विचार/लेख
-राकेश दीवान
कई लोगों को यह थोड़ा विचित्र लग सकता है कि करीब 15 हजार की आबादी का मामूली, अनजान, उनींदा-सा एक कस्बा अपने से लगभग सात गुने, एक लाख से ज्यादा लोगों को ढाई-तीन दिन अपने साथ रहने, खाने-पीने और प्रदर्शन करने में शामिल कर सकता है। कस्बे की आबादी और जरूरत-भर संसाधन इतने कम थे कि जमावड़े के लिए मामूली आटा-दाल, साग-भाजी तक के लिए भी करीब साठ किलोमीटर दूर, खंडवा शहर तक जाना-आना पडता था। कार्यक्रम में आने वाले मेहमानों के लिए कस्बेभर के अधिकांश घर खोल दिए गए थे, लेकिन आमंत्रित इतने अधिक थे कि उनके ठहराने के लिए कृषि उपज मंडी, हर दर्जे के स्कूल और तरह-तरह के सरकारी भवनों का उपयोग किया गया था। पीने और निस्तार के पानी के लिए हरसूद के नागरिकों के कुओं, नलकूपों के अलावा सरकारी नलकूप, जरूरत की जगहों पर लगाने के लिए रखी गई झक नई टंकियां तक उपयोग में लाई गई थीं। आबादी से रेलवे-स्टेशन दूर था इसलिए सभी रिक्शोंं-तांगेवालों ने अपनी सेवाएं मुफ्त कर दी थीं। कार्यक्रम के दो दिन पहले पता चला कि कुछ गफलत के चलते बम्बई से आने वाला चंदा नहीं पहुंच सका है और पैसा बिलकुल नहीं है। ऐसे में इसी कस्बे ने आनन-फानन तीन-चार घंटे की मेहनत से 65-70 हजार रुपए इक_ा किए थे। इसके अलावा लघु व्यापारी संघ ने खाने के दस हजार मुफ्त-कूपन देने का वायदा किया था। कार्यक्रम के पहले लगभग रोज निकाली जाने वाली रैलियों, मशाल-जुलूसों के भागीदारों के लिए घरों के सामने पानी से भरा घडा और कहीं-कहीं चाय का इंतजाम किया जाता था।
आज के समय में अजूबा लगने वाली ये बातें खंडवा जिले के जीते-जागते, भरे-पूरे और 2004 में ‘इंदिरा सागर परियोजना’ की राक्षसी डूब में समा चुके सात सौ साल पुराने कस्बे हरसूद में इकतीस साल पहले हुईं थीं। मौका था, 28 सितम्बर 1989 को पर्यावरण-प्रदूषण, खासकर बडे बांधों के विरोध में हुए ‘संकल्प मेले’ के विशाल जमावडे का। दुनियाभर में अस्सी के दशक की दस में से एक बड़ी घटना माने जाने वाले इस मेले की कहानी 1985-86 की उन चार में से एक राष्ट्रीय बैठक से शुरु हुई थी जो हरसूद में ही बड़े बांधों की डूब और लाभ-हानि पर विस्तार से विचार करने की खातिर आयोजित की गई थी। इस श्रंृखला की बाकी बैठकें बडवानी के पड़ौसी कस्बे अंजड, कुक्षी के पास नर्मदा किनारे के कोटेश्वर और इलाके के महानगर इंदौर में हुई थीं। उन दिनों काशीनाथ त्रिवेदी की अगुआई में कुछ वरिष्ठ गांधीवादियों ने निमाड-मालवा में बड़े बांधों के खिलाफ अलख जगाई थी और उनके आग्रह पर इन चार बैठकों का आयोजन किया गया था। तब तक अंतरराज्यीय ‘सरदार सरोवर परियोजना’ के विरोध में आज का ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ जमीन पकडऩे लगा था और वहां भी ऐसे किसी विशाल जमावड़े की जरूरत महसूस होने लगी थी। नतीजे में तय हुआ था कि समूची नर्मदा घाटी में खड़े किए जाने वाले 30 बडे बांधों के प्रभावितों, देशभर में पर्यावरण और वैकल्पिक राजनीति के मुद्दों पर काम करने वाले संगठनों और सरोकार रखने वाले साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, नाटककारों, फिल्म-कलाकारों, राजनेताओं और नागरिकों को एक जगह इक_ा करके पर्यावरण, खासकर बड़े बांधों पर बातचीत की जाए।
नर्मदा घाटी के सरकारी विकास के मंसूबों में सबसे बड़े ‘इंदिरा सागर’ बांध को लेकर हरसूद में पहले ही सुगबुगाहट शुरु हो चुकी थी। लोग बांध की आशंका से इतने डर गए थे कि घरों की आम-फहम टूट-फूट भी नहीं सुधरवाते थे। बेंकों ने यहां भी कर्ज देने में आनाकानी शुरु कर दी थी। इसी समय होशंगाबाद जिले में स्कूली शिक्षा के काम में लगी संस्था ‘किशोर भारती’ ने इतिहासकार और पुरातत्वविद् रमेश बिल्लौरे से आग्रह किया था कि वे नर्मदा पर बनने वाले बांधों, खासकर ‘इंदिरा सागर’ पर शोध करें। नतीजे में बिल्लौरे के साथ पत्रकार क्लॉड अल्वारिस ने मिलकर 1988 में नर्मदा बांधों पर पहली किताब ‘डेमिंग दि नर्मदा : इंडियाज ग्रेटेस्ट प्लॉन्ड इनवायरनमेंटल डिजास्टर’ लिखी थी जिसे मलेशिया स्थित मीडिया समूह ‘थर्ड वल्र्ड नेटवर्क’ ने प्रकाशित किया था। रमेश बिल्लौरे कोई शोधार्थी, लेखक भर नहीं थे, उन्हें लगता था कि सीधे मैदान में जाकर बांध का विरोध किया जाना चाहिए। उस समय, यानि 1986-87 तक हरसूद और आसपास के लक्ष्मीनारायण खण्डेेलवाल, गयाप्रसाद दीवान, शब्बीरभाई पटैल, कमल बाबा, दगडूलाल सांड जैसे भिन्न-भिन्न कामकाजों में लगे लोगों ने ‘नर्मदा सागर संघर्ष समिति’ का गठन कर लिया था और खण्डेलवालजी के घर में दफ्तर खोलकर रमेश बिल्लौरे, सतीनाथ षड्ंगी, नीति आनंद जैसे कई कार्यकर्ताओं ने विस्थापितों और डूब प्रभावितों से सम्पर्क करना शुरु कर दिया था।
पहले से तैयार इस पृष्ठभूमि में ‘संकल्प मेले’ के लिए लामबंदी शुरु की गई। देशभर को जोडने वाले इटारसी जंक्शन की गोठी-धर्मशाला में हुई तैयारी बैठक के बाद हरसूद कार्यक्रम का स्वरूप उभरने लगा। उन दिनों ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के समर्थकों का गढ़ माना जाने वाला होशंगाबाद हरसूद के लिए भी कमर कसकर तैयार हो गया। वहां के न सिर्फ ढेरों कार्यकर्ता दो-ढाई महीने पहले से हरसूद में डेरा डालकर बैठ गए, बल्कि चंदा, अनाज, नुक्कड़-नाटक, गीत-संगीत और दूसरी तरह की सहायताएंं भी वहां से मिलने लगीं। तैयारी की इस प्रक्रिया में इंदौर, भोपाल तथा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे दूर-दराज के राज्यों के लोग भी महीनों पहले से शामिल हुए। आखिरकार ‘संकल्प मेले’ का दिन भी आ ही गया, लेकिन इसके भी पहले कुछ बेहद अहम बातें हो रही थीं। एक तो, देश के प्रसिद्ध कलाकार विष्णु चिंचालकर ‘गुरुजी’ की देख-रेख में हरसूद के एन बीच में एक ‘संकल्प स्तंभ’ का निर्माण किया जा रहा था। इस ‘संकल्प स्तंभ’ की नींव में देशभर से आने वाले लोगों ने एकजुटता के प्रतीक स्वरूप अपने-अपने इलाकों से लाई मु_ीभर मिट्टी डाली थी। जमावडे में बीबीसी, ‘टाइम मैगजीन,’ न्यूयार्क टाईम्स , ल’मांद, वाशिंगटन पोस्ट, ऑब्जर्वर, इंडियन एक्सप्रेस, टाईम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू, फ्रंटलाइन, हिन्दुस्तान टाईम्स, जनसत्ता, नई दुनिया, भास्कर, नवभारत आदि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया के करीब डेढ़ सौ पत्रकारों के आने की संभावना थी, इसलिए उनके ठहरने, खाने-पीने और समाचार देने की व्यवस्था की गई थी। कस्बे के कुछ फोन-धारी परिवारों ने अपने-अपने फोन पत्रकारों के उपयोग के लिए समर्पित कर दिए थे और कुछ संसाधन-धारी पत्रकारों ने अपने लिए बीएसएनएल की ओबी वैन लगवा ली थी।

वैसे तो 26 और 27 सितम्बर से ही लोगों का आना शुरु हो गया था, लेकिन 28 को असली जमावडा हुआ। कार्यक्रम बाबा आमटे की अगुआई में होना था, उन्हें ही ‘संकल्प मेले’ में मौजूद लोगों को संकल्प दिलवाना था इसलिए पहले वे ही मंचासीन हुए। अनिल त्रिवेदी के संचालन में हुए कार्यक्रम में शबाना आजमी, शिवराम कारंत, एसआर हीरेमठ, बबलू गांगुली, स्वामी अग्निवेश, सुन्दरलाल बहु्गुणा, मेधा पाटकर, स्मितु कोठारी, ओमप्रकाश रावल, महेन्द्र कुमार, विनोद रैना के साथ देशभर के पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और वैकल्पिक राजनीति में लगे अनेक लोग शामिल थे। सभा में मेेनका गांधी और विद्याचरण शुक्ल भी पहुंचे थेे, लेकिन सत्ता की राजनीति से परहेज रखने की मान्यता के चलते उन्हें विनम्रता-पूर्वक मंच से उतरने का आग्रह किया गया। दिनभर गणमान्यों और बांध-प्रभावितों ने पर्यावरण और बडे बांधों से होने वाली आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हानियों के बारे में विस्तार से बताया। इस तरह के कार्यक्रमों का यह शुरुआती दौर था और इसीलिए सभी की बातें नई और भारी उत्सुकता जगाने वाली थीं।
‘संकल्प मेले’ की इस प्रक्रिया में एक जो सर्वाधिक महत्व?पूर्ण बात हुई, वह थी- ‘जन विकास आंदोलन’ का गठन। असल में बाबा आमटे और ओमप्रकाश रावल का आग्रह था कि हमें भी अब राष्ट्रीय स्तर पर ‘ग्रीन पार्टी’ की घोषणा कर देना चाहिए और उसके लिए ‘संकल्प मेले’ से बेहतर कोई अवसर नहीं हो सकता था। लेकिन बाबा और रावलजी की इस बात से कई लोगों की असहमति थी। उनका कहना था कि पार्टी गठित करने के पहले हमें आपस में एक-दूसरे की वैचारिक समझ, व्यापक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय माहौल का ज्ञान और राजनीति में उतरने की इच्छा पर बात कर लेनी चाहिए। अंत में तय हुआ कि इस मौके का लाभ लेते हुए कम-से-कम एक गठबंधन तो बनाना ही चाहिए और नतीजे में ‘जन विकास आंदोलन’ का जन्म हुआ। ‘संकल्प मेले’ के बाद कुछ साल ‘जन विकास आंदोलन’ सक्रिय भी रहा, लेकिन फिर उसके सहभागी संगठनों-व्यक्तियों ने अपनी-अपनी जरूरतों, समझ और व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं के चलते इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया से किनारा कर लिया। इस तरह इतिहास में दशक की एक महत्वपूर्ण घटना की तरह दर्ज हरसूद का ‘संकल्प मेला’ समाप्त हो गया और उसी के साथ नए हरसूद या छनेरा में तब्दील हो गया वह हरसूद, जो अपनी जीवन्तता, संघर्ष और आपसी भाई-चारे के लिए जाना-पहचाना जाता था। अंत में रह गया वह मासूम बच्चा जिसने डूब क्षेत्र का दौरा करने आईं लेखिका अरुन्धति राय के यह पूछने पर कि तुम जंगल के फूल क्यों इकट्ठा कर रहे हो, जबकि यहां दूर-दूर तक कोई देवी-देवता नहीं हैं, कहा था कि फूल ‘कित्ते खबसूरत हैं न?!’ उम्मीद है कि अपने समय और समाज को डुबोने वालों को भी इस बच्चे जैसी समझ आ सके !!
- Lalit Maurya
अब तक महाराष्ट्र में 747,995 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से 543,170 ठीक हो चुके हैं। ऊपर ग्राफ में देखिए कि किस राज्य में कब कितने मामले सामने आए। दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है जहाँ अब तक 409,238 मामले सामने आ चुके हैं। तीसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश है, जहां अब तक 403,616 मामले सामने आ चुके हैं। कर्नाटक में 318,752, उत्तरप्रदेश में 213,824, दिल्ली 169,412, पश्चिम बंगाल में 153,754, बिहार में 131,057, तेलंगाना में 120,166, असम में 101,367, ओडिशा में 94,668 जबकि गुजरात में भी अब तक संक्रमण के करीब 92,457 मामले सामने आ चुके हैं। जबकि उनमें से 74,525 मरीज ठीक हो चुके हैं। गौरतलब है कि गुजरात में पहला मामला 20 मार्च को सामने आया था।
पिछले 24 घंटों में सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में 14,427 सामने आये हैं। जबकि आंध्रप्रदेश में (10,526), तमिलनाडु (5,996), कर्नाटक(8,960), उत्तरप्रदेश (5,405), दिल्ली (1,808), जम्मू कश्मीर (696), गुजरात (1,273), पश्चिम बंगाल (2,982), राजस्थान (1,355), मध्यप्रदेश में 1252 मामले सामने आये हैं।
जबकि राजस्थान में अब तक 77,370 मामले सामने आ चुके हैं। इसके बाद केरल (69,304) का नंबर आता है। देश भर में 26,48,998 लोग इस बीमारी से ठीक हो चुके हैं।
स्रोत: स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
भारत दुनिया का तीसरा ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं, जबकि प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ 29,234 टेस्ट किये गए हैं
भारत में अब तक कोरोना के 34,63,972 मामले सामने आ चुके हैं। जिसके साथ वो दुनिया का तीसरा सबसे संक्रमित देश बन गया है। यदि गंभीर मामलों को देखें तो अमेरिका के बाद भारत का दूसरा स्थान है। जहां 8,944 मरीज गंभीर रूप से बीमार हैं।
कब सामने आए कितने मामले
स्रोत: स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, अंतिम आंकड़ें दिनांक 29 अगस्त 2020, सुबह 8:00 बजे
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 29 अगस्त 2020, सुबह 8:00 बजे तक जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में मामलों की संख्या बढ़कर 34,63,972 पर पहुंच चुकी है। जिनमें 111 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। इस संक्रमण से अब तक 62,550 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। पिछले 24 घंटों में 76,472 नए मामले सामने आये हैं और 1,021 लोगों की मौत हुई। जबकि देश भर में 26,48,998 मरीज ठीक हो चुके हैं। (downtoearth)
- Dayanidhi
कोविड-19 महामारी में सार्वजनिक रूप से बाहर निकलने से पहले मास्क पहनना जरूरी हो गया है। हालांकि, अभी भी कई लोग मास्क पहनने से संक्रमण फैलेगा या नहीं, इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हैं।
इन शंकाओं को दूर करने के लिए, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से पद्मनाभ प्रसन्ना सिम्हा, और श्री जयदेव इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवस्कुलर साइंसेज एंड रिसर्च से प्रसन्ना सिम्हा मोहन राव ने विभिन्न मास्कों के साथ, अलग-अलग परिदृश्यों में खांसी के प्रवाह को लेकर एक प्रयोग किया है।
सिम्हा ने कहा कि कोई भी व्यक्ति संक्रमण के प्रसार को कम करके वातावरण में संक्रमण फैलने से रोक सकता है, यह अन्य स्वस्थ व्यक्तियों के लिए बेहतर स्थिति है।
घनत्व और तापमान की तीव्रता एक दूसरे से जुड़े होते हैं। खांसी उनके आसपास के क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इस संबंध को देखते हुए, सिम्हा और राव ने एक तकनीक का उपयोग किया जिसका नाम स्कॉलरिन इमेजिंग है। यह घनत्व में परिवर्तन की कल्पना करता है, जिसमें किसी व्यक्ति पर परीक्षण किए जा रहे पांच तरह के खांसी की तस्वीरें कैप्चर की जाती हैं। क्रमिक छवियों पर खांसी की गति पर नजर रखने से, टीम ने अनुमानित बूंदों की गति और प्रसार का अनुमान लगाया।
अप्रत्याशित रूप से, उन्होंने खांसी के क्षैतिज प्रसार को कम करने में एन 95 मास्क को सबसे प्रभावी पाया। एन 95 मास्क ने खांसी के शुरुआती गति को 10 तक कम कर दिया और इसके प्रसार को 0.1 से 0.25 मीटर के बीच सीमित कर दिया। अध्ययन के निष्कर्ष एआईपी प्रकाशन के जर्नल ऑफ फ़्लूइड्स में प्रकाशित हुए हैं।
बिना मास्क की खांसी की बूंदें (ड्रॉपलेट) 3 मीटर तक फैल सकती है, लेकिन यहां तक कि एक साधारण डिस्पोजेबल मास्क भी इनके फैलने की दूरी को 0.5 मीटर तक नीचे ला सकता है।
सिम्हा ने कहा, भले ही एक मास्क सभी कणों को फ़िल्टर नहीं करता है, अगर हम ऐसे बूंदों, कणों को बहुत दूर तक फैलने से रोक सकते हैं, तो कुछ न करने से तो बेहतर है कुछ करना अर्थात मास्क जरूर पहनना चाहिए, ताकि बूंदें वातावरण में फैल न पाएं। उन स्थितियों में जहां परिष्कृत मास्क उपलब्ध नहीं हो, संक्रमण के प्रसार को धीमा करने में किसी भी मास्क को पहना जा सकता है।
हालांकि कुछ अन्य तुलनाओं में हमें इन पर भी विचार करना चाहिए
उदाहरण के लिए, खांसी को कवर करने के लिए कोहनी का उपयोग करना आमतौर पर एक जल्दबाजी में लिया गया एक अच्छा विकल्प माना जाता है, जो कि अध्ययनकर्ताओं को गलत लगता है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है जब तक आस्तीन को कवर नहीं किया गया हो, एक नंगा हाथ एयरफ्लो को रोकने के लिए नाक के खिलाफ उचित सील नहीं बना सकता है। खांसी में मौजूद बूंदें तो किसी भी खुले भाग से रिस (लीक) सकती हैं और कई दिशाओं में फैल सकती हैं।
सिम्हा और राव को उम्मीद है कि उनके निष्कर्ष इस तर्क को गलत साबित कर देंगे, जिसमें कहा गया है कि नियमित कपड़े के मास्क अप्रभावी होते हैं। लेकिन वे इस बात पर जोर देते हैं कि मास्क को सामाजिक दूरी के साथ इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
सिम्हा ने कहा एक तय दूरी, एक ऐसी चीज है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मास्क अपने आप में सम्पूर्ण हल (फूलप्रूफ) नहीं हैं। (downtoearth)
- Angela Saini
हम कई दशकों से जानते आ रहे हैं कि नस्ल कोई जैविक सच्चाई नहीं है। आज हम विभिन्न नस्लों के वर्गीकरण का जो तरीका इस्तेमाल करते हैं, उन तरीकों का इजाद कई शताब्दियों पहले काफी मनमाने ढंग से किया गया था। ये तरीके मानवीय भिन्नताओं को बहुत गलत रूप से व्याख्या करते हैं। असल में कोई “काला” या “गोरा” जीन नहीं होता! लगभग सभी तरह की आनुवंशिक भिन्नताएं, जो हम मनुष्यों के बीच देखते हैं, वह व्यक्तिगत स्तर पर मौजूद है। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच अलग-अलग। यह जनसंख्या के स्तर पर भिन्न नहीं होता है। वास्तव में, विभिन्न समुदायों (जनसंख्या) के बीच की तुलना में किसी एक समुदाय (जनसंख्या) के बीच कहीं अधिक आनुवांशिक विविधता है।
लेकिन कई शताब्दियों तक पश्चिमी विज्ञान पर संभ्रांत गोरे लोगों का कब्जा रहा है। 18वीं शताब्दी में भी, जब ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ, लोगों के बीच एक आम धारणा थी कि महिलाएं और अन्य “नस्ल” बौद्धिक रूप से असमर्थ होते हैं। नस्लवाद को शुरू से ही विज्ञान में उलझा दिया गया था और इसी आधार पर पश्चिमी वैज्ञानिकों ने सदियों से मानव भिन्नताओं का अध्ययन किया। उन्होंने “रेस साइंस” (नस्ल विज्ञान) का आविष्कार किया। इस झूठे वैज्ञानिक सोच का इस्तेमाल औपनिवेशिक व्यवस्था, दासता, नरसंहार और लाखों लोगों के साथ दुर्व्यवहार को सही ठहराने के लिए किया गया, जैसाकि आज हम अमेरिका में अश्वेत लोगों के साथ हो रहे व्यवहार के रूप में देख रहे हैं। यह हमारी सोच में इतना गहरा समा चुका है कि हम अब भी हर दिन इसके विनाशकारी प्रभावों के साथ जी रहे हैं। हालांकि पिछले 70 वर्षों के दौरान, अधिकांश वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि केवल एक ही मानव जाति है और हम प्रजाति के रूप में एक है।
लेकिन, अब भी कुछ ऐसे हैं जो पुरानी सोच पर कायम हैं और मानते हैं कि हमारी नस्लीय श्रेणियों के कुछ अर्थ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वैज्ञानिकों को अक्सर महान वैज्ञानिकों की विरासत से संघर्ष करना पड़ता है। ये ऐसे महान वैज्ञानिक हैं, जिनके वैज्ञानिक, राजनीतिक और नैतिक विचार आपत्तिजनक थे। यूरोप में 19वीं शताब्दी में यह मानना काफी आम था कि मनुष्य को उप-प्रजाति में विभाजित किया जा सकता है और कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक आधुनिक मानकों के अनुसार नस्लवादी थे। भयावह बात यह है कि 21वीं सदी में भी नस्लवादियों को बर्दाश्त किया गया है। कई सम्मानित वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार विजेता और अमेरिकी जीवविज्ञानी जेम्स वास्टन (जो खुले तौर पर नस्लवादी थे) को नकारने में दशकों का समय लगा। कोई भी महान काम कर सकता है। लेकिन, हमें नस्लवादियों को वैज्ञानिक क्षेत्र में सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए कि उन्होंने महान काम किया है।
भूल सुधारने का वक्त?
इस वक्त दुनियाभर में नस्लवाद के खिलाफ विरोध जारी है। क्या ये वक्त अपनी भूल सुधारने और परिवर्तन का है? क्योंकि हम अब भी वहां है, जहां हमने समाज के लिए जरूरी सुधारों को नहीं अपनाया है। लेकिन मौजूदा समय निश्चित रूप से अलग दिख रहा है। संस्थान और कॉरपोरेशंस साफ तौर पर जवाब दे रहे हैं। बेशक, सरकारें उलझन में दिख रही हैं, लेकिन उम्मीद है कि हम आने वाले चुनावों में प्रभावी बदलाव देखें। ऐसा इसलिए है क्योंकि दुनिया के कुछ हिस्सों में, जहां नस्लवाद की वजह से सत्ता असंतुलन है, कुछ-कुछ वैसा ही दुनिया के अन्य हिस्सों में भी देखा जा रहा है। नस्लवाद की तर्ज पर ही सत्ता कई जगहों पर जातिवाद, वर्गवाद, लिंगवाद आदि का इस्तेमाल कर रही हैं। मैंने अपनी किताब, “सुपीरियर” में जाति का जिक्र किया है। नस्ल की तरह ही जाति को लेकर भी समाज में पूर्वाग्रह की जड़ें गहरी हैं। मुझे कोई संदेह नहीं है कि यह पूर्वाग्रह भारत में भी नस्लवाद की तरह ही भूमिका निभाता है, जिसे हम भारतीय समाज में लोगों के साथ हर दिन होने वाले व्यवहार के रूप में देखते हैं।
उदाहरण के लिए, अश्वेत अमेरिकियों की जीवन प्रत्याशा श्वेत अमेरिकियों की तुलना में कम है, क्योंकि उनके उत्पीड़न का एक लंबा इतिहास है, जो उनके स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता हैं। मैं ब्रिटेन में रहती हूं। यहां भारतीय मूल के डॉक्टर अन्य ब्रिटिश डॉक्टरों की तुलना में बड़ी संख्या में मर रहे हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि वे आनुवांशिक रूप से भिन्न हैं, बल्कि वे कई तरह के नस्लीय भेदभाव को झेलते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है। हम पैदाइशी अलग नहीं होते हैं, हमें समाज अलग बना देता है।
कुछ लोगों का जीवन दूसरों की तुलना में तुच्छ माना जाता है। यहां, घोर-दक्षिणपंथी हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि समाज में जो नस्लीय असमानताएं हैं, वे ऐतिहासिक कारकों से नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से मौजूद हैं। यही कारण है कि वे 19वीं शताब्दी की पुरानी लाइन को आगे बढ़ाते रहे हैं, जो कहती है कि नस्ल जैविक वास्तविकता है। मुख्यधारा का विज्ञान उनके पक्ष में नहीं है। लेकिन घोर-दक्षिणपंथी अविश्वसनीय रूप से चालाक और धूर्त हैं और साथ ही ऑनलाइन मीडिया पर काफी सक्रिय भी हैं। सोशल मीडिया पर इन लोगों से अगर आमना-सामना हो जाए, तो मेरी सलाह है कि उनकी उपेक्षा करें। ये उनकी रणनीति है कि ऑनलाइन मीडिया पर इस पर बहस हो और ये भ्रम पैदा हो कि इन मुद्दों पर वैज्ञानिक बहस जारी है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है।
सच्चाई यह है कि विज्ञान हर दिन इस मूल तथ्य की पुष्टि कर रहा है कि हम एक ही मानव प्रजाति हैं। हम किसी भी अन्य प्रजाति की तुलना में अधिक समरूप हैं। यहां तक कि कुछ समुदायों को, जिन्हें कभी भौगोलिक और सांस्कृतिक अलगाव के कारण, आनुवांशिक रूप से अलग माना जाता था, उन्हें भी अब अलग नहीं माना जाता है। लेकिन इन तथ्यों का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक हम अपने दिमाग में भरे पूर्वाग्रहों से आगे नहीं बढ़ जाते हैं। नस्ल और जाति सामाजिक आविष्कार थे। हम एक-दूसरे के बारे में क्या और कैसे सोचते हैं, इस पर इन सामाजिक मान्यताओं का गहरा प्रभाव है। लेकिन, यह वक्त सत्य को जानने-समझने और मानने का है। ये ऐसा सच है, जिसके जरिए हम अपनी उस सोच को ठीक कर सकते हैं, जो हमें अन्य को देखने-समझने का रास्ता बता सकती है और हमारी पूर्व-निर्धारित धारणाओं को दुरुस्त कर सकती है।
(लेखक ब्रिटिश साइंस जर्नलिस्ट और “सुपीरियर: द रिटर्न ऑफ रेस साइंस” की लेखक हैं)(downtoearth)
- Bhagirath Srivas
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रहने वाले 39 साल के जुगल किशोर शर्मा 27 अप्रैल 2020 को जब कोरोनावायरस (कोविड-19) से जंग जीतकर अस्पताल से निकले, तब उनके हाथ में गुलाब का फूल और चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। उनकी खुशी लाजिमी थी क्योंकि वह भोपाल के उन पांच शुरुआती लोगों में से एक थे जो जानलेवा वायरस के संक्रमण से सबसे पहले उबरे थे। 3 अप्रैल को वह कोरोना संक्रमित पाए गए थे। तब उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया था, “यह वायरस उतना डरावना नहीं है, जितना हम इसे समझते हैं। जरूरत पड़ने पर मुझे 18 घंटे तक ऑक्सीजन दी गई। मैंने खूब पानी किया और डॉक्टरों ने लक्षणों के आधार पर मेरा इलाज किया जिससे मैं रिकवर हो गया।”
तब से अब तक करीब चार महीने का वक्त गुजर चुका है। डाउन टू अर्थ ने अगस्त में जब उनकी स्थिति जानने के लिए दोबारा संपर्क साधा तब पता चला कि उनकी परेशानियां खत्म नहीं हुई हैं। रिकवरी के बाद उन्हें थकान और कमजोरी की शिकायत थी जो अब तक बरकरार है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्हें लगा था कि कुछ दिनों बाद ये परेशानियां खत्म हो जाएंगी लेकिन वह गलत निकले। अब उन्हें लगता है कि इनके साथ ही जीना पड़ेगा। अपना अनुभव साझा करते हुए वह बताते हैं, “कोरोनावायरस ने मेरे फेफड़ों पर गहरा असर डाला है। वायरस ने फेफड़ों को इतना नुकसान पहुंचा दिया कि थोड़ा ज्यादा चलने पर हांफने लगता हूं।” उन्हें आशंका है कि वह भविष्य में अस्थमा का शिकार हो सकते हैं। जुगल ने रिकवरी के बाद चार बार फेफड़ों का एक्सरे कराया है। हर एक्सरे में फेफड़ों को हुआ नुकसान साफ दिख रहा है।
दिल्ली के पांडव नगर में रहने वाले 34 साल के चंदन कुमार भी जुगल किशोर शर्मा की तरह कोरोनावायरस से संक्रमित होने के बाद चिकित्सीय भाषा में रिकवर तो हो गए लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं हुए हैं। चंदन कुमार को जीवन में कभी सिरदर्द नहीं हुआ था लेकिन संक्रमण के बाद असामान्य ढंग से उन्हें कभी-कभी अचानक तेज सिरदर्द होने लगता है। यह दर्द भी एक जगह नहीं बल्कि सिर के अलग-अलग हिस्सों में होता है। संक्रमण से पहले चंदन चार से पांच मंजिल तक आसानी से सीढ़ियां चढ़ लेते थे लेकिन अब दूसरी मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते उनकी सांस फूलने लगती है। रात को सोने के दौरान भी सांसों के अचानक उतार-चढ़ाव से वह परेशान हो उठते हैं। चंदन बताते हैं,“कभी-कभी चलते वक्त लगता है कि चक्कर खाकर गिर पडूंगा। हमेशा कमजोरी और थकान महसूस होती है।” चंदन के सास, ससुर और साले भी संक्रमण के बाद रिकवर हुए हैं। वह बताते हैं कि सास और ससुर की सूंघने की क्षमता अब भी नहीं लौटी है। चंदन 28 जून को बुखार, सूखी खांसी और सिरदर्द के लक्षणों साथ बीमार हुए थे। 8 जुलाई को उन्होंने टेस्ट कराया और एक दिन बाद आई रिपोर्ट में वह संक्रमित पाए गए। चंदन बताते हैं कि उन्हें हल्के लक्षण थे, लिहाजा डॉक्टर ने घर पर ही आइसोलेशन में रहने की सलाह दी। इस दौरान बुखार और मल्टीविटामिंस की दवा खाते रहे। 25 जुलाई को फिर जांच कराई तो रिपोर्ट नेगेटिव आई। चंदन को कोरोनावायरस के संक्रमण के दौरान इतनी परेशानी नहीं हुई, जितनी रिकवरी के बाद हो रही है। उन्हें उम्मीद है कि एक-दो महीने का वक्त गुजरने के साथ उनकी समस्याएं खत्म हो जाएंगी।
लेकिन क्या चंदन दो महीने बाद परेशानियों से उबर जाएंगे? यह दावा के साथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि बहुत से लोग तीन से चार महीने बाद भी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हैं। उदाहरण के लिए एक समाचार चैनल में काम करने वाले अवनीश चौधरी को ही लीजिए। शुरुआत में उन्हें भी चंदन की तरह लगता था कि कोरोनावायरस के कारण उनके शरीर में आई कमजोरी और थकान की समस्या कुछ दिनों के लिए है। अवनीश को कोरोनावायरस से उबरे तीन महीने से ज्यादा हो गए हैं लेकिन समस्याएं जस की तस हैं। अवनीश को भी चलते या सीढ़ियां चढ़ते वक्त सांस फूलने की समस्या हो रही है। वह डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि रात को सोते समय पीठ के बल लेटने पर सांस लेने में अचानक तकलीफ होने लगती है। सांसों का टूटना और जल्दी-जल्दी चलना अब सामान्य होता जा रहा है। वह अब यह मानकर चल रहे हैं कि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहेगी। अवनीश ने भी चंदन की तरह रिपोर्ट पॉजिटिव आने पर खुद को घर में आइसोलेट कर लिया था। रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद दोनों का डॉक्टर से संपर्क टूट गया।
चंदन और अवनीश से उलट कोरोनावायरस से उबरे ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने एक बार कोविड-19 पॉजिटिव आने के बाद दोबारा जांच नहीं कराई और लक्षण खत्म होने पर खुद को रिकवर मान लिया। इनमें से बहुत से लोगों ने डॉक्टरों की सलाह पर ही दोबारा जांच नहीं कराई। उदाहरण के लिए, दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में रहने वाली 38 वर्षीय शिक्षिका सुशीला ने 7 जून को टेस्ट कराया था। तीन दिन बाद उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई। इसके बाद डॉक्टर ने उन्हें जांच कराने से मना कर दिया और उन्होंने 15 दिन बाद मान लिया कि वह संक्रमण से मुक्त हो गई हैं। उनके परिवार के किसी अन्य सदस्य की भी जांच नहीं हुई। डॉक्टर ने उन्हें भले ही कोरोना से रिकवर बता दिया लेकिन अब वह एक अजीब किस्म की समस्या से जूझ रही हैं। उन्हें अचानक घबराहट होने लगती है और दिल की धड़कन अप्रत्याशित रूप से तेज हो जाती है। कई बार यह धड़कन इतनी तेज होती है कि उन्हें लगता है कलेजा सीने से बाहर न निकल जाए। सुशीला बताती हैं कि कोरोनावायरस से संक्रमित होने से पहले दिल का इतना तेज धड़कना दुर्लभ था लेकिन संक्रमण के बाद हफ्ते में एक-दो बार ऐसा नियमित हो जाता है। उन्हें हैरानी तब होती है जब चेक करने पर धड़कन सामान्य आती है।
सुशीला की तरह दिल्ली के मयूर विहार, फेज-3 में रहने वाली 35 वर्षीय पूनम बिष्ट के परिवार के सभी छह सदस्य कोरोनावायरस के संक्रमण से दो महीने पहले मुक्त हुए हैं। पूनम के ससुर के अलावा घर के किसी भी सदस्य की जांच नहीं हुई। परिवार के सभी सदस्यों में लक्षण आने पर डॉक्टर ने उन्हें संक्रमित मान लिया और जून के आखिर में लक्षण समाप्त होने पर उन्होंने परिवार को कोरोना मुक्त समझ लिया। अन्य लोगों की तरह पूनम और उनके परिवार के सदस्यों को अब भी कोई न कोई समस्या बनी हुई है। पूनम अस्थमा की मरीज हैं। लक्षण समाप्त होने के बाद उन्हें लगा था कि सब ठीक हो गया है। लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने महसूस किया कि उनकी सूंघने की क्षमता अब भी पूरी तरह से नहीं लौटी है। उन्हें अक्सर थकान महसूस होती है और एसी में रहने पर सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। उनके 63 वर्षीय ससुर को अब भी हल्की खांसी है। सास-ससुर दोनों कमजोरी महसूस करते हैं।
उपरोक्त मामले बताते हैं कि कोरोना से होने वाली रिकवरी को भले ही हम उपलब्धि समझकर खुश हो लें लेकिन सभी रिकवर मरीजों को स्वस्थ मान लेना बड़ी भूल है। भारत में 19 अगस्त 2020 तक 21 लाख से अधिक लोग रिकवर हो चुके थे और रिकवरी की दर करीब 72 प्रतिशत पहुंच चुकी थी। राजधानी दिल्ली में जहां मई-जून को कोरोना संक्रमितों के मामले तेजी से बढ़ रहे थे, वहां जुलाई और अगस्त में सुधरी रिकवरी के बूते ही हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं। राजधानी में रिकवरी दर करीब 90 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इसका अर्थ है कि राज्य में 19 अगस्त तक आए 1,56,139 मामलों में करीब 1,40,767 संक्रमित रिकवर हो चुके हैं। वैश्विक स्तर पर सामने आए करीब सवा दो करोड़ मामलों में डेढ़ करोड़ संक्रमित रिकवर हो चुके हैं (देखें, रिकवरी बनाम संक्रमण, पेज 14)। ये आंकड़े बताते हैं कि रिकवर होने वाले लोगों की संख्या मामूली नहीं है। अगर इनमें से 10-15 प्रतिशत लोगों की तकलीफों में भी इजाफा होता है तो इनकी कुल संख्या लाखों में होगी, इसलिए ऐसे लोगों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
केंद्र सरकार भी इस तथ्य को स्वीकार करती है। यही वजह है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी राजेश भूषण ने दिल्ली में मीडिया के सामने माना “कुछ रिकवर मरीजों को सांस, हृदय, लिवर और आंखों से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं। हमारे विशेषज्ञ लोगों के मार्गदर्शन के लिए काम कर रहे हैं। वे पता लगा रहे हैं कि दीर्घकाल में लोगों की किस तरह की देखभाल की जरूरत है और वे भविष्य में किस प्रकार की समस्याओं का सामना कर सकते हैं।” नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल ने भी 18 अगस्त को बताया, “बीमारी का एक नया पहलू सामने आ रहा है। वैज्ञानिक और चिकित्सा समुदाय की इस पर नजर है। हम सभी को सचेत रहना होगा कि बाद में भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। जैसे-जैसे हम इसे अधिक समझेंगे, वैसे-वैसे हम इसके बारे में अधिक बता पाएंगे।”
स्त्रोत: साइंस ऑफ द टोटल एनवायरमेंट जर्नल में प्रकाशित “फॉलोअप स्टडीज इन कोविड-19 रिकवर्ड पेशेंट्स - इज इट मेंडेटरी” अध्ययन
चिंता में डालते अध्ययन
दुनियाभर में इस वक्त ज्यादातर देशों का ध्यान संक्रमण रोकने और मरीजों की जान बचाने पर केंद्रित है। रिकवर मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर देखना अभी संभव नहीं हो रहा है। इस संबंध में हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि रिकवर हुए मरीजों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आगे चलकर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। दरअसल, बहुत से लोगों की रिकवरी के बाद हृदय, फेफड़ों, मस्तिष्क, लीवर आदि में विभिन्न तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं (देखें, अंगों पर असर,)।
जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जामा) कार्डियोलॉजी में 27 जुलाई, 2020 को प्रकाशित यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल फ्रैंकफर्ट के अध्ययन में रिकवरी के बाद होने वाली हृदय की परेशानियों पर रोशनी डाली गई है। जर्मनी में कोरोनावायरस से रिकवर हुए लोगों पर किया गया यह अध्ययन बताता है कि सीएमआर (कार्डियक मैग्नेटिक रेजोनेंस) जांच में कोविड-19 से रिकवर हुए 100 में से 78 लोगों के हृदय में संरचनात्मक परिवर्तन और 60 प्रतिशत लोगों में मायोकार्डियल यानी हृदयघात के लक्षण पाए गए। अध्ययन बताता है कि कोविड-19 हृदय तंत्र पर गहरा असर डालता है। यह वायरस पहले से हृदय की समस्याओं से जूझ रहे लोगों में हार्ट फेल की समस्या को काफी गंभीर कर सकता है। अध्ययन में शामिल 100 लोगों में 67 असिंप्टोमैटिक और हल्के लक्षण वाले थे और घर में ही रिकवर हुए थे। शेष 23 लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। जामा का अध्ययन बताता है कि कोविड-19 के कारण लंबे समय तक रक्त प्रवाह को सुचारू रखने की हृदय की क्षमता घट सकती है।
ब्रिटेन स्थित एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के डॉक्टरों का विश्लेषण भी इसी तरह के निष्कर्ष पर पहुंचता है। डॉक्टरों ने 69 देशों के 1,200 मरीजों की अल्ट्रासाउंड (एकोकार्डियोग्राम) जांच की और पाया कि 55 प्रतिशत लोगों के हृदय में गंभीर गड़बड़ियां हैं। जांच में एक तिहाई से अधिक लोगों के हृदय के दो मुख्य चैंबरों (वेंट्रिकल्स) में क्षति पाई गई। इसके अलावा तीन प्रतिशत लोगों ने हृदयाघात और अन्य तीन प्रतिशत लोगों ने हृदय की कोशिकाओं में जलन की शिकायत की। इसी दौरान एक अन्य अध्ययन भी हुआ है जिसमें कोविड-19 से मारे गए 39 लोगों की ऑटोप्सी जांच की गई। इन लोगों की औसत आयु 85 साल थी। जांच में पाया गया कि 24 मृतकों के हृदय में बड़ी मात्रा में वायरस मौजूद हैं।
नेचर रिव्यू कार्डियोलॉजी में मार्च 2020 को प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, सार्स सीओवी-2 (कोविड-19) और एमईआरएस सीओवी (मिडिल ईस्ट रेस्पिटेरटी सिंड्रोम कोरोनावायरस) में काफी समानता है। अध्ययन बताता है कि इन वायरस के संक्रमण से नि:संदेह मायोकार्डियल को क्षति पहुंचती है और मरीज को उबरने में दिक्कत होती है। इसके अनुसार, वुहान में कोविड-19 से संक्रमित पाए गए शुरुआती 41 में से 5 लोगों के हृदय को गंभीर नुकसान पहुंचा। हृदय के अलावा कोविड-19 फेफड़ों को भी स्थायी क्षति पहुंचा सकता है। अमेरिकन लंग असोसिएशन के एमडी व मुख्य चिकित्सा अधिकारी अलबर्ट लिज्जो के अनुसार, हलके लक्षण वाले मरीजों के फेफड़े तो संक्रमण से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं लेकिन जिन मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया गया है अथवा जिनके वेंटीलेटर पर पहुंचने की नौबत आई है, उनके फेफड़ों को पहुंचा नुकसान स्थायी हो सकता है। इसकी प्रबल आशंका है कि ऐसे लोगों के फेफड़ों पहले की तरह काम न कर पाएं। फेफड़ों को पहुंचा स्थायी नुकसान फाइब्रोसिस कहलाता है। उनका मानना है कि वायरस से दीर्घकाल में स्वास्थ्य को होने वाली परेशानियां जीवन की गुणवत्ता पर असर डाल सकती हैं।
कोविड-19 केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) को भी बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। यह वायरस नाक के रास्ते दाखिल होकर दिमाग में मौजूद आल्फैक्टरी बल्ब में पहुंचकर संक्रमण फैला सकता है। यही वजह है कि संक्रमण के बाद संूघने और स्वाद की क्षमता प्रभावित हो जाती है। साथ ही सिरदर्द जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसके अलावा सीएनएस में इस वायरस की मौजूदगी का असर मानसिक विकार के रूप में देखा जा सकता है। अमेरिका में कोविड-19 से संक्रमित पाई गई एक 50 वर्षीय महिला के सीटी स्कैन से पता चला कि उसके मस्तिष्क की नसों में रिसाव आ गया है। एक 74 वर्षीय संक्रमित पुरुष में भी मानसिक विकार देखे गए। पार्किंसन और फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित यह शख्य कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद बोलने की क्षमता खो बैठा। यह भी देखा गया है कि कोविड-19 से रिकवर होने वाले अधिकांश मरीज कुछ हफ्तों तक तनाव महसूस करते हैं। आमतौर पर कुछ समय पर बाद यह तनाव खत्म हो जाता है लेकिन अवसाद, डर और घबराहट जैसे मनोवैज्ञानिक लक्षण लंबे समय तक बने रहते हैं।
न्यूरोसाइकोफार्माकोलाॅजी जर्नल में 13 अगस्त 2020 को प्रकाशित डेनिज वेतेनसेवर, शोयन वॉन्ग और बार्बरा जैकलीन सहाकियन का शोधपत्र बताता है कि कोिवड-19 महामारी में अवसाद से संबंधित विकारों में सुनामी लाने की क्षमता है। अपनों को खोने की चिंता, असहायता और वायरस के संपर्क मंे आने के डर से बड़ी संख्या मंे लोग अवसाद, बेचैनी से घिर सकते हैं और उनके मन में खुदखुशी के विचार आ सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, महामारी से आए अकेलेपन और चिंताओं के कारण ब्रेन केमिस्ट्री में बदलाव आ सकता है जो मूड डिसऑर्डर का कारण बन सकता है। दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेस (इहबास) में मनोचिकित्सक व सहायक प्रोफेसर ओमप्रकाश ने डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “हमारी नजर में ऐसे मामले आ रहे हैं जिनमें कोविड-19 का दिमाग पर असर देखा जा रहा है। अधिकांश लोगों को एंजाइटी प्रॉब्लम है। उनके दिमाग मंे एक अलग तरह की बेचैनी है।”
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) से संबद्ध चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (एनआईई) के वैज्ञानिक तरुण भटनागर ने डाउन टू अर्थ से बातचीत में स्वीकार किया कि कोविड-19 से रिकवरी के बाद लोगों की कई तरह की परेशानियां आ रही हैं। वह मानते हैं कि रिकवरी के बाद थकान, सिरदर्द और सांसों का फूलना बहुत आम है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में फेफड़ों में बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। वह कहते हैं कि अभी यह कह पाना मुश्किल है कि कोविड-19 से संक्रमितों की पूर्ण रिकवरी कब तक होगी।
भटनागर के अनुसार, “कई तरह की परेशानियों के चलते बहुत से लोग रिकवरी के बाद पहले जितनी सक्रियता से काम नहीं कर पा रहे हैं। रिकवर हुए लोगों के आंकड़ों को जुटाकर उनका व्यापक विश्लेषण जरूरी है। विदेशों में कुछ अध्ययन जरूर हुए हैं लेकिन अभी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस संबंध में कोई अध्ययन नहीं हुआ है। लोगों की परेशानियों को देखते हुए इसकी शीघ्र जरूरत है।” भटनागर मानते हैं कि गंभीर संक्रमण के मामलों में फाइब्रोसिस का खतरा है। डब्ल्यूएचओ की प्रमुख वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने 12 अगस्त को एक समाचार चैनल में स्वीकार किया कि रिकवर लोगों को स्वास्थ्य से संबंधित तरह-तरह की परेशानियां आ रही हैं। उन्हांेने ऐसे लोगों पर ध्यान देने की जरूरत पर जोर िदया।
खत्म होती एंटीबॉडी, नया खतरा
नेचर मेडिसिन में 18 जून 2020 को प्रकाशित एक शोधपत्र बताता है कि कोविड-19 से संक्रमित मरीजों की एंटीबॉडी दो से तीन महीने में क्षीण हो रही है। चीन में हुए इस शोध में 37 सिंप्टोमैटिक और 37 असिंप्टोमैटिक मरीजों का अध्ययन किया गया। अध्ययन के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि 90 प्रतिशत मरीजों की इम्युनोग्लोबुलिन जी (आईजीजी) एंटीबॉडी 2-3 महीने में तेजी से कम हो गई। इसका सीधा सा मतलब है कि एक बार एंटीबॉडी विकसित होने का यह कतई मतलब नहीं है कि फिर से संक्रमण नहीं हो सकता। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं जिनमें लोग रिकवरी के बाद भी दोबारा संक्रमित हुए हैं। उत्तर प्रदेश में कोरोना का हॉटस्पॉट बन चुके कानपुर में 45 साल का व्यक्ति एक महीने में दूसरी बार कोरोना संक्रमित पाया गया। 17 जुलाई को उसकी रिपोर्ट नेगेटिव आने पर उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी लेकिन 3 अगस्त को फिर से तबीयत खराब होने पर जांच हुई तो रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई।
सफदरजंग अस्पताल में यूरोलॉजी, रोबोटिक्ट एवं रेनल ट्रांसप्लांट विभाग के प्रमुख (एचओडी) अनूप कुमार डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “मेरी जानकारी में कोविड-19 के कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जिनकी रिपोर्ट कुछ समय बाद फिर से पॉजिटिव आई है। कुछ लोगों को फिर से पुराने और नए लक्षण उभर रहे हैं। इसकी दो वजह हो सकती हैं। पहला कमजोर इम्युनिटी और दूसरी रिपोर्ट में विसंगति।”
इम्युनिटी के संबंध में तो डब्ल्यूएचओ ने अप्रैल 2020 में ही कह दिया था कि संक्रमण न तो इम्युनिटी का पासपोर्ट है और न ही चिंताओं के खत्म होने की वजह। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि एंटीबॉडी से दोबारा संक्रमण नहीं होगा। देश के अलग-अलग हिस्सों में फिर से रहे संक्रमण के मामले डब्ल्यूएचओ की बातों को पुष्ट करते हैं। कोविड-19 पर शोध करने वाले यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया के भौतिक वैज्ञानिक विलियम पेट्री कहते हैं, “एक अनुत्तरित प्रश्न यह है कि रिकवर हुए लोगों में कितने समय तक वायरस छुपा रह सकता है।
अगर यह वायरस व्यक्ति के अंदर मौजूद रहा तो देर सवेर रिकवरी के बाद भी लक्षण दिख सकते हैं और वह दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है।” छोटे स्तर पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि कोरोनावायरस ऐसे अंगों में भी पाया गया है जो पहले इम्यून हो गए थे।
फॉलोअप जरूरी
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, कोविड-19 से मृत्युदर 3-5 प्रतिशत के बीच है। इसका अर्थ है कि शेष 95 से 97 प्रतिशत लोगों को देर सवेर रिकवर हो जाएंगे। रिसर्चर मानते हैं कि हलके लक्षणों से रिकवर हुए आधे लोग अपने तंत्र में वायरस को कैरी कर सकते हैं। ऐसे में अगर इन लोगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वायरस को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि विशेषज्ञ रिकवरी के बाद भी लगातार फॉलोअप और जांच की सलाह देते हैं (देखें, समाज की भलाई के लिए जरूरी है कोविड-19 से रिकवर मरीजों का लंबा निरीक्षण, पेज 15)। अनूप कुमार बताते हैं कि संक्रमितों को डिस्चार्ज करने के बाद हम एक महीने तक तो उनका फॉलोअप करते हैं। घर में रिकवर होने वाले मरीजों के साथ भी ऐसा होता है लेकिन एक महीने बाद उनकी निगरानी नहीं हो पाती। वह मानते हैं कि रिकवरी के बाद लंबे समय तक फॉलोअप जरूरी है। विशेषकर किडनी, लिवर, हृदय और मधुमेह से पीड़ित अधिक जोखिम वाले मरीजों की कम से कम तीन महीने तक गहन निगरानी आवश्यक है। बहुत से लोग रिकवरी के बाद परेशानियों के बाद भी डॉक्टर से संपर्क नहीं करते। ऐसे लोगों को समझाने की जरूरत है कि वे तुरंत डॉक्टर से संपर्क नहीं करेंगे तो आगे चलकर उनकी तकलीफें काफी बढ़ सकती हैं।
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) के अध्यक्ष श्रीनाथ रेड्डी बताते हैं कि वायरस शरीर के इम्युनोलॉजी रिएक्शन पर असर डालता है, लेकिन यह शरीर के अंगों को कितना नुकसान पहुंचा सकता है, यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यह संक्रमित की उम्र के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। इस पर अधिक स्पष्टता के लिए जरूरी है कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद व्यापक अध्ययन कराए। रेड्डी संक्रमण से रिकवर होने वाले मरीजों की गहन निगरानी पर जोर देते हैं। इससे मरीज से सामाजिक रूप से जुड़े लोगों को भी पता चल जाएगा कि उनका दोस्त या परिवार का सदस्य खतरे में नहीं है।
साइंस ऑफ द टोटल एनवायरमेंट जर्नल में प्रकाशित अध्ययन “फॉलोअप स्टडीज इन कोविड-19 रिकवर्ड पेशेंट्स- इज इट मेंडेटरी” बताता है, “अगर कुछ समय बाद कोविड-19 से रिकवर हुए मरीजों की बीमारियों में उछाल आता है तो स्वास्थ्य तंत्र पर अचानक बोझ बढ़ेगा जिससे वह चरमरा सकता है। इसलिए नियमित अंतराल पर रिकवर मरीजों की देखभाल जरूरी है। इससे भविष्य में होने वाले बहुत से खतरों से भी बचा जा सकता है। साथ ही यह बेहतर टीके का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।”
श्रीनाथ रेड्डी चेताते हैं कि हमें रिकवर हुए मरीजों पर सावधानी से ध्यान देने की जरूरत है। उनका कहना है, “हम यह पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं कि रिकवर हुए मरीज कैसा व्यवहार करते हैं। जामा में प्रकाशित हुआ जर्मन शोध बताता है कि युवा लोगों में भी रिकवरी के बाद हृदय में संक्रमण की समस्या आ रही है। यह हमारी समझ को विकसित करने के लिए महज शुरुआत भर है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि असिंप्टोमैटिक सहित सभी रिकवर हुए मरीज पूरी तरह रिकवर हो चुके हैं।”(downtoearth)
यह चौंकाने वाला है कि कोरोनावायरस के इस महत्वपूर्ण क्षण में डोनाल्ड ट्रम्प नेतृत्व कर रहे हैं। कोरोनोवायरस काफी गंभीर है। लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि दो और बहुत बड़े खतरे हैं, जो मानव इतिहास में घटित होने वाली किसी भी घटनाओं से कहीं ज्यादा बदतर हैं। एक परमाणु युद्ध का बढ़ता खतरा और दूसरा ग्लोबल वार्मिंग जैसा वैश्विक खतरा। ये दोनों खतरे बढ़ते जा रहे हैं। कोरोनावायरस भयानक है और इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं, लेकिन हम इससे उबर जाएंगे। जबकि अन्य दो खतरों से उबर पाना नामुमकिन होगा। इनसे सब कुछ तहस-नहस हो जाएगा।
अमेरिका के पास असीम ताकत है। यह एकमात्र ऐसा देश है, जो ईरान और क्यूबा जैसे अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाता है, तब बाकी के देश उसका अनुसरण करते हैं। यूरोप भी अमेरिका का अनुसरण करता है। ये देश अमेरिकी प्रतिबंधों से पीड़ित हैं, लेकिन आज के वायरस संकट की सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि क्यूबा, यूरोप की मदद कर रहा है। जर्मनी ग्रीस की मदद नहीं कर सकता, लेकिन क्यूबा यूरोपीय देशों की मदद कर सकता है। भूमध्यसागर क्षेत्र में हजारों प्रवासियों और शरणार्थियों की मौतों के मद्देनजर इस समय पश्चिम की सभ्यता का संकट विनाशकारी है।
युद्ध के वक्त की जाने वाली बयानबाजी का आज कुछ महत्व है। अगर हम इस संकट से निपटना चाहते हैं, तो हमें युद्ध के समय की जाने वाली लामबंदी की तरफ देखना होगा, उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के लिए अमेरिका की वित्तीय लामबंदी (वित्त जुटाने की विभिन्न योजनाएं)। द्वितीय विश्व युद्ध ने देश को कर्ज में डाल दिया था और अमेरिकी विनिर्माण को चौपट कर दिया था। लेकिन, वित्तीय लामबन्दी ने आगे विकास को आगे बढ़ाया। इस अल्पकालिक संकट को दूर करने के लिए हमें उसी मानसिकता की आवश्यकता है और अमीर देश ऐसा कर सकते हैं। एक सभ्य दुनिया में, अमीर देश, दूसरे देशों का गला घोंटने के बजाय सहायता देते हैं। कोरोनावायरस संकट लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर कर सकता है कि हम किस तरह की दुनिया चाहते हैं।
इस संकट की उत्पत्ति बाजार की विफलता और नव-आर्थिक नीतियों का भी नतीजा है, जिसने गहरी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया है और तीव्र किया है। यह लंबे समय से पता था कि सार्स महामारी कुछ बदलाव के साथ कोरोनावायरस के रूप में आ सकती है। अमीर देश संभावित कोरोनावायरस के लिए टीका बनाने का काम कर सकते थे और कुछ संशोधनों के साथ आज ये हमारे पास उपलब्ध होता। बड़ी दवा कंपनियों की निरंकुशता जगजाहिर है। उन पर लगाम लगा पाना पाना सरकार के लिए कठिन है। ऐसे में लोगों को विनाश से बचाने के लिए एक वैक्सीन (टीका) खोजने की तुलना में नई बॉडी क्रीम बनाना अधिक लाभदायक है। पोलियो का खतरा सरकारी संस्थान द्वारा बनाए गए साल्क टीके से खत्म हो गया। इसका कोई पेटेंट नहीं था। यह काम इस समय किया जा सकता था, लेकिन नवउदारवादी आफत ने इस काम को होने नहीं दिया।
हमने ध्यान नहीं दिया
अक्टूबर 2019 में ही अमेरिका को कोरोना जैसी संभावित महामारी की आशंका थी। हमने इस पर ध्यान नहीं दिया। 31 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को निमोनिया के बारे में सूचित किया और एक हफ्ते बाद चीनी वैज्ञानिकों ने इसे कोरोनावायरस के रूप में पहचाना। फिर इसकी जानकारी दुनिया को दी गई। इस इलाके के देशों जैसे, चीन, दक्षिण कोरिया, ताइवान ने कुछ-कुछ काम करना शुरू कर दिया और ऐसा लगता है कि संकट को बहुत अधिक बढ़ने से रोक लिया। यूरोप में भी कुछ हद तक यही हुआ। जर्मनी के पास एक विश्वसनीय अस्पताल प्रणाली है और वह दूसरों की मदद किए बिना अपने हित में काम करने में सक्षम था। अन्य देशों ने इसे अनदेखा कर दिया। सबसे खराब रवैया रहा ब्रिटेन और अमेरिका का।
दुनिया के आगे दो बड़े खतरे हैं। एक है परमाणु युद्ध का बढ़ता खतरा और दूसरा ग्लोबल वार्मिंग जैसा वैश्विक खतरा। ये दोनों खतरे बढ़ते जा रहे हैं
जब हम किसी तरह इस संकट से उबर जाएंगे, तब हमारे पास जो विकल्प मौजूद होगा वह अधिक अधिनायकवादी व क्रूर राज्यों की स्थापना के रूप में देखा जा सकता है या फिर पहले के मुकाबले अधिक मानवीय समाज का पुनर्निर्माण भी संभव है। एक ऐसा समाज जो निजी लाभ के बजाय मानवीय आवश्यकताओं को वरीयता दे। इस बात की संभावना है कि लोग संगठित होंगे, एक बहुत बेहतर दुनिया बनाने के लिए काम करेंगे। लेकिन वे भारी-भरकम समस्याओं का सामना तब भी करेंगे, जैसे हम आज परमाणु युद्ध की आशंका का सामना कर रहे हैं। पर्यावरणीय तबाही की समस्याएं भी होंगी, जिसकी अंतिम सीमा छूने के बाद शायद ही हम कभी उबर पाएं। इसलिए, जरूरी है कि इन समस्याओं को लेकर हम निर्णायक रूप से कार्य करें। इसलिए यह मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण क्षण है। न केवल कोरोनावायरस की वजह से, जो दुनिया की खामियों के बारे में जागरुकता ला रहा है, बल्कि पूरे सामाजिक-आर्थिक प्रणाली की गहरी त्रुटियों के बारे में भी हमें इस वक्त पता चल रहा है। अगर हमें जीवन जीने लायक भविष्य चाहिए तो मौजूदा हालात को बदलना ही होगा। कोरोना संकट चेतावनी संकेत हो सकता है और आज इससे निपटने या इसके विस्फोट को रोकने के लिए एक सबक हो सकता है। लेकिन हमें इसकी जड़ों के बारे में भी सोचना है, जो हमें आगे और अधिक बदतर हाल में ले जा सकते हैं।
आज 2 बिलियन से अधिक लोग क्वारंटाइन (संगरोध) में है। सामाजिक अलगाव का एक रूप वर्षों से मौजूद है और बहुत ही हानिकारक है। आज हम वास्तविक सामाजिक अलगाव की स्थिति में हैं। किसी भी तरह, फिर से सामाजिक बंधनों के निर्माण के जरिए इससे बाहर निकलना होगा, जो जरूरतमंदों की मदद कर सके। इसके लिए उनसे संपर्क करना, संगठन का विकास, विस्तारित विश्लेषण जैसे कार्य करने होंगे। उन लोगों को कार्यशील और सक्रिय बनाने से पहले, भविष्य के लिए योजनाएं बनाना, लोगों को इंटरनेट युग में एक साथ लाना, उनके साथ शामिल होना, परामर्श करना, उन समस्याओं के जवाब जानने के लिए विचार-विमर्श करना, जिसका वे सामना करते हैं, और उन पर काम करना आवश्यक है। यह आमने-सामने का संचार नहीं है, जो मनुष्य के लिए आवश्यक है। लेकिन इसे कुछ समय के लिए आप रोक सकते हैं। अंत में कहा जा सकता है कि अन्य तरीकों की तलाश करें और उसके साथ आगे बढ़ें। उन गतिविधियों का विस्तार और उन्हें गहरा करें। ये संभव है। यह आसान नहीं है। इंसानों ने अतीत में भी कई समस्याओं का सामना किया है।
(सौजन्य: प्रेसेंजा)
- महेन्द्र पांडे
1980 के दशक से पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन लगातार अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा है। हरेक वर्ष बड़े तामझाम के साथ दो-तीन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है, बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं। पर, धरातल पर देखें तो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन लगातार बढ़ता जा रहा है। कोई भी संसाधन असीमित नहीं है, हरेक संसाधन की हरेक वर्ष नवीनीकरण की क्षमता सीमित है। आदर्श स्थिति यह है जब प्राकृतिक संसाधन का जितना वर्ष भर में नवीनीकरण होता है, विश्व की जनसँख्या केवल उतने का ही उपभोग करे, जिससे संसाधनों का विनाश नहीं हो। पर, अब हालत यह हो गयी है कि इस वर्ष यानि 2020 के अंत तक जितने संसाधनों का उपयोग हमें करना था, उतने का उपयोग विश्व की आबादी 22 अगस्त तक ही कर चुकी है।
पूरे वर्ष के संसाधनों का उपभोग मानव जाति जिस दिन कर लेती है, उस दिन को ‘अर्थ ओवरशूट डे’ कहा जाता है, यानि सालभर का कोटा हमने ख़त्म कर दिया और इसके आगे जो उपभोग किया जाएगा उसकी भरपाई प्रकृति कभी नहीं कर पायेगी। पर्यावरण संरक्षण के तमाम दावों के बाद भी साल दर साल ओवरशूट डे पिछले वर्ष तक पहले से जल्दी आ रहा था, पर इस वर्ष कोविड 19 के प्रभाव से जब पूरी दुनिया लगभग बंद हो गई थी, तब यह दिन पिछले वर्ष की तुलना में तीन सप्ताह बाद आया है। इस वर्ष यह दिन 22 अगस्त को आया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। पिछले वर्ष ओवरशूट डे 29 जुलाई को था। इसका सीधा सा मतलब है कि वर्ष 2020 के पूरे वर्ष में जितने संसाधनों का उपयोग करना था, उतना कोविड 19 की महामारी के बाद भी हम 22 अगस्त तक कर चुके हैं। हमारे पास एक ही पृथ्वी है, पर हमारे संसाधनों के उपभोग की दर के अनुसार हमें 1.6 पृथ्वी की जरूरत है।
ओवरशूट डे का निर्धारण ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क नामक एक अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान संस्था करता है। यह संस्था 1970 से लगातार इसका निर्धारण कर रही है। साल दर साल प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते दोहन का यह सही प्रमाण है। वर्ष 1970 में ओवरशूट डे 29 दिसम्बर को था, जबकि 1988 में 15 अक्टूबर को, 1998 में 30 सितम्बर को, 2000 में 23 सितम्बर को, और 2008 में यह दिन 15 अगस्त को, 2010 में 7 अगस्त को और 2019 में 29 जुलाई को आया था। वर्ष 2019 में यह पहली बार जुलाई के महीने में आया था, और अनुमान था कि यदि कोविड 19 का कहर नहीं होता तो इस वर्ष यह तारीख 29 जुलाई से पहले आती।
बढ़ती आबादी के साथ साथ खाद्यान्न उत्पादन, धातुओं का खनन, जंगलों का कटना और जीवाश्म इंधनों का उपभोग तेजी से बढ़ रहा है। इससे कुछ हद तक अल्पकालिक जीवन स्तर में सुधार तो आता है, पर दीर्घकालिक परिणाम भयानक हैं। विश्व की कुल भूमि में से एक-तिहाई से अधिक बंजर हो चुकी है, पानी की लगभग हरेक देश में कमी हो रही है, तापमान बढ़ता जा रहा है, जलवायु का मिजाज हरेक जगह बदल रहा है, जैव-विविधता तेजी से कम हो रही है और जंगल नष्ट होते जा रहे हैं। हम प्रकृति से उधार लेकर अर्थव्यवस्था में सुधार ला रहे है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं, हम यह उधार कभी नहीं चुका पायेंगे, पर सभी देश इसे नजरअंदाज करते जा रहे हैं। पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों का विनाश करने पर तुली है, पर यह सब बहुत दिनों तक चलेगा ऐसा लगता नहीं है।
पूंजीवादी व्यवस्था में समय समय पर झटके लगते रहते हैं और आर्थिक मंदी का दौर आता रहता है। आर्थिक मंदी के दौर में औद्योगिक गतिविधियाँ कम होने लगती हैं और तेल तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन में कमी आ जाती है। इस वर्ष कोविड 19 की आपदा ने यह असर दिखाया है। ऐसे वर्षों में यह प्रभाव ओवरशूट डे पर भी पड़ता है। वर्ष 2004-2005 की आर्थिक मंदी के समय ओवरशूट डे 5 दिन आगे खिसक गया था। इसी तरह का असर 1980 और 1990 के दशक की मंदी के समय और 1970 के पेट्रोलियम पदार्थों की कमी के समय देखा गया था। इस वर्ष यह तीन सप्ताह आगे कोविड 19 के असर के कारण चला गया।
ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क के अनुसार आज भी प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित उपभोग को नियंत्रित कर स्थिति कुछ हद तक बेहतर बनायी जा सकती है। वर्तमान में मांस की जितनी खपत है, यदि उसे आधी कर दी जाए तो ओवरशूट डे को पांच दिन आगे किया जा सकता है। भवनों और उद्योगों की दक्षता में सुधार लाकर इसे तीन सप्ताह आगे किया जा सकता है और यदि कुल कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को आधा कर दिया जाए तब ओवरशूट डे तीन महीने आगे चला जाएगा। इस वर्ष भी सबसे अधिक असर ग्रीनहाउस गैसों के कम उत्सर्जन के कारण ही पड़ा है। इस वर्ष अब तक दुनिया में पिछले वर्ष की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन 14.5 प्रतिशत कम रहा है।
ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क के अध्यक्ष मथिस वाच्केर्नागेल के अनुसार वर्ष 2020 में पहली बार पिछले वर्ष की तुलना में तीन सप्ताह का अंतर आया है, और इस वर्ष यह स्तर वर्ष 2006 के पहले के स्तर पर पहुँच गया है। यह अच्छी बात है, पर जाहिर है इस वर्ष यह अंतर कोविड 19 महामारी के कारण है। हम एक ऐसे विश्व की कल्पना कर रहे हैं, जहां प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर कोई आपदा लगाम नहीं लगाए बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था स्वयं सामान्य प्रक्रिया में इन संसाधनों का कम दोहन करे, कम अपशिष्ट उत्पन्न करे और ग्रीनहाउस गैसों का कम उत्सर्जन करे। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो वर्तमान के लिए अपने भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।(navjivan)
-हृदयेश जोशी
राज्य वन विभाग की ताजा रिपोर्ट कहती है कि पूरे उत्तराखंड में पिछले 5 साल में 62% से अधिक बार किंग कोबरा-साइटिंग केवल नैनीताल जिले में ही हुई है.
किंग कोबरा भारत का नेशनल रेप्टाइल है और यह दुनिया का सबसे बड़ा ज़हरीला सांप है.
भारत का नेशनल रेप्टाइल किंग कोबरा देश के कई हिस्सों में पाया जाता है. इनमें रेन-फॉरेस्ट एरिया जैसे भारत के पूर्वी और पश्चिमी घाट, उत्तर-पूर्वी राज्य, सुंदरबन और अंडमान के कुछ इलाके आते हैं. इसके अलावा पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के कुछ जिलों में भी किंग कोबरा यदा-कदा देखा जाता है लेकिन पिछले कुछ सालों में राज्य के एक खास हिस्से में इसकी मौजूदगी अधिक रिकॉर्ड हुई है.
उत्तराखंड के वन विभाग की रिसर्च विंग ने एक रिपोर्ट तैयार की है जिससे ये संकेत मिलते हैं कि उत्तराखंड का नैनीताल जिला किंग कोबरा का गढ़ बन रहा है. रिपोर्ट दावा करती है कि उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से रेन फॉरेस्ट वाले परंपरागत हैबीटाट के बाहर "नैनीताल में संभवत: किंग कोबरा की सबसे अधिक संख्या है.”
जर्मनी की दवा कंपनियों के लोगो और विश्व स्वास्थ्य संगठन के झंडे पर बना सांप का यह निशान दुनिया में सबसे प्रसिद्ध है. यह असल में एस्कुलाप्नाटेर सांप है, जो जहरीला नहीं होता. फिर भी इनका आवास सिकुड़ने और गैर कानूनी व्यापार बढ़ने के कारण इनके अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
नैनीताल में बढ़ती मौजूदगी के प्रमाण!
उत्तराखंड के पांच जिलों में किंग कोबरा के होने के सुबूत मिले हैं. इनमें हर जिले में किंग कोबरा की साइटिंग के आंकड़ों को इस रिपोर्ट में इकट्ठा किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2015 से जुलाई 2020 के बीच पूरे राज्य में किंग कोबरा कुल 132 बार देखा गया. इनमें से 83 बार किंग कोबरा की मौजूदगी नैनीताल जिले में ही रिकॉर्ड की गई जबकि देहरादून में किंग कोबरा को 32 बार देखा गया. इसके अलावा पौड़ी जिले में 12 बार किंग कोबरा दिखा जबकि उत्तरकाशी में सिर्फ 3 और हरिद्वार में तो 2 बार ही इसकी साइटिंग रिकॉर्ड हुई.
वन विभाग के शोधकर्ता हैरान हैं कि आखिर नैनीताल जिले में ही किंग कोबरा की इतनी मौजूदगी कैसे बढ़ रही है. खासतौर से तब जबकि किंग कोबरा एक "कोल्ड ब्लडेड” प्राणी है जिसके लिए वातावरण का बदलता तापमान दुश्वारी पैदा करता है.
इस शोध में कहा गया है कि किंग कोबरा का घोंसला - यह दुनिया का एकमात्र सर्प है जो अंडे देने के लिए घोंसला बनाता है - उत्तराखंड में पहली बार साल 2006 में नैनीताल जिले की भवाली फॉरेस्ट रेंज में दिखा. फिर साल 2012 में मुक्तेश्वर में 2303 मीटर की ऊंचाई में इसका घोंसला मिला. इतनी ऊंचाई पर किंग कोबरा का होना दुनिया भर में एक रिकॉर्ड है.
पूरे उत्तराखंड राज्य में नैनीताल जिले में किंग कोबरा की मौजूदगी के सबसे अधिक सुबूत मिले हैं

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले रिसर्च फेलो ज्योति प्रकाश कहते हैं, "पिछले 5 साल में देहरादून और हरिद्वार जैसे बड़े जिलों में किंग कोबरा की रिकॉर्डेड साइट को जोड़ भी दें, तो नैनीताल में इससे ढाई गुना अधिक बार किंग कोबरा देखा गया है. यहां हमने इसके कई घोंसले भी लोकेट किए हैं.”
नैनीताल के मनोरा, भवाली और नैना फॉरेस्ट रेंज में किंग कोबरा आसानी से दिख रहा है. रिपोर्ट कहती है, "मनोरा और भवाली रेंज, जहां किंग कोबरा सबसे अधिक बार देखा गया, वहां तापमान 1.5 डिग्री से 24 डिग्री के बीच बदलता है. कोल्ड ब्लडेड किंग कोबरा का इतने बदलते तापमान पर जीवित रहना और इतनी ऊंचाई (2303 मीटर) पर उसका घोंसला पाया जाना एक गहन शोध का विषय है.”
ज्योति प्रकाश ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुक्तेश्वर में करीब 2200 मीटर की ऊंचाई है, जबकि जिम कॉर्बेट पॉर्क का तराई वाला इलाका 300 से 400 मीटर पर है. एक ही जिले में इतनी अलग अलग ऊंचाई पर किंग कोबरा की अच्छी साइटिंग होना हमें हैरान करता है. यह किंग कोबरा की अनुकूलन क्षमता का सुबूत तो है लेकिन इस पर और गंभीर रिसर्च करने की जरूरत है.”
किंग कोबरा: एक शीर्ष परभक्षी
भोजन श्रंखला में किंग कोबरा एपेक्स प्रीडेटर यानी सबसे ऊपर है. प्रकृति में जहां अन्य सांप चूहों को खाकर उनकी संख्या नियंत्रित करते हैं, वहीं किंग कोबरा का भोजन सिर्फ सांप हैं. यानी वह प्रकृति में सांपों की संख्या को नियंत्रित करता है. विरले मौकों पर ही किंग कोबरा सांप के अलावा छिपकली या गिरगिट जैसे अन्य जीवों को खाता है. इस तरह से यह धरती पर सांपों की संख्या नियंत्रित करने में एक रोल अदा करता है.
किंग कोबरा भारत में वन्य जीव कानून के तहत संरक्षित प्राणियों में है और इसकी कई खासियत हैं, जो इसे विश्व भर के बाकी सर्पों से अलग करती हैं. आकार के हिसाब से यह दुनिया का सबसे बड़ा विषैला सांप है, जिसकी लंबाई 18 फुट तक हो सकती है. यह दुनिया में सांपों की अकेली प्रजाति है जिसमें मादा अंडे देने से पहले अपना घोंसला बनाती है.
अंडों से बच्चे निकलने में 80 से 100 दिन लगते हैं और तब तक मादा किंग कोबरा अपने अंडों की तत्परता से रक्षा रहती है. जानकार कहते हैं कि इस दौरान वह तकरीबन 2 महीने तक भूखी ही रहती है. यह दिलचस्प है कि अंडों से बच्चे निकलने से ठीक पहले मादा किंग कोबरा हमेशा वह जगह छोड़कर चली जाती है.
जानकार कहते हैं कि इस विषय पर गहन शोध की ज़रूरत है कि किंग कोबरा की नैनीताल में इतनी साइटिंग कैसे हो रही है
विराट और शांतिप्रिय प्राणी
किंग कोबरा एक बेहद शांतिप्रिय या जानकारों की भाषा में नॉन-कॉम्बेटिव (आक्रमण न करने वाला) सांप है. भारत में सांपों की कई जहरीली प्रजातियां हैं लेकिन चार ही सांप हैं, जिनके काटने से अधिकांश मौतें होती हैं. ये हैं रसेल्स वाइपर, सॉ स्केल वाइपर, क्रेट और इंडियन कोबरा. इन चारों को "बिग-फोर” कहा जाता है. अपने शांतिप्रिय स्वभाव के कारण ही बहुत विषैला होने के बावजूद किंग कोबरा "बिग-फोर” में नहीं गिना जाता.
जहां सांपों की ज्यादातर प्रजातियां इंसानी बसावट के आसपास रहती हैं और कई बार लोगों के घरों में भी घुस जाती हैं, वहीं किंग कोबरा जंगल में रहना ही पसंद करता है और इंसान से उसका सामना कम ही होता है. इसके काटने की घटनाएं पूरे देश में बहुत कम हैं. उत्तराखंड वन विभाग की यह रिपोर्ट किंग कोबरा के स्वभाव का प्रमाण है. इसके मुताबिक राज्य में अब तक किंग कोबरा के काटने की एक भी घटना दर्ज नहीं हुई है.
किंग कोबरा पर जानकारों की राय
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के पीएचडी स्कॉलर जिज्ञासु डोलिया, जो पिछले 10 साल से किंग कोबरा पर इसी क्षेत्र में रिसर्च कर रहे हैं, कहते हैं कि नैनीताल जिला राज्य के सबसे अधिक वनाच्छादित जिलों में है. इसलिए यह इलाका किंग कोबरा के लिए एक बेहतर पनाहगार बनाता है. लेकिन डोलिया इस रिपोर्ट के आधार पर किंग कोबरा की संख्या को लेकर किसी निष्कर्ष पर नहीं जाना चाहते.
किंग कोबरा अकेला सांप है जहां मादा अंडे देने से पहले अपना घोंसला बनाती है और अंडों की करीब 3 महीने तक रखवाली करती है.
उनके मुताबिक, "एक बात हमें समझनी होगी कि हमारे पास किंग कोबरा की गिनती का बहुत सटीक तरीका नहीं है, जैसे कि टाइगर की गिनती होती है, जहां हम काफी हद तक सही संख्या पता कर सकते हैं. इसलिए नंबर को लेकर स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता." नैनीताल जिला ऐसा क्षेत्र है, जहां किंग कोबरा बार-बार देखा जाता है और उसका घोंसला भी यहां जंगल में हर साल बना मिलता है.
यह भी सच है कि राज्य की बाकी जगहों की तुलना में नैनीताल क्षेत्र में लोगों में अधिक जागरूकता है, इसलिए वह किंग कोबरा की साइटिंग की रिपोर्टिंग भी करते हैं. जिज्ञासु डोलिया कहते हैं, "असल में नैनीताल का फॉरेस्ट कवर, यहां होने वाली बारिश और भौगोलिक स्थिति से किंग कोबरा के लिए एक अनुकूल मिश्रण तैयार होता है.”
नैनीताल जिले में किंग कोबरा के जो भी घोंसले मिले, वे चीड़ की नुकीली पत्तियों से बने हैं जबकि अन्य जगहों में इसके घोंसले बांस द्वारा बने मिले हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि चीड़ की पत्तियां आसानी से नष्ट नहीं होती, इसलिए यह मादा द्वारा घोंसले के लिए इन पत्तियों के चुनाव की वजह हो सकती है लेकिन जिज्ञासु नहीं मानते की मादा चीड़ को विशेष रूप से ढूंढकर ही उसकी पत्तियों से घोंसला बनाती है, "हमारा अनुभव है कि जो भी उपयुक्त चीज मिलेगी, मादा उससे अपना घोंसला बनाएगी. इस क्षेत्र में चीड़ और बांज अच्छी खासी संख्या में है और वह अंडो के लिए तापमान नियंत्रित करने में काफी मददगार है, इसलिए मादा किंग कोबरा घोंसला बनाने में उसका प्रयोग करती है.”(dw)
दुनिया भर के 188 से भी ज़्यादा देशों में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले सामने आए हैं.
इसकी चपेट में आए लोगों की संख्या दो करोड़ 47 लाख से ज़्यादा हो चुकी है जबकि अब तक इस महामारी से अब तक आठ लाख 38 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे एक महामारी घोषित किया है.
1. कोरोना के संक्रमण और उसके लक्षण सामने आने में कितना समय लगता है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस से संक्रमण के बाद इसके लक्षण सामने आने में पांच दिनों का समय लगता है लेकिन कुछ लोगों में इसके लक्षण दिखने में इससे ज़्यादा वक़्त भी लग सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ कोरोना से संक्रमित व्यक्ति के लक्षण 14 दिनों तक रहते हैं. लेकिन कुछ शोधकर्ताओं की राय में इसके लक्षण 24 दिनों तक रह सकते हैं.
इनक्यूबेशन पीरियड या बीमारी के सामने आने में लगने वाले समय को जानना और समझना ज़रूरी है.
इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग को ज़्यादा बेहतर और प्रभावी तरीके से कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर कदम उठाने में मदद मिलती है.

2. कोरोना से संक्रमण के बाद ठीक होने वाले लोग दोबारा संक्रमित नहीं होंगे?
फिलहाल ये कहना जल्दबाज़ी होगी. इस वायरस के बारे में अभी दिसंबर में ही पता चला है.
वायरस संक्रमण के दूसरे मामलों से जुड़े अतीत के अनुभव बताते हैं कि रोग रोग प्रतिरोधकों के ज़रिये इससे बचाव किया जा सकता है.
सार्स और कोरोना परिवार के अन्य विषाणुओं को लेकर हमारी राय ये है कि दोबारा संक्रमित होने के आसार कम हैं.
लेकिन चीन से मिलने वाली कुछ रिपोर्टों में ये कहा गया है कि हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद भी कुछ लोगों के टेस्ट पॉज़िटिव पाए गए हैं पर हम उन टेस्ट को लेकर पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते.
हालांकि गौर करने वाली बात ये है कि ऐसे लोगों से अब संक्रमण का कोई ख़तरा नहीं था.
3. फ़्लू और कोरोना वायरस में क्या अंतर है?
कोरोना वायरस और फ़्लू (बुखार और संक्रामक जुकाम) के कई लक्षण एक जैसे हैं. बिना मेडिकल टेस्ट के इसके अंतर को समझना मुश्किल है.
कोरोना वायरस के प्रमुख लक्षण बुखार और सर्दी ही है. फ्लू में अक्सर दूसरे लक्षण भी दिखाई देते हैं जैसे गले में दर्द.
जबकि कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति को सांस की तकलीफ़ की शिकायत रहती है.

4. खुद को एकांत में कैसे रखें?
सेल्फ़ आइसोलेशन यानी खुद को एकांत में रखने का मतलब 14 दिनों तक घर में रहना, काम पर नहीं जाना, स्कूल या किसी अन्य सार्वजनिक जगह पर नहीं जाना और सार्वजनिक परिवहन और टैक्सी से दूर रहना.
आपको घर के भीतर भी खुद को परिवार के दूसरे लोगों से अलग रखना चाहिए.
अगर आपको घरेलू सामानों की ज़रूरत हैं या कोई दवा चाहिए या फिर कोई शॉपिंग करनी है तो मदद लें, दरवाज़े पर डिलेवरी हो सकती है लेकिन आप किसी को घर आने के लिए न कहें.
आप को अपने पालतू पशुओं से भी दूर रहना चाहिए लेकिन अगर ये मुमकिन न हो तो उन्हें छूने से पहले और बाद ठीक से हाथ ज़रूर साफ़ करें.
5. अस्थमा के मरीज़ों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक़?
हमारे श्वसन तंत्र या हमारी सांस लेने की प्रणाली में किसी भी तरह का संक्रमण, वो चाहे कोरोना वायरस ही क्यों न हो, अस्थमा की तकलीफ़ बढ़ा सकता है.
कोरोना वायरस को लेकर चिंतित अस्थमा के मरीज़ कुछ एहतियाती कदम उठा सकते हैं. इसमें डॉक्टर द्वारा सुझाए गए इनहेलर का इस्तेमाल भी शामिल है.
इससे कोरोना सहित किसी वायरस किसी वजह से पड़ने वाले अस्थमा के दौरे का ख़तरा कम होता है.
6. क्या कोरोना का संक्रमण फ़ोन से भी हो सकता है?
माना जाता है कि कोरोना वायरस का संक्रमण छींकने या खांसने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में हो सकता है. लेकिन जानकारों का कहना है कि ये वायरस किसी सतह पर भी अस्तित्व में रह सकता है और वो भी संभवतः कई दिनों तक.
इसलिए ये अहम है कि आपका फ़ोन चाहे घर पर हो या दफ़्तर में पूरी तरह से बार-बार साफ़ हो. सभी प्रमुख फ़ोन बनाने वाली कंपनियां मोबाइल फ़ोन को एल्कोहॉल से, हैंड सैनिटाइज़र से या स्टरलाइजिंग वाइप्स से साफ़ करने को लेकर आगाह करती हैं क्योंकि इससे फोन की कोटिंग को नुक़सान होने का ख़तरा रहता है.
इस कोटिंग लेयर को नुक़सान पहुंचने से कीटाणुओं के लिए मोबाइल फोन में फंसे रहना आसान हो जाता है. आजकल जो मोबाइल फ़ोन आते हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे वाटर रेजिस्टेंस होते हैं यानी पानी से उनको कम ख़तरा रहता है.
अगर ऐसा है तो आप फ़ोन को साबुन और पानी या फिर पेपर टॉवल से साफ़ कर सकते हैं लेकिन ऐसा करने से पहले ये ज़रूर जांच लें कि आपका फोन वाटर रेजिस्टेंस है या नहीं.
7.क्या कोरोना दरवाज़े के हैंडल से भी फैल सकता है?
अगर कोई संक्रमित व्यक्ति छींकते वक़्त मुंह पर हाथ रखता है और फिर उसी हाथ से वो किसी चीज़ को छूता है तो वो सतह विषाणु युक्त हो जाती है.
दरवाज़े के हैंडल ऐसी सतहों के अच्छे उदाहरण हैं जिससे दूसरे लोगों को संक्रमण का ख़तरा हो सकता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वायरस किसी सतह पर भी अस्तित्व में रह सकता है और वो भी कई दिनों तक.
इसलिए सबसे अच्छा यही है कि आप हाथ नियमित रूप से धोते रहें ताकि संक्रमण का ख़तरा कम हो और कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सके.

8. स्वीमिंग पूल में तैरना कितना सुरक्षित?
ज़्यादातर स्वीमिंग पूल्स में क्लोरीन मिलाया जाता है. ये एक ऐसा रसायन है जिससे विषाणु ख़त्म जाते हैं.
इसलिए अगर किसी स्वीमिंग पूल में क्लोरीन का इस्तेमाल किया जा रहा है तो उसमें तैरना सुरक्षित है.
लेकिन इसके बावजूद आप चेंजिंग रूम या फिर किसी संक्रमित सतह जैसे दरवाज़े के हैंडल के संपर्क में आने के बाद संक्रमित हो सकते हैं.
और अगर वहां कोई संक्रमित व्यक्ति आपके नजदीक छींकता या खांसता है तो आपके भी संक्रमित होने का ख़तरा बना रहेगा.
9. मास्क पहनना कितना ज़रूरी?
हालांकि डॉक्टर लोग हमेशा ही मास्क पहने हुए दिखते हैं लेकिन इस बात के प्रमाण कम ही मिलते हैं कि आम लोगों के मास्क पहनने से चीज़ें बदल जाती हैं.
ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग ने कहा है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए वो मास्क पहनने की सिफ़ारिश नहीं करता है.
पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड का कहना है कि हॉस्पिटल के माहौल के बाहर मास्क पहनने से किसी व्यापक फायदे के प्रमाण ज़्यादा नहीं मिलते हैं.
विशेषज्ञों की राय में साफ़-सफ़ाई जैसे कि नियमित रूप से हाथ धोना ज़्यादा असरदार है.
10. बच्चों के लिए कितना ख़तरा?
चीन से मिल रहे आंकड़ों के अनुसार बच्चे तुलनात्मक रूप से कोरोना संक्रमण से बचे हुए हैं.
हालांकि जिन बच्चों को फेफड़े की बीमारी है या फिर अस्थमा है, उन्हें ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है क्योंकि ऐसे मामलों में कोरोना वायरस हमला कर सकता है.
ज़्यादातर बच्चों के लिए ये श्वसन संबंधी सामान्य संक्रमण की तरह है इसके बावजूद यह माना जा रहा है कि बच्चों की इम्यूनिटी कम होने से वे कोरोना की चपेट में आसानी से आ सकते हैं.
यही वजह है कि भारत सरकार ने कोरोना संबंधी अपने निर्देशों में दस साल से कम उम्र के बच्चों को घर में रखने का निर्देश जारी किया है.
इसके अलावा सभी स्कूल बंद हैं, हालांकि कई स्कूल इस दौरान ऑनलाइन क्लासों को संचालित कर रहे हैं.
11. संक्रमित व्यक्ति के हाथ का बना खाना कितना नुक़सानदेह?
संक्रमित व्यक्ति ने खाना बनाते वक़्त अगर साफ़-सफ़ाई का ठीक से ख़्याल न रखा हो तो इससे कोरोना वायरस के फैलने का ख़तरा रहता है.
छींकने या खांसने से हाथ पर लगी कफ़ के छोटे से हिस्से से भी कोरोना वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है. कीटाणुओं को फैलने से रोकने के लिए खाना खाने और छूने से पहले हाथ तरीके से धोये जाएं, इसकी सलाह हमेशा दी जाती है.(bbc)
-विकास बहुगुणा
‘इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले नेताओं का कांग्रेस के लिए समर्पण राहुल गांधी की तुलना में निश्चित रूप से कहीं ज्यादा है.’
कांग्रेस के 23 बड़े नेताओं की एक चिट्ठी के बाद पार्टी के भीतर उठे तूफान और इसके अंजाम पर यह बात बीते दिनों भाजपा नेका वडक्कन ने कही. सोनिया गांधी को लिखी गई इस चिट्ठी में पार्टी के पुर्नगठन सहित एक ऐसा नेतृत्व लाने की मांग की गई थी जो दिखे भी और सक्रिय भी रहे. लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इन बातों और इन्हें कहने वालों को किनारे कर दिया गया.
इस तरह यह तय हो गया है कि अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर अभी सोनिया गांधी ही पार्टी की कमान थामे रहेंगी. दो दशक से भी ज्यादा समय कांग्रेस में बिताने वाले टॉम वडक्कन का इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहना था, ‘आईना टूट चुका है. आईना जब टूट जाता है तो इसे जोड़ा नहीं जा सकता. आपको इसे फेंकना पड़ता है.’
आईना टूटने वाली बात मौजूदा हालात में कांग्रेस के लिए एक सटीक रूपक लगती है. कांग्रेस कभी वास्तव में भारत का आईना हुआ करती थी. पार्टी देश के संघर्षों और उसकी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती थी. देश की एक बड़ी आबादी उसके साथ खुद को जोड़कर देखती थी. यही वजह रही कि आजादी के बाद एक लंबे समय तक देश में उसका वर्चस्व रहा.
लेकिन अब स्थिति पलट चुकी है. आईना वास्तव में टूट चुका नजर आता है. कांग्रेस लगातार दो आम चुनाव हार चुकी है. राज्यों में भी उसकी स्थिति खस्ताहाल है. पार्टी के 23 नेताओं ने सोनिया गांधी को जो चिट्ठी लिखी है उसमें भी कहा गया है कि देश के लोग खास कर युवा, भाजपा और नरेंद्र मोदी पर ज्यादा भरोसा करते हैं. कांग्रेस के पतन की इस प्रक्रिया को गौर से देखें तो पता चलता है कि पार्टी ने अपनी वे लगभग सारी ही विशेषताएं गंवा दी हैं जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थीं.
पूरे भारत की पार्टी
जो खासियतें कांग्रेस को दूसरे दलों से अलग करती थीं उनमें से एक यह भी थी कि उसकी मौजूदगी भारत के हर इलाके में थी. यानी वह देशव्यापी पार्टी थी. लेकिन आज बाजी पलट चुकी है. अब उसके बजाय भारतीय जनता पार्टी पूरे भारत की पार्टी दिखती है.
इसका अंदाजा इस दिलचस्प तथ्य से भी लगाया जा सकता है. 1952 में जब देश में पहला आम चुनाव हुआ तो कांग्रेस को 45 फीसदी वोट हासिल हुए थे. 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में ठीक यही आंकड़ा भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के पास आ गया. यानी उसे 45 फीसदी मतदाताओं ने अपना समर्थन दिया. 2014 के 44 सीटों के आंकड़े में सिर्फ आठ फीसदी की बढ़ोतरी कर सकी कांग्रेस का वोट शेयर महज 19.5 फीसदी रहा. राज्यों में भी उसका दायरा सिमटता गया है. आज देश में महज छह राज्य या केंद्र शासित प्रदेश हैं जहां उसकी सरकार है. इनमें भी दो ऐसे हैं जहां वह जूनियर पार्टनर है.
सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ. इसका एक जवाब यह है कि बीते कुछ समय के दौरान कांग्रेस संगठन से लेकर मुद्दे खड़े करने तक हर मोर्चे पर भाजपा से पिछड़ती गई. अपने वर्चस्व वाले दिनों में उसके पास जम्मू-कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक एक प्रभावशाली संगठन हुआ करता था. उत्तर प्रदेश में गोविंद वल्लभ पंत से लेकर तमिलनाडु में सी राजगोपालाचारी तक हर इलाके में पार्टी के पास कद्दावर और जमीनी नेता थे. आज कमोबेश यही बात भाजपा के बारे में कही जा सकती है. संगठनात्मक ढांचे और मजबूत कैडर के मोर्चे पर कांग्रेस उसके सामने कहीं नहीं ठहरती. जैसा कि अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर मोहम्मद अय्यूब अपने एक लेख में कहते हैं, ‘अपने पितृ संगठन आरएसएस की बदौलत भाजपा एक कैडर आधारित पार्टी है जिसके सदस्यों के भीतर संगठन के अनुशासन की भावना भरी हुई है.’ कांग्रेस के साथ स्थिति उलट है जिसका अंदाजा हाल के सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रकरणों से भी लगता है.
इसके अलावा कांग्रेस बीते कुछ समय से ऐसे विमर्श यानी नैरेटिव और नारे खड़े करने में भी असफल रही है जो मतदाताओं को आकर्षित कर सकें. एक समय था जब जवाहर लाल नेहरू के ‘आराम हराम है’ या लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ जैसे नारे जनता की जुबान पर होते थे. उसके दिग्गजों की कल्पनाएं देश का भविष्य तय किया करती थीं. जैसा कि अपने एक लेख में प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब कहते हैं, ‘नेहरू का मानना था कि आर्थिक विकास को बाजार की ताकतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि योजना के जरिए इसे राज्य-निर्देशित होना चाहिए.’ ऐसा ही हुआ भी.
लेकिन वे दिन बीते जमाने हो गए. बीते कुछ समय से रफाल मुद्दे पर भाजपा को घेरने की कोशिश हो या ‘चौकीदार चोर’ है का नारा या फिर सॉफ्ट हिंदुत्व, पार्टी को हर मोर्चे पर असफलता मिली है. वह भविष्य में कैसा भारत चाहती है, इसे लेकर भी वह कोई स्पष्ट नजरिया लोगों के सामने रखने में नाकामयाब दिखती है. उधर, उसकी प्रतिद्वंदी भाजपा राष्ट्रवाद से लेकर ‘सबका साथ सबका विकास’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ तक लगातार नये विमर्श और नारे खड़े करने में सफल रही है. इसका फल उसे लगातार दो लोकसभा चुनावों और उत्तर प्रदेश जैसे कई अहम राज्यों की सत्ता के रूप में मिला है.
देशभक्ति
भारतीय स्वाधीनता संग्राम कांग्रेस के नेतृत्व में ही चला था. महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक पार्टी के कई नेता सालों जेल में रहे. असहयोग आंदोलन से लेकर सविनय अवज्ञा और नमक सत्याग्रह जैसे उसके आंदोलनों ने न सिर्फ ब्रिटिश सत्ता की चूलें हिला दीं बल्कि कांग्रेस को देशभक्ति का पर्याय भी बना दिया. आजादी के आंदोलन से मिली इस पुण्याई का पार्टी को आजादी के बाद भी काफी समय तक फायदा मिलता रहा. इसकी वजह यह थी कि इस आंदोलन का नेतृत्व करने वालों ने अब देश के नेतृत्व की बागडोर संभाल ली थी. एक जमाने का यह पोस्टर भी इसका उदाहरण है जिसमें लिखा गया है कि कांग्रेस उम्मीदवार को वोट देकर लोग अपने राष्ट्र प्रेम का परिचय दें.’
आज भी पार्टी खुद को देशभक्त बताने के लिए स्वाधीनता संग्राम का हवाला देती है. लेकिन अब लोगों की एक बड़ी संख्या देशभक्ति को कांग्रेस से जोड़कर नहीं देखती. उल्टे सोशल मीडिया पर एक तबका तो कांग्रेस को देशद्रोही या फिर देशद्रोहियों का साथ देने वाला कहता है. भाजपा पर निशाना साधते हुए पार्टी के नेता भले ही कहें कि जिनका देश की आजादी में कोई योगदान नहीं वे देशभक्ति की बात कर रहे हैं, लेकिन सच यही है कि आज देशभक्ति एक ऐसा ब्रांड हो चुकी है जिस पर भाजपा का ही कब्जा दिखता है. भाजपा ने हिंदुत्व, धर्म, राष्ट्र, देश, नारेबाजी, देशभक्ति औऱ कांग्रेस विरोध का ऐसा एक मिश्रण बनाया है जिससे पार पाना फिलहाल कांग्रेस के बस की बात नहीं लगती है. ऐसे में कांग्रेस अगर संतुलित बात करती है तो अक्सर देशद्रोही करार दे दी जाती है. और अगर वह इससे दायें कुछ करती है तो अपनी विरासत से दूर जाती और भाजपा की भौंड़ी नकल करती दिखती है.
दिग्गजों की विरासत
महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और इंदिरा गांधी तक कांग्रेस के पास चमकदार नामों का एक लंबा सिलसिला रहा है. लेकिन इस मजबूत विरासत का कुछ हिस्सा उससे छिन गया तो कुछ उसके लिए बोझ बन गया. और कांग्रेस इसे रोकने में असफल रही.
सरदार वल्लभ भाई पटेल का ही उदाहरण लें. कांग्रेस के दिग्गज और देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगा दिया था. उनका कहना था कि इस संगठन की गतिविधियां देश के लिए खतरा हैं. लेकिन आज ऐसा लगता है जैसे भाजपा उन्हीं सरदार पटेल को कांग्रेस से छीन चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि देश के पहले उप-प्रधानमंत्री को कांग्रेस ने वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे. दो साल पहले वे गुजरात में सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ का भी अनावरण कर चुके हैं. यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है. यही नहीं, पिछले साल भी वे सरदार पटेल के जन्मदिन यानी 31 अक्टूबर को उन्हें श्रद्धांजलि देने ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ गए और कहा कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 निष्प्रभावी करने का उनका फैसला देश के पहले गृहमंत्री को समर्पित है.
कुछ ऐसा ही सुभाष चंद्र बोस या फिर महात्मा गांधी जैसे नेताओं के मामले में होता दिखता है. इस पर कांग्रेस सिर्फ यह तर्क देती दिखती है कि भाजपा के पास अपना कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं है इसलिए वह ऐसा करती है. लेकिन इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता. मसलन एक बड़ा तबका अब यह मानता दिखता है कि सरदार वल्लभ पटेल या सुभाष चंद्र बोस को भाजपा ने ही वह सम्मान दिया है जिसके वे हकदार थे.
इसी तरह कभी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे नाम कांग्रेस की ताकत हुआ करते थे. लेकिन कांग्रेस की वंशवाद की राजनीति और भाजपा की प्रचार मशीनरी ने इस स्थिति को उल्टा कर दिया है. वर्तमान कांग्रेस ने इनकी विरासत का फायदा उठाया तो उस विरासत को वर्तमान कांग्रेस की गलतियों और गिरावट का खामियाज़ा भुगतना पड़ा. इसके चलते बहुत से लोग कश्मीर सहित देश की ज्यादातर समस्याओं के लिए इन नेताओं को ही जिम्मेदार मानते हैं. और अब कांग्रेस इनका फायदा उस तरह से उठाने की स्थिति में नहीं है जैसे पहले उठाया करती थी.
धर्मनिरपेक्षता
धर्मनिरपेक्षता को कभी कांग्रेस ने अपनी ताकत बनाया था. दरअसल 1947 में जब देश आजाद हुआ और इसके बाद संविधान सभा बनी तो इस पर काफी मंथन हुआ कि धर्म और राज्य व्यवस्था के बीच क्या संबंध हो. इस मुद्दे को लेकर संविधान सभा में कई विचारधाराएं आपस में टकरा रही थीं. एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की धारा थी जिसका मत था कि राज्य सभी धर्मों का बराबर सम्मान करे. दूसरी धारा में हिंदू परंपरावादी थे जिनका मानना था कि राज्य व्यवस्था को आयुर्वेद से लेकर हिंदी तक उन सारी पहचानों का संरक्षण करना चाहिए जो बहुसंख्यक धर्म से जुड़ती हैं. इसके अलावा एक धारा हिंदू राष्ट्रवादियों की भी थी जो भारत की पहचान हिंदू धर्म में देखती थी, हालांकि संविधान सभा में इसका प्रतिनिधित्व नगण्य था.
काफी दबाव के बाद भी जवाहरलाल नेहरू और संविधान सभा के अध्यक्ष बीआर अंबेडकर पूरी बहस को इस नतीजे तक ले जाने में सफल रहे कि भारत की पहचान मिली-जुली होनी चाहिए जिसमें सब नागरिक बराबर हों. इसे सेक्युलर राज्य व्यवस्था कहा गया. इसकी व्याख्या करते हुए एक बार नेहरू ने कहा था, ‘सेक्युलर के लिए कोई सटीक हिंदी शब्द खोजना मुश्किल है. कुछ लोग सोचते हैं कि इसका मतलब धर्म के खिलाफ है. लेकिन यह सही नहीं है. इसका मतलब है कि राज्य व्यवस्था सभी धर्मों का बराबर सम्मान करती है और उन्हें समान अवसर देती है.’
जानकारों के मुताबिक नेहरू धर्मनिरपेक्षता को भारत के लिए बेहद अहम मानते थे क्योंकि उन्होंने देखा था कि किस तरह मुस्लिम सांप्रदायिकता ने देश के टुकड़े करवाए. इसलिए आजादी के बाद हिंदू समेत हर धर्म की सांप्रदायिकता को काबू में रखना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया था.
1950 से लेकर 1970 तक भारत का यह सेक्युलर मॉडल काफी हद तक ठीक से चला. मुस्लिमों सहित सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को विधायिकाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिला. धार्मिक दंगे भी काफी कम हो गए. बहुत सीमा तक इसका श्रेय जवाहरलाल नेहरू को दिया जाता है जिन्होंने भरसक कोशिश की कि कोई भी नेता धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए न करे.
लेकिन 1970 के दशक में जब पहली बार केंद्र में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई तो यह स्थिति बदलने लगी. 1980 में सत्ता में लौटीं इंदिरा गांधी ने धार्मिक तुष्टीकरण शुरू किया. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देना, पंजाब में अकालियों की टक्कर में भिंडरावाले को खड़ा करना और हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद के समर्थन से बने भारत माता मंदिर का उद्घाटन इसके उदाहरणों में गिने जाते हैं. उनके बेटे राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा और इससे खुद पर लगने वाले मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों की काट राम जन्मभूमि के ताले खुलवाकर करने की कोशिश की. माना जाता है कि इससे उस हिंदू सांप्रदायिकता का रास्ता खुल गया जिसे जवाहरलाल नेहरू किसी भी हाल में उभरने नहीं देना चाहते थे. इसके बाद भाजपा बहुसंख्यक तुष्टीकरण की राह पर चली और बाकी इतिहास है.
अब आलम यह है कि सार्वजनिक विमर्श में धर्मनिरपेक्षता शब्द को एक बड़ा वर्ग गाली की तरह इस्तेमाल करता है. कई जानकारों के मुताबिक इसकी वजह कांग्रेस ही है जिसने हमेशा इस मामले में दोहरा बर्ताव किया है. इनके मुताबिक पार्टी सब धर्मों के साथ बराबरी के बर्ताव की बात तो करती रही, लेकिन व्यवहार में वह ऐसा करती नहीं दिखी. उदाहरण के लिए हिंदू धर्म की रूढ़ियों को दूर करने के लिए हिंदू कोड बिल तो लाया गया, लेकिन भारत के मुसलमानों के मामले में ऐसा नहीं किया गया. इससे धीरे-धीरे यह धारणा बनने लगी कि धर्मनिरेपक्षता की बात करने वाली कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण करती है. शाहबानो प्रकरण जैसे उदाहरणों ने इस धारणा को पुष्ट किया. लेकिन कांग्रेस ने इसका जवाब हमेशा यह कहकर दिया कि यह हिंदुत्ववादी संगठनों का प्रचार है. आखिरकार 2014 में हुए आम चुनाव में बुरी गत के बाद इसकी समीक्षा करने के लिए बनी पार्टी की एक समिति ने माना कि मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पार्टी को ले डूबी.
इसके बाद कांग्रेस ने अपने रुख में बदलाव किया. भाजपा का मुकाबला करने के लिए वह सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलने की कोशिश करने लगी. मसलन राहुल गांधी मंदिरों के दौरे करने लगे और खुद को शिवभक्त बताने लगे. लेकिन भाजपा की पिच पर खेलने की कांग्रेस की यह कोशिश भी उसके काम नहीं आई. जानकारों के मुताबिक इससे यह संदेश गया कि पार्टी ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण की गलती मान ली है और अब वह भूल सुधार कर रही है. इससे हिंदू वोटर तो उससे नहीं जुड़ा, उल्टे मुस्लिम वोटर भी उससे छिटकने लगा.
इस सबका नतीजा यह है कि कांग्रेस न सिर्फ अपने सबसे बुरे दौर में है बल्कि मौजूदा हालात को देखते हुए उसकी हालत बिन पतवार की कश्ती जैसी ही दिखती है. सोनिया गांधी एक साल से पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं. लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि वे अपने स्वास्थ्य के चलते इस भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पा रहीं. आम चुनाव की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे चुके राहुल गांधी अब भी खुद को केंद्रीय भूमिका में रखे हुए हैं, लेकिन कई कांग्रेस नेताओं की मानें तो उनकी शिकायतों पर वे यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि वे अब अध्यक्ष नहीं हैं.
अपने एक लेख में पूर्व नौकरशाह और चर्चित लेखक पवन के वर्मा लिखते हैं, ‘सच ये है कि पार्टी एक ऐसे परिवार की बंधक बनी हुई है जो दो आम चुनावों में इसका खाता 44 से सिर्फ 52 तक पहुंचा सका.’ उनके मुताबिक कांग्रेस को नेतृत्व से लेकर संगठन तक बुनियादी बदलाव की जरूरत है और तभी वह एक ऐसा विश्वसनीय विपक्ष बन सकती है जिसकी लोकतंत्र को जरूरत होती है, सत्ता पक्ष बनने की बात तो अभी दूर है.(satyagrah)
विनोद वर्मा
बस्तर के नगरनार स्टील संयंत्र को शुरु होने से पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार ने विनिवेश सूची में डाल रखा है। यानी इस संयंत्र को किसी निजी कंपनी को बेचने की तैयारी कर ली गई है। लेकिन अब एक नया मोड़ आ गया है। इसे स्थापित करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनएमडीसी ने डी-मर्जर करने का फैसला किया है। आसान शब्दों में यह कि एनएमडीसी पहले इस संयंत्र से अपने आपको अलग कर रहा है। इसके बाद इसका निजीकरण किया जाएगा।
शेयर मार्केट में उछाल बता रहा है कि बाज़ार इस फैसले से ख़ुश है। इन दिनों शेयर बाज़ार और जनता की ख़ुशी में तालमेल वैसे भी बचा नहीं है।
यानी नरेंद्र मोदी सरकार बस्तरवासियों की उम्मीद नगरनार को किसी अंबानी या अडानी या जिंदल को बेचने की दिशा में एक ठोस कदम उठा लिया है।
इस बीच यह भी फैसला हुआ है कि इस संयंत्र को अगले साल शुरु किया जाए। हज़ारों करोड़ के निवेश के बाद उत्पादन शुरु न करने के पीछे भी एक सुनियोजित षडय़ंत्र है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने एनएमडीसी को ज़मीन और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध करवाईं थीं क्योंकि यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है और इससे बस्तर के आदिवासियों का भला होगा। लेकिन जब यह संयंत्र शुरू होने से पहले ही निजी हाथों में चला जाएगा तो बस्तर के सपनों का क्या होगा?
‘देश नहीं बिकने दूंगा’ वाले जुमले का क्या हुआ यह तो पूछना लोगों ने बहुत पहले ही बंद कर दिया है। अब तो तय हो गया है कि यह जुमला अब ‘देश नहीं बचने दूंगा’ हो चुका है।
(विनोद छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार हैं। यह टिप्पणी उन्होंने अपने निजी फेसबुक पेज पर की है।)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर जातीय आरक्षण के औचित्य पर प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है। पांच जजों की इस पीठ ने अपनी ही अदालत द्वारा 2004 में दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसमें कहा गया था कि आरक्षण के अंदर (किसी खास समूह को) आरक्षण देना अनुचित है याने आरक्षण सबको एकसार दिया जाए। उसमें किसी भी जाति को कम या किसी को ज्यादा न दिया जाए। सभी आरक्षित समान हैं, यह सिद्धांत अभी तक चला आ रहा है।
ताजा फैसले में भी वह अभी तक रद्द नहीं हुआ है, क्योंकि उसका समर्थन पांच जजों की बेंच ने किया था। अब यदि सात जजों की बेंच उसे रद्द करेगी तो ही आरक्षण की नई व्यवस्था को सरकार लागू करेगी। यदि यह व्यवस्था लागू हो गई तो पिछड़ों और अनुसूचितों में जो जातियां अधिक वंचित, अधिक उपेक्षित, अधिक गरीब हैं, उन्हें आरक्षण में प्राथमिकता मिलेगी। लेकिन मेरा मानना है कि सरकारी नौकरियों में से जातीय आरक्षण पूरी तरह से खत्म किया जाना चाहिए। अब से 60-65 साल पहले और विश्वनाथप्रताप सिंह के जमाने तक मेरे-जैसे लोग आरक्षण के कट्टर समर्थक थे।
डॉ. लोहिया के साथ मिलकर हम अपने छात्र-जीवन में नारे लगाते थे कि ‘पिछड़े पाएं सौ में साठ’ लेकिन जातीय आरक्षण के फलस्वरुप मुट्टीभर लोगों ने सरकारी ओहदों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अपनी नई जाति खड़ी कर ली। उसे अदालत ने ‘क्रीमी लेयर’ जरुर कहा लेकिन उस पर रोक नहीं लगाई। ये आरक्षण जन्म के आधार पर दिए जा रहे हैं, जरुरत के आधार पर नहीं। इसकी वजह से सरकार में अयोग्यता और पक्षपात को प्रश्रय मिलता है और करोड़ों वंचित लोग अपने नारकीय जीवन से उबर नहीं पाते हैं। यदि हम देश के 60-70 करोड़ लोगों को समाज में बराबरी के मौके और दर्जे देना चाहते हों तो हमें शिक्षा में 60-70 प्रतिशत आरक्षण बिना जातीय भेदभाव के कर देना चाहिए। जो भी गरीब, वंचित, उपेक्षित परिवारों के बच्चे हों, उन्हें मुफ्त शिक्षा, मुफ्त भोजन, मुफ्त वस्त्र और मुफ्त निवास की सुविधाएं दी जानी चाहिए। देखिए, ये बच्चे हमारी तथाकथित ऊंची जातियों के बच्चों से भी आगे निकलते हैं या नहीं?(नया इंडिया की अनुमति से)
-लक्ष्मण सिंह देव
शाजी जमा की लिखी किताब अकबर आज पढ़ी। इतिहास का रोचक वर्णन है और ईमानदारी से लिखी है। अकबर का धर्मांध एवं सेकुलर दोनों पक्षों का वर्णन है। सबसे रोचक बात है उस समय के बादशाहों का ज्योतिषियों में विश्वास। किताब में लिखा है कि तैमूर की भी कुंडली थी और उसे साहिब किरान कहा जाता था क्योंकि जब वो पैदा हुआ तो उसकी कुंडली में उस समय बृहस्पति और शुक्र का योग था। इब्राहिम लोदी के दरबार में हिन्दू मुसलमान दोनों ही ज्योतिषी थे। अकबर की कुंडली इस किताब में पूरी डिटेल में बताई गई है।
पूरे 4 पेज कुंडली और उसके योगों पर ही है। इससे पता चलता है कि मुसलमान भी उस समय ज्योतिष में यकीन करते थे। जहां तक मेरी जानकारी है इस्लाम धर्म मे भविष्यवाणी करना हराम है? एक रोचक वर्णन में अधम खान से अकबर पूछता है-तूने हमारे अटका को क्यों मारा। पेज के एंड नोट में लिखा है कि अकबर ने यही लाइन कही यह रेकॉर्डेड बात है। बुधवार के दिन अकबर हजरत अली के नाम का रोजा रखता था। एक बार अकबर कहीं से वापस आ रहा था तो आमेर में रुकने पर उसे एक पुच्छल तारा दिखाई दिया। उसने ज्योतिषी से पूछा तो बताया गया कि जिस ओर तारा दिखा है उस दिशा में किसी राजा की मृत्यु होगी। अकबर इस बात से बहुत डर गया और उसने बहुत दान दिया। बाद में ईरान का राजा शाह तस्मासप मर गया। लोग खुश हुए कि अब तबर्रा नहीं होगा। शाह कट्टर शिया था, सम्भवत: इसलिए तबर्रा= प्रथम 3 इस्लामिक खलीफाओं को गाली देना। शाह तस्मासप ने हुमायूं को शरण भी दी थी। शाह तस्मासप ने हुमायूं को शिया बनाने की कोशिश की। शाह ने हुमायूं से कहा कि ईरानी स्टाइल में बाल कटवा लो और सफवी ताज पहन लो (सफवी ताज वस्तुत: एक पगड़ी होती थी। जिसे 12 बार लपेट के पहना जाता था। 12 बार इसलिए क्योंकि इशना असरी शियाओं के इमामों का प्रतीक है, शाह तस्मासप के दादा हैदर को हजरत अली सपने में दिखाई दिए कहा कि एक ताज बनवाओ तो इस पगड़ी को ईजाद किया गया। अकबर ने चितौड़ को जीतने के बाद वहां कत्लेआम भी करवाया।
अकबर के बारे में 2 ऐसे प्रसंग लिखे हैं जहां उसे विवाहित औरतें पसन्द आयी तो उसने उनके पतियों से उनके तलाक करवा के उनसे विवाह कर लिया। उन्माद में वह बकता था कि हिन्दू खाये गाय, मुसलमान खाए सुअर, तो कुछ चमत्कार हो वह अक्सर यह बात बड़बड़ाता था। मान सिंह की प्रशंसा में लिखे ग्रंथ मान सिंह रासो के अनुसार अकबर पिछले जन्म में ब्राह्मण था और इस जन्म में वह सनातन की रक्षा करने पैदा हुआ। एक अन्य अफवाह भी उस समय कुछ ब्राह्मणों ने ऐसी ही उड़ाई। अकबर जब अभियान पर जाता था तो 2 तलों वाले तंबू में रहता था। इब्राहिम लोदी की बूढ़ी माँ द्वारा बाबर को जहर दिए जाने की घटना का भी वर्णन है। शेरशाह सूरी की 4 इच्छाओं का जिक्र है जिसमें एक इच्छा है कि वह पानीपत में इब्राहिम लोदी का मकबरा बनवाये और उसके सामने की मुगलों की याद में एक स्मारक। दुश्मनों की याद में एक स्मारक बनवाये जिससे वो इतिहास में अमर हो जाये। इसी सिद्धान्त पर चलते हुए सम्भवत: अकबर ने चितौड़ के किले में मुगल सेना का डटकर मुकाबला करने वाले जयमल एवं पत्ता की हाथी पर बैठी संगमरमर की मूर्तियां आगरा के किले के द्वार पर स्थापित करवाई।
-कृष्ण कांत
सुशांत सिंह राजपूत केस भारत के इतिहास में शायद सबसे खौफनाक केस के तौर पर दर्ज होगा। जांच प्रक्रिया का ये नमूना बेहद अद्भुत है जहां बाढ़ और महामारी में फंसे पूरे भारत को छोडक़र, मीडिया के लोग गिद्धों के झुंड की तरह एक आरोपी पर टूट पड़े हैं।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के केस ने उस खौफनाक मॉब लिंचिंग का विस्तार कर डाला जो अब तक कुछ लफंगे समूहों तक सीमित थी। अब सभ्य समाज भी इसमें शामिल है। सभ्य समाज कभी डंडा और चापड़ लेकर नहीं निकलता। उसके अंदर का जहर भी सभ्य रास्ते अख्तियार करता है। वह कभी लिंच मॉब को माला पहनाता है तो कभी संगसारी का समर्थन करता है, कभी दंगे को ‘राष्ट्र की सेवा’ कह डालता है।
आपको उस चैनल से डरना चाहिए जो स्पष्ट तौर पर आरोपी युवती को ‘हत्यारिन’ लिख सकता है।
आरोप क्या है, अभी ये भी तय नहीं है। आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप बनेगा या हत्या का, ये अभी जांच एजेंसी भी नहीं जानती। आरोपी दोषी है या निर्दोष, ट्रायल से पहले ये अदालत भी नहीं जानती। लेकिन शक के आधार रिया चक्रवर्ती से घृणा करने वाले उन्हें ये सलाह दे रहे हैं कि
‘तुम मर क्यों नहीं जातीं’, ‘तुम भी आत्महत्या कर लो’, ‘तुम्हें मरने से कौन रोक रहा है’, ‘हमें तो इंतजार है’, ‘सुसाइड लेटर छोडऩा मत भूलना’ वगैरह-वगैरह। ये जुमले इन्हें लिखने वाले के बारे में क्या कहते हैं? क्या ये सच में न्याय चाहने वाले लोग हैं?
अगर आप लोकतंत्र की न्यायिक प्रक्रिया की सामान्य समझ रखते हैं तो भारतीय मीडिया को देखकर आप डर जाएंगे। अगर नहीं डर रहे हैं तो आपको डरना चाहिए।
रिया चक्रवर्ती के बचाव का कोई कारण मौजूद नहीं है, ठीक उसी तरह उसे निर्दोष मानने का कोई कारण मौजूद नहीं है। फिर भी, मीडिया औ कथित सिविल समाज का एक हिस्सा मिलकर किसी को दोषी ठहरा रहा है और उसके ‘मर जाने’ या ‘आत्महत्या कर लेने’ की कामना कर रहा है।
क्या सच में हमारा समाज अब किसी पर आरोप लगते ही उसे दोषी मान लेगा और आरोपी के मरने की कामना करेगा? क्या हम खून के इतने प्यासे हो रहे हैं कि हमसे जांच प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही तक का इंतजार नहीं हो रहा है? क्या हम आंख के बदले आंख मांगने निकले हैं, जहां कोई भी आंख वाला न बचे?
एक चैनल पर आरोपी रिया ने अपनी बात कही तो एंकर और आरोपी दोनों ट्रोल हो रहे हैं। हमारा सभ्य समाज न्याय नहीं चाहता। हमारे लोग साफ सुथरी न्यायिक प्रक्रिया नहीं चाहते। उन्हें देखकर लगता है कि यह गिद्धों का झुंड है जो सिर्फ खून का प्यासा है।
भारत की अदालतों में लटके केस का अब ऐसा ही ट्रायल होगा? एजेंसी के आगे आगे चैनल ट्रायल चलाएंगे और एजेंसियां उन्हें फॉलो करेंगी?
हम ऐसे समाज में तब्दील हो गए हैं जहां लोग महामारी में या अपराध में भी नफरत पैदा कर सकते हैं!
- दीपक शर्मा
वर्ष 1931 में हॉलीवुड स्टार चार्ली चैपलिन ने लंदन में ईस्ट इंडिया डॉक रोड स्थित एक छोटे से घर में महात्मा गांधी के साथ एक छोटी सी मुलाकात की थी। ठीक एक साल बाद, लॉस एंजेलिस में चार्ली चैपलिन ने हॉकी के जादूगर और भारतीय आइकन मेजर ध्यानचंद के साथ मुलाकात की। यह भारत के दो आइकनों के साथ उनकी दूसरी यादगार मुलाकात थी। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद 1932 के लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण जीतने के बाद ही तुरंत स्टार बन गए थे।
मेजर ध्यानचंद के बेटे और विश्व कप विजेता टीम के सदस्य अशोक ध्यानचंद सहित कई ओलंपियन ध्यानचंद को भारत देने की मांग कर चुके हैं। अशोक ने खुलासा करते हुए कहा, " चार्ली चैपलिन ओलंपिक विलेज आए थे और उन्होंने दादा (ध्यानचंद) तथा उनके टीम साथियों के साथ मुलाकात की थी। अमेरिकी मीडिया ने इसे काफी हाईलाइट किया था।"
अपने पिता के 115वीं जयंती को याद करते हुए अशोक ने कहा कि हर साल 29 अगस्त को जन्मदिन पर राष्ट्रीय खेल दिवस मनाकर भारत अपने हॉकी के दिग्गज का सम्मान करता है।
उन्होंने कहा, " यह न केवल हमारे परिवार के लिए बल्कि देश के सभी खेल प्रेमियों के लिए एक सम्मान है। और यह सच है कि न केवल हमारी ओर से, बल्कि भारत के लोगों ने भी ध्यानचंद के लिए भारत रत्न की मांग की है। अब यह सरकार को तय करना है। जहां तक मुझे पता है कि खेल मंत्रालय (यूपीए-2 के दौरान) ने दादा के लिए भारत रत्न की सिफारिश की थी। लेकिन फाइल पर अंतिम मंजूरी सचिन (तेंदुलकर) के लिए थी।"
अशोक ने 1975 में कुआलालम्पुर में पाकिस्तान के खिलाफ विजयी गोल करके भारत को पहला विश्व कप दिलाया था।
अशोक ने तेंदुलकर को लेकर कहा, " सचिन के लिए मेरे मन में सम्मान और प्यार है। वह भारत के अब तक के सबसे महान क्रिकेटर हैं लेकिन शीर्ष खेल इतिहासकारों का मानना है कि ध्यानचंद भारतीय उपमहाद्वीप में पैदा हुए सबसे महान खिलाड़ी थे..क्योंकि वह अपराजेय थे। एक एथलीट के लिए किसी भी खेल अनुशासन में पूरे करियर के लिए अजेय रहना, अपने आप में एक रिकॉर्ड है।"
ध्यानचंद के लिए भारत रत्न देने की मांग पर अशोक ने कहा कि उनका बेटा होने के नाते, हर साल राष्ट्रीय खेल दिवस की पूर्वसंध्या पर उनसे यह सवाल पूछा जाता है। अशोक ने कहा, " अक्सर मुझे लगता है कि मुझसे भारत रत्न के बारे में क्यों पूछा जा रहा है? सरकार से सवाल पूछा जाना चाहिए। यूपीए-2 शासन के लिए यह अधिक सटीक है, जिसने दादा के लिए भारत रत्न की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन खेल मंत्री की सिफारिश का सम्मान नहीं किया गया। हालांकि, सरकार ने उनकी याद में कई पुरस्कारों की घोषणा की है। उनके नाम पर कई स्टेडियम बनाए गए हैं ..दादा के खेल में योगदान के लिए सरकार की मान्यता से मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं।
हर साल 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर सरकार राष्ट्रपति भवन में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ कोच के लिए) देकर उत्कृष्ट खिलाड़ियों का सम्मान करती है।
खेलों में लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए भारत का सर्वोच्च पुरस्कार-ध्यानचंद पुरस्कार है जिसे 2002 से हर साल के खेल के आंकड़ों के आधार पर सम्मानित किया जाता है जो न केवल अपने प्रदर्शन के माध्यम से योगदान करते हैं, बल्कि संन्यास के बाद भी खेल में योगदान करते हैं।
सरकार ने ध्यानचंद की याद में दिल्ली में मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम का नाम भी रखा है। भारत और विदेशों दोनों में कई सड़कों, पार्कों और खेल के मैदानों का नाम हॉकी जादूगर की याद में रखा गया है।(navjivan)
-विनोद वर्मा
बस्तर के नगरनार स्टील संयंत्र को शुरु होने से पहले ही नरेंद्र मोदी सरकार ने विनिवेश सूची में डाल रखा है. यानी इस संयंत्र को किसी निजी कंपनी को बेचने की तैयारी कर ली गई है. लेकिन अब एक नया मोड़ आ गया है. इसे स्थापित करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनएमडीसी ने डी-मर्जर करने का फ़ैसला किया है. आसान शब्दों में यह कि एनएमडीसी पहले इस संयंत्र से अपने आपको अलग कर रहा है. इसके बाद इसका निजीकरण किया जाएगा.
शेयर मार्केट में उछाल बता रहा है कि बाज़ार इस फ़ैसले से ख़ुश है. इन दिनों शेयर बाज़ार और जनता की ख़ुशी में तालमेल वैसे भी बचा नहीं है.
यानी नरेंद्र मोदी सरकार बस्तरवासियों की उम्मीद नगरनार को किसी अंबानी या अडानी या जिंदल को बेचने की दिशा में एक ठोस क़दम उठा लिया है. इस बीच यह भी फ़ैसला हुआ है कि इस संयंत्र को अगले साल शुरु किया जाए. हज़ारों करोड़ के निवेश के बाद उत्पादन शुरु न करने के पीछे भी एक सुनियोजित षडयंत्र है.
छत्तीसगढ़ सरकार ने एनएमडीसी को ज़मीन औऱ दूसरी सुविधाएं उपलब्ध करवाईं थीं क्योंकि यह सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है और इससे बस्तर के आदिवासियों का भला होगा. लेकिन जब यह संयंत्र शुरु होने से पहले ही निजी हाथों में चला जाएगा तो बस्तर के सपनों का क्या होगा?
'देश नहीं बिकने दूंगा' वाले जुमले का क्या हुआ यह तो पूछना लोगों ने बहुत पहले ही बंद कर दिया है. अब तो तय हो गया है कि यह जुमला अब 'देश नहीं बचने दूंगा' हो चुका है.
(विनोद छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार हैं. यह टिप्पणी उन्होंने अपने निजी फेसबुक पेज पर की है.)
- ज़फ़र आग़ा
इतिहास साक्षी है कि जब-जब अत्याचार, आतंक, अंधकार एवं असत्य अत्यधिक बढ़ जाता है तो कहीं- न-कहीं एक किरण फूट पड़ती है और समाज एक नई सुबह की ओर बढ़ने लगता है। भारतीय समाज पिछले छह वर्षों में घोर अत्याचार और अंधकार से जूझता रहा है। इतना ही नहीं, इन छह वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं के विपरीत देश के लोकतांत्रिक एवं सामाजिक ताने-बाने पर प्रहार किया है।
भारतीय सभ्यता के दो-तीन मौलिक सिद्धांत हैं जिन पर यह समाज सदा टिका रहा है। सर्वप्रथम, भारत में लोकतांत्रिक प्रथा कोई आज की नहीं बल्कि सदियों पुरानी है। आर्यावर्त के समय से ही पीपल के पेड़ों के नीचे यह समाज पंचायतों में सामाजिक सर्वानुमति की प्रथा के जरिये अपनी समस्याएं हल करता रहा। यही कारण है कि सन 1950 में जब वोट के जरिये आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली आरंभ हुई तो इस देश की अनपढ़ जनता को भी उसको स्वीकार करने में कोई समस्या नहीं हुई। भले ही पश्चिम ने उस समय भारत में लोकतंत्र की सफलता पर सवाल खड़े किए हों लेकिन आज वही पश्चिमी देश भारत को संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र मानते हैं।
भारत की दूसरी सबसे पुरानी परंपरा इस देश की ही नहीं, स्वयं हिंदू धर्म की उदारता में निहित है। हिंदू सभ्यता ने कभी किसी दूसरे धर्म से अपने को असुरक्षित महसूस नहीं किया। तभी तो संसार का हर छोटा-बड़ा धर्म भारत में न केवल फला-फूला बल्कि उसको संपूर्ण सम्मान भी मिला। तभी तो भारत में मंदिरों के शंख, मस्जिदों की अजान एवं चर्चों तथा गुरुद्वारों के घंटे तथा संगत की आवाजें आज भी एक साथ सुनाई पड़ती हैं। यह भारतीय और हिंदू समाज की सदियों पुरानी उदारता का प्रतीक है।
भारत की तीसरी सांस्कृतिक परंपरा यह रही है कि यहां राजनीति को धर्म से नहीं जोड़ा गया। तब ही तो आर्यावर्त के समय से क्षत्रिय राजपाट एवं ब्राह्मण धार्मिक मामलों के अलग-अलग गार्जियन मान लिए गए थे। इस प्रकार भारत वर्ष ने यूरोप से सदियों पहले अपने यहां धर्म को राजपाट से अलग कर लिया था। ये तीनों मूल्य भारतीय संस्कृति के स्तंभ हैं जिन पर भारतीय समाज सदियों से टिका हुआ है।
परंतु राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपनी स्थापना के समय से ही इन तीनों मूल्यों को नकारा और अंततः अब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन तीनों स्तंभों को गिराकर देश में एक संघी समाज की स्थापना की जा रही है। इस संघी समाज में पहला सबसे बड़ा प्रहार लोकतंत्र पर है। मोदी राज में कोई राजनीतिक दल आवाज उठाने में असमर्थ है। कहने को कागज पर हर तरह की आजादी है। परंतु हर दल को चुप रखने के लिए सरकार ने अपने उपाय निकाले हैं जिनसे अब सभी अवगत हैं। इसी प्रकार सिविल सोसायटी को चुप करा दिया गया है। आज मीडिया एवं न्यायपालिका-जैसे लोकतांत्रिक स्तंभों पर प्रश्न चिह्न लग चुके हैं। और तो और, यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर एक ट्वीट भी कर दे तो वह कब जेल चला जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं रह गई है। ऐसे वातावरण को आप घोर अंधकार नहीं तो और क्या कहेंगे!
निःसंदेह भारतवर्ष इस समय ऐसी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति से जूझ रहा है जिसमें अंधकार के साथ दम घोटने वाली खामोशी है। ऐसे वातावरण में प्रशांत भूषण की आवाज उम्मीद की किरण है जो आने वाली सुबह की ओर एक इशारा भी है। प्रशांत भूषण अभी एक अकेली आवाज है। परंतु यह एक विद्रोह का इशारा भी है। मैं प्रशांत भूषण को गांधी अथवा मंडेला नहीं मानता हूं। मेरे विचारों से उन्होंने पहले ऐसे कदम भी उठाए हैं जिनसे संघ और मोदी की राजनीति को बल मिला। अन्ना आंदोलन को आंखें मूंदकर जो उन्होंने सहयोग दिया, वह मेरी समझ से राजनीतिक भूल थी। दरअसल, अन्ना आंदोलन नरेंद्र मोदी को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने की पृष्ठभूमि था। प्रशांत राजनीति की इस बारीकी को नहीं समझ सके और अपनी विद्रोही प्रवृत्ति में अन्ना के साथ बह निकले। परंतु इस समय प्रशांत भूषण जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट से माफी नहीं मांगने पर अडिग हैं, वह केवल अकेली उनकी आवाज नहीं अपितु वह भारतीय अंतरात्मा की आवाज है। बस, यही बात है जो प्रशांत भूषण को भारत के लिए एक नए विद्रोह का प्रतीक बना देती है। जब राजनीतिक प्रतिक्रिया ठप हो, सिविल सोसायटी सिर न उठा सके, मीडिया एवं न्यायपालिका अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहे हों, तो ऐसे में प्रशांत भूषण की आवाज एक गूंज बन जाती है जो देश की अंतरात्मा की आवाज प्रतीत होती है।
“यदि मैं इस कोर्ट के सामने से अपना बयान वापस ले लूं जिसको मैं सत्य मानता हूं या मैं कोई झूठी-मूठी माफी मांग लूं तो यह स्वयं मेरी अंतरात्मा की मानहानि होगी और उस संस्था का भी अपमान होगा जिसको मैं अत्यधिक आदरणीय मानता हूं”- प्रशांत भूषण का यह बयान निःसंदेह केवल उनकी अंतरात्मा ही नहीं अपितु देश की अंतरात्मा की आवाज है। यह वही रास्ता है जो गांधी जी ने 1917 में चंपारण आंदोलन के दौरान अदालत के सामने देश को सिखाया था। गांधी जी वह नेता थे जिन्होंने देश को सबसे पहले यह सिखाया कि जब सत्य एवं न्याय के सारे रास्ते बंद हों तो पहले डर छोड़ दो और फिर निर्भीकता से अपनी अंतरात्मा के बताए रास्ते पर चलो। प्रशांत भूषण इस समय उसी गांधीवादी मार्ग पर चलकर अपनी अंतरात्मा का पालन कर रहे हैं क्योंकि सत्य एवं न्याय के सारे मार्ग बंद हो चुके हैं।
देश में जो परिस्थितियां हैं, वे ब्रिटिश शासनकाल- जैसी ही हैं। जैसे उस समय ब्रिटिश शाही खानदान का सिक्का चलता था, वैसे ही इस समय देश में मोदी शाही का सिक्का चल रहा है। उस समय में जिस तरह से सरकार के विरुद्ध हर आवाज एक पाप थी, उसी तरह से आज एक मामूली-सा ट्वीट तक पाप है। आखिर में अंग्रेजों ने भी चुनावी प्रक्रिया आरंभ कर दी थी। वैसे ही इस समय भी चुनाव हो रहे हैं परंतु निर्वाचन आयोग की भूमिका पर इस समय प्रश्न चिह्न है। जब भारतीय निर्वाचन आयोग ही स्वतंत्र नहीं हो तो फिर लोकतंत्र कैसा! फिर आर्थिक दशा भी वैसी ही, जैसी कभी अंग्रेजों के शासनकाल में थी। उस समय देश की सारी दौलत विलायत के खजाने में जाती थी। वैसे ही देश की सारी पूंजी इस समय गिनती के कॉरपोरेट घरानों अथवा पीएम केयर फंड-जैसी योजनाओं के माध्यम से स्वयं प्रधानमंत्री की मुठ्ठी में जा रही है। जैसे अंग्रेज हिंदू-मुसलमान को लड़वाकर अपना राजपाट चला रहे थे, उसी प्रकार मोदी जी भी ‘बांटो और राज करो’ की रणनीति का इस्तेमाल कर अपनी सत्ता चला रहे हैं। जैसे अंग्रेजी राज में नौजवान बेरोजगार था, वैसे ही आज भी भारतीय युवक हाथ में डिग्री लिए सड़कों पर जूते घिस रहा है। देश में लोकतंत्र ठप है, नफरत की आग फैली हुई है, राजनीति में धर्मका बोलबाला है और अल्पसंख्यकों की जान सूली पर लटकी हुई है, क्या इसे आप एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज कहेंगे! यह एक असत्य और अन्याय पर आधारित समाज है जहां संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक परंपराओं पर ताला पड़ चुका है। ऐसे में अब सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। कहीं से भी अब न्याय की उम्मीद करना बेकार है। अतः अब केवल एक ही रास्ता बचा है जो गांधी जी का रास्ता है और जिस मार्ग को प्रशांत भूषण ने अपनाया है। और वह अंतरात्मा की आवाज का रास्ता है।
गांधी जी ने स्वयं इसी रास्ते पर चलकर और भारतवासियों को इसी रास्ते पर चलवाकर देश को स्वतंत्र करवाया था। इस समय फिर देश संघ की गुलामी का शिकार है। हमको इस गुलामी से केवल गांधी के मार्ग पर ही चलकर निजात मिलेगी। वह मार्ग सत्य एवं अहिंसा का मार्ग है। और उस सत्याग्रह के लिए प्रशांत भूषण की तरह ही आपको निर्भीक होकर अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनना और मानना होगा। प्रशांत भूषण इस समय जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भारत की आत्मा विचलित है। और उसकी शांति के लिए हजारों क्या, लाखों भारतीयों को प्रशांत भूषण के समान निर्भीकता से जेल की यात्रा के लिए तैयार रहना चाहिए।(navjivan)
कनुप्रिया
महज दो लोगों के रिश्ते में भी गड़बड़ हो जाए तो किसी एक को सीधे-सीधे आरोपी ठहराना मुश्किल होता है। भले एक हाथ कम हिला हो तब भी ताली दोनो हाथों से ही बजती है। यदि मैं महज अपनी ही दूसरे लोगों से लड़ाईयों की बात करूँ तो मैं जानती हूँ कि मेरे करीबी मेरा ठीक पक्ष देखेंगे मगर जो मुझे नहीं जानते और चीजों को दूसरी तरह देखते हैं उन्हें मेरे पक्ष में कई खामियाँ नजर आ सकती हैं।
हमारे समाज में भी रिश्तों का बनना आदर्श रूप से दो परिवारों का मिलन या दो व्यक्तियों का प्रेम कहा जाता है, मगर इतनी आदर्श स्थितियाँ होती नहीं हैं, बहुत से दूसरे कारणों से रिश्ते बनते हैं, जहाँ परिवारों में दहेज़, जाति, स्टेटस, कमाई यह सब देखा जाता है, दो लोग भी अपनी अपनी नीड्स और अपने अन्य हितों का खयाल करते हैं, जिनमे करियर बूस्ट, इमेज बूस्ट, बड़े कॉन्टेक्ट्स, सोशल प्रिविलेज, सेक्सुअल या इकोनोमिकल नीड्स ऐसे कई कई अन्य कारण शामिल रहते हैं.
तब फिल्मी दुनिया जैसी घोर व्यवसायिक और व्यवहारिक दुनिया मे रिश्तों के बारे में जज करना तो और मुश्किल है।
कल रिया चक्रवर्ती का इंटरव्यू सुना न तो उसे सुनकर ये लगा कि यही मासूम है और न ये लगा कि सुशांत सिंह की हत्या/ आत्महत्या की यही जिम्मेदार है। उसकी बातों में भी कई लूपहोल्स थे जिनकी शुरुआत सुशांत सिंह के सपने में आकर इंटरव्यू देने को कहने से ही हो गई थी मगर उसे ही अपराधी बनाने को ततपर हमारे समाज का महीन स्त्रीद्वेष भी एक पहलू है।
हमारी मनोवैज्ञानिक आदत होती है कि हम ठीकरा फोडऩे के लिये सर ढूँढा करते हैं, वो सर मिल जाए, सारे आरोप उस पर लगा दिए जाएँ, उसे सज़ा हो और मामला दफ़ा हो। अक्सर लपेटे में छोटे सर ही आते हैं, बड़े सर निकल जाते हैं।
इसलिये ये भी अजीब है कि इंडस्ट्री के बड़े भारी किरदार जो इस कहानी का हिस्सा थे वो ग़ायब हो गए और रिया चक्रवर्ती ही अहम कड़ी हो गईं। यह भी अजीब है कि सुशांत सिंह के बहाने नेपोटिज़्म और ख़ुद के बहाने फेमिनिज़्म का परचम लहराने वाली कंगना के पास सभी एक्टर एक्ट्रेस के लिये शब्द हैं मगर आउटसाइडर और एक स्त्री रिया चक्रवर्ती के लिए नहीं।
गोलमाल है भई सब गोलमाल है
सोचती हूँ सुशांत सिंह राजपूत का अगर मालूम होता कि मरणोपरांत उसकी और उससे जुड़े लोगों की पब्लिकली इतनी छीछालेदर होनी है तो शायद वो यह कदम न उठाता।
बाकी जो है सो अब बिहार के चुनाव ही तय करेंगे, किसी की बिसात क्या राजनीति की बिसात के आगे।
बेबाक विचार डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कांग्रेस-अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने संकट से उबरने के बाद जो यह पहला कदम उठाया है, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। उन्होंने सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बात की और कहा कि ‘जी’ और ‘नीट’ की परीक्षाएं स्थगित की जाएं। इन दोनों प्रवेश-परीक्षाओं में लगभग 25 लाख छात्र बैठते हैं। इन सात मुख्यमंत्रियों में से चार कांग्रेस के हैं। दो मुख्यमंत्री कांग्रेस की मदद से अपनी कुर्सी पर हैं। सातवीं मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी हैं। ये सातों सोनियाजी की हां में हां मिलाएं, यह स्वाभाविक है।
दिल्ली की ‘आप’ सरकार और तमिलनाडु की भाजपा समर्थित सरकार भी इन परीक्षाओं के पक्ष में नहीं हैं। इन सरकारों का मुख्य तर्क यह है कि कोरोना की महामारी के दौरान ये परीक्षाएं देश में बड़े पैमाने पर रोग फैला सकती हैं। इन प्रांतीय सरकारों की यह चिंता स्वाभाविक है लेकिन इनसे कोई पूछे कि यह चिंता क्या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या शिक्षा मंत्रालय या सरकार को नहीं होगी ?
उन्हें तो विपक्षियों से भी ज्यादा होगी। इसीलिए उन्होंने परीक्षा के लिए बेहतरीन इंतजाम किए हैं। ‘जी’ की परीक्षाएं 660 और ‘नीट’ की परीक्षाएं 3842 केंद्रों पर होंगी। इन केंद्रों पर परीक्षार्थियों के लिए शारीरिक दूरी रखने, मुखपट्टी लगाने, जांच आदि का कड़ा इंतजाम होगा। 99 प्रतिशत छात्रों के लिए वे ही परीक्षा-स्थल तय किए गए हैं, जो उन्होंने पसंद किए हैं। जिन्हें दूर-दराज के केंद्रों में जाना है, उनके केंद्र बदलने की प्रक्रिया भी जारी है। इसके अलावा छात्रों की यात्रा और रात्रि-विश्राम की व्यवस्था भी कुछ राज्य सरकारें कर रही हैं। ऐसी स्थिति में इन परीक्षाओं को स्थगित करने की मांग कहां तक जायज है ? यदि ये परीक्षाएं स्थगित हो गईं तो लाखों छात्रों का पूरा एक वर्ष बर्बाद हो जाएगा। जो फीस उन्होंने भरी है, वह राशि बेकार हो जाएगी।
जब देश में रेलें और बसें चल रही हैं, मेट्रो खुलनेवाली हैं, मंडियां और बड़े बाजार खुल रहे हैं तो परीक्षाएं क्यों न हो ? यह बात एक याचिका पर बहस के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूछी है। अब यदि ये सातों राज्य फिर से अदालत की शरण में जाएंगे तो वह शुद्ध नौटंकी ही होगी। उसका नतीजा क्या होगा, यह उनको पता है। विपक्षी मुख्यमंत्रियों और कांग्रेस-नेताओं का यह कदम उन्हें लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों से अलग करेगा। विपक्ष अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रहा है ? (नया इंडिया की अनुमति से)
-आलोक शुक्ला
सुधा भारद्वाज और अन्य 11 लोगों पर भीमा कोरेगांव की हिंसा का फर्जी आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया गया है। जो हिंसा 1 जनवरी 2018 को पुणे शहर के पास भीमा कोरेगांव में भडक़ी थी उसके असली गुनहगारों मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े को छोडक़र यह मामला मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, जनपक्षधर वकीलों, लेखकों और प्रोफेसरों को फर्जी केस में फंसाकर हिरासत में लेने की साजिश में तब्दील हो गया है। भीमा कोरेगांव का कार्यक्रम जो दलित अस्मिता का प्रतीक है उसे हिंसक मोड़ देने और उसका आरोप इन कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेखकों, प्रोफेसर और सांस्कृतिक कर्मियों पर लगाना
सत्ता के द्वारा विरोध के स्वरों को दबाने व भय का माहौल खड़ा करने की गहरी साजिश है।
गिरफ्तार सभी साथी कई दशकों से इंसाफ व न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। ये बेहद चिंताजनक है कि जो लोग संविधान और कानून के पालन और शोषण के खिलाफ एक समतापूर्ण समाज के निर्माण के लिए अपना जीवन, श्रम और संसाधनों को निस्वार्थ अर्पित कर रहे हैं, उन्हें देशद्रोही बताकर फर्जी केसों में फंसाया जा रहा है। ये केवल उन लोगों पर एक व्यक्तिगत हमला नहीं है बल्कि सभी जन-संघर्ष, मज़दूर आंदोलन, जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाई व मनुवादी-फांसीवादी ताकतों के खिलाफ चल रहे दलित बहुजन आदिवासी आंदोलनों पर भी प्रहार है। दरअसल मोदी सरकार देश में लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित कर अघोषित आपातकाल लागू कर रही हैं जिसका प्रमुख उद्देश्य देश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक उपक्रमों को बेशर्मी के साथ कार्पोरेट को सौंपना।
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में वकील सुधा भारद्वाज ने अपने जीवन का तीन दशक से ज्य़ादा समय मज़दूरों व किसानों के हकों की लड़ाई कोर्ट में और एक ट्रेड यूनियन की नेत्री के बतौर कंधे से कंधा मिलाकर लडऩे में दिया है। राजनांदगांव में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के हक में, बस्तर में मानव अधिकार के हनन के खिलाफ, रायगढ़ व सरगुजा में औद्योगिक घरानों की लूट के खिलाफ जन-जंगल-ज़मीन की लड़ाई में, भिलाई में सीमेंट कारखानों के मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी के लिए, भिलाई, रायपुर व विलासपुर में बस्तियों के तोड़े जाने के खिलाफ उनके हक के लिए हाईकोर्ट में लडऩा - ये सब लड़ाइयां सुधा भारद्वाज ने लड़ी हैं। और उनकी इस फर्जी केस पर गिरफ्तारी से सभी जन-आंदोलन एवं मजदूर-किसान संगठन बेहद आक्रोशित हैं। हम ये बात समझ रहे हैं कि ये छत्तीसगढ़ में चल रही जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाइयों, मजदूर-किसानों के संघर्ष को दबाने पर सीधा हमला है।
सुधा भारद्वाज व अन्य 4 लोगों को 28 अगस्त 2018 में गिरफ्तार किया गया था। दो साल होने को हैं पर अभी तक उनके केस की न्यायिक कार्यवाही भी ठीक से आगे नहीं बढ़ी है। और अभी हाल ही में एक और गिरफ्तारी की गई। इसके अलावा, ऐसा प्रतीत होता है कि ज़मानत की सुनवाइयों में भी जानबूझकर और बिना वजह की देरी की जा रही है। अब जब कोविड के काल में सब तरफ जेलों को खाली करने की बात की जा रही है तब भी इस केस से जुड़े लोगों की ज़मानत की सुनवाई को टाला जा रहा है।
सुधाजी की 23 जुलाई को कोर्ट से मिली जेल की मेडिकल रिपोर्ट चिन्ताजनक थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि सुधा भारद्वाज ‘इस्केमिक हार्ट डिजीज’ से पीडि़त हैं, जो हृदय की धमनियों के संकुचित होने के कारण होती है जिससे हृदय की मांसपेशियों में रक्त के प्रवाह की कम होती है और जिससे दिल का दौरा पड़ सकता है। यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि 27 अक्टूबर, 2018 को हिरासत में लिए जाने से पहले सुधा भारद्वाज को दिल से जुड़ी कोई शिकायत नहीं थी, ऐसा उनकी बेटी मायशा ने बताया।
मायशा ने बताया कि उसकी माँ के दिल की बिगड़ती स्थिति स्पष्ट रूप से दो साल से कारागर में परिरुद्ध होने के तनाव के कारण ही पैदा हुई है, और अभी भी विचारण शुरू होने के कोई लक्षण नजऱ नहीं आ रहे हैं। चिकित्सकीय डॉक्टरों ने हृदय की ऐसी स्थिति को गंभीर बताया, जिससे दिल का दौरा पड़ सकता है। जेल से प्राप्त चिकित्सा रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती है कि इस स्थिति का निदान कब किया गया था, न ही इस निदान का आधार बताती है। इस अनिश्चितता और पूर्ण चिकित्सा इतिहास के प्रकटीकरण की कमी के कारण सुधाजी के सभी विस्तारित परिवार और करीबी सहयोगियों को गहरी चिंता है।
सुधा भारद्वाज की दिल की बीमारी की खबर नई है, पर पहले से ही उनको मधुमेह और रक्तचाप है, और कुछ सालों पहले तपेदिक भी था, जिस कारण उनको कोविद के संक्रमण से सामान्य से अधिक खतरा है। इस तरह की महामारी के समय, किसी असुरक्षित, भीड़-भाड़ वाली जगह पर ऐसे व्यक्ति का एक दिन भी व्यतीत करना उनको अनावश्यक जोखिम में डालना होता है। न्यायिक प्रक्रिया में इस तरह की देरी अति दु:खदायी है।
अत : हम सब मांग करते हैं कि, सुधा भारद्वाज और उनके साथ भीमा कोरेगांव मांमले में बंद सभी की रिहाई के लिए सुनवाई जल्द हो और इस फर्जी केस को रद्द किया जाय।
सभी को, खासकर सुधाजी और उनके साथ बंद वरिष्ठ एवं स्वास्थ्य-पीडि़त बंदियों को कोविड-19 को ध्?यान में रखते हुए स्वास्थ्य के आधार पर अंतरिम ज़मानत तुरंत दी जाए।
भीमा कोरेगांव केस की सही रूप में जांच की जाय और उसके असली गुनहगारों - मिलिंद एकबोटे व संभाजी भिड़े को तुरंत गिरफ्तार किया जाय।
न्याय व मानवाधिकारों के लिए लडऩे वाले मानव अधिकार कार्यकर्ता, दलित बहुजन के हकों की लड़ाई लडऩे वाले कार्यकर्ता, आदिवासी हक की बात करने वाले वकील एवं कार्यकर्ता और महिलाओं की आवाज़ बुलंद करने वाले प्रोफेसरों, लेखकों व वकीलों पर दमन बंद किया जाय।
एक हिंदी टीवी न्यूज़ चैनल पर सिविल सेवाओं में मुसलमानों के चयन पर सवाल उठाने वाले एक कार्यक्रम के टीज़र पर आपत्ति करते हुए कई नौकरशाहों और उनके संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है.
सुदर्शन न्यूज़ नाम के इस न्यूज़ चैनल ने मंगलवार को अपना एक टीज़र जारी किया जिसमें चैनल के संपादक ने ये दावा किया है कि 28 अगस्त को प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम में 'कार्यपालिका के सबसे बड़े पदों पर मुस्लिम घुसपैठ का पर्दाफ़ाश' किया जाएगा.
सोशल मीडिया पर इसे लेकर आलोचना शुरू हुई और जिसके बाद गुरूवार को भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के संगठन ने इसकी निंदा करते हुए इसे 'ग़ैर-ज़िम्मेदाराना पत्रकारिता' क़रार दिया है.
A news story targeting candidates in civil services on the basis of religion is being promoted by Sudarshan TV.
— IPS Association (@IPS_Association) August 27, 2020
We condemn the communal and irresponsible piece of journalism.
पुलिस सुधार को लेकर काम करने वाले एक स्वतंत्र थिंक टैंक इंडियन पुलिस फ़ाउंडेशन ने भी इसे 'अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के आईएएस और आईपीएस बनने के बारे में एक हेट स्टोरी' क़रार देते हुए उम्मीद जताई है कि ब्रॉडस्काटिंग स्टैंडर्ड ऑथोरिटी, यूपी पुलिस और संबंद्ध सरकारी संस्थाएँ इसके विरूद्ध सख़्त कार्रवाई करेंगे.
The hate story carried on a Noida TV channel against minority candidates joining IAS /IPS is dangerous bigotry. We refrain from retweeting it because it is pure venom. We hope #NewsBroadcastingStandardsAuthority, #UPPolice and concerned government authorities take strict action.
— Indian Police Foundation (@IPF_ORG) August 27, 2020
सुदर्शन न्यूज़ के संपादक सुरेश चव्हानके ने आईपीएस एसोसिएशन की प्रतिक्रिया पर अफ़सोस जताते हुए कहा है कि 'उन्होंने बिना मुद्दे को समझे इसे कुछ और रूप दे दिया है'. उन्होंने संगठन को इस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया है.
Unfortunate that @IPS_Association twisting without knowing the issue.
— Suresh Chavhanke “Sudarshan News” (@SureshChavhanke) August 27, 2020
Issue is sudden spike in no of people of certain category selected in UPSC Civils in the last few years.
You're invited to participate in our program for informed discussion, if you care for UPSC objectivity. https://t.co/jy4wJXhljk
राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला ने इस कार्यक्रम के बारे में दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है.
A news story targeting candidates in civil services on the basis of religion is being promoted by Sudarshan TV.
— IPS Association (@IPS_Association) August 27, 2020
We condemn the communal and irresponsible piece of journalism.
पूनावाला ने साथ ही इस बारे में न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) के अध्यक्ष रजत शर्मा को एक पत्र लिख उनसे इस कार्यक्रम का प्रसारण रूकवाने और सुदर्शन न्यूज़ तथा इसके संपादक के विरूद्ध क़ानूनी कार्रवाई करने का अनुरोध किया है.
दिल्ली की जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के शिक्षकों के संगठन ने भी एक बयान जारी कर यूनिवर्सिटी प्रशासन से इस बारे में अवमानना का मामला दायर करवाने का अनुरोध किया है.
Jamia Teachers’ Association requests the University administration to file Criminal Defamation Suit against anti-Indian and anti-JMI remarks by traitor @SureshChavhanke CMD and Chief Editor of @SudarshanNewsTV.#JamiaMilliaIslamia #SuspendSureshChavhanke pic.twitter.com/WMRbPbhVfV
— Jamia Millia Islamia (@jamiamillia_) August 27, 2020
आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने की आलोचना
छत्तीसगढ़ के आईपीएस अधिकारी आरके विज ने इस कार्यक्रम के टीज़र पर प्रतिक्रिया करते हुए इसे 'घृणित' और 'निंदनीय' बताया है और कहा है कि वो इस बारे में 'क़ानूनी विकल्पों पर ग़ौर कर रहे हैं'.
Exploring legal options @ashubh https://t.co/u4BK6cbuYk
— RK Vij, IPS (@ipsvijrk) August 27, 2020
छत्तीसगढ़ काडर के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण ने भी इस शो पर प्रतिक्रिया करते हुए लिखा है कि 'इसे बनाने वाले से इस कथित पर्दाफ़ाश के स्रोत और उसकी विश्वसनीयता के बारे में पूछा जाना चाहिए'.
A new entry in the ‘मंडी’ of TRP. He should be asked about the source and reliability of this so called “पर्दाफ़ाश.” https://t.co/y0zh28Wz1j
— Awanish Sharan (@AwanishSharan) August 27, 2020
पुड्डुचेरी में तैनान आईपीएस अधिकारी निहारिका भट्ट ने लिखा है, "धर्म के आधार पर अफ़सरों की निष्ठा पर सवाल उठाना ना केवल हास्यापस्द है बल्कि इसपर सख़्त क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. हम सब पहले भारतीय हैं."
A despicable attempt at hate mongering. To question the credentials of officers on the basis of religion is not only laughable, but should also be dealt with strictest legal provisions.
— Niharika Bhatt IPS (@niharika_bhatt) August 27, 2020
We are all Indians first ???????? https://t.co/6NoDA1fiAU
हरियाणा के आईएएस अधिकारी प्रभजोत सिंह ने लिखा है, "पुलिस इस शख़्स को गिरफ़्तार क्यों नहीं करती और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट या अल्पसंख्यक आयोग या यूपीएससी इस पर स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लेते? ट्विटर इंडिया कृपया कार्रवाई करे और इस एकाउंट को सस्पेंड करे. ये हेट स्पीच है."
Why dont police arrest him and why SC or HCs or Minorities commission or UPSC dont take suo motto cognizance now? @TwitterIndia please take action and suspend this account. Its hate speech. https://t.co/A24LzH8Z3Y
— Prabhjot Singh IAS (@PrabhjotIAS) August 27, 2020
बिहार में पूर्णिया के ज़िलाधिकारी राहुल कुमार ने लिखा है, "ये बोलने की आज़ादी नहीं है. ये ज़हर है और संवैधानिक संस्थाओं की आत्मा के विरूद्ध है. मैं ट्विटर इंडिया से इस एकाउंट के विरूद्ध कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ."
This is not free speech. This is sheer poison and against the fabric of our constitutional institutions. I request @TwitterIndia @TwitterSafety @Twitter to take action against this account. https://t.co/IBkP4EskD5
— Rahul Kumar (@rahulias6) August 27, 2020
The only identity that will forever matter and define us, the civil servants, is being Indian ????????
— Rakesh Balwal (@ips_balwal) August 27, 2020
Hate Speech Check @TwitterIndia https://t.co/m9Xnri4Ux4
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए में कार्यरत आईपीएस अधिकारी राकेश बलवल ने लिखा है, "हम सिविल सेवा अधिकारियों के लिए एकमात्र पहचान जो कोई अर्थ रखती है, वो है भारत का राष्ट्र ध्वज."(bbc)
- प्रवीण साहनी
अगर अमेरिका के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी- ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी दक्षिण चीन सागर के मामले में चीन को सैन्य कार्रवाई की धमकी देते, तय मानिए कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की ओर से इसका उचित जवाब जरूर दिया जाता। लेकिन भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने हाल ही में कहा कि अगर लद्दाख में भारत-चीन की वार्ता विफल रहती है तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प है, तो इस पर पीएलए एकदम से मौन है। ऐसा क्यों?
इसका बड़ा सीधा-सा कारण हैः आधुनिक प्रौद्योगिकियों के जानकार भली-भांति जानते हैं कि या तो जनरल रावत जुमलेबाजी कर रहे हैं या फिर आज युद्ध के पूरी तरह बदल चुके चरित्र से वह पूरी तरह नावाकिफ हैं। प्रौद्योगिकियों और ऑपरेशन या युद्ध लड़ने की कला के मामले में भारतीय सेना और चीन की पीएलए के बीच जो विशाल अंतर है, उसे शायद 1991 के खाड़ी युद्ध के उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है। खाड़ी युद्ध 43 दिनों तक चला जिसमें से जमीनी मुकाबला मात्र 100 घंटे का था जो अनिवार्य रूप से ऑपरेशन को समाप्त करने के लिए था। पड़ोसी देश ईरान के साथ एक दशक लंबी लड़ाई का अनुभव रखने वाली इराकी सेना के जाबांज रिपब्लिकन गार्ड्स अमेरिकी प्रौद्योगिकी के सामने बिना लड़ाई लड़े बुरी तरह हार गए थे।
दुनिया, विशेष रूप से पीएलए को अमेरिका की ‘स्टील्थ तकनीक, गाइडेड युद्धक सामग्री, और इनसे भी ज्यादा युद्ध नेटवर्क (सेंसर, निशानेबाजों और कमांड पोस्ट के बीच वास्तविक समय की कनेक्टिविटी) पर आधारित युद्ध लड़ने की रणनीति देखकर मानो काठ मार गया। पीएलए ने तत्काल समझ लिया कि अमेरिकी सैन्य प्रौद्योगिकीय क्षमताओं का मुकाबला कर सकने वाला तकनीकी, वैज्ञानिक-औद्योगिक बुनियादी ढांचा और पैसा उसके पास नहीं है। लेकिन चीन ने इसकी तोड़ निकाली। युद्ध में समय पर निर्णय लेना सबसे अहम होता है और इसके लिए उसने सिस्टम डिस्ट्रक्शन वारफेयर, यानी ऐसी व्यवस्था विकसित की जो अमेरिका के युद्ध नेटवर्क कमांड, कंट्रोल, संचार और निगरानी प्रणाली को या तो काम ही न करने दे या फिर उसे सूचना इकट्ठा करने में देरी हो।
चीन ने यह क्षमता साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध कौशल और मिसाइलों (बैलिस्टिक और क्रूज) पर ध्यान केंद्रित करके विकसित की। वर्ष 2000 के शुरू में ही चीन के पास असासिन्समेस, यानी दुश्मन की सूचना व्यवस्था को ठप करके उसे अचानक और पूरी तरह से अक्षम कर देने की क्षमता आ गई थी। दुश्मन से सीधे लड़ने के बजाय उसे पंगु बना देने की चीन की इस क्षमता ने अमेरिकी सेना का ध्यान अपनी ओर खींचा। अमेरिका को इससे भी तेज झटका 2012 में उस समय लगा जब उसे पता चला कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और 11 आधुनिक अवरोधात्मक प्रौद्योगिकी में भी चीन उसका एक बड़ा प्रतिस्पर्धी बन गया है और जाहिर है कि इन क्षमताओं के कारण समृद्धि के लिए चौथी औद्योगिक क्रांति की राह पर चलते हुए बीजिंग युद्ध-कौशल और भू-राजनीति को बदल देने जा रहा है।
चीन की ताकत को नया आयाम देने वाली ये प्रौद्योगिकियां हैंः माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक, साइबर तकनीक, 5-जी वायरलेस संचार, अंतरिक्ष, हाइपरसोनिक, निर्देशित ऊर्जा हथियार, नेटवर्क संचार, मिसाइल रक्षा, क्वांटम तकनीक और परमाणु परीक्षण। और तो और, माना जाता है कि 5-जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम-जैसी कुछ तकनीकों में तो चीन ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। चीन की इस प्रौद्योगिकीय उन्नति का ही असर था कि अमेरिका ने 2014 में रोबोटिक्स, ऑटोनोमी और मानव- मशीन फ्यूजन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी तीसरी ऑफसेट रणनीति की घोषणा की। चीन की चुनौती का सामना करने के लिए ही अमेरिका ने यह तीसरी ऑफसेट रणनीति पर आगे बढ़ने का फैसला किया और यह चीन की युद्ध कौशल के लिए तकनीक प्रेरित उन्नति का स्पष्ट प्रमाण था।
दुर्भाग्य है कि भारत के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी 1990 के बाद के महत्वपूर्ण 30 वर्षों तक पाकिस्तान और आतंकवाद-रोधी अभियानों में उलझे रहे और चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पीएलए की बढ़ती चुनौतियों से मुंह मोड़े रहे। यह बात खास तौर पर जनरल रावत के मामले में एकदम सटीक बैठती है जिन्हें दिसंबर, 2016 में इसलिए सेना प्रमुख बनाया गया क्योंकि आतंकवाद विरोधी ऑपरेशंस में उन्हें कथित तौर पर विशेषज्ञता हासिल थी।
पीएलए और पाकिस्तान की सेना में बहुत अंतर है इसलिए यह बात शीशे की तरह साफ है कि चीन को रोकने के लिए युद्ध का एकदम नया खाका तैयार करना होगा। भारतीय सेना बहादुरी के साथ युद्ध लड़ने वाली अनुभवी सेना है और यह तय है कि पीएलए भारतीय सेना की इस ताकत से दो-दो हाथ नहीं करेगा। इसके बजाय वह युद्ध को अपनी ताकत के मुताबिक लड़ेगा, यानी उसकी युद्ध रणनीति तकनीक आधारित होगी। जब सीडीएस रावत ने चीन को धमकी दी तो उन्होंने पीएलए की युद्ध लड़ने की क्षमताओं में हुई बेतहाशा वृद्धि को नजरअंदाज कर दिया। उन्हें और ज्यादातर विश्लेषकों को यह बात समझ में नहीं आ रही कि 2017 के डोकलाम और 2020 के लद्दाख संकट में जमीन-आसमान का अंतर है।
यह मानते हुए कि जनरल रावत लापरवाह हैं और वह पूर्वी लद्दाख में कब्जे वाले इलाके को खाली कराने के मकसद से पीएलए पर दबाव डालने के लिए 3,488 किमी लंबे एलएसी पर एक नया मोर्चा खोलने का फैसला करेंगे, यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जैसे ही भारत की ओर से पहली गोली चली, चीन की ओर से तत्काल एक साथ चार मोर्चे पर जवाबी कार्रवाई का होना तय है। वैसी स्थिति में चीन युद्ध के निर्दिष्ट क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करेगा। तब एक ऐसा बड़ा साइबर हमला संभव है जो पूरे देश को प्रभावित कर दे।
चूंकि चीनी कंपनियां भारत के दूरसंचार, बिजली, सूचना और संचार से लेकर रक्षा ग्रिड से भी जुड़ी हुई हैं, इसलिए सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि युद्ध के आभासी मैदान में एक साइबर युद्ध वास्तव में क्या कुछ कर जाएगा। इस तरह का युद्ध दुनिया ने अब तक देखा भी नहीं है। पूरे व्यावसायिक और वित्तीय क्षेत्र में घबराहट, भय और अफरा-तफरी का माहौल होगा और सरकार को समझ में नहीं आ रहा होगा कि क्या करे।
पीएलए की ओर से दूसरा संभावित हमला होगा कमांड और संचार प्रणाली पर। चीन की सर्वोच्च सैन्य नीति निर्धारक निकाय सेंट्रल मिलिट्री कमीशन इस रणनीति को अपने मातहत दो प्रमुख संगठनों के जरिये अंजाम देगा। ये संगठन हैंः साइबर, स्पेस, इलेक्ट्रॉनिक और मनोवैज्ञानिक क्षमताओं से युक्त स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फोर्स और रॉकेट फोर्स जिसके तहत सभी बैलिस्टिक, क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइल आती हैं। ऐसी स्थिति में माना जा सकता है कि भारत के अंतरिक्ष उपग्रह साइबर मालवेयर हमलों से लेकर पीएलए की उप-कक्षीय उपग्रहों को पंगु बनाने और उपग्रह-विरोधी क्षमताओं के निशाने पर होंगे। इसके साथ ही कमांड सेंटर, विभिन्न फील्ड मुख्यालय, एयरफील्ड और महत्वपूर्ण सूचना उपलब्ध कराने वाले केंद्रों पर भी हमले किए जाएंगे।
मोटे तौर पर पीएलए का लक्ष्य होगा समय पर निर्णय लेने के लिए जरूरी सूचनाओं से भारतीय सेना को वंचित कर देना। इसका नतीजा यह होगा कि युद्ध के दौरान निर्णय लेने के मामले में पीएलए को अहम बढ़त मिल जाएगी और वह तेजी से सटीक कार्रवाई कर सकेगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि पीएलए ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक से अपने हथियारों को लैस कर रखा है। इसका असर युद्ध लड़ने के हर पहलू पर पड़ेगा- तेज और सटीक जानकारी पाने, टोही और निगरानी से लेकर त्वरित कार्रवाई तक।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विकास अभी आरंभिक चरण में है लेकिन ये दो उदाहरण यह समझने के लिए काफी हैं कि युद्ध में इनका इस्तेमाल किस तरह हो सकता है। इसका सीधा मतलब है कि क्रूज मिसाइल बिना नियंत्रण के खुद ही इतनी सक्षम होंगी कि लक्ष्य को खोजकर उसे खत्म कर सकें। इसके अलावा पीएलए ने बड़ी संख्या में ड्रोन या मानवरहित हवाई वाहनों को नियंत्रित करने वाले एक उन्नत जमीनी स्टेशन की क्षमता का भी प्रदर्शन किया है।
कुल मिलाकर यह यह निश्चित है कि उन्नत प्रौद्योगिकी क्षमता के मुकाबले खड़ी भारतीय प्रशिक्षित सेना पीएलए को कब्जे वाले क्षेत्रों से बेदखल नहीं कर सकेगी। वही वजह है जो जनरल रावत की चेतावनी को हवा-हवाई बनाती है।(navjivan)
जन्म 27 अगस्त, 1935, दिल्ली
- अनुराग भारद्वाज
कुछ समय पहले खबर आई थी कि आईआईटी कानपुर के छात्रों द्वारा मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ गाए जाने के मामले की जांच होगी. आईआईटी के छात्रों ने यह नज़्म नए नागरिकता कानून का विरोध करते दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के समर्थन में गाई थी. इसके खिलाफ एक शिकायत की गई थी. इसमें कहा गया था कि फ़ैज की इस नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं जो हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर सकते हैं.
करीब साढ़े तीन दशक पहले भी इस नज़्म से भावनाएं आहत होने का डर था. फर्क बस इतना है कि यह डर सरहद पार था. किस्सा यूं है कि 1985 में पाकिस्तान के फौजी आमिर (डिक्टेटर) ज़िया-उल-हक़ ने मुल्क में कुछ पाबंदियां लगा दी थीं. इनमें औरतों का साड़ी पहनना और शायर फैज़ अहमद फैज़ के कलाम गाना शामिल था. दोनों ही बातें निहायत ही बचकाना थीं. तब एक गायिका जिनका नाम इकबाल बानो था, उन्होंने इन फैसलों की मुख़ालफ़त करने की ठान ली और ऐलान करवा दिया कि अमुक रोज़ वे इन पाबंदियों को तोड़ देंगी. इसके लिए उन्होंने लाहौर स्टेडियम का इंतेख़ाब किया.
तयशुदा दिन स्टेडियम में ख़ास इंतज़ाम किये गए थे- हुक्मरानों ने इकबाल बानो को रोकने के लिए और उन्होंने इसकी मुखालफ़त के लिए. शाम का वक़्त था. तकरीबन पचास हज़ार सामईन (दर्शक) इस वाक़ये के गवाह बनने के लिए हाज़िर हो गए.
उस रोज़ काली साड़ी पहने इकबाल बानो निहायत खूबसूरत लग रही थीं. उन्होंने माइक संभाला और अपनी खनकदार आवाज़ में फ़रमाया; ‘आदाब!’ स्टेडियम गूंज उठा. चंद सेकंड बाद उन्होंने फिर कहा; ‘देखिये, हम तो फैज़ का कलाम गायेंगे और अगर हमें गिरफ्तार किया जाए तो मय साजिंदों के किया जाए जिससे हम जेल में भी फैज़ को गाकर हुक्मरानों को सुना सकें!’ स्टेडियम सन्न रह गया था. फिर जब तबले बोल उठे, शहनाई गूंज उठी तो बानो गा उठीं - ‘हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे...’ यह फैज़ अहमद फैज़ की माक़ूल नज्मों में से एक थी.
इस नज़्म में बीच में आता है - ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे’, तो एक लाख हाथों ने आपस में मिलकर वह शोर मचाया कि स्टेडियम गूंज उठा. तकरीबन दस मिनट तक तालियों की गडगडाहट सुनाई दी. पाबंदियों की धज्जियां उड़ाकर रख दी गयी थीं. माहौल में गर्मी देखकर पुलिस की हिम्मत नहीं हुई उन्हें गिरफ्तार करने की. इस कदर बेख़ौफ़-ऐ-ख़तर थीं इकबाल बानो.
इकबाल बानो का जन्म 27 अगस्त, 1935 को दिल्ली में हुआ था. उनके वालिद मूलतः रोहतक के रुबाबदार ज़मींदार थे जिनके पास अच्छी-खासी ज़मींदारी थी. कहते हैं, घर में खुला माहौल था. उन्होंने बानो को दिल्ली घराने के उस्ताद चांद खान की शागिर्दी में कर दिया. उस्ताद ने उनके हुनर को बखूबी तराशा. उनको दादरा और ठुमरी की ज़बरदस्त ट्रेनिंग दी गयी. बताते चलें कि दिल्ली घराना इस मुल्क के सबसे पुराने घरानों में से एक है.
1950 में एक रोज़ जब दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो को कुछ नए गायकों की ज़रूरत हुई तो उस्ताद अपनी शागिर्द को ले गए और ऑडिशन करवाया. इसके पहले ऑडिशन खत्म होता, बानो को गाने का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका था. बस यहीं से उनके सितारा बनने का सफ़र हो गया.
बानो जब 17 साल की हुईं तो उनका पाकिस्तान के सूबे मुल्तान के एक ज़मींदार से निकाह हो गया. मेहर की रस्म में उनके वालिद ने बानो को ताजिंदगी गाने देने का अहद लिया उनके शोहर से. शोहर ने भी इस अहद को बाकमाल खूब निभाया. 1955 के आते-आते इकबाल बानो शोहरत की बुलंदी पर थीं. उर्दू फिल्में जैसे गुमनाम, क़त्ल, इश्क-ए-लैला और नागिन में उनके गए नगमे खूब हिट हुए.
पर इकबाल बानो का असल हुनर तो क्लासिकल गायकी जैसे - ठुमरी, दादरा में था. किसी ने उनको सलाह दी कि उनकी आवाज़ गज़लों पर खूब फबेगी. बस फिर क्या था? उनके सफर में एक और राह जुड़ गई. ग़ज़ल सुनने वालों ने उनकी गायकी के अंदाज़ को ख़ूब पसंद किया. उनका शेर पढने का अंदाज़, शेर के अलग-अलग माने कहना और बेगम अख्तर की तरह लफ़्ज़ों के उच्चारण पर ख़ास ध्यान देना, सुनने वालों को बेइंतहा भाया.
1970 में इकबाल बानो के शोहर का इंतकाल हो गया. इसके बाद वे मुल्तान से लाहौर चली आईं और फिर यहीं की होकर रह गयीं. इस दौर में फैज़ अहमद फैज़, नासिर काज़मी (दिल में एक लहर सी उठी है अभी...) जैसे शायरों के कलाम उन्होंने तसल्लीबख्श गाये जो खूब पसंद भी किये गए. कहते हैं कि फैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’ को गाकर इकबाल बानो ने इस नज्म को और इस नज़्म ने इकबाल बानो को अमर कर दिया. 1974 में उन्हें पाकिस्तान सरकार ने ‘तगमा–ए-इम्तियाज़’ से नवाज़ा.
फिर ये किस्सा यूं ख़त्म हुआ कि चंद रोज़ वे बीमार रहीं और 21 अप्रैल, 2009 में लाहौर में उनका इंतेकाल हो गया. लेकिन उनके सुनने वालों के लिए इकबाल बानो हमेशा हैं और रहेंगी.(satyagrah)
- Eesha
हमारा देश अनगिनत सामाजिक आंदोलनों के आधार पर बना है। हज़ारों स्वतंत्रता आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के बाद ही हमें साल 1947 में जाकर आज़ादी मिली। आज़ाद होने के बाद भी अनेक बार इस देश के नागरिकों को सामाजिक आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा है। मौजूदा खराब परिस्थितियों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए या सरकार द्वारा किए गए किसी अन्याय के विरोध के लिए लोग सामाजिक आंदोलनों का सहारा लेते हैं। इनमें से कई आंदोलन ऐसे हैं जो महिलाओं ने शुरू किए थे और आगे बढ़ाए थे।
साल 2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किस तरह देशभर की महिलाएं सड़कों पर उतर आई थी वह हम सबने देखा है। ‘शाहीन बाग की दादियों’ के बारे में आज पूरी दिल्ली जानती है। यह पहली बार नहीं है जब भारत की औरतों ने एकजुट होकर नया इतिहास रच दिया हो। इसलिए हम आज बात करेंगे औरतों द्वारा शुरू किए गए उन छह सामाजिक आंदोलनों की, जो इस देश की प्रगति में मील के पत्थर साबित हुए।
1. चिपको आंदोलन
साल 1973 में मौजूदा उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में ‘चिपको आंदोलन’ शुरू हुआ था। इस क्षेत्र के जंगल सरकार ने इलाहाबाद के एक खेल सामग्री बनाने वाले को बेच दिए थे ताकि पेड़ों को काटकर टेनिस रैकेट बनाए जा सके। स्थानीय महिलाओं ने इस निर्णय का विरोध किया और गौरा देवी के नेतृत्व में जंगलों को कटने से बचाने के लिए वे पेड़ों से चिपककर खड़ी हो गई। यह था ‘चिपको आंदोलन’। यह सामाजिक आंदोलन चार दिनों तक जारी रहा जिसके बाद खेल सामग्री की कंपनी को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद उत्तराखंड के पहाड़ों में पेड़ काटना 15 सालों के लिए प्रतिबंधित रहा। चिपको आंदोलन भारत के सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय आंदोलनों में से एक है।
2. ग्रंविक हड़ताल
यह आंदोलन भारत में तो नहीं हुआ, पर इसमें शामिल सभी महिलाएं भारतीय मूल की थी। लंदन की ग्रंविक फैक्ट्री में ज़्यादातर कामगार भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों की महिलाएं थी। साल 1976 में एक कामगार जयाबेन देसाई ने फैक्ट्री के असहनीय हालात और अधिकारियों की नाइंसाफ़ी के खिलाफ़ फैक्ट्री कामगारों का हड़ताल बुलाया था। उनका कहना यह था कि कुछ ही दिनों पहले उनके बेटे देवशी को फैक्ट्री से निकाल दिया गया था। उन्होंने यह शिकायत भी थी कि फैक्ट्री के मालिक नस्लवादी हैं और जानबूझकर अपने भारतीय, एशियाई और अफ्रीकन कामगारों से अमानवीय परिस्थितियों में काम करवाते हैं। इस हड़ताल में शामिल लगभग 130 कामगारों को नौकरी से निकाल दिया गया। एक साल तक ग्रंविक फैक्ट्री के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन जारी रहे जिनमें बीस हज़ार से भी ज़्यादा भारतीय महिला कामगारों ने भाग लिया। यह आंदोलन अधूरा रह गया क्योंकि इन औरतों की मांगें कभी पूरी नहीं हुई पर इतिहास में पश्चिमी दुनिया ने देखा कि भारतीय औरत शोषण के खिलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है।
2019 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में किस तरह देशभर की महिलाएं सड़कों पर उतर आई थीं वह हम सबने देखा है। ‘शाहीन बाग की दादियों’ के बारे में आज पूरी दिल्ली जानती है। यह पहली बार नहीं है जब भारत की औरतों ने एकजुट होकर नया इतिहास रच दिया हो।
3. न्यूक्लियर विरोधी आंदोलन
साल 1988 में तमिलनाडु के इडिंतकरई गांव की औरतों ने तिरुनेलवेली में बसाए जानेवाले कुडंकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट का विरोध करना शुरू किया। मछुआरा समुदाय की इन औरतों का कहना है कि न्यूक्लियर विकिरण समुंदर को नुकसान पहुंचा सकता है, जो पर्यावरण और उनके रोज़गार दोनों के लिए एक खतरा है। साल 2001 में इस पावर प्लांट का निर्माण शुरू हुआ और यह साल 2013 से क्रियाशील है। इस बीच कई हड़ताल, प्रदर्शन और आमरण अनशन भी किए गए हैं पर किसी भी सरकार ने अभी तक इन महिलाओं की नहीं सुनी है।
4. अरक विरोधी आंदोलन
साल 1990 से देशभर में साक्षरता अभियान शुरू हुए। इन अभियानों में महिलाओं ने भारी मात्रा में हिस्सा लिया। साक्षरता अभियान महिलाओं के लिए फ़ायदेमंद साबित हुए क्योंकि वे यहां सिर्फ़ पढ़ना-लिखना ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों के बारे में भी सीख रही थी। आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में इन्हीं अभियानों ने एक सामाजिक आंदोलन छेड़ दिया। महिलाएं जितनी जागरूक होने लगी, उन्हें एहसास होने लगा कि उनके गांव में ठेका शराब या ‘अरक’ की बिक्री एक बहुत बड़ी समस्या है। उनके पति दिनभर शराब के नशे में चूर रहते और काम पर नहीं जाते, जिसका असर उनकी आर्थिक स्थिति पर पड़ता। शराब पीकर वे घरेलू हिंसा भी करते थे। साल 1992 में महिलाओं ने ‘अरक विरोधी आंदोलन’ शुरू किया जिसका मकसद था पूरे राज्य में ठेका शराब पर प्रतिबंध लगाया जाए। यह आसान नहीं था क्योंकि शराब माफ़िया के साथ कई बड़े राजनेता भी शामिल थे, पर लंबे संघर्ष के बाद यह आंदोलन कामयाब हुआ।
5. मुन्नार चाय बागान हड़ताल
साल 2015 में केरल के मुन्नार के चाय बागानों में काम करती महिलाओं ने अपनी पगार 230 रुपए से 500 रुपए में बढ़ाने के लिए आंदोलन किया। धीरे-धीरे आंदोलन बड़ा होता गया और सिर्फ़ पगार बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा। नौ दिनों तक हड़ताल करती महिला कामगारों ने कहा कि पुरुष कामगारों से कहीं ज़्यादा काम करने के बावजूद उन्हें सही वेतन नहीं मिलता और उनके साथ काम करनेवाले मर्द दिनभर शराब के नशे में पड़े रहकर भी उनसे ज़्यादा कमाते हैं। महिलाओं की शिकायत यह भी थी कि सारी बड़ी राजनैतिक पार्टियों के मज़दूर संगठन उनका साथ देने का नाटक ही करते हैं और अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल ही करते हैं। इसलिए इस आंदोलन में सिर्फ़ महिलाओं को हिस्सा लेने दिया गया और किसी भी नेता या राजनैतिक संगठन को इसमें भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई। महिलाओं ने अपनी लड़ाई अकेले लड़ी और अपने अधिकार हासिल करने में सफल हुईं।
6. दिल्ली गैंगरेप के विरोध में प्रदर्शन
दिसंबर 2012 में दिल्ली की एक बस में एक छात्रा का सामूहिक बलात्कार किया गया और उसे नृशंस तरीके से मारा गया। इसके बाद दिल्ली में कई महिलाएं हमारे समाज के ‘रेप कल्चर’ का विरोध करने और एक सुरक्षित, आज़ाद ज़िंदगी जीने के अपने अधिकार के लिए सड़कों पर उतर आईं। इंडिया गेट के सामने हज़ारों प्रदर्शनकारी इकट्ठे हुए और संसद भवन के सामने भी प्रदर्शन हुए। पुलिस और प्रशासन ने बेरहमी से प्रदर्शनकारियों को दबाने की कोशिश की पर आंदोलन बड़ा होता गया और दिल्ली से पूरे देश में फैल गया।
अपूर्व गर्ग
लोकतंत्र बार-बार मौके देता है तानाशाही सोचने का भी मौका नहीं देती। लोकतंत्र कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति को भी सारे अधिकार देते हुए देश का प्रथम व्यक्ति बनने का अवसर देती है। तानाशाही अंतिम व्यक्ति तो दूर प्रथम व्यक्ति को भी सूली पर चढ़ाकर सारे अधिकार कुचल डालती है। इसलिए लोकतंत्र पर होने वाले हर हमले को कभी हलके में न लेकर सजग-सचेत रहकर एकजुटता से लडऩा चाहिए।
तानाशाही की सूली पर चढऩे वाले ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने भी गलती की थी। जनरल जिया का चुनाव भुट्टो ने यह जानते हुए किया कि उसके कट्टर पंथी संगठन से रिश्ते हैं, उन्हें यह भी बताया गया वह लालची, भ्रष्ट किस्म का है फिर भी जिया का चुनाव करते हुए भुट्टो ने कहा ‘सरकार को फौज के मामले में दखल नहीं देना चाहिए’।
भुट्टो ने सेना को हमेशा हल्के में लिया
बांग्लादेश के बँटवारे से पहले 20 मार्च 1971 को जब शेख मुजीब और भुट्टो कि ढाका में मुलाकात हुई तो शेख मुजीब ने भुट्टो को चेताया ‘सेना पर भरोसा मत करना नहीं तो यह हम दोनों को नष्ट कर देगी।, इस पर भुट्टो ने अपने ढंग का उत्तर दिया-‘मैं इतिहास द्वारा नष्ट किए जाने कि बजाय सेना के हाथो मरना पसंद करूँगा’।
इन दोनों के बीच हुई इस चर्चा को भुट्टो के भारतीय बचपन के दोस्त रूसी मोदी ने भुट्टो के प्रधान मंत्री रहते हुई अपनी किताब ‘मेरा दोस्त जुल्फी’ (1973 ) में इसका उल्लेख भी किया। पर भुट्टो को सेना पर भरोसा था, उधर शेख मुजीब की भविष्यवाणी सच साबित हुई बांग्लादेश बनने के बाद उनकी सेना ने उनकी हत्या कर दी और इधर जनरल जिया ने प्रधान मंत्री भुट्टो और उनके परिवार के साथ जानवरों से भी बुरा सलूक कर भुट्टो को फाँसी पर चढ़ा दिया।
इसके बाद जनरल जिया के रहते भुट्टो परिवार लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा, इन्हें मुक्ति तब मिली जब कुछ लोकतंत्र की बहाली हुई और इसी लोकतंत्र के लिए बेनजीर को जेल से लेकर सडक़ तक लडऩा पड़ा और लोकतंत्र ने ही उन्हें प्रधानमंत्री भी बनाया।
...तो तानाशाही ने किसी को नहीं बख्शा न भुट्टो की लापरवाही को न ख़ुद तानाशाह जिय़ा को। जबकि लोकतंत्र आसिफ़ जऱदारी बिलावल भुट्टो तक को मौके पे मौका दे रही। लोकतंत्र अधिकार ही नहीं पूरे मौके देती है और तानाशाही सब कुछ छीन लेती है, समझिये।


