सवाल करेगी और देहाती स्थानीय मीडिया भी आम जनता से जुड़े तीखे और धारदार प्रश्न पूछेगा।
उडऩ खटोले की यात्रा नेताओं को इन तमाम व्याधियों से निजात दिलाती है इसीलिए दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, कलकत्ता से लेकर हैदराबाद, चेन्नई और बैंगलोर के तमाम बड़े नेता सरकारी या पूंजीपतियों के चंदे से जुटाए प्लेन से हवाई यात्रा करते हैं। जनता को मूर्ख बनाने के लिए उन्होंने सत्ता के शॉर्टकट के लिए लालच और भय के दो ब्रह्म अस्त्र खोज लिए हैं। उनका एक ही नारा बन गया हम सत्ता में आए तो तुम पर खजाना लुटाएंगे और विरोधी आए तो घोटालों और भ्रष्टाचार से जनता और देश को लूटेंगे।
विरोधियों का भय दिखाकर और अपनी तरफ से लालच का सुनहरा जाल फेंककर जनता को जमीनी मुद्दों से भटकाना नेताओं का सबसे बड़ा शगल बन गया है। इसी शगल को आगे बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर उनकी आई टी सेल सक्रिय रहती है और इसीलिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापनों की बारिश की जाती है।
कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने लालकृष्ण आडवानी का हवाला देकर बताया था कि वे मध्य प्रदेश को आर एस एस और भाजपा की प्रयोगशाला मानते हैं। इस पर तंज कसते हुए राहुल गांधी ने आगे जोड़ा था कि मध्य प्रदेश की प्रयोगशाला में मुर्दों के इलाज के नाम पर रकम हड़पी जाती है और बच्चों के भोजन तक में घोटाला होता है। यह सच है कि मध्य प्रदेश में ऐसा शायद ही कोई विभाग है जिसमें घोटालों की खबरें न हों लेकिन ऐसे घोटालों की कांग्रेस सरकार की भी काफी लंबी सूची है।
यह भी सच है कि नवंबर में जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्य प्रदेश को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों सर्वाधिक ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। इस लिहाज से मध्य प्रदेश भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रयोगशाला बना हुआ है। विधान सभा चुनाव में दोनों दल लालच और भय के ब्रह्मास्त्रों का अपनी अपनी तरह से इस्तेमाल कर रहे हैं। जहां तक लालच का प्रश्न है इसकी शुरुआत भाजपा सरकार की तरफ से महत्वाकांक्षी लाडली बहना योजना से शुरु हुई थी।
घर बैठे महिलाओं के खाते में एक हजार रुपए प्रति माह देने की इस योजना को आधी आबादी के बड़े वोट बैंक में बदलने की भाजपा की योजना थी ।कांग्रेस ने इसे डेढ़ गुणा लालच बढ़ाकर पंद्रह सो रुपए कर इस योजना की हवा निकाल दी थी। ऊपर से प्रियंका गांधी ने हर स्कूल जाने वाले बच्चे को पांच सौ से पंद्रह सो रुपए प्रति माह घोषित कर लालच का और भी तगड़ा पांसा फेंका है।
लालच की तरह मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में भय की भी प्रतियोगिता हो रही है। भाजपा पी एफ आई को आतंकवादी संगठन और कांग्रेस को उनका हिमायती बताती है क्योंकि दिग्विजय सिंह ने इस संगठन पर दर्ज अधिकांश मामलो को फर्जी कहा है।कांग्रेस संघ को सांप्रदायिक नफरत फ़ैलाने वाला संगठन कहती है। एक अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक समुदाय का विरोधी बताकर और दूसरा बहुसंख्यक समाज को अल्पसंख्यक समाज के प्रति आक्रोशित करने का आरोप लगा कर समाज में भय का वातावरण बनाने की कोशिश करते हैं।
फ्रीबीज की प्रतियोगिता में जिस तरह भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे को पछाडक़र आगे निकलने की कौशिश कर रहे हैं उसका सबसे ज्यादा भार देश में टैक्स चुकाने वाले पांच प्रतिशत लोगों पर पड़ता है। इस कमाऊ वर्ग, जिसे दुधारू गाय कहा जाना चाहिए,की किसी को चिंता नहीं है क्योंकि उसका कोई वोट बैंक नहीं है।
फ्रीबीज पाने वाले अस्सी प्रतिशत लोगों के लिए दोनों दल इस तरह घोषणा करते हैं जैसे उनके नेता अपनी पुस्तैनी तिजोरी से धन निकालकर बांटेंगे।यह हाल तब है जब सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर सुनवाई चल रही है कि राजनीतिक दलों में आए दिन बढ़ती इस आदत पर कैसे लगाम कसी जाए। चुनाव के बाद फ्रीबीज के लिए संसाधनों की उगाही कहीं शराब की बिक्री बढ़ाकर, कहीं कर्ज लेकर, कहीं सरकारी संपत्तियों को बेचकर और तरह तरह के टैक्स बढ़ाकर ही होगी। इन सबके दुष्परिणाम चुनाव के बाद देश की जनता को ही भोगने होंगे।
ममता सिंह
मेरे गांव में सामाजिकता के नाम पर बस भोज भात रह गया है यानि जन्म हो, मृत्यु हो या कोई और अवसर बस सब खाने के समय ही इक_े होते हैं।
महिलाएं तो शोक में, दुख में दिखाने को ही सही पर रोती चीखती उदास होती दिखती हैं पर पुरुष! वह पूरी बेशर्मी के साथ गुटखा खाते, बीड़ी पीते, फोन चलाते और राजनीति पर बतियाते दीखते हैं।
जीते जी किसी बूढ़े बीमार स्त्री-पुरुष को उसके बेटे बहू, गांव वाले भले न पूछें, सेवा करें पर उसके मरते ही सब उमड़ पड़ते हैं। एक पुत्र वालों का तब भी ठीक है कि बिना किच किच दाह संस्कार हो जाता है पर एकाधिक पुत्र वालों को मरने के बाद भी चैन नहीं।
पहले तो बेटों में ही झगड़ा होगा कि कहां दाह संस्कार होगा,कौन कितना खर्चा देगा। रिश्तेदारों,पड़ोसियों की मध्यस्थता के बाद भुनभुनाते हुए क्रियाकर्म होगा। बहू मुंह फुलाए और बेटा शहीद होने जैसी शक्ल लिए फिरेगा कि अम्मा बाबू ने मेरे लिए तो कुछ नहीं किया और हम पर ही सारा खर्चा ओढ़ा दिया लोगों ने।
मृतक के जीते जी कोई दवा को भले न ले गया हो पर दाह संस्कार के लिए बस, कार बुक होगी,पूरा गांव लदकर फुंकवाने जायेगा और दाह संस्कार के बाद समोसे,रसगुल्ले का नाश्ता करके घर आएगा। और इसके बाद शुरू होगी मृतक के जीवन की सच्ची झूठी कहानी की मीमांसा जिसमें बुरे से बुरे को अच्छा बताना है, महान दिखाना है।
तेरहवीं का आयोजन भव्य से भव्यतम होता जा रहा, अब तेरहवीं है या तिलकोत्सव अंतर नहीं पता चलता। शोक के बजाय उत्सव का माहौल रहता है रही सही कसर फोटोबाजी से पूरी हो जाती है। पनीर, पुलाव, पूड़ी ठूंसकर लोग अपने घर वापस लौट जाते हैं पीछे बचते हैं परिजन।
परिजनों के भी शोक का पैमाना मृतक की उपयोगिता के समानुपाती होता है। यानी घर का कमाऊ प्राणी गया हो तो दुखी होना है और यदि बूढ़ा, बीमार, लाचार प्राणी गया हो तो मुक्ति की सांस ली जाती है।
सब कुछ देखते हुए निराशा,वैराग्य सा उपजता है। क्या हमारे भीतर मृत्यु को लेकर सच्ची संवेदना और शोक का अभाव होता जा रहा है। क्या उपयोगी होना ही मरने के बाद इज्जत पाने का पैमाना रह गया है। जिन बेटों की संख्या पर माता पिता जि़ंदगी भर इतराते फिरते हैं वह उनकी बीमारी या अकेलेपन में कहां होते हैं।
मैं तो मरने के बाद नरक में जाऊं या मेरी आत्मा सदियों भटकती रहे मुझे परवाह नहीं पर मैं ऐसी समाज व्यवस्था को अपने जीते जी खारिज करती हूं जो मेरे मरने के बाद केवल समोसा, रसगुल्ला, पनीर, पुलाव के लिए मेरी लाश के इर्द गिर्द दिखे। मृतक भोज में लाखों खर्च करने वाला समाज किसी जिंदा इंसान पर दस रुपए भी नहीं खर्च करता है।
अब यह सार्वभौमिक सत्य नहीं कि आप बहस करने लगें कि ऐसा कहां होता है! पर जी यह भी सत्य ही है और जहां मैं हूं वहां होता है।
इडो वॉक और लॉरेन्स पीटर
फ्रांस की सरकार ने देश में फ़लस्तीनियों के समर्थन में विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगा दी है।
गृह मंत्री जेराल्ड डर्मानिन ने चेतावनी दी है कि फ्रांस में रहने वाले जो विदेशी नागरिक नियमों का पालन नहीं करेंगे उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। वहीं फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने देश वासियों से एकजुटता की अपील की है।
इसराइल और हमास के बीच जारी जंग ने यूरोपीय मुल्कों की चिंता बढ़ा दी है, उनका मानना है कि मौजूदा तनाव लोगों में यहूदी विरोधी भावना को बढ़ा सकता है।
हालांकि सरकार की लगाई पाबंदी के बावजूद गुरुवार को बड़ी संख्या में फ़लस्तीनी समर्थकों ने राजधानी पेरिस में विरोध प्रदर्शन किया।
पैसेल दे ला रिपब्लिक के नजदीक हुई एक रैली में करीब 3 हजार लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारी फिलस्तीनी झंडा लहरा रहे थे और ‘इसराइल ख़ूनी है’ और ‘फिलस्तीन जरूर जीतेगा’ जैसे नारे लगा रहे थे।
भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए पुलिस ने अब तक 10 लोगों को गिरफ्तार किया है।
फिलस्तीनियों के समर्थन में विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाने का आदेश देते हुए डार्मानिन ने कहा कि रोक का पालन न करने वाले को गिरफ्तार किया जाना चाहिए ‘क्योंकि वो कानून व्यवस्था के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं।’
लेकिन फिलस्तीनी समर्थक समूहों का कहना है कि ये रोक अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ है। उनका कहना है कि वो फलस्तीनियों के हकों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन करना जारी रखेंगे।
मैक्रों की अपील
रैली में शामिल हुई शार्लोट वॉतिए ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ‘हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां नागरिक कानून है। ये एक ऐसा देश है, जहाँ हमें कसी मामले में अपनी राय रखने का हक़ है और विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है।’
वो कहती हैं, ‘एक पक्ष के हक में दूसरे पक्ष का समर्थन करने वालों पर पाबंदी लगाना अन्याय है।’
इधर जर्मनी की राजधानी बर्लिन में भी पुलिस ने सभी तरह के फिलस्तीनी समर्थक प्रदर्शनों पर रोक लगा दी है। पुलिस का कहना है कि इससे यहूदी विरोधी भावना के बढऩे और हिंसा को सही ठहराए जाने का खतरा है।
पुलिस ने कहा कि गुरुवार को बर्लिन के पश्चिम में मौजूद पॉट्सडेमर प्लात्ज में कुछ लोग फिलस्तीनियों के समर्थन में प्रदर्शन के लिए इक_ा हुए थे। इनमें से 60 प्रदर्शनकारियों ने पुलिस का आदेश मानते हुए प्रदर्शन रोक दिया।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने फ्रांस में रहने वालों से अपील की है कि वो एकजुटता का प्रदर्शन करें। उन्होंने कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विचारों का विभाजन पहले ही है, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा न होने दें।’
मैक्रों ने फिलस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास को ‘एक आतंकी संगठन’ बताया और कहा कि ‘ये संगठन इसराइल के लोगों की मौत चाहता है।’
बीते सप्ताह शनिवार को इसराइल पर हुए हमास के हमले में 13 फ्रांसीसी नागरिकों की मौत की पुष्टि हुई है। मैक्रों ने कहा कि 17 फ्रांसीसी नागरिक अब भी लापता हैं और हो सकता है कि ये उन लोगों में शामिल हों जिन्हें हमले के दौरान हमास के लड़ाके बंधक बनाकर अपने साथ गजा ले गए थे।
लापता लोगों में चार बच्चे भी शामिल हैं। मैक्रों ने कहा, ‘इसराइल और अपने दूसरे सहयोगियों के साथ मिलकर फ्रांस सभी कदम उठा रहा है ताकि इन नागरिकों को सुरक्षित वापस लाया जा सके।’
मैक्रों ने कहा कि इसराइल को अधिकार है कि वो राष्ट्रीय हित में चरमपंथियों को खत्म करे। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि ‘ऐसा करते हुए उसे आम नागरिकों की जान बचानी चाहिए क्योंकि यही गणतंत्रिक मुल्क का फर्ज है।’
उन्होंने कहा, ‘चरमपंथ के खिलाफ उठाया जाने वाला कदम मजबूत होना चाहिए लेकिन अन्याय नहीं होना चाहिए।’
फ्रांस में बढ़ी यहूदी विरोधी घटनाएं
यूरोप में फ्रांस ऐसा मुल्क है, जहाँ बड़ी संख्या में यहूदी और मुसलमान समुदाय के लोग बसते हैं।
यहाँ करीब पाँच लाख यहूदी बसते हैं जो यूरोप के दूसरे देशों की तुलना में सबसे अधिक हैं। वहीं एक आंकलन के अनुसार, देश में मुसलमानों की आबादी कऱीब 50 लाख है जो यूरोप के दूसरे किसी देश के मुकाबले अधिक है।
गुरुवार को गृह मंत्री जेराल्ड डर्मानिन ने स्थानीय मीडिया से बात करते हुए कहा कि देश में मौजूद यहूदी स्कूलों और पूजास्थनों की रक्षा के लिए वहां पुलिस की मौजूदगी बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने फ्रेंच रेडियो से कहा कि शनिवार को हमास के हमले के बाद से देश में करीब एक सौ यहूदी विरोधी घटनाएं दर्ज की गई हैं। अधिकतर मामलों में दीवारों पर ग्राफिटी बनाई गई है, जिनमें या तो ‘स्वस्तिक’ का चिह्न बनाया गया है या फिर ‘यहूदियों का खात्मा’ या ‘इसराइल के विरोध में इंतिफदा शुरू हो’ लिखा है। फिलस्तीनियों के इसराइल विरोधी और यहूदी विरोधी संघर्ष को इंतिफदा कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि कुछ घटनाओं में स्कूल और पूजास्थलों में छिपाकर चाकू ले जाने की कोशिश कर रहे लोगों को गिरफ्तार किया गया है
फ्रांसीसी पुलिस का कहना है कि उन्होंने नेशनल असेम्बली की अध्यक्ष येल ब्रॉन-पीवे और एक और नेता मेयर हबीब की सुरक्षा और कड़ी कर दी है। ये दोनों यहूदी मूल के हैं।
मिल रही जानकारी के अनुसार ब्रॉन-पीवे को मौत की धमकियां मिली हैं। वो राष्ट्रपति मैक्रों की रिनैसां पार्टी की सदस्य हैं।
इस सप्ताह उन्होंने इसराइल के समर्थन में फ्रांसीसी संसद की इमारत को इसराइली झंडे के रंग की रोशनी से सजाया था। मंगलवार को संसद क सत्र शुरू होने से पहले उन्होंने सभी सांसदों से एक मिनट का मौन रखने की भी अपील की थी।
येल ब्रॉन-पीवे ने घोषणा की कि पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ पैलेस्टीइन (पीएफएलपी) की एक सदस्य मरियम अबू दक्का अगले महीने संसद में होने वाली डॉक्यूमेंट्री स्क्रीनिंग में शामिल होने पर पाबंदी लगाई जाएगी। पीएफ़एलपी एक विद्रोही संगठन है जिसे यूरोपीय संघ चरमपंथी संगठन मानता है।
मेयर हबीब विदेश में रहने वाले फ्रांसीसी लोगों के एक संगठन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें इसराइल और फ़लस्तीनी इलाक़ों में रहने वाले फ्रांसीसी मूल के लोग शामिल हैं। वो खुले तौर पर इसराइल का समर्थन करते हैं। इसराइल पर हमास के हमले के बाद उन्होंने कहा था, ‘हम जो देख रहे हैं वो नरसंहार है।’
हमास के हमले और उसके बाद के घटनाक्रम का असर फ्रांस की राजनीति पर पड़ा है। जहां अधिकांश राजनीतिक पार्टियों ने शनिवार को हुए हमले को ‘आतंकी हमला’ करार दिया है और कहा है कि इसराइल को जवाबी कार्रवाई करने का हक है, वहीं धुर वामपंथी पार्टी की प्रतिक्रिया अलग थी।
ले फ्रांस इनसुमी पार्टी के वामपंथी नेता ज्यां लुइक मैलॉनशौं की प्रतिक्रिया सरकार की प्रतिक्रिया से अलग रही है। पार्टी ने एक बयान जारी कर हमास के हमले को ‘फिलस्तीनी ताकतों का सशस्त्र हमला’ करार दिया है जिसकी सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसी वामपंथी पार्टियों ने भी कड़ी आलोचना की है।
जर्मनी का स्टैंड
जर्मनी के चांसलर ओलाफ शूल्त्ज ने कहा है कि देश में ‘यहूदी विरोधी भावना’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उन्होंने संसद को बताया है कि फिलस्तीन समर्थक समूह सामीदू को देश में बैन किया जाएगा। हमास के हमले के बाद इस समूह से जुड़े लोगों ने बर्लिन के नजदीक नोयकर्न इलाके में मिठाइयां बांटी थीं। शूल्त्ज ने कहा, ‘हम यहूदी विरोधी भावना को बर्दाश्त नहीं करेंगे।’
उन्होंने संसद को बताया कि इसराइल की सुरक्षा उनके देश की नीति में शामिल है। इसराइल के प्रति समर्थन जताने के लिए जर्मनी की विदेश मंत्री एनालेना बारबोक शुक्रवार को इसराइल के दौरे पर जाने वाली हैं।
जर्मन अधिकारियों के अनुसार मेइन्ज, ब्रॉन्शविग और हेलब्रॉन समेत कई जगहों पर इसराइल के समर्थन में झंडे लगाए गए थे जिन्हें फ़लस्तीन समर्थकों ने फाड़ दिया लिया। कुछ जगहों पर झंडा लगाए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर उन्हें या तो फाड़ दिया गया या फिर नष्ट कर दिया गया। (bbc.com/hindi)
नीलिमा पांडेय
भारत का बटवारा 1947 के इतिहास के चंद गम्भीरतम झंझावातों में से एक था। एक करोड़ 20 लाख लोग बेघर हो गए । 10 लाख जान गई।
75000 स्त्रियों के बारे में कहा जाता है कि वह अगवे और तरह-तरह की ज़बरदस्तियों का शिकार हुईं।
परिवार बिखरे, संपत्ति लुटी और घर उजड़े। इन तमाम हिंसक तथा आपल्वनकारी घटनाओं की यादें अब जनस्मृति की चुप्पियों में खोई हुई हैं।
लेकिन देश के विभाजन से प्रभावित असंख्य लोग, जब अपने अकेलेपन के साथ होते हैं; इन छुट्टियों के पर्दे हटने लगते हैं और उन भयावह दिनों की दस्तक सुनाई देने लगती है। क्योंकि उनकी देहों और आत्माओं पर उन जख्मों की खरोंचें अभी भी बनी हुई हैं जो 1947 के उन खूनी दिनों की देन हैं।
उर्वशी बुटालिया की यह पुस्तक लगभग एक दशक के शोध कार्य, सैकडों स्त्रियों, प्रौढ़ों और बच्चों से लंबी अंतरंग बातचीत और ढेर सारे दस्तावेजों, रिपोर्ट, संस्मरणों, डायरी तथा संसदीय रिकॉर्ड के आधार पर लिखी गई है।
इसके पन्ने पन्ने पर उन बेशुमार आवाजों और वृतांतों को संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है , जो आजादी हासिल करने के 50 साल बाद भी हृदय हीनता और उपेक्षा के मलबे में दबी पड़ी थी। क्योंकि उनसे मुठभेड़ करने का साहस हम नहीं जुटा पाए हैं।
यह समझ पाना मुश्किल है कि किन लक्ष्यों को ध्यान में रखकर विभाजन स्वीकार किया गया और हकीकत में क्या क्या घटित हुआ, खासकर महिलाओं के साथ।
हिमांशु कमार
मैंने फैसला किया कि अब जब फेसबुक पर युद्ध का ऐलान हो ही चुका है तो चलकर पाकिस्तान का नामो-निशान मिटाने के महान काम में मुझे भी अपना योगदान देना चाहिए।
मैं राजस्थान के गड़रियों के साथ मिलकर पाकिस्तान में दाखिल हो गया।
पाकिस्तान में घुसने के बाद मैंने आसपास नजर दौड़ाई कि पाकिस्तान को बर्बाद करने की शुरुआत कहां से करी जाय?
मेरे आसपास रेत का मैदान और झाडिय़ाँ थीं।
मैंने थोड़ी सी रेत बर्बाद करने की मंशा से हवा में उड़ा दी और सोचा कि कम से कम पाकिस्तान की कुछ रेत ही बर्बाद कर दूं।
लेकिन वह रेत उडक़र वापिस मेरी आँखों और कुछ मुंह में घुस गई।
अपना पहला वार खाली जाने के बाद गुस्से से मैंने कुछ पाकिस्तानी झाडिय़ों को बर्बाद करने के लिहाज से उन्हें उखाडऩा चाहा।
लेकिन रेगिस्तानी झाडिय़ाँ काँटों से भरी होती हैं इसलिए मेरे हाथ में कांटे घुस गये।
झाडिय़ों को कोसते हुए मैंने झाडिय़ां बर्बाद करने का आइडिया भी ड्राप कर दिया।
मैंने दूर नजर दौड़ाई तो वहाँ से मुझे धुंआ उठता दिखाई दिया, मैंने सोचा जरूर ये पाकिस्तानी आग जलाकर भारत को जलाने की तैयारी में लगे हुए होंगे।
जब मैं धुंए के नजदीक पहुंचा तो मैंने देखा कि धुंआ एक झोपड़ी से निकल रहा था।
मैंने सोचा अंदर आतंकवादी होंगे।
मैंने हाथ में एक डंडा ले लिया और घर के पीछे की तरफ गया।
घर के पीछे एक खिडक़ी थी।
मैंने चुपके से खिडक़ी के भीतर झाँका तो भीतर एक बूढ़ा आदमी चूल्हे पर रोटियाँ सेक रहा था।
कमरे में दीवार के साथ एक खाट पर एक बूढ़ी औरत लेटी हुई थी।
वो शायद बीमार थी क्योंकि वो बार-बार खांस रही थी।
जमीन पर एक बच्चा बोरी का टुकड़ा बिछा कर पढ़ रहा था।
मेरे खिडक़ी के झांकने से कमरे में आने वाली रोशनी कम हुई बूढ़े व्यक्ति ने मुझे नजर उठाकर देखा और पूछा कौन हो भाई, भीतर आ जाओ।
मेरा दिल जोर-जोर से धडक़ने लगा।
मुझे लगा अगर मैंने भागने की कोशिश करी तो अभी यह बूढ़ा चूल्हे के पीछे से एके फोर्टी सेवेन निकालकर मुझे भून देगा।
मैं डरते-डरते सामने के दरवाजे से घर के भीतर चला गया।
बूढ़ी महिला खटिया पर उठकर बैठ गई।
बच्चा भी पढ़ाई रोककर मुझे देखने लगा।
बूढ़े ने मेरे सामने बैठने के लिए एक लकड़ी का पीढ़ा सरका दिया और मटके से एक गिलास पानी निकालकर मेरे सामने खड़ा हो गया।
मैंने सोचा जरूर पानी में जहर डालकर लाया होगा।
लेकिन रेगिस्तान में इतनी देर चलने के बाद मेरा प्यास से बुरा हाल था इसलिए मैंने सारा पानी एक ही सांस में खत्म कर दिया।
बूढ़े ने कहा बेटा लगता है परदेसी हो, रास्ता भटक गये हो, भूख लगी होगी, लो रोटी खा लो।
मेरे मना करने के बाद भी बूढ़े ने एक एल्मूनियम की थाली में दो रोटी और आलू की सब्जी डाल कर मेरे सामने रख दी।
मैंने सोचा कि पाकिस्तान को बर्बाद करने के लिए जिंदा रहना जरूरी है इसलिए खाना खा लिया जाय।
मैं खाना खा रहा था तभी बूढ़े ने कहा हिन्दुस्तान की तरफ से आये लगते हो?
मुझे लगा कि जरूर यह बूढ़ा आईएसआई का एजेंट है।
मैं घिर चुका था मैंने डरते-डरते कहा जी हाँ रास्ता भटक गया था।
बूढ़े ने बेहद नरमी से कहा कोई बात नहीं यहाँ के गडरिये अपनी बकरियां चराते-चराते कभी कभी हिन्दुस्तान में चले जाते हैं।
मैं बोल दूंगा तो हमारे गाँव वाले तुम्हें हिन्दुस्तान पहुंचा देंगे।
मैंने सर नीचा करके कहा जी ठीक है।
बाहर रात हो गई थी बूढ़े ने कहा बेटा रात यहीं रुक जाओ, सुबह तुम्हारी वापसी का इंतजाम कर देंगे।
आधी रात को जब सब सो रहे थे तो मैं उठा और चुपके से बाहर निकल गया।
काफी दूर चलने के बाद एक सडक़ मिली।
सडक़ पर करीब एक किलोमीटर चलने के बाद एक ढाबा मिला।
ढाबे वाले से मैंने पूछा कि क्या यहाँ रुकने के लिए कोई इंतजाम हो सकता है।
ढाबे वाले ने कहा कि इतनी सारी खाटें पड़ी हैं किसी पर भी सो जाइये।
ढाबे पर मैं सुबह-सुबह उठ गया।
सामने से एक ट्रक गुजर रहा था।
मैंने ट्रक को हाथ दिया और उसमें सवार हो गया।
एक कस्बा देखकर मैंने कहा मुझे यहाँ उतार दो ।
जब उसे मैंने पैसे देने चाहे तो उसने भारतीय रूपये देखकर कहा कि जी आप तो हमारे मेहमान हो मैं आपसे पैसे कैसे लूँगा और ट्रक लेकर आगे बढ़ गया।
कस्बे में पहुँचने के बाद मैंने सोचा कि अब शायद मुझे पाकिस्तान को बर्बाद करने का मौका मिल सकता है।
तभी मुझे एक फौजी दिखाई दिया ।
मैंने सोचा कि हाँ मेरी लड़ाई तो पाकिस्तान आर्मी से ही है क्योंकि ये फौजी ही तो हम पर हमला करते हैं।
फौजी के करीब जाकर मैंने बहाना बनाया कि मैं पत्रकार हूँ और वीजा लेकर पकिस्तान में घूमने आया हूँ।
वो सिपाही मेरी बातों में आ गया।
मैंने उससे पूछा कि आपके भारत के बारे में क्या विचार हैं?
वो बोला कि देखिये सिपाही तो अफसर के आर्डर पर जंग लड़ता है।
सिपाही की किसी से दुश्मनी नहीं होती।
सिपाही तो हमेशा यही चाहता है कि अमन रहे।
उस फौजी ने कहा कि हमारे सामने बार्डर पर जो हिंदुस्तानी सिपाही खड़ा है वो पाकिस्तान के बारे में नहीं अपने बच्चों के बारे में सोचता रहता है।
हम भी अपने बच्चों के भविष्य के बारे में फिक्रमंद रहते हैं।
फौजी ने बताया उसके दो बच्चे हैं, बीबी को कैंसर हो गया है, इलाज करा रहा है।
उसने बताया कि मुझे हमेशा छुट्टी लेनी पड़ती है इसलिए अफसरों से कई बार मुझे ताने भी सुनने पड़ते हैं।
मुझे लगा इस फौजी को मारने से पकिस्तान को कोई नुकसान नहीं होगा, उलटे इसके अफसर खुश होंगे कि चलो एक बोझ कम हुआ।
पकिस्तान में घूमते हुए मैंने गरीब मजदूर देखे जो दिन भर काम करने के बाद भी अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते।
मैंने किसान देखे जो कड़ी मेहनत के बाद भी अपने परिवार को इलाज और शिक्षा देने में असमर्थ हैं।
मैंने पढ़े-लिखे नौजवान देखे जो बिना नौकरी के परेशान हैं।
मैंने पाकिस्तान में भी धार्मिक लोगों को मजे में देखा।
उन्हें देखकर मुझे भारत के धार्मिक नेताओं की याद आ गई जो धर्म के नाम पर हमें लड़वाते रहते हैं।
पकिस्तान में भी ऐसे भडक़ाने वाले लोग बड़े ताकतवर थे।
मैंने देखा जैसे भारत में पाकिस्तान के खिलाफ भडक़ाकर वोट मांगे जाते हैं वैसे ही पाकिस्तान में भी भारत के खिलाफ भडक़ाकर नेता लोग वोट मांग रहे थे।
पाकिस्तान में मुझे एक युवक मिला उसने मुझसे कहा कि मेरी समझ में नहीं आता कि भारत पाकिस्तान को और क्या बर्बाद करना चाहता है? हम तो पहले से ही बर्बाद हैं?
उसकी बातें सुनकर मुझे भारत की बर्बादी याद आ गई।
हमारे भारत में भी तो किसान बर्बाद हो रहे हैं, मजदूरों के ऊपर मजदूरी बढ़ाने की मांग करने पर पुलिस लाठी चलाती है।
हमारे देश में भी बड़े पूंजीपतियों के लिए लाखों आदिवासियों को जंगल से बाहर खदेड़ा जा रहा है।
अब पाकिस्तान को बर्बाद करने का मेरा जोश कमजोर पडऩे लगा था।
मैं जहां भी जाता था मुझे भारतीय जानकर लोग मुझे बहुत प्यार देते थे।
मैंने सोचा पाकिस्तान को बर्बाद करने का मतलब क्या इन प्यारे लोगों को बर्बाद करना है?
क्या हम इन स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों को मारना चाहते हैं?
क्या हम इन निर्दोष औरतों को या रोजग़ार तलाश कर रहे नौजवानों को मारना चाहते हैं?
आखिर जब हम कहते हैं कि पाकिस्तान का नामो निशान मिटा दो तो हम इन निर्दोषों की हत्या के लिए तो अपनी सरकार को कहते हैं।
यह सोचते हुए मेरा सर चकराने लगा।
मुझे लगा हे प्रभु यह मैं क्या पाप करने चला था?
हमें धर्म के नाम पर इतना क्रूर बनाया जा रहा है?
और हम मूर्ख इन भडक़ाने वाले दुष्टों के पीछे लगे हुए हैं?
अब मेरी आंखें खुल चुकी थीं।
मैं जिस रास्ते भारत से पाकिस्तान गया था उसी रास्ते वापिस आ गया।
-अरुण दीक्षित
मध्यप्रदेश के "रिकॉर्डतोड़" मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले कुछ दिनों से एकदम अलग मूड में हैं।खासतौर पर पिछले आठ दिन में उनका जो "चेहरा" सामने आया है,वह सबको चौंका रहा है।शीर्ष नेतृत्व के सामने हमेशा नतमस्तक रहने वाले शिवराज अचानक सीना ठोक कर उसके सामने खड़े हो गए हैं।उनके हावभाव और भाषा दोनों बदल गए हैं!ऐसा लग रहा है कि शीर्ष नेतृत्व को भी शिवराज के बदले तेवर समझ में आ गए हैं।
शिवराज के जीवन में यह बदलाव पिछले आठ दिन में दिखाई दिया है!यह एक ऐसा बदलाव है जिसने करीब साढ़े छह दशक की उनकी जिंदगी की तस्वीर ही बदल दी है।
अब जरा घटनाक्रम पर नजर डालते हैं।11अक्टूबर 2023 को उन्होंने भोपाल में एक रोड शो में कहा कि वे फीनिक्स पक्षी की तरह हैं।जो कभी खत्म नहीं होता है।सैकड़ों साल जीवित रहता है।फिर जल कर अपनी ही राख से पैदा हो जाता है।फीनिक्स दुनियां में अपनी तरह का अकेला पक्षी माना जाता है।जिसका अपना कोई परिवार नही होता है।वह सैकड़ों साल की अपनी जिंदगी अकेले ही जीता है।
इसके पहले भी शिवराज ने इसी तरह का बयान दिया था।बात साल 2018 के आखिरी महीने की है।विधानसभा चुनाव हार कर जब शिवराज मुख्यमंत्री का अधिकृत आवास छोड़ रहे थे तब उन्होंने अपने लोगों से कहा था - चिंता मत करना मैं हूं न ! टायगर अभी जिंदा है!
टायगर से फीनिक्स तक के सफर में शिवराज सिंह चौहान के जीवन में बहुत पानी बह गया है।मुख्यमंत्री की जो कुर्सी उन्होंने जनता की वजह से खोई थी,वह ज्योतिरादित्य सिंधिया की कांग्रेस से बगावत के चलते,15 महीने बाद ही उन्हें फिर मिल गई थी।फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार यह कुर्सी उन्हें नरेंद्र मोदी की कृपा से मिली थी।क्योंकि उन्होंने ही उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था।कमलनाथ सरकार के पतन में अहम भूमिका निभाने वाले अमित शाह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने का आश्वासन दे चुके थे।लेकिन मोदी ने शिवराज का साथ दिया।
अब करीब पौने चार साल बाद शिवराज सिंह चौहान फिर उसी स्थिति में हैं जिसमें दिसंबर 2018 में थे।फर्क इतना है कि तब वे चुनाव हार चुके थे।अब वे मुख्यमंत्री तो हैं लेकिन उन्हें पता है कि आने वाली दिसंबर में उनकी ताजपोशी नही होगी।माना जा रहा है एक बार फिर उन्हें टायगर जिंदा है..कहना पड़ सकता है।लेकिन वे अक्तूबर में ही टायगर से फीनिक्स पर पहुंच गए।
दरअसल पिछले चार महीने में जो घटनाक्रम हुआ है,वह बताता है कि केंद्रीय नेतृत्व(नरेंद्र मोदी - अमित शाह) ने यह तय कर लिया है कि वह मध्यप्रदेश विधानसभा का चुनाव तो किसी भी कीमत पर जीतेगा लेकिन शिवराज सिंह को पांचवी बार मुख्यमंत्री नही बनने देगा।इसलिए जब अमित शाह ने प्रदेश में विधानसभा चुनाव की व्यवस्था अपने हाथ में ली तब यह भी साफ कर दिया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के मुख्यमंत्री चेहरा नही होंगे।अमित शाह ने शुरू से ही यह कहा कि मध्यप्रदेश में सामूहिक नेतृत्व और दिल्ली में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनेगी।दूसरी सूची में प्रदेश के बड़े बड़े नेताओं के नाम डाल कर यह प्रमाणित भी किया।
एक ओर शिवराज सरकारी खजाने के बल पर पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने की तैयारी कर रहे थे वहीं अमित शाह लगातार प्रदेश में सामूहिक नेतृत्व की बात कर रहे थे।बीजेपी का कोई भी नेता शिवराज सिंह का नाम लेने को तैयार नहीं था।
25 सितम्बर 2023 को, दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के दिन, भोपाल में नरेंद्र मोदी ने भी अमित शाह की बात पर मोहर लगाई।लाखों पार्टी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में मोदी ने अपने भाषण में शिवराज का नाम तक नहीं लिया।न उन्होंने शिवराज की उन योजनाओं का जिक्र किया जो गेम चेंजर मानी जा रही हैं।मोदी आए तो थे पार्टी का प्रचार करने लेकिन सिर्फ अपना प्रचार करके चले गए।न शिवराज की कोई बात की ओर न उनकी सरकार और योजनाओं की।
उसके बाद यह साफ हो गया कि अब शिवराज अपनी आखिरी पारी खेल रहे हैं।वह भी नाइट बैटर की भूमिका में।इस बात पर मीडिया में चर्चा भी खूब हुई।और तो और गोदी मीडिया ने भी सवाल उठाया।
इस घटना के ठीक दस दिन बाद ,पांच अक्तूबर 2023 को शिवराज ने ऐसा दांव चला,जिसने सबको आश्चर्य चकित कर दिया।उस दिन नरेंद्र मोदी जबलपुर आए थे।बड़ी सभा थी।शिवराज ने मोदी के भाषण से पहले ही सभा में लाई गई जनता से पूछ लिया - मेरी सरकार कैसी चल रही है?अच्छी चल रही है कि नहीं? मैं अच्छा काम कर रहा हूं कि नहीं?
शिवराज के सवाल पर जो जवाब जनता से आया उसे मोदी ने भी सुना।
इस सभा के अगले दिन शिवराज एक कदम और आगे बढ़ गए!डिंडोरी में एक सरकारी सभा में उन्होंने फिर जनता से पूछा - मैं कैसी सरकार चला रहा हूं? अच्छी सरकार चला रहा हूं कि नहीं।मेरी सरकार फिर बननी चाहिए कि नहीं? बननी चाहिए कि नहीं? मामा को फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहिए कि नहीं?
शिवराज यहीं नहीं रुके!उन्होंने भीड़ से अगला सवाल पूछा - नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनना चाहिए कि नहीं।साथ ही मंच से यह भी कहा कि जो मेरा साथ देगा मैं उसका साथ दूंगा!
शिवराज की इस रैली ने राजनीतिक हलकों में सनसनी फैला दी।माना गया कि शिवराज अब बगावत के मूड में आ गए हैं।उन्होंने जनता के बीच सार्वजनिक मंच से मोदी शाह को उत्तर दे दिया है!वे भले ही सामूहिक नेतृत्व की बात करें लेकिन शिवराज ने अपना दावा जनता की अदालत में पेश कर दिया है।
शिवराज के इस बदले रूप की चर्चा चल ही रही थी कि केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश के विधानसभा प्रत्याशियों की चौथी सूची जारी कर दी।57 नामों की इस सूची में शिवराज के साथ साथ ज्यादातर नाम उन्हीं की पसंद के थे।शिवराज ने इस पर प्रतिक्रिया भी दी।उन्होंने कहा - प्रदेश संगठन की ओर से जो नाम सुझाए गए थे,केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें मंजूरी दे दी है।इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व का आभार!शिवराज की इस प्रतिक्रिया के बाद यह सवाल भी उठा कि अगर केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश संगठन की सिफारिश मानी है तो फिर दिल्ली ने जो सर्वे कराए थे उनका क्या हुआ?जब यही करना था तब सर्वे कराए ही क्यों?
चौथी सूची में उन लोगों के नाम भी थे जो पार्टी में शिवराज के विरोधी माने जाते हैं।साथ ही उनके भी जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से बीजेपी में आए थे।बीजेपी की यह चौथी सूची शिवराज की जीत के रूप में देखी गई।
शिवराज ने इस बीच एक और चौकाने वाला कदम उठाया। वे अचानक "शांति" की तलाश में गंगा की शरण में ऋषिकेश चले गए।वहां दो दिन "शांति" के साथ बिता कर भोपाल लौटे।इस बात की जानकारी भी उन्होंने गंगा के किनारे की अपनी फोटो सोशल मीडिया में पोस्ट करके दी।
भोपाल आकर वे बदले बदले दिखे।करीब पांच साल पहले खुद को टायगर बताने वाले शिवराज ने अपनी तुलना फीनिक्स पक्षी से की। उन्होंने राजधानी में रोड शो करते हुए कहा - मैं मर भी गया तो फीनिक्स पक्षी की तरह राख से फिर पैदा हो जाऊंगा।जनता की सेवा के लिए!
उनके इस बयान की अलग अलग ढंग से व्याख्या की जा रही है!सबसे बड़ा सवाल यह है कि राम भक्त शिवराज ने ग्रीक मैथालोजी के प्रतीक फीनिक्स पक्षी से ही अपनी तुलना क्यों की?वे संघ के स्वंयसेवक और बीजेपी के सदस्य हैं।इसी वजह से एक सामान्य कार्यकर्ता से उठकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे हैं।उन्होंने देश में बीजेपी का सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है।फिर वे हमेशा अकेले रहने वाले,परिवारविहीन पक्षी से अपनी तुलना क्यों कर रहे हैं?यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि केंद्र द्वारा सामूहिक नेतृत्व की बात किए जाने के बीच वे "मैं और मेरी" पर उतर आए हैं।उन्होंने जनता से पूछा कि मेरी सरकार कैसी चल रही है?मुझे पांचवी बार मुख्यमंत्री बनना चाहिए कि नहीं?
खुद बीजेपी के नेता यह मान रहे हैं कि शिवराज जो लाइन ले रहे हैं वह संघ और बीजेपी की लाइन नही है। उनका कहना है कि संघ बीजेपी दोनों ही "हम" में विश्वास करते हैं।"मैं" हमारे शब्दकोश में ही नही है। हमारे आदर्श भगवान राम ने कभी अकेले की बात नही की और न हम करते हैं।वह हमेशा लक्ष्मण और सीता जी के साथ बताए गए हैं।या फिर हनुमान उनके साथ रहे हैं।ऐसे में ग्रीक का फीनिक्स पक्षी शिवराज के मन में कैसे और क्यों आया?
एक वर्ग यह भी मान रहा है कि पिछले कुछ महीने से जिस तरह उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा था, उसका उन्होंने जवाब दिया है।जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्ममुग्धता की वजह से आत्मकेंद्रित होकर मैं मैं करते रहते हैं ठीक उसी तरह शिवराज भी अब यह बताना चाहते हैं कि वे किसी से कम नहीं हैं।उन्हें कोई रोक नहीं सकता।फीनिक्स पक्षी की तरह वे अकेले ही लंबी पारी खेलेंगे।अकेले ही संघर्ष करेंगे!
अब देखना यह कि आने वाले दिनों में दिल्ली उनके साथ क्या सलूक करती है।उन्होंने टायगर से फीनिक्स तक का सफर तो पूरा कर लिया है।क्या उनका अंत भी फिनिक्स जैसा ही होगा?क्या दो महीने बाद वे राजनीति के बियाबान में खो जाएंगे और राजनीति की राख में विलीन हो जाएंगे?क्योंकि अभी तक तो यही देखा गया है कि बड़े से बड़े सूरमा राख में मिलने के बाद राख के ही होकर रह गए!
राख से निकल कर वापस आते किसी को देखा नहीं गया। पर अब शिवराज राख से वापस निकलने की दंभोक्ति कर रहे हैं तो अवश्य कुछ सोच समझ कर ही कर रहे होंगे।चलिए आगे आगे देखिए होता है क्या।
-प्रियंका झा
इसराइल और फलस्तीनियों का विवाद कई बार जंग का रूप ले चुका है। इसराइल के जन्म से ही फलस्तीनियों के अपने मुल्क का सवाल बना हुआ है लेकिन वक़्त के साथ इसका समाधान मिलने के बजाय स्थितियां और जटिल होती जा रही हैं।
फलस्तीनियों को उम्मीद रहती है कि अरब के इस्लामिक देश कम से कम इसराइल के खिलाफ उनके साथ खड़े होंगे। लेकिन सबके अपने-अपने हित हैं और उसी के अनुसार सबकी प्रतिक्रिया होती है। जब यूएई, मोरक्को, बहरीन और सूडान ने अब्राहम अकॉर्ड्स के ज़रिए इसराइल को मान्यता दी और औपचारिक रिश्ते कायम किए तो तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने विरोध किया था जबकि तुर्की के इसराइल के साथ राजनयिक संबंध पहले से ही थे।
तुर्की और इसराइल में 1949 से ही राजनयिक संबंध हैं। तुर्की इसराइल को मान्यता देने वाला पहला मुस्लिम बहुल देश था।
2005 में अर्दोआन कारोबारियों के एक बड़े समूह के साथ दो दिवसीय दौरे पर इसराइल गए थे। इस दौरे में उन्होंने तत्कालीन इसराइली पीएम एरिएल शरोन से मुलाकात की थी और कहा था कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से न केवल इसराइल को ख़तरा है बल्कि पूरी दुनिया को है।
2010 में मावी मरमार वाकय़े के बाद से दोनों देशों के बीच कड़वाहट थी। इस घटना में इसराइली कमांडो ने तुर्की के पोत में घुसकर उसके 10 लोगों को मार दिया था। लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के में कारोबारी संबंध हैं। 2019 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 6 अरब डॉलर से ज़्यादा का था।
इसराइल मामले में तुर्की की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि उसका राष्ट्रीय हित किस हद तक प्रभावित नहीं होता है।
हमास के हमले से ठीक पहले अर्दोआन इसराइल जाने वाले थे।
सऊदी अरब भी खुलकर फ़लस्तीनियों के अधिकारों की बात करता है लेकिन इस हद तक नहीं जाता है कि पश्चिम को एकदम से नाराज़ कर दे।
यूएई ने तो इसराइल और गजा में मौजूदा हिंसा के लिए हमास को जिम्मेदार ठहराया है। ईरान खुलकर हमास का समर्थन कर रहा है और इसराइल पर सीधे उंगली उठा रहा है। ईरान के हितों का अपना समीकरण है और उसी के हिसाब से वह प्रतिक्रिया दे रहा है।
हमास को लेकर विरोधाभास
सऊदी अरब और हमास के रिश्ते भी उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। 1980 के दशक में हमास के बनने के बाद से सऊदी अरब के साथ उसके सालों तक अच्छे संबंध रहे।
2019 में सऊदी अरब में हमास के कई समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया था। इसे लेकर हमास ने बयान जारी कर सऊदी अरब की निंदा की थी। हमास ने अपने समर्थकों को सऊदी में प्रताडि़त करने का भी आरोप लगाया था। 2000 के दशक में हमास की कऱीबी ईरान से बढ़ी।
हमास एक सुन्नी इस्लामिक संगठन है जबकि ईरान शिया मुस्लिम देश है लेकिन दोनों की कऱीबी इस्लामिक राजनीति की वजह से है। अहमद कहते हैं कि ईरान के कऱीब होने के बावजूद इससे हमास को कोई फ़ायदा नहीं होता है।
ईरान से कऱीबी के कारण सऊदी अरब से हमास की दूरी बढऩा लाजि़म था क्योंकि सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी रही है। ऐसे में हमास किसी एक का ही कऱीबी रह सकता है।
इसराइल का जितना खुला विरोध ईरान करता है, उतना मध्य-पूर्व में कोई नहीं करता है। ऐसे में हमास और ईरान की कऱीबी स्वाभाविक हो जाती है।
2007 में फ़लस्तीनी प्रशासन के चुनाव में हमास की जीत हुई और इस जीत के बाद उसकी प्रासंगिकता और बढ़ गई थी। लेकिन हमास और सऊदी अरब के रिश्ते भी स्थिर नहीं रहे। जब 2011 में अरब स्प्रिंग या अरब क्रांति शुरू हुई तो सीरिया में भी बशर अल-असद के ख़िलाफ़ लोग सडक़ पर उतरे। ईरान बशर अल-असद के साथ खड़ा था और हमास के लिए यह असहज करने वाला था।
इस स्थिति में ईरान और हमास के रिश्ते में दरार आई। लेकिन अरब क्रांति को लेकर सऊदी अरब का रुख़ मिस्र को लेकर जो रहा, वो भी हमास को रास नहीं आया।
सऊदी अरब मिस्र में चुनी हुई सरकार का विरोध कर रहा था। ऐसे में फिर से हमास की तेहरान से करीबी बढ़ी।
2019 के जुलाई में हमास का प्रतिनिधिमंडल ईरान पहुँचा और उसकी मुलाकात ईरान के सर्वोच्च नेता अयतोल्लाह अली खामेनेई से हुई थी। सऊदी अरब में हमास के नेताओं को मुस्लिम ब्रदरहुड से भी जोड़ा जाता है।
इसराइल और हमास के बीच अभी हिंसक संघर्ष चल रहा है और इसमें अब तक 67 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 14 बच्चे हैं। इस बीच हमास ने मध्य पूर्व के प्रतिद्वंद्वी देश ईरान और सऊदी से एकता बनाने की अपील की है।
हमास के एक प्रवक्ता ने न्यूजवीक से कहा था, ‘इसराइल ने अल अक्सा मस्जिद का अपमान किया है। इसलिए हम रॉकेट दाग रहे हैं। वे पूर्वी यरुशलम से फलस्तीनी परिवारों को निकालना चाह रहे हैं। अल अक्सा मुस्लिम जगत के लिए तीसरी सबसे पवित्र जगह है और फलस्तीन के लिए सबसे पवित्र जगह। हमें उम्मीद है कि सऊदी अरब और ईरान आपसी मतभेद भुला देंगे। अगर ऐसा होता है तो फलस्तीनियों के लिए बहुत अच्छा होगा।’
हमले पर क्या कह रहे हैं इस्लामिक देश?
संयुक्त अरब अमीरात ने रविवार को बयान जारी कर हमास के हमले को ‘गंभीर और तनाव बढ़ाने वाला’ बताया था। यूएई के विदेश मंत्रालय के बयान में कहा था कि वो ‘इसराइली नागरिकों को उनके घरों से अगवा कर के बंदी बनाए जाने की खबरों से स्तब्ध है।’
बहरीन ने भी हमास के हमलों की आलोचना की है। बहरीन ने कहा था, ‘हमले ने तनाव को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है, जिससे आम लोगों की जान जोखिम में पड़ गई है।’ इन दोनों देशों के ये बयान उनके पहले के रुख़ से अलग है, जब पूरा अरब वर्ल्ड इसराइल के खिलाफ एक सुर में बोलता था।
सऊदी अरब ने संतुलन बरतने की कोशिश की है। हालांकि उसने ‘इसराइली कब्ज़े' का जि़क्र किया है और हमास के हमले की निंदा न करते हुए ख़ुद को फलस्तीन के साथ खड़ा दिखाया है। सऊदी अरब की ओर से जारी बयान में इस संघर्ष को तुरंत रोकने और दोनों ओर नागरिकों की सुरक्षा का आह्वान किया गया है।
बयान में कहा गया है, ‘सऊदी अरब फ़लस्तीनी लोगों के वैध अधिकार हासिल करने, सम्मानजनक जीवन जीने की कोशिश और उनकी उम्मीदों को पूरा करने और न्यायपूर्ण और स्थायी शांति की कोशिश में उसके साथ खड़ा रहेगा।’
कुवैत, ओमान और कतर ने इसराइल पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए एक बार फिर से फ़लस्तीन को देश के रूप में मान्यता देने की मांग दोहराई है, जिसकी राजधानी पूर्वी यरुशलम हो। कतर ने इसराइल को इस तनाव का अकेला जिम्मेदार बताया है।
मलेशिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान ने भी फ़लस्तीनियों के प्रति समर्थन दिखाया है।
मोरक्को भी अब्राहम समझौते के तहत इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य करने वाले देशों में से एक है। मोरक्को ने हमलों को लेकर काफी संतुलित बयान जारी करते हुए कहा, ‘मोरक्को गजा में हालात बदतर होने और सैन्य कार्रवाई तेज होने पर अपनी गहरी चिंता व्यक्त करता है। नागरिकों के खिलाफ हमलों की निंदा करता है, चाहे वे कहीं भी हों।’
तुर्की ने इसराइल की आलोचना तो की है लेकिन उसके रुख में वो आक्रामकता नहीं दिखी जो पहले थी। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन अतीत में इसराइल की तुलना नाजी जर्मनी से कर चुके हैं। अर्दोआन ने 2019 में संयुक्त राष्ट्र के भाषण में भी इसराइल पर जमकर हमले किए।
अमेरिका से दुश्मनी पड़ सकती है भारी
इसराइल और अमेरिका की जिगरी यारी दशकों पुरानी है। अमेरिका इसराइल को देश के तौर पर मान्यता देने वाला पहला मुल्क है।
हमास के साथ जंग के एलान के साथ ही इसराइल को अमेरिका ने अपना युद्धपोत और लड़ाकू विमान भेजे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसराइल को गजा युद्ध के बीच सैन्य और राजनीतिक मदद देने का वादा किया है।
इसराइल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां की बहुसंख्यक आबादी यहूदी है। ये एक छोटा सा देश है लेकिन इसकी सैन्य ताक़त का लोहा दुनिया मानती है।
इसराइल भूमध्यसागर के पास मध्य पूर्वी देश है। इसके आसपास मिस्र, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, इराक़, तुर्की, ईरान, कुवैत, मोरक्को, सऊदी अरब, फलस्तीन, सूडान और ट्यूनीशिया जैसे कई मुस्लिम देश हैं।
इनमें से कई ऐसे भी देश हैं जो इस्लामिक देशों के संगठन यानी ओआईसी के सदस्य हैं और उनकी अमेरिका से भी दोस्ती है।
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पश्चिम एशिया मामलों के अध्यापक प्रोफ़ेसर रहे एके पाशा कहते हैं, ‘ओआईसी में जो 56 देश हैं, उसमें आधे से ज्यादा अमेरिका के बहुत कऱीबी दोस्त हैं। फिर वो तुर्की हो, पाकिस्तान हो, इंडोनेशिया हो, बांग्लादेश, जॉर्डन हो या मोरक्को। ये लंबी लिस्ट है। इसराइल के मुद्दे पर ओआईसी दो गुटों में बँट गया है। दूसरा गुट इराक, ईरान, अल्जीरिया है, लीबिया वगैरह देश हैं। ये देश हार्डलाइन अप्रोच चाहते हैं। ये हमास को समर्थन देना चाहते हैं।’
पश्चिमी एशिया मामलों की जानकार और जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर सुजाता एश्वर्य कहती हैं, ‘इसराइल के समर्थन में पश्चिमी देश एक सुर में आगे आए हैं।’
‘तुर्की सालों से ख़ुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। इसके उलट अब्राहम एकॉर्ड के जरिए इसराइल ने कई देशों के साथ अपने रिश्ते सुधारे हैं। तुर्की ये जानता है कि अगर उसने पूरी तरह से फलस्तीन के प्रति झुकाव दिखाया और इसराइल का खुला विरोध किया तो वह अकेला रह जाएगा। अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए भी तुर्की ने संतुलित रुख अपनाया है। तुर्की को ये साफ पता है कि वो इसराइल के खिलाफ खड़े होकर पश्चिम के साथ नहीं रह सकता।’
सुजाता एश्वर्य तुर्की के रवैये के पीछे इसराइल के साथ तुर्की के गैस पाइपलाइन को लेकर होने वाले समझौते को भी एक वजह मानती हैं।
रूस पर निर्भरता कम करने के मक़सद से तुर्की के रास्ते इसराइली गैस को यूरोप तक पहुंचाने के लिए गैस पाइपलाइन की शुरुआत करने की चर्चा जारी है। हालांकि, अभी तक इस पर कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है।
अल-जजीरा की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तुर्की में महंगाई चरम पर है। ऐसे में तुर्की को क्षेत्रीय देशों से निवेश की दरकार है। साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर सुरक्षा का ख़तरा भी है। सीरिया में हालात खऱाब हैं। ऐसे में तुर्की को इसराइल एक मज़बूत खिलाड़ी के तौर पर दिख रहा है। वहीं इसराइल के लिए मध्य पूर्व क्षेत्र में ईरान के दबदबे को संतुलित करने के लिए तुर्की बड़ी ताकत है।
क्या इस्लामिक देशों के आपसी मतभेद मिट सकेंगे?
क्या वाकई इस्लामिक देश फ़लस्तीनियों को लेकर आपसी मतभेद भुला देंगे? क्या इस्लामिक देशों की एकता से इसराइल थम जाएगा?
खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद ने 2021 में बीबीसी से कहा था, ‘1967 से पहले फलस्तीन और इसराइल समस्या अरब की समस्या थी लेकिन 1967 में अरब-इसराइल युद्ध में इसराइल की जीत के बाद से यह केवल इसराइल और फ़लस्तीन की समस्या रह गई है। अगर इसे कोई हल कर सकता है तो वे इसराइल और फलस्तीनी हैं।’
तलमीज़ अहमद ने कहा था, ‘इस्लामिक देशों की प्रतिक्रिया दिखावे भर से ज़्यादा कुछ नहीं है।
ज़्यादातर इस्लामिक देश राजशाही वाले हैं और वहां की जनता का ग़ुस्सा जनादेश के रूप में आने का मौक़ा नहीं मिलता है। ऐसे में वहाँ के शासक फलस्तीनियों के समर्थन में कुछ बोलकर रस्मअदायगी कर लेते हैं। जहाँ तक तुर्की की बात है तो अर्दोआन ने बाइडन के आने के बाद इसराइल के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की। वे राजदूत भेजने को भी तैयार थे लेकिन इसराइल ने कुछ दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसराइल के खिलाफ हाल के दिनों में अर्दोआन ने बहुत ही आक्रामक बयान दिए हैं।’
तलमीज अहमद का मानना कि तुर्की या सऊदी अरब से इसराइल का कुछ भी नहीं बिगडऩे वाला है और अगर कोई दखल दे सकता है तो वो अमेरिका है लेकिन वहाँ की दक्षिणपंथी लॉबी इसराइल के समर्थन में मज़बूती से खड़ी है।
तलमीज़ अहमद मानते हैं कि सऊदी अरब के आम लोगों की सहानुभूति फ़लस्तीनियों के साथ बहुत ही मज़बूत है। ऐसे में सऊदी शाही परिवार पर अप्रत्यक्ष रूप से आम लोगों का दबाव रहता है और इसी का नतीजा होता है कि वहाँ का विदेश मंत्रालय एक प्रेस रिलीज जारी कर देता है। ईरान खुद को क्रांतिकारी स्टेट मानता है, इसलिए वो फलस्तीनियों के समर्थन में बोलता है और इस्लामिक वजहों से हमास का समर्थन करता है। हालांकि हमास को सारी मदद तुर्की और कतर से मिलती है।’
ईरान सबसे बड़ी वजह
फलस्तीनी मुद्दे को समर्थन देना ईरान की विदेश नीति का एक ज़रूरी पहलू रहा है और ख़बरों की मानें तो शनिवार को गज़ा से इसराइल पर हुए हमलों के बाद ईरान में जश्न का माहौल था।
हालांकि, ईरान ने उन आरोपों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि गजा से हुए हमलों में उसकी भूमिका थी।
सऊदी अरब और इसराइल के बीच कभी कूटनीतिक रिश्ते नहीं रहे। लेकिन ईरान दोनों का साझा दुश्मन है। दोनों देश मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं। हालांकि सऊदी अरब और ईरान के बीच चीन ने हाल ही में राजनयिक रिश्ते बहाल करवाया था लेकिन दोनों देशों के विरोधाभास खत्म नहीं हुए हैं। दोनों देशों के आपसी हित कई क्षेत्रों में टकराते हैं।
ईरान और सऊदी अरब दोनों ही इस्लामिक देश हैं लेकिन दोनों सुन्नी और शिया प्रभुत्व वाले हैं। ईरान शिया मुस्लिम बहुल है, वहीं सऊदी अरब सुन्नी बहुल।
लगभग पूरे मध्य-पूर्व में समर्थन और सलाह के लिए कुछ देश ईरान तो कुछ सऊदी अरब की ओर देखते हैं।
एके पाशा कहते हैं, ‘सऊदी अरब ख़ुद को इस्लाम में सबसे पवित्र मक्का-मदीना का रखवाला बताता है। ओआईसी का मुख्यालय भी जेद्दा में है। ईरान ही ऐसा देश है जिसकी नीति हमेशा से फलस्तीन के पक्ष में और इसराइल के ख़िलाफ़ रही है।’
पिछले कुछ समय में सऊदी अरब और इसराइल के बीच अमेरिका की मध्यस्थता में समझौता होने की चर्चा तेज हुई थी लेकिन हमास के हमले के बाद इस सौदे पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
एके पाशा कहते हैं कि फलस्तीन के मुद्दे पर ईरान के रुख़ से उसकी लोकप्रियता बढ़ सकती है। ये सऊदी अरब के लिए परेशानी बढ़ाने वाला हो सकता है क्योंकि वो ख़ुद को इस्लामी दुनिया का नेता मानता है।
वो कहते हैं, ‘दोनों देशों के बीच चीन की मध्यस्थता में राजनयिक रिश्ते बहाल जरूर हुए लेकिन ये संबंध पूरी तरह सामान्य नहीं हैं। दोनों के बीच यमन का मसला है, लेबनान का मुद्दा है, लीबिया का ऐसा मुद्दा है जिन पर टकराव हो रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को काउंटर करने के लिए सऊदी अरब को अमेरिका से परमाणु सहयोग चाहिए। सऊदी अरब किसी भी कीमत पर अपनी स्थिति ईरान को नहीं खोना चाहता।’ (bbc.com/hindi)
-सिद्धार्थ ताबिश
मेरे ऑफिस का ऑफिस बॉय ही ऐसा अकेला इंसान है जिसकी तीन से चार महीने की एडवांस सैलरी चला करती है। उसकी माँ अपने शराबी पति को गाँव छोडक़र इसके पास रह रही है अपने 12 साल के बच्चे के साथ ऑफिस बॉय का अभी 8 महीने का एक बेटा है। इसकी पत्नी दूसरे घरों में झाडू बर्तन करती है।
डिलीवरी के 5 महीने बाद ही वो वापस काम पर जाने लगी थी। इसलिए इस समय वो इतनी कमजोर हो गई है कि बीते दो हफ़्ते से उसका बुखार ही नहीं उतर रहा है। उसका अल्ट्रासाउंड करने के पैसे नहीं थे इन लोगों के पास मगर इस ऑफिस बॉय की माँ, खानदान की किसी भी शादी, किसी भी ब्याह, किसी भी मुंडन, किसी भी त्यौहार के मौके पर बड़ा बड़ा खर्च करने से गुरेज नहीं करती है। अब इसकी माँ ने प्लान बना रखा है अपने पोते के मुंडन का उसके लिए ऑफिस बॉय आज फिर ऑफिस में एडवांस मांग रहा था। मैंने पूछा कि ‘तुम्हारी सैलरी तीन से चार महीने की एडवांस चलती है.. और तुम्हें अब मुंडन करना है’.. कहने लगा ‘माँ और बाक़ी लोग नहीं मानेंगे’.. मैंने उस से पूछा कि ‘तुम्हारी पत्नी की दवा हो रही है ठीक से?’, कह रहा है वो ठीक है.. बस बुखार नहीं उतर रहा है उसका.. इसकी पत्नी को लगता है कोई सीरियस इशू है मगर उसकी इन लोगों को कोई चिंता नहीं है।
मैंने कहा कि तुम्हारे अकाउंट में कितने पैसे की सेविंग है? कहने लगा 600 रुपये हैं मेरे अकाउंट में। मैंने पूछा और तुम्हारी बीबी के.. कहने लगा 700 रुपये.. मैंने पूछा मुंडन में कितना लगेगा.. कहने लगा ‘25 हजार। ऑफिस से पैसा लूँगा और कुछ कर्जा लूँगा। क्यूंकि माँ भव्य मुंडन समारोह चाहती है.. मौसी और सबका अरमान है.. ऐसे कैसे अरमान छोड़ दूं सबका। सब लोग आयेंगे खाना खायेंगे.. बहनों को मुझे नेग देना होगा। ये सब ज़रूरी है न भईया.. इसके बिना कैसे चलेगा?’
इसकी पत्नी भी एक दिन मुझ से कह रही थी ‘भय्यिया, हमारी एक जमीन है, वो बिकने वाली है। पांच लाख की बिकेगी अगर तो हम लोग डेढ़ लाख का जगराता करेंगे.. सारे गाँव को बुलायेंगे.. ये मेरा और मेरी सास का प्लान है।’
भारत में लगभग आप जितने भी निम्न आय स्तर के लोगों को पायेंगे, पैसे को लेकर उन सभी का मैनेजमेंट आपको ऐसे ही मिलेगा। इन लोगों के सारे पैसे सिर्फ त्यौहार और शादी वगैरह की रस्में निभाने में खर्च होते हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज करवाएंगे, राशन कण्ट्रोल से राशन लेंगे और अपनी सारी कमाई मुंडन, शादी, नेग, त्यौहार इत्यादि में खर्च करते रहेंगे। हर दूसरे महीने एक त्यौहार होता है भारत में जिस से निम्न और मध्यम आय वर्ग को पूरी उम्र कभी छुट्टी ही नहीं मिल पाती है।
-सनियारा खान
व्हाईट टॉर्चर नामक किताब को ईरान की महिला और मानवाधिकार कार्यकर्ता नरगिस मुहम्मदी ने लिखा है।
ईरान की कुख्यात एविन जेल में बंद रहने के बावजूद भी नरगिस मुहम्मदी को इस साल का शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । लेखिका की मन:स्थिति जानने के लिए इस किताब को पढऩा बेहद ज़रूरी हो जाता है। जेल में रहते हुए नरगिस ने न सिर्फ अपने अनुभवों को, बल्कि साथ में अन्य बारह ऐसी औरतों के बारे में भी बताया जिन्हें लंबे समय तक अंतहीन यातनाएं झेलते हुए जैसे तैसे जीना पड़ रहा था। किताब की शुरुवात में वे लिखती है, ‘गृहबंदी रहने के अब इस आखरी समय में मैं जानती हूं कि जल्दी मुझे फिर से जेल में पहुंचा दिया जाएगा। इस बार मुझे दोषी ठहराया गया है इस किताब को लिखने के लिए, जो शायद इस वक्त आपके हाथ में है।’
ईरान की राजनैतिक और सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ़ लगातार आवाज़ उठाकर नरगिस मोहम्मदी को बार बार कारागार पहुंच जाना पड़ता है। इस बार उनको हार्ट अटैक आने पर सर्जरी कराना ज़रूरी हो गया था। इसलिए वे बाहर आई थी। लेकिन फिर जेल गई ,वह भी अस्सी कोड़े के आदेश के साथ! उनको जेल में कई बार एकाकी भी रखा जाता है। उनकी जि़ंदगी की कुल उपलब्धि है 13 बार गिरफ्तारी,31 साल के लिए जेल की सजा और 154 कोड़े।
अब सवाल उठता है कि व्हाईट टॉर्चर यानि कि श्वेत यातना क्या है? ये एक तरह से मनोवैज्ञानिक यंत्रणा देने की तकनीक है। इसमें कैदी को एक सम्पूर्ण सफ़ेद सेल में रख कर उनके अंदर एक डरावना अकेलापन पैदा करने की कोशिश की जाती है। उन्हें वहां न कोई रोशनी दिखाई देती है और न ही कोई आवाज सुनाई देती है। कैदी अपने अलावा कुछ भी नहीं सुन पाते है। कभी कभी ऐसे कैदियों को नींद से वंचित करने के लिए उसके सेल में लगातर रोशनी का भी उपयोग किया जाता है।कई बार तो आंखों में पट्टी भी बांध दि जाती है। इस दशा में धीरे धीरे इन कैदियों के अंदर मतिभ्रम, अवसाद और पागलपन पनपने लगते हैं। वैसे तो कहा जाता है कि अमेरिका में भी 9/11 की घटना के बाद बहुत से कैदियों पर व्हाइट टॉर्चर अपनाया गया था। आयरलैंड और वेनेजुएला में भी काफी मामले सामने आए। साधारण नियम में क्रूर बलात्कारी लोगों पर भी ये तरीका आजमाया जाता है। लेकिन लगता है कि ईरान में सामाजिक और राजनेतिक कैदियों पर व्हाइट टॉर्चर किए जाने को एक बेहद साधारण प्रक्रिया के रूप में मान लिया गया है। जिन महिलाओं से नरगिस ने बातचीत की उन सभी को अपराध न करते हुए भी अपराध स्वीकार करने के लिए इसी तरह अलग अलग तरीके से मानसिक और शारीरिक रूप से अत्यधिक दबाव में डालने के लिए श्वेत यातना कक्ष में रखा जाता था। अलग अलग कैदी अलग अलग दबाव के कारण अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते थे। इन कैदियों में से एक थी निगारा अफसर जादेह। वह अपने सेल में अकेलापन दूर करने के लिए चींटियों से बात करने लग गई थी। उसे खाने में जो सफ़ेद चावल मिलता था वह उस में से कुछ चावल जमीन पर फेंक दिया करती थी। इस कारण उसकी सेल में चीटियां आ जाती और वह उन चींटियों से बात करके खुद को शांत रखने की
कोशिश करती थी।व्हाइट टॉर्चर सहने वाले लोगों में से ज्यादातर लोग बाद में पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं आ पाते हैं।
नरगिस मोहम्मदी जेल में रहते हुए भी ईरान में चल रही समाजिक और राजनैतिक अन्याय के साथ साथ एकांत कारावास और श्वेत यंत्रणा के खिलाफ़ भी लगातर बोल रही है। ईरान की कट्टरपंथी सरकार से लोहा लेने वाली वे एक बहादुर औरत है।अब जब उनको नोबेल पुरस्कार मिला तो लोग ज़रूर गुगल पर उनको ढूंढ कर उनके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। लेकिन साथ में व्हाईट टॉर्चर नामक उनकी लिखी इस किताब के बारे में भी जानकारी प्राप्त करें तो और भी अच्छा होगा। एक औरत हो कर वे अपने देश और सरकार की गलत कदमों की आलोचना करते हुए जेल में ही रह कर ज्यादातर जि़ंदगी गुज़ार दी। अंत में यही लगता है कि हमारे देश के बहुत से पत्रकारों को ‘व्हाईट टॉर्चर’ खरीदकर पढऩा चाहिए। मुल्क की भलाई के लिए।
-सुजाता
यह बाजार एक बेहद चतुर व्यापारी है। वह मुफ्त में हमसे हमारी ही सारी सुविधाजनक पसंदीदा चीजें और आदतें छीनकर दोबारा हमें ही महंगे दामों में बेचता रहता है? और हमें आभास तक नहीं होता कि हम ठग लिए गए हैं।
दांत साफ करने के लिए दातुन, नमक, चारकोल, नींबू और अनेक जड़ी बूटियां को पहले तो बेहद हानिकारक बताकर, कैल्शियम के नाम पर कैमिकल्स से बना टूथपेस्ट आपको बेचता है और फिर सालों बाद उसी टूथपेस्ट को हानिकारक बताकर फिर से दातुन, नमक, चारकोल, नींबू और अनेक जड़ी बूटियों को टूथपेस्ट में मिलाकर आपको और अधिक महंगे दामों में बेचता है।
पहले आपके सादा चेहरे के मेकअप के लिए न जाने कितने ही प्रकार के प्रोडक्ट आपको बेचता है और फिर एक दिन ‘नो मेकअप लुक्स’ को ट्रैंड बनाकर पहले से भी महंगे प्रोडक्ट आपको बेचता है।
पहले तो दादी नानी की रसोईयों में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी, लोहे, पीतल और तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए खतरनाक बताकर आपको नान स्टिक, स्टील, एल्यूमीनियम आदि के बर्तन थमा देता है और अब वापिस उन्हीं मिट्टी, लोहे, पीतल आदि के बर्तनों को ब्रांड बना उन्हें महानगरों की यंगर जेनरेशन को महंगे दामों में बेच रहा है।
पहले चूल्हे पर पकाए खाने को स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक बताकर गैस, हीटर बाजार में उतारे जाते हैं और फिर ‘मिट्टी के चूल्हे की रोटी’ को एक लक्जरी खाद्य पदार्थ की श्रेणी में शामिल कर महंगे दामों पर बेचा जाता है।
बाकी प्लाजो, सलवार, शरारे, गरारे, टाईट फिट, घेरदार, बेलदार, बैलबाटम, फुल/हाफ/मिड स्लीव आदि ट्रैंड फैशन की दुनिया में हर छ: महीने एक साल में धरती की तरह अपनी धुरी पर घूमते ही पाए जाते हैं और हम आप उस ट्रैंड के गिर्द चक्करघिन्नी बने अपने पैसे खर्च करते ही रहते हैं।
पहले फ्लैट्स और बाल्कनियों को ही मॉडर्न लाइफस्टाइल ट्रैंड बनाकर उन्हें हद से महंगे दामों पर बेचने की कवायद के चलते जड़ से बने घरों को चलन से पहले बाहर किया गया और फिर उन्हीं जड़ से बने घरों को ‘विला’बताकर फ्लैटों से भी महंगे दामों पर बेचा जा रहा।
बाजार की चाल जितनी समझ आई है उससे तो यह लगता है कि अब ये हमसे हमारे छोटे शहरों को ओल्ड फैशन लिविंग स्टाइल बताकर उन्हें चलन से बाहर कर गली मुहल्ले खाली करवा कर दोबारा हमे ही इन्हें न्यू हाई फाई लाइफ स्टाइल लग्जरियस ट्रैंड बताकर और अधिक महंगे दामों में बेचने की साजि़श रच रहा है।
ये बाजार हमारी जरूरतें पूरी करने के लिए बना था और इसे हमारे पीछे भागना चाहिए था लेकिन कमाल की बात देखिए? कि हम अंधे होकर इसके पीछे भाग रहे हैं और ये हमसे हमारा सुख चैन सब छीनकर हमें ही दोबारा महंगे दामों में बेचने में व्यस्त है।
ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं गौर करें तो हम हर प्रकार से ठगे जा रहे हैं। तो फिलहाल सुखी वही है जो बाजार के बहकावे में न आकर अपने निर्णय स्वयं ले रहा है। बाकि जनसंख्या/ रोजगार का अनुपात एक अलग समस्या है ही जिसका निदान शायद ही कभी हो पाए।
-प्रमोद भार्गव
बाढ़ और सूखे की समस्या का स्थाई समाधान ढूंढने के लिए देश में चल रही महत्वाकांक्षी केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से जल संकट और गहरा सकता है। इससे मानसून का नियमित तंत्र भी प्रभावित हो सकता है। यह दावा ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में किया गया है। यह शोध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई, उष्णदेषीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) पुणे ने किया है। अध्ययन में हैदराबाद विष्वविद्यालय और किंग अब्दुल्ला युनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक भी षामिल थे। शोध में क्षेत्रीय जलवायु स्थितियां और आंकड़ों का विष्लेशण सहित मानसून से जुड़ी कई तकनीकियों का उपयोग किया गया। ताकि इन बड़ी परियोजनाओं के पूरी होने पर भविश्य में उत्पन्न होने वाले जल और मौसम संबंधी नतीजों के जटिल तंत्र को सामने ला सकें।
शोध में क्षेत्रीय जलवायु पारिस्थितिकी तंत्र और आंकड़ों का विष्लेशण करने के बाद पाया कि जो अलनीनो दक्षिणी दोलन जैसी परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं। अतएव नदी जोड़ो योजना पूरी होने के बाद इसके क्षेत्र में आने वाला जल-स्थल वायुमंडल अंतरसंबंध को बिगाड़ सकता है। इससे वायु और नमी का स्तर प्रभावित होगा। नतीजतन देष में ये नदी जोड़ो क्षेत्र विशेष में बारिस का परंपरागत रुझान बदल सकता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पानी दूसरी नदी में जाने से सिंचित क्षेत्र बढ़ेगा, जो पानी की कमी का सामना कर रहें इलाकों में सितंबर की बारिस में 12 प्रतिशत तक की कमी ला सकता है। गोया, ऐसा होता है तो नदी जोड़ो योजना का संकट न केवल इस, परियोजना से लाभान्वित होने वाले इलाकाई लोगों को झेलना होगा बल्कि मौसम के तंत्र पर भी इसका विपरीत असर दिखाई देगा। भारत में एनडब्ल्यूडीए के अनुसार 30 नदियों को जोड़ा जाना है। इनमें प्रायद्वीपीय घटक के तहत 16 और हिमालयी घटक के अंतर्गत 14 नदियों को जोड़े जाने की पहचान कर ली गई है। इनमें से आठ योजनाओं की डीपीआर भी बना ली गई है।
जीवनदायी नदियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। नदियों के किनारे ही ऐसी आधुनिकतम बढ़ी सभ्यताएं विकसित हुईं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं। सिंधु घाटी और सारस्वत (सरस्वती) सभ्यताएं इसके उदाहरण हैं। भारत के सांस्कृतिक उन्नयन के नियमों में भागीरथी, राम और कृष्ण का नदियों से गहरा संबंध रहा है। भारतीय वांग्मय में इंद्र और कुबेर विपुल जलराशि के प्राचीनतम वैज्ञानिक-प्रबंधक रहे हैं। भारत भूखण्ड में आग, हवा और पानी को सर्वसुलभ नियामत माना गया है। हवा और पानी की शुद्धता और सहज उपलब्धता नदियों से है। दुनिया के महासागरों, हिमखण्ड़ों, नदियों और बड़े जलाशयों में अकूत जल भण्डार हैं। लेकिन मानव के लिए उपयोग जीवनदायी जल और बढ़ती आबादी के लिए जल की उपलब्धता का बिगड़ता अनुपात चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है। ऐसे में भी बढ़ते तापमान के कारण हिमखण्डों के पिघलने और अवर्षा के चलते जल स्त्रोतों के सूखने का सिलसिला जारी है। वर्तमान में जल की खपत कृषि, उद्योग, विद्युत और पेयजल के रूप में सर्वाधिक हो रही है। हालांकि पेयजल की खपत मात्र आठ फीसदी है। जिसका मुख्य स्त्रोत नदियां और भू-जल हैं। औद्योगिकिकरण, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के दबाव के चलते एक ओर नदियां सिकुड़ रही हैं, वहीं औद्योगिक कचरा और मल मूत्र बहाने का सिलसिला जारी रहने से गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां इतनी प्रदूषित हो गईं हैं कि यमुना नदी को तो एक पर्यावरण संस्था ने मरी हुई नदी तक घोषित कर दिया है। इसलिए नदी जोड़ो परियोजना से भी यदि नदियों और मौसम के पंख को हानि होती है तो बड़ा संकट देश की जनता को भुगतना होगा।
प्रस्तावित करीब 120 अरब डालर अनुमानित खर्च की नदी जोड़ों परियोजना को दो हिस्सों में बांटकर अमल में लाया जाएगा। एक प्रायद्वीप स्थित नदियों को जोडऩा और दूसरे, हिमालय से निकली नदियों को जोडऩा। प्रायद्वीप भाग में 16 नदियां हैं, जिन्हें दक्षिण जल क्षेत्र बनाकर जोड़ा जाना है। इसमें महानदी, गोदावरी, पेन्नार, कृष्णा, पार, तापी, नर्मदा, दमनगंगा, पिंजाल और कावेरी को जोड़ा जाएगा। पशिचम के तटीय हिस्से में बहने वाली नदियों को पूर्व की ओर मोड़ा जाएगा। इस तट से जुड़ी तापी नदी के दक्षिण भाग को मुंबई के उत्तरी भाग की नदियों से जोड़ा जाना प्रस्तावित है। केरल और कर्नाटक की पशिचम की ओर बहने वाली नदियों की जलधारा पूर्व दिशा में मोड़ी जाएगी। यमुना और दक्षिण की सहायक नदियों को भी आपस में जोड़ा जाना इस परियोजना का हिस्सा है। हिमालय क्षेत्र की नदियों के अतिरिक्त जल को संग्रह करने की दृष्टि से भारत और नेपाल में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र तथा इनकी सहायक नदियों पर विशाल जलाशय बनाने के प्रावधान हैं। ताकि वर्षाजल इकट्ठा हो और उत्तर-प्रदेश, बिहार एवं असम को भंयकर बाढ़ का सामना करने से निजात मिल सके। इन जलाशयों से बिजली भी उत्पादित की जाएगी। इसी क्षेत्र में कोसी, घांघरा, मेच, गंडक़, साबरमती, शारदा, फरक्का, सुन्दरवन, स्वर्णरेखा और दमोदर नदियों को गंगा, यमुना और महानदी से जोड़ा जाएगा। करीब 13,500 किमी लंबी ये नदियां भारत के संपूर्ण मैदानी क्षेत्रों में अठखेलियां करती हुईं मनुष्य और जीव-जगत के लिए प्रकृति का अनूठा और बहुमूल्य वरदान बनी हुईं हैं। 2528 लाख हेक्टेयर भू-खण्डों और वनप्रांतरों में प्रवाहित इन नदियों में प्रति व्यक्ति 690 घन मीटर जल है। कृषि योग्य कुल 1411 लाख हेक्टेयर भूमि में से 546 लाख हेक्टेयर भूमि इन्हीं नदियों की बदौलत प्रति वर्ष सिंचित की जाकर फसलों को लहलहाती हैं।
ऐसा दावा किया जा रहा है कि बाढ़ और सूखे से परेशान देश में नदियों के संगम की केन-बेतवा नदी परियोजना मूर्त रूप ले लेती है, तो भविश्य में 60 अन्य नदियों के मिलन का रास्ता खुल जाएगा। दरअसल बढ़ते वैष्विक तापमान, जलवायु परिवर्तन, अलनीनो और बदलते वर्षा चक्र के चलते जरूरी हो गया है कि नदियों के बाढ़ के पानी को इकट्ठा किया जाए और फिर उसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नहरों के जरिए भेजा जाए। ऐसा संभव हो जाता है तो पेयजल की समस्या का निदान तो होगा ही, सिंचाई के लिए भी किसानों को पर्याप्त जल मिलने लग जाएगा। वैसे भी भारत में विश्व की कुल आबादी के करीब 18 प्रतिशत लोग रहते हैं और उपयोगी जल की उपलब्धता महज 4 प्रतिशत है। हालांकि पर्यावरणविद् इस परियोजना का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि नदियों को जोडऩे से इनकी अविरलता खत्म होगी, नतीजतन नदियों के विलुप्त होने का संकट बढ़ जाएगा। इसी तथ्य की पुश्टि यह नया शोध कर रहा है।
यदि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना में आ रहे संकटों की बात करें तो इनसे पार पाना आसान नहीं है। वन्य जीव समिति बड़ी बाधा के रूप में पेष आ रही है, यह आशंका भी जताई जा रही है कि परियोजना पर क्रियान्वयन होता है तो नहरों एवं बांधों के लिए जिस उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा, वह नष्ट हो जाएगी। इस भूमि पर फिलहाल जौ, बाजरा, दलहन, तिलहन, गेहूं, मूंगफली, चना जैसी फसलें पैदा होती हैं। इन फसलों में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं पड़ती है। जबकि ये नदियां जुड़ती हैं, तो इस पूरे इलाके में धान और गन्ने की फसलें पैदा करने की उम्मीद बढ़ जाएगी। परियोजना को पूरा करने का समय 9 साल बताया जा रहा है। लेकिन हमारे यहां भूमि अधिग्रहण और वन भूमि में स्वीकृति में जो अड़चनें आती हैं, उनके चलते परियोजना 20-25 साल में भी पूरी हो जाए तो यह बड़ी उपलब्धि होगी ?
दोनों प्रदेशों की सरकारें दावा कर रही हैं कि यदि ये नदियां परस्पर जुड़ जाती हैं तो मध्य-प्रदेश और उत्तर-प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखण्ड क्षेत्र में रहने वाली 70 लाख आबादी खुषहाल हो जाएगी। यही नहीं नदियों को जोडऩे का यह महाप्रयोग सफल हो जाता है तो अन्य 60 नदियों को जोडऩे का सिलसिला भी शुरू हो सकता है ? नदी जोड़ों कार्यक्रम मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है। इस परियोजना के तहत उत्तर-प्रदेश के हिस्से में आने वाली पर्यावरण संबंधी बाधाओं को दूर कर लिया गया है। मध्यप्रदेश में जरूर अभी भी पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाधा बना हुआ है और जरूरी नहीं कि जल्दी यहां से मंजूरी मिल जाए? वन्य जीव समिति इस परियोजना को इसलिए मंजूरी नहीं दे रही है, क्योंकि पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाघों के प्रजनन, आहार एवं आवास का अहम् वनखंड है। इसमें करीब चार दर्जन बाघ बताए जाते हैं। अन्य प्रजातियों के प्राणी भी बड़ी संख्या में हैं। हालांकि मध्यप्रदेश और केंद्र में एक ही दल भाजपा की सरकारें हैं, लिहाजा उम्मीद की जा सकती है कि बाधाएं भी जल्दी दूर हो जाएं ? हीरा खनन क्षेत्र भी नई बाधा के रूप में आ सकता है ?
- अपूर्व भारद्वाज
आडवाणी जब रथ यात्रा पर निकले थे तो तबके प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लालू यादव से पूछा कि बीजेपी की धर्म की राजनीति की काट क्या है लालू ने बोला कि केवल सामाजिक न्याय ही धर्म की राजनीति को पटखनी दे सकता है।
वीपी सिंह मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर चुके थे बीजेपी को गेम समझ आ रहा था इसलिए उसने दबी जुबान में मंडल का विरोध करके कमंडल पकड़ कर रथ निकाल लिया ताकि ओबीसी का पूरा वोट बैंक वीपी सिंह की गोद में न चला जाये कांग्रेस इस दोनों मुद्दों पर रहस्यमय ढंग से चुप रही और इसलिए यूपी औऱ बिहार में इतिहास हो गई।
2014 के चुनाव में बिहार में बुरी तरह हारने के बाद यही सवाल नीतीश ने लालू से पूछा और जवाब वही था सामाजिक न्याय.. 2015 में महा-गठबंधन बना और बीजेपी बिहार में बुरी तरह हार गई। कांग्रेस तब उनके साथ थी पर तब भी कांग्रेस मुखर नहीं थी क्योंकि कांग्रेस को हमेशा उस सवर्ण वोट का लालच था जो 2014 के बाद से उसके पास कभी लौट कर नहीं आया था 2023 में यही सवाल राहुल गांधी ने नीतीश और लालू से पूछा और जवाब वही था कि सामाजिक न्याय....इस बार राहुल गाँधी ने इसे समझ लिया है कि बीजेपी के धर्मपाश में बंधा पेटभरा सवर्ण मतदाता कम से कम 2029 तक लौट कर नहीं आ रहा है, इसलिए मंडल 2.0 का दांव चल दिया है। जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की तर्ज पर ‘जितनी आबादी उतना हक का नारा’ अब 2024 तक की हर चुनावी रैली मे लगेगा और यह गेम चेंजर हो सकता है तो क्या 2024 मंडल 1ह्य कमंडल होगा ? याद रखिए राहुल ने जातीय जनगणना के साथ गरीबों की आर्थिक गणना की भी बात की है तो क्या राहुल बीजेपी के घोर पूंजीवाद साम्प्रदायिक मॉडल के विरुद्ध सामाजिक न्याय और गरीबी को मिलाकर एक नया समाजवाद मॉडल खड़ा कर 2024 में बीजेपी के लौटने के सारे दरवाजा बंद कर देंगे ? यह सवाल अगले 6 महीने में हर राजनीतिक पंडित के जिह्वा पर रहेगा।
-दीपाली अग्रवाल
हॉस्टल का कमरा जिसकी खिडक़ी राजस्थान की रेत को निहारती थी, उसी के पास रखी कुर्सी पर मेरा समय बीतता। मेज पर लैपटॉप टिकाकर कागज पर नोट्स बनाती, डूबते सूरज को निहारती और जगजीत सिंह की गजलें सुनती। नोट्स पीछे रह जाते, शाम गहरा जाती, बचते तो मैं, आसमान के सीने पर उतरते तारे और जगजीत की आवाज़। दरअसल मैं भी कहां बच पाती थी, उस तरन्नुम में ही सब डूबता रहा।
एक दफा मुझसे किसी ने कहा था कि, अध्यात्म का ज्ञान न हो तो आंखें बंद किए गज़़लें सुना करो। तुम जानोगी कि अवचेतन तक कैसे पहुंचा जाता है। अगर बात सच है तो जगजीत सिंह की आवाज से मैंने जब-तब अपने अवचेतन में प्रवेश किया है। कॉलेज के उन दिनों से वे मेरे हमसफर रहे हैं। घंटों लूप पर एक ही गजल चलती रहती, फिर कोई कहता कि मेस जाना है। गजल का मतला (पहला शेर) और जगजीत सिंह की आवाज जैसे टेप-रिकॉर्डर की तरह तब भी मन में चलते रहते। यह उनकी आवाज का मोजिजा था कि मतला से आगे कभी कुछ याद न हुआ, वे दूसरा शेर गा देते और हम पहले पर ही दाद में उलझे रहे।
फिर जगजीत इतनी आसानी से कहीं और जाने भी नहीं देते। उनके पास मन के हर सोपान के लिए तो कुछ है। बगीचे से हर रंग के फूल चुनकर उन्होंने अपनी आवाज में शहद इकट्ठा किया है।
प्रेमियों के लिए वे गाते हैं-
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है
नए परिंदों को उडऩे में वक्त तो लगता है
हिज्र के लिए
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुजऱ क्यूँ नहीं जाता
रूमानी
सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़्ताब आहिस्ता आहिस्ता
हकीकत
हर तरफ हर जगह बे-शुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
चिट्ठी न कोई संदेश, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, इन तमाम गजलों और नज़्मों की तासीर अलग है। जिन शायरों ने इन्हें लिखा है उनकी कैफियत भी एक दूसरे से अलग रही होगी लेकिन जगजीत एक ही थे। उन्होंने हर गजल को जैसे खुद भी जीया और फिर गाया हो। एक इंटरव्यू के दौरान जगजीत सिंह ने कहा भी था कि उन्होंने गालिब को मिर्जा गालिब बनकर गाया है न कि जगजीत सिंह बनकर। लेकिन ऐसा नहीं कि उन्होंने गज़़लें भर ही गाई हैं। जगजीत सिंह की आवाज़ में राधे-कृष्ण बांके-बिहारी मंदिर की गलियों में अब भी सुनाई दे जाता है। सुनने वाले अचरज करेंगे कि मंदिर की गलियों में गूंज रही इसी आवाज़ ने पंजाबी लोक के टप्पे गाए हैं, इसी गले से निकला कि ठुकराओ अब कि प्यार करो, मैं नशे में हूं। अपने इन सुरों से जगजीत सिंह ने हर गली का सफऱ किया है- गले से गली तक की यात्रा और हर उम्र के लोगों के बीच लोकप्रिय। जहन की हर स्थिति के लिए कुछ गाने वाले।
वे जानते थे कि उन्हें अपने सुनने वालों के लिए कैसा काम करना है। वे फिल्मों को लेकर दुराग्रही नहीं थे, वहां हिट हुए तो खूब काम किया जब फि़ल्म नहीं चली तो मोह भी न रहा। अपनी एल्बम बनाते रहे, काम करते रहे। संगीत के साज के साथ प्रयोग करते थे, एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को नए वाद्य के साथ संगीत देना चाहिए। यह बात 60 साल से अधिक के जगजीत सिंह कह रहे थे।
70 की उम्र में साल 2011 अक्टूबर में उन्होंने हमें अलविदा कहा, मेरा उनके साथ सफऱ तब शुरू ही हुआ था। कई बार सोचती हूं कि हॉस्टल की उस खिडक़ी से जो सितारे दीखते थे उनमें जगजीत कौन से होंगे। किसी कवि ने लिखा है न कि, कहते हैं तारे गाते हैं। हमारा गजल गाने वाला तारा क्या आज भी हॉस्टल की किसी खिडक़ी के पार कुछ सुनाता होगा।


