विचार/लेख
विभुराज और सलमान रावी
देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने जानेमाने वकील प्रशांत भूषण के दो विवादित ट्वीट्स को लेकर उन्हें अवमानना का दोषी माना है। कंटेम्ट ऑफ कोर्ट्स ऐक्ट, 1971 के तहत प्रशांत भूषण को छह महीने तक की जेल की सजा जुर्माने के साथ या इसके बगैर भी हो सकती है। इसी कानून में ये भी प्रावधान है कि अभियुक्त के माफी मांगने पर अदालत चाहे तो उसे माफ कर सकती है। गुरुवार को वरिष्ठ पत्रकार एन राम, अरुण शौरी और एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कंटेम्ट ऑफ कोर्ट्स ऐक्ट के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली अपनी याचिका वापस ले ली थी।
मामला क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट प्रशांत भूषण के इन ट्वीट्स पर स्वत: संज्ञान लेते हुए अदालत की मानहानि का मामला शुरू किया था।
कोर्ट ने कहा, ‘पहली नजर में हमारी राय ये है कि ट्विटर पर इन बयानों से न्यायपालिका की बदनामी हुई है और सुप्रीम कोर्ट और खास तौर पर भारत के चीफ जस्टिस के ऑफिस के लिए जनता के मन में जो मान-सम्मान है, ये बयान उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं।’
चीफ जस्टिस बोबडे पर की गई टिप्पणी पर प्रशांत भूषण ने अपने हलफनामे में कहा कि पिछले तीन महीने से भी ज़्यादा समय से सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सुचारू रूप से न हो पाने के कारण वे व्यथित थे और उनकी टिप्पणी इसी बात को जाहिर कर रही थी।
उनका कहना था कि इसकी वजह से हिरासत में बंद, गरीब और लाचार लोगों के मौलिक अधिकारों का ख्याल नहीं रखा जा रहा था और उनकी शिकायतों पर सुनवाई नहीं हो पा रही थी।
लोकतंत्र की बर्बादी वाले बयान पर प्रशांत भूषण की ओर से ये दलील दी गई कि ‘विचारों की ऐसी अभिव्यक्ति स्पष्टवादी, अप्रिय और कड़वी हो सकती है लेकिन ये अदालत की अवमानना नहीं कहे जा सकते।’
लेकिन ऐसा नहीं है कि प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के केवल इसी मामले में कठघरे में खड़े हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का एक और मामला लंबित है।
अदालत की अवमानना का एक और मामला
प्रशांत भूषण ने साल 2009 में ‘तहलका’ मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में आरोप लगाया था कि भारत के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे।
इस मामले में तीन सदस्यों की बेंच ने 10 नवंबर, 2010 को कंटेम्प्ट पिटीशन पर सुनवाई करने का फ़ैसला सुनाया था।
इसी महीने की 10 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘जजों को भ्रष्ट कहना अवमानना है या नहीं, इस पर सुनवाई की आवश्यकता है।’
गौर करने वाली बात ये भी है कि पिछले दस सालों में इस मामले पर केवल 17 बार सुनवाई हुई है।
प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को एक लिखित बयान में खेद जताने की बात कही थी। लेकिन अदालत ने इसे ठुकरा दिया।
जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यों वाली बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख़ 17 अगस्त तय की है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अवमानना के बीच एक पतली रेखा है। जजों ने कहा है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और एक संस्था के रूप में जजों की गरिमा की रक्षा की ज़रूरत को संतुलित करना चाहते हैं।
दूसरी ओर, वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि भ्रष्टाचार के उनके आरोप में किसी वित्तीय भ्रष्टाचार की बात नहीं थी बल्कि उचित व्यवहार के अभाव की बात थी। उन्होंने कहा कि अगर उनके बयान से जजों और उनके परिजनों को चोट पहुँची है, तो वे अपने बयान पर खेद व्यक्त करते हैं।
कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का मतलब क्या है?
हिमाचल प्रदेश नेश्नल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ का दर्जा दिया गया है और उन्हें अपनी अवमानना के लिए किसी को दंडित करने का हक भी हासिल है।’
‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड से मतलब हुआ कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के आदेश तब तक प्रभावी रहेंगे जब तक कि उन्हें किसी कानून या दूसरे फैसले से ख़ारिज न कर दिया जाए।’
साल 1971 के कंटेम्ट ऑफ कोर्ट्स ऐक्ट में पहली बार वर्ष 2006 में संशोधन किया गया।
इस संशोधन में दो बिंदु जोड़े गए ताकि जिसके खिलाफ अवमाना का मामला चलाया जा रहा हो तो ‘सच्चाई’ और ‘नियत’ भी ध्यान में रखा जाए।
इस कानून में दो तरह के मामले आते हैं - फौजदारी और गैर फौजदारी यानी ‘सिविल’ और ‘क्रिमिनल कंटेम्प्ट।’
‘सिविल कंटेम्प्ट’ के तहत वो मामले आते हैं जिसमे अदालत के किसी व्यवस्था, फैसले या निर्देश का उल्लंघन साफ़ दिखता हो जबकि ‘क्रिमिनल कंटेम्प्ट’ के दायरे वो मामले आते हैं जिसमें ‘स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट’ वाली बात आती हो। प्रशांत भूषण पर ‘आपराधिक मानहानि’ का मामला ही चलाया जा रहा है।
प्रोफेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, ‘कोर्ट की आम लोगों के बीच जो छवि है, जो अदब और लिहाज है, उसे कमजोर करना कानून की नजर में अदालत पर लांछन लगाने जैसा है।’
‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ बनाम ‘
अभिव्यक्ति की आजादी’
अभिव्यक्ति की आज़ादी को लोकतंत्र की बुनियाद के तौर पर देखा जाता है।
भारत का संविधान अपने नागरिकों के इस अधिकार की गारंटी देता है।
लेकिन इस अधिकार के लिए कुछ शर्तें लागू हैं और उन्हीं शर्तों में से एक है अदालत की अवमानना का प्रावधान।
यानी ऐसी बात जिससे अदालत की अवमानना होती हो, अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में नहीं आएगी।
प्रोफेसर चंचल कुमार सिंह की राय में संविधान में ही इस तरह की व्यवस्था बनी हुई है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट’ की असीमित शक्तियां हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार इसके आगे गौण हो जाता है।
दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया और सीके दफ्तरी बनाम ओपी गुप्ता जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट बार-बार ये साफ कर चुकी है कि संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 के तहत मिले उसके अधिकारों में न तो संसद और न ही राज्य विधानसभाएं कोई कटौती कर सकती है।
दूसरे लोकतंत्रों में क्या स्थिति है?
साल 2012 तक ब्रिटेन में ‘स्कैंडलाइजिंग द कोर्ट’ यानी ‘अदालत पर लांछन’ लगाने के जुर्म में आपराधिक कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता था।
लेकिन ब्रिटेन के विधि आयोग की सिफारिश के बाद ‘अदालत पर लांछन’ लगाने के जुर्म को अपराध की सूची से हटा दिया गया।
बीसवीं सदी में ब्रिटेन और वेल्स में अदालत पर लांछन लगाने के अपराध में केवल दो अभियोग चलाए गए थे। इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवमानना से जुड़े ये प्रावधान अपने आप ही अप्रासंगिक हो गए थे।
हालांकि अमरीका में सरकार के ज्यूडिशियल ब्रांच की अवज्ञा या अनादर की स्थिति में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट के प्रावधन है लेकिन देश के संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट के तहत अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के अधिकार को इस पर तरजीह हासिल है।
विरोध और समर्थन में चि_ी
प्रशांत भूषण के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामलों ने समाज में बहस छेड़ दी है।
जहां कुछ पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व नौकरशाहों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि ‘सर्वोच्च न्यायलय की गरिमा को देखते हुए प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमाना के मामले वापस लिए जाएं।’
तो एक दूसरे समूह ने भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखकर संस्थानों की गरिमा को बचाने का अनुरोध किया था।
भूषण के पक्ष में जारी किए गए बयान में जिन 131 लोगों के हस्ताक्षर थे। उनमें सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व चीफ जस्टिस जस्ती चेलामेस्वर, जस्टिस मदन बी लोकुर के अलावा दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस (रिटायर्ड) एपी शाह, पटना उच्च न्यायालय की जस्टिस (रिटायर्ड) अंजना प्रकाश शमिल हैं।
इनके अलावा हस्ताक्षर करने वालों में इतिहासकार रामचन्द्र गुहा, लेखक अरुंधति रॉय और वकील इंदिरा जयसिंह भी हैं। वहीं, राष्ट्रपति को पत्र भेजने वाले पूर्व न्यायाधीशों, वकीलों, पूर्व नौकरशाहों और सामजिक कार्यकर्ताओं के एक दूसरे समूह का कहना था कि कुछ प्रतिष्ठित लोग संसद और चुनाव आयोग जैसी भारत की पवित्र संस्थाओं को दुनिया के सामने बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोडऩा चाहते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट भी उनके निशाने पर है।
राष्ट्रपति को भेजी गई इस चि_ी पर हस्ताक्षर करने वालों में राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनिल देव सिंह, सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस प्रमोद कोहली के अलावा 15 रिटायर्ड जज शामिल हैं।
कुल मिलाकर 174 लोगों के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट में अवमाना का मामला पूरी तरह से प्रशांत भूषण और अदालत के बीच का मामला है। इसपर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियाँ कर सुप्रीम कोर्ट के गौरव को हल्का दिखाना है।
समर्थक और विरोधी क्या कह रहे हैं?
सेंट्रल एडमिन्सट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के अध्यक्ष और सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस रह चुके प्रमोद कोहली कहते हैं, ‘अवमाना का क़ानून अगर ना हो तो कोई भी सुप्रीम कोर्ट या दूसरी अदालतों के फ़ैसलों को नहीं मानेगा।’
उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूरे देश पर लागू होते हैं और सभी अदालतें और कार्यपालिका उन फैसलों को मानने के लिए बाध्य हैं। सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता, अखंडता और साख बनी रहे, ये सुनिश्चित करना सबके लिए ज़रूरी है। लेकिन कानून के जानकारों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई है।
दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस एपी शाह कहते हैं, ‘ये अफसोसनाक है कि जज ऐसा सोचें कि आलोचना को दबाने से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।’
शाह के अनुसार, अवमानना के कानून पर फिर से गौर किए जाने जरूरत तो है ही, साथ ही ये भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इसका इस्तेमाल किसी तरह की आलोचना को रोकने के लिए नहीं किया जाए।
आलोचना बनाम अवमानना
कानून के जानकारों को लगता है कि टकराव वहाँ होता है जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 129 आमने-सामने आ जाते हैं।
संविधान के अनुसार हर नागरिक अपने विचार रखने या कहने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन जब वो अदालत को लेकर टिप्पणी करे तो फिर अनुच्छेद 129 को भी ध्यान में रखे।
अदालत की अवमाना को लेकर भारत के न्यायिक हलकों में हमेशा से ही बहस होती रही। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस (रिटायर्ड) एपी शाह के अनुसार अवमानना का कानून विश्व के कई देशों में और खास तौर पर मजबूत लोकतांत्रिक देशों में अप्रचलित होता जा रहा है। मिसाल के तौर पर अमरीका में अदालतों के फैसलों पर टिप्पणियाँ करना आम बात है और वो अवमानना के दायरे में नहीं आते हैं।
लेकिन पूर्व चीफ जस्टिस प्रमोद कोहली कहते हैं कि अगर अवमाना का कड़ा कानून नहीं हो तो फिर अदालतों का डर किसी को नहीं रहेगा। कार्यपालिका और विधायिका को मनमानी करने से रोकने का एक ही जरिया है और वो है न्यायपालिका।
वो कहते हैं, ‘अगर कानून और अदालतों का डर ही खत्म हो जाए तो फिर अदालतें बेमानी हो जाएंगी और सब मनमानी करने लगेंगे। इस लिए अदालत और कानून का सम्मान सबके अंदर होना जरूरी है।’
कैसे वजूद में आया अवमानना कानून
साल 1949 की 27 मई को पहले इसे अनुच्छेद 108 के रूप में संविधान सभा में पेश किया गया। सहमति बनने के बाद इसे अनुच्छेद 129 के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
इस अनुच्छेद के दो प्रमुख बिंदु थे- पहला कि सुप्रीम कोर्ट कहाँ स्थित होगा और दूसरा प्रमुख बिंदु था अवमानना। भीम राव आंबेडकर नए संविधान के लिए बनायी गई कमिटी के अध्यक्ष थे।
चर्चा के दौरान कुछ सदस्यों ने अवमानना के मुद्दे पर सवाल उठाया था। उनका तर्क था कि अवमाना का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए रुकावट का काम करेगा।
आंबेडकर ने विस्तार से सुप्रीम कोर्ट को इस अनुच्छेद के जरिये अवमानना का स्वत: संज्ञान लेने के अधिकार की चर्चा करते हुए इसे जरूरी बताया था।
मगर संविधान सभा के सदस्य आरके सिधवा का कहना था कि ये मान लेना कि जज इस कानून का इस्तेमाल विवेक से करेंगे, उचित नहीं होगा।
उनका कहना था कि संविधान सभा में जो सदस्य पेशे से वकील हैं वो इस कानून का समर्थन कर रहे हैं जबकि वो भूल रहे हैं कि जज भी इंसान हैं और गलती कर सकते हैं।
लेकिन आम सहमति बनी और अनुच्छेद 129 अस्तित्व में आ गया। (bbc.com/hind)
-पुस्तक ‘माई ईयर्स विथ राजीवः ट्रायम्फ एंड ट्रैजेडी’
बीस अगस्त, 1944 को भारत उस साम्राज्यवादी आधिपत्य की जकड़न में ही था जिसने हमारे विनाश के लिए हमारा शोषण किया था, लेकिन राजीव गांधी के परिवार-जैसे कई लोगों के प्रयास की वजह से स्वतंत्रता हासिल करने ही वाला था। इसी युवा भारत में मेरे स्कूल के साथी राजीव बड़े हुए और बाद में प्रधानमंत्री बने। वह ऐसे दोस्त थे जो अंतिम समय तक मेरे दोस्त बने रहे। विभाजन के बाद भारत के इतिहास में विस्तार के नजरिए से अभूतपूर्व हिंसक सदमे के बीच वह प्रधानमंत्री-पद तक पहुंचे। उन्होंने भगवद्गीता के 9वें अध्याय के 7वें श्लोक के विसृजामि (मैं रचता हूं) के तौर पर यह समझते हुए खुद को कभी भी नहीं देखा था कि किसी का घाव भरने की शक्ति के लिए जरूरी है कि स्वस्थ करने वाला अधिक मजबूत हो। विदेश नीति के मामले में राजीव ने अपने जीवनकाल में यही बात आगे बढ़ाई थी- परमाणु-मुक्त दुनिया के लिए काम करना। देश के अंदर इसका मतलब शक्ति के मोर्चे के तौर पर सामंजस्य था।
और इस तरह, प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पूर्वोत्तर में म्यांमार से सटते मिजोरम और असम से लेकर दुराग्रही पाकिस्तान की सीमा से लगते पंजाब और कश्मीर तक देशभर के असंतुष्ट तत्वों के साथ समझौते को आगे बढ़ाया। विदेश नीति में इसका मतलब गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के तौर पर भारत की प्रतिष्ठा का उपयोग करते हुए वैश्विक परमाणु-मुक्ति के लिए आग्रह करना था जिसे पूरा होते देखने के लिए वह जीवित नहीं रहे, लेकिन इस दिशा में बढ़ने के उनके प्रयत्न का ही फल था जिसने तब सोवियत संघ तक से परमाणु प्रसार को रोकने में मदद पहुंचाने की बात कहलवाई जब वह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के औचित्य के समापन की बात कहने लगा था। इस आंदोलन की परिकल्पना उनके नाना जवाहरलाल नेहरू ने की थी और निश्चित तौर पर वैश्विक व्यवस्था में यह उनकी प्रमुख भागीदारी थी। संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक मंच पर राजीव ने ‘भारत और गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ की बात कहते हुए इसे नई दिशा दी थी- ‘खास तौर पर परमाणु निःशस्त्रीकरण के तौर पर इच्छापूर्वक निःशस्त्रीकरण की वकालत। हमारा अंतिम लक्ष्य प्रभावी अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण में पूर्ण निःशस्त्रीकरण होना चाहिए।’ इस संदर्भ में उन्होंने गुटनिरपेक्षता की दुर्बलता वाली भावना को नवीन दृष्टि दी, ‘गुटनिरपेक्षता के क्षेत्र का विस्तार वैश्विक टकरावों के खतरे को कम करता है।’
फिर भी, शांति को बढ़ावा देते हुए राजीव गांधी ने भारतीय रक्षा क्षमता में किसी तरह का समझौता करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया। मैं जब वाशिंगटन में भारतीय दूतावास में सामुदायिक मामलों का मंत्री था और दुनिया के एकमात्र सुपरपावर की राजधानी में महात्मा गांधी मेमोरियल की स्थापना के लिए बिल के कांग्रेस से अनुमोदन की तैयारी कर रहा था, तब बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया और भारत परमाणु शक्ति वाले देशों में शामिल हो गया। यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि यह राजीव की व्यक्तिगत विरासत थी। राजीव ने लगातार माना था कि भारत के पास ऐसी शक्ति पहले से है। 1986 में राजीव गांधी ने रिटायरमेंट के 33 साल बाद जनरल के.एम. करियप्पा को फील्ड मार्शल नियुक्त किया। वह आजाद भारत के पहले देसी कमांडर-इन-चीफ थे। फील्ड मार्शल तकनीकी तौर पर कभी रिटायर नहीं होते और वह सक्रिय सूची में बने रहते हैं, यह मानते हुए राजीव गांधी ने करियप्पा को उनकी अवकाश प्राप्ति के काफी वर्षों बाद प्रोन्नत कर सेना की परंपरा तोड़ी। करियप्पा औपनिवेशिक सेना को भारतीय रक्षा सेवा के गौरव के तौर पर परिवर्तित करने में सफल रहे थे। कोई भी इस तरह की बड़ी प्रतिष्ठा अर्पित नहीं कर सकता था। इस तरह उन्होंने भारत की दृढ़ सैन्य रीढ़ को भी सम्मान दिया।
राजीव ने दुख में डूबे देश की इच्छा से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ीं लेकिन उनसे इक्कीसवीं सदी की इच्छित कूद में ले जाने की अपेक्षा भी थी और राजीव के कार्यकाल के पांच साल की सफलता देश को ऐसा करने का नेतृत्व देने का साक्षी भी है। राजीव ने वसीयत में विरोधाभासों की पहेली पाई थी और यह पहेली अब भी बनी हुई है। भीमकाय साम्राज्यवाद से आजादी पाने के चालीस साल बाद भी गरीबी को वह नितांत अनुचित स्तरों वाला मानते थे। यह उन्हें कष्ट देता था। इससे उनकी प्राथमिक चिंताएं जन्मीं जो टेक्नोलॉजी मिशन बनीं:
- ग्रामीण पेयजल
- टीकाकरण
- वयस्क शिक्षा
- खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता
- टेलीकॉम नेटवर्क का विकास
- डेयरी विकास
युवाओं के लिए भी उन्हें खासी चिंता थी और इसीलिए अगले पांच साल के अपने कार्यकाल के लिए उन्होंने एक अन्य मिशन का ड्राफ्ट तैयार किया था। दुर्भाग्य से यह अवसर नहीं आया। हालांकि भारत को ओलम्पिक में मेडल मिलते थे लेकिन वे आम तौर पर हॉकी तक ही सीमित थे। 1952 हेल्सिंकी में हमें कुश्ती में कांस्य मिला था। आज हमारे पास ओलम्पिक और एशियाई खेलों- दोनों के कई पदक जीतने वाले और वैश्विक प्रतिस्पर्धी हैं। 1982 में भारत में हुए एशियाई खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष राजीव थे और भारत ने इसमें 57 मेडल हासिल किए थे। यह सबसे ज्यादा संख्या थी। ये पदक टेनिस, भारोत्तोलन, मुक्केबाजी, कुश्ती के साथ-साथ ऐसी बैडमिंटन स्पर्धा में भी मिले थे जिसमें चीन का एक तरह से एकाधिकार था। और यह राजीव ही थे जिन्होंने 18 साल के लोगों को मताधिकार दिया। यह राजनीतिक तौर पर सचेत भारतीयों की पीढ़ी को दिया गया अधिकार था जो चुनावों में आज निर्णायक तत्व हैं।
आज का भारत गरीबी से आक्रांत है जिसे राजीव ने अपनी प्राथमिक चुनौती के तौर पर देखा था और राजीव के बाद लाए गए आर्थिक उदारीकरण के कारण नाटकीय विकास के बावजूद अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ती ही जा रही है। राजीव को इस तरह के दुःस्वप्न की आशंका थी। उन्हें इस क्षति को संभालने का अवसर नहीं मिल पाया। फिर भी, कोई भी निरपेक्ष पर्यवेक्षक कहेगा कि भारत आज पुरातन अवशेष नहीं बल्कि ऐसा आधुनिक देश है जो 21वीं सदी में टेक्नोलॉजी के साथ अपनी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
राजीव आज इतिहास के अंग, अपनी प्राचीन भूमि के समय के विस्तार में महज झिलमिलाहट हैं लेकिन वह भारत के न सिर्फ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के तौर पर उभार के विकास में विशाल कद वाले व्यक्ति के तौर पर खड़े हैं बल्कि सुशासन की सार्वजनिक भागीदारी के मामले में सबसे प्रमुख व्यक्तित्व हैं। और इससे भारत भौगोलिक अभिव्यक्ति के तौर पर ब्रिटेन के विंस्टन चर्चिल से अपनी आजादी हासिल करने के समय से लेकर ऊर्जा, अपने अंतहीन विरोधाभासों में समरूपता पाने और फिर भी इससे निरंतर एकताबद्ध होने से कंपायमान होता गया है। एक व्यक्ति के तौर पर राजीव गांधी की महत्ता शेक्सपीयर के मार्क एंटोनी के अपने शत्रु ब्रूटस के बारे में बताते हुए शब्दों में सबसे बढ़िया ढंग से बताई जा सकती है। उनका जीवन सौम्य था और उसमें कई सारे तत्व इतनी अच्छी तरह समाहित थे कि पूररी कायनात खड़ी होकर सारी दुनिया से कह सकती है, ‘हां, वह एक अच्छा आदमी था।
- Ritika
बबली तीन महीने की गर्भवती हैं। वह अपने दूसरे बच्चे के लिए उत्साहित तो हैं पर डरी हुई भी हैं। बबली अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पूरी तरह सरकारी अस्पताल पर निर्भर हैं लेकिन कोरोना वायरस और लॉकडाउन के कारण वह अब तक सिर्फ एक बार ही अस्पताल जा सकी हैं। वह कहती हैं, ‘हमारे पास निजी अस्पताल में जांच कराने जितने पैसे नहीं हैं। हमारे लिए सरकारी अस्पताल ही एकमात्र विकल्प है। मैं जिस अस्पताल में अपनी जांच करवाने जाती थी वहां फिलहाल कोरोना के मरीज़ों का इलाज चल रहा। इसलिए मैं अस्पताल जाने से डरती हूं क्योंकि अगर मैं संक्रमित हो गई तो अपना इलाज कैसे करवाऊंगी?’ ये कहानी सिर्फ पटना की बबली की ही नहीं है। कोरोना वायरस के कारण लागू किए गए लॉकडाउन ने देश की कई गर्भवती महिलाओं को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित कर दिया है।
बेरोज़गारी, आर्थिक तंगी, स्वास्थ्य सुविधाओं की दयनीय स्थिति, बढ़ता मानसिक अवसाद, महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा में बढ़त, शिक्षा में रुकावट, ये वो चंद समस्याएं हैं जो भारत में 24 मार्च से लागू हुए लॉकडाउन के कारण पैदा हुई। लॉकडाउन से भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में मदद मिली या नहीं इस पर संशय बरकरार है। आज 26 लाख से अधिक कोरोना वायरस के मामलों के साथ भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच चुका है। कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण ग्रामीण भारत पर क्या असर हुआ इसपर मीडिया संस्था गांव कनेक्शन ने एक सर्वे किया है। यह सर्वे ग्रामीण भारत पर लॉकडाउन के असर को बताता देश का पहला सर्वे है। इस सर्वे की डिजाइनिंग और डेटा विश्लेषण सेंटर फॉर स्टडी डेवलपिंग सोसायटी और लोकनीति ने किया है। यह सर्वे देश के 23 राज्यों के 179 ज़िलों में किया गया है। इस सर्वे में 25 हज़ार 300 लोगों के जवाब और प्रतिक्रियाएं दर्ज की गई हैं।
कोरोना महामारी की दस्तख के साथ ही देश में अन्य बीमारियों से ग्रसित मरीज़ हाशिये पर चले गए। लॉकडाउन की शुरुआत में ही सभी अस्पतालों के ओपीडी बंद करने के आदेश दे दिए गए थे। ऐसे में कोरोना के इतर दूसरी बीमारियों का इलाज करवा रहे मरीज़ों, खासकर गर्भवती महिलाओं के लिए यह लॉकडाउन किसी परीक्षा से कम नहीं था। लॉकडाउन के दौरान गर्भवती महिलाओं को किन परेशानियों से गुज़रना पड़ा गांव कनेक्शन के इस सर्वे में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया है।
क्या कहता है सर्वे
गांव कनेक्शन के सर्वे के मुताबिक सर्वे में शामिल हर आठ में से एक परिवार में एक गर्भवती महिला मौजूद थी। सर्वे में हर पांच में से एक परिवार ने माना कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें अस्पताल या डॉक्टर के पास जाने की ज़रूरत पड़ी। सर्वे के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण भारत की 42 फीसद गर्भवती महिलाएं न ही किसी जांच के लिए गई और न ही उनका टीकाकरण हो पाया। ग्रीन ज़ोन में 40 फीसद, ऑरेंज ज़ोन में 36 फीसद और रेड ज़ोन में 56 फीसद गर्भवती महिलाओं की न जांच हुई, न ही टीकाकरण। यह स्थिति तब है जब भारत की स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही लचर हैं।
राजस्थान में 87 फीसद, उत्तराखंड में 84 फीसद, बिहार में 66 फीसद गर्भवती महिलाओं ने माना कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें जांच और टीकाकरण की सुविधा मिली। सबसे खराब हालत पश्चिम बंगाल में देखने को मिली जहां सिर्फ 29 फीसद गर्भवती महिलाओं को इस दौरान जांच और टीकाकरण की सुविधा मिली। जबकि ओडिशा में सिर्फ 33 फीसद गर्भवती महिलाओं को ये सुविधाएं मिल सकी।
गर्भवती महिलाओं को जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होना पड़ा, वहीं दूसरी तरफ लाखों महिलाएं अपना सुरक्षित गर्भसमापन नहीं करवा सकी।
लॉकडाउन में गर्भवती महिलाओं को किन परेशानियों का सामना उठाना पड़ा इस स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा हम इसी बात से लगा सकते हैं कि नोएडा की एक गर्भवती महिला नीलम कुमारी गौतम को सिर्फ एक बेड के लिए 15 घंटे में 8 अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े थे। लॉकडाउन के दौरान जब हज़ारों मज़दूर पैदल ही अपने घरों को निकल पड़े थे, उसमें गर्भवती महिलाएं भी बड़ी संख्या में शामिल थी। महाराष्ट्र के नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए पैदल अपने घर के लिए निकली एक गर्भवती महिला को सड़क किनारे ही अपने बच्चे को जन्म देना पड़ा था। प्रसव के महज़ 2 घंटे बाद ही उसने अपने नवजात बच्चे के साथ 150 किलोमीटर का सफर तय किया था।
कोरोना वायरस के आने से पहले भी भारत में गर्भवती महिलाओं की स्थिति कुछ खास नहीं थी। साल 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की आई रिपोर्ट बताती है कि भारत में हर पांच मिनट एक महिला की मौत गर्भावस्था या प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती है। हालांकि रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015-17 के मुकाबले साल 2016-18 में मातृ मुत्यु दर में 7.3 फीसद की गिरावट आई है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए 3.1 फीसद के लक्ष्य के मुकाबले भारत की मातृ मृत्यु दर अभी भी दोगुनी है।
लॉकडाउन में 18.5 लाख महिलाएं सुरक्षित गर्भपात से हुई वंचित
लॉकडाउन न सिर्फ गर्भवती महिलाओं के लिए परेशानियों का सबब बनकर आया बल्कि उन महिलाओं को भी खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ा जो किसी कारणवश गर्भ समापन करवाना चाहती थी। इपस डेवलपमेंट फाउंडेशन द्वारा 12 राज्यों में किए गए सर्वे के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान करीब 18.5 लाख महिलाएं अपना सुरक्षित गर्भपात नहीं करवा पाई। अधिकतर महिलाओं का गर्भसमापन तय समय से देर से हुआ और कुछ महिलाओं को मजबूरन बच्चे को जन्म देना पड़ा।
फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया से जुड़ी ऋचा साल्वी के मुताबिक ज्यादातर महिलाएं लॉकडाउन के दौरान क्लिनिक आने में असमर्थ थी। वहीं, कई केस ऐसे भी सामने आए जहां महिलाओं को अपने गर्भवती होने की बात छिपानी पड़ी। यह स्थिति तब पैदा हुई जब गर्भसमापन को लॉकडाउन के दौरान ज़रूरी सेवाओं की सूची में शामिल किया गया था। हम बता दें कि भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक हर दिन 10 महिलाओं की मौत असुरक्षित गर्भसमापन के दौरान हो जाती है। भारत में करीब आधे गर्भपात असुरक्षित तरीके और अप्रशिक्षित लोगों द्वारा किया जाता है।
इतना ही नहीं, असम, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों में अबॉर्शन पिल्स की भी कमी देखने को मिली। फाउंडेशन फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विसेज़ की रिपोर्ट बताती है कि इन राज्यों में 79 फीसद दवा विक्रेताओं के मेडिकल अबॉर्शन पिल्स का स्टॉक जनवरी से मार्च के दौरान ही खत्म हो गया था।
गर्भवती महिलाओं को जहां बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होना पड़ा, वहीं दूसरी तरफ लाखों महिलाएं अपना सुरक्षित गर्भसमापन नहीं करवा सकी। हम आंकड़ों पर अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि ये समस्याएं भारत के लिए नई नहीं है। इन समस्याओं को बस लॉकडाउन और इस महामारी ने पहले से भी अधिक गंभीर बना दिया। कोरोना महामारी को मानो एक बहाना बना लिया गया अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को नज़रअंदाज़ करने के लिए। ये समस्याएं सीधा सवाल उठाती हैं भारत की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और सरकार की नीतियों पर क्योंकि कोरोना महामारी के आने से दूसरी बीमारियां और मरीज़ों की परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं।
( यह रिपोर्ट पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुई है)
-राजु सजवान
देश में कोरोनावायरस की वजह से अब तक 50 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी हैं, लेकिन कोरोनावायरस की वजह से राज्यों की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में आई गिरावट भी लोगों की मौत का कारण बन सकती है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अर्थशास्त्रियों द्वारा जारी की जाने वाली इकोरैप रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन राज्यों की जीडीपी में 10 फीसदी से अधिक कमी आएगी, तो वहां कोविड-19 मृत्यु दर में 0.55 से 3.5 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि होगी। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी राज्यों की जीडीपी में औसतन 16 फीसदी की गिरावट हो सकती है।
रिपोर्ट बताती है कि राज्य की जीडीपी में सबसे अधिक नुकसान महाराष्ट्र को होने वाला है। रिपोर्ट में 2018 में राज्य की मृत्यु दर को आधार बनाया गया है। इसके मुताबिक महाराष्ट्र में आधार मृत्यु दर 5.5 फीसदी थी, कोविड-19 की वजह से चालू मृत्यु दर में 0.34 फीसदी की वृद्धि हुई है और यदि जीडीपी में 10 फीसदी की कमी आती है तो यहां मृत्यु दर 1.28 फीसदी और इजाफा हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्यों में लॉकडाउन खुलने के बाद अनियोजित तरीके से आजीविका संबंधी कामों पर पाबंदी लगाई जा रही है, बल्कि फिर से नए तरीके से अनियोजित लॉकडाउन लगाए जा रहे हैं, जिसका असर राज्यों की जीडीपी पर दिखेगा।
राज्यों को नुकसान
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोविड-19 की वजह से महाराष्ट्र को वित्त वर्ष 2020-21 में 5.39 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है। महाराष्ट्र को 38,841 रुपए प्रति व्यक्ति आय के नुकसान की आशंका जताई गई है, जबकि राज्य की जीडीपी में 17.6 फीसदी नुकसान का भी आकलन किया गया है। जबकि तमिलनाडु में 18.2 फीसदी का जीडीपी का नुकसान हो सकता है।
कोविड-19 से होने वाले नुकसान के मामले में उत्तर प्रदेश तीसरे नंबर पर है। उत्तर प्रदेश को 3 लाख 11 हजार 850 करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन लगाया गया है। राज्य की जीडीपी में 16.1 फीसदी और प्रति व्यक्ति आय में 14006 रुपए के नुकसान की आशंका जताई गई है।
22 राज्यों में पीक देखना बाकी
इकोरैप में कहा गया है कि कोरोनावायरस संक्रमण अब ग्रामीण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है और अब ऐसे जिलों की संख्या बहुत कम रह गई है, जहां 10 से कम कोरोना केस हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन राज्यों में अभी कोरोना केसों का पीक आना बाकी है। एसबीआई के अर्थशास्त्रियों ने 27 राज्यों का विश्लेषण किया है और दावा किया है कि अभी कम से कम 22 राज्यों को पीक देखना बाकी है। जिन राज्यों में कोरोना केसों की संख्या उच्च स्तर (पीक) तक पहुंच चुकी है, उनमें तमिलनाडु, दिल्ली, गुजरात, जम्मू कश्मीर और त्रिपुरा शामिल है। इस रिपोर्ट में 14 अगस्त तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।(downtoearth)
- भागीरथ श्रीवास
हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2017-19 के दौरान करीब 5,68,000 लोग बलपूर्वक विस्थापित किए गए हैं। मंगलवार 18 अगस्त 2020 को जारी रिपोर्ट “वर्ष 2019 में भारत में जबरन बेदखली: एक राष्ट्रीय संकट” में बताया गया है कि पिछले तीन वर्षों के दौरान 1,17,770 से अधिक आवासों को उजाड़ा गया। इस दौरान औसतन 108 मकानों को प्रतिदिन उजाड़ा गया। दूसरे शब्दों में कहें तो रोज करीब 519 लोगों ने अपना घर खोया और हर घंटे 22 लोग जबरन बेदखल किए गए। वर्ष 2019 में कम से कम 22,250 घरों को उजाड़ा गया जिससे 1,07,600 से अधिक लोग विस्थापित हुए।
रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में लगभग डेढ़ करोड़ लोग बेदखली और विस्थापन के खतरे के बीच रह रहे हैं। एचएलआरएन के अनुसार, यह एक न्यूनतम अनुमान है और वास्तविक स्थिति का एक हिस्सा भर प्रदर्शित करते हैं। भारत में बेदखल और विस्थापित लोगों की कुल संख्या के साथ-साथ विस्थापन के खतरे में रहने वाले लोगों की संख्या लिखित आंकड़ों से अधिक होने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, जबरल बेदखली के लगभग सभी मामलों में राज्य के अधिकारियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
बेदखली के बहाने
सर्वाधिक विस्थापन या बेदखली (46 प्रतिशत) का कारण झुग्गी बस्ती को हटाना, अतिक्रमण हटाना और सौंदर्यीकरण अभियान को बताया गया। 27 प्रतिशत मामलों में विस्थापन का कारण बुनियादी ढांचा और अस्थायी विकास परियोजनाएं रहीं। 17 प्रतिशत मामलों में पर्यावरणीय परियोजनाओं, वन संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण का हवाला दिया गया। सात प्रतिशत विस्थापन की वजह आपदा प्रबंधन के प्रयास और तीन प्रतिशत विस्थापन की वजह अन्य कारण (जैसे राजनीतिक रैली) बताए गए।
पुनर्वास केवल 26 प्रतिशत
एचएलआरएन के अनुसार, 2019 में बेदखली के दस्तावेजीकृत मामलों में केवल 26 प्रतिशत मामलों में पुनर्वास किया गया। अधिकांश मामलों में पुनर्वास के अभाव में प्रभावित व्यक्तियों को अपने वैकल्पिक आवास की व्यवस्था खुद करनी पड़ी अथवा उन्हें बेघर ही रहना पड़ा। जिन लोगों का राज्य सरकारों द्वारा किसी प्रकार का पुनर्वास प्राप्त हुआ, उनका पुनर्वास दूरदराज के इलाकों में किया गया। ये इलाके आवश्यक नागरिक व बुनियादी सामाजिक सुविधाओं से वंचित थे। बेदखली के कारण बच्चों, महिलाओं, विक्लांग व्यक्तियों, बुजुर्गों, दलितों, अनुसूचित जनजातियों और हाशिए पर रहने वाले समूहों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में उच्च न्यायालयों, स्टेट कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश से 20,500 से अधिक लोग विस्थापित हो गए।(downtoearh)
नई दिल्ली, 20 अगस्त ( एजेंसी ) | कोरोना वायरस को काबू करने के लिए जब भारत में लॉकडाउन लगा तो रातों रात बेरोजगार हुए ब्रजेश के लिए फैसला करना मुश्किल हो गया. उन्हें वापस गांव चले जाना चाहिए या फिर दिल्ली में अपनी टीबी की दवा मिलने का इंतजार करना चाहिए?
जब टीबी सेंटर जाने का कोई साधन नहीं बचा तो उन्होंने अपना बोरिया बिस्तर बांधा और अपने गांव की तरफ निकल पड़े जो दिल्ली से 1,100 किलोमीटर दूर पूर्वी बिहार में है.
दिल्ली के बाहरी इलाके में कबाड़ी का काम करने वाले 44 साल के ब्रजेश कहते हैं, "सब कुछ बंद हो गया, इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि मुझे अपनी टीबी की दवा मिलेगी. मेरे पास बहुत कम बचत थी. मुझे चिंता सताने लगी कि अपनी पत्नी और बेटी को क्या खिलाऊंगा. इसलिए हडबड़ी में मैं दिल्ली से निकला." उन्होंने दरभंगा जिले से टेलीफोन पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के साथ बातचीत में यह बात कही.
टीबी के मरीजों की संख्या के मामले में भारत दुनिया भर में सबसे ऊपर आता है. इसलिए यह मुश्किल ब्रजेश जैसे बहुत से लोगों के सामने थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि 2018 में दुनिया भर में एक करोड़ लोगों को टीबी हुई जबकि 15 लाख लोग इससे मारे गए. इनमें से 27 प्रतिशत नए मामले भारत में दर्ज किए गए जबकि इससे मरने वालों की संख्या 45 हजार के आसपास रही.
महामारी की मार
भारत में मार्च के आखिर में 70 दिनों का सख्त लॉकडाउन लगाया गया, जिससे भारत के लाखों टीबी मरीजों के लिए दवा पाना, डॉक्टर को दिखाना और इलाज पाना मुश्किल हो गया. स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि कोरोना महामारी ने पहले ही बोझ तले भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए हालात और मुश्किल बना दिए. ज्यादातर स्वास्थ्यकर्मी और चिकित्सा सेवाएं कोरोना संक्रमण को रोकने में जुट गए. ऐसे में, टीबी के मरीजों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.
हालांकि जून में लॉकडाउन में ढील देनी शुरू की गई, लेकिन लोग अभी भी अस्पतालों में जाने से डर रहे हैं या फिर उन्हें वहां आने नहीं दिया जा रहा है. कई जगह स्टाफ की कमी है तो कई जगहों पर कोविड-19 और टीबी की बीमारी में फर्क करना मुश्किल हो रहा है. दोनों ही बीमारियों में खांसी, कभी बलगम वाली खांसी, छाती में दर्द, कमजोरी और बुखार की शिकायत होती है. सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी नाम की संस्था से जुड़े चपल मेहरा कहते हैं, "पहले एक-दो महीने तो कोविड-19 और टीबी में बहुत भ्रम की स्थिति रही. इस महामारी ने एक फिर बता दिया है कि हमारी स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था ऐसे संकटों का सामना करने के लिए तैयार नहीं है."
टीबी से बचाने के लिए नई वैक्सीन
कोरोना के सबसे ज्यादा मामले वाले देशों में भारत अमेरिका और ब्राजील के बाद तीसरे नंबर पर है. टीबी के मरीजों की देखभाल पर इस महामारी का सबसे ज्यादा असर पड़ा. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि जनवरी से जून के बीच टीबी के नए मामलों के रजिस्ट्रेशन में 25 फीसदी की कमी देखी गई है. इस कमी की वजह उचित देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को माना जा रहा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता है कि इससे 2025 तक टीबी को पूरी तरह खत्म करने का भारत का लक्ष्य पटरी से उतर सकता है. वैश्विक स्तर पर 2030 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य है.
इलाज बना चुनौती
वहीं भारत की केंद्रीय टीबी डिविजन के प्रमुख कुलदीप सिंह सचदेव कहते हैं कि महामारी की वजह से टीबी देखभाल पर बहुत असर पड़ा है, लेकिन इससे टीबी को खत्म करने की समयसीमा प्रभावित नहीं होगी. उनका कहना है कि कोरोना महामारी की वजह से मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग पर अमल से टीबी को फैलने से रोकने में भी मदद मिलेगी, जो खांसी और छींक के जरिए फैलती है.
उनका कहना है कि सरकार का अनुमान था कि टीबी के मामले कम दर्ज होंगे. लेकिन वह कहते हैं कि आने वाले महीनों में उनका पता लगा लिया जाएगा.
सचदेव के मुताबिक उनका विभाग कोशिश कर रहा है कि कोविड-19 के साथ साथ टीबी का भी टेस्ट किया जाए. अब तक ऐसे 50 हजार टेस्ट हो चुके हैं. सचदेव का कहना है कि टीबी को लेकर कई तरह के जागरूकता अभियान चलाए गए हैं. उनका दावा है कि जिन लोगों का इलाज लॉकडाउन से पहले शुरू हुआ, उनके घर जाकर उन्हें दवा डिलीवर की गई है.
उधर, टीबी से ग्रस्त जेनेंद्र कहते हैं कि उन्हें घर पर दवाएं तो मुहैया नहीं कराई गई हैं, लेकिन लॉकडाउन की वजह से उनका इलाज प्रभावित नहीं हुआ है. वहीं 32 साल की मंजु कहती हैं कि उन्हें अपनी दवाएं दोबारा शुरू करनी हैं क्योंकि लॉकडाउन की वजह से वे दो हफ्तों तक दवाएं नहीं ले पाई थीं. वह उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में रहती हैं. उनके पति राम छैला ने बताया, "आने जाने का कोई साधन नहीं था, और बाहर निकलने पर पुलिस भी पीट रही थी."
एके/सीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)(dw)
अनिल चमडिय़ा
दिलचस्प है कि सामान्य दिनों में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की भले अन्य भारतीय नागरिकों के मुकाबले औसत आयु कम हो, लेकिन महामारी के समय यह स्थिति उलट जाती है। ऊंची जातियों के मुकाबले स्वास्थ्य सुविधाएं कम मिलने के बावजूद उनके बीच मौत की दर कम होती है।
सत्ता द्वारा जो वंचित जातियां स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भी वंचित रह जाती हैं, वे महामारी के दौरान कैसे अपने को सुरक्षित रख पाती हैं, यह अध्ययन दिलचस्प हो सकता है।
पहली बात तो भारतीय समाज के बारे में कई ऐसे अध्ययन हैं, जिसमें यह तथ्य सामने आए हैं कि समाज के दलितों, मुस्लिमों, महिलाओं और अन्य जाति समूहों की औसत आयु सामान्य औसत आयु से कितनी कम होती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार दलित जाति समूह की महिलाएं, गैर दलित जातियों की महिलाओं के मुकाबले कम उम्र तक जिंदा रह पाती हैं।
अध्ययन के मुताबिक दलित महिलाएं, अन्य महिलाओं के मुकाबले 14.6 वर्ष कम जीती हैं। दलित महिलाओं की औसत उम्र महज 39.5 वर्ष है, तो सवर्ण जाति की महिलाओं की औसत आयु 54.1 वर्ष है। अर्थशास्त्री वाणी कांत बरुआ ने अपने एक शोध अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला है कि आदिवासियों की औसत उम्र 43 वर्ष पहुंच गई है, जबकि 2004 में औसत उम्र 45 वर्ष थी। आदिवासियों के बाद दलितों और मुसलमानों की औसत आयु अन्य भारतीय नागरिकों के मुकाबले कम है।
इसीलिए यह माना जाता है कि भारत में ‘जाति’ शब्द के मुकाबले दुनिया भर में शायद कोई और दूसरा शब्द नहीं है, जहां कि एक शब्द से अनेक अर्थ निकलता हो। भारत में जाति का नाम भर बता देने से सुनने वाले के कानों में कई अर्थ पहुंच जाते हैं। भारत की समाज व्यवस्था में जाति का नाम भर ले लेने से उस जाति के सदस्यों की जिंदगी की हर तरह की परिस्थियों की कहानी सामने आ जाती है। लेकिन यह बेहद दिलचस्प है कि सामान्य दिनों में दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की अन्य भारतीय नागरिकों के मुकाबले औसत आयु कम हो, लेकिन महामारी के समय यह स्थिति उलटी पड़ जाती है। बावजूद इसके कि महामारी के दौरान दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को स्वास्थ्य की सुविधाएं अपेक्षाकृत कम मिल पाती हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके बीच मौत की दर कम होती है।
दरअसल भारत की समाज व्यवस्था की तरह ही स्वास्थ्य सुविधाओं और रोग प्रतिरोधक क्षमताओं का ढांचा बना हुआ है। स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा जहां राजनीतिक, सामजिक और आर्थिक व्यवस्थाएं विकसित करती हैं, वहीं प्रतिरोधक क्षमता का ढांचा दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों में उनकी जीवन शैली की वजह से विकसित हो गया है। भारत में समाज व्यवस्था के अनुसार दलितों पर श्रम करने के कठोर नियम लागू रहे हैं। आदिवासियों के हिस्से शहरों से दूर जंगली इलाकों में रहने की जगह होती है और गरीबी के कारण मुसलमानों के बीच मांस खाने की मजबूरी होती है।
दिलचस्प तथ्य है कि किसी महामारी के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा नाकाफी साबित होता है, लेकिन प्रतिरोधक क्षमता आबादी के बड़े हिस्से को सुरक्षित रखने में कामयाब होती है। 120 वर्ष पहले भारतीय समाज में प्लेग के दौरान जातियों की जो स्थिति थी, उसका एक अध्ययन सामने आया है।
भारत सरकार के गृह विभाग के आईसीएस अधिकारी आर. नाथन द्वारा संकलित एक दस्तावेज (वॉल्टर चार्ल्स रैंड, प्लेग कमिश्नर पुणे- द प्लेग इन इंडिया 1896, भाग- एक, 1898; शिमला, अध्याय-7 पेज-207) के अनुसार महाराष्ट्र के पुणे में हिन्दू प्लेग अस्पताल ब्राह्मणों की एक समिति द्वारा संचालित था और सभी हिन्दुओं के लिए खुला था- सिवाय निचली जाति के हिन्दुओं के।
चाल्र्स रैंड ने अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ये लिखा कि हिन्दू प्लेग अस्पताल ब्राह्मणों और उच्च जाति के लोगों के लिए था, निम्न जाति के लिए नहीं। उन्होंने यह भी लिखा कि अस्पताल में दाखिल 157 मरीजों में से 98 ब्राह्मण थे और 59 अन्य ऊंची जातियों के थे। अस्पताल खुलने के पहले साल में ब्राह्मण मरीज 62.2 फीसदी थे।
इस अध्ययन में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया कि जिनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित की जाती हैं, उनके लिए उनकी जीवन शैली और सांस्कृतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने के लिए एक बाधक के रुप में सक्रिय हो जाती है। भारत में कोरोना के दौरान भी यह देखा गया कि इस वायरस से प्रभावित लोग घरों में ही छुपे रहना पसंद करते हैं। प्लेग की महामारी के दौरान स्थिति यह थी कि पुणे में घर-घर जाकर मरीजों तक पहुंचने की बड़ी कवायद हुई।
हालांकि, आमतौर पर पुणे की जनता ने प्लेग समिति के कार्यकलाप का समर्थन किया। चार्ल्स रैंड लिखते हैं कि ‘अधिकतर लोगों का व्यवहार मैत्रीपूर्ण था, किन्तु लोग बीमारी छुपाने की कोशिश करते थे। केवल ब्राह्मण समुदाय ने प्लेग समिति का विरोध किया। उनका सैनिकों के प्रति व्यव्हार द्वेषपूर्ण था। ब्राह्मण बस्तियों में प्लेग समिति को खासे विरोध का सामना करना पड़ा। उनका प्रतिरोध काफी प्रबल था।’
प्लेग कमिश्नर के अनुसार मुसलमानों के अस्पताल काफी अच्छी तरह काम कर पा रहे थे। इसका सबसे बड़ा कारण था सभी मुसलमानों का सामान रूप से अस्पतालों पर विश्वास। ‘इन अस्पतालों में दाखिल मरीज ज्यादातर गरीब मुसलमान थे। और तो और, ज्यादातर मरीज उनके परिवार द्वारा खुद अस्पताल लाए गए थे। जहां एक ओर इन अस्पतालों में मरीज अच्छा इलाज और विश्वास पा रहे थे, वहीं हिन्दू मरीजों को मानो जबरदस्ती ही अस्पताल लाना पड़ रहा था।’
लेकिन 22 जून 1897 के दिन चार्ल्स रैंड पर जानलेवा हमला हो गया, जिसमें रैंड के साथी लेफ्टिनेंट आयर्स्ट ने मौके पर दम तोड़ दिया और चार्ल्स रैंड ने दस दिनों बाद 3 जुलाई को दम तोड़ दिया। चाल्र्स रैंड के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने 2 माह (19 फरवरी से अप्रैल तक ) से भी कम समय में पुणे को प्लेग मुक्त कर दिया था। 19 फरवरी 1897 को पुणे के युवा उप जिलाधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को प्लेग नियंत्रण का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया था।
कार्यभार मिलने के बाद रैंड ने पाया कि पुणे प्लेग का गढ़ बन चुका था, जो कि राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर की राजनीतिक गतिविधियों का स्थानीय केंद्र था। तिलक ने 25 अप्रैल, 1897 के दिन मराठा में संपादकीय लिखा, जिसका शीर्षक था-लार्ड सैंड्हर्स्ट से एक निवेदन। उन्होंने लिखा- ‘चाल्र्स रैंड की प्लेग कमिश्नर के तौर पर नियुक्ति दुर्भाग्यपूर्ण है।’
प्रो. परिमला वी. राव ने चार्ल्स रैंड के प्रति बाल गंगाधर तिलक के इस नफरत की पृष्ठभूमि पर गहन शोध किया है। 1894 में चाल्र्स रैंड सतारा में खोटी समझौता अधिकारी के पद पर तैनात थे। बाल गंगाधर तिलक के बारे में यह कहा जाता है कि कैसे उन्होंने गणेश चतुर्थी के उत्सव को राजनीतिक रंग दिया था। सतारा में अपनी तैनाती के दौरान रैंड ने गणेश उत्सव में राष्ट्रवादियों के राजनीतिक संगीत बजाने पर रोक लगा दी थी। यही नहीं उन्होंने 11 ब्राह्मणों को आदेश का उल्लंघन करने पर सजा भी दिलवाई थी।
भारत में राजनीति का आधार जाति रहा है और महामारी में जातीय पृष्ठभूमि भी सक्रिय रहती है। लिहाजा महामारी तो राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाता, लेकिन महामारी के दौरान जातीय भावना मुद्दा बन जाती है। (बाकी पेज 7 पर)
दिसंबर 1897 में पुणे के करीब महाराष्ट्र के ही शहर अमरावती में इंडियन नेशनल कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ, लेकिन प्लेग को लेकर उसमें कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया।
यही नहीं चार्ल्स रैंड की हत्या के आरोप में जिन हिन्दूत्ववादी विचारधारा के दामोदर चापेकर, उसके दो भाई बालकृष्ण व वासुदेव और महादेव विनायक रानाडे के खिलाफ फांसी की सजा सुनाई गई थी, उनमें से चापेकर की 120वीं पुण्य तिथि पर 8 जुलाई 2018 को भारतीय डाक विभाग द्वारा एक डाक टिकट जारी कर दिया गया। यह भी तथ्य है कि हिन्दूत्ववाद के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक का जन्म एक सौ पच्चीस वर्ष पहले महाराष्ट्र में ही हुआ था और 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में उसकी विचारधारा के प्रभुत्व वाली सरकार है।
लेकिन जाति और उसकी जीवन शैली का रिश्ता स्वस्थ रहने के शारीरिक और मानसिक ढांचे से भारत के हर हिस्से में जुड़ा रहा है। पुणे के अलावे दूसरे हिस्से में भी प्लेग की महामारी के दौरान पुणे जैसी परिस्थितियां देखी गईं। शोधकर्ता डा. ए के विस्वास ने प्लेग पर अपने अध्ययन में पंजाब प्रान्त की अधिकारिक रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि प्लेग किसी कि जाति, वर्ग, सामाजिक स्थिति, श्रेणी या वंश नहीं देखता।
लेकिन पंजाब के सबसे पुराने रेलवे जंक्शन अंबाला के उप कमिश्नर, मेनार्ड ने लाहौर (1947 के बाद पाकिस्तान का हिस्सा) में सरकार को सौंपी प्लेग के मृत्यु दर से संबंधित अपनी रिपोर्ट में लिखा- यदि ब्राह्मणों में प्लेग फैल जाए तो वह मक्खियों की तरह मरते हैं। ब्राह्मण और बनिये अक्सर बच नहीं पाते, क्योंकि वे सबसे अधिक समय कम कपड़ों और बिना जूतों के गुजारते हैं। उनका शरीर अधिकांशत: निर्वस्त्र रहता है, जिससे संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है।
दूसरी ओर पंजाब सरकार के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अनुसार- मुसलमानों, चमारों और भंगियों (दोनों दलित जातियां) में प्लेग से होने वाली मृत्यु की दर सामान पाई गई, क्योंकि यह सभी समुदाय मांस का अधिक सेवन करते हैं। मृत्यु दर के हिसाब से देखें तो सबसे ज्यादा मौतें ऊंची जातियों के हिन्दुओं की हुई, जैसे कि ब्राह्मण, राजपूत, खत्री आदि। यह दर 72.27 त्न थी। इससे यह साफ हो गया कि चमारों की प्रतिरोधक क्षमता सबसे बेहतर थी। प्लेग से ठीक होने वालों में सबसे अधिक दर चमारों की 36 प्रतिशत और मुसलमानों की 34त्न थी। वहीं ब्राह्मणों, राजपूतों और खत्रियों में यह दर मात्र 28 प्रतिशत थी।
भारत में कोरोना महामारी के दौरान जाति और धर्म की भूमिका पर भी इन दिनों काफी लिखा जा रहा है, लेकिन उसे प्लेग की तरह एक शोध का दस्तावेज बनने में अभी थोड़ा वक्त लग सकता है। (navjivanindia.com)
रिचर्ड महापात्रा
सिएरा लियोन ने जब नई शताब्दी में प्रवेश किया था, तब शांति और समृद्धि की उम्मीद नहीं थी। उस समय इस देश में गृहयुद्ध चल रहा था जिसमें 50 हजार लोग मारे गए और 2002 तक 20 लाख लोग विस्थापित हुए। इसके 12 वर्ष बाद भी देश मेडिकल युद्ध लड़ रहा था यानी इबोला महामारी से जूझ रहा है। 2016 तक इसका लक्ष्य बीमारी को सीमित रखना था। इस दौरान विकास का काम ठप हो गया था।
लेकिन सिएरा लियोन के अंदर ऐसा कुछ चल रहा था जिसे दुनिया ने नहीं देखा। हालांकि यह दुनिया के सबसे गरीबी देशों में तब भी शुमार था और अब भी है। लेकिन इसने दुनिया को उस वक्त चौंका दिया जब वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) में कहा गया कि इस छोटे से देश ने सबसे तेजी से गरीबी कम की है।
द ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव और यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) ने हाल ही में यह सर्वेक्षण जारी किया है। इसमें एक जैसे आंकड़ों वाले 80 देशों की बहुआयामी गरीबी की तुलना की गई है। आय गरीबी के इतर सूचकांक में तीन पैमानों- स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनस्तर को परखा जाता है। इनमें शामिल 10 संकेतकों के विश्लेषण के आधार पर देशों को रैंकिंग दी जाती है। कोई व्यक्ति बहुआयामी गरीब तब होता है, जब वह एक तिहाई संकेतकों या इससे अधिक से वंचित रहता है। यह आकलन का दसवां साल है। इसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि विभिन्न देश गरीबी से संबंधित इन संकेतकों पर कितनी प्रगति कर रहे हैं।
एमपीआई 2020 के अनुसार, 107 देशों में 5.9 बिलियन लोगों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि 1.3 बिलियन लोग बहुआयामी गरीब हैं। 65 देशों ने बहुआयामी गरीबी कम की है। सिएरा लियोन में इसकी दर सबसे तेज है। इसने बहुआयामी गरीबी में सालाना 4 प्रतिशत की कमी की है। यह कमी ऐसे समय में हुई है जब देश इबोला के प्रकोप से जूझ रहा है। इबोला के प्रकोप के एक साल पहले 2013 में सिएरा लियोन में 74 प्रतिशत लोग बहुआयामी गरीब थे। इबोला का प्रकोप खत्म होने के एक साल बाद यानी 2017 में यह घटकर 58 प्रतिशत रह गया। इस प्रगति को देखकर एमपीआई 2020 के लेखक इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसकी तुलना दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की बेहतर हुई जीवन प्रत्याशा से कर दी। युद्ध के दौरान ब्रिटेन में यह बेहतर नीतियों और खाद्य वितरण प्रणाली के माध्यम से संभव हुआ था।
सिएरा लियोन में 2002 में गृहयुद्ध समाप्त होने के तुरंत बाद गरीबी कम करने का काम शुरू हुआ। सरकार ने बेहद प्रभावी कार्यक्रम के माध्यम से नि:शुल्क शिक्षा सुनिश्चित की। इसके साथ ही स्थानीय प्राधिकरणों को ताकत देकर बड़े पैमाने पर शासन का विकेंद्रीकरण किया। इससे मानव विकास के लिए जरूरी सेवाओं की बेहतर डिलीवरी हो पाई। सरकार इस मूलमंत्र पर चल रहा थी कि अगर परिवार का मुखिया शिक्षित होगा तो गरीबी से बाहर निकलने की प्रबल संभावना होगी। साथ ही वह आपदा से भी बेहतर तरीके से निपट सकेगा।
इसके अलावा सिएरा लियोन ने गरीबी का मापदंड भी बदल दिया। पहले वह आय से गरीबी मापता था, जिसे ऐसे तंत्र में परिवर्तित कर दिया गया जिससे गरीबी के कारण पता चलते हैं। 2017 में इस देश ने गरीबी के कारणों को जानने के लिए सर्वेक्षण किया। इससे नीति निर्माताओं को आय बढ़ाने वाली योजनाएं बनाने में मदद मिली। साथ ही साथ गरीबी को दूर करने के दीर्घकालीन उपाय भी पता चले। उम्मीद के मुताबिक सरकार ने स्वच्छ ईंधन, शिशु मृत्युदर और स्कूल में बच्चों की उपस्थिति से संबंधित योजनाओं को लागू किया। इसी का नतीजा था कि सिएरा लियोन ने पहले दो संकेतकों पर उल्लेखनीय सुधार किया।
एमपीआई 2020 की तरह स्कूलों में बढ़ते दाखिलों से गरीबी को कई स्तरों पर मापा जा सकता है। गरीबी को केवल आय और व्यय के आधार पर परखने पर खुशहाली की तस्वीर तो दिख जाती है लेकिन यह नहीं पता चलता कि गरीबी को बढ़ाने वाले कारक कौन से हैं। गरीबी रेखा से नीचे बने रहने के कारण भी इससे पता नहीं चलते। ऐसे समय में जब दुनिया समग्र मानव विकास को उसकी खुशहाली से जोड़ रही है, तब हमें गरीबी के बहुआयामी मूल्यांकन की जरूरत है। सिएरा लियोन से भी यही सबक मिलता है।
मध्यप्रदेश में सत्ता की चाहत में जनता को खतरे में डाला
-पंकज मुकाती
(राजनीतिक विश्लेषक )
लापरवाह..गैरजिम्मेदार..जनता की जान के दुश्मन... कोरोना प्रतिनिधि...शिवराज सरकार के मंत्रियों पर ये सारे शब्द इस वक्त एक दम सटीक है। मध्यप्रदेश में सरकार ने ही कोरोना प्रसार का जिम्मा ले रखा है। ऐसा लगता है मानो शिवराज कैबिनेट में कोरोना फैलाने की होड़ लगी है। एक के बाद एक मंत्री संक्रमित हो रहे हैं। पर कोई भी सुधारने को तैयार नहीं। नेता, मंत्री और उनके समर्थकों की भीड़ प्रतिदिन जुट रही है। शुरुवात में कांग्रेस सरकार पर कोरोना में लापरवाही का आरोप लगाने वाले शिवराज और ज्योतिरादित्य सिंधिया अब खुद अपने-अपने समर्थकों के साथ सत्ता के शक्ति प्रदर्शन में कोरोना फैलाने पर आमादा हैं। ये सभी जनता की जान के दुश्मन बनते नजर आ रहे हैं। देश में सर्वाधिक मंत्री और संघ से जुड़े लोग मध्यप्रदेश में ही संक्रमित हुए हैं।
मंगलवार को उज्जैन के विधायक और प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव संक्रमित हो गए। यादव सोमवार को पूरा दिन राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ महाकाल की सवारी के आयोजन में शामिल रहे। वे पूरा दिन सिंधिया के साथ रहे। इस आयोजन में भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती, मंत्री कमल पटेल, तुलसी सिलावट और सैकड़ों कार्यकर्त्ता बिना सोशल डिस्टेंसिंग के एक दम सटकर पूजा में बैठे रहे। तस्वीरों में सब एक दूसरे से इस कदर बैठे हैं मानों सिंधिया से एक इंच की दूरी भी उनकी आस्था को कम कर देगी। राजनीतिक सत्ता की भूख और बड़े नेताओं के करीब दिखने का ये तमाशा प्रदेश की करोड़ों जनता की सेहत पर भारी पड़ सकता हैं।
करीबी की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद भी यादव आयोजन में बने रहे
माना जा रहा है कि मोहन यादव के निवास पर सोमवार को रखे गए सिंधिया के सम्मान कार्यक्रम में शामिल दीनदयाल मंडल के एक पदाधिकारी के संपर्क में आने से संक्रमित हुए हैं। इस पदाधिकारी की रिपोर्ट सोमवार को ही पॉजिटिव आई थी। इसके बाद से ही भाजपा सांसद अनिल फिरोजिया, नगर अध्यक्ष विवेक जोशी, उपाध्यक्ष अमित श्रीवास्तव सहित 200 से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने खुद को होम आइसोलेट कर लिया था, पर मोहन यादव पूरे वक्त सिंधिया के साथ बने रहे।
तुलसी सिलावट के सारे गुनाह माफ़
ज्योतिरादित्य सिंधिया के सबसे करीबी तुलसी सिलावट तो कोरोना गुनाहों के देवता बनते नजर आ रहे हैं। सबसे पहले तो मुख्यमंत्री की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद भी तुलसी सिलावट आइसोलेट नहीं हुए। वे दूसरे ही दिन भाजपा कार्यालय इंदौर में एक बैठक में पहुँच गए। पत्रकारों के सवालों के जवाब में बचकाना सा जवाब दिया -भाजपा कार्यालय मेरा घर है और मैं होम आइसोलेट ही हूं। मुख्यमंत्री के निर्देश पर उन्होंने जांच करवाई और रिपोर्ट पॉजिटिव निकली। इसके बाद भी वे नहीं माने सोमवार को इंदौर में सिंधिया को लेने एयरपोर्ट पहुंचे। बाद में वे पूरा दिन सिंधिया के साथ रहे। इंदौर सांसद सुमित्रा महाजन के अलावा वे कैलाश विजयवर्गीय के घर डिनर में भी सिंधिया के साथ रहे।
मुख्यमंत्री इस दौड़ में सबसे आगे
ऐसा ही नहीं कि सिर्फ मंत्री ऐसी लापरवाही कर रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का व्यवहार भी ऐसा ही है। वे पॉजिटिव होने के बाद भी अस्पताल में सक्रिय रहे। उनसे मिलने लोग आते रहे। अस्पताल में उन्होंने एक संक्रमित से राखी भी बंधवाई। आखिर कोरोना के इस दौर में अस्पताल में ऐसा करने की छूट उन्हें किसने दी।
उमा भारती, कमल पटेल भी मुश्किल में
उज्जैन में पूरे वक्त मोहन यादव के साथ रही उमा भारती और कृषि मंत्री कमल पटेल के भी संक्रमित होने का खतरा बना हुआ है। इसके अलावा इंदौर में हजारों कार्यकर्त्ता इसकी चपेट में आ सकते हैं।
संक्रमितों की इस सूची को देखिये आप समझ जायेंगे संक्रमण कौन फैला रहा
शिवराज सिंह चौहान (मुख्यमंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया (सांसद )
अरविंद भदौरिया (मंत्री)
तुलसी सिलावट (मंत्री )
मोहन यादव (मंत्री )
विश्वास सारंग (मंत्री )
ओमप्रकाश सकलेचा (मंत्री )
रामखेलावन पटेल (मंत्री )
महेंद्र सिसोदिया (मंत्री )
हीरासिंह राजपूत (गोविंद राजपूत मंत्री के भाई)
वीडी शर्मा (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष )
सुहास भगत - संगठन मंत्री
आशुतोष तिवारी -सहसंगठन मंत्री
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
क्या हम आज फेसबुक और व्हाट्सऐप के बिना रह सकते हैं ? सुबह उठते ही करोड़ों भारतीय भगवान का नाम लेते हैं या नहीं, लेकिन अपने फेसबुक और व्हाट्सऐप को जरूर देखते हैं। यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। भारत तो फेसबुक का दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बन गया है लेकिन फेसबुक पर गंभीर लापरवाही के आरोप लग रहे हैं।
मेरी राय में फेसबुक, अब ठेसबुक बनती जा रही है। उस पर लोग झूठी खबरें, निराधार निंदा, अश्लील चर्चा, राष्ट्रविरोधी अफवाहें याने जो चाहें सो चला देते हैं। ऐसी बातों से लोगों का, संस्थाओं का और देश का अथाह नुकसान होता है। ऐसे ही कुछ मामले अभी-अभी सामने आए हैं। अमेरिका के अखबार ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ में छपी एक खबर से पता चला है कि भारत में भाजपा के चार नेताओं ने फेसबुक का इस्तेमाल हिंसा भडक़ाने के लिए किया, जो कि फेसबुक के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है लेकिन भारत में फेसबुक की कर्ता-धर्ता महिला ने कह दिया कि उन ‘खतरनाक दोषियों’ के खिलाफ हम कार्रवाई करते तो हमें व्यापारिक नुकसान हो जाता। कुछ ऐसे ही तर्कों के विरुद्ध अमेरिकी संसद ने सख्त कार्रवाई की थी और इस तरह की संचार-संस्थाओं को दंडित भी किया था।
भारत में भी सूचना तकनीक की स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष शशि थरुर ने इस मामले में फेसबुक की जांच की मांग की है। थरुर की मांग पर भाजपा को नाराज होने की जरुरत नहीं है, क्योंकि भाजपा ने तो अपने उन सांसदों और नेताओं को खुद ही काफी डांट-फटकार लगाई थी। बेंगलुरु और दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों को कुछ गैर-जिम्मेदार लोगों ने उत्तेजना जरुर दी लेकिन किसी पार्टी ने उसे योजनाबद्ध ढंग से भडक़ाया हो, ऐसा मानना कठिन है।
फिर भी फेसबुक और व्हाट्साप को मर्यादित करना बहुत जरुरी है। इसे पार्टीबाजी का मामला नहीं बनाया जाना चाहिए। यदि इसे लेकर कांग्रेसी भाजपा पर हमला करेंगे तो भाजपा भी ‘केम्ब्रिज एनालिटिका’ का मामला उठाकर कांग्रेस की खाट खड़ी कर देगी।
यह कहना तो ज्यादती ही है कि फेसबुक की प्रमुख अखी दास ने जान-बूझकर भाजपा के साथ पक्षपात किया है, क्योंकि उनके कोई रिश्तेदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं। ऐसा कहना विषयांतर करना होगा। यह मामला इतना गंभीर है कि इसे पार्टी के चश्मे से देखने की बजाय राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
भारत की संसदीय समिति में सभी दलों के लोग हैं। वे सर्वसम्मति से फेसबुक और व्हाट्साप के दुरुपयोग को रोकें, यह बहुत जरूरी है। यदि यह नहीं हुआ तो चीन की तरह भारत में भी फेसबुक को लोग ठेसबुक कहने लगेंगे और वह अंर्तध्यान हो जाएगी।
(नया इंडिया की अनुमति से)
नवीन अग्रवाल
कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था परास्त और हताश है, आखिर इसका जिम्मेदार कौन है, सरकार या अफसर। सरकार को लगता है कि कोरोना सडक़ पर घूमने वाली बीमारी है, जिसे बेरिकेड्स लगाकर रोका जा सकता है। हालांकि कुछ लोग इससे भी सहमत मिलेंगे, दरअसल उनके पेट भरे हुए है। दो महीने तक लगे देशव्यापी लॉक डाउन ने लोगो ने देशभर मे तमाशा देख लिया, कुछ हासिल हुआ क्या। याद करिये उस समय का कोई दृश्य जब एक लाठीधारी पुलिस वाला किसी निरीह को बुरी तरह मार रहा था, क्या हुआ। नहीं मारता तो कोरोना और बढ़ जाता क्या, या उसने मारपीट करके दस पांच लाख लोगों को कोरोना होने से बचा लिया। याद करो वो दृश्य जब कुछ लोग पटरी पर थक कर सो गए थे और उनके ऊपर से ट्रेन गुजर गई, उनको सडक़ किनारे सोने दे दिया जाता तो कोरोना के कितने पेशेंट बढ़ जाते ? ऐसे अनगिनत दृश्य है जिन्हें याद किया जाये तो समझ आएगा कि ये सब कोरोना के नाम पर क्रूरता थी।
पुलिस सडक़ पर उठक-बैठक करा रही थी, हेलमेट नहीं पहनने पर चालान काट रही थी, इस सबसे कोरोना रुक गया क्या गलती केवल पुलिस की नहीं थी, सरकार और अधिकारी सब ये देख रहे थे। कोई जनता के साथ नही था । जिस समय सरकार को फ्रंट फुट में होना था वो कोरोना के डर से घर मे दुबकी पड़ी थी। श्रमिक स्पेशल ट्रेन के पैसे के लिए रेलवे विभाग अड़ा हुआ था, कितना पैसा कमा लिया रेलवे ने, नहीं कमाती तो क्या जीडीपी 2-4 परसेंट गिर जाती ? कितने ही लोग भूखे-प्यासे मर गए इन ट्रेनों में, क्या कोरोना उससे कंट्रोल में आ गया। दरअसल सरकार की आत्मा मर चुकी है।
इतना बुरा बर्ताव तो आजादी के बाद देश भर में एक साथ कभी नहीं हुआ, पर सरकार टस से मस नही हुई। सरकार के पास मुख्य रुप से कमी थी मास्क की, पीपीई किट की, सेनेटाईजर की, ये कमी किसने दूर किया ,ये कमी भी व्यापारियों ने ही पूरी की, जिसे डंडा मार कर पुलिस घर मे बैठने कह रही थी। क्या आपको याद पड़ता है कि किसी विधानसभा क्षेत्र में कोई विधायक मौजूद हो और जागरूकता या मदद की बात कर रहा हो, वैसे विधायक आपका क्या भला करेंगे जो इस कठिन समय मे निकलकर नहीं आए। ये तो सरकार के लिए कठिन परीक्षा का दौर था हर विधायक अपने अपने इलाके के प्रशासन के साथ खड़ा दिखना था। लेकिन पूरे देश ने पुलिस और प्रशासन का तांडव देखा, और चुने हुए जन प्रतिनिधि तमाशा देखते रहे क्योंकि उन्हें सिर्फ अपनी सेहत की चिंता थी।
देश भर में गिनेचुने जनप्रतिनिधि भी केवल फोटो खिंचाऊ मुद्रा में नजऱ आए। हकीकत यह थी कि पूरे कोरोना प्रबंधन में जनप्रतिनिधियों की कोई भूमिका ही नहीं थी। हकीकत यह है कि कोरोना तंत्र इस तरह डिज़ाइन किया गया कि जनप्रतिनिधि बाहर हो जाएं और निरंकुश नौकरशाही सब कुछ अपने हाथों में ले ले।दरअसल यह चुनौती लोकतंत्र के लिए है। आज का दौर तो निकल जायेगा,लेकिन भविष्य में जब मजबूत नौकरशाही होगी और कमज़ोर जनप्रतिनिधि होंगे तब क्या होगा?जब लॉक डाउन के एंट्री पास के लिए आज जिन अफसरों के सामने जनप्रतिनिधि लगभग गिड़गिड़ाने की मुद्रा में थे,भविष्य में भी वो नौकरशाह अपने आपको जनप्रतिनिधियों से ऊपर ही समझेंगे। यकीन मानिए नया वर्ल्ड आर्डर अब यही है। कोरोना प्रबंधन ने जनप्रतिधियों को, राजनीतिज्ञों को और अछूत बना दिया! जनता को लगता है कि माई-बाप कलेक्टर है या एसपी या वो अच्छा वाला पुलिस अंकल जो गाना गा कर लॉक डाउन में मन बहला रहा था।
लॉक डाउन में जब लाखों मजदूर सडक़ों पर थे तब जिस चीज़ की कमी थी वो थे जनप्रतिनिधि।शायद इसीलिए भी तब श्रमिकों को प्रबंधन का मानवीय चेहरा नहीं दिखा।जनप्रतिनिधि हमेशा जनहित में काम करता है ऐसा नहीं है, पर वो जानता है कि उसे लौट कर इस जनता के सामने जाना है। किसी अफसर को कभी भी जनता का सामना नहीं करना होगा। इस कोरोना प्रबंधन ने जनता और जन प्रतिनिधि के बीच की खाई भी और चौड़ी कर दी। यह है नया वल्र्ड आर्डर। तैयार रहिए- एक निरंकुश व्यवस्था आपका इंतजार कर रही है।
रेड ग्रीन और ऑरेंज जोन इसी में उलझ कर रह गया देश, समझ में नहीं आता था कब हमारा जिला हरा से लाल हो गया, मतलब कोरोना के नाम पर ऐसा तमाशा मचाया गया है कि दस बीस साल बाद जब इस पर किताब लिखी जाएगी तो कोरोना की चर्चा कम होगी, सरकार की चर्चा ज्यादा होगी। याद रखना वोट देने जाओ जब... आप दूध फल सब्जी के लिए कैसे भटके थे, किराया पटाने के लिए मकान मालिक से कितनी मिन्नत किए थे। कैसे पुलिस ने आपसे बात की थी, कोरोना तो चले जाएगा एक न एक दिन पर क्रूरता के इस दौर को हमेशा याद रखना ।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बहुचर्चित वकील प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी मानहानि करने का दोषी करार दिया है और शीघ्र ही उन्हें सजा भी दी जाएगी। उनका दोष यह बताया गया है कि उन्होंने कुछ जजों को भ्रष्ट कहा है और वर्तमान सर्वोच्च न्यायाधीश पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी। यह बात तो बिल्कुल ठीक है कि किसी भी नेता या न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार का आरोप यों ही नहीं लगा दिया जाना चाहिए और उनके बारे में बेलगाम भाषा का भी इस्तेमाल नहीं होना चाहिए लेकिन यह भी सत्य है कि कोई दूध का धुला है या नहीं, इस तथ्य पर संदेह की उंगली हमेशा उठी रहनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो भारत की सरकार, प्रशासन और अदालतों का स्वच्छ रहना असंभव होगा। नेता, अफसर और जज भी आम आदमियों की तरह इंसान ही तो हैं। ये कोई आसमान से उतरे हुए फरिश्ते तो नहीं हैं। यह भी सच है कि फिसलता तो वही है, जो सीढ़ी पर चढ़ा होता है।
सत्ता के सिंहासन पर बैठे हुए इन लोगों पर प्रशांत भूषण जैसे लोग ही अंकुश लगाते रहते हैं। डॉ. लोहिया और मधु लिमये जैसे सांसद और डॉ. अरुण शौरी जैसी पत्रकार ही इनकी बखिया उधेड़ते रहे हैं। राजनीति के बारे में तो सभी लोग मानने लगे हैं कि वह भ्रष्टाचार के बिना चल ही नहीं सकती लेकिन हमारे न्यायाधीशों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। ज्यादातर न्यायाधीश निष्पक्ष, निडर और निस्वार्थ होते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन पर संसद को महाभियोग चलाना पड़ता है और उच्च न्यायालय के दो जज ऐसे भी थे, जिन्हें संसद ने दोषी पाया और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों ने पत्रकार परिषद करके अपना असंतोष जाहिर किया था। 1964 में एक संसदीय कमेटी ने माना था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार होता है। दो सर्वोच्च न्यायाधीशों ने भी ऐसा ही कहा था। भ्रष्टाचार का अर्थ सिर्फ रिश्वतखोरी ही नहीं है। सेवा-निवृत्त होते ही जजों का राज्यपाल या राज्यसभा सदस्य या राजदूत बन जाना किस प्रवृत्ति का सूचक है ? वरिष्ठों की उपेक्षा और कनिष्ठों की पदोन्नति किस बात की ओर संकेत करती है ? ठकुरसुहाती करने में कई न्यायाधीश क्या-क्या फैसले नहीं दे देते हैं ? हमने आपात्काल में यह सब होते हुए देखा था या नहीं ? इसीलिए प्रशांतभूषण के आरोपों से नाराज होने की बजाय जजों को न्यायपालिका के काम-काज को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने प्रशांत भूषण को दोष तो दे ही दिया है, क्या उन्हें दंड देना भी जरुरी है ? प्रशांत भूषण ने स्पष्ट कहा है कि वह अदालत की अवमानना कतई नहीं करना चाहते।
(नया इंडिया की अनुमति से)
मनरेगा के तहत अजमेर सहित पांच जिलों में ग्रामीण अंचलों के स्कूलों में किक्रेट मैदान, बास्केटबॉल कोर्ट और ट्रैक एंड फील्ड बनाए गए
-अनिल अश्वनी शर्मा
राजस्थान के गांवों की नवपौध यानी बच्चे जब स्कूल जाते हैं तो उन्हें स्कूल तो जैसे-तैसे नसीब हो जाता है, लेकिन खेल के मैदान के नाम पर स्कूल के आसपास की खाली पड़ी जमीनों पर लगी जंगली झाड़ियों से भरा मैदान ही नसीब हो पाता है। वहीं राज्य सरकार की प्राथमिकताएं भी ग्रामीण अंचलों में खेल मैदान तो दूर केवल स्कूल खोलने तक ही सीमित रहती हैं, लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत इस कमी को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
अकेले अजमेर जिले में मनरेगा के माध्यम से अब तक नौ स्कूलों में खेल के मैदान, ट्रैक एंड फील्ड और बाक्केटबॉल कोर्ट तैयार किए गए हैं। इस सबंध में अजमेर जिला परिषद में मनरेगा अधिकारी गजेंद्र सिंह राठौर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हमने यह महसूस किया है कि मरनेगा के तहत कहने के लिए तमाम विकास कार्यों को स्वीकृति दी जा रही है। और जिस प्रकार से हमने जिले में तमाम जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित करने के साथ अन्य विकास कार्यों को शुरू करने के लिए पहले पहल ग्रामीणों के साथ बैठक कर अंतिम निर्णय पहुंचे थे। ठीक उसी प्रकार से मई में हमने कम से कम आधा दर्जन से अधिक स्कूलों से बातचीत की और इस दौरान यह बात निकल कर आई कि स्कूल तो हैं लेकिन खेल के मैदान नदारद।
वे बताते हैं कि ऐसे में हमने अब तक चार स्कूलों में खेल के मैदान, 200 मीटर दौड़ के लिए ट्रैक एंड फील्ड और बास्केटबॉल के मैदान तैयार किए हैं। स्कूलों में बने खेल के मैदान के संबंध में जिले के एक अन्य मनरेगा अधिकारी अमित माथुर बताते हैं कि अकेले राजस्थान में ही नहीं देशभर के ग्रामीण अंचलों में सरकारों ने स्कूल तो खोल दिए हैं लेकिन अधिकांश स्कूलों में खेल के मैदान नहीं होते हैं। और इसे एक कमी के रूप में कोई भी नहीं उठाता।
वह बताते हैं कि अक्सर इसके लिए वित्तीय संसाधन की कमी को एक बड़े कारण के रूप में बताया जाता है। चूंकि हमारे पास मनरेगा फंड था तो हमने इस प्रकार से मनरेगा में खर्च करने की तैयारी की, ताकि गांव में हर प्रकार की मूलभूत सुविधाओं का निर्माण हो सके। केवल तालाब या नाली या सड़क तक ही मनरेगा के कामों को सीमित नहीं रखा गया।
उन्होंने बताया कि हमने देखा कि कई गांवों में स्कूल तो हैं लेकिन खेल के मैदान नहीं, ऐसे में हमने ग्राम पंचायत प्रमुख से बातचीत करके उनसे जमीन लेकर मनरेगा के तहत खेल मैदान तैयार करवाए। वह बताते हैं कि किक्रेट अब अकेले शहरी खेल नहीं रहा, अब बड़ी संख्या में ग्रामीण बच्चे भी इसमें अपना कौशल दिखाने में पीछे नहीं रहते। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने दो स्थानों पर तो बकायदा किक्रेट खेलने के लिए सीमेंट की पिच तक तैयार करवा दी है। ताकि कोई भी खेल प्रतिभा केवल इस बिना पर पीछे न रह जाए कि उसके पास खेल के मैदान नहीं था, इस प्रकार दो स्कूलों में बास्केटबॉल कोर्ट भी तैयार किए हैं। (downtoearth)
दुनिया भर में बढ़ते एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स के लिए एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते उपयोग के साथ-साथ प्रदूषण में हो रही वृद्धि भी जिम्मेवार है
-ललित मौर्य
दुनिया भर में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स, स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। इसके विषय में हाल ही में किए एक नए शोध से पता चला है कि यह केवल बढ़ते एंटीबायोटिक दवाओं के अनावश्यक उपयोग के कारण ही नहीं हो रहा है, इसके लिए बढ़ता प्रदूषण भी जिम्मेवार है। यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ जॉर्जिया के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जोकि जर्नल माइक्रोबियल बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों ने प्रदूषण और एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स के सम्बन्ध को समझने के लिए जीनोमिक एनालेसिस की मदद ली है। जिससे पता चला है कि भारी धातु के प्रदूषण और एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स के बीच एक मजबूत सम्बन्ध है। वैज्ञानिकों के अनुसार जिस मिटटी में भारी धातुओं की अधिकता थी उसमें बड़ी मात्रा में वो बैक्टीरिया मौजूद थे जिनके जीन में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स के गुण मौजूद थे।
शोधकर्ताओं के अनुसार इस मिटटी में एसिडोबैक्टीरियोसाय, ब्रैडिरिज़ोबियम और स्ट्रेप्टोमी जैसे बैक्टीरिया मौजूद थे। इन बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन होते हैं जिन्हें एआरजी के रूप में जाना जाता है। जिसकी वजह से इनपर वैनकोमाइसिन, बेसिट्रेसिन और पोलीमैक्सिन जैसे एंटीबायोटिक का असर नहीं होता है। इन तीनों दवाओं का उपयोग मनुष्यों में संक्रमण के इलाज के लिए किया जाता है।
इस शोध से जुड़े शोधकर्ता जेसी सी थॉमस के अनुसार इन बैक्टीरिया में जो एआरजी जीन होते हैं, वो इन्हें मल्टीड्रग रेसिस्टेन्स बनाने के साथ-साथ इन भारी धातुओं से भी बचाते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार जब ये एआरजी मिट्टी में मौजूद थे, तब उन सूक्ष्मजीवों में आर्सेनिक, तांबा, कैडमियम और जस्ता सहित कई धातुओं के लिए, धातु प्रतिरोधी जीन (एमआरजी) भी मौजूद थे।
थॉमस के अनुसार वातावरण में जैसे-जैसे एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग बढ़ रहा है यह सूक्ष्मजीव उतना ज्यादा इन दवावों के प्रति अपनी प्रतिरोधी क्षमता को विकसित कर रहे हैं। लेकिन इन बैक्टीरिया में मौजूद जीन केवल एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति ही रेसिस्टेंट नहीं होते इसके साथ ही यह कई अन्य यौगिकों के प्रति भी प्रतिरोध विकसित करते हैं जो सेल्स को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जिसमें यह हैवी मेटल्स भी शामिल हैं।
पब्लिक हेल्थ कॉलेज में प्रोफेसर ट्रेविस ग्लेन के अनुसार चूंकि एंटीबायोटिक दवाओं के विपरीत, भारी धातुएं पर्यावरण में आसानी से ख़त्म नहीं होती इसलिए वो लम्बे समय तक नुकसान पहुंचा सकती हैं। थॉमस के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग ही केवल एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का कारण नहीं है। कृषि और जीवाश्म ईंधन, खनन जैसी गतिविधियों के कारण भी यह बढ़ रहा है।
क्या होता है एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स
एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स तब उत्पन्न होता है, जब रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया, कवक, वायरस, और परजीवी) में रोगाणुरोधी दवाओं के संपर्क में आने के बाद से बदलाव आ जाता हैं और वो इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं। नतीजतन, यह दवाएं इन पर अप्रभावी हो जाती हैं। इसके कारण संक्रमण शरीर में बना रहता है। इन्हें कभी-कभी "सुपरबग्स" भी कहा जाता है।
दुनिया में कितना बड़ा है एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट का खतरा
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि दुनिया में एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट एक बड़ा खतरा है। अनुमान है कि यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2050 तक इसके कारण हर साल करीब 1 करोड़ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ सकती है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2030 तक इसके कारण 2.4 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी का सामना करने को मजबूर हो जाएंगे। साथ ही इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार इन बैक्टीरिया के बारे में जानना जरुरी है कि समय के साथ यह कैसे विकसित हो रहे हैं। यह हमारे भोजन, पानी के जरिए हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए सही समय पर इनसे निपटना जरुरी है। (downtoearth)
-जुबैर अहमद(बीबीसी संवाददाता)
फे़सबुक भारत में राजनीतिक विवाद में फंस गया है. अमरीका के अख़बार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' के मुताबिक फ़ेसबुक ने आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) और वैचारिक रूप से संघ के क़रीब मानी जाने वाली सत्तारूढ़ बीजेपी की मदद की है. अब विपक्ष इस मुद्दे को लेकर हमलावर है.
शुक्रवार को 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में छपी एक रिपोर्ट में फे़सबुक के कुछ मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों के हवाले से दावा किया गया है कि इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं की हेट स्पीच और सांप्रदायिक कंटेंट को नज़रअंदाज किया है. फे़सबुक के पास ही वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम का भी मालिकाना हक है.
निष्पक्षता को लेकर फे़सबुक के दावों पर सवालिया निशान?
विश्लेषकों का कहना है कि 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' की ओर से फे़सबुक पर लगाए गए आरोपों ने इसकी निष्पक्षता के दावों पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. इस आरोप की वजह से फे़सबुक पर चले 2014 और 2019 के चुनावी अभियानों को भी शक़ की निगाहों से देखा जाने लगा है. इन दोनों चुनावों में बीजेपी को भारी बहुमत मिला था.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक परंजॉय गुहा ठाकुरता ने पिछले साल आई अपनी किताब में बीजेपी और फे़सबुक के रिश्तों की पड़ताल की थी. ठाकुरता कहते हैं कि उन्हें विश्वास है कि फे़सबुक और वॉट्सऐप ने पिछले दो लोकसभा चुनावों के नतीजों को काफी अधिक प्रभावित किया है. उन्होंने बीबीसी से कहा कि वॉल स्ट्रीट जर्नल की स्टोरी ने भारत में फेसबुक की भूमिका की उनकी जांच पर मुहर ही लगाई है.
वह कहते हैं, "भारत में 40 करोड़ फे़सबुक यूज़र्स हैं और 90 करोड़ वोटर. देश में चुनाव से पहले, बाद में और इसके दौरान इस प्लेटफ़ॉर्म का दुरुपयोग होने दिया गया. लोगों ने किसे वोट डाला और कैसे वोट डाला इस पर निश्चित तौर पर इनका बड़ा असर रहा है. संक्षेप में कहें तो आज की तारीख में फे़सबुक और वॉट्सऐप जिस तरीके से काम कर रहे हैं, इससे न सिर्फ़ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र को ख़तरा पैदा हुआ है".

फे़सबुक का दोहरा रवैया?
आलोचकों का कहना है कि फे़सबुक अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम और गाइडलाइंस बनाता है. फे़सबुक दूसरे देशों में सत्ताधारी दलों के आगे हथियार डाल देता है लेकिन अमेरिका में जहां इसका मुख्यालय हैं, वहां राजनीति से दूरी बनाता दिखता है. यह इसका दोहरा रवैया है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि वह फे़सबुक और वॉट्सऐप को नियंत्रित कर रही है. उन्होंने संसद की संयुक्त कमेटी से इसकी जांच कराने की मांग की है.
लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सरकार का बचाव किया है. उन्होंने कहा कि फे़सबुक, वॉट्सऐप को नियंत्रित करने में उनकी सरकार की कोई भूमिका नहीं है. प्रसाद ने ट्वीट कर कहा, "जो लूज़र ख़ुद अपनी पार्टी में भी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकते वो इस बात का हवाला देते रहते हैं कि पूरी दुनिया को बीजेपी और आरएसएस नियंत्रित करते हैं."
अमरीका में अपने मुख्यालय से बयान जारी करते हुए फे़सबुक ने इन आरोपों का खंडन किया है. उसके बयान में कहा गया है, " हम हिंसा भड़काने वाले हेट स्पीच और कंटेंट को रोकते हैं. पूरी दुनिया में हमारी यही पॉलिसी है. हम किसी राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं लेते हैं और न हमारा किसी से जुड़ाव है".
हालांकि फे़सबुक ने माना है कि इस तरह के मामलों से बचने के लिए और भी काफ़ी कुछ करना होगा. अपने बयान में उसने कहा, "हमें पता है कि इस दिशा में अभी कुछ और क़दम उठाने होंगे. लेकिन हम अपनी प्रक्रिया के लगातार ऑडिट और उन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ताकि हमारी निष्पक्षता और सटीकता पर आंच न आए."
फे़सबुक और बीजेपी की नज़दीकियों की पड़ताल
फे़सबुक और बीजेपी सरकार के बीच संबंधों की खबरों से ठाकुरता को अचरज नहीं हुआ. वह कहते हैं, "पिछले साल जब मैंने फे़सबुक पर किताब लिखी और इसके और वॉट्सऐप से मोदी सरकार के नजदीकी रिश्तों का ब्योरा दिया तो मीडिया ने इसे नजरअंदाज किया. अब जब एक विदेशी अख़बार ने यह मुद्दा उठाया है तो मीडिया में गज़ब की फुर्ती और दिलचस्पी दिख रही है".
ठाकुरता ने बीबीसी से कहा कि फे़सबुक और मोदी की पार्टी बीजेपी की दोस्ती काफी पुरानी है. मोदी को सत्ता में पहुंचाने वाले 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले दोनों के बीच काफी अच्छे रिश्ते बन चुके थे.

फे़सबुक से लोकतंत्र को खतरा ?
अमरीका और यूरोप के राजनीतिक नेताओं ने लोकतंत्र के सिद्धांतों को कथित तौर पर चोट पहुंचाने के लिए फे़सबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को कटघरे में खड़ा किया है.
ब्रिटेन में हयूमन राइट्स कमेटी के अध्यक्ष हैरियट हरमन का कहना है "आमतौर पर सांसद काफी शिद्दत से यह मान रहे हैं सोशल मीडिया जो कुछ कर रहा है उससे लोकतंत्र के लिए ख़तरा पैदा हो रहा है".
इस तरह के कई मामलों के बाद फे़सबुक और वॉट्सऐप पर चारों ओर से अपने कामकाज में सुधार लाने के दबाव बढ़ने लगे हैं. ट्विटर जैसे दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र फे़सबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को सलाह दे रहे हैं वह भारत में अपनी कंपनी की गड़बड़ियों को ठीक करे. हालांकि ट्विटर पर भी गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं.
ज़करबर्ग की पिछले दिनों अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पोस्ट के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने पर आलोचना हुई थी. फे़सबुक के शुरुआती दौर में इसमें काम कर चुके 30 कर्मचारियों ने सार्वजनिक तौर पर एक चिट्ठी लिख कर कहा था कि ट्रंप को पोस्ट को मॉडरेट करने से फे़सबुक का इनकार करना ठीक नहीं है. इसने अमरीकी जनता को उन ख़तरों की ओर धकेल दिया, जिन्हें वह पहले ही देख चुका है. इस पत्र में फे़सबुक पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया था.
हेट स्पीच और हिंसा के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के इन-हाउस गाइडलाइंस होते हैं और वे इन्हें बढ़ावा देने के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी करते हैं. लेकिन इस मामले में वो ज्यादातर यूज़र पर ही निर्भर रहते हैं कि वे नियमों के उल्लंघन के प्रति उन्हें सतर्क करें.
ज़करबर्ग ने हाल ही में इसराइली इतिहासकार युआल नोह हरारी से कहा था कि फे़सबुक के लिए यूज़र की प्राइवेसी और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है. लेकिन हरारी इससे सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि ऐसे मामलों में फे़सबुक ने सब कुछ यूज़र पर छोड़ दिया है. उसे इन मामलों में एक कदम आगे बढ़ कर काम करना चाहिए क्योंकि आम आदमी को अक्सर यह पता नहीं होता कि उसका फायदा उठाया जा रहा है. उनका कहना था आम यूज़र के पास फेक न्यूज़ का पता करने का ज़रिया नहीं होता.
'सोशल मीडिया का मकसद सिर्फ पैसा कमाना'
ठाकुरता का कहना है कि सोशल मीडिया का राजनीतिक या कोई और दूसरा मकसद नहीं होता. उसका एक मात्र मकसद "मुनाफा और पैसा कमाना होता है."
फे़सबुक ने हाल में रिलायंस के जियो प्लेटफॉर्म्स में 43,574 करोड़ रुपये का निवेश किया है ताकि भारत में इसका धंधा और बढ़े.
यूज़र की तादाद के हिसाब से भारत फे़सबुक का सबसे बड़ा बाजार है. देश की 25 फीसदी आबादी तक इसकी पहुंच है. 2023 तक यह 31 फीसदी लोगों तक पहुंच सकता है, वॉट्सऐप की पहुंच तो और ज्यादा है.
उन्होंने कहा, " 2013 में मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते ही फे़सबुक और बीजेपी के बीच काफी अच्छे संबंध बन गए थे. मैंने लिखा है कि कैसे फे़सबुक के कुछ आला अफसरों ने बीजेपी के आईटी सेल, इसके सोशल मीडिया विंग और फिर बाद में पीएमओ में मोदी के करीबियों के साथ मिल कर काम किया."
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने फे़सबुक के एक शीर्ष अधिकारी के हवाले से कहा है कि अगर यह प्लेटफॉर्म हेट स्पीच या दूसरे नियमों के उल्लंघन पर बीजेपी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कदम उठाता तो देश में कंपनी की कारोबारी संभवानाओं चोट पहुंचती. इस स्टोरी में कहा गया है कि फे़सबुक के पास बीजेपी का पक्ष लेने का एक 'विस्तृत पैटर्न' है. हालांकि बीजेपी अब इस आरोप से इनकार कर रही है कि फे़सबुक ने उसकी कोई मदद की है.(BBCNEWS)
कोरोना, 18 अगस्त। कोरोना महामारी ने यौनकर्मियों की जिंदगी बदल दी है. अब वे अपने यहां आने वाले ग्राहकों का टेम्परेचर जांच रही हैं और हर ग्राहक के जाने के बाद कमरे को सैनिटाइज कर रही हैं. इस तरह अब ये लोग कोरोना की मार से उबर रही हैं. हालांकि ग्राहकों की संख्या बहुत कम होने के कारण उनके लिए रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है.
भारत ने कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए जब 25 मार्च को लॉकडाउन लागू किया तो देश भर की लाखों यौनकर्मियों से उनके आमदनी का जरिया एकदम छिन गया. मुंबई में इंसानी तस्करी को रोकने के लिए काम करने वाली गैर सरकारी संस्था प्रेरणा की निदेशक और सह संस्थापक प्रीति पाटकर कहती हैं, "जून के अंत तक यौनकर्मियों का कोई धंधा ही नहीं हुआ. मुंबई में पुलिस की निगरानी इतनी सख्त थी कि कमाठीपुरा के वेश्यालयों में कोई गतिविधि नहीं थी."
पाटकर बताती हैं, "खाना और दूसरी जरूरी चीजें तो मुहैया कराई गईं, लेकिन इससे उन्हें घर का किराया और कर्ज उतारने में कोई मदद नहीं मिल पाई." महामारी शुरू होने के बाद से ही अधिकारी लोगों को जरूरी चीजें मुहैया करा रहे हैं.
दरबार महिला समन्वय समिति (डीएमएससी) नाम की संस्था के मुख्य सलाहकार समरजीत जन कहते हैं, "सरकार सिर्फ उन लोगों को मदद मुहैया करा रही है जिनके पास राशन कार्ड है. भारत में 50 प्रतिशत से ज्यादा यौनकर्मियों के पास राशन कार्ड या फिर कोई और ऐसा दस्तावेज नहीं है."
डीएमएससी 65 हजार से ज्यादा यौनकर्मियों का प्रतिनिधित्व करती है. संस्था यौनकर्मियों को खाना, सैनिटरी नैपकिन और अन्य जरूरी चीजें मुहैया करा रही है. यह संस्था एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया कोलकाता के सोनागाछी में भी काम करती है.

महामारी के हालात
लॉकडाउन के हालात में यौनकर्मियों के लिए काम करना लगभग असंभव था. लेकिन मई में भारत ने लॉकडाउन में ढील देना शुरू किया. इसके बाद रेड लाइट इलाकों में भी कुछ चहल पहल बढ़ी. एक पूर्व सेक्स वर्कर और डीएमएससी की सचिव काजोल बोस ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब भी कोई ग्राहक हमारे यहां आता है तो हम उसका टेम्परेचर चेक करते हैं. हम ग्राहक के आने से पहले और उसके जाने के बाद कमरे को सैनिटाइज करते हैं." वह बताती हैं कि कुछ हाई क्लास कैटेगरी की सेक्स वर्करों ने अपनी कमाई के कुछ नए तरीके भी खोज लिए हैं. "इनमें फोन और इंटरनेट सेक्स के माध्यम से पैसा कमाना शामिल है. लेकिन यह विकल्प सबके लिए मौजूद नहीं है."
प्रेरणा की पाटकर कहती हैं कि फोन सेक्स हालांकि एक बेहतर विकल्प है कि इसमें शारीरिक दूरी होती है, लेकिन हर किसी के लिए यह बात लागू नहीं होती. उनके मुताबिक, "यह विकल्प उनके लिए है, जिनके ग्राहक मध्यम और उच्च आमदनी वाले वर्ग से होते हैं. लेकिन कम आमदनी वाले ग्राहकों की जरूरत पूरी करने वाली यौनकर्मियों के पास इसके लिए ना तो जरूरी उपकरण या कनेक्शन होता है और ना ही पर्याप्त जगह."
आमदनी के वैकल्पिक स्रोत
पाटकर कहती हैं कि कुछ यौनकर्मियों ने पैसे कमाने के और भी तरीके ढूंढ़ लिए हैं. एनजीओ उनकी मदद कर रहा है जिससे वे सूखी मछली, प्याज और आलू बेचने वाले स्टोर खोल रही हैं. डीएमएससी से जुड़ी महिलाओं को मास्क और सैनिटाइजर बनाने के काम में भी लगाया गया है. डीएमएसी के सलाहकार जना कहते हैं, "आने वाले दिनों में हम पीपीई किट बनाना भी शुरू करने वाले हैं."
सेक्स वर्कर कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित समूहों में शामिल हैं. कई महिलाएं अपने घर का किराया और बच्चों के स्कूल की फीस नहीं दे पा रही हैं. पाटकर कहती हैं, "कई महिलाओं को वेश्यालय मालिकों की तरफ से उत्पीड़न और हिंसा का सामना भी करना पड़ा है." लॉकडाउन के कारण बहुत से प्रवासी और दिहाड़ी मजदूर वापस अपने घरों को चले गए. ऐसे में यौनकर्मियों के पास आमदनी का जरिया नहीं बचा.
भारत में यौनकर्मियों को बहुत भेदभाव झेलना पड़ता है. इस पेशे को बुरा माना जाता है. बड़े शहरों में लड़कियों को मानव तस्करी के जरिए देह व्यापार में धकेला जाता है. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का कहना है कि मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में सबसे ज्यादा महिलाओं और लड़कियों को मानव तस्करी के जरिए लाया जाता है. मुंबई के कमाठीपुरा में रहने वाली मीरा कहती हैं, "वापस गांव जाना संभव नहीं है. वहां मेरी अब किसी को जरूरत नहीं है. मुझे अपनी रोजीरोटी के लिए यहीं कुछ तलाशना होगा. मैं दूसरा कुछ भी काम कर सकती हूं, कुछ भी सीख सकती हूं."(DW.COM)
हिंदी के जाने-माने कवि धूमिल ने कभी एक चुभता हुआ सवाल पूछा था, ‘क्या आजादी सिर्फ तीन रंगों का नाम है जिसे एक थका हुआ पहिया ढोता है?’
आज की तारीख में भारतीय लोकतंत्र, खासकर उसके युवा नागरिकों के लिए यह सवाल बहुत मार्मिक और प्रासंगिक है। शासन खुद को कितना बड़ा फन्ने खां क्यों न समझे, वह किसी भी जिंदादिल युवा लोकतंत्र को उसके वर्तमान से काटकर थोक के भाव किसी अनदेखे मिथकीय अतीत का हूबहू जुड़वां नहीं बना सकता। धूमिल ने सही कहा था कि सचमुच की आजादी का मतलब सिर्फ एक तिरंगे और उसे जैसे-तैसे ढो रहे अशोक चक्रतक सीमित नहीं होता।
धूमिल की यह पंक्ति हम आज इसलिए भी दोहराना जरूरी समझते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के ठीक दस दिन पहले हमने अयोध्या में 2020 के भारत को त्रेता युग का भारत बनाने का एक हैरतअंगेज प्रयास शुरू होता देखा। क्या यह अटपटा नहीं कि हमारे नेता एक तरफ तो भारत को विश्वगुरु, ग्लोबल महाशक्ति आदि बनाने की बात करते हैं, पर दूसरी तरफ क्या होता है? महामारी, सीमा पर चीनी जमावड़े, पड़ोसी देशों से बिगड़ते रिश्तों और ढहती अर्थव्यवस्था में सुधार पर जुटने की बजाय सूबे की मीडिया की सारी ताकत सरयू तट पर 2020 के लोकतांत्रिक भारत को उस त्रेता युग की अविकल परछाई बना कर टीवी पर्दों पर उतारने में जुटी दिखती है जिसकी बाबत हमारे पास बस मौखिक साक्ष्यों की एक लंबी लिस्ट है?
माजरा क्या है? जब कोई भारत को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी, सबसे युवा शक्ति से लबलबाता राष्ट्र घोषित कर छप्पन इंच का सीना साठ का कर ले, तो भी दुनिया के मीडिया की नजरों में, हमारे लोकतंत्र की छवि तमाम तरह के जातीय-धार्मिक भेदभावों से भरी, प्रतिगामी, आर्थिक तौर से डगमग और आक्रामक पड़ोसी देशों से घिरे लोकतंत्र की ही दिखती रहती है। और जब आज के मिलेनियल युवा भारत को आत्मनिर्भर बनने का नारा दिया जाता है तो उसका क्या मतलब होता है? कि नेतृत्व को हिंदुत्व की जो अवधारणा मान्य है, उसी की परंपरा को वे कर्मठता से आधुनिक बना कर देश-दुनिया के सामने लाएं? पर कोविड की रोकथाम के सीमित से क्षेत्र में भी जब इस किसम के गड़बड़झाला निर्देशों के तहत काम होता है, तो अक्सर नतीजे पतंजलि की कोरोनिल दवा, गिलोय के रस या भाभीजी के पापड़ों तलक ही जाते हैं। विडंबना यह कि इस संगीन समय में इस किसम की आधुनिकता के शिखर से सम्मत व्याख्या ने प्रोफेशनल लोगों को एक तरह से चौंकाना बंद कर दिया है।
दरअसल युगांत के समय ‘आधुनिक’ शब्द जब-जब भारत की राजनीति से टकराया, उसने इतिहास को लेकर हमेशा एक बेढब आत्मविरोध पैदा किया है। पहला विरोध उपजता है धर्मांधता और धर्मनिरपेक्षता के बीच। इसके दर्शन आजादी की बयार चलने की शुरुआत में भारतेंदु की कविता में होते हैं। फिरंगी राज के विरोध में उनके (नीलदेवी) नाटक का पात्र कहता है, ‘अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी, पैधन बिदेस चलिजातय है अतिख्वारी।’ पर फिर वही भारतेंदु यह भी लिखते हैं कि जो आर्य होकर भी यवन प्रेमी हैं, उनको धिक्कार है: ‘धिक तिन कहिं जे आर्य होय यवन नके चाहें।’ सो, भारतेंदु का मन धर्मांध माना जाए या धर्म निरपेक्ष? नए की खोज करने को चलें तो यह साफ दिखता है कि कुछ भी सार्थक नया पुरानी परंपरा से ही उपजेगा। पश्चिम में भी यही हुआ है जहां लोकतंत्रकी मूल अवधारणा चौथी सदी ईसा पूर्व के यूनान से आई है। लेकिन पुरानी परंपरा की समझ समग्र, गहरी और निरंतर भी तो होनी चाहिए। हमारे यहां परंपरा पर जीवंत जिरह करीब हजार बरस स्थगित रही। उसके बाद पच्छिम की हवा में संविधान आधारित लोकतंत्र के साथ भारत में 20वीं सदी की परंपरा, संस्कृति, देशभक्ति और राष्ट्रीयता के कई जटिल सवाल भी उड़कर आए और जड़ पकड़ने लगे। जब हमारे ठहरे हुए राज-समाज के लगभग खुश्क बंजर बौद्धिक वीराने में सदियों बाद इन विचारों की कलमें लगीं, तो अलग-अलग धार्मिक-ऐतिहासिक पहचान के विविध तरह का एक मनोरम संकरित जंगल उगने लगा। जिसे आज हम एक आधुनिक लोकतंत्र कहते हैं, उसके नेताओं का सबसे पहला और सबसे बुनियादी काम है, इस जंगल की विविधता को बुनियादी जरूरत मानकर इसकी समवेत देखभाल करें ताकि यह साल दर साल एक आधुनिक महारण्य में बदलता जाए। आधुनिकता की तरफ जाने की सही शुरुआत समन्वयवादी ही हो सकती है, निर्मम, अज्ञानी काट-छांट की नहीं। दसवीं सदी में मिथिला के प्रखर बौद्धिक नेता उदयनाचार्य अपने दो सदी पहले के जाने-माने कश्मीरी बुजुर्ग नैयायिकों को खस्ताहाल (जर्जर) और खुद को ‘वयं आधुनिका:’ बताते हैं। पर गौर करें, कि वे पुरानों को सिरे से खारिज नहीं करते। वे उनके ज्ञान को अपने समय के सवालों से टक्कर लेने के लिए नाकाफी और सुधार लायक बताते हैं। दुनिया भर में ज्ञान की सही परंपराएं अंधभक्ति अपना कर राजा या बूढ़ों के भय से निष्प्राण पोथियों के बासी ज्ञान को जस का तस स्वीकार करके नहीं, लगातार जायज प्रश्न पूछ कर अपना पक्ष निडरता से धुका कर आधुनिक बनाई गई हैं।
परंपरा और आधुनिकता के बीच ईमानदार सार्वजनिक टकराहट, बूढ़ों और नई पीढ़ी के बीच प्रश्नों के तीखे तीर चलें, इसके लिए राजनीति और बौद्धिकता- दोनों ही जगह नए ‘वयं आधुनिका:’ की पीढ़ी के लिए हर दिन कुछ अपूर्व नया बनाने की खुली आजादी बहुत जरूरी है। आजाद खयाली की छूट बिना कोई लोकतांत्रिक सभ्यता आगे नहीं बढ़ती। रही बात धर्मनिरपेक्ष आधुनिकता की, वह हमको, मनुष्य को उसके धर्म और जातीय इतिहास से अलग कर परखने का नया नजरिया देती है। राजकाज को धर्मनिरपेक्ष बनाने का विचार यूरोप को हजारों सालों तक हुए जातीय संकरण और सदियों तक चले धर्मयुद्धों के मंथन के बाद मिला। मूल सवाल यह है कि एक आदर्श लोकतंत्र में एक आत्मनिर्भर मनुष्य को कैसा होना चाहिए? सही मायनों में लोकतांत्रिक राष्ट्र-राज्य का नागरिकों से रिश्ता क्या कई तरह के निजी, धार्मिक, जातीय आग्रहों के परे एक सामूहिक जन दायरा नहीं बनाया जाना चाहिए? निजी जीवन में सबके लिए अपने जातीय-धार्मिक विचार जीने की एक-सी आजादी हो, तभी देश का लोकतंत्र सही मायनों में एकजुट और समन्वय समृद्ध बनेगा। परंपरा तो एक निष्प्राण मूर्ति है जिसमें मनुष्य प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। उसी जीवंत परंपरा की छाया में हम रहते हैं। उस इतिहास में नहीं, जो पथरा चुका है।
2020 के भारत का लोकतंत्र जिसकी आजादी की वर्षगांठ हम सामंती ठाठ-बाट से मनाई जाती देख रहे हैं, जड़ से शिखर तक हिंसा, घृणा और लालच से रंगीपुती सभ्यता में बदल रहा है। उपजाऊ जमीन, नदियां, वन, यहां तक कि बहुत कम दिहाड़ी पर काम करने वाले कामगार- सबकी बिक्री को अलिखित आजादी मिलती जा रही है। ऐसे विचित्र दौर में नेतृत्व की एक साथ आधुनिक और त्रेतायुगीन बनने की यह अजीब मिली-जुली चाह हमें इस स्थिति तक ले आई है जहां साफ हवा, पानी, बिना चेहरा ढके बाहर निकल पाना, बच्चों के लिए शिक्षा परिसरों तक आना-जाना, नौकरी के लिए देशभर में मुक्त संचरण और सामाजिक बातचीत सब असंभव बन गए हैं। तोपें छुड़ाकर फूलों की बरसात तले झंडा अभिवादन कर, ‘जनगण मन अधिनायक जय हे’, गाते-गवाते हुए विशिष्ट लोगों की छवि टीवी पर देखते हुए हमको इस गाने के साथ महात्मा गांधी की बात का सही मतलब समझ में आता है कि यह धरती सबकी जरूरतें पूरी कर सकती है, पर किसी एक का लालच नहीं।(NAVJIVAN)
परिवेश मिश्रा
दुख की बात है, देश में 50000 के करीब लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है लेकिन हेल्थ मिनिस्ट्री इस बात का क्रेडिट लेने में व्यस्त है कि 50000 पहुंचने में भारत को 156 दिन लगे जबकि अमेरिका को 23 दिन, ब्राज़ील को 95 दिन और मैक्सिको को 141 दिन लग गए थे।
कायदे से तो हेल्थ मिनिस्ट्री को दुख व्यक्त करना चाहिए था और यह लिखना चाहिए था वो 50000 लोगों की जान नहीं बचा पाई जो इस देश की नागरिक थे। हेल्थ मिनिस्ट्री हमेशा रिकवरी रेट और मोर्टेलिटी रेट पर बात करती है। अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों के साथ तुलना करती है लेकिन अपने पड़ोसी देशों को भूल जाती है।
जहां भारत में 50000 के करीब लोगों की मौत हुई है वहीं पाकिस्तान में 6168 लोगों की मौत हुई, बांग्लादेश में 3625,चीन में 4634, म्यांमार में 6, श्रीलंका में 11, मालदीव में 22, इंडोनेशिया में 6071, नेपाल में 102 और भूटान में कोई मौत नहीं हुई है।
अब यह सवाल लोग उठाएंगे कि यह सब छोटे देश हैं यहां जनसंख्या कम है लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इनमें से कई पड़ोसी देश गरीब हैं लेकिन कोरोना को रोकने में सक्षम हुए हैं। दूसरी बात यह है कि चीन की जनसंख्या भारत से ज्यादा है लेकिन फिर भी चीन में सिर्फ 4634 लोगों की मौत हुई है भारत से लगभग 11 गुना कम। भारत के जो 9 पड़ोसी देश हैं वहां कुल मिलाकर 20639 लोगों की मौत हुई है जबकि भारत अकेले में 50000 से ज्यादा मौत हुई है यानी लगभग दो गुना ज्यादा।
अब हर 10 लाख जनसंख्या में कितने लोग कोरोना की वजह से मरे हैं उस पर भी नजर डालते हैं।
भारत में हर दस लाख में 36 लोग मरे हैं, चीन में हर दस लाख में 3 लोग मरे हैं। पाकिस्तान में हर दस लाख में 28 लोग मरे हैं, बांग्लादेश में हर दस लाख में 22 लोग मरे हैं,इंडोनेशिया में 22,नेपाल में 3,श्रीलंका में 0.5 जब कि म्यांमार में हर दस लाख में 0.1 लोग मरे हैं। मालदीव में हर दस लाख में 41 लोग मरे हैं। भूटान में किसी की भी मौत नहीं हुई है। यह आंकड़े बताते हैं कि अगर पड़ोसी देशों के साथ तुलना की जाए तो सिर्फ मालदीव को छोडक़र भारत में हर दस लाख में सबसे ज्यादा 36 लोगों की मौत हुई है।
अब रिकवरी रेट पर भी ध्यान देते हैं।
भारत में रिकवरी रेट 71.91 प्रतिशत है , चीन में 94 प्रतिशत, पाकिस्तान में रिकवरी रेट 92 प्रतिशत, श्रीलंका में 92 प्रतिशत, है, म्यांमार में 86 प्रतिशत, भूटान में 75 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 66 प्रतिशत, नेपाल में 66 प्रतिशत,बांग्लादेश में 57 जबकि मालदीव में 56 प्रतिशत है।
भारत के जो 9 पड़ोसी देश वहां कुल मिलाकर 820350 कोरोना केस है यानी भारत से लगभग 6 गुना कम। पड़ोसी देशों के कुल 820350 केस में से 602851 लोग ठीक हो चुके हैं यानी रिकवरी रेट 73 प्रतिशत से भी ज्यादा है।
अब थोड़ा टेस्टिंग पर ध्यान देते हैं
भारत में हर दस लाख में 21213 लोगों की टेस्ट हुई है जब कि अमेरिका में हर दस लाख में 212002 लोगों की टेस्ट हुई है। ब्राज़ील में 63288, रूस में 222691, साउथ अफ्रीका में 56869, पेरू में 82907, मेक्सिको में 9071, कोलंबिया में 42063, चिली में 103922, स्पेन में 159805। दुनिया के पहले दस देश जहां कोरोना के सबसे ज्यादा केस है वहां की टीटिंग का डेटा है। सिर्फ मैक्सिको को छोडक़र सभी देश यानी आठ देश टेस्टिंग के मामले में भारत से आगे हैं। अब पड़ोसी देशों की बात करते हैं। चीन में हर दस लाख में 62814 लोगों की टेस्ट हुई है, पाकिस्तान में 10285,भूटान में 72918, श्रीलंका में 7783, मयांमार में 2461, मालदीव में 175130, नेपाल में 28030, इंडोनेशिया में 6802, बांग्लादेश में 8137 लोगों की टेस्ट हुई है। आगे जब हेल्थ मिनिस्ट्री डेटा लेकर आए तो यह सब डेटा भी सामने रखे।
नोट; डेटा सब वर्लडोमीटर से लिया गया है। 16 अगस्त दिन के 12 बजे के करीब यह डेटा लिया गया था। समय के साथ साथ डेटा ऊपर-नीचे होते रहता है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले दो दिनों में अमेरिका एक बार उठ गया और एक बार गिर गया। वह उठा तब जबकि इस्राइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में समझौता हो गया और वह गिरा तब जबकि सुरक्षा परिषद में वह ईरान के विरुद्ध बुरी तरह से पछाड़ खा गया। इस्राइल की स्थापना 1948 में हुई लेकिन पश्चिम एशिया के राष्ट्रों में से सिर्फ दो देशों ने अभी तक उसे कूटनीतिक मान्यता दी थी। एक मिस्र और दूसरा जोर्डन। ये दोनों इस्राइल के पड़ौसी राष्ट्र हैं। इन दोनों के इस्राइल के साथ जबर्दस्त युद्ध हुए हैं।
इन युद्धों में दोनों की जमीन पर इस्राइल ने कब्जा कर लिया था लेकिन 1978 में मिस्र ने और 1994 में जोर्डन ने इस्राइल के साथ शांति-संधि कर ली और कूटनीतिक संबंध स्थापित कर लिए। इस्राइल ने मिस्र को उसका सिनाई का क्षेत्र वापस किया और जोर्डन ने पश्चिमी तट और गाजा में फलस्तीनी सत्ता स्थापित करवाई लेकिन संयुक्त अरब अमीरात याने अबू धाबी के साथ इस्राइल का जो समझौता हुआ है, उसमें इस्राइल को कुछ भी त्याग नहीं करना पड़ा है। अबू धाबी इसी बात पर राजी हो गया है कि इस्राइल ने उसे आश्वस्त किया है कि वह पश्चिमी तट के जिन क्षेत्रों का इस्राइल में विलय करना चाहता था, वह नहीं करेगा। इस समझौते का श्रेय डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिकी सरकार ले रही है, जो वाजिब है। उसने ईरान के विरुद्ध इस्राइल, सउदी अरब, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात आदि कई सुन्नी देशों का एक सम्मेलन पिछले साल पोलैंड में बुलाया था। उसी में इस्राइल और अबू धाबी का प्रेमालाप शुरु हुआ था। इस समझौते से ईरान और तुर्की बेहद खफा हैं लेकिन ट्रंप अपने चुनाव में इसका दोहन करना चाहते हैं। ट्रंप की टोपी में यह एक मोरपंख जरुर बन गया है।
लेकिन सुरक्षा परिषद ने ट्रंप की लू उतारकर रख दी है। अमेरिका ने ईरान पर लगे हथियार खरीदने के प्रतिबंधों को बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था लेकिन 15 सदस्यों वाली इस सुरक्षा परिषद में सिर्फ एक सदस्य ने उसका समर्थन किया। उसका नाम है-डोमिनिकन रिपब्लिक। यह एक छोटा-सा महत्वहीन देश है।
अमेरिका को ऐसी पराजय का मुंह पिछले 75 साल में पहली बार देखने को मिला है। यों भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडन और कमला हैरिस के जीतने के आसार इतने बढ़ गए हैं कि दुनिया के राष्ट्र बड़बोले ट्रंप का ज्यादा लिहाज नहीं कर रहे हैं। चीन ने हाल ही में ईरान के साथ अरबों डॉलर खपाने का समझौता किया है और रुस के व्लादिमीर पुतिन ने ईरान के साथ हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते पर एक शिखर सम्मेलन बुलाने का भी सुझाव दिया है। ट्रंप की टोपी में ईरान एक बिच्छू बना हुआ है।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)
(नया इंडिया की अनुमति से)
अंखी दास कौन हैं - इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं. मगर उनका एक परिचय ये बताने के लिए पर्याप्त है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कितनी अहमियत रखती हैं.
नरेंद्र मोदी डॉट इन नाम से प्रधानमंत्री मोदी की एक व्यक्तिगत वेबसाइट है. उनका एक व्यक्तिगत ऐप भी है - नमो ऐप.
वेबसाइट पर न्यूज़ सेक्शन के रिफ़्लेक्शंस सेक्शन के कॉन्ट्रिब्यूटर्स कॉलम में, और नमो ऐप पर नमो एक्सक्लूसिव सेक्शन में एक टैब या स्थान पर कई लोगों के लेख प्रकाशित किए गए हैं.
वहाँ जो 33 नाम हैं, उनमें 32वें नंबर पर अंखी दास का नाम है. यानी अंखी दास का एक परिचय ये भी है कि वो नरेंद्र मोदी की वेबसाइट और ऐप की कॉन्ट्रिब्यूटर हैं, यानी वो वहाँ लेख लिखती हैं.
अलबत्ता, अप्रैल 2017 से ऐप के साथ जुड़े होने के बावजूद वहाँ उनका एक ही लेख दिखाई देता है जिसका शीर्षक है - प्रधानमंत्री मोदी और शासन की नई कला.
वहाँ उनका परिचय ये लिखा है - "अंखी दास, भारत और दक्षिण एवं मध्य एशिया में फेसबुक के लिए लोक नीति की निदेशिका हैं. उनके पास टेक्नोलॉजी सेक्टर में लोक नीति और रेगुलेटरी एफेयर्स में 17 साल का अनुभव है."
पर यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि अंखी दास मीडिया में लेख लिखती रही हैं. उनका नाम अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के कॉलमनिस्ट लेखकों की सूची में भी है. वो अमरीकी वेबसाइट हफ़िंग्टन पोस्ट के भारतीय एडिशन के लिए भी लिखती रही हैं.
अंखी दास अक्तूबर 2011 से फ़ेसबुक के लिए काम कर रही हैं. वो भारत में कंपनी की पब्लिक पॉलिसी की प्रमुख हैं.
फ़ेसबुक से पहले वो भारत में माइक्रोसॉफ़्ट की पब्लिक पॉलिसी हेड थीं. माइक्रोसॉफ़्ट से वो जनवरी 2004 में जुड़ीं, और लगभग आठ साल काम करके बाद वो फ़ेसबुक में चली गईं.
उन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से 1991-94 के बैच में अंतरराष्ट्रीय संबंध और राजनीति शास्त्र में मास्टर्स की पढ़ाई की है. ग्रेजुएशन की उनकी पढ़ाई कोलकाता के लॉरेटो कॉलेज से पूरी हुई है.
हालाँकि, ये दिलचस्प है कि दुनिया की सबसे कामयाब और प्रभावशाली ताक़तों में गिनी जानेवाली कंपनी के फ़ेसबुक इंडिया पेज पर और ना ही वेबसाइट पर कंपनी के भारत में काम करने वाले अधिकारियों के बारे में कोई जानकारी दी गई है.

अंखी अभी चर्चा में क्यों हैं
ये समझने के लिए पहले अंखी दास के इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख की चर्चा ज़रूरी है. मुंबई हमलों की दसवीं बरसी पर 24 नवंबर 2018 को छपे अंखी दास के इस लेख का शीर्षक था - No Platform For Violence.
इसमें वो कहती हैं कि "फ़ेसबुक संकल्पबद्ध है कि वो ऐसे लोगों को अपना इस्तेमाल नहीं करने देगा जो कट्टरवाद को बढ़ावा देते हैं." इसमें वो आगे लिखती हैं, हमने इस साल ऐसी 1 लाख 40 हज़ार सामग्रियों को हटा लिया है जिनमें आतंकवाद से जुड़ी बातें थीं.
लेख में वो कहती हैं कि "उनके पास ऐसी तकनीक और उपकरण हैं जिनसे अल क़ायदा और उनके सहयोगियों को पहचाना जा सका, इसी वजह से इस्लामिक स्टेट और अल क़ायदा से जुड़ी 99 फीसदी सामग्रियों को पहचाना जाए, उससे पहले ही उन्हें हटा लिया गया".
इस लेख में वो ये भी बताती हैं कि "फ़ेसबुक की अपनी विशेषज्ञों की एक टीम है जिनमें पूर्व सरकारी वकील, क़ानून का पालन करवाने वाले अधिकारी, ऐकेडमिक्स, आतंकवाद-निरोधी रिसर्चर शामिल हैं. साथ ही निगरानी करनेवाले और भी लोग हैं, जो आतंकी गतिविधियों वाले केंद्रों में बोली जाने वाली भाषाएँ समझते हैं".
यानी उनके इस लेख का आशय ये है कि फ़ेसबुक आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों का प्रचार-प्रसार करने वाली सामग्रियों को पकड़ने को लेकर बहुत सक्रिय था और उसने इन पर प्रभावशाली तरीक़े से लगाम लगाई.
अभी जो विवाद चल रहा है उसके केंद्र में यही मुद्दा है - कि फ़ेसबुक पर भारत में कुछ ऐसी सामग्रियाँ आईं हैं जिन्हें नफ़रत फैलाने वाली सामग्री बताया गया, मगर अंखी दास ने उन्हें हटाने का विरोध किया.
क्या हैं आरोप?
अमरीकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में 14 अगस्त को एक रिपोर्ट छपी जिसमें आरोप लगाया कि दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनी जो वॉट्सऐप की भी मालिक है, उसने भारत में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सामने हथियार डाल दिए हैं.
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अंखी दास ने ये जानकारी दबा दी कि फ़ेसबुक ने बीजेपी से जुड़े फ़र्ज़ी पन्नों को डिलीट किया था.
अख़बार ने ये भी दावा किया कि फ़ेसबुक ने अपने मंच से बीजेपी नेताओं के नफ़रत फैलाने वाले भाषणों को रोकने के लिए ये कहते हुए कुछ नहीं किया कि सत्ताधारी दल के सदस्यों को रोकने से भारत में उसके व्यावसायिक हितों को नुक़सान हो सकता है.
रिपोर्ट में तेलंगाना से बीजेपी विधायक टी राजा सिंह की एक पोस्ट का हवाला दिया गया था जिसमें कथित रूप से अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा की वकालत की गई थी.
मामले की जानकारी रखने वाले फ़ेसबुक के मौजूदा और पूर्व कर्मचारियों से बातचीत के आधार पर लिखी गई इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि फ़ेसबुक के कर्मचारियों ने तय किया था कि पॉलिसी के तहत टी राजा सिंह को बैन कर देना चाहिए, लेकिन अंखी दास ने सत्तारूढ़ बीजेपी के नेताओं पर हेट स्पीच नियम लागू करने का विरोध किया था.
अख़बार ने लिखा - "देश में कंपनी की शीर्ष पब्लिक-पॉलिसी अधिकारी अंखी दास ने नफ़रत फैलाने वाले भाषणों के नियम को टी राजा सिंह और कम-से-कम तीन अन्य हिंदू राष्ट्रवादी व्यक्तियों और समूहों पर लागू करने का विरोध किया जबकि कंपनी के भीतर से लोगों ने इस मुद्दे को ये कहते हुए उठाया था कि इससे हिंसा को बढ़ावा मिलता है."
हालाँकि, विधायक टी राजा सिंह ने बीबीसी तेलुगू संवाददाता दीप्ति बथिनी से कहा कि वो अपने बयानों पर अभी भी क़ायम हैं और उन्हें नहीं लगता कि उनकी भाषा में कोई दिक़्क़त थी. उन्होंने दावा किया कि ये आपत्तियाँ उनकी छवि को ठेस लगाने के लिए की गईं.
टी राजा सिंह ने कहा, "क्यों केवल मुझे ही निशाना बनाया जा रहा है? जब दूसरा पक्ष ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है तो किसी को तो जवाब देना होगा. मैं बस उसी का जवाब दे रहा हूँ".
सियासी मुद्दा
बहरहाल, इस मुद्दे ने अब भारत में राजनीतिक रंग ले लिया है. राहुल गांधी समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने जहाँ इसे लेकर सत्ताधारी बीजेपी पर हमला बोला है, वहीं बीजेपी के वरिष्ठ नेता पार्टी के बचाव में उतर आए हैं.
राहुल गांधी ने रविवार को ट्वीट कर लिखा - "भाजपा-RSS भारत में फेसबुक और व्हाट्सएप का नियंत्रण करती हैं. इस माध्यम से ये झूठी खबरें व नफ़रत फैलाकर वोटरों को फुसलाते हैं. आख़िरकार, अमरीकी मीडिया ने फेसबुक का सच सामने लाया है."
वहीं केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इसके जवाब में ये ट्वीट किया, "जो लूज़र ख़ुद अपनी पार्टी में भी लोगों को प्रभावित नहीं कर सकते वो इस बात का हवाला देते रहते हैं कि पूरी दुनिया को बीजेपी और आरएसएस नियंत्रित करती है."
इस सारे मामले पर फ़ेसबुक ने कहा है कि वो नफ़रत फैलाने वाले भाषणों पर अपनी नीतियों को बिना किसी के राजनीतिक ओहदे या किसी पार्टी से उसके संपर्क को देखे लागू करती है.
फ़ेसबुक के एक प्रवक्ता नेबीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास को बताया - "हम नफ़रत फैलाने वाले भाषणों और सामग्रियों को रोकते हैं और दुनिया भर में अपनी नीतियों को बिना किसी के राजनीतिक ओहदे या पार्टी से उसके संपर्क को देखे लागू करते हैं. हमें पता है कि इस बारे में और प्रयास किए जाने की ज़रूरत है, मगर हम निष्पक्षता और सत्यता को सुनिश्चत करने के लिए हमारी प्रक्रिया को लागू किए जाने की जाँच करने की दिशा में प्रगति कर रहे हैं."(BBCNEWS)
-मनीष सिंह
और पॉलिटिकल लीडरशिप की पहचान इससे होती है कि उसके इर्द-गिर्द राजनीति और ब्यूरोके्रसी में कितने नए लीडर्स नर्चर किये गए। गांधी नेहरू का दौर ऐसा सुनहरा दौर था, जिसने भारत को हर विंग में दूरदर्शी लोगों को पहचाना, गढ़ा और बढ़ाया गया। केएफ रुस्तमजी उनमें से एक थे।
रायपुर- नागपुर रेलवे लाइन पर एक छोटा से स्टेशन है, कामटी। इस गांव में खुसरो फरामुर्ज रुस्तमजी का जन्म हुआ। मुस्लिम से लगते नाम की वजह से खारिज न करें, वे पारसी थे। नागपुर और मुंबई में पले बढ़े, और फिर नागपुर के एक कॉलेज में प्रोफेसर हुए। वहीं से सलेक्शन अंग्रेजी पुलिस में हो गया। यह कोई 1938 के आसपास का दौर था।
यह इलाका सीपी और बरार कहलाता था, राजधानी थी नागपुर। असिस्टेंड एसपी के रूप में नागपुर में उन्हें पुलिस सेवा मेडल मिला। 1948 में हैदराबाद एक्शन के दौरान वे अकोला औए एसपी रहे और हैदराबाद एक्शन में भूमिका का निभाई। 1952 आते आते उन्हें एक खास जगह पोस्टिंग मिली।
रुस्तमजी को प्रधानमंत्री जवाहरलाल की पर्सनल सेक्युरिटी का इंचार्ज बनाया गया। इस दौर के अपने अनुभव उन्होंने अपनी डायरी में लिखे है, जो किताब की शक्ल में ढाले गए। (आई वाज शैडो ऑफ नेहरू) बहरहाल पांच साल बाद उन्होंने आगे बढऩे का निर्णय किया। न चाहते हुए नेहरू ने उन्हें रिलीव किया। सपत्नीक डिनर पर बुलाया, अपनी हस्ताक्षरित तस्वीर दी।
सीपी एंड बरार अब मध्यप्रदेश हो चुका था। रुस्तमजी यहां आईजी हुए। अब उस दौर का आईजी आज का डीजीपी होता था। स्टेट का टॉप कॉप.. पुराने पुलिसवाले यह दौर याद करते है, और चंबल के डाकू भी। इस दौर पर रुस्तमजी की डायरियों पर आधारित एक और किताब है। (द ब्रिटिश, बैंडिट एंड बार्डर मैन)
यह 1965 था और भोपाल से निकलकर रुस्तमजी वापस दिल्ली में थे। चीन युध्द का अनुभव हो चुका था। शास्त्रीजी एक नई फोर्स के लिए सोच रहे तो, ऐसा अर्द्धसैनिक बल जो सीमाओं की सुरक्षा करे। रुस्तमजी को बीएसएफ बनाने की कमान दी गयी। कुछ फौजी यूनिट्स, कुछ स्टेट आर्म्ड पुलिस को मिलाकर यह बल बना। रुस्तमजी की कमांड में यह बल एक सशक्त और सजग सीमा प्रहरी बन गया। इसकी परीक्षा की घड़ी भी जल्द आयी।
यह 1971 था। इंदिरा ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का पूरा इरादा कर लिया था। मगर जनरल मानेकशॉ ने वक्त मांग लिया। उन्हें 6 माह चाहिए थे। इस वक्त में पाकिस्तान के हुक से बच निकलने का खतरा था। वक्त का इस्तेमाल किया रुस्तमजी ने ..
बांग्लादेश की मुक्तिबाहिनी को ट्रेनिंग, हथियार और पाकिस्तानी एडमिनिस्ट्रेशन पर धावे के लिए सारी रणनीति बनाकर देने के बाद रुस्तमजी ने सुनिश्चित किया कि पाकिस्तान को दम लेने की फुर्सत न मिले। छह माह बाद मानेकशॉ ने बाकी का काम तमाम कर दिया।
रिटायरमेंट के बाद रुस्तमजी को पुलिस आयोग का सदस्य बनाया गया। जेलों की दुव्र्यव्यवस्था को रुस्तमजी ने बेदर्दी से सामने निकालकर दिखाया। वह दौर सरकार की आलोचना करने वालो को उठवा लेने या उसके ऑफिस में आधी रात को छापे मारने का न था। रुस्तमजी की रिपोर्ट पर कार्यवाही हुई, हजारों बन्दी जमानत पर छोड़ दिये गए। जेलों के लिए नई गाइडलाइन बनी।
यह कोई पुलिस या फौजी सेवा न थी। यह राष्ट्र के लिए एक चाक चौबंद नागरिक की सेवा थी। भारत मे सिविलियन सेवा के दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मविभूषण’ से रुस्तमजी को नवाजा गया।
आजादी की बेला थी। अमरावती में पदस्थ एसपी रुस्तमजी को आदेश हुआ कि 5 प्रिंसली स्टेटस के मर्जर से बनने वाले के नए जिले की कमान संभाले। एक कार में सवार हो मियां बीवी नए जिले की कमान संभालने निकल पड़े।
सारंगढ़ रियासत के पैलेस में आकर रुके । 31 दिसम्बर 1948 को स्टेट गेस्ट बुक में उनके हस्ताक्षर और एंट्री मिलती है। अपनी डायरी में रुस्तमजी इस दिन के विषय में लिखते है- मैं एक ऐसे जिले का एसपी बनने जा रहा हूँ, जो अब तक अस्तित्व में नही आया। और मैं ऐसे राजा के साथ बैठा हूँ, जिसका राज्य कल खत्म हो जाएगा।
1 जनवरी 1948 को सारंगढ, रायगढ़, धरमजयगढ़, सक्ति और जशपुर की रियासतों को मिलाकर एक जिला बना, जो मेरा रायगढ़ है। रुस्तमजी इसके फाउंडर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस थे। (सक्ति अब दूसरे जिले का हिस्सा है)
कमाऊ जिलों में और प्लम पोस्टिंग के लिए मरते, रीढें चटकाते युवा आईएएस/ आईपीएस के लिए पदमविभूषण के एफ रुस्तमजी का कद इतना ऊंचा है, कि उनकी ओर देखने के लिए सर ऊंचा करने से दर्द हो सकता है।
इसलिए कि उनका कद बेहद छोटा है। छोटे कद की पोलिटीकल लीडरशिप, अफसर भी छोटे कद के ही चाहती है।
(जानकारी परवेश मिश्रा की मदद से)

रुस्तमजी इतिहास के एकमात्र पुलिस कप्तान रहे जिन्होंने कलेक्टरी भी की। भले ही थोड़े दिनों के लिये। हुआ यह कि 1जनवरी 1948 को श्री रामाधार मिश्रा ने रायगढ़ के पहले कलेक्टर के रूप चार्ज लिया था। तीन सप्ताह बाद ही उनकी तबियत बिगड़ी। अंतडिय़ां आपस में उलझ गयी थीं। असहनीय पेटदर्द से परेशान श्री मिश्र को हावड़ा-बम्बई मेल से रायपुर पंहुचाया गया उनकी जान नहीं बच पायी थी। उन दिनों अंग्रेजों के अचानक वापस चले जाने के कारण अधिकारियों का जबर्दस्त अकाल था। सो पुलिस कप्तान रुस्तमजी को आदेश प्राप्त हुआ कि वे कलेक्टर का चार्ज लें। और इतिहास बन गया। -परवेश मिश्रा
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 15-16 जून की रात को चीन और भारत की सेना के बीच आमने-सामने का संघर्ष हुआ था. इसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए. इसके बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक और सैन्य स्तरों पर बातचीत शुरू हुई. लेकिन बीते दो महीने में 22 से ज्यादा बैठकें होने के बाद भी बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है. पिछले दो हफ़्तों के दौरान दोनों देशों की ओर से आये बयानों से इसका पता चलता है. चीन का कहना है कि उसकी सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) से पीछे हट चुकी है. जबकि भारत ने कहा है कि लद्दाख में एलएसी पर सेना के पीछे हटने की प्रक्रिया में बहुत थोड़ी प्रगति हुई है और चीन के साथ सीमा पर संघर्ष लंबा भी खिंच सकता है. इससे कुछ रोज पहले ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि दोनों देशों में बातचीत जारी है और समस्या का हल निकल जाना चाहिए. लेकिन ये मामला कब तक हल होगा, इसकी गारंटी वे नहीं दे सकते. कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत और चीन के बीच संघर्ष का खतरा अभी भी बना हुआ है.
बीते कुछ समय से भारत और चीन के बीच जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखकर कई जानकारों को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय की याद ताजा हो गयी है. इतिहास के जानकारों की मानें तो भारत-चीन के बीच जैसे हालात 1950 से लेकर 1962 तक थे, बीते कुछ सालों से लगभग वैसे ही हालात फिर से बने हुए हैं. सीमा पर जो क्षेत्र तब विवादास्पद थे, वे आज भी वैसे ही हैं, जिस तरह राजनीतिक यात्राएं और वार्ताएं उस समय जारी थीं वैसी ही नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान भी दिखीं. उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरु और तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ की दोस्ती के किस्से भी उसी तरह आम थे, जिस तरह अपने कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संबंध चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बताते रहे हैं. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी और शी जिंनपिंग 16 बार मुलाकातें कर चुके हैं. इनमें से कुछ तो बेहद गर्मजोशी भरे माहौल में हुई हैं.
#WATCH: PM Modi talks about Chinese President says,'scholar Xuanzang visited my village in India & in China he visited Pres Xi's village' pic.twitter.com/jZOuCTlxxM
— ANI (@ANI) October 8, 2017
कुछ जानकारों के मुताबिक तब और अब में एक बात और भी समान दिखती है, उस समय चीन को लेकर जवाहरलाल नेहरू ने जो गलती की थी, वैसी ही या उससे भी बड़ी गलती अपने कार्यकाल के दौरान नरेंद्र मोदी ने भी की है.
जवाहरलाल नेहरू की गलती
चीन को लेकर जवाहरलाल नेहरू ने क्या गलतियां की थीं इसका पता बीते पचास सालों में आई कई रिपोर्टों और किताबों से लगता है. अक्टूबर 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर कब्ज़ा किया तो कुछ भारतीय सैन्य अधिकारी और नेताओं ने चीन की विस्तारवादी नीति को भांप लिया था. इन्होंने भारत सरकार को समय-समय पर इसके बारे में आगाह भी किया.

तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू से कहा था कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता है और न ही हिंदुस्तान को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के तौर पर चीन की दावेदारी को बढ़ावा देना चाहिए. पटेल के इस विचार को नेहरू ने तरजीह नहीं दी. उनका मानना था कि चीनी साम्यवाद का मतलब यह नहीं हो सकता कि वह भारत की तरफ कोई दुस्साहस करेगा. उन्होंने, तिब्बत पर कब्जे के बावजूद चीन से गहरे रिश्ते बनाने पर ही जोर दिया. इसके कुछ ही महीनों बाद ही वल्ल्भभाई पटेल की मृत्यु हो गयी. और चीन पर नेहरू को समझा सकने वाला नहीं रहा.
इसके बाद जवाहरलाल नेहरू की चीन से करीबियां बढ़ीं और इस दौरान तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ से उनकी दोस्ती के किस्से अखबारों की सुर्खियां बनने लगे. 1956 में नेहरू के बुलावे पर चाऊ एन-लाइ भारत के दौरे पर आये और तब ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा दिया गया. इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी प्रसिद्ध किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि इसके साल भर बाद ही अक्टूबर 1957 में अचानक खबर आई कि चीन ने अपने शिनजियांग प्रांत से तिब्बत तक हाईवे का निर्माण कर लिया है और इसका कुछ हिस्सा भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन से भी होकर जाता है. बताते हैं कि इसके बाद तत्कालीन सेनाध्यक्ष केएस थिमैय्या ने सरकार को चीन से लगती सीमा मज़बूत करने की सलाह दी. उनका कहना था कि भारत को असली ख़तरा चीन से ही है. लेकिन नेहरू सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई. उसका मानना था कि भारत को केवल पाकिस्तान से खतरा है और चीन से कोई खतरा नहीं है. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के करीबी और तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके मेनन का कहना था कि चीनी सीमा पर सेना बढ़ाने की जरूरत नहीं है.
इस घटनाक्रम के कुछ समय बाद ही चीनी घुसपैठ की खबरें आने लगीं. चीनी सैनिक बेख़ौफ़ भारतीय सीमा में घुसे चले आ रहे थे और हिंदी में लाउडस्पीकर से भारतीय गांवों को चीन का इलाक़ा बता रहे थे. चीन मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि आज की ही तरह उन दिनों भी संसद में आये दिन चीनी घुसपैठ पर नोंक-झोंक होती थी. एक बार संसद में अक्साई चिन में चीनी घुसपैठ पर नेहरू इतना ज्यादा बिफ़र पड़े कि बेख्याली में यह तक कह बैठे कि अक्साई चिन एक बंज़र इलाक़ा है जहां घास भी नहीं होती. उनके इस बयान के जवाब में एक सांसद ने कहा कि उनके (नेहरू के) सिर पर भी बाल नहीं उगते तो क्या वह भी चीन को दे दिया जाए.
1957 से लेकर 1960 तक भारत-चीन सीमा पर दोनों सेनाओं के बीच झड़प की कई घटनाएं हुईं. इस समय दोनों देशों के बीच पत्राचार भी लगातार चल रहा था. 1960 में नेहरू ने चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ को फिर भारत आने का न्योता दिया. चाऊ एन-लाइ की इस यात्रा के बाद भी भारत-चीन सीमा विवाद जस का तस ही बना रहा. दोनों देश इस यात्रा और बातचीत के बाद भी किसी सहमति तक नहीं पहुंच पाए. इसके बाद 1962 के अक्टूबर में अचानक एक दिन युद्ध की शुरुआत हो गयी और चीनी सेना की कई टुकड़ियां हथियारों के साथ भारतीय सीमा के भीतर घुस आईं. भारतीय सेना के पास इनका मुकाबला करने के लिए न तो पर्याप्त हथियार थे और न ही सैनिक. इस वजह से इस युद्ध में भारत की हार हुई और उसे काफी नुकसान उठाना पड़ा.
इतिहासकारों की मानें तो जवाहरलाल नेहरू ने चीन से धोखा खाने के बाद आठ नवंबर 1962 को संसद में एक प्रस्ताव रखा था. इसमें उन्होंने चीन से खाए धोखे की बात स्वीकार की. इस दिन उन्होंने सदन में कहा था, ‘हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे. हमने अपने लिए एक बनावटी माहौल तैयार किया और हम उसी में रहते रहे.’
नरेंद्र मोदी की गलती
2014 में नरेंद्र मोदी क प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने बाद ही चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अहमदाबाद में भव्य स्वागत किया गया. जिनपिंग भारत की यात्रा पर ही थे कि खबर आ गयी कि चीनी सैनिकों ने लद्दाख के चुमार और डेमचक में घुसपैठ शुरू कर दी है. चुमार में भारतीय इलाके में पांच किमी अंदर चीन ने सड़क बनाने की कोशिश की जिस पर कई दिनों तक गतिरोध चलता रहा. चीनी राष्ट्रपति की इस भारत यात्रा को मोदी सरकार ने अपनी बड़ी सफलता बताया जबकि जिनपिंग के वापस जाने के कई हफ्ते बाद तक चीनी सेना चुमार में तंबू लगाए बैठी रही. यह मसला तब सुलझा, जब एलएसी के निकट भारत ने वह निर्माण कार्य बंद किया जिसे वह अपने ही इलाकों में करवा रहा था. जानकार कहते हैं कि ऐसा करके मोदी सरकार ने चीन से सुलह नहीं की थी, बल्कि उसने चीन के प्रति तुष्टीकरण की नीति की शुरुआत की थी.
2015 में नरेंद्र मोदी चीन की यात्रा पर गए. इस दौरान उन्होंने अपने ही अधिकारियों को चौंकाते हुए चीनी नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक पर्यटक वीजा देने की घोषणा कर दी. मोदी की इस घोषणा से कुछ रोज पहले ही भारतीय गृह मंत्रालय और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने चीनी नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक पर्यटक वीजा देने का विरोध किया था. इनका मानना था कि इससे भारत को खतरा है. इस यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में चीनी निवेश को बढ़ाने के मकसद से उसका नाम ‘कंट्रीज ऑफ कंसर्न’ की सूची से हटा दिया. मोदी के इस फैसले से चीनी कंपनियों को भारत में आने की आजादी मिल गयी. इसके बाद से चीन का भारत के साथ व्यापार मुनाफा प्रति वर्ष 60 अरब डॉलर हो गया, जो इससे पहले से दोगुना है.
How China is thanking Modi for removing it from "countries of concern" list and granting Chinese e-visa on arrival: https://t.co/aVyrCliHoz
— Brahma Chellaney (@Chellaney) April 15, 2016
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चीन के हक़ में किए गए इन बड़े फैसलों के बाद भी चीन ने न तो भारत के बड़े राजनयिक और कूटनीतिक लक्ष्यों में अड़ंगा लगाना बंद किया और न ही उसकी सेना ने एलएसी पर भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ बंद की. भारत ने साल 2016 में वैश्विक संगठन - परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता पाने के लिए आवेदन किया. अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और जर्मनी जैसे देश इस मामले में भारत के पक्ष में थे, लेकिन चीन ने पाकिस्तान से अपने संबंधों के चलते भारत के खिलाफ वीटो कर दिया. यह मोदी सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था.
इसके अगले ही साल यानी 2017 के मध्य में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच सिक्किम के करीब डोकलाम में गतिरोध शुरू हो गया. इस गतिरोध का कारण चीन द्वारा भूटान के इलाके में कब्जा कर भारतीय सीमा तक सड़क बनाना था. 73 दिनों के बाद जब यह गतिरोध खत्म हुआ तो मोदी सरकार ने इसे अपनी जीत की तरह प्रचारित किया. जबकि गतिरोध समाप्त होने के बाद भी डोकलाम के आसपास के इलाकों में चीन की ओर से सैन्य ढांचे का विस्तार करना बंद नहीं हुआ था. ये ढांचा निर्माण इस मकसद से किए गए कि चीनी सेना को एलएसी तक पहुंचने में लगने वाले समय को कम किया जा सके. कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो डोकलाम के आसपास जो निर्माण किया गया, उनमें बड़ी इमारतें जिनका आर्मी कैम्प्स की तरह इस्तेमाल किया जा सके, सुरंगे, चार लेन वाली सड़कें और हेलीपैड शामिल हैं. इसके अलावा चीन के इस निर्माण से यह भी साफ़ हो गया कि भारत अपने करीबी देश भूटान की संप्रभुता की रक्षा नहीं कर सका, जिसकी जिम्मेदारी उसी के हाथ में है.
लेकिन, इन सभी घटनाओं के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के प्रति भारत की तुष्टिकरण की नीति जारी रखी. डोकलाम विवाद के समय से ही मोदी सरकार ने नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच बैठक कराने के प्रयास तेज कर दिए थे. आखिरकार, अप्रैल 2018 में वुहान में अनाधिकारिक शिखर सम्मेलन पर बात बनी. लेकिन इससे पहले जो चीजें घटी वे हैरान करने वाली थीं. इस शिखर वार्ता से करीब एक महीने पहले मोदी सरकार की तरफ से अपने वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों को पत्र लिखकर दलाई लामा के कार्यक्रम में न जाने का आदेश दिया गया. बताया जाता है कि सरकार ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि दलाई लामा के भारत में 60 साल पूरे होने का उत्सव अगर दिल्ली में मनाया जाता और इसमें बड़े नेता और अधिकारी भी शामिल होते तो उससे चीन नाराज हो सकता था और शिखर सम्मेलन के लिए न भी कह सकता था. विदेश मंत्रालय के इस पत्र के बाद दलाई लामा का वह कार्यक्रम हिमाचल प्रदेश के मैक्लॉयडगंज में हुआ. कुछ मीडिया रिपोर्टों में तो यहां तक दावा किया गया कि यह पत्र चीन के कहने पर ही लिखा गया था क्योंकि जब भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले ने इसे लिखा था तब वे चीन में ही थे.
वुहान के बाद नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच बीते साल अक्टूबर में एक और अनाधिकारिक शिखर सम्मेलन हुआ. दो दिवसीय यह सम्मलेन तमिलनाडु के महाबलीपुरम में हुआ. पहले की तरह ही इसे भी मोदी सरकार ने अपनी बड़ी सफलता बताया. लेकिन इसके चार महीने बाद ही लद्दाख के गलवान घाटी से चीनी सैनिकों की घुसपैठ की खबरें आनी शुरू हो गईं. जानकारों के मुताबिक चीनी सैनिकों ने गलवान में घुसपैठ बहुत सोच-समझकर की थी. उन्होंने यहां जिस तरह का बंदोबस्त कर रखा था उससे साफ़ पता चलता है कि इसकी तैयारी एक योजना के तहत काफी पहले शुरू की गयी थी.
विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि बीते छह सालों में नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग के साथ 16 मुलाकातें की. मोदी सबसे ज्यादा बार चीन की यात्रा पर जाने वाले भारतीय प्रधानमंत्री भी हैं. लेकिन अगर इन सबका निष्कर्ष निकालें तो नतीजा सिफर नहीं बल्कि ऋणात्मक ही दिखता है. यानी इनसे भारत को कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि नुकसान ही उठाना पड़ा. जबकि इसके उलट चीन ने इन बैठकों से जमकर आर्थिक फायदा उठाया और साथ ही भारतीय क्षेत्रों में घुसता भी चला आया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह कई बार संसद में और खुले मंचों पर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते रहे हैं. ये लोग चीन से 1962 में हुए युद्ध और अक्साई चिन जैसे क्षेत्रों पर चीन के कब्जे के लिए नेहरू को गलत ठहराते रहे हैं. भाजपा के कई नेताओं ने तो गलवान विवाद के लिए भी देश के पहले प्रधानमंत्री को ही दोषी बताया है. लेकिन जानकारों की मानें तो चीन को लेकर नेहरू से कहीं बड़ी गलती नरेंद्र मोदी ने की है. इनके मुताबिक ऐसा इसलिए है कि नेहरू तो देश के पहले प्रधानमंत्री थे और उस समय तक चीन के छल-फरेब के बारे में उन्हें या उस समय के किसी भी अन्य नेता को कोई खास अनुभव नहीं था. लेकिन अब जब 1962 के युद्ध को 60 साल बीते चुके हैं और पूरी दुनिया चीन की चालों को बहुत अच्छी तरह से समझ चुकी है, तब नरेंद्र मोदी का चीन के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाना नेहरू से कहीं बड़ी गलती लगती है. इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि घड़ी-घड़ी जवाहरलाल नेहरू की गलतियां गिनाने वालों ने, उनकी गलतियों से भी कोई सबक नहीं लिया.(SATYAGRAH)
-अशोक मिश्रा
नीतीश कुमार की एक खासियत है कि जब वो किसी से नाराज होते हैं, तो उस संगठन के प्रति भी उदासीन हो जाते हैं, जिससे वो शख्स जुड़ा हुआ है। ऐसा होने पर नीतीश कुमार उस व्यक्ति के परिपेक्ष्य में ही संगठन को देखेंगे और संगठन की टिप्पणियों को नजरअंदाज करेंगे। हाल ही में नीतीश कुमार ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भूमि पूजन का स्वागत न करके बीजेपी के प्रति अपनी उदासीनता जाहिर की थी। सत्ता और विपक्ष के तमाम नेता जहां भूमि पूजन अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे, वहीं नीतीश कुमार चुप्पी साधे हुए थे। इससे राजनीतिक हलकों में अटकलों को हवा मिली। सियासी गलियारों में एनडीए के साथ जेडीयू के संबंध की एक बार फिर से चर्चा होने लगी।
अभी तक वो दौर नहीं आया है, जब जनता दल (यूनाइटेड) बीजेपी के साथ रिश्ते तोडऩे की सोच सकता है। लेकिन जिस तरह से एनडीए की एक और सहयोगी, एलजेपी नीतीश कुमार को निशाना बना रही है, उससे एनडीए के साथ जेडीयू की तल्खियां बढ़ ही रही हैं। बिहार सरकार पर एलजेपी नेता चिराग पासवान के लगातार हमलों पर बीजेपी नेतृत्व ने चुप्पी साध रखी है, जिसे नीतीश कुमार पंसद नहीं कर रहे हैं।
चिराग पासवान ने कोरोना महामारी की भयानक स्थिति को देखते हुए अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव नहीं कराने की बात कही है, जिसे लेकर जेडीयू नेतृत्व ने आपत्ति भी जाहिर कर दी है। चिराग पासवान ही नहीं, बल्कि उनके पिता रामविलास पासवान ने भी यह कहकर नीतीश कुमार को भडक़ा दिया कि पार्टी के मामले चिराग पासवान संभालते हैं। इसमें अब उनकी पहले जैसी भूमिका नहीं है। सवाल ये है कि बीजेपी चिराग पासवान को लेकर चुप्पी क्यों साधे हुई है। या फिर चिराग पासवान खुद बीजेपी के इशारे पर काम कर रहे हैं?
जेडीयू के वरिष्ठ नेता पहले ही कह चुके हैं कि वे स्थिति को करीब से देख रहे हैं। यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि क्या चिराग के जुबानी हमले बीजेपी प्रायोजित हैं या चिराग ऐसा गठबंधन में ज्यादा सीटें पाने की रणनीति के तहत कर रहे हैं।
बिहार में एनडीए के भविष्य को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने गुरुवार को चिराग पासवान से मुलाकात की। माना जा रहा है कि इस मुलाकात में नड्डा ने एलजेपी को आश्वासन दिया है कि सीट की बातचीत के दौरान इसकी आशंकाओं पर ध्यान दिया जाएगा।
हालांकि, एलजेपी नड्डा के आश्वासन से खुश नहीं है और नीतीश कुमार सरकार से समर्थन वापस लेने पर अड़ी हुई है। बिहार विधानसभा में एलजेपी के 2 विधायक और एक एमएलसी हैं। ऐसे में भले ही एलजेपी समर्थन वापस ले ले, लेकिन सरकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
जेडीयू और एलजेपी के बीच मतभेद इस हद तक बढ़ गए हैं कि लोकसभा में जेडीयू संसदीय दल के नेता राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह ने चिराग पासवान को ‘कालिदास’ तक कह डाला है, जो जिस शाखा पर बैठे हैं, उसे ही काटने पर तुले हुए हैं।
वहीं, एलजेपी नेता अशरफ अंसारी ने लल्लन को ‘सूरदास’ कह दिया है, जो कोरोना वायरस समेत बिहार की दुर्दशा करने वाले सभी मुद्दों की ओर आंखें मूंद कर बैठे हैं। एलजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अवलोकन का हवाला दिया है, जिन्होंने बिहार में कोरोना वायरस-प्रभावित राज्यों में टेस्टिंग बढ़ाने पर जोर दिया था।
दोनों पार्टियों के बिगड़ते रिश्ते के बीच बीजेपी पूरे देश में और बिहार में अपने दम पर खड़ी होने की अपनी नीति का पालन कर रही है। राज्य में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना चाहती है। सभी सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए एनडीए ने रणनीति भी बदल ली है। लक्ष्य को हासिल करने के लिए बीजेपी ने हाल ही में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को चुनाव प्रभारी बनाया है, जो एक सख्त सौदेबाज माने जाते हैं।
बीजेपी के लिए 2020 का बिहार चुनाव 2015 के इलेक्शन से बहुत अलग है। बीजेपी अब बिहार में राजनीतिक स्थिति का पूरी तरह से दोहन करना चाहती है, क्योंकि प्रमुख विपक्षी दल आरजेडी कई आरोपों को लेकर अभी हाशिये पर है। कांग्रेस की हालत वैसे ही पस्त है। ऐसे में बीजेपी के पास उभरने का यही सही मौका है।
इसके अलावा नीतीश कुमार के ‘सुशासन बाबू’ वाली छवि की ब्रांडिंग में इस बार कोरोना वायरस संकट की वजह से देरी हो गई है। विपक्ष इसे एक नकारात्मक ब्रांडिंग के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। विपक्ष चीजों को ऐसे पेश करना चाहता है कि नीतीश कुमार सरकार ने शुरू से ही कोरोना वायरस को लेकर शिथिलता दिखाई। जिस वजह से राज्य के कई जिलों में अब कोरोना संक्रमण की विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई है।
बिहार प्रभारी के रूप में फडणवीस के साथ राज्य बीजेपी यूनिट में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और राज्य बीजेपी अध्यक्ष डॉ. संजय जायसवाल हैं। जो एक साथ मिलकर बिहार चुनाव में बीजेपी के लिए अलग लॉबी तैयार कर रहे हैं।
बीजेपी ने हर चुनाव क्षेत्र में जमीनी स्तर पर पार्टी के संदेश को फैलाने के लिए ‘प्रमुख मतदाताओं’ की पहचान करके अपना चुनाव अभियान शुरू किया है। पार्टी ने प्रमुख मतदाताओं के विवरणों से भरे जाने के लिए सभी 1,000 मंडलों में 28 पेज वाली मंडल पुस्तिकाएं भी वितरित की हैं, जो सामान्य मतदाताओं के मन को प्रभावित कर सकती हैं। बता दें कि एक विधानसभा सीट में कम से कम 5 मंडल और एक मंडल में कम से कम 60 बूथ होते हैं।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि उम्मीदवारों के चयन में फडणवीस की पसंद प्रबल होगी। साथ ही फडणवीस ही जनता दल (यूनाइटेड) के साथ सीट साझा करने वाली वार्ता का फैसला करेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
सदर्भ-वाल स्ट्रीट जर्नल की स्टोरी
-पुष्य मित्र
इसी साल 16 अप्रैल की बात है। मेरी न्यूज फीड में नजर आ रहे इस हेट स्पीच वाली पोस्ट (जो इस पोस्ट के साथ लगी है) को हटाने के लिए मैंने फेसबुक के कम्युनिटी स्टैंडर वाली टीम से अनुरोध किया था। मैंने उन्हें लिखा था, यह पोस्ट न सिर्फ फेक है, बल्कि एक खास धर्म के खिलाफ नफरत फैलाने वाला भी है। मुझे लगता है कि फेसबुक पर ऐसी पोस्ट को नहीं रहना चाहिये। मैंने इस फेसबुक गु्रप की भी समीक्षा करने का अनुरोध किया था, यह कहते हुए कि इस पर सिर्फ नफरत भरी सामग्रियां होती हैं। तब मुझे लगता था कि चूंकि हमलोग शिकायत नहीं करते इसलिये फेसबुक पर ऐसे घटिया पोस्ट और पेज की भरमार है। हमें इनके बारे में फेसबुक को बताना चाहिये। फेसबुक एक न्यूट्र्ल संस्था है, वह जरूर सही फैसले लेगी। मगर उस रोज फेसबुक ने मेरा भ्रम दूर कर दिया।
फेसबुक टीम का एक घंटे में इस पोस्ट और पेज की जांच कर मुझे सूचित कर दिया कि इसमें कुछ भी आपत्तिजनक या हमारी कम्यूनिटी स्टैंडर के खिलाफ नहीं है। हम आपका अनुरोध अस्वीकार करते हैं। मुझे तब दुख हुआ। मगर मुझे मालूम नहीं था, असली झटका आने वाला है।
अगले ही घंटे मेरे पास उनका मैसेज आया कि हम लोगों ने आपके फेसबुक पेज की पिछली पांच पोस्ट की समीक्षा की है, वे कम्युनिटी स्टैंडर के खिलाफ हैं। इसलिये हम आपको अगले 24 घंटे के लिए ब्लॉक कर रहे हैं।
मैंने अपने पिछले पांच पोस्टों को पढ़ा। संयोग से वे सभी पांच पोस्ट सूचनात्मक थे, उनमें किसी तरह का कोई विचार या ओपिनियन भी नहीं था। बहुत सोचा, मगर उन पोस्टों में ऐसी कोई बात नजर नहीं आई कि जिससे कोई दिक्कत हो रही हो। आखिरकार इस बात को मानना पड़ा कि इस हिन्दूवादी पेज की रिपोर्ट करना फेसबुक की टीम को पसंद नहीं आया। इसी के बदले में उसने मुझ पर इस तरह की कार्रवाई की है। तभी मतलब साफ हो गया था कि उस टीम में कोई इस विचार का हितैषी बैठा है।
दुख बहुत हुआ। कई मित्रों को व्यक्तिगत तौर पर बताया भी। उस रोज दिल इस कदर टूटा कि लगा, फेसबुक को ही छोड़ दें। फेसबुक की इंटरनेशनल सिक्योरिटी टीम को मेल से शिकायत भी की। मुकदमा करने का भी मन बना लिया। एक वैकल्पिक फेसबुक खाता भी खोल लिया। अपनी वाल के कई महत्वपूर्ण पोस्ट हटा भी ली।
मगर फिर लगा कि इस प्लेटफॉर्म पर पिछले 14 साल से मेहनत की है। उसे ऐसे नहीं छोडऩा। यहीं रह कर लडऩा है। सो लगा हूं।
मगर सच यही है कि मुझे उसी रोज वह सब अनुभव हो गया था, जो कल एक अमेरिकी अखबार में छपा है। तभी मैं समझ गया था कि अब फेसबुक भी भक्तिमार्ग पर है। फिर उसके भारत में रिटेल सेक्टर में निवेश करने की खबर आई। समझ और साफ हुई।
एक दिन देखा कि बहुत शांत भाव से गांधी और विनोबा के बारे में लिखने वाले साथी अव्यक्त जी के साथ भी यही हुआ। फिर कोई संदेह नहीं रहा।
अब यह सच्चाई है कि जिस तरह अपने देश की मीडिया सरकार के कब्जे में है, फेसबुक भी अब अपने हित के लिए सरकार को खुश करने में जुटा है। हमें इन्हीं स्थितियों में अपनी बात को कहते रहना है, अपना हस्तक्षेप करते रहना है। देर सवर फेसबुक की सच्चाईयां इसी तरह सामने आती रहेगी।
और हां, अभी भी मेरा यह अकाउंट फेसबुक द्वारा रिस्ट्रिक्टेड है। मुझे चेतावनी दी गयी है कि अगली दफा मेरा अकाउंट हमेशा के लिए ब्लॉक किया जा सकता है।
- *समय निकाल कर पढें*
- मैंने अपने एक दोस्त से पूछा, जो 60 पार कर चुके हैं और 70 की ओर जा रहा हैं। वह अपने जीवन में किस तरह का बदलाव महसूस कर रहे हैं?
- उन्होंने मुझे निम्नलिखित बहुत दिलचस्प पंक्तियाँ भेजीं, जिन्हें मैं आप सभी के साथ साझा करना चाहूँगा ....
- मैं माता-पिता, भाई-बहनों, पत्नी, बच्चों, दोस्तों से प्यार करने के बाद, अब मैं खुद से प्यार करने लगा हूं।
- मुझे बस एहसास हुआ कि मैं *एटलस* नहीं हूं। दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है।
- मैंने अब सब्जियों और फलों के विक्रेताओं के साथ सौदेबाजी बंद कर दी। आखिरकार, कुछ रुपए अधिक देने से मेरी जेब में कोई छेद नहीं होगा, लेकिन इससे इन गरीबों को अपनी बेटी की स्कूल फीस बचाने में मदद मिल सकती है।
- मैं बची चिल्लर का इंतजार किए बिना टैक्सी चालक को भुगतान करता हूं। अतिरिक्त धन उसके चेहरे पर एक मुस्कान ला सकता है। आखिर वह मेरे मुकाबले जीने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है7
- मैंने बुजुर्गों को यह बताना बंद कर दिया कि वे पहले ही कई बार उस कहानी को सुना चुके हैं। आखिर वह कहानी उनकी अतीत की यादें ताज़ा करती है और जिंदगी जीने का हौसला बढाती है 7
- कोई इंसान अगर गलत भी हो तो मैंने उसको सुधारना बंद कर दिया है । आखिर सबको परफेक्ट बनाने का जिम्मा मेरे ऊपर ही नहीं है। ऐसे परफेक्शन से शांति अधिक कीमती है।
- मैं अब सबकी तारीफ बड़ी उदारता से करता हूं। यह न केवल तारीफ प्राप्तकर्ता की मनोदशा को उल्हासित करता है, बल्कि यह मेरी मनोदशा को भी ऊर्जा देता है!!
- अब मैंने अपनी शर्ट पर क्रीज या स्पॉट के बारे में सोचना और परेशान होना बंद कर दिया है। मेरा अब मानना है कि दिखावे की अपेक्षा सच्चा व्यक्तित्व ज्यादा कीमती होता है ।
- मैं उन लोगों से दूर ही रहता हूं जो मुझे महत्व नहीं देते। आखिरकार, वे मेरी कीमत नहीं जान सकते, लेकिन मैं वह बखूबी जनता हूँ।
- मैं तब शांत रहता हूं जब कोई मुझे ‘चूहे की दौड’ से बाहर निकालने के लिए गंदी राजनीति करता है। आखिरकार, मैं कोई चूहा नहीं हूं और न ही मैं किसी दौड़ में शामिल हूं।
- मैं अपनी भावनाओं से शर्मिंदा ना होना सीख रहा हूं। आखिरकार, यह मेरी भावनाएं ही हैं जो मुझे मानव बनाती हैं।
- मैंने सीखा है कि किसी रिश्ते को तोडऩे की तुलना में अहंकार को छोडऩा बेहतर है। आखिरकार, मेरा अहंकार मुझे सबसे अलग रखेगा जबकि रिश्तों के साथ मैं कभी अकेला नहीं रहूंगा।
- मैंने प्रत्येक दिन ऐसे जीना सीख लिया है जैसे कि यह आखिरी दिन हो। क्या पता, आज का दिन आखिरी हो!
- सबसे महत्वपूर्ण मोस्ट इम्पार्टेंट
- मैं वही काम करता हूं जो मुझे खुश करता है। आखिरकार, मैं अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हूं, और मै उसका हक़दार भी हूँ।
- (कहीं से आया हुआ राजेश जोशी ने फेसबुक पर पोस्ट किया )


