विचार/लेख
कैसे किया जाता हैै, VPN का इस्तेमाल
अगर कोई देश किसी वेबसाइट को ब्लॉक कर देता है तो तमाम इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर उस वेबसाइट को एक्सेस नहीं देते हैं। सामान्य तौर पर अगर आप कुछ वेबसाइटों का यूआरएल ओपन करेंगे, तो उसे ओपन नहीं कर पाएंगे। ऐसी स्थिति में लोग वीपीएन का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट इस्तेमाल करते समय आपने कई बार वीपीएन के बारे में सुना होगा। सीधे-सीधे बोलें, तो वीपीएन मतलब वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क और इसका इस्तेमाल उन वेबसाइट्स को ओपन करने में किया जाता है जो इंटरनेट पर ब्लॉक की गयी होती हैं।
आइये डिटेल जानते हैं-
वीपीएन के बारे में अगर गहराई से जानकारी ली जाए तो इसका इस्तेमाल तमाम बड़ी कंपनियां और यहां तक कि कई देश अपनी वेबसाइट के डाटा को सिक्योर रखने के लिए इस्तेमाल करते हैं, ताकि इंटरनेट पर उनकी महत्वपूर्ण सूचनाएं चोरी न की जा सकें। आपके मन में एक प्रश्न उठ सकता है कि अगर यह साइट्स इतनी गुप्त होती हैं तो फिर जरूरत पड़ने पर इनके ओनर इसको कैसे एक्सेस करते हैं, तो इसका जवाब यही है कि इसके लिए एक खास आईपी और यूजर नेम और पासवर्ड की सहायता से इसे एक्सेस किया जा सकता है। वर्तमान में कई कंपनियां फ्री में भी वीपीएन सर्विसेज प्रोवाइड करती हैं। हालांकि अगर आपको रेगुलर और स्मूथ वीपीएन सर्विस चाहिए, तो कई कंपनियां इसके लिए चार्ज करती हैं पेड वीपीएन का यह फायदा होता है कि आपको ऐड फ्री एक्सपीरियंस मिलता है, साथ ही फ्री वीपीएन की तुलना में यहां से फ्री होता है ऐड फ्री! सॉफ्टवेयर डेवलपर के अनुसार, एक वीपीएन फ्री होने के बावजूद भी सेफ्टी के मामले में काफी एडवांस है और एक्सेस करने के लिए इन्हीं में से एक है ओपेरा का डेवलपर सॉफ्टवेयर। इन्टरनेट से इसे आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं। कंप्यूटर में इसका इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले आपको इसे इंस्टॉल करना पड़ेगा और मीनू ऑप्शन में जाकर सेटिंग पर क्लिक करना होगा। यहां आपको प्राइवेसी और सिक्योरिटी का ऑप्शन दिखेगा, जहां पर आपको वीपीएन को इनेबल करना है। अब इसके बाद इस ब्राउजर में आप किसी भी ब्लॉग वेबसाइट को आसानी से ओपन कर पाएंगे, जो सामान्य तौर पर ब्लॉक्ड होती हैं। न केवल कंप्यूटर में, बल्कि मोबाइल में भी आप वीपीएन इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आपको TouchVPN जैसे ऐप इंस्टाल करने पड़ेंगे। स्पेसिफिकली अगर टच वीपीएन की बात करें तो, इसके लिए आपको लोकेशन सेलेक्ट करके कनेक्ट पर क्लिक करना पड़ेगा, जिसके बाद वीपीएन सक्रीय हो जायेगा।
- मिथिलेश कुमार सिंह
-सुसान चाको, ललित मौर्या
सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त, 2020 को दिए अपने आदेश में साफ कर दिया है कि देश में कोरोनावायरस से निपटने के लिए अलग से नई राष्ट्रीय नीति बनाने की जरुरत नहीं है। कोर्ट इस मामले में सरकार को नई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना बनाने और उसे लागु करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत पहले ही अलग-अलग आदेशों के अनुरूप 2019 में एक राष्ट्रीय योजना पहले ही लागु की जा चुकी है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा दायर याचिका पर दिया गया है। यह जनहित याचिका कोविड-19 महामारी के मद्देनजर दायर की गई थी। जिसमें कोरोनावायरस से निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नई योजना तैयार, अधिसूचित और लागू करने की मांग की गई थी।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं ने इस महामारी से निपटने और जरुरी मदद देने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) के उपयोग की भी मांग की थी। इसके साथ ही यह भी मांग की गई थी कि सभी व्यक्तियों/ संस्थानों से जो भी अंशदान और अनुदान कोविड-19 से निपटने के लिए दिया जा रहा है उसे राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में जमा कराया जाए। साथ ही अब तक इस उद्देश्य के लिए जो फण्ड पीएम केयर में डाला गया है उसे भी राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में जमा कराया जाए। कोर्ट ने सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की इस मांग को अस्वीकार कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और पीएम केयर दो अलग तरह के फण्ड हैं, जिनके उद्देश्य भी अलग हैं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि केंद्र सरकार महामारी से लड़ने में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का बहुत बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर रही है। इसमें नए दिशानिर्देशों के अनुसार, राज्यों के अनुरोध पर फंड जारी किया जा रहा है।
आदेश के अनुसार पीएम केयर फंड एक अलग तरह का फण्ड है जोकि एक तरह का सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है।
देश में 30 लाख से ज्यादा हो चुके हैं मामले
भारत ही नहीं दुनिया भर के सामने कोरोनावायरस एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह बीमारी दुनिया भर में 2 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। अकेले भारत में इसके 30,44,940 मामले सामने आ चुके हैं। इस संक्रमण से अब तक 56,706 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। पिछले 24 घंटों में 69,239 नए मामले सामने आये हैं और 912 लोगों की मौत हुई। जबकि देश भर में 22,80,565 मरीज ठीक हो चुके हैं।
यदि राज्यस्तर पर देखें तो अब तक महाराष्ट्र में इसके 671,942 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से 480,114 ठीक हो चुके हैं। जबकि दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है जहां अब तक 373,410 मामले सामने आ चुके हैं। तीसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश है, जहां अब तक 345,216 मामले सामने आ चुके हैं। कर्नाटक में 271,876, उत्तरप्रदेश में 182,453, दिल्ली 160,016, पश्चिम बंगाल में 135,596, बिहार में 119,529, तेलंगाना में 104,249, असम में 89,468 जबकि गुजरात में भी अब तक संक्रमण के करीब 85,523 मामले सामने आ चुके हैं। (downtoearth)
-रश्मि सहगल
कोविड-19 महामारी डैने फैलाकर बढ़ रही है। इसकी रफ्तार ऐसी है कि कोई आश्चर्य नहीं कि इससे संक्रमित लोगों की संख्या के मामले में भारत अमेरिका को पछाड़कर पहले नंबर पर पहुंच जाए। संक्रमण की स्थिति की पहचान और इससे बचाव के लिए 2 अप्रैल को आरोग्य सेतु ऐप की घोषणा की गई थी। 2 अप्रैल को जब इसकी घोषणा की गई, वह पहले लॉकडाउन का नौवां दिन था। उस वक्त कोविड-19 के मामले काफी कम थे और अधिकांश लोगों को भरोसा था कि कुछ ही हफ्तों में इसकी बढ़ने की रफ्तार पर हम काबू पा लेंगे।
हमें बताया गया था कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के खयाल से आरोग्य सेतु ऐप महत्वपूर्ण कदम होगा- इसका उपयोग करने वाले व्यक्ति को संक्रमित व्यक्ति के आसपास आने या होने पर सतर्क करने वाली सूचना मिल जाएगी। इस ऐप ने इस कदर आशा जगाई थी कि सिर्फ 13 दिनों के रिकॉर्ड समय में इसे पांच करोड़ लोगों ने डाउनलोड कर लिया था। यह पूरी दुनिया में डाउनलोड किया गया सबसे तेज ऐप बन गया। लगभग दस करोड़ लोग इसे डाउनलोड कर चुके हैं।
कोविड-19 से निबटने में टेक्नोलॉजी और डाटा प्रबंधन के मामलों की देखरेख करने वाले समूह 9 के चेयरमैन के तत्वावधान में 12 मई को हुई प्रेस मीट में एक अधिकारी ने बताया कि यह मोबाइल ऐप्लीकेशन संक्रमित व्यक्ति के आसपास होने की वजह से संक्रमण के संभावित खतरे को लेकर लगभग 1.4 लाख लोगों को चेतावनी दे चुका है और इसने देश में करीब 700 हॉटस्पॉट को लेकर सूचना जुटाने में मदद की है। आरोग्य सेतु आपके फोन के ब्लूटूथ और लोकेशन डेटा का उपयोग करते हुए आपको संक्रमण के पहचाने जा चुके मामलों के डाटाबेस को स्कैन कर बताता है कि आप कोविड-19 वाले किसी व्यक्ति के आसपास हैं या नहीं। फिर, ये आंकड़े सरकार को दिए जाते हैं।
कई विशेषज्ञों ने इस बारे में चेताया है कि कोविड-19 के नए मामलों का पता लगाने के खयाल से ब्लूटूथ एप्लीकेशन किस तरह बेकार है। फिर भी, सरकार ने इस बात पर जोर देते हुए इसे आगे बढ़ाया कि अगर कोई व्यक्ति पिछले दो हफ्तों में कोविड-19 पॉजिटिव पाया गया है, तो यह ऐप संक्रमण और निकटता के खतरे की गणना कर सकता है और वह इसका उपयोग करने वाले व्यक्ति को सलाह दे सकता है कि वह संक्रमण से किस तरह बचे। कुछ अन्य विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि आखिर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी टेक्नोलॉजी डाउनलोड करने का अनुरोध क्यों किया जिसकी क्षमता को लेकर पूरी तरह प्रामाणिकता सिद्ध नहीं है। फिजीशियन और हार्वर्ड में मानवाधिकारों के लिए एफएक्सबी सेंटर के फेलो डॉ. सचित बल्सारी का कहना है कि अधिकांश देशों ने पाया है कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग वाले ऐप काम नहीं करते और उन्होंने इसे वापस ले लिया है। वह कहते हैं कि ‘पारंपरिक कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग बहुत कठिन है इसलिए इसका वैसी टेक्नोलॉजी के साथ संवर्धन करना होगा जो वैध हैं। लेकिन इस किस्म का सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप तब ही बढ़ाया जाना चाहिए जब टेक्नोलॉजी विधि मान्य हो।’
दरअसल, ये ऐप यूनिवर्सिटी कैंपस जैसे अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्रों में काफी ज्यादा संख्यावाले स्मार्टफोन वाली आबादी में कुछ भूमिका निभाने वाले पाए गए हैं। लेकिन ज्यादा बड़े क्षेत्र में उनकी क्षमता कई तरह की चीजों पर निर्भर करती है। यह बिल्कुल सटीकता के साथ गतिविधि को पकड़ने की संवेदनशीलता पर निर्भर है। यह ऐप किसी शॉपिंग मॉल के दो छोरों या किसी दीवार के दोनों तरफ के लोगों के भी विवरण पकड़ पाने में असमर्थ पाया गया है। यह उन नाजुक फर्क को पकड़ने में भी सक्षम नहीं है कि कोविड-19 वायरस कैसे फैलता है।
और तब भी, कन्टेनमेंट जोन में रहने वाले लोगों तथा सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए इसे अनिवार्य बना दिया गया है। नोएडा में इसे डाउनलोड करना अनिवार्य है और जो ऐसा नहीं करते, उन्हें छह माह की जेल हो सकती है। जोमैटो और स्विगी-जैसे खाना पहुंचाने वाले स्टार्ट-अप ने भी इसे अनिवार्य कर दिया है। हवाई और ट्रेन यात्रा करने वालों के लिए भी यह अनिवार्य है। हाल में दिल्ली से अहमदाबाद जाने और वहां से वापस हवाई यात्रा करने वाली गुड़गांव की एक होम मेकर मिन्नी मेहता ने बताया, ‘जब आप एयरपोर्ट में प्रवेश करते हैं और जब वहां सिक्योरिटी चेक करवाने जाते हैं- दोनों ही अवसरों पर आपको अपना ऐप दिखाना पडता है, अन्यथा आपको आगे जाने की अनुमति नहीं मिलेगी।’ उन्होंने बताया कि ‘जब मैं हवाई अड्डेपर थी, तो ऐप ने मुझे बताया कि 'आप किसी संक्रमित व्यक्ति के पास नहीं हैं।’ जब मैं अहमदाबाद हवाई अड्डे पर पहुंची, तब भी मुझ उसी तरह का संदेश मिला।’
कई लोगों ने इसे एक्टिवेट किए बिना भी इसे डाउनलोड कर लिया है। उद्यमी तृप्ति जोशी ने बताया कि 'मैंने इसे डाउनलोड कर लिया है क्योंकि मुझे कम समय के नोटिस पर यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन मैंने अपने ऐप को एक्टिवेट नहीं किया है क्योंकि मुझे इसके कुछ फीचर्स बहुत ही आक्रामक लगते हैं।’
इस ऐप को लेकर कुछ अन्य चीजें हैं जिनसे संदेह पैदा हो रहे हैं। भारत की आबादी का 70 फीसदी से ज्यादा बड़े हिस्से के पास स्मार्टफोन नहीं हैं और इसलिए वे लोग इस ऐप को डाउनलोड करने की हालत में नहीं हैं। एक बिजनेस मैन ने कहा कि ‘रेलवे पहले 16,000 ट्रेन चला रही थी। सरकार इस वक्त महज 260 ट्रेन चला रही है। यह भी चलेगी या नहीं, इसका तब की स्थिति पर फैसला होता है। ऐसे में, इस बड़ी आबादी की ट्रेन यात्रा फिलहाल दूर की कौड़ी ही है।’ और इसलिए उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलनी है।
कोई व्यक्ति कोविड-19 पॉजिटिव पाया जाता है, तो इस ऐप में यह सूचना डाल दी जाती है। लेकिन वैसे लक्षणहीन (एसिम्पटोमैटिक) लोगों का क्या जिन्हें खुद भी पता नहीं है कि वे संक्रमित और वायरस के कैरियर हैं? उनकी केस हिस्ट्री इस ऐप में दर्ज नहीं होगी और वे संक्रमण फैलाते रहेंगे। सवाल यह भी है कि अगर ऐप आधारित कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के परिणाम इतने ही असाधारण थे, तो सरकार टेस्टिंग को लगातार बढ़ाने पर क्यों जोर देती रही है। अभी 17 अगस्त को एक ही दिन में नौ लाख लोगों के टेस्ट किए गए और स्वास्थ्य विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इनकी संख्या और बढ़ानी होगी।
गुड़गांव में कोलम्बिया एशिया अस्पताल के प्रमुख कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. मोनिक मेहता दावा करते हैं कि इस ऐप का एक मात्र लाभ यह है कि यह हमारे बिल्कुल आसपास के इलाके को लेकर हमें कुछ जानकारी देता है। वह कहते हैं, ‘अभी के हाल में यह एकमात्र ऐप है जिसे सरकार या कोई प्राइवेट ऑपरेटर कुछ नया लेकर सामने आया है।’
भारत दुनिया में एकमात्र ऐसा लोकतांत्रिक देश है जिसने करोड़ों लोगों के लिए कोराना वायरस ट्रैकिंग ऐप को अनिवार्य बनाया है। वह भी ऐसे समय में जब हमारे यहां कोई राष्ट्रीय डेटा प्राइवेसी कानून नहीं है और यह भी साफ नहीं है कि इस ऐप से किसे और किन स्थितियों में डाटा एक्सेस करने का अधिकार है। इस वक्त, डेटा को एक्सेस करने या उसका उपयोग करने को लेकर कोई कड़ी, पारदर्शी नीतिया डिजाइन सीमाएं भी नहीं हैं। यह बात कई नागरिक अधिकार विशेषज्ञ रेखांकित कर चुके हैं। कई लोगों ने यह भी कहा है कि इसका कोड ओपन सोर्स नहीं है और सरकार जो कुछ कह रही है, उसमें कई झोल लगते हैं।
यह प्रमुख सवाल भी विशेषज्ञ भी उठाते हैं कि टेक्नोक्रेट्स की टीम कौन-सी है जिसने यह दावा करते हुए प्रधानमंत्री को गुमराह किया है कि यह महामारी के नियंत्रण में प्रमुख भूमिका निभाएगा जबकि ऐसा है नहीं। (navjivan)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
कल दो दृश्य देखने लायक हुए। एक तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने चीन पहुंच कर फिर कश्मीर की ढपली बजाई और दूसरा, फ्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी की चांसलर जब मिले तो दोनों ने एक-दूसरे को हाथ जोडक़र और नमस्ते बोलकर अभिवादन किया। ऐसा ही ट्रंप और इस्राइल के प्रधानमंत्री भी करते हैं। यह देखकर दिल खुश हुआ लेकिन समझ में नहीं आता कि पाकिस्तान अपने इस्लामी मित्र-देशों से क्यों कटता जा रहा है ?
वह ज़माना लद गया जब अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन कश्मीर पर पाकिस्तान की पीठ ठोका करता था। सालों-साल वह भारत-विरोधी प्रस्ताव पारित करता रहा। पिछले साल जब भारत सरकार ने धारा 370 हटाई तो पाकिस्तान का साथ सिर्फ दो देशों ने दिया। तुर्की और मलेशिया। सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसी इस्लामी राष्ट्रों ने उसे भारत का आतंरिक मामला घोषित किया। पाकिस्तान के आग्रह के बावजूद सउदी अरब ने कश्मीर पर इस्लामी संगठन की बैठक नहीं बुलाई। इस पर उत्तेजित होकर कुरैशी ने कह दिया कि यदि सउदी अरब वह बैठक नहीं बुलाएगा तो हम बुला लेंगे। इस पर सउदी अरब ने पाकिस्तान को जो 6.2 बिलियन डॉलर का कर्ज 2018 में दिया था, उसे वह वापस मांगने लगा। उसने पाकिस्तान को तेल बेचना भी बंद कर दिया।
पाकिस्तान के सेनापति कमर जावेद बाजवा सउदी शहजादे को पटाने के लिए रियाद पहुंचे लेकिन वह उनसे मिला ही नहीं। इसीलिए अब चीन जाकर विदेश मंत्री कुरैशी ने अपनी झोली फैलाई होगी लेकिन चीन भी आखिर कब तक पाकिस्तान की झोली भरते रहेगा ? वह कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान का दबी जुबान से पक्ष इसलिए लेता रहता है कि उसे पाकिस्तान ने अपने ‘आजाद कश्मीर’ का मोटा हिस्सा सौंप रखा है। वह लद्दाख के भी केंद्र-प्रशासित क्षेत्र बन जाने से चिढ़ा हुआ है।
पाकिस्तान के नेता यह क्यों नहीं सोचते कि चीन अपने स्वार्थ के खातिर उसे चने के पेड़ पर चढ़ाए रखता है ? राजीव गांधी के जमाने में जब भारत-चीन संबंध सुधरने लगे थे, तब यही चीन कश्मीर पर तटस्थ होता दिखाई देने लगा था। सबको पता है कि दुनिया की कोई ताकत डंडे के जोर पर कश्मीर को भारत से नहीं छीन सकती। हां, पाकिस्तान बातचीत का रास्ता अपनाए तथा आक्रमण और आतंकवाद का सहारा न ले तो निश्चय ही कश्मीर का मसला हल हो सकता है। वास्तव में कश्मीर तो पाकिस्तान के पांव की बेड़ी बन गया है।
इसके कारण पाकिस्तान का फौजीकरण हो गया है। गरीबों पर खर्च करने की बजाय सरकार हथियारों पर पैसा बहा रही है। उसके आतंकवादी जितनी हत्याएं भारत में करते हैं, उससे कहीं ज्यादा वे पाकिस्तान में करते हैं। पाकिस्तान, जो कभी भारत ही था, वह दूसरे देशों के आगे कब तक झोली फैलाता रहेगा ?
(नया इंडिया की अनुमति से)
-कनक तिवारी
1. प्रशांत भूषण के अवमानना प्रकरण के कारण जिरह में संविधान के इतिहास और उसकी भविष्यमूलकता को लेकर कई तरह के पेंच और द्वैध पैदा हो गए हैं। उनकी भू्रणहत्या नहीं की जानी चाहिए। ये सवाल फिलहाल तो जस्टिसगण अरुण मिश्रा,बी आर गवई और कृष्ण मुरारी की बेंच में आश्वस्ति मांग रहे हैं कि उन पर ‘पब्लिक डोमेन’ में बहस सुनी जाए। संविधान न्यायालय भी दरबार-ए-खास नहीं दरबार-ए-आम होते हैं। सभी संस्थाओं की लोकतांत्रिक बादशाहत में संवैधानिक तेवर होना भी ज़रूरी है। प्रशांत भूषण पर चल रहे अवमानना मामले ने देश क्या दुनिया के समझदार नागरिक वर्ग में चिंताजनक और चिन्तनीय बौद्धिक खलबली मचा रखी है। लोग सीधे संविधान से ही सवाल पूछ रहे हैं कि तुम्हारी उद्देशिका में ही लिखा है न कि ‘हम भारत के लोग’ ही संविधान निर्माता हैं। ‘हम भारत के लोग’ ही सार्वभौम हैं। न राष्ट्रपति, न प्रधानमंत्री, न संसद और न खुद संविधान ही सार्वभौम है। इसलिए संविधान के रचयिता खुद अपने लिखे के पाठ संविधान, अर्थात अपने खुद के विवेक से ‘पब्लिक डोमेन’ में खुली जिरह करने के लिए सक्रिय होकर आश्वस्त हैं।
2. तथ्यात्मक मुद्दा इतना ही है कि प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के बहुत सक्रिय वकील हैं। अपनी अलग पहचान बनाते जनहित के मामले उठाते वकीलों में लगभग अव्वल हैं। उन्होंने कई बार ऐसा भी कुछ कहा और किया भी है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना अधिनियम, 1971 के प्रावधानों के तहत उन पर अवमानना प्रकरण कायम हुए हैं। मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय और प्रशांत भूषण ने ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में भाषण और वक्तव्य देते सुप्रीम कोर्ट के सामने धरना भी दिया था। तब सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों की शिकायत पर तीनों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा दर्ज हुआ। प्रशांत भूषण और मेधा पाटकर के खिलाफ कार्यवाही नहीं की लेकिन ख्यातिप्राप्त लेखिका अरुंधति रॉय ने नोटिस के जवाब में सुप्रीम कोर्ट की समझ के अनुसार ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो अवमाननाकारक लगी। जिन भाषणों के आधार पर मुकदमा था वे तो अलग थलग हो गए। नतीजतन अरुंधति को सजा दी गई। केरल के प्रसिद्ध मुख्यमंत्री ई. एम. एस. नम्बूदिरीपाद को न्यायपालिका की अकादेमिक आलोचना करने के कारण में सजा दी गई। अजीबोगरीब कारण बताया गया कि उनकी और उनके विख्यात वकील वी. के. कृष्णमेनन की न्यायपालिका को लेकर माक्र्स और एंजिल्स के विचारों के अनुरूप भाषण देने का दावा सही नहीं है। देश के कानून मंत्री पी. शिवशंकर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी आलोचना में कह गए कि दहेजलोभी लोग बहुओं को जला रहे हैं, काले बाजारिए, भ्रष्ट लोग और विदेशी विनिमय वगैरह के अभियुक्त भी सुप्रीम कोर्ट में स्वर्ग पा लेते हैं। चीफ जस्टिस सव्यसाची मुखर्जी ने उसे एक विधिशास्त्री का ‘एप्रोच’ और ‘एटिट्यूट कहा, ‘लेकिन सजा नहीं दी। 1919 में अंगरेज जज ने ‘यंग इंडिया’ के सम्पादक गांधीजी को बार बार माफी मांगने का कहने पर भी गांधी के माफी नहीं मांगने पर भी सजा नहीं दी। केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया। गांधी ने साफ कह दिया था वे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई अदालती अंकुश स्वीकार नहीं करते। जज जो चाहे सो सजा दे दे।
एक जज हेवार्ड ने उन्हें और प्रकाशक महादेव देसाई को सत्याग्रही मान लिया था। कई मामलों में निहित न्याय सिद्धांतों को अपने लंबे चैड़े जवाब और सैकड़ों पृष्ठों के दस्तावेजों के साथ प्रशांत भूषण ने विचारण के लिए तीन जजों की बेंच के सामने दाखिल किया। मजा यह कि आठ दस दिनों में ही उन जवाबी बिंदुओं और दस्तावेजों को मुनासिब प्रक्रिया के चलते बहुत कम समय में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समझ में 108 पृष्ठों का आदेश पारित करते प्रशांत भूषण को जिम्मेदार ठहरा दिया। उनको कितनी सजा दी जाए केवल इस पर विचार होना है। प्रशांत भूषण के वकील डॉ. राजीव धवन ने यह भी कह दिया कि उसमें से कई पृष्ठ तो किसी अन्य मामले से शब्दष: उठा लिए गए लगते हैं।
3. संविधान सभा में नागरिकों के मूल अधिकार अमेरिकी संविधान से हूबहू उधार लिए गए हैं। अभिव्यक्ति के नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाते संविधान सभा में कई आधारों सहित मानहानि और अदालत की अवमानना के संबंध में संसद को अधिनियम बनाने के अधिकार दिए गए। हालांकि दमदार सदस्य आर. के. सिधवा और विश्वनाथ दास ने ऐसी कड़ी बातें कही थीं कि आज कोई कह नहीं सकता। वरना सीधा सीधा अवमानना का मामला बन जाएगा। प्रशांत भूषण ने तो वैसा कुछ नहीं कहा। उन सदस्यों ने तो यहां तक कह दिया था कि जज भी आखिर मनुष्य ही होते हैं। उनके सिर पर दो सींग नहीं होते। उनसे भी गलतियां होती हैं। कई कंगाल वकील तक जज बना दिए जाते हैं। आजादी के बाद भी जजों की ब्रिटिश हुकूमतशाही के वक्त की मानसिकता कायम चली आई है।
बहरहाल प्रतिबंध तो अनुच्छेद 19 (2) में लगा ही वह कहता है, ‘‘19. वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण-(2) खण्ड (1) के उपखण्ड (क) की कोई बात उक्त उपखण्ड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अपमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के सम्बन्ध में युक्तियुक्त निर्बंन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नही करेगी।’’
21 साल की उम्र में ही प्रशांत भूषण ने आपातकाल के वक्त ‘दी केस दैट शूक इंडिया’ नामक किताब लिख दी थी।
4. प्रशांत भूषण में युवकोचित बौद्धिक गुस्सा भी रहता है। मनुष्य में विचार उसके संस्कार, पैतृक गुण, सामाजिक हैसियत आदि के कारण सार्वजनिक अभिव्यक्तियों में वाचाल रहते है। मानो अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि पी. शिवशंकर ने कहा था कि न्यायपालिका में उच्च वर्णों और वर्गों की दबंगई होने से वहां वंचितों की वेदना का फलसफा सूखा सूखा सा है। यही तो जस्टिस कर्णन को अदालत की अवमानना पर सजा होने से कई बुद्धिजीवी कह रहे हैं। न्यायिक इतिहास के भीष्म पितामह शताब्दी पुरुष जज वी. आर. कृष्ण अय्यर ने रिटायरमेंट के बाद कह दिया था कि न्यायपालिका तो अस्तित्वहीन संस्था हो गई है। वहां ईसा मसीह को तो सूली पर चढ़ाया जाता है लेकिन खलनायकों को नहीं। कई बार उसका सभ्यता से भी संस्पर्ष बिछुड़ जाता है। उन पर भी मुकदमा दायर किया गया लेकिन केरल के चीफ जस्टिस रहे सुब्रमणियम पोट्टी की बेंच ने नोटिस तक देने की जरूरत नहीं समझी। कहा कि न्यायपालिका की छाती इतनी चैड़ी होनी चाहिए कि वह सवालों को अपने विवेक से सुलझाती रहे। अमेरिका और इंग्लैंड में भी जजों को मीडिया में मूर्ख और बूढ़ा तक कहकर उनका सिर नीचे और पैर ऊपर दिखाते तस्वीरें छाप दी गई हैं। वहां भी शिकायतकुनिंदा पहुंचे लेकिन उन्हीं जजों ने साफ किया कि यह तो सच है कि हम बूढ़े हैं। कोई हमें बेवकूफ समझ रहा है। तो यह तो उसकी निजी राय है, हमारी अपने बारे में ऐसी राय नहीं है।
5. 2009 में प्रशांत भूषण के कहने के वक्त कि पिछले छ: वर्ष के दौर में न्यायपालिका में लोकतंत्र का क्षरण हुआ या पिछले चार मुख्य न्यायाधीषों के वक्त भ्रष्टाचार रहा है, सोषल मीडिया सक्रिय होकर आया नहीं था। अरुंधति के पक्ष में भी देश के सैकड़ों बुद्धिजीवी और विदेशों के प्रख्यात विद्वान और सांसद वगैरह सुप्रीम कोर्ट को लिख चुके थे कि अदालती अवमानना को लेकर संवैधानिक अधिकारों की समझ को ही तो अरुंधति ने अपने जवाब में विन्यस्त किया है। वह अवमानना का नहीं बौद्धिक वादविवाद का मामला है और पूरी तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी के तहत है। नॉम चॉम्की जैसे विख्यात बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनेता, प्राध्यापक जिनमें ‘हिन्दू’ के संपादक एन. राम, ‘जनसत्ता‘ के संपादक प्रभाष जोशी और न जाने कितने लोग शामिल थे सामने आए। जिस जज ने मामला पंजीबद्ध कर नोटिस जारी की थी, अरुंधति ने सवाल उठाया था कि उन्हें नोटिस के जवाब की सुनवाई अन्य जज से करानी चाहिए, तभी वस्तुपरक आकलन होगा। लेकिन जस्टिस जी. बी. पटनायक ने दलील नहीं मानी।
6. हालिया कोविड-19 के भयानक प्रकोप के दौर में चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे की अपने गृहनगर नागपुर पहुंचकर पचास लाख रुपये की भाजपा कार्यकर्ता की विदेशी हारले डेविडसन की मोटरसायकल पर बैठकर तस्वीर खींची गई। वह सोशल मीडिया में वायरल हो गई। हजारों नागरिकों ने तरह तरह की असहज क्या भद्दी और अपमानजनक टिप्पणियां कर दीं। प्रशांत भूषण ने भी शायद इस आशय का ट्वीट कर दिया होगा कि न्याय मिलने की मुश्किलों के इस महामारी के दौर में सुप्रीम कोर्ट में त्वरित और जरूरी सुनवाई के वक्त ऐसी फोटो खिंचाने और संपूर्ण व्यापक न्यायिक व्यवस्था के आचरण का आकलन करने से आने वाली पीढिय़ां भारतीय न्यायपालिका के बारे में क्या धारणाएं कायम करेंगी। कुछ शिकायतखोर नस्ल के वकीलों का कानूनी ज्ञानशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रेखांकित होता रहता है। एक शिकायत के आधार पर प्रशांत भूषण को अवमानना का नोटिस आननफानन में मिला। तुर्रा यह कि 2009 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों के खिलाफ जो कथित कटाक्ष किया था, उसे भी सुनवाई के लिए साथ साथ सूचीबद्ध कर दिया गया। बहुत कम दिनों में फैसला देने का इरादा तेज प्रक्रिया के चलते इशारों इशारों में ‘कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है‘ की तर्ज पर जाहिर कर दिया गया। अपनी रीढ़ की हड्डी पर आज भी सुप्रीम कोर्ट में कुछ तेजतर्रार वकील संविधान के ज्ञान, फलक और जन-अभिमुखता के विकास के लिए लगातार जजों के कई क्रोधी तेवर झेलते जद्दोजहद कर रहे हैं। अभी भी सब कुछ बरबाद नहीं हुआ है। डॉ. राजीव धवन, दुष्यंत दवे, कोलिन गोन्जाल्वीस, इंदिरा जयसिंह, कामिनी जायसवाल, वृंदा ग्रोवर जैसे प्रसिद्ध वकीलों ने कई सवाल उठाए हैं। न्यायिक प्रक्रिया की हड़बड़ी में उनका व्यापक विचारण कई बार नहीं हो पाता। यह पहला वक्त है जब एक नागरिक/वकील पर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मामला चलाने का खुद संज्ञान इस तेज गति और मति से लिया है लेकिन नेपथ्य से प्रॉम्पिटंग की कई आवाजें फुसफुसाती हुई लग रही हैं। संविधान के अंतरिक्ष में अब अनसुनी कैसे हो सकती है? प्रशांत भूषण द्वारा दिए गए जवाब पर कोई टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया के चलते नहीं की जानी चाहिए। वह तो तीन सदस्यीय पीठ के जेहन में है ही।
7. पहली बार लेकिन कुछ नए सवाल पैदा हुए हैं। सोशल मीडिया की वजह से जन-इजलास में इन मुद्दों पर बातचीत करना संभव और जरूरी है। वह बातचीत संविधान के निर्माता ‘हम भारत के लोग’ कर सकते हैं। इन्हें सारसंक्षेप में समेटा जा सकता है:
(1) अरुंधति के समर्थन में सैकड़ों बुद्धिजीवियों की राय को इसलिए दरकिनार किया गया होगा क्योंकि वे ‘बाहरी व्यक्ति’ थे। उनकी राय अकादेमिक लगने से संविधान के इस्तेमाल के अनुभवों की विशेषज्ञता की नहीं रही होगी। प्रशांत भूषण के मामले में जस्टिस चीफ जस्टिस रहे राजेन्द्रमल लोढ़ा ने (जिनकी अध्यक्षता के कॉलेजियम में मौजूदा तीन सदस्यीय पीठ के मुखिया जज की नियुक्ति की सिफारिश की गई थी) तो कह दिया है कि कोविड-19 की महामारी के चलते यह महत्वपूर्ण मामला ‘वर्चुअल कोर्ट’ के जरिए निपटाने की क्या ज़रूरत थी? उसे महामारी के बाद औपचारिक भौतिक अदालती प्रक्रिया के तहत निपटाने से बहुत कुछ कहने सुनने की स्थिति बनती। इंग्लैंड से भारत ने संवैधानिक ज्ञान उधार लिया है। वहां की पुष्ट परंपराएं कहती हैं ‘न्याय केवल होना नहीं चाहिए। वह होता हुआ दिखना भी चाहिए।’ बिना आपातकाल लगाए और अब तो मैदान में लाए गए (गोदी?) इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ गलबहियां करते प्रिंट मीडिया बेतरह, बेवजह चुप है। प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट की चिंतातुर व्याकुलता पर साजिशी चुप्पी साधकर जैसे सेंसर लगा है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का मामला मीडिया के अंतरिक्ष में नया उपग्रह बनाकर उछाला गया है। उस घटना का इतना प्रचार है कि भारत में चीन की घुसपैठ, लाखों लोगों का कोरोना में मरना खपना और सदा मीडिया के फोकस में रहने वाले बेचैन प्रधानमंत्री तक के लिए जगह और समय की कमी हो रही है। संविधान सभा ने कभी नहीं सोचा होगा कि मीडिया (तब प्रेस कहा था) जनता के मुद्दों तो क्या मुंह पर सेंसर लगा देगा। जनअभिव्यक्तियों के खिलाफ लिख और कुचलकर सत्ता प्रतिष्ठान का बगलगीर बनेगा। फिर भी नागरिकों के बराबर आजादी पा लेगा। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों के तहत जनता और न्याय हित में कई अदालती प्रक्रियाओं की खबरों को मीडिया में प्रकाशित होने से रोका है। सुप्रीम कोर्ट को यह अजूबा भी तो देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट खुद नागरिक आज़ादी के अहम सवाल से जूझते अपने ही वरिष्ठ रहे पूर्व जजों की राय तक को मीडिया में नहीं पढ़ या सुन पा रहा हो। तब क्या करना चाहिए? सोशल मीडिया नहीं होता तो इस मामले की जनसरोकारिता की ही मौत हो जाती!
(2) चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त जनवरी 2018 में वरिष्ठ जजों रंजन गोगोई,जे. चेलमेश्वर, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ ने सीधे मीडिया से बात की थी। वह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का अकेला अपवाद है। उन्होंने खुलकर चीफ जस्टिस पर कई आरोप लगाए। उनमें यह भी था कि चीफ जस्टिस बहुत संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों को भी उस वक्त के सुप्रीम कोर्ट के 24 जजों में से अपेक्षाकृत कनिष्ठ जज की अध्यक्षता की पीठ को दे देते हैं। प्रशांत भूषण के मामले में भी वरिष्ठता का सिद्धांत नहीं, चीफ जस्टिस के अधिकार से वरिष्ठता क्रम के जजों को सौंपा नहीं गया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था मामला देने का चीफ जस्टिस का अधिकार है क्योंकि अंगरेजी परम्परा में वही ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ होता है। अंगरेजी परंपरा में तो वरिष्ठता का भी सिद्धांत रहा है-यह नहीं कहा था। परम्परा में तो यह भी है जिस जज साहब पर भरोसा नहीं हो, तो उन्हें मामले से हट जाना चाहिए। प्रशांत भूषण ने तो ऐसा कुछ नहीं कहा है। सुप्रीम कोर्ट के एक जज एच. एस. कपाडिय़ा के कई शेयर एक प्राइवेट कम्पनी स्टरलाइट में रहे हैं। फिर भी वकीलों से उन्होंने स्टरलाइट कम्पनी के मामले में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) थे। इसकी आलोचना प्रशांत भूषण ने खुलकर की। उन्होंने ही प्रशांत भूषण के खिलाफ जजों के भ्रष्टाचार वाले कथन के खिलाफ अवमानना की शिकायत की थी। उसे अभी सुना जा रहा है। किसी भी आरोपी को पूरी सुनवाई का मौका दिए बिना या उठाए गए मुद्दों पर संवैधानिक तुष्टि हासिल किए बिना फैसला नहीं देना चाहिए जजों के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया का अनुपालन किया जाना चाहिए। शुरुआती 5 जज सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के सदस्य होते हैं। जस्टिस रंजन गोगोई के विवादास्पद अपवाद को छोडक़र (जो राम मंदिर के फैसले के बाद राज्यसभा में मनोनीत हुए) तीन वरिष्ठ जजों जस्टिस चेलमेश्वर, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ ने प्रशांत भूषण के पक्ष में खुलकर बयान दिए हैं कि कोई मामला ही नहीं बनता।
(3) जस्टिस कुरियन जोसेफ के तर्क में बहुत दम है कि सुप्रीम कोर्ट खुद अवमानना करार देकर मामला चलाना चाहे तब भी जब आरोपी कहे मुझे अभिव्यक्ति की अबाधित आजादी है। सच तो यह है यह मामला भारत-चीन की सरहदों की तरह नहीं, माता पिता के प्रेम के बटवारे की सरहद का किसी तरह निर्धारण करे) यही संविधान का बेहद नाजुक बिन्दु है। संविधान निर्माता जनता के भी खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न्यायिक व्याख्या का संवैधानिक अधिकारी होने से कोई विपरीत अमलकारी फैसला दे, तो भाष्यकार जनता का क्या होगा? ऐसे (संभावित) विवाद की कल्पना संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अगुवाई के करीब 300 सदस्यों को नहीं रही है। इसलिए कुरियन जोसेफ ठीक कहते हैं कि प्रशांत भूषण का मामला कम से कम 5 या अधिक जजों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए। उनके अनुसार प्रकरण में कई सैद्धांतिक सवाल निहित हैं। जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। जस्टिस कर्णन के अवमानना मामले में पूरी सुप्रीम की राय के अनुपालन में सात वरिष्ठ जजों की पीठ में सुनवाई होकर फैसला हुआ था। अभी तो उन्हीं में से कुछ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों ने संयुक्त पत्र प्रशांत भूषण के तर्कों के पक्ष में लिखा है।
(4) कानून यह है कि फौजदारी नस्ल का अवमानना मामला आवश्यकतानुसार अटॉर्नी जनरल की अनुमति के बाद अदालत के सामने रखा जाए। अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के अनुसार ‘‘आपराधिक अवमानना की दशा में, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय या तो स्वप्ररेणा से या (क) महाधिवक्ता के, अथवा (ख) महाधिवक्ता की लिखित सम्मति से किसी अन्य व्यक्ति के समावेदन पर कार्रवाई कर सकेगा। स्पष्टीकरण-इस धारा में ‘‘महाधिवक्ता’’ पद से अभिप्रेत है-(क) उच्चतम न्यायालय के सम्बन्ध में, महान्यायवादी या महासालिसिटर।
प्रशांत भूषण के मामले में रजिस्ट्री को या तो संकोच रहा या उसने इस नियम के अनुसार एटार्नी जनरल की राय लेने संबंधी नोट लगाकर जजों के सामने मामला रखा होगा। बेंच ने उसे गैरजरूरी प्रावधान मानते सुनवाई की होगी। अटॉर्नी जनरल से सहमति ले ली जाती तो क्या दिक्कत थी? प्रशांत भूषण ने 2009 में जो कथित अवमाननाकारक बयान दिया, उस मामले में तो अटॉर्नी जनरल की राय ली गई थी। वह मामला 11 साल तक सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड रूम में पड़ा रहा। वहां कई मामले अपना अपना दुखड़ा सुनाते, नसीब ढूंढते बिसूरते पड़े रहते हैं। मामला इतना विस्फोटक समझा गया होता तो सुप्रीम कोर्ट के जो जज और चीफ जस्टिस 2009 से लेकर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के वक्त तक रहे हैं, तब तक सुनवाई क्यों नहीं हुई? मौजूदा चीफ जस्टिस भी 18 नवम्बर 2019 से हैं। तब कोरोना और हारवे मोटर साइकिल वाली दुर्घटना नहीं हुई थी। जो सभी संभावित जज उस मामले को सुन सकते थे। उनमें से ही जज प्रशांत भूषण के पक्ष में खड़े होकर वैधता पर सवाल उठा रहे हैं। इनमें जस्टिस ए. के. गांगुली (2012), चीफ जस्टिस राजेन्द्रमल लोढ़ा (2014), जस्टिस विक्रमजीत सेन (2015), जस्टिस चेलमेश्वर (2018), जस्टिस कुरियन जोसफ (2019), जस्टिस आफताब आलम (), जस्टिस ए. के. गांगुली (2012), जस्टिस मदन बी. लोकुर भी (2018), जस्टिस जी. एस. सिंघवी (2013) कई और जज हैं। सवाल उठ रहे हैं कि हम होते तो क्या फैसला करते? सुदर्षन रेड्डी (2011), जस्टिस गोपाल गौड़ा (2016) रिटायर हो गए हैं। जस्टिस रूमा पॉल भी साथ हैं, जो अलबत्ता 2006 में रिटायर हो गई थीं।
(5) अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल में असाधारण समझ, योग्यता और निष्ठायुक्त आचरण आदर्श है। पहले झिझकते हुए और बाद में साफगोई में उन्होंने बेंच से अनुरोध किया कि प्रशांत भूषण को सजा नहीं दी जाए। अनुरोध भावुक नहीं है। भारत के महान्यायवादी की संवैधानिक समझ का फलसफा है। अटॉर्नी जनरल सरकारी नौकर नहीं होते। असाधारण विद्वता के विधिशास्त्री को संविधान की रक्षा के लिए अटॉर्नी जनरल बनाया जाता है। वह राष्ट्रपति/उप राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के साथ संविधान में कार्यपालिका का अंग है। ‘‘52. भारत का राष्ट्रपति-भारत का एक राष्ट्रपति होगा।‘‘ ‘‘63. भारत का उपराष्ट्रपति-भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।’’ ‘‘74. राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्-(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देनेे लिए एक मंत्रि-परिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।’’ ‘‘76. भारत का महान्यायवादी-(1) राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को महान्यायवादी नियुक्त करेगा। (2) महान्यायवादी का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो राष्ट्रपति उसको समय-समय पर निर्देर्षित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किए गए हों। (3) महान्यायवादी को अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र में सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार होगा।’’
अटॉर्नी जनरल की अनसुनी कर दी गई। इस तरह का सवाल सुप्रीम कोर्ट में पहली बार आया जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते वक्त अटॉर्नी जनरल की राय नहीं ली गई को जरूरी नहीं माना। अटार्नी जनरल से राय नहीं लेने पर भी उनके द्वारा क्षतिपूर्ति के रूप में (?) अनुरोध करने की संवैधानिक स्थिति तय नहीं हुई है। संविधान या अधिनियम खामोश हैं। कहा जा सकता है कि क्या यह भी स्थिति संविधान पीठ के लायक नहीं बनती? फैसला जो हो वह तो संवैधानिक इतिहास का हिस्सा बनेगा।
(6) अवमानना अधिनियम की धारा 19 इस तरह है। 19. अपीलें-(1) अवमान के लिए दण्डित करने की अपने अधिकारिता के प्रयोग में उच्च न्यायालय के किसी आदेश या विनिश्चय की साधिकार अपील-(क) यदि आदेश या विनिश्चय एकल न्यायाधीश का है, तो न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों की न्यायपीठ को होगी। (ख) यदि आदेश या विनिश्चय न्यायपीठ का है, तो उच्चतम न्यायालय को होगी। परन्तु यदि आदेश या विनिश्चय किसी संघ राज्यक्षेत्र के किसी न्यायिक आयुक्त के न्यायालय का है तो ऐसी अपील उच्चतम न्यायालय को होगी। (2) किसी अपील के लम्बित रहने पर, अपील न्यायालय आदेश दे सकेगा कि-(क) उस दण्ड या आदेश का निष्पादन, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, निलम्बित कर दिया जाए। (ख) यदि अपीलार्थी परिरोध में है तो वह जमानत पर छोड़ दिया जाए, और (ग) अपील की सुनवाई इस बात के होते हुए भी की जाए कि अपीलार्थी ने अपने अवमान का मार्जन नहीं किया है। (3) यदि किसी आदेश से, जिसके विरुद्ध अपील फाइल की जा सकती है, व्यथित कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय का समाधान कर देता है कि वह अपील करने का आशय रखता है तो उच्च न्यायालय की उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त सभी शक्तियों का या उनमें से किन्हीं का प्रयोग भी कर सकेगा। (4) उपधारा (1) के अधीन अपील, उस आदेश की तारीख से जिसके विरुद्ध अपील की जाती है। (क) उच्च न्यायालय की किसी न्यायपीठ को अपील की दशा में, तीस दिन के भीतर की जाएगी। (ख) उच्चतम न्यायालय की अपील की दशा में, साठ दिन के भीतर की जाएगी।
कुरियन जोसेफ ने यही बुनियादी सवाल उठाया है। यह न्याय के सिद्धांत और अधिनियम में बड़ी चूक है। अकबर इलाहाबादी ने यहां गैरलागू अन्य सन्दर्भ में कहा था ‘‘वो ही कातिल, वो ही शाहिद, वो ही मुंसिफ ठहरे। अंगरेजों से उधार लेकर उस पर आचरण करना भारतीय न्यायशास्त्र में पारम्परिक हो गया है। यह कि पीठ पीछे सुनवाई नहीं होनी चाहिए। आरोपी को अपने बचाव का विधिसंगत पूरा मौका मिलना चाहिए। सौ मुलजिम छूट जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के जज द्वारा दी गई सजा के बारे में अपील नहीं है। संविधान पीठ तक कई मामले बार बार समझाए जाते या बड़ी पीठ में भेेजे जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकार को सलाह भी दी है कि अमुक तरह का कानून बनाने पर सोचे क्योंकि वैसा कानून नहीं होने से न्याय मुकम्मिल तौर पर करने में कठिनाई या असंभाव्यता हो सकती है। अवमानना अधिनियम 1971 मुकम्मिल कानून कतई नहीं है। उसमें खुद सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड वरिष्ठ जजों की राय के अनुसार संशोधन की जरूरत है। तब उसकी भी अनदेखी बिना संविधान पीठ में विचारण के क्या हो सकती है?
(7) सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई पूर्व जजों ने इस मामले में अलग अलग कारण (भी) लिखते लेकिन एक दूसरे से सहमत तार्किक सिद्धांत मौजूदा जजों के सामने एकजाई कर भेज दिए हैं। वह फकत बौद्धिक या अकादेमिक बांझ राय नहीं है। वह ‘अन्दरखाने’ के वरिष्ठों की अनुभवजन्य संवैधानिक ‘सलाह’ है। उसका आशय या संकेत यही है कि हमारे वक्त यह मामला आया होता (जो कि आ सकता था, लेकिन नहीं लाया गया) तो हम वैसा ही फैसला करते, जैसी राय अभी दे रहे हैं। इस तरह यह भी यह एक संवैधानिक ऊहापोह की चुनौतीपूर्ण स्थिति है कि न्याय उस वक्त किया जा रहा है, जब बहुत देर हो चुकी है। उस वक्त नहीं किया जा सका जब उसे विचारण में लिया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट प्रशासनिक हैसियत में चूक करे, तो न्यायिक हैसियत में उसका खामियाजा वाचाल और झगड़ालू समझा जाता कर्मठ और असमझौताशील वकील अपनी छाती पर अकेला क्यों झेले?
अवमानना अधिनियम की धारा 20 कहती है ‘‘अवमान के लिए कार्यवाहियां करने की परिसीमा कोई न्यायालय अवमान के लिए कार्यवाहियां, यो तो स्वयं स्वप्रेरणा पर या अन्यथा, उस तारीख को जिसको अवमान का किया जाना अभिकथित है, एक वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात् प्रारम्भ नहीं करेगा।’’ इसका क्या आशय है? सुप्रीम कोर्ट एक वर्ष तक खामोश रहकर अवमानना की कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। प्रशांत का मामला पंजीबद्ध होकर ग्यारह साल तक ठंडे बस्ते में रहे। फिर एकाएक मामला गर्म हो जाए। यह मुद्दा भी विचारण मांगता है कि कब तक कोई संशय में रखा जाए। खुद सुप्रीम कोर्ट भुला दे। फिर एकाएक याद करे कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व जजों सहित जनमानस ही उद्वेलित हो जाए।
(8) अवमानना अधिनियम की धारा 13 कहती है: ‘‘13. कतिपय मामलों में अवमानों का दंडनीय न होना-तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी-(क) कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन न्यायालय अवमान के लिये दंड तब तक अधिरोपित नहीं करेगा जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि अवमान ऐसी प्रकृति का है कि वह न्याय के सम्यक् उनुक्रम में पर्याप्त हस्तक्षेप करता है, या उसकी प्रवृत्ति पर्याप्त हस्तक्षेप करने की है, (ख) न्यायालय, न्यायालय अवमान के लिए किसी कार्यवाही में, किसी विधिमान्य प्रतिरक्षा के रूप में सत्य द्वारा न्यायानुमत की अनुज्ञा दे सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि वह लोकहित में है और उक्त प्रतिरक्षा का आश्रय लेने के लिए अनुरोध स्वभाविक है।’’
उपरोक्त प्रावधान से स्पष्ट है कि अदालतों द्वारा यक- ब-यक किसी नागरिक की अभिव्यक्ति के खिलाफ अवमानना अधिनियम के तहत कार्यवाही नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यदि मान लिया है कि प्रशांत भूषण की टिप्पणियां संयत, भद्र, माकूल और तर्कसम्मत नहीं हैं। तो भी क्या विचार हो सकता है कि वे बाद में लगातार मुकदमे लड़ते और कई कथित कटाक्ष भी करते रहे। उनके द्वारा सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन में नागेश्वर राव की नियुक्ति को लेकर गलत तथ्य कहने का आरोप लगाते अटॉर्नी जनरल ने शिकायत भी की थी। प्रशांत भूषण को मिली जानकारी विश्वसनीय नहीं होने से उन्हें उस मामले से पीछे हटना पड़ा था और वह सफाई उन्होंने अटॉर्नी जनरल को दी थी। तब मामला रफा दफा कर दिया गया था। धारा 13 की इबारत के अनुसार क्या प्रशांत भूषण की टिप्पणी जनहित में नहीं है। फिलहाल यह सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है। लोकहित तो बहुत खुला हुआ शब्द है। सुप्रीम कोर्ट लोकहित का प्रतिनिधि नहीं है तो क्या निर्धारक हो सकता है? वह तो न्याय करता है। क्या देश के मशहूर विद्वानों, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों की राय और सोशल मीडिया पर डाली जा रही टिप्पणियों का आकलन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट को फिर भी लगा सकता है कि प्रशांत भूषण ने जनहित के खिलाफ आचरण किया है। सुप्रीम कोर्ट के अधिकार बहुत व्यापक और असरकारी होते हैं। इसलिए यदि सुप्रीम कोर्ट से केवल यही अनुरोध किया जा रहा है कि वह तेज गति से चलने के बदले धीमी गति से चले। तो मामले का ऐतिहासिक व्याख्या में निरूपण जरूरी भी हो सकता है। गांधी भी तो कहते थे कि जीवन में धीमी गति जरूरी है जिससे कोई दुर्घटना नहीं हो।
(9) सोशल मीडिया पर विद्वानों की बहार है। अब उन्हें साजिश के तहत इक_ा किया जा रहा है कि वे सबसे बड़ी अदालत की कथित प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए लामबंद होना महसूस करें। अन्यथा वे प्रशांत भूषण के लिए 2009 से खामोशी में बैठे थे। बहुतों को नहीं मालूम होगा कि दंड प्रक्रिया संहिता की परिभाषा में सुप्रीम कोर्ट अदालत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को संविधान निर्मााताओं ने अदालती परिभाषा से ऊपर रखते हुए उसे मूल अधिकारों के परिच्छेद में अनुच्छेद 32 में रखा।’’ 32. इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उपचार-(1) इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में समवेदन करने का अधिकार प्रत्याभूत किया जाता है। (2) इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को ऐसे निर्देश या आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, जो भी समुचित हो, निकालने की शक्ति होगी।’’
सुप्रीम कोर्ट भी संसद की तरह कानून बना सकने की गंगोत्री है। उसके अस्तित्व में ही संविधान के मर्म का निचोड़ है। अनुच्छेद 141 के अनुसार उसका हर फैसला बल्कि कानून देश की सभी अदालतों पर हुक्मनामे की तरह चस्पा हो जाता है। ‘‘141. उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि का सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होना-उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होगी।’’ प्रशांत भूषण के मामले का फैसला न्यायिक भविष्य में सभी निचली अदालतें मानने बाध्य होंगी। प्रशांत भूषण की नस्ल और प्रकृति के संविधान जिज्ञासु न जाने कितने अज्ञात वकील और नागरिक इस संभावित फैसले को नज़ीर बनाकर प्रभावित किए जाएंगे। इसलिए भी सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों से संविधान का इतिहास और भविष्य भी खुद जिरह कर रहे हैं। वे ऐसे निर्णय की उम्मीद कर रहे हैं जिससे संविधान का चेहरा अंतरराष्ट्रीय इजलास में जगमगाता दिखाई दे।
(10) विश्व के महानतम जजों में एक लॉर्ड डेनिंग के फैसलों से अवगत हुए बिना सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने 1950 के दशक में उसी बिन्दु पर फैसला किया था जो विश्व इतिहास में अमर है। नागरिक आजादी के क्षितिज का सबसे बड़ा विस्तारण 5 जजों की संविधान पीठ के अल्पमत जज हंसराज खन्ना ने किया। वह पूरी दुनिया में संविधान के विद्यार्थियों द्वारा सिर माथे लगाया जाता है। खन्ना आपातकाल के लागू रहते भी अपने न्यायिक ज्ञान की रीढ़ की हड्डी सीधी रख पाए थे। सुप्रीम कोर्ट जवाबदेह प्रजातांत्रिक संस्था है।
हाई कोर्ट के जजों के तिहाई पदों पर उसी हाईकोर्ट के वकील वरिष्ठ जजों के आंतरिक फैसलों के जरिए मनोनीत कर माई लॉर्ड बना दिए जाते हैं। तरक्की पाकर सुप्रीम कोर्ट के जज हो जाते हैं। यह संकीर्ण आत्मतुष्ट सिद्धांत है। उसे संसद और विधि आयोग ने बदलकर लोकतांत्रिक बनाने की कोशिश की है। सुप्रीम कोर्ट ने वैसे एक अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। हालांकि उसमें खामियां भी थीं। जज बनाने के लिए संविधान कहता है सुप्रीम कोर्ट (या चीफ जस्टिस) से सलाह की जाएगी। ‘सलाह’ शब्द की खुद व्याख्या करते सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि उसे ‘सहमति’ समझा जाए। इसके बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्तियों के लिए एक आंतरिक संस्था कॉलेजियम (जिसमें सुप्रीम कोर्ट वरिष्ठतम पांच जज होंगे) के नाम से खुद बना ली। अब उसकी सहमति लेनी होती है। 2009 से 2014 के दरम्यान सुप्रीम कोर्ट के कम से कम 50 जज रिटायर हो गए होंगे। उनमें से ही कुछ जज मुखर और तार्किक होकर प्रशांत भूषण के पक्ष में अपने संवैधानिक ज्ञान का लोकव्यापीकरण कर रहे हैं। रिटायर हो जाने से उनकी संवैधानिक समझ की हैसियत की ‘पब्लिक डोमेन’ में आने के बावजूद अनदेखी के लायक हो सकती है? उनके ही पुराने फैसलों को नजीर बनाकर बाद के जज उन बौद्धिक सीढिय़ों पर चढ़ते संवैधानिक व्याख्याओं को तरोताजा बनाए रखते हैं।
(11) किसी साधारण नागरिक की मानहानि हो। तो भारतीय दंड संहिता में कई अपवाद उसे बचाने के लिए हैं।
मसलन यदि वह सच कहता हुआ लांछन लगा रहा हो, या किसी लोकसेवक के आचरण के विषय में सद्भावनापूर्वक कह रहा हो, या परनिंदा कर रहा हो कि वह उस व्यक्ति पर विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति तक जानकारी पहुंचाए, या अपने या अन्य के हितों की संरक्षा के लिए सद्भावनापूर्वक लांछन लगा रहा हो, या जिस व्यक्ति के खिलाफ कह रहा हो वह लांछन उसे सुधारने या लोककल्याण के लिए हो।
तब वह मानहानि का मामला नहीं ही बनता है। संविधान सभा ने 1949 में और संसद ने 1971 में विधायन करते सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा किया है। इसलिए अदालत की अवमानना के लिए नागरिक अधिकारों की हिफाजत की तरह अपवाद नहीं लिखे। यह इतिहास सुप्रीम कोर्ट के विचारण में रहा है। कोई प्रशांत भूषण बनकर व्यवस्था से उत्पन्न कुछ परिणामों को लेकर उत्तेजित होकर अनर्गल भी कह दे। तो उसे पी. शिवशंकर के प्रकरण में जस्टिस सव्यसाची मुखर्जी या गांधीजी के प्रकरण में अंगरेज जज जस्टिस हेवार्ड की भाषा में अवमाननाकारक नहीं माना गया था। ऐसे साहसी (?) व्यक्तियों को सुप्रीम कोर्ट अपनी उदारता में लचीलेपन के साथ व्याख्यायित कर दे। तो उससे तो सुप्रीम कोर्ट का मर्तबा और बढ़ सकता है।
(12) आज न्यायपालिका की देश को पहले से ज्यादा जरूरत है। कार्यपालिका अर्थात मंत्रियों और विधायिका अर्थात (कई गैरजिम्मेदार) विधायकों और सांसदों में से कुछ ने (जिनमें लगभग आधे अपराधी भी कहे जाते हैं) देश का माहौल जहरीला बना दिया है। जनता सुप्रीम कोर्ट की ओर लगातार टकटकी लगाकर देखती रहती है। जनता हताश भीड़ नहीं है। वह महान जनसैलाब से है जिसकी कुर्बानियों के कारण भारत को आज़ादी मिली। उसी जनसंकुल के प्रतिनिधियों ने खुद सुप्रीम कोर्ट की राय के अनुसार दुनिया का सबसे बड़ा 90 हजार शब्दों का संविधान रचा। किसी को भी नायक या खलनायक बनाने का सवाल नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अंतरराष्ट्रीय अहमियत, प्रसिद्धि और स्वीकार्यता होने से ही भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सिरमौर बन सकेगा। यही हर विवेकशील नागरिक के विवेक की कशिश है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की कलमें न्याय के क्षेत्र में इतिहास भी लिखती हैं। संविधान सभा के सदस्यों ने नेहरू, अंबेडकर और राजेन्द्र प्रसाद की अगुवाई में खास चरित्र के विवेक की उसमें रोशनाई भरी है। वह विवेक प्रकारांतर से जनता के खून, पसीने और आंसू बहाने के बाद के संघर्ष से उपजा था। प्रशांत भूषण का मामला केवल पक्षकारों का विवाद नहीं है। प्रशांत भूषण को तो इतिहास ने अब अवसर दे दिया है कि वे जनअपेक्षाओं के प्रतीक, प्रवक्ता या प्रस्तोता बनकर सुप्रीम कोर्ट के सामने संविधान निर्माताओं और व्याख्याताओं की जिरह को विन्यस्त, विकसित और विस्तारित करें। सुप्रीम कोर्ट के जजों के सम्मान, स्वाभिमान और स्वविवेक की रक्षा तथा संस्था की हिफाजत करना हर नागरिक का संवैधानिक और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। अज्ञान, हताशा अतिरिक्त आत्मविश्वास और नासमझी के कारण सोशल मीडिया पर टिप्पणियां होती रहती हैं। उन्हें संविधान रामायण के मूल पाठ की चैपाई, दोहा या सोरठा नहीं समझा जाना चाहिए। वे ज्यादा से ज्यादा क्षेपक हैं। यह लेख भी एक क्षेपक है। इसमें मुझ अभिव्यक्तिकार की पीड़ा, जिज्ञासा, परेशानदिमागी और उत्कंठा है। इसमें पूर्वग्रह, खीझ, आक्रोश, अविश्वास या नासमझी की ऊहापोह नहीं है। देखें! भारत की जनता संविधान निर्मााता के रूप में अपना खुद का भविष्य आने वाले इतिहास के बियाबान में किस तरह बांचती है।
(13) यूरो-अमेरिकी मॉडल के संविधान से लिए गए अधिकारों के बचाव के लिए संविधान सलाहकार बी.एन. राव, अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर से मिले। उनकी सलाह पर नागरिक आजादी और अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध रचे गए। मूल अधिकारों की सलाहकार समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल ने रिपोर्ट सौंपते कहा था यदि मूल अधिकार छीने जाएं तो अदालतें हस्तक्षेप करेंगी। डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था अदालतों को पूरी आजादी दे देने से सुप्रीम कोर्ट को विधायिका की मर्यादा और कार्यपालिका की जवाबदेही तय करने के अधिकार दिए गए तो सुप्रीम कोर्ट अमेरिकन थ्योरी के तहत, पुलिस अधिकारों के तहत शक्तियों की मीमांसा कर सकता है। नागरिक आजादी पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद हम बार बार डींग मारते हैं कि भारत का संविधान दुनिया के सबसे उदार संविधानों में एक है। संविधान सभा में महबूब अली बेग ने बताया कि अलबत्ता ऐसे प्रतिबंध जर्मनी के संविधान में हैं। तानाषाह हिटलर चाहता था ऐसे कानून बनें जिनका विरोध तक नहीं किया जा सके। स्वतंत्र बुद्धि के अंगरेज पत्रकार बी.जी. हार्निमेन और महात्मा गांधी के बेटे देवदास गांधी को भी अपने अखबारों में अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल करने के कारण अदालती अवमानना के नाम पर जेल की सजा हुई थी। अवमानना का प्रतिबंध फिर भी संविधान की आंत में ठहर गया।
(14) सुप्रीम कोर्ट में जब बहुत जटिल संवैधानिक जिरह होती है, तो पांच या अधिक जजों की संविधान पीठ बनाने का नियम और परंपरा है। सुप्रीम कोर्ट में आज तक के सबसे बड़े मुकदमे केशवानन्द भारती में संविधान का बुनियादी ढांचा क्या है, पर फैसला 7 बनाम 6 के बहुमत से हुआ। अल्पमत के 6 जजों की समझ का इतिहास में क्या लब्बोलुबाब बनेगा? टी.एम. ए पाई फाउंडेशन के 11 सदस्यीय बेंच के फैसले ने क्या कहा, उसे। बाद में 5 जजों की इस्लामिक एजुकेशन सोसायटी वाली बेंच ने समझाया। फिर दूसरी बेंच के खिलाफ भी 7 जजों की पी. ए. इनामदार के मामले वाली तीसरी बेंच ने समझाया। अटपटी भाषा में लिखे फैसलों को खुद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज तक समझ नहीं पाते। तब बार बार उन्हें तर्क की सान पर खुद चढ़ाते हैं। प्रशांत भूषण के कारण हर नागरिक की अदालत की आलोचना करने के अधिकार पर बंदिश लगने के खतरे भी कुलबुला रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को हर तरह के आरोप, दुराचरण और छींटाकशी से मुक्त रखना भी संविधान का आग्रह है। हर नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी की पतंग आसमान में जितनी ऊंचाई तक चाहे उड़ाई जा सकती है। उसकी डोर अंतत: सुप्रीम कोर्ट के हाथ होती है। उड़ती तो वही है जो उड़े, कटे नहीं। आसमान तक उडऩा ही तो नागरिक अभिव्यक्तियों का लक्ष्य होता है।
(15) मशहूर संविधानविद एस.पी. साठे अपनी पुस्तक में सवाल उठाते हैं ‘‘क्या अवमानना के कानून को सामाजिक सक्रिय संगठनों द्वारा की जा रही आलोचना के लिए ज्यादा सहिष्णुता प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए?’’ एक महत्वपूर्ण जज चिनप्पा रेड्डी ने फैसले को असंगत, गैरतार्किक और अरुंधति की पीड़ा समझने में असमर्थ करार दिया है। बाबरी मस्जिद को बचाने का झूठा हलफनामा देकर मस्जिद का ढांचा गिर जाने पर भी तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के अवमानना प्रकरण में 28 साल बाद भी चुप्पी है। कई प्रबुद्ध व्यक्ति सच कहना चाहते हैं लेकिन अवमानना कानून के पसरते हुए डैनों के डर के कारण संभव नहीं होता। इसलिए सुप्रीमकोर्ट के वे फैसले महत्वपूर्ण हैं जहां संविधान और कानून के जानकारों तथा उस प्रक्रिया में संलग्न विधि विशेषज्ञों द्वारा कभी उत्साह में भी कर दी जाती रही टिप्पणियों पर उदार और सजारहित लोकतांत्रिक फैसले हुए हैं।
(16) सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनहित में न्याय करने का एक और पक्ष है। (संभवत) जस्टिस पी. एन. भगवती ने साधारण नागरिकों से प्राप्त चिट्ठियों को जनहित याचिकाओं में बदलकर अथवा अखबारों के समाचार पढक़र संविधान न्यायालय के मुताबिक न्याय देने की कोशिश करने की पहल की थी। उसे कई जजों ने लगातार कायम रखा। भले ही मौजूदा सुप्रीम कोर्ट ने एक अनुदार संकोच ओढ़ लिया है।
एक दिलचस्प मोड़ तो इस तरह भी आ सकता था कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चार जज रोहिंग्टन, नरीमन, उदय ललित, एन. नागेश्वर राव और इंदु महोत्रा वर्षों से प्रशांत भूषण के सुप्रीम कोर्ट बार में साथी वकील रहे हैं। यदि इनमें से से बेंच बनती तो मामले में कई ऐसे तथ्य भी आते अथवा बहस होती जो पुरानी घटनाओं के सिलसिले में उनके पास पुष्ट सूचनाओं के रूप में उपलब्ध समझे जा सकते हैं। जस्टिस नरीमन, उदय ललित तथा प्रशांत भूषण के पिता सुप्रीम कोर्ट के बहुत वरिष्ठ वकीलों में गिने जाते हैं। हालांकि यह केवल एक मनोविलास का तर्क है। सुप्रीम कोर्ट तो सार्वभौम है।
देश के कई हाई कोर्ट में नए नए बने जज भी सैकड़ों की संख्या में पक्षकारेां को और कुछ वकीलों को भी अवमानना नोटिस देते रहते हैं। भले ही तीन चौथाई मुकदमों में बस केवल माफीनामा दे देते हैं। ऐसे में इस बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान का बहुत लोकधर्मी चलन भी तो होना मुनासिब नहीं लगता। संभवत: सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे आंकड़े मंगाकर उस पर कभी विचार किया हो। विधि आयोग की भी अपनी सिफारिशें रही हैं। कुल मिलाकर यह जरूरी है कि न्याय किया जाने पर भी उससे जुड़ी परिस्थितियों और परिणामों के सिलसिले में उसे बहस के लिए न्याय्य (जस्टिशिएबल) बनाया जाना भी संविधान का मकसद, आग्रह और आदेश है। सुप्रीम कोर्ट के संबंध में बिना किसी पूर्वग्रह के उसकी गरिमा की रक्षा करना संसद, सरकार, वकीलों, जनता, मीडिया और खुद सुप्रीम कोर्ट का संविधान के प्रति अर्थात जनता के प्रति बुनियादी कर्तव्य है।
चीन में हाल ही में दक्षिण अमरीका से आए फ्रोज़न (जमे हुए) झींगों और चिकन विंग्स पर कोरोना वायरस पाया गया था.
बाज़ार में कई ऐसे सामान हैं जो पैकेट में मिलते हैं और बताया जाता है कि वायरस भी किसी सतह पर लंबे समय तक ज़िंदा रह सकता है. ऐसे में फिर से सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या खाने के पैकेट से भी कोरोना वायरस फैल सकता है?
लैब और बाहरी वातावरण में वायरस
सिद्धांत कहता है कि सामान के पैकेट से भी कोविड-19 हो सकता है.
लैब आधारित अध्ययन दिखाते हैं कि वायरस कई घंटों तक ज़िंदा रह सकता है. ख़ासतौर पर कार्डबोर्ड और कई तरह के प्लास्टिक पर.
ये वायरस कम तापमान पर लंबे समय तक ज़िंदा रह सकता है और खाने के कई सामाना कम तापमान पर ही एक से दूसरी जगह पहुंचाए जाते हैं.
हालांकि, कुछ वैज्ञानिक ये भी सवाल करते हैं कि क्या लैब के बाहर भी इन स्थितियों में यही नतीजे आएंगे.
यूनिवर्सिटी ऑफ लिसेसटर में रेसपीरेट्री साइंसेज़ की एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर जूलियन टैंग कहती हैं कि लैब के बाहर की दुनिया में वातावरण लगातार बदलता है जिसका मतलब है कि वायरस ज़्यादा समय तक ज़िंदा नहीं रह सकता.
रटगेर्स यूनिवर्सिटी में माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर इमैनुएल गोल्डमैन बताते हैं कि लैब में किए गए अध्ययनों में 10 मिलियन वायरल पार्टिकल्स को सैंपल के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है जबकि छींकने से सतह पर पड़े एक ऐरोसोल ड्रॉपलेट में सिर्फ 100 के क़रीब वायरस पार्टिकल्स होते हैं.
जुलाई में लांसेंट में लिखते हुए उन्होंने कहा था, “मेरी राय में, निर्जीव सतहों के माध्यम से संक्रमण की संभावना बहुत कम है, और सिर्फ़ उन्हीं स्थितियों में ऐसा संभव है जब किसी संक्रमित व्यक्ति के किसी सतह पर खांसने और छींकने के तुरंत बाद कोई दूसरा व्यक्ति उस सतह को छू लेता है (एक या दो घंटे के अंदर).”

वायरस कैसे फैल सकता है?
माना जाता है कि खाने के किसी कंसाइनमेंट से संक्रमण का ख़तरा तब हो सकता है जब फूड पैकेजिंग प्लांट में काम करने वाला कोई व्यक्ति संक्रमित जगहों को छूने के बाद अपनी आंखों, नाक और मुंह को छू ले.
लेकिन, वैज्ञानिक अब नहीं मानते कि कोविड-19 के अधिकतर मामलों में इस तरह से संक्रमण फैला है.
अमरीकी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर्स फॉर द डिज़ीज़ कंट्रोल (सीडीसी) अपनी वेबसाइट पर कहती है, “वायरस से संक्रमित किसी सतह या सामान को छूने से कोई व्यक्ति संक्रमित हो सकता है.” हालांकि, वेबसाइट पर ये भी लिखा है, “यह वायरस के फैलने का मुख्य तरीक़ा नहीं माना जाता है.”
मुख्यतौर पर इसका संक्रमण इंसान से इंसान में सीधे तौर पर होता है. जैसे-
- उन लोगों के बीच जो एक दूसरे के निकट संपर्क में हैं (दो मीटर या छह फीट की दूरी में)
- संक्रमित व्यक्ति की खांसी, छींक और बात करने से बाहर निकले ड्रॉपलेट्स से.
- जब ड्रॉपलेट्स पास खड़े व्यक्ति की नाक या मुंह पर गिरते हैं (या वो उन्हें सांस द्वारा अंदर ले लेता है)
डॉक्टर टैंग का कहना है कि ये साबित करना भी मुश्किल है कि किसी को पैकेजिंग के ज़रिए वायरस का संक्रमण हुआ है.
पक्के तौर पर इसका पता करने के लिए पहले ये सुनिश्चित करना होगा कि संक्रमित व्यक्ति को दूसरी जगहों से संपर्क के कारण संक्रमण नहीं हुआ है. इसमें एसिम्पटोमैटिक लोगों से हुआ संपर्क भी शामिल है.
कैसे सुरक्षित रहें?
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है, “खाने या खाने की पैकेजिंग से कोविड-19 का संक्रमण होने की पुष्टि करने वाले वर्तमान में कोई मामले नहीं हैं.”
लेकिन, फिर भी संगठन संक्रमण से बचने के लिए कई तरह की सावधानियों के बारे में बताता है. संगठन के अनुसार खाने के पैकेट को कीटाणुरहित करने की ज़रूरत नहीं है, बस खाने के पैकेट को छूने के बाद और खाना खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धोना ज़रूरी है.
अगर आप किराने का सामान खरीद रहे हैं तो स्टोर के अंदर जाने से पहले हैंड सैनिटाइज़र लगाएं और इसके बाद अच्छी तरह से हाथ धोएं. खरीदे गए सामान को पकड़ने और घर पर उसकी जगह पर रखने के बाद भी अच्छी तरह हाथ धोएं.
सामान की डिलीवरी भी करा सकते हैं अगर डिलीवरी करने वाला व्यक्ति हाइजीन का पूरी तरह ध्यान रखता है. सामान की डिलीवरी लेने के बाद अपने हाथ अच्छी तरह धो लें. कुछ विशेषज्ञ प्लास्टिक बैग को एक ही बार इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं.(bbc)
-दिनेश श्रीनेत
जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक में लाइव का फीचर जोड़ा गया तो ज्यादातर लोग इसका इस्तेमाल जीवन की हलचल या किसी इवेंट की झलक दिखाने के लिए करते थे। कोई अपने बच्चों की शरारतें लाइव करता था तो कोई संगीत का प्रोग्राम। किसी ने यह नहीं सोचा था कि इसका इस्तेमाल सिर्फ किसी के विचार सुनने या बहस या संवाद के रूप में भी हो सकता है।
कोरोना काल में जब न कॉफी हाउस रहे, न ऑ़़डिटोरियम और न ही छोटी-मोटी सभाओं की गुंजाइश रही तो आनन-फानन में बहुत से लोगों ने इस माध्यम का प्रयोग किया और इसे साधते चले गए। बाकी भाषाओं का मुझे नहीं पता मगर हिंदी साहित्य ने तो इस माध्यम के जरिए अपनी वैचारिकी गढ़नी आरंभ कर दी है।
हिंदी के शीर्षस्थ आलोचक नामवर सिंह ने बहुत पहले ही सीधे संवाद माध्यम की ताकत को पहचाना और लिखने की बजाय बोलने की राह चुकी। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिस दौर में उन्होंने यह करना आरंभ किया था, हमारे पास डाक्यूमेंटेशन के तरीके बहुत कम और खर्चीले थे। बीते दौर के साहित्यकारों को लाइव सुनने के लिए हमारे पास दूरदर्शन के प्रोग्राम और कुछ डाक्यूमेंट्रीज़ भर हैं।
मुझे निजी तौर पर ऐसा लगता है कि छपे हुए शब्दों के विस्तार की अपनी सीमाएं हैं। हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाएं निकालना न सिर्फ खर्चीला है बल्कि उसकी प्रसार संख्या भी बहुत सीमित है। कुछ पत्रिकाओं को छोड़ दें तो बाकी लघु पत्रिकाओं की स्थिति पुराने समय में निकलने वाली स्मारिकाओं जैसी रह गई है, जिसे जान-पहचान वालों के बीच बांटकर खपाना पड़ता है। वहीं डिजिटल ने बड़ी संख्या में हिंदी के पाठक तैयार किए हैं। उन पाठकों में नई सूचनाओं की भूख है। वे नए विषयों और मुद्दों को जानना-समझना चाहते हैं।
खुद अपनी प्रोफायल से किए गए किसी भी ठीक-ठाक फेसबुक लाइव में औसत उपस्थिति 25 से 50 के बीच होती है और बाद में उसे देखने वालों की संख्या औसतन एक हजार से 5-6 हजार तक पहुँच जाती है। इस मुकाबले में साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रसार बहुत कम होता है। दूसरे, इनमें जो कुछ भी छपता है अब हिंदी समाज के पास ऐसे ठिकाने बहुत कम रह गए हैं जहां इन पर चर्चा हो सके। पुराने कॉफी हाउस या तो बंद हो गए या वहां सन्नाटा पसरा रहता है। साहित्यिक गोष्ठियों में या वक्ता ही श्रोता होते हैं या जबरन डमी दर्शकों को बिठाया जाता है।
इसके अपवाद हैं मगर दिल्ली जैसी जगहों पर भी ऐसे अपवाद साल में आठ-दस बार घटित होते हैं जबकि साहित्यिक और वैचारिक आयोजन हफ्ते में आठ-दस होते हैं। फेसबुक लाइव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वहां सुनने वाले को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की आजादी होती है, जबकि परंपरागत साहित्यिक आयोजनों में माहौल शादी-ब्याह जैसा होता है, जहां लोग बधाई देते या आयोजन के मूल विषय से इतर चर्चा करते नजर आते हैं। कुछ लोग 20 मिनट बैठने के बाद बाहर चले जाते हैं और चाय-कॉफी के साथ अपनी नेटवर्किंग में व्यस्त हो जाते हैं। वहीं डिजिटल आयोजनों में वही चेहरे दिखते हैं जिनकी दिलचस्पी विषय में होती है।
यहां एक बात और भी गौर करने लायक है। कितना भी बड़ा या चर्चित नाम क्यों न हो अगर वो काम की बात नहीं कर रहा है तो उसके लाइव में कम लोग ही दिखते हैं। वहीं कई युवा चेहरों ने डिजिटल में अपार लोकप्रियता बटोरी है। असहमति में यह तर्क भी दिया जाता है कि साहित्यिक पत्रिकाओं की अपनी एक स्तरीयता है। इसमें कोई संदेह नहीं मगर यह भी उतना कड़वा सच है कि हंस व पहल जैसी पत्रिकाओं को छोड़ दें तो ऐसी पत्रिकाएं साहित्य में केंद्रीय भूमिका से हाशिये की तरफ खिसकती जा रही हैं। हर पत्रिका का अपना क्षेत्र है, अपने लेखक हैं और अपना एक ग्रुप है जहां पर उसका वितरण होता है।
इस लिहाज से मुझे डिजिटल ज्यादा व्यापक और उदार माध्यम लगता है। ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिकाओं ने अपनी कोई ख्याति नहीं दर्ज की। इसकी एक वजह यह रही कि बहुत से गंभीर साहित्यकारों ने इस माध्यम से परहेज बनाए रखा और बहुत सी पत्रिकाओं के संचालकों ने लोकप्रियता और परिचय के लालच में औसत रचनाओं को भी खूब छापा। बेहतर ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिका निकालना भी एक कला है, जिसे फिलहाल मौजूदा संचालक नहीं साध पाए हैं। कहीं कंटेंट अच्छा है तो तकनीकी स्तर पर बहुत खराब हैं और कहीं बाकी बातों का ध्यान रखा गया है तो कंटेट पर फोकस नहीं है।
रेख्ता, हिन्दवी, हिंदीनामा, सदानीरा जैसे प्लेटफॉर्म इसी बीच सामने आए। पिछले दिनों राजकमल ने व्हाट्सऐप के माध्यम डिजिटल पत्रिका का जो प्रयोग किया उसमें बड़ी संभावनाएं हैं। लेकिन इन सबसे ज्यादा बड़ी संभावनाओं वाला माध्यम वह है जिसका जिक्र मैंने आरंभ में किया। रचनाकार और पाठक का सीधा संवाद। सीधे कविताएं और कहानियां सुनना, सीधी चर्चा में भाग लेना, विचारों को सुनना- इसका एक अलग सुख और संभावनाएं हैं। इसने हमारी हिंदी की वैचारिकी में एक नया आयाम जोड़ा है।
भारतीय परंपराओं में सीधे संवाद का बड़ा योगदान है। पुरा-काल में सारा ज्ञान इन्हीं संवादों का नतीजा था। यह समाज लिखने, लिख हुए को गुनने और उस पर जवाब लिखने वाला समाज नहीं है। वह पश्चिम में था। जिसकी वैचारिकी का सीधा संबंध छापाखाने के अविष्कार और प्रसार से था। यह समाज बोलने, सुनने और सुने पर चर्चा करने वालों का समाज है। नई तकनीकी ने खोई हुई इस परंपरा को दोबारा हासिल करने में मदद की है।
यह सब कुछ संभव हुआ है इसी कोरोना काल में और इसमें कोई संदेह नहीं कि इसने एक नई दुनिया के दरवाजे खोले हैं। प्रायोजित गोष्ठियों, आत्ममुग्ध वार्तालापों और सीमित दायरे के संवादों से अलग यहां विचारों का दस्तावेजीकरण भी संभव हुआ है, कही गई बातें अब रिकॉर्ड में हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि यह माध्यम उत्तर-कोरोना काल में धुमिल नहीं होगा और हिंदी में वैचारिकी एक नए तरीके से विस्तार लेगी। (फेसबुक से)
संडे नवजीवन ब्यूरो
नागरिक अधिकारों के लिए लगातार जूझने वाले प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण के इस साल जून में किए गए दो ट्वीट का निष्कर्ष निकालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 14 अगस्त को 108 पेज की प्रतिक्रिया दी। उसने लगभग 22 दिनों में उन्हें अदालत की अवमानना का दोषी बताया। भले ही भूषण अपनी बात पर कायम रहने की बात कह रहे हों, अभी 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अपने बयान पर फिर से विचार करने के लिए 2-3 दिनों का समय दिया है। भूषण ने कोर्ट से कहा कि अपने मुकदमे के समय महात्मा गांधी ने जो कहा था, वह उसे ही कहेंगे, ’मैं दया की मांग नहीं करूंगा। मैं उदारता की अपील नहीं करता हूं।’ उनके ट्वीट उनके पुख्तायकीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह उनपर कायम हैं। सुप्रीम कोर्ट में ही प्रैक्टिस करने वाले एक अधिवक्ता ने बाद में ट्वीट किया कि भूषण ने वकील बनने के लिए आईआईटी, मद्रास और प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी छोड़ दी थी। इस ट्वीट में कहा गया है कि ‘आईआईटी, मद्रास के दिनों से ही वह अपने दिल की बातें सुनते रहे हैं। आप सोचते हैं कि दो दिनों में वह अपना बयान बदल देंगे? गुड लक!’
वैसे, भूषण को दोषी करार दिए जाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बार काउंसिलें भी बंट गई दिखती हैं। महाराष्ट्र और गोवा की काउंसिलों ने फैसले का समर्थन किया है। लेकिन यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि देश भर के 1,500 वकीलों ने एक बयान में कहा है कि ‘यह फैसला जनता की नजर में कोर्ट के अधिकार को पहले जैसा नहीं रखता। बल्कि यह खरी-खरी बोलने के प्रति वकीलों को हतोत्सहित ही करेगा।’ सुप्रीम कोर्ट के सात पूर्व न्यायाधीशों ने भूषण के खिलाफ कार्यवाही वापस लेने का पिछले माह सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था। ये हैं: न्यायमूर्ति सर्वश्रीरूमा पाल, जी.एस. सिंघवी, ए.के. गांगुली, गोपाला गौड़ा, आफताब आलम, जे. चेलमेश्वर और विक्रमजीत सेन। इस बयान पर अन्य लोगों के अतिरिक्त दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए.पी. शाह, पटना हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अंजना प्रकाश, इतिहासकार रामचंद्रगुहा, लेखिका अरुंधती रॉय, कानूनविद इंदिरा जयसिंह और एक्टिविस्ट हर्ष मंदर ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
27 जून को किए ट्वीट में भूषण ने पिछले छह साल के दौरान लोकतंत्र के ‘विनाश’ में ‘सुप्रीम कोर्ट की भूमिका’ को लेकर लिखा था और ‘देश के पिछले चार प्रधान न्यायाधीशों की भूमिका’ का उल्लेख भी किया था। 29 जून को किए अपने दूसरे ट्वीट में उन्होंने हर्ले डेविडसन बाइक पर बैठे प्रधान न्यायाधीश एस.ए. बोबडे पर टिप्पणी की थी। भूषण के खिलाफ दिए गए फैसले से सहमत न होने वाले वकील कई मामलों को सामने रख रहे हैं। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पास कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने, इलेक्टोरल बॉण्ड, नागरिकता संशोधन कानून और कश्मीरियों द्वारा दायर की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई का समय नहीं है, पर भूषण के खिलाफ कार्यवाही उसने तुरत-फुरत में की। इलेक्टोरल बॉण्ड को लेकर दायर याचिकाएं सुप्रीम कार्ट के पास पिछले तीन साल से लंबित हैं। संभावना है कि इस पर सितंबर के पहले हफ्ते में सुनवाई हो। अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के खिलाफ दायर याचिका करीब एक साल से लंबित है।
दरअसल, भूषण के ट्वीट के विषय को लेकर भी एक राय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन लोकुर ने उन्हें एक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए कहा कि भूषण का ट्वीट एक राय है जिसपर अदालत की अवमानना का मामला नहीं बनता। उन्होंने कहा, ‘मुगल शासन को लेकर कुछ इतिहासकारों की राय प्रेममय है, दूसरों की नहीं। राज को लकर कुछ इतिहासकारों की राय प्रेममय है, दूसरों की नहीं। आजादी के बाद के कुछ नेताओं को लेकर कुछ इतिहासकारों की राय प्रेममय है, दूसरों की नहीं। इसी तरह, आगे आने वाले इतिहासकार भारत के प्रधानन्यायाधीशों की भूमिका को लेकर प्रेममय तरीके से देख सकते हैं जबकि दूसरे नहीं देखेंगे। क्या हमें शासन और न्याय समेत जीवन के हर अंग में एक समान राय की जरूरत है? क्या असहमति और विरोध अरुचिकर हैं?’(navjivan)
- मनीष कुमार
बिहार के कई जिलों में विनाशकारी बाढ़ के साथ ही बाल तस्करी का घिनौना खेल शुरू हो जाता है. प्रलयंकारी बाढ़ में सब कुछ गंवा चुके परिवारों पर मानव तस्करों की गिद्ध दृष्टि लगी होती है.
सहानुभूति व आर्थिक मदद की आड़ में मानव तस्कर बच्चों के माता-पिता को यह समझाने में कामयाब हो जाते हैं कि उनका बेटा या बेटी पूरे परिवार को भुखमरी से बचाने में कामयाब हो सकता है, बशर्ते बच्चों को उन्हें सौंप दिया जाए. जीवन की चाह में परिवार अपने कलेजे के टुकड़े को उन दलालों के हाथों सौंप देता है. घर से निकलने के बाद फिर उन बच्चे-बच्चियों के साथ जो गुजरता है उसकी कल्पना भर से रूह कांप जाती हैं.
इस साल भी बाढ़ के साथ ही ऐसी घटनाएं समाचार पत्रों की सुर्खियां बनने लगीं हैं. बच्चों के कल्याणार्थ काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन की सूचना पर मंगलवार की रात पटना जिले के मोकामा में रेलवे पुलिस जीआरपी व रेलवे सुरक्षा बल आरपीएफ की संयुक्त कार्रवाई में महानंदा एक्सप्रेस से दिल्ली ले जाए जा रहे सात बच्चों को दलालों के चंगुल से मुक्त कराया गया. पुलिस ने एक मानव तस्कर को भी गिरफ्तार किया. इन बच्चों को तीन हजार रूपये मासिक की पगार का प्रलोभन दिया गया था जबकि पेशगी के तौर पर उनके मां-बाप को एक हजार रुपये दिए गए थे.
ऐसा ही एक मामला बुधवार की शाम को सामने आया जब गया जिले की शेरघाटी से गुजरात से ले जाए जा रहे मजदूरों व बाल मजदूरों से भरी बस को डेहरी में पकड़ा गया. पुलिस ने तीन दलालों को भी पकड़ा है. बस में भेड़-बकरी की तरह ठूंसकर इन मजदूरों को सूरत की कपड़ा मिल में काम करने के लिए ले जाया जा रहा था. रोहतास जिले में बाल तस्करी रोकने का काम कर रही संस्था सेंटर डायरेक्ट, पटना की सदस्य सविता पांडेय कहती हैं, "इधर फिर दलालों की सक्रियता बढ़ गई है. वे तरह-तरह के दांव-पेंच अपना रहे हैं. प्रलोभन में फंसकर इन बच्चों के मां-बाप उन्हें दलालों के साथ गुजरात के सूरत व राजस्थान के जयपुर भेज देते हैं."
उत्तरी बिहार से बच्चों की तस्करी
वाकई यह सच है कि वैसे तो संपूर्ण बिहार किंतु खासकर सीमांचल व कोसी बेल्ट यथा किशनगंज, पूर्णिया, अररिया, सहरसा, मधेपुरा, कटिहार व खगड़िया से सस्ते श्रम, मानव अंग, देह व्यापार एवं झूठी शादी के नाम पर बालक-बालिकाओं की तस्करी की जाती है. जाहिर है बाढ़ जैसी भयंकर आपदा के बाद पहले से ही गरीबी की मार झेल रहे परिवारों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है. गरीबी के कारण उनमें आर्थिक असुरक्षा का भाव आता है. स्लीपर सेल की तरह काम करने वाले दलालों की नजर ऐसे परिवारों पर रहती है. कई बच्चे ऐसे होते हैं जो बाढ़ के दौरान जान बचाने की जद्दोजहद के बीच अपने मां-बाप से बिछुड़ जाते हैं. राहत शिविरों में रह रहे इन बच्चों पर भी मानव तस्करों की पैनी निगाह रहती है.
स्थानीय अपराधियों से मिले ये दलाल दूर-दराज के गांवों में पहुंच जाते हैं. अपने नेटवर्क से मिले इनपुट के आधार पर ये बच्चे-बच्चियों के माता-पिता को बेहतर जिंदगी का सपना दिखाते हैं और एडवांस के तौर पर उनको अच्छी-खासी रकम दे देते हैं. इन तस्करों की सक्रियता पर पुलिस-प्रशासन भी ध्यान नहीं दे पाता है क्योंकि आपदा के समय में उनकी पहली प्राथमिकता लोगों की जान बचाने की होती है. बच्चे या बच्चियां जैसे ही मां-बाप द्वारा उनके हवाले कर दिए जाते हैं, वे उन्हें महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान,पंजाब, कोलकाता ले जाते हैं जहां उनकी मासूमियत को दरकिनार कर उन्हें घरेलू कामगार, ढाबों, ईंट उद्योग, कशीदाकारी, लोहा, चूड़ी या कालीन फैक्ट्री में झोंक दिया जाता है. कुछ दिनों तक तो मां-बाप से संपर्क बना रहता है लेकिन बाद में वह भी टूट जाता है.
दलाल के वादे के अनुसार मां-बाप को तो दूर, बच्चों को भी पगार नहीं दी जाती है. अब वहां वे बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हैं. बच्चियों को तो इससे भी त्रासद स्थिति झेलनी पड़ती है. उन्हें देह व्यापार के धंधे में धकेल दिया जाता है. पूर्णिया जिले के बायसी में एक बच्चे को माता-पिता ने मानव तस्कर के हवाले कर दिया. उसने हर महीने पैसे भेजने का आश्वासन दिया था. कुछ दिनों बाद बच्चे का मां-बाप से संपर्क खत्म हो गया. काफी अरसे बाद जब पुलिस ने राजस्थान से कुछ बच्चों को मुक्त कराया तो उनमें बायसी का वह बच्चा भी था. इसी तरह 2018 में जब पुलिस ने सीमांचल एक्सप्रेस से बारह बच्चों को रेस्क्यू किया तो उस समय एक बच्चे ने बताया कि वह उसके गांव से आने वाले एक चाचा के साथ जा रहा था लेकिन जैसे ही पुलिस की गतिविधियां दिखी, चाचा गायब हो गया.
लॉकडाउन के बाद बाल तस्करी बढ़ने की आशंका
आंकड़ों के मुताबिक 2019 में सीमांचल के इलाके पूर्णिया से तीन, कटिहार से पांच, अररिया से चार, किशनगंज से तीन बच्चे लापता हो गए जबकि 2018 में 17 और 2017 में 24 बच्चों के गुम होने का मामला विभिन्न थानों में दर्ज हुआ. यही वजह है कि इस साल स्वयंसेवी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दखिल कर कहा है, "लॉकडाउन के बाद बाल तस्करी के मामलों में काफी वृद्धि की संभावना है. कोरोना के कारण आर्थिक संकट गहरा गया है. मानव तस्कर सक्रिय हो गए हैं और वे संभावित पीड़ित परिवारों को एडवांस पेमेंट भी कर रहे हैं. इस दिशा में गंभीर प्रयास करने की जरूरत हैं."
कोसी के इलाके में गरीब लोगों की बच्चियों को शादी के नाम पर गुमराह किया जाता है. उत्तरी बिहार के विभिन्न जिलों के कई थानों में ऐसे मामले दर्ज हैं. यहां ब्राइड ट्रैफिकिंग एक बड़ा मुद्दा है. जिन इलाकों में लिंगानुपात कम है वहां बच्चियां आसानी से मानव तस्करों की शिकार हो जातीं हैं. यहां मांग व आपूर्ति के हिसाब से झूठी शादियां होती हैं. इसके नाम पर यहां की अधिकतर बच्चियों को तथाकथित विवाह के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली व पंजाब भेज दिया जाता है. जहां उन्हें विवाह के नाम पर कई बार बेचा जाता है या फिर देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया जाता है. जहां से जीवनभर वे घर वापसी की सोच भी नहीं सकती. सूत्रों के मुताबिक दस से पंद्रह ऐसे पुरुष व महिला मानव तस्कर हैं जो कई बरसों से कोसी व सीमांचल के इलाके में सक्रिय हैं.
अगर कभी किसी बच्ची की वापसी हो भी जाती है तो तस्करों व स्थानीय अपराधियों के दहशत के मारे उसके मां-बाप आगे की कार्रवाई से हिचक जाते हैं जिससे गुनाहगारों को सजा नहीं मिल पाती है. बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकारी तंत्र को ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है. खासकर राहत शिविरों का सर्वे किया जाना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि कहीं बच्चे गायब तो नहीं हो रहे. बाल मजदूरी विरोधी अभियान (सीएसीएल) के बिहार चैप्टर के राज्य संयोजक नवलेश कुमार कहते हैं, "बाढ़ के कारण विस्थापन की अवस्था में मानव तस्कर सक्रिय हो जाते हैं. मानव तस्करी रोकने के लिए राज्य में दिसंबर, 2008 से ही अस्तित्व नाम की योजना लागू है. किंतु इसके असर का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे राज्य में नौ से चौदह साल की आयु के बाल श्रमिकों की संख्या दस लाख थी. चूंकि बाल तस्करी सीधे तौर पर बालश्रम से जुड़ा है इसलिए इस पर तो नियंत्रण पाना ही होगा."
बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए सामाजिक चेतना
बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था बचपन बचाओ आंदोलन के बिहार-झारखंड के राज्य संयोजक मुख्तारुल हक कहते हैं, "बिहार के करीब 11 लाख बच्चे देशभर में बतौर श्रमिक काम कर रहे हैं. अशिक्षा इसलिए है कि बच्चे स्कूल नहीं जा रहे. तो ये कहां जाएंगे. वे काम करने चले जाते हैं." कोविड व लॉकडाउन के कारण जो परिवार घर लौट आए थे, दलाल उन्हें प्रलोभन दे बस भेजकर काम पर बुलाने की व्यवस्था कर रहे हैं. जो श्रमिक लौट रहे हैं वे अपने बच्चों को भी ले जा रहे हैं. नेपाल के जो सात जिले बिहार के सीमांचल से लगते हैं, बाल तस्करी के लिए वे बड़े संवेदनशील है. हालांकि तस्करी रोकने को सरकार ने तमाम उपाय कर रखे हैं.
बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है जहां 2009 में बालश्रम उन्मूलन, पुनर्वास व विमुक्ति के लिए कार्य योजना बनाई गई जिसमें सत्रह विभागों की हिस्सेदारी है. सभी की अपनी-अपनी जिम्मेदारी तय की गई है. जैसे शिक्षा विभाग रेस्क्यू किए गए बच्चों का स्कूल में नामांकन कराता है और फिर उसकी ट्रैकिंग की जाती है. वैसे भी बच्चों के पुनर्वास की सबसे अच्छी जगह स्कूल है. इसी तरह समाज कल्याण विभाग अनाथ बच्चों का लालन-पोषण करने वाले परिवार को परवरिश योजना के तहत एक हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान करता है. कुसहा त्रासदी के बाद रोकथाम के लिए अस्तित्व योजना को लागू किया गया जबकि पुलिस ने एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) का गठन किया जिसका नोडल अफसर डीएसपी स्तर के अधिकारी को बनाया गया. मुख्तारुल हक कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि इसे रोकने के प्रावधान नहीं बनाए गए हैं. किंतु बगैर सामाजिक चेतना व व्यावहारिक परिवर्तन के स्थिति को बदला नहीं जा सकता."
बाल तस्करी रोकने की सरकारी व्यवस्थाएं जितनी हों लेकिन यह भी सच है पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे तस्करों का खेल बदस्तूर जारी है. बात भले ही बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की की जाती हो लेकिन आज भी मुनिया का सौदा हो रहा है. यह कटु सत्य है कि जब तक यह राजनीतिक दलों का मुद्दा नहीं बनेगा तब तक गरीबी, अंतरराज्यीय समन्वय में कमी, कमजोर अभियोजन के कारण मासूमों की सौदेबाजी होती रहेगी.(dw)
गिरीश मालवीय
मुझे कभी इस बात में शक नहीं रहा कि जितने ट्विटर और इंस्टाग्राम के सेलेब्रिटीज़ है यह पीआर एजेंसियों के ही प्रोडक्ट है। अगर आप सुशांत सिंह वाले प्रकरण में देखें तो आप पाएंगे कि सुशांत सिंह के परिवार में उनकी बहनों के ट्विटर एकॉउंट अब पीआर एजेंसियां ही हैंडल कर रही हैं। उनके पिता ने जो चिठ्ठी रिलीज की थी वह बॉलीवुड के किसी स्क्रिप्ट राइटर से लिखवाई गई थी और न सिर्फ सुशान्त का परिवार बल्कि रिया चक्रवर्ती के सारे सोशल मीडिया एकॉउंट से जो भी संदेश जा रहा है वह सारा पीआर एजेंसियां ही डिसाइड कर रही हंै।
यह तो हुई सुशांत सिंह वाली बात, कल मित्र सौमित्र ने बताया कि यूट्यूब पर एक गालीबाज आदमी है ‘भाऊ’ इसके लाखों फॉलोअर बताए जाते हैं, उसका एकॉउंट भी वडोदरा की एक एजेंसी ऑपरेट करती है, और उस एजेंसी का बीजेपी से डायरेक्ट लिंक है यही भाऊ गाली बक-बक कर बिग बॉस में पहुंच गया। अब ये पहुंचा या पहुंचाया गया यह आप स्वयं समझ लीजिए।
अब दूसरी तमाम सेलेब्रिटीज की बात कर लेते हैं जो आजकल अपने भडक़ाऊ बयानों की वजह से टीवी के न्यूज़ चैनलों और न्यूज़ वेबसाइट पर छाई रहती हैं। इसमें अभी सबसे ज्यादा टॉप पर है कँगना राणावत, कोई भी बकवास से बकवास मुद्दा हो ये अभिनेत्री उस पर अपनी राय अवश्य देती हैं और एक डील के तहत उसके ट्वीट और बयानों को दर्शकों के सामने परोसा जाता है। यह डील न्यूज़ चैनल्स और पीआर एजेंसी के बीच होती है कि हमें आपके चैनल पर इतना कवरेज दिया जाएगा। दरअसल न्यूज़ मीडिया और पीआर एजेंसी दोनों के लिए यह विन-विन डील है।
ऐसी ही एक और है कुश्ती की महिला खिलाड़ी बबीता फोगाट। क्या आपको आश्चर्य नहीं होता कि सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में खिलाड़ी होंगे जिनका कद फोगाट से बड़ा है लेकिन उनके बयानों को मीडिया कोई महत्व नहीं देता लेकिन फोगाट कुछ बोलती है तो तुरन्त मीडिया उठा लेता है। ऐसे और भी एकॉउंट हैं अभिजीत भट्टाचार्य, कैलाश खेर, सोनू निगम आदि-आदि। यह अपने-अपने स्तर पर अलग-अलग काम करते हैं लेकिन इनका मुख्य उद्देश्य एक ही एजेंडा सपोर्ट करना होता है जिसे पीआर एजेंसी डिसाइड करती है। इसे समझना थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है जैसे डील यह है कि 8 से 10 ट्वीट आप अपने हिसाब से करो लेकिन 1 ट्वीट आपको पीआर एजेंसी के हिसाब से करेगी।
इन तमाम सेलेब्रिटीज़ की पोल पट्टी कुछ साल पहले कोबरा पोस्ट ने स्टिंग कर बहुत बढिय़ा तरीके से खोली थी लेकिन मीडिया ने कभी उस बारे में बात नहीं की।
कोबरा पोस्ट के रिपोर्टरों ने एक छद्म पीआर एजेंसी के प्रतिनिधि बनकर इन सितारों से मुलाक़ात की थी। उन्हें बताया गया कि आपको अपने फेसबुक, ट्विटर और इन्स्टाग्राम अकाउंट के जरिये एक राजनीतिक पार्टी को प्रोमोट करना है
उनसे कहा गया, ‘हम आपको हर महीने अलग-अलग मुद्दों पर कंटैंट देंगे, जिसे आप अपने शब्दों और शैली में लिखकर अपने फेसबुक, ट्विटर और इन्स्टाग्राम अकाउंट से पोस्ट करेंगे। आपके और हमारे बीच आठ-नौ महीने का एक दिखावटी करार होगा। यही नहीं जब पार्टी किसी मुद्दे पर घिर जाए तो आपको ऐसे मौकों पर पार्टी का बचाव भी करना होगा।’
इन मशहूर सितारों ने सभी शर्तें मानते हुए मनमाफिक़ पैसा मिलने पर किसी भी पार्टी के लिए सोशल मीडिया पर छद्म-प्रचार करने को तैयार थे। इनमें अनेक चर्चित नाम शामिल थे जैसे जैकी श्रॉफ, शक्ति कपूर, विवेक ओबेरॉय, अभिजीत भट्टाचार्य, कैलाश खेर, मीका सिंह, अमीषा पटेल, महिमा चौधरी, श्रेयस तलपड़े, राखी सावंत, अमन वर्मा, सनी लियोन, कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल, राजपाल यादव आदि।
इसके अलावा इसमें पुनीत इस्सर, सुरेंद्र पाल, पंकज धीर और उनके पुत्र निकितिन धीर, टिस्का चोपड़ा, दीपशिखा नागपाल, अखिलेन्द्र मिश्रा, रोहित रॉय, राहुल भट, सलीम ज़ैदी, हितेन तेजवानी और उनकी पत्नी गौरी प्रधान, एवलीन शर्मा, मिनिषा लाम्बा, कोइना मित्रा, पूनम पांडेय, उपासना सिंह, कृष्णा अभिषेक, विजय ईश्वरलाल पवार यानि वीआईपी, कोरियोग्राफर गणेश आचार्य और डांसर-एक्टर संभावना सेठ भी पैसे लेकर कुछ भी लिखने को तैयार थे।
एक ओर बड़ा नाम था जो अब पीआर एजेंसियों की मेहनत से प्रवासी मजदूरों का मसीहा बन गया है वह था सोनू सूद का, आप जानते हैं सोनू सूद क्या डील चाहते थे, सोनू सूद हर महीने 15 मैसेज के लिए 1.5 करोड़ की फीस पर तैयार नहीं थे। सूद एक दिन में पांच से सात मैसेज करने को तैयार थे लेकिन प्रति मैसेज वे 2.5 करोड़ रुपये की मांग कर रहे थे।
अब यदि सोनू सूद एक मैसेज का इतना माँग रहे थे तो आप समझ लीजिए कि उनकी प्रवासी मजदूरों को मदद करने वाली पूरी कैम्पेन किसके कहने पर चलाई गई और किसने रकम लगाई। जितनी रकम उन्होंने खर्च की होगी उससे दसियों गुना ज्यादा रकम तो उन्होंने अपने ट्वीट और इंस्टाग्राम पोस्ट का रेट बढ़ाकर वसूल ली होगी।
लेकिन इन सबकी गलती नहीं है। दरअसल लोग ही बेवकूफ हैं जो ऐसे घटिया फिल्मी सितारों और खिलाडिय़ों की ओपिनियन से अपने आपको प्रभावित होने देते हैं। उन्हें फॉलो करते हैं उनकी चर्चा करते हैं यह सब एक तरह के बनाए गए पीआर एजेंसियों के बनाए गए प्रोडक्ट है जो हमें एक स्यूडो वातावरण में बनाए रखते हैं। थोड़ा लिखा है अधिक समझिएगा।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोरोना वायरस से मानव जीवन को बचाने और जनता की तकलीफों के बारे में अनुभव कर छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए अथक कार्य किया। यही वजह है प्रवासी श्रमिकों, किसानों और गौसेवकों का आशीर्वाद उनको मिल रहा है। उन्होंने न केवल किसानों से 25 सौ रूपए में धान खरीदने का वादा निभाया है, बल्कि कोराना संकट के समय किसानों को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के जरिए बड़ी राहत दी है। किसानों को खेती-किसानी के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए 57 सौ करोड़ रूपए की राशि चार किश्तों में दी जा रही है। इसकी 15-15 सौ करोड़ की दो किश्ते दी जा चुकी है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री बघेल उस समय किसानों की मदद के लिए सामने आए जब चारो ओर से कोरोना वायरस की वजह से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था संकट में है। ऐसे कठिन समय में राज्य की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने के लिए लिए उन्होंने किसानों की मदद की, यह उनकी दूरदर्शिता का उदाहरण है।
गांवों में बसता भारत को पहचान दिलाने छत्तीसगढ़ सरकार मजबूती से प्रयास कर रही है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री बघेल किसानों, मजदूरों की तकलीफ और दर्द को बखूबी समझते हैं। इसलिए उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए सुराजी गांव योजना की शुरूआत की, जिसमें गौठान के माध्यम से ग्रामोत्थान के लिए प्रावधान रखे गए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूती देने के लिए उन्होंने गोधन न्याय योजना की शुरूआत की। छत्तीसगढ़ सरकार को इन योजनाओं के जरिए किए जा रहे कार्यों से सभी लोगों और संगठनों का आशीर्वाद छत्तीसगढ़ सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को मिल रहा है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के छत्तीसगढ़ी मॉडल को पूरे देश में सराहना मिल रही है। कई राज्य गोधन न्याय योजना और सुराजी गांव योजना को लागू करने का मन बना रहे हैं। गाय, गौठान और गोबर गांव के लोगों की आर्थिक समृद्धि का आधार है। छत्तीसगढ़ सरकार की पहल में गांव के किसान, मजदूर सहित सभी लोगों की आर्थिक उन्नति निहित है। गौठानों में पशुधन के संवर्धन के साथ ही आर्थिक गतिविधियोंं में लोगों को रोजगार मिलेगा वहीं खुले में चराई पर रोक लगने से किसानों को दोहरी फसल लेने का मौका भी मिलेगा। गोधन न्याय योजना से लोग वर्षभर आमदनी प्राप्त करेंगे। दो रूपए में खरीदे गए गोबर से वर्मी कम्पोस्ट के जरिए युवाओं को रोजगार मिलेगा।
खेतों में जैविक खाद के उपयोग से मानव शरीर को रासायनिक खाद से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। इससे हमारा अन्न-जल और पर्यावरण भी शुद्ध होगा। बाड़ी में अधिकतर ग्रामीण जैविक खाद का उपयोग परम्परागत ढंग से करते आ रहे हैं। सरकार की ओर से पहली बार इस दिशा में मजबूत प्रयास की शुरूआत की गई है। निश्चित रूप से इन योजनाओं के सफल क्रियान्वयन से छत्तीसगढ़ के सभी लोगों को सकारात्मक परिणाम मिलेगा। यह प्रयास कितना सामयिक है यह इस बात से पता चलता है कि जब कोरोना संकट शुरू हुआ तब आवागमन बंद होने के कारण बाहर से सब्जी आना बंद हो गया तब शहर और गांव में बाड़ी की सब्जियां ही काम आई। सुराजी गांव योजना आकस्मिक विपदा की घड़ी में संकटमोचक और दूरगामी सोच का परिचायक बनी।
लॉकडाउन के समय जब पूरे देशभर में प्रवासी श्रमिक अपने घर किसी भी हाल में पहुंचने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। असंख्य लोग पैदल और सायकल से घर के लिए रवाना हो रहे थे। कोटा से छात्रों की वापसी के समय में मुख्यमंत्री बघेल द्वारा श्रमिकों को उनके राज्य की सीमा तक पहुंचाने, प्रवासी श्रमिकों के लिए ट्रेन चलाने की पहल, तत्काल निर्णय लेकर नि:शुल्क ट्रेन की व्यवस्था करना सब उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
अपने घर तक सकुशल पहुंचने वाले श्रमिक कहते है कि यह बड़ी बात है कि एक मुख्यमंत्री ने श्रमिकों की पीड़ा को समझकर उनके लिए नि:शुल्क ट्रेन की व्यवस्था की। हमारे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि उन्होंने यह महसूस किया कि श्रमिकों के पास जो भी राशि बची होगी उससे जीवन-यापन में खर्च हो गई होगी, ‘घर वापसी के लिए ट्रेन की टिकट के लिए पैसे नहीं होगा। ऐसे विपदा के समय में मुख्यमंत्रीभूपेश बघेल प्रवासी श्रमिकों के लिए संकटमोचक बने।
उन्होंने श्रमिकों को लॉकडाउन के दौरान मनरेगा में रोजगार देकर बहुत बड़ा उपकार किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि देश के प्रमुख शोध संस्था सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटिज (सीएसडीएस) के सर्वे रिपोर्ट में भारत के अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ सरकार ने लॉकडाउन अवधि में मनरेगा से सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने का उल्लेख है। कहीं न कहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रवासी श्रमिकों और किसानों के लिए हरसंभव मदद की है । छत्तीसगढ़ सरकार सुराजी गांव योजना से लोगों के शरीर और उनके जीवन को सुधारने की कोशिश कर रही है साथ ही साथ ग्रामीण भारत से समृद्ध भारत बनाने की ओर बढ़ रही है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मुझे गर्व है कि इंदौर को लगातार चौथी बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया है। मुझे दिल्ली में बसे 55 साल हो गए लेकिन इंदौर में जन्म के बाद जो 21 साल कटे, वे अद्भुत थे। लगभग 50 साल पहले जब मैं अपनी पीएच.डी. के शोध के लिए लंदन और वाशिंगटन जा रहा था तो एक मित्र के आग्रह पर आस्ट्रिया की राजधानी वियना में भी एक सप्ताह रुका। वहां एक सडक़ पर एक सरदारजी ने मुझे देखा और पूछा कि ‘‘तुम इंदौर में ही रहते हो, न ?’’ मैंने कहा, ‘‘मैं आजकल दिल्ली में रहता हूं। मैं इंदौर में नहीं रहता हूं लेकिन इंदौर मुझमें रहता है।’’
हम इंदौरियों की राय यह है कि जो आदमी एक बार इंदौर में रह गया, वह कभी इंदौर को भूल नहीं पाता। यों भी इंदौर को ‘छोटा मुंबई’ कहा जाता है लेकिन सफाई में वह मुंबई क्या, दिल्ली से भी आगे निकल गया है। उस समय इंदौर की जनसंख्या मुश्किल से 3-4 लाख थी लेकिन अब 30 लाख के ऊपर है। इसके बावजूद वह साफ-सफाई में अव्वल है। ‘स्वच्छ सर्वेक्षण 2020’ की रपट में 4000 शहरों के 28 दिन तक बारीकी से किए गए निरीक्षण का ब्यौरा है। लगभग पौने दो करोड़ लोगों से पूछताछ के बाद यह रपट तैयार की गई है।
इंदौर चौथी बार भी सारे भारत में सर्वप्रथम इसलिए रहा है कि वहां की जनता अत्यंत जागरुक और सक्रिय है। इंदौर के लोग स्वच्छताप्रिय तो हैं ही उनके-जैसे भोजनप्रेमी लोग शायद पूरे दक्षिण एशिया में कहीं नहीं होंगे। इंदौर के नमकीन और मिठाइयों ने सारी दुनिया के प्रवासी भारतीयों को सम्मोहित कर रखा है। भारत के मध्य क्षेत्र में इंदौर-जैसा मालदार शहर कोई और नहीं है। इंदौर की खूबियां इतनी हैं कि उनका जिक्र इस छोटे-से लेख में नहीं हो सकता। इंदौर के मालवी लोगों को ‘घर-घुस्सू’ कहा जाता है याने वे मालवा छोडक़र कहीं जाना ही नहीं चाहते। मालवा में न ज्यादा ठंड पड़ती है और न ही ज्यादा गर्मी!
इस मौसम ने मालवी लोगों के मन को भी अपने रंग में रंग दिया है। इसीलिए मालवा-क्षेत्र में सांप्रदायिक और जातीय दंगे बहुत कम होते हैं। वहां एक-दूसरे की लिहाज़दारी गज़ब की होती है। परस्पर विरोधी नेता भी एक-दूसरे का बड़ा ख्याल रखते हैं। इंदौर में आंदोलन करते हुए मुझे कई बार जेलों में भी रहना पड़ा लेकिन वहां भी किसी ने कोई दुर्व्यवहार किया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। इंदौर के आस-पास की पहाडिय़ों, नदियों, तालाबों और बगीचों से ऐसा खुशनुमा माहौल बना रहता है कि जैसे कोई ईश्वरीय महफिल सजी हुई है। भारत तथा हमारे पड़ौसी देशों के शहर भी इंदौर-जैसे या उससे भी बढिय़ा बन जाएं, क्या यह आप नहीं चाहेंगे ? (nayaindia.com)
(नया इंडिया की अनुमति से)
कोरोना वायरस, 22 अगस्त। कोविड-19 के कारण दुनिया के सामने आए तमाम तरह के संकटों पर उम्मीद हावी है। सवाल एक अदद वैक्सीन का है। लेकिन वैक्सीन तैयार करने की दौड़ एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। इसमें इतनी जल्दबाजी की जा रही है और जिस तरह से नियम-कायदों में ढील दी जा रही है, उससे नई आशंकाएं जन्म ले रही हैं। अगर वैक्सीन में थोड़ी-सी भी चूक रह गई तो लाखों-करोड़ों लोगों को उसके दुष्परिणामों को झेलना पड़ेगा।
आमतौर पर टीके लोकप्रिय दवाओं की तरह मोटी कमाई करने वाले तो नहीं होते लेकिन एहतियाती उपाय के जरिये ये लंबे समय से कहीं ज्यादा इंसानी जान बचाते रहे हैं। लेकिन कोविड-19 का मामला कुछ अलग है। लगभग 200 देशों के अरबों लोग इससे प्रभावित हैं और इसके संभावित टीके के लिए अरबों डॉलर का कारोबार पलक-पांवड़े बिछाए हुए है। वैक्सीन तैयार करने की प्रक्रिया को तेज करने, विनियामक तंत्र को ढीला करने, पूर्व की कठोर वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में ढील देने और जिन वैक्सीन की क्षमता अभी पूर्णतः साबित भी नहीं हुई हो, उसके लिए मारामारी की स्थितियां बन गई हैं।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन घोषणा करते हैं कि उनके यहां देश में विकसित वैक्सीन (स्पुतनिक वी) को पंजीकृत किया गया है और उसकी पहली खुराक उनकी अपनी बेटी को दी गई। गौरतलब है कि भारत, चीन और तमाम पश्चिमी देशों समेत कई कॉरपोरेट्स वैक्सीन तैयार करने की सदी की इस दौड़ में शामिल हैं और समय-समय पर इसके विकास के बारे में घोषणाएं की जा रही हैं, तेजी से सफलता पाने का दावा किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि अब, बस, एक कदम दूर हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के पास कम-से-कम छह वैक्सीन सूचीबद्ध हैं जो तीसरे चरण में मनुष्यों पर परीक्षण करने का काम कर रहे हैं। इनमें ऑक्सफोर्ड ग्रुप, फाइजर, बायोएनटेक, कैन्सिनो और क्योरवैक, मॉडर्ना आगे हैं। उम्मीद की जा रही है कि 2020 के अंत तक टीका तैयार हो जाएगा हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह टीका 2021 में ही तैयार हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि बेशक तकनीकी प्रगति हुई है और बहुत सारे आंकड़ों के सटीक विश्लेषण की क्षमता काफी बढ़ी है जिसके कारण विकास की प्रक्रिया तेज हो गई है लेकिन यह ऐसा विषय है जिसमें किसी भी शॉर्ट कट या अटकलबाजी की कोई जगह नहीं है।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के पूर्व प्रोफेसर और थिंक टैंक एसीसीस हेल्थ इंटरनेशनल के अध्यक्ष विलियम हैसेल्टाइन ने हाल ही में वाशिंगटन पोस्ट में लिखे एक लेख में कहा कि, "चिकित्सा और विज्ञान पर यकीन भरोसे पर आधारित है लेकिन आज कोविड-19 का मुकाबला करने में वैज्ञानिक प्रगति को साझा करने की हड़बड़ी में उस भरोसे को ही कम किया जा रहा है। निजी कंपनियां, सरकारें और अनुसंधान संस्थान संभावित सफलताओं की जानकारी देने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुला रहे हैं लेकिन उनके दावों को जांचा नहीं जा सकता। वे सभी तथ्य जिनके आधार पर ये घोषणाएं की जा रही हैं, उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं जिनसे कि इनकी बातों को कसौटी पर कसा जा सके।”
कोविड-19 ने कई देशों में अभूतपूर्व संकट पैदा किया तो देशों का जवाब भी अभूतपूर्व रहा। डब्लूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन के शब्दों में, “वैक्सीन के विकास की दौड़ में 200 से अधिक संस्थान और कंपनियां हैं और उनमें से 27 क्लीनिकल ट्रायल के चरण में हैं। टीके के विकास और वितरण वगैरह के संबंध में एक राष्ट्रवादी रवैया अपनाना ठीक नहीं, यह काम वैश्विक सहयोग से होना चाहिए।” रूस ने 11 अगस्त को स्पुतनिक-वी बनाने की घोषणा की और उसके बाद खास तौर से पश्चिमी देशों की ओर से आलोचनाओं की एक लहर शुरू हो गई। डब्ल्यूएचओ में यह वैक्सीन विकास के शुरुआती चरण के तौर पर सूचीबद्ध है। लेकिन मॉस्को के गेमालेया संस्थान और रूसी प्रत्यक्ष निवेश कोष का कहना है कि टीका मानव परीक्षणों के अंतिम चरण से गुजर रहा है। लेकिन फिर अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और भारत भी अपने स्वयं के सार्वजनिक वित्त पोषित अनुसंधान संस्थानों और कॉरपोरेटों द्वारा वैक्सीन का उत्पादन करने के प्रयासों में पीछे नहीं हैं। ऐसे समय जब दुनिया इस महामारी से जूझ रही है, इनमें से कुछ देशों का नेतृत्व राजनीतिक-व्यावसायिक-जीवन को बचाने वाली वर्चस्वकारी भूमिका से निर्देशित हो रहा है।
चीन ने अपने यहां एक वैक्सीन को तीसरे चरण के परीक्षणों से गुजारे बिना सैनिकों पर आजमाने की मंजूरी दे दी है। इसने कैनसिनो को पहला वैक्सीन पेटेंट भी दे दिया है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी लोगों को सुरक्षित करने की कोशिशों के तहत दुनियाभर की तमाम कंपनियों को पहले से ही अरबों खुराक का ऑर्डर दे रखा है। कुछ ऐसी ही स्थिति ब्रिटेन की है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी एस्ट्रा जेनेका के साथ मिलकर टीका विकसित कर रहा है जिसमें पुणे का सीरम इंस्टीट्यूट प्रमुख निर्माता है।
वैक्सीन के साइड इफेक्ट:
अगर संख्या में बात करें तो निश्चित तौर पर वैक्सीन की मांग अरबों खुराक में है। दिक्कत की बात है इसके साइड इफेक्ट्स का जोखिम। अगर यह जोखिम 1-2 प्रतिशत भी रहता है तो इसका मतलब लाखों-करोड़ों लोग हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी वजह से वैक्सीन के विकास और परीक्षण के विभिन्न चरणों में अत्यधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा की जाती है। मर्क केन फ्रैजियर के सीईओ कहते हैं, "टीका तैयार करने की कोशिशों का नतीजा इस साल आने की संभावना नहीं है क्योंकि यह एक लंबी प्रक्रिया है। हजारों ट्रायल, आंकड़े इकट्ठा करने और इनके विश्लेषण और संभावित दीर्घकालिक प्रभावों तक पहुंचने में वक्त लगता है।”
टीका तैयार करने की दौड़ में भारत भी है। आईसीएमआर ने परीक्षण से जुड़े संस्थानों को जुलाई के शुरू में काम तेज करने को कहा ताकि 15 अगस्त तक कोई सकारात्मक नतीजा आ सके और प्रधानमंत्री लालकिले के प्राचीर से इसकी घोषणा कर सकें। स्वाभाविक ही राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों और संबंधित विशेषज्ञों ने इसका विरोध किया और तब आईसीएमआर यह कहते हुए पीछे हट गई कि यह तो सिर्फ इसलिए कहा गया था कि विकास प्रक्रिया तेज हो सके।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि तीन टीके परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं। उत्पादन और वितरण की तैयारी हो चुकी है और जैसे ही वैज्ञानिक हरी झंडी देंगे, बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हो जाएगा। भारत बायोटेक, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के साथ-साथ जायडस कैडिला समूह द्वारा विकसित टीका परीक्षण के चरण-1 और 2 में है। सीरम इंस्टीट्यूट दूसरे और तीसरे चरण का परीक्षण कर रहा है। भारत बायोटेक के अध्यक्ष ने कहा कि उनके काम का टीका नियामक मंजूरी के बाद 6 महीने से एक साल में तैयार हो सकेगा। हालांकि भारत वर्तमान में दुनिया के आधे से अधिक टीकों का उत्पादन करता है लेकिन उसके लिए भी 1.3 अरब लोगों को वैक्सीन देने का काम दुष्कर है।(NAVJIVAN)
-मनीष सिंह
घरों से निकलिए और तमाम जंगलों से होकर गुज़रिये। देखिये, ब्रिटिश राज की निशानियों पर फूल आये है।
ये सागौन के फूल हैं। सागौन, याने ‘टेक्टोंना ग्रान्डिस’ भारतीय स्पीशीज नहीं है। साल या शीशम की तरह ‘न ये खुद से उगता है, न खुद से उग आया है.. इसे तो अंग्रेजों ने लगाया है। मितरों..’
तो टीक, या सागौन असल में दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया का नेटिव है। आसानी से नहीं लगता, इसे बीज की नर्सरी तैयार कर, या रुट शूट से उगाकर वृक्षारोपण किया जाता है। सागौन के वृक्ष सीधे, बेहद लंबे होते है। पूरा टिम्बर बेहद मजबूत होता है और काटने पर गैर टिम्बर वेस्ट कम होता है। जरा पोलिश कर दो, चमकने लगती है। ऐसे शानदार टिम्बर से आप घर के सोफे पलंग बनाना चाहेंगे, और अंग्रेज बन्दूक।
और खूब सारी बंदूक, जिसके लिए चाहिए खूब सारी लकड़ी। मध्य भारत के सूखे पर्णपाती वनों में सागौन के खूब उगता है। जमकर प्लांटेशन किये गए। आज भी किये जाते है। कटी हुई लकड़ी को ढोने के लिए जंगल से पोर्ट तक रेलवे लाइन भी बिछाई गई। और पूरी की पूरी भारतीय वन सेवा भी गठित की गई।
डीएफओ ऑफिस के रिकॉर्ड रूम में फेंकी हुई एक किताब ने मुझे बताया कि 1860 के दशक में भारत मे इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फारेस्ट का पद बन गया था। और इसके नीचे पूरी विंग बनी। इंडियन सिविल सर्विस के बाद, इंडियन पुलिस सर्विस नही, इंडियन फारेस्ट सर्विस बनी थी। इससे महत्व जानिए।
यह सेवा इतनी महत्वपूर्ण थी, कि इसका प्रशाशन, खर्च, नियम नीति का जिले के दूसरे विभागों से कोई कंट्रोल नही था। यह लगभग स्वत्रंत होती थी। नतीजा, वन सेवा के अधिकारी कलेक्टर और एसपी को न हेजते थे। वन अफसर ट्रेजरी से सीधे चेक काटता है। खर्च का हिसाब फॉर्म 14 में सीधे एजी को भेजने की रवायत आज भी है।
इन बंदूकों से ब्रिटिश ने सारी दुनिया जीती, विश्वयुद्ध जीते। भारत मे टीक अच्छे प्लांटेशन को पुरस्कार मिलते। मगर यह बात हर किसी को मालूम न थी।
टीक लगाने की रवायत और जुनून इतना था, कि मध्य भारत के रायपुर के समीप बार नाम की रेंज में ( यहां आज बार-नवापारा नाम का अभयारण्य स्थित है) मनीराम नाम के एक प्लांटेशन वाचर ने तीन एकड़ जंगल सफाचट कर दिया। और उस पर टीक के पौधे लगा दिए।
जंगल को बिना अनुमति काटने की खबर ऊपर पहुंची और कोई अधिकारी जांच के लिए आया। मनीराम की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। घर परिवार त्याग कर जान बचाने के लिए गायब हो गए। उनका पता सरकार खोजती रह गई।
इनाम देने के लिए..!
मनीराम प्लांटेशन कोई डेढ़ सौ साल पुराने हो चुके हैं। जितने भी पेड़ बचे है, गर्थ और हाइट देखते बनती है। सागौन प्लांटेशन कैसा किया जाना चाहिए, बड़े
अफसरों को ट्रेनिंग में बुलाकर मनीराम का प्लांटेशन दिखाया जाता है।
तो जरा गाड़ी निकालिये। कहीं जंगलों में सागौन के फूल देखकर आइये। हमे बताइये कैसा महसूस हुआ?
राहुल गांधी पर रामचन्द्र गुहा, और
उनसे असहमत राजमोहन गांधी
देश के एक प्रमुख राजनीतिक-इतिहासकार रामचन्द्र गुहा आमतौर पर मोदी के आलोचक के रूप में अखबारों में दिखते हैं। लेकिन मोदी की आलोचना का मतलब यह नहीं कि वे राहुल गांधी के प्रशंसक हों। उन्होंने अभी एनडीटीवी पर एक लेख में ऐसी वजहें गिनाई हैं कि राहुल गांधी किन पांच वजहों से मोदी के मुकाबले खड़े नहीं हो सकते।
अब उनके तर्कों के मुकाबले एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री, वर्तमान में अमरीका में पढ़ा रहे राजमोहन गांधी ने एक जवाबी लेख लिखा- मैं राहुल गांधी पर रामचन्द्र गुहा के आंकलन से असहमत हूं।
हम एनडीटीवी के सौजन्य से ये दोनों लेख यहां दे रहे हैं, लोग पहले रामचन्द्र गुहा का लेख पढक़र फिर राजमोहन गांधी का लेख पढ़ें, और फिर अपना दिमाग खुद बनाएं। -संपादक
5 Reasons Why Rahul Gandhi Cannot Take On Modi For PM
by - Ramachandra Guha
Those who oppose Hindutva seek to recover the founding principles of the freedom struggle, such as religious and linguistic pluralism, gender and caste equality, a critical attitude to state power, and an open-ness to other cultures and civilizations: all principles which Hindutva threatens to abandon or overthrow. But the closer one gets to 2024, the battle against Hindutva will also become a battle of personalities. For general elections in India are now increasingly presidential. Can the person who so lamentably failed to take on Narendra Modi twice in succession succeed on his third try? A recent poll suggests he can't. This asked voters to choose their favoured Prime Minister, finding that while 66% nominated Narendra Modi, a mere 8% opted for Rahul Gandhi.
Back in January 2013, when the Congress was firmly in power at the Centre, I published a column on the party's heir-apparent in the Telegraph, where, after reviewing his career since he entered politics, I wrote: "The nicest thing one can say about Mr Rahul Gandhi is that he is a well-intentioned dilettante. He has shown no signs of administrative ability, no desire to take on large, important responsibilities, no energy or commitment to solving - as distinct from merely identifying - serious social problems."
क्लिक करें और यह भी पढ़ें : I Disagree With Ram Guha's Assessment Of Rahul Gandhi- Rajmohan Gandhi
I added: "Mr Gandhi's dilettantism would not matter so much if he was still in college or in a private-sector job or running a small business of his own. But as the vice president and prospective leader of India's largest, oldest, and still most influential political party, and as their candidate for prime ministership, it does matter.'
Those who write on Indian politics are prone to make statements that they later deeply regret; God knows I have made my share of these. However, this is one assessment I stand by. Seven-and-a-half years later, Rahul Gandhi remains a dilettante in politics.
A telling manifestation of Rahul Gandhi's dilettantism is his continuing inability to speak fluently in Hindi-despite his having been an MP for three terms from Uttar Pradesh. His lack of fluency in the language that a plurality of Indians speak is surely one reason that he did so poorly while leading his party in the general elections of 2014 and 2019. His stuttering, stumbling, Hindi was in striking contrast to the absolute command over that language exhibited by Narendra Modi. But there were other reasons too: among them Rahul Gandhi's lack of administrative experience, and his being a fifth-generation dynast.
That Rahul Gandhi is the son, grandson and great grandson of former Prime Ministers is not an advantage in the eyes of most Indians, who are increasingly disenchanted with claims to entitlement based on birth and ancestry. And it is an absolute disadvantage when it comes to confronting the policies of the Modi Government. When the Congress led by Rahul Gandhi charges the Prime Minister and his government of suppressing the press and stifling dissent, the ruling party's spontaneous answer is: And what about Indira Gandhi and her Emergency? When the Congress led by Rahul Gandhi charges the Prime Minister with allowing the Chinese into our territory, the ruling party's spontaneous answer is: And what about Jawaharlal Nehru's capitulation to the Chinese in 1962?
Back in 2019, Rahul Gandhi made the error of making the Prime Minister's personal integrity the central plank of his party's electoral campaign, through the slogan 'Chowkidar Chor Hai'. This was profoundly ill-judged. The Congress should have instead consistently and repeatedly asked where the Acche Din promised in 2014 were. Besides, these allegations of corruption were being made by the son of the Prime Minister associated with the Bofors scandal.
Rahul Gandhi has now been in public life for a full 16 years now. An objective assessment of his career in politics would highlight five traits that make him unsuitable for presentation as a Prime Ministerial alternative to Narendra Modi. First, he lacks political intelligence as manifest in his choosing the wrong slogans and themes in his election campaigns. Second, he is an indifferent speaker in general, and especially so in India's most widely-understood language, Hindi. Third, he lacks administrative experience, never having held a proper job of any kind (whether before entering politics or after it). Fourth, he lacks stamina and tenacity, frequently disappearing from the public stage for weeks at a time. Fifth, he comes across as an entitled dynast to voters who - in the India of the 21st century - ask their leaders what they have themselves done, not whose son or grandson they are.
If the Congress hopes to become a credible all-India party once more, a party capable of gaining power at the centre once more, it needs to do two things. The first is to choose someone to lead it who is not from the Nehru-Gandhi family. The second is to organize a ghar wapasi for those leaders and groups who were once part of the Indian National Congress. Getting the YSR Congress, the Trinamool Congress and the Nationalist Congress to merge with the parent body will greatly expand the party's footprint across India, while at the same time widening the pool of potential candidates for the party's leadership.
The sycophants surrounding Sonia Gandhi and Rahul Gandhi always tell us that the party will not survive unless Sonia or one of her children were to lead it. On the other hand, if one looks beyond personal devotion to the larger interest of Indian democracy, having a non Nehru-Gandhi as the president of our principal opposition party would make it more difficult for the Modi Government to deflect criticisms of its policies in the present by referring to the mistakes (real or alleged) of Jawaharlal, Indira or Rajiv in the past. If a non Nehru-Gandhi as Congress President asked the Government tough questions about its mishandling of the economy and of the pandemic, or about its suppression of dissent and its capitulation to the Chinese, it would be harder for the ruling regime to speak about Nehru or Indira or Rajiv in reply. And if this Congress President who is a non Nehru-Gandhi speaks fluent Hindi, has a mass base, a capacity for hard and sustained work, and a desire to take his or her campaign beyond Twitter and into the streets, the party might do much better at election time too.
On social media, one sometimes hears the argument that "only Rahul Gandhi is bold enough to take on Modi and/or the RSS." The argument is spurious. Rahul Gandhi's criticisms get noticed only because he is viewed and presented as the chief spokesman of the principal opposition party. Who is to say that if someone named Baghel or Gehlot or Banerjee or Reddy was made president of the Congress and given full independence to run the party as they wished, they would not take on Modi and/or the RSS to more telling effect?
Some also claim that "Rahul will make a better Prime Minister than Modi". Were he to suddenly find himself as Prime Minister, it may indeed be that Rahul Gandhi will consult more widely than the current incumbent, be less obsessed with promoting his own image, be less driven by a majoritarian agenda, and allow greater autonomy to public institutions. But he is not in that job, nor is he at all likely to get there. The bitter truth that all opponents of the current regime must face is that presenting Rahul Gandhi as a Prime Minister-in-waiting only plays into the hands of Narendra Modi and the BJP.
I spoke of Rahul Gandhi as being a dilettante, and also of being well-intentioned. This latter trait is manifest in his being the only member of his family who is in any way ambivalent about his entitlement. Thus Priyanka Gandhi thinks that the statement "I am the granddaughter of Indira Gandhi" forecloses criticism of her politics. Sonia Gandhi's dedication to family rule of party and country is arguably even deeper. It is to Rahul Gandhi's credit that he stands apart from his mother and sister in this regard. Whether he can prevail upon them in having a non-family member chosen as Congress President, and then allowing this person to lead with authority, from the front, and with no back-seat driving from Sonia, Rahul, or Priyanka, is another question altogether.
I have been a critic of the dynastic culture of the Congress party for more than two decades now. I make these criticisms afresh because they are perhaps even more necessary than ever before. For in six years as Prime Minister, Narendra Modi has done grievous damage to India. He and his government have undermined our economy, divided our society, and degraded India in the eyes of the world. And he still has almost four years of his present term to run. Those who hope for India's economic, political, and moral revival must find a way to remove Modi and his party from office in 2024. Presenting a dilettantish dynast as his principal opponent for the third time in a row is unlikely to bring about that much desired outcome.
(Ramachandra Guha is a historian based in Bengaluru. His books include 'Environmentalism: A Global History' and 'Gandhi: The Years that Changed the World'.)
राहुल गांधी पर रामचन्द्र गुहा, और
उनसे असहमत राजमोहन गांधी
देश के एक प्रमुख राजनीतिक-इतिहासकार रामचन्द्र गुहा आमतौर पर मोदी के आलोचक के रूप में अखबारों में दिखते हैं। लेकिन मोदी की आलोचना का मतलब यह नहीं कि वे राहुल गांधी के प्रशंसक हों। उन्होंने अभी एनडीटीवी पर एक लेख में ऐसी वजहें गिनाई हैं कि राहुल गांधी किन पांच वजहों से मोदी के मुकाबले खड़े नहीं हो सकते।
अब उनके तर्कों के मुकाबले एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री, वर्तमान में अमरीका में पढ़ा रहे राजमोहन गांधी ने एक जवाबी लेख लिखा- मैं राहुल गांधी पर रामचन्द्र गुहा के आंकलन से असहमत हूं।
हम एनडीटीवी के सौजन्य से ये दोनों लेख यहां दे रहे हैं, लोग पहले रामचन्द्र गुहा का लेख पढक़र फिर राजमोहन गांधी का लेख पढ़ें, और फिर अपना दिमाग खुद बनाएं। -संपादक
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I Disagree With Ram Guha's Assessment Of Rahul Gandhi
by - Rajmohan Gandhi
I am responding not because I am devoted to the prospect that seems to depress Guha - the projection of Rahul Gandhi as an electoral alternative to Modi. The year 2024 is too far, and by then the Congress, the opposition and the country may have several options to choose from. My problems with Guha's article are different.
Before spelling them out, let me summarize Guha's "five reasons". Firstly, says Guha, Rahul comes up with poor slogans. Next, Rahul's speaking skills are weak, especially in Hindi. Thirdly, Rahul has no experience of managing a government department or a private company. Fourthly, he lacks stamina and tenacity. Finally, Rahul is a dynast at a time when, in Guha's assessment, the public is more willing to blame an heir for the failures, real or perceived, of forebears than to look up to someone because of his or her ancestry.
My first problem is with the article's suggestion that "the battle against Hindutva", to use one of Guha's phrases, is primarily an electoral affair. Much before we face another national election, we have to recognize what is taking place before our eyes right now: the systematic hacking of pillars that have kept our democratic house from falling to the ground.
We see the Supreme Court deferring critical petitions that involve the lives and rights of millions. Enforcement officers making well-timed raids on opposition politicians and their relatives. A parliament unable or unwilling to debate pressing issues. Policemen chasing the kin but not the killers of a murdered person.
A Prime Minister monopolizing state-owned media and government-paid hoardings across the country but refusing to face a probing reporter. Private but pervasive TV channels filling the country's air with toxic ill-will towards particular communities. Universities pressurized to compromise on scholarly independence. Students being coerced, often with police batons, to fall in line. Etcetera, etcetera.
क्लिक करें और यह भी पढ़ें : 5 Reasons Why Rahul Gandhi Cannot Take On Modi For PM - Ramachandra Guha
While well aware of this reality, Ram Guha gives undue centrality to the electoral challenge. He also seems to imply that a future electoral battle will be a fair one. Will it?
Where will opposition parties find the money? Will even remotely fair debates be allowed on TV channels? How will opposition candidates, and their relatives and supporters, cope with raids by officers of the state? With criminal charges of inciting disaffection and violence, or of sedition? With physical threats?
It's a tribute to the Election Commission of India (and to the thousands of government employees placed under its control for the weeks of voting) that most Indian elections so far seem to have reflected popular opinion. Can we be certain that this will be so in the future too?
Believing that it will be, elections will be fought in 2024. But guts will then be more important than ever before, and far more important than oratorical skills. There appears to be sufficient evidence that Rahul Gandhi is not deficient in this indispensable requirement.
A seasoned scholar of political and historical personalities, Guha should acknowledge this quality in his analysis of Rahul Gandhi. For the sake of fairness, Guha should also, I think, admit that suit-boot-ki-sarkar was a pretty effective slogan that Rahul employed. And while chowkidar chor hai did not prove a winning slogan, and was also disapproved by many of his supporters, Rahul has played a necessary role in puncturing (for a good number of Indians) the manufactured image of a larger-than-human Modi.
Taking a politician down may be an unavoidable and even a required task in a democracy, but I would like to suggest that in today's India, all of us who think of ourselves as critical commentators may need to re-examine our role.
With democracy, dissent, secularism and pluralism under sustained attack from forces with immense resources, lovers of these values will help their purpose by building up every individual who puts up a genuine fight to defend the values. Rahul Gandhi is certainly not the only one in the Congress or in the opposition as a whole who is putting up a real fight.
But he definitely seems to be fighting. I love him for that. And he has been fighting month after month, and year after year. I admire him for that.
Anyone working for liberty, equality and fraternity in India is my ally today. She or he or they may be in the Congress, in the Communist Party, the NCP, the TMC, the DMK, whatever. In the Shiv Sena, the Muslim League. Or in the BJP or the JDU. It doesn't matter. They may be rich or poor, Dalit or Brahmin or Rajput or OBC or whatever. Doesn't matter. Hindu, Sikh, Muslim, Christian, atheist, whatever. Doesn't matter.
Anonymous, unknown, or a dynast. Doesn't matter. I will root for any and every person working for more liberty, equality and fraternity in India. And I will quietly pray for mutual goodwill among all these persons.
When the time comes, popular pressure will compel political unity, and the right person will be chosen to lead an electoral alliance against domination and coercion.
The Test matches are some distance away, but important contests are taking place every day. It's a tough pitch to play in today, the light is poor, there's wind and rain, and we don't know how impartial the umpires are. But Rahul Gandhi is playing with pluck. Bravo!
(Rajmohan Gandhi is presently teaching at the University of Illinois at Urbana-Champaign.)
- Dhruv Gupt
तमाम काल्पनिक देवी-देवताओं और अंधविश्वासों के बीच भी हमारे पुराणों में ऐसी कुछ चीजें हैं जो अपनी दृष्टिसम्पन्नता और सरोकारों से चकित करती हैं। शिव और पार्वती के पुत्र गणेश प्रकृति की शक्तियों के ऐसे ही एक विराट रूपक है। गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका गुरू। मोर और सांप परिवार के सदस्य ! पर्वत उनका आवास है। वन उनका क्रीड़ा-स्थल। आकाश उनकी छत। गंगा के स्पर्श से पार्वती द्वारा गढ़ी गई उनकी आकृति में जान आई थी, इसीलिए उन्हें गांगेय कहा गया। गणेश के चार हाथों में से एक हाथ में जल का प्रतीक शंख, दूसरे में सौंदर्य का प्रतीक कमल, तीसरे में संगीत का प्रतीक वीणा और चौथे में शक्ति का प्रतीक परशु या त्रिशूल हैं। उनकी दो पत्नियां - रिद्धि और सिद्धि वस्तुतः देह में हवा के आने और जाने अर्थात प्राण और अपान की प्रतीक हैं जिनके बगैर कोई जीवन संभव नहीं।
गणेश और प्रकृति के एकात्म का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनकी पूजा महंगी पूजन-सामग्रियों से नहीं, प्रकृति में मौजूद इक्कीस पेड़-पौधों की पत्तियों से करने का प्रावधान है। हरी दूब गणेश को प्रिय है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली उन्हें अर्पित नहीं की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की मूर्ति घर के मुख्यद्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। हमारे पूर्वजों द्वारा गणेश के इस अद्भुत रूप की कल्पना संभवतः यह बताने के लिए की गई है कि प्रकृति की शक्तियों से सामंजस्य बिठाकर मनुष्य शक्ति, बुद्धि, कला, संगीत, सौंदर्य, भौतिक सुख और आध्यात्मिक ज्ञान सहित कोई भी उपलब्धि हासिल कर सकता है। यही कारण है कि संपति, समृद्धि, सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी और ज्ञान, कला, संगीत की देवी सरस्वती की पूजा गणेश के बिना पूरी नहीं मानी जाती है।
होता यह है कि प्रतीकों को समझने की जगह हम प्रतीकों को ही आराध्य बना लेते हैं और वे तमाम चीज़ें विस्मृत हो जाती हैं जिनकी याद दिलाने के लिए वे प्रतीक गढ़े गए थे। गणेश के वास्तविक स्वरुप को भुलाने का असर प्रकृति के साथ हमारे रिश्तों पर पड़ा है। आज प्रकृति अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से रूबरू हैं और इस संकट में हम उसके साथ नहीं, उसके खिलाफ खड़े हैं। गणेश के अद्भुत स्वरुप को पाना है तो उसके लिए मंदिरों और मूर्तियों, मंत्रों और भजन-कीर्तन का कोई अर्थ नहीं। गणेश हम सबके भीतर हैं। प्रकृति, पर्यावरण और जीवन को सम्मान और संरक्षण देकर हम अपने भीतर के गणेश को जगा सकते हैं !
मित्रों को गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं !
अनंत प्रकाश
केंद्र सरकार ने बीते बुधवार सरकारी क्षेत्र की तमाम नौकरियों में प्रवेश के लिए एक राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी गठित करने का फैसला किया है।
सरकार का दावा है कि ये एजेंसी केंद्र सरकार की नौकरियों में प्रवेश प्रक्रिया में परिवर्तनकारी सुधार लेकर आएगी और पारदर्शिता को भी बढ़ावा देगी।
इस एजेंसी के तहत एक कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी समान योग्यता परीक्षा आयोजित की जाएगी जो कि रेलवे, बैंकिंग और केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए ली जाने वाली प्राथमिक परीक्षा की जगह लेगी।
वर्तमान में युवाओं को अलग अलग पदों के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में भाग लेने के लिए भारी आर्थिक दबाव और अन्य तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट करके कैबिनेट के इस फ़ैसले की प्रशंसा की है।
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा है, राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी करोड़ों युवाओं के लिए एक वरदान साबित होगी। सामान्य योग्यता परीक्षा (कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट) के जरिये इससे अनेक परीक्षाएं ख़त्म हो जाएंगी और कीमती समय के साथ-साथ संसाधनों की भी बचत होगी। इससे पारदर्शिता को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट क्या है?
भारत में हर साल दो से तीन करोड़ युवा केंद्र सरकार और बैंकिग क्षेत्र की नौकरियों को हासिल करने के लिए अलग अलग तरह की परीक्षाओं में हिस्सा लेते हैं।
उदाहरण के लिए बैंकिंग क्षेत्र में नौकरियों के लिए ही युवाओं को साल में कई बार आवेदन पत्र भरना पड़ता है। और प्रत्येक बार युवाओं को तीन-चार सौ रुपये से लेकर आठ-नौ सौ रुपये तक की फीस भरनी पड़ती है।
लेकिन नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी अब ऐसी ही तमाम परिक्षाओं के लिए एक कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट का आयोजन करेगी।
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इस टेस्ट की मदद से एसएससी, आरआरबी और आईबीपीएस के लिए पहले स्तर पर उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग और परीक्षा ली जाएगी।
प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के मुताबिक, कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट एक ऑनलाइन परीक्षा होगी जिसके तहत ग्रेजुएट, 12वीं पास, और दसवीं पास युवा इम्तिहान दे सकेंगे।
ख़ास बात ये है कि ये परीक्षा शुरू होने के बाद परीक्षार्थियों को अलग अलग परीक्षाओं और उनके अलग-अलग ढंगों के लिए तैयारी नहीं करनी पड़ेगी।
क्योंकि एसएससी, बैंकिंग और रेलवे की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले सवालों में एकरूपता नहीं होती है। ऐसे में युवाओं को हर परीक्षा के लिए अलग तैयारी करनी पड़ती है।
कैसे होगी ये परीक्षा?
इन परीक्षाओं को देने के युवाओं को कम उम्र में ही घर से दूर बनाए गए परीक्षा केंद्रों तक बस और रेल यात्रा करके जाना पड़ता था।
सरकार की ओर से ये दावा किया जा रहा है कि राष्ट्रीय भर्ती परीक्षा युवाओं की इन मुश्किलों को हल कर देगी क्योंकि इस परीक्षा के लिए हर जिले में दो सेंटर बनाए जाएंगे।
इसके अलावा इस परीक्षा में हासिल स्कोर तीन सालों तक वैद्य होगा। और इस परीक्षा में अपर एज लिमिट नहीं होगी।
इस परीक्षा से क्या बदलेगा?
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ये एक ऐसा सुधारवादी कदम है जिसकी काफी समय से प्रतीक्षा की जा रही थी।
करियर काउंसलर अनिल सेठी मानते हैं कि सरकार के इस कदम अच्छा है और इसका असर भी दीर्घकालिक होगा लेकिन ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि ये सुधार की दिशा में पहला कदम है।
वे कहते हैं, अगर आपको अलग अलग बहुत सारे दरवाजों पर जाना है, बहुत सारी जगह फॉर्म भरने हैं और अलग अलग जगह स्क्रूटनी होनी है तो ये एक लंबी प्रक्रिया है। इसमें लोगों को बहुत दिक्कतें होती हैं। ये मेरी व्यक्तिगत राय है कि ये बहुत साल पहले हो जाना चाहिए था।
एसएससी, बैंक और रेलवे ये तीन रास्ते हैं जहां से सरकारी नौकरियों में प्रवेश होता है। ऐसे में व्यक्ति जब ये इम्तिहान देगा तो इसका स्कोर तीन साल तक वैध रहेगा। इसके बाद युवा एसएससी, बैंक और रेलवे में से किसी भी परीक्षा में बैठ सकेगा। मेरे ख्याल से ये एक बेहतर कदम है।
अब सवाल उठता है कि ये कदम परीक्षार्थियों पर कैसा असर डालेगा।
बीबीसी से बात करते हुए ऐसे ही एक परीक्षार्थी पूर्वेश शर्मा बताते हैं कि ये कदम उन जैसे तमाम स्टूडेंट्स के लिए कुछ दुश्वारियों को कम कर देगा।
नेशनल रिकू्रटमेंट एजेंसी लेगी सरकारी नौकरियों की परीक्षा
वे कहते हैं, अब तक जो जानकारी मिल रही है, उसके मुताबिक ये अच्छा होगा। क्योंकि अब तक आप एक पेपर दिया करते थे। लेकिन अगर आपकी तबियत खराब होने या किसी अन्य वजह से आप वह पेपर नहीं दे पाते थे तो आपका पूरा साल खराब हो जाता था। अब सरकार ने जो बताया है, उसके मुताबिक ये पेपर साल में दो बार होगा।
एक बड़ी बात ये भी है कि पहले आपको हर पेपर के लिए अलग अलग फॉर्म भरने होते थे। एसएससी में क्लर्क और सीजीएल दोनों का पेपर देना होता था तो दोनों के लिए फॉर्म अलग से भरने पड़ते थे। ऐसे में गऱीब छात्रों के लिए बड़ी दिक्कत हो जाती है क्योंकि आईबीपीएस का एक फॉर्म ही जनरल कैटेगरी के लिए आठ सौ रुपये का होता है। और अब बच्चों को ऐसे कई फॉर्म भरने होते हैं, ऐसे में बच्चों पर काफ़ी बोझ पड़ जाता है। अब कम से कम प्री की परीक्षा एक ही हो जाएगी जिसके बाद आप अपनी इच्छा से जिस भी सेक्टर में जाना चाहें, उसके मेंस परीक्षा की तैयारी करवा सकते हैं।
तैयारी कर रहे बच्चों की प्रतिक्रिया साझा करते हुए पूर्वेश बताते हैं, मैं खुद तैयारी कर रहा हूँ और कुछ बच्चों को पढ़ा भी रहा हूँ। जब से ये ख़बर आई है तब से कुछ बच्चों के फोन आ रहे हैं कि अब क्या होगा। मैं मानता हूँ कि ये एक अच्छा कदम है लेकिन अब तक हमें सारी जानकारी नहीं है कि ये इम्तिहान 2021 से होगा तो इसमें साल 2020 की परीक्षा ही होगी या 2021 की होगी क्योंकि अगर 2021 वाली परीक्षा सीईटी के तहत आयोजित की जाएगी तो 2023 तक ये परीक्षा नहीं हो पाएगी। ऐसे में लब्बोलुआब ये है कि सीईटी को लेकर ज़्यादा जानकारी सामने आनी चाहिए। (bbc.com/hind)
हेमंत कुमार झा
अखबारों में छपी खबरों के अनुसार रेलवे ने स्पष्ट किया है कि निजी रेलगाडिय़ों की अपनी मर्जी होगी कि वे किस स्टेशन पर रुकें, कहां न रुकें। वैसे ही, जैसे भाड़ा के निर्धारण में उनकी अपनी मर्जी ही चलेगी। जाहिर है, अब वे दिन लदने वाले हैं जब अपने शहर के स्टेशन पर किसी ट्रेन के ठहराव के लिए पब्लिक आंदोलित होती थी, नेताओं पर दबाव बनाती थी और नेताजी लोग रेलवे बोर्ड या मंत्रालय में जाकर गुहार लगाते थे।
यह रेलवे पर जनता के अधिकारों के सिकुडऩे का अगला अध्याय होगा। जनता की जरूरतें एक तरफ, निजी ट्रेन के मालिकों के व्यावसायिक हित दूसरी तरफ। दोनों में कोई सामंजस्य नहीं। अब जब, निजी ट्रेन और स्टेशनों के मालिकान अपनी मर्जी के मालिक होंगे, जो कि स्वाभाविक भी है, तो भाड़ा के निर्धारण या ठहराव आदि में ही नहीं, नियुक्तियों में भी उनकी मर्जी ही चलेगी।आप आरक्षण के झुनझुने को बजाते रहिये, नियुक्तियों में विकलांग या कमजोर वर्गों के अन्य कोटे के गीत गाते रहिये, मालिक लोग अपनी मर्जी चलाएंगे।
‘रेलवे आपकी अपनी संपत्ति है, इसकी रक्षा आपकी जिम्मेदारी है।’...बचपन से ही इस तरह के बोर्ड हम रेलवे स्टेशनों पर देखते रहे हैं। यह रेलवे के साथ जनता के रागात्मक संबंधों के लंबे अध्याय का एक खास पन्ना हुआ करता था। समय आ रहा है कि अब धीरे-धीरे ये बोर्ड उखड़ते जाएंगे और उनकी जगह स्टेशनों पर हमें जल्दी ही ऐसे बोर्ड नजर आने वाले हैं, ‘...यह रेलवे स्टेशन छंगामल भुजियावाले की निजी संपत्ति है, कृपया उपयोग में सतर्कता बरतें...’
यह रेलवे का सरकारी ढांचा था जो जनता की जरूरतों के अनुसार और जनता की मांगों के अनुसार उन क्षेत्रों में भी पसरता गया जो व्यावसायिक हितों के बहुत अनुकूल नहीं थे। अब व्यावसायिक हित प्रधान होंगे और जनता की जरूरतें गौण होंगीं। मुनाफा की संस्कृति जनता के व्यापक हितों के साथ तालमेल बिठा ही नहीं सकती। यह संभव ही नहीं है।
इसलिये, विचारकों का बड़ा वर्ग शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्रों को व्यायसायिक हितों के लिए बंधक बनाने का विरोधी बना रहा। किन्तु, हमारी पतनशील राजनीतिक संस्कृति कुछ खास वर्गों के व्यावसायिक हितों की बंधक बनती गई, जिसका एक नतीजा रेलवे के निजीकरण के रूप में सामने आ रहा है। स्कूल और अस्पताल तो कब के निजी क्षेत्र के चारागाह बन चुके हैं। बहुत सारे लोग अभी यह सोचने-समझने को तैयार नहीं कि रेलवे का क्रमश: निजीकरण हमारी संस्कृति और सामूहिक चेतना को किस हद तक नकारात्मक अर्थों में प्रभावित करने वाला है।
रेलवे की ही क्या बात करें, लोग तो कुछ भी सोचने-समझने के लिए तैयार नहीं और एक-एक कर हमारी तमाम राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला जारी है। विविधता में एकता और राष्ट्र के सामूहिक मानस का प्रतीक भारतीय रेलवे आने वाले समय में निजी हाथों का एक उपकरण होगा, जो जनता के हित की जगह मुनाफा की संस्कृति से संचालित होगा। पता नहीं यह राष्ट्रवाद का कौन सा अध्याय है जिसके तमाम हर्फों में अंध निजीकरण अपना अर्थ ग्रहण करता जा रहा है।
यहीं आकर स्पष्ट होता है कि राष्ट्रवाद का यह विशिष्ट स्वरूप दरअसल लोगों की मति को भरमा कर कारपोरेट राज का घोषणा पत्र जारी कर रहा है और बेहद चतुराई से इसके एक-एक लफ्ज़़ को हकीकत में बदल रहा है।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि उनके प्रदेश में अब नौकरियां मध्यप्रदेश के लोगों को ही दी जाएंगी। मध्यप्रदेश की नौकरियां अन्य प्रदेशों के लोगों को नहीं हथियाने दी जाएंगी। शिवराज चौहान की यह घोषणा स्वाभाविक है। इसके तीन कारण हैं। पहला, कोरोना की महामारी के कारण बेरोजगारी इतनी फैल गई है कि इस घोषणा से स्थानीय लोगों को थोड़ी सांत्वना मिलेगी।
दूसरा, कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने घोषणा की थी कि मप्र सरकार की 70 प्रतिशत नौकरियां मध्यप्रदेशियों के लिए आरक्षित की जाएंगी। ऐसे में चौहान पीछे क्यों रहेंगे? तुम डाल-डाल तो हम पात-पात। तीसरा, 24 विधानसभा सीटों पर कुछ ही माह में उपचुनाव होने वाले हैं। उनमें कई पूर्व कांग्रेसी विधायकों को भाजपा अपना उम्मीदवार बनाकर लड़ाएगी। यह बड़ी विकट स्थिति है। ऐसे में भाजपा की तरफ से आम मतदाताओं के लिए तरह-तरह की चूसनियां लटकाना जरूरी हैं। इसके अलावा ऐसी घोषणा करने वाले शिवराज चौहान अकेले नहीं हैं। कई मुख्यमंत्रियों ने पहले भी कमोबेश इसी तरह के पैंतरे मारे हैं और उन्हें उनके सुपरिणाम भी मिले हैं।
शिवसेना ने महाराष्ट्र में ‘मराठी मानुस’ का नारा दिया था। 2008 में महाराष्ट्र सरकार ने नियम बनाया था कि जिस उद्योग को सरकारी सहायता चाहिए, उसके 80 प्रतिशत कर्मचारी महाराष्ट्र के ही होने चाहिए। गुजरात सरकार ने भी कुछ इसी तरह के निर्देश जारी किए थे। आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक में भी यही प्रवृत्ति देखी गई है। ऐसी स्थिति में शिवराज चौहान और कमलनाथ की घोषणाएं स्वाभाविक लगती हैं लेकिन जो स्वाभाविक लगता हो, वह सही हो, यह जरूरी नहीं है। इसके भी कई कारण हैं। पहला, यदि हम पूरे भारतवर्ष को अपना मानते हैं तो हर प्रदेश में किसी भी भारतीय को रोजगार पाने का अधिकार है। जब हम दूसरे राष्ट्रों में रोजगार पा सकते हैं तो अपने ही देश के दूसरे राज्यों में क्यों नहीं पा सकते?
दूसरा, उक्त प्रावधान हमारे संविधान की धारा 19 (1) का उल्लंघन करता है, जिसमें कहा गया है कि धर्म, वर्ण, जाति, भाषा, जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव करना अनुचित है। तीसरा, जिस भाजपा ने धारा 370 और 35 ए खत्म करके कश्मीरी प्रतिबंधों को समाप्त किया है, उन्हें भाजपा की एक प्रादेशिक सरकार क्या अपने प्रदेश में फिर लागू करेगी? चौथा, नौकरियां तो मूलत: योग्यता के आधार पर ही दी जानी चाहिए, चाहे वह किसी भी प्रदेश का आदमी हो। यदि नहीं तो सरकारें निकम्मों की धर्मशालाएं बन सकती हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
- ललिता मौर्य
2017 से 2030 के बीच भारत में 68 लाख बच्चियां का जन्म नहीं होगा, क्योंकि बेटे की लालसा में उन्हें जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाएगा। यह जानकारी 19 अगस्त को जर्नल प्लोस में छपे एक नए शोध में सामने आई है। शोधकर्ताओं ने इसके लिए देश भर में हो रही कन्या भ्रूण हत्या को जिम्मेवार माना है। यह शोध फेंग्किंग चाओ और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया है जोकि किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, सऊदी अरब से जुड़े हैं।
भारत में कन्या भ्रूण हत्या का इतिहास कोई नया नहीं है। लम्बे समय से लड़कों को दी जा रही वरीयता का असर लिंगानुपात पर भी पड़ रहा है। समाज में फैली इस कुरुति ने संस्कृति का रूप ले लिया है। लड़का वंश चलाएगा यह मानसिकता आज भी भारत में फैली हुई है। सिर्फ अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे परिवारों में ही नहीं बल्कि शिक्षित लोगों में आज भी यह मानसिकता ख़त्म नहीं हुई है। 1970 के बाद से तकनीकी ज्ञान ने इस काम को और आसान कर दिया है। इसमें भ्रूण की पहचान बताने वाले अल्ट्रासाउंड सेंटर और नर्सिंग होम की एक बड़ी भूमिका है।
हर साल औसतन 469,000 कन्या भ्रूण नहीं ले पाएंगी जन्म
इस शोध में शोधकर्ताओं ने देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया है और उनमें जन्म के समय लिंगानुपात का विश्लेषण किया है। 2011 के आंकड़ों के अनुसार यह देश की 98.4 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिसमें से 9 में स्पष्ट तौर पर बेटे की वरीयता साफ झलकती है। इसमें से उत्तरपश्चिम के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है।
यदि पूरे भारत को देखें तो 2017 से 2030 के दौरान 68 लाख कन्या भ्रूण जन्म नहीं ले पाएंगी। यदि 2017 से 2025 के बीच का वार्षिक औसत देखें तो यह आंकड़ा 469,000 के करीब है। जबकि 2026 से 2030 के बीच यह बढ़कर प्रति वर्ष 519,000 पर पहुंच जाएगी। शोधकर्ताओं के अनुसार कन्या जन्म में सबसे अधिक कमी उत्तर प्रदेश में होगी, जिसमें अनुमान है कि 2017 से 2030 के बीच 20 लाख बच्चियां जन्म नहीं ले पाएंगी।
केवल कानून से नहीं मानसिकता बदलने से आएगा बदलाव
हालांकि देश में इसको रोकने के लिए पीसी पीएनडीटी एक्ट अर्थात प्रसव पूर्व निदान तकनीक (विनियमन एवं दुरूपयोग निवारण अधिनियम-1994) बनाया गया था जिसे 1996 में लागु किया गया था। वर्ष 2003 में इसे संशोधित किया गया था, इसके तहत लिंग निर्धारण करते हुए पहली बार पकड़े जाने पर तीन वर्ष की सजा एवं 50 हजार का जुर्माना लगाने का प्रावधान था। जबकि दूसरी बार पकड़े जाने पर पांच वर्ष की जेल एवं एक लाख रुपये का अर्थ दंड निर्धारित किया गया है। इसके बावजूद देश में अभी भी इस कानून का उल्लंघन जारी है।
यह स्थिति तब तक नहीं सुधरेगी जब तक लोगों की मानसिकता नहीं बदलती। केवल कानून बना देने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। भारतीय समय में मानसिकता के बदलाव की जो प्रक्रिया है वो बहुत धीमी है। आज भी लोग बेटियों की जगह बेटों को तरजीह देते हैं। जिसके पीछे की मानसिकता यह है कि बेटों से वंश चलता है, जबकि बेटियां पराया धन होती हैं। जो शादी के बाद पराये घर चली जाती हैं।
देश में आज भी लड़की का मतलब परिवार के लिए अतिरिक्त खर्च होता है। इसमें समाज की भी बहुत बड़ी भूमिका है, बच्चियों के खिलाफ बढ़ते अपराधों की वजह से भी लोग बेटी के बदले बेटा चाहते हैं। तकनीक की मदद से गर्भ में ही बच्चे के लिंग का पता चल जाता है और बेटी होने पर गर्भपात करा दिया जाता है। ऐसे में कानून के साथ-साथ मानसिकता में भी बदलाव लाने की जरुरत है, जिससे वास्तविकता में बेटियों को बराबरी का हक़ दिया जा सके।(downtoearth)
-रमेश शर्मा
कई ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारते हुये, न्याय की स्थापना के लिये लाये गये वनाधिकार क़ानून (2006) की लोकप्रियता इस बात से समझी जा सकती है कि एशिया और अफ्रीका के कुछ देश अपने मूलवासियों के लिये भी ऐसी ही पहल करना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का विश्व खाद्य और कृषि संगठन पहले ही इसे मूलवासियों/ आदिवासियों के अधिकारों के लिये दुनिया के बेहतरीन कानून का दर्जा दे चुका है। दुनिया के अनेक देशों में लोगों के जंगल-जमीन पर अधिकारों की मान्यता और स्थापना के लिये भारत का यह वनाधिकार क़ानून, आज सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण सन्दर्भ है।
भारत में वन कानूनों के जन्मने का इतिहास और लागू होने का भूगोल यहां के अनेक उन सशक्त जमीनी आंदोलनों के प्रतिक्रियास्वरूप आकार लेते गये, जो विगत दो सदी में हुये। स्वाधीनता के पूर्व के संघर्ष, यदि उन गुलाम बनाने वाले कानूनों के प्रति खिलाफत थे, तो आजादी के बाद के आंदोलन उन औपनिवेशिक कानूनों की समाप्ति का सत्याग्रह बना। वनाधिकार कानून के लिये संघर्ष और सफलता का अध्याय इसी बिंदु से शुरू होता है। वनाधिकार कानून लागू करते हुए भारत सरकार की यह स्वीकारोक्ति की यह कानून 'ऐतिहासिक अन्याय' को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा, बेहद महत्वपूर्ण वैधानिक प्रयास था। लेकिन जारी ऐतिहासिक अन्याय समाप्त हुआ या नहीं आज इसके ज़मीनी पड़ताल की आवश्यकता है।
यह जगजाहिर है कि अंतराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का, भारत सहित तीसरी दुनिया के जंगलों के प्रति हरित-प्रेम के अपने सुलझे-उलझे आर्थिक तर्क रहे हैं । दुर्भाग्य से सरकार का एक पूरा तंत्र और अमला उन हरे-भरे अंतर्राष्ट्रीय निवेशों का लाभार्थी था/है, जिसके लिये आदिवासी को जंगल में अतिक्रमणकर्ता और अवांछित साबित कर दिया गया। भारत में वन संपदा के दोहन और संरक्षण के नाम पर लाये गये तमाम वानिकी परियोजनाओं के विस्तार और उनके विध्वंसक परिणामों के प्रभाव-दुष्प्रभाव से यह देखा और समझा जा सकता है। जाहिर है, अंतर्राष्ट्रीय निवेशों के लिये बनाये गये इस वन-तंत्र में जंगल के सनातन रक्षक अर्थात आदिवासी समाज के मौलिक अधिकारों को खारिज़ किये बिना, वन संपदा की खुली लूट संभव थी ही नहीं।
बाद के बरसों में वैश्वीकरण और निजीकरण के नये आर्थिक तर्कों के साथ नवें दशक के मध्य से तथाकथित विकास के नाम पर जल जंगल और जमीन जैसे संसाधनों के संगठित लूट के ऐतिहासिक अन्याय का जो अध्याय शुरू हुआ वो आज तक तमाम अंतर्विरोधों और बाहरी प्रतिरोधों के बावज़ूद भी जारी है। नयी सदी के भारत गढ़ने के लिये जनहित के नाम पर शुरू की गयी विकास - योजनाओं की तमाम सदाशयताओं के साथ ही जल जंगल और जमीन के अधिग्रहणों का जो दौर आया, उसमें आदिवासी समाज, लगभग नेपथ्य में धकेल दिया गया। भारत में उत्खनन, औद्योगीकरण और वृहत परियोजनाओं का अवांछित परिणाम हुआ कि करोड़ों आदिवासी और वनाश्रित लोगों को हमेशा के लिये उजाड़-उखाड़ दिया गया। इसीलिये वनाधिकार कानून जैसे कवच की जरूरत थी जो जारी ऐतिहासिक अन्यायों और आदिवासी / वनाश्रित समाज के मध्य सुरक्षात्मक दीवार बन सके।
ऐतिहासिक अन्याय के प्रमाणों और परिणामों के तर्कों के साथ लाये गये अब तक के सबसे क्रांतिकारी वनाधिकार कानून (2006) का प्रथम लक्ष्य, आदिवासी और वनाश्रित समाज के उन लिखित-अलिखित अधिकारों की पुनर्स्थापना और मान्यता थी, जिसके बिना देश के प्रथम समुदाय के न्याय, अस्मिता और सम्मान का मार्ग प्रशस्त होना संभव ही नहीं था। वास्तव में ऐतिहासिक अन्याय के दृष्टिकोण से उन सभी कानूनों, नियमों, नीतियों और व्यवस्था को समाप्त किया जाना अपरिहार्य था जो अब तक अन्याय को पोषित करते रहे थे। लेकिन आदिवासी और वनाश्रित समाज के प्रति पूर्वाग्रहों से ग्रसित वन कानूनों और उससे जुड़े वन-तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन के अभाव में वनाधिकार कानून का क्रियान्वयन वास्तव में आज विरोधाभासों से भर गया है।
आदिवासी और वनाश्रित समाज को निर्णायक भूमिका में लाने की प्रतिबद्धता के साथ वनाधिकार क़ानून का जो प्रारूप लागू हुआ वह निःसंदेह 'अस्मिता और अधिकारों' के सवालों का सबसे सार्थक उत्तर था/है। लेकिन वनाधिकार कानून के लागू होने के बाद लगभग एक दशक से अधिक के प्रयास और परिणाम यह साबित कर रहे हैं कि समूचे तंत्र के माध्यम से पोषित जारी ऐतिहासिक अन्यायों को महज़ एक नये क़ानून भर से समूल समाप्त नहीं किया जा सकता है। वास्तविक चुनौती तो उस पूरे तंत्र से है जहां आदिवासी अस्मिता और अधिकारों को अब भी नैतिक, राजनैतिक और वैधानिक रूप से पूरी तरह आत्मसात नहीं किया गया है। यथार्थ है कि वन विभाग और मौजूदा वन कानूनों के दायरे में यदि आदिवासी समुदाय महज़ एक लाभार्थी और आवेदनकर्ता भर है तो पंचायत विभाग भी अब तक पांचवी अनुसूची के प्रावधानों को धरातल पर नहीं उतार सका है। प्रशासनिक तंत्र के लिये आदिवासी समाज जहाँ केवल एक अनुसूचित वर्ग है तो राजनैतिक बिरादरी के लिये आदिवासी अधिकारों के सवाल, महज़ उलझाये रखे जा सकने वाले चंद मुद्दे हैं। आज वनाधिकार क़ानून का आधा-अधूरा क्रियान्वयन इन विरोधाभासों का ही प्रतिबिम्ब है।
जाहिर है आदिवासी समाज को अतिक्रमणकर्ता मानने वाले असंवैधानिक प्रावधानों को समूल समाप्त किये बिना आदिवासी समाज के अस्मिता और अधिकार की स्थापना न तब संभव था और न आज है। इसीलिये जंगल को राजस्व का साधन और संसाधन मानने वाले समूचे वन-तंत्र और आदिवासी समाज के आदिवासियत के मौलिक मूल्यों बीच यह सनातन द्वन्द आज भी जारी है। वनाधिकार कानून की सीमित सफलतायें और संदिग्ध क्रियान्वयन, अब तक जारी द्वंदों का ही सार्वजनिक प्रमाण और परिणाम है।
वनाधिकार क़ानून (2006) के लागू होने के बाद विगत 12 बरसों के लेखा-जोखा से इसे समझने की कोशिश की जा सकती है। जनगणना (2011) के अनुसार भारत में कुल आदिवासी परिवारों की संख्या लगभग 2.2 करोड़ है। आदिवासी मामलों के मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा जारी रिपोर्ट (2020) के अनुसार अब तक लगभग 20 लाख परिवारों को वनाधिकार प्रदान किया गया है। अर्थात विगत 12 बरसों में अब तक 10 फ़ीसदी से भी कम आदिवासी परिवारों को वनाधिकार दिया गया है। आदिवासी मामलों के मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा 2 जुलाई 2020 को जारी एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार अब तक लगभग 12 लाख प्रकरणों का निरस्तीकरण हुआ है। इन सरकारी रिपोर्टों का सारांश यह है कि लगभग 80 फ़ीसदी आदिवासी परिवार अब भी अपने अस्मिता और अधिकार के लिये आवेदकों के कतार में बेबस प्रतीक्षारत खड़े हैं।
एक समसामयिक सवाल यह हो सकता है कि क्या वन विभाग के बिना, जंगल और आदिवासी समाज दोनों संपन्न रह सकते हैं? यदि बहुमत इसके पक्ष में है, तो आज फिर ऐतिहासिक न्याय की स्थापना लिये जंगल-जमीन के पूरे नये लोकतंत्र की जरूरत होगी। किन्तु लोकतांत्रिक राज्य का इसके पक्ष में न होने का संभावित परिणाम उन सभी संघर्षों की नये सिरे से शुरुआत होगी जिसे वनाधिकार कानून (2006) के बाद आदिवासी तथा वनाश्रित समाज के न्याय और विकास के लिये संधि मान लिया गया था। आदिवासी और वनाश्रित समाज समाज आज किसी स्पष्ट उत्तर की प्रतीक्षा में है। (downtoearth)
-पुलकित भारद्वाज
राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट पिछले हफ्ते जयपुर लौट आए. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से अदावत के चलते वे एक महीने से ज़्यादा समय से भाजपा शासित हरियाणा में रुके हुए थे. जयपुर आने से एक दिन पहले पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी. सचिन पायलट गुट का दावा है कि इस मुलाकात में उनकी मांगों और शिकायतों को तफ़सील से सुना गया. इस मुलाकात में कथित तौर पर सचिन पायलट ने भी भरोसा दिलाया कि गहलोत सरकार को कार्यकाल पूरा करने में उनकी तरफ़ से कोई व्यवधान नहीं पहुंचेगा. इसके बाद 14 अगस्त को बुलाए गए विधानसभा सत्र में अशोक गहलोत सरकार ध्वनिमत से बहुमत साबित करने में सफल रही. वहीं रविवार देर रात पार्टी हाईकमान ने पायलट की मांगों और शिकायतों के निदान के लिए वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, के सी वेणुगोपाल राव और अजय माकन की सदस्यता वाली कमेटी का गठन कर दिया.
इस सब को देखते हुए जानकारों के एक वर्ग का मानना है कि राजस्थान में अब तक जो सियासी घमासान मचा हुआ था उसका निपटारा हो चुका है. लेकिन कई विश्लेषक ऐसे भी हैं जिनके मुताबिक यह खींचतान फिलहाल भले ही थमती नज़र आ रही है. लेकिन यह स्थिति कब तक बनी रहेगी, इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है.
पहले सचिन पायलट की ही बात करें तो वे राजस्थान आ तो गए हैं, लेकिन अब उनके पास न तो उपमुख्यमंत्री का पद है और न ही पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का. फिर जयपुर आने के बाद उन्होंने मीडिया में जितने भी बयान दिए हैं उनमें एक ही लाइन को बार-बार दोहराया है कि ‘पद हो या ना हो, प्रदेश की जनता के प्रति अपने दायित्व को निभाता रहूंगा’. उनकी इस बात का यह मतलब निकाला जा रहा है कि शायद राजस्थान में उन्हें पार्टी या सरकार में हाल-फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिलने वाली है. वे अपने समर्थकों को जताना चाहते हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ स्वाभिमान के लिए ही थी और उन्हें कभी किसी पद का कोई लालच नहीं था. संभावना यह भी जताई जा रही है कांग्रेस हाईकमान पायलट को संगठन में प्रदेश के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी सौंप सकता है. हालांकि यह किसी से नहीं छिपा है कि उनका मन केंद्र के बजाय राजस्थान की राजनीति में ही ज़्यादा रमता है.
विश्लेषकों के मुताबिक यदि सचिन पायलट तमाम हालातों के मद्देनज़र दिल्ली में कोई जिम्मेदारी संभाल लेते हैं तो उनके लिए 2023 के अगले विधानसभा चुनाव तक राजस्थान की सरकार और पार्टी संगठन में कोई प्रत्यक्ष और प्रभावशाली भूमिका निभा पाने की गुंजाइश कम ही नज़र आती है. इस हिसाब से राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट का करियर कम से कम तीन वर्ष के लिए पीछे खिसकता दिख रहा है. और यदि 2023 में राजस्थान के मतदाताओं ने चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलने की अपनी परंपरा को बरक़रार रखा तो मुख्यमंत्री बनने के लिए पायलट को कम से कम आठ साल का इंतज़ार करना पड़ेगा. तब तक उनकी उम्र 50 का आंकड़ा पार कर चुकी होगी. और उस वक्त भी उनका वक्त तब आएगा जब सारी राजनीतिक परिस्थितियां उनके पक्ष में होंगी.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस दौरान पार्टी हाईकमान सूबे में किसी तीसरे चेहरे को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने पर भी विचार कर सकता है. कई पायलट समर्थकों का भी यह कहना है कि सचिन पायलट की पूरी लड़ाई ख़ुद मुख्यमंत्री बनने की नहीं बल्कि गहलोत को पद से हटाने की थी. इनकी बात के समर्थन में कहा जा सकता है कि तीसरे मुख्यमंत्री का विकल्प पायलट ने 2018 में भी पार्टी शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा था. हालांकि इसे समझना कोई मुश्किल बात नहीं कि पायलट के लिए यह मजबूरी का विकल्प ही रहा होगा. और इस विकल्प को सामने रखकर वे किसी न किसी तरह खुद की दावेदारी ही मजबूत करना चाह रहे होंगे
वर्तमान घटनाक्रम से पहले तक इस बात का ठीक-ठीक अंदाजा शायद कम ही लोगों को था कि राजस्थान में कांग्रेस के सभी विधायकों में से कितने पायलट के पक्ष में हैं और कितने गहलोत के. लेकिन हालिया घटनाक्रम के दौरान पायलट के साथ पार्टी के 100 में से सिर्फ 18 और तेरह निर्दलीय में से महज तीन विधायकों ने ही हरियाणा में डेरा जमाया था. ग़ौरलतब है कि मुख्यमंत्री गहलोत के ख़िलाफ़ खोले गए मोर्चे में पायलट अपने कई करीबी विधायकों और मंत्रियों तक का समर्थन हासिल नहीं कर पाए. इनमें राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास प्रमुख थे जो इस पूरे विवाद के दौरान अपने बयानों के ज़रिए पायलट पर बड़े हमले बोलने की वजह से चर्चाओं में रहे थे. जबकि स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा बहुत पहले ही पायलट से दूरी बना चुके हैं.
जानकारों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की सचिन पायलट की मांग पर सिर्फ़ तभी विचार कर सकता था जब वे पांच सप्ताह हरियाणा में जमे रहने के बजाय शुरुआती दिनों में ही उससे जाकर मिल लेते. सूत्रों के मुताबिक उन दिनों ख़ुद प्रियंका गांधी ने कई बार पायलट से संपर्क साधने की कोशिश की थी. पर नाकाम रहीं. लेकिन जब पायलट को इस बात का अहसास हुआ कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उन्हें और उनके समर्थक विधायकों को अयोग्य घोषित करवाने के बाद बहुमत भी साबित कर देंगे तब जाकर उन्हें गांधी परिवार की याद आई. पायलट के इस डर को भाजपा की कद्दावर नेता व प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अस्पष्ट राजनीतिक रुझानों ने भी हवा देने का काम किया. दरअसल सचिन पायलट आरोप लगाते रहे हैं कि विपक्षी दलों से होने के बावजूद सिंधिया और गहलोत पर्दे के पीछे एक-दूसरे की मदद करते रहते हैं.
ऐसे में जानकारों का मानना है कि पायलट अब एक खुली मुट्ठी की तरह हो गये हैं जिनके लिए कांग्रेस हाईकमान ने अपने दरवाजे भले ही खोल दिए हों लेकिन वह उनकी हर शर्त को मानेगा ही यह कह पाना मुश्किल है! हालांकि राजस्थान में पायलट समर्थकों को शीर्ष नेतृत्व द्वारा गठित की गई कमेटी से बड़ी उम्मीदें है. इन समर्थकों का मानना है कि यह कमेटी ऐसा कोई रास्ता ज़रूर निकालेगी जिसके सहारे उनके नेता सूबे में सम्मानजनक तरीके से सक्रिय रह सकें. लेकिन विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि कमेटी पायलट गुट को कुछ खास संतुष्ट कर पाने में नाकाम रही तो एक बार फिर कांग्रेस को राजस्थान में अस्थिरता का माहौल देखने को मिल सकता है. ग़ौरतलब है कि मीडिया को दिए अपने बयानों में पायलट ने जिस एक और बात को दोहराया है उसका लब्बोलुआब है कि ‘जो बीत गया उसकी चर्चा आवश्यक नहीं और जो भविष्य में होने वाला है उसके बारे में आज निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है.’
सचिन पायलट की नाराज़गी के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक बयान ख़ूब चर्चाओं में रहा था कि ‘पायलट बिना रगड़ाई के ही पार्टी प्रदेशाध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री बन गए, इसलिए वे अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं.’ इस पर प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार चुटीले लहजे में कहते हैं कि बीते एक महीने में पूर्व उपमुख्यमंत्री की शायद उचित रगड़ाई हो चुकी है. इस दौरान उन्होंने अपने विश्वस्तों की सलाह को आंख मूंदकर मानने के दुष्परिणाम भी झेले हैं और राजनीति के कई रंगों से भी उनका सामना पहली बार ही हुआ है.
ग़ौरतलब है कि जैसे ही पायलट के गांधी परिवार के साथ मुलाकात की ख़बरें सामने आईं, उनके खेमे के कुछ विधायक तुरंत ही जयपुर स्थित मुख्यमंत्री आवास पर हाज़िरी लगाने पहुंच गए. भंवरलाल शर्मा ऐसा करने वाले पायलट गुट के पहले विधायक थे. वे शर्मा ही थे जिन पर कांग्रेस ने एक ऑडियो टेप जारी कर राजस्थान में विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त करने और गहलोत सरकार को गिराने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया था. इस टेप में शर्मा कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से फ़ोन पर बात कर रहे थे. लेकिन गहलोत से मुलाकात के बाद भंवरलाल शर्मा ने मीडिया को स्पष्ट बयान दिया कि ‘अन्य बाग़ी विधायकों को भी जयपुर लौट आना चाहिए. राजस्थान में हमारे मुखिया अशोक गहलोत हैं.’
सचिन पायलट के साथ हरियाणा जाने वाले विधायकों में प्रदेश के कुछ पुराने व नए जाट विधायक विशेष तौर पर सुर्ख़ियों में रहे थे. इनमें भरतपुर के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखने वाले विश्वेंद्र सिंह और छात्र राजनीति से जुड़े रहे नागौर जिले के मुकेश भाकर और रामनिवास गावड़िया शामिल थे. बग़ावत के दौरान विश्वेंद्र सिंह ने कई बार भाकर और गावड़िया की हरसंभव तरीके से जमकर हौसला अफजाई और तारीफ़ें की थीं. कहा जा रहा है कि ऐसा उन्होंने जान-बूझकर किया ताकि वे दोनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राजस्थान के दिग्गज जाट नेताओं की नज़रों में खटक सकें. जानकार कहते हैं कि विश्वेंद्र सिंह अपने बेटे अनिरुद्ध सिंह को मुख्यधारा की राजनीति में उतारने की तैयारी में हैं. ऐसे में वे शायद ही चाहेंगे कि राज्य में सर्वाधिक आबादी वाले जाट समुदाय से अनिरुद्ध सिंह का हमउम्र कोई भी नेता ज़्यादा आगे बढ़े.
यदि इन कयासों में थोड़ी भी सच्चाई है तो सचिन पायलट को भविष्य में कोई बड़ी उड़ान भरने से पहले न सिर्फ़ विपक्ष और कांग्रेस में अपनेे विरोधी गुट बल्कि अपने ख़ुद के खेमे में भी पनप रही राजनीति को समझते हुए उससे पार पाने का हुनर भी सीखना होगा. ग़ौरतलब है कि जयपुर आने के बाद अन्य बाग़ी विधायकों की ही तरह सिंह ने भी अशोक गहलोत को अपना नेता मानने से गुरेज़ नहीं किया. जबकि कांग्रेस ने जो ऑडियो टेप जारी किया था उसमें उसने भंवरलाल शर्मा के साथ विश्वेंद्र सिंह की भी आवाज़ होने का दावा किया था. शर्मा और सिंह के जयपुर आने के बाद प्रदेश कांग्रेस ने उन्हें निलंबित करने के आदेश को रद्द कर दिया है और इन दोनों नेताओं के ख़िलाफ़ बैठाई गई सभी जांचें भी अब ठंडे बस्ते में जाती दिखाई दे रही हैं.
बहरहाल; पायलट के ही लहजे में कहा जाए तो ‘भविष्य में जो भी हो’ लेकिन हाल-फिलहाल इस पूरी उठापटक का उनकी लोकप्रियता पर विपरीत प्रभाव पड़ता नज़र आया है. दरअसल राजस्थान के जनमानस में पायलट ने जाने-अनजाने अपनी छवि एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित कर ली थी जिससे पीछे हटने की उम्मीद कम ही की जा सकती है. ऐसे में एक बड़ा राजनीतिक बवाल खड़ा करने के बाद क़दम पीछे खींच लेने की वजह से उनके समर्थकों में निराशा है. इसे सूत्रों के इस दावे से समझा जा सकता है कि बुधवार को पायलट पहले विमान से दिल्ली से जयपुर आने वाले थे. फिर उन्होंने इस यात्रा के लिए सड़क मार्ग को चुना. लेकिन यह बात चौंकाने वाली थी कि 250 किलोमीटर से ज़्यादा के उस सफ़र में कहीं भी उनका कोई बड़ा स्वागत नहीं हुआ. जबकि यह पूरा क्षेत्र गुर्जर बाहुल्य है और सचिन पायलट व उनके दिवंगत पिता राजेश पायलट की कर्मभूमि रह चुका दौसा जिला भी इसी रास्ते में पड़ता है. यही नहीं पूर्व उपमुख्यमंत्री के स्वागत के लिए उनके जयपुर स्थित निवास पर भी जो भीड़ जुटी वह भी अपेक्षा से बेहद कम थी.
इसके जवाब में सचिन पायलट के करीबी होने का दावा करने वाले लोग कहते हैं कि उनके नेता ख़ुद इस तरह का कोई आयोजन नहीं चाहते थे. वहीं कुछ जानकारों के मुताबिक यह भी हो सकता है कि हाईकमान की तरफ़ से ही पायलट को ऐसा कोई भी राजनीतिक स्टंट न करने का निर्देश मिला हो.
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर असर!
इस पूरी उठापटक में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जीते हुए भी नज़र आ रहे हैं और नहीं भी! वे अपने पद और सरकार को तो बचा पाने में सफल नज़र आ रहे हैं. लेकिन उनकी जो मुख्य कवायद पायलट की सदस्यता रद्द करवाकर उन्हें हमेशा के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने की थी उसमें वे नाकाम हुए हैं. कुछ जानकारों के अनुसार शायद गहलोत को इस बात का अंदाजा पहले से था कि देर-सवेर गांधी परिवार पायलट के साथ संवाद करने के लिए तैयार हो जाएगा. इसलिए ही उन्होंने इस मामले में अति की जल्दबाज़ी भी दिखाई. लेकिन पहले तो पायलट गुट ने अदालत जाकर और फिर राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने विधानसभा बुलाने की अनुमति न देकर गहलोत को अपनी रणनीति में कामयाब नहीं होने दिया.
कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वह बाग़ियों को मौके देने में विश्वास रखती आई है. इसे सचिन पायलट के पिता राजेश पायलट के उदाहरण से ही समझा जा सकता है. 1998 में जब सोनिया गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी पेश की तो बाग़ी नेता जितेंद्र प्रसाद ने उनके ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. उस चुनाव में राजेश पायलट ने जितेंद्र प्रसाद का साथ दिया था. लेकिन इसके बावजूद राजेश पायलट के ख़िलाफ़ पार्टी आलाकमान ने कोई बड़ा क़दम नहीं उठाया. अब उस हिसाब से देखें तो सचिन पायलट की बग़ावत कुछ भी नहीं है.
इस पूरे विवाद के दौरान गांधी परिवार की तरफ़ से कभी भी पायलट के ख़िलाफ़ खुलकर नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की गई. पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तो कोरोना महामारी के दौरान राजस्थान सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था. लेकिन तब भी उन्होंने सीधे पायलट को लेकर कुछ नहीं कहा. वहीं, सचिन पायलट भी इस पूरी अवधि में पार्टी या किसी भी नेता के ख़िलाफ़ बयान देने से बचते रहे, फ़िर चाहे वह अशोक गहलोत ही क्यों न हों. जानकारों के मुताबिक आख़िर में पायलट को इस ख़ामोशी का बड़ा फ़ायदा मिला है. भले ही यह राजनीतिक कमज़ोरी की वजह से अपनाई गई थी या रणनीति के तहत या फिर मर्यादा के चलते.
जानकारों की मानें तो इस पूरी रस्साकशी के बाद सचिन पायलट को राहुल गांधी के करीबी होने का लाभ तो मिला ही है, लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि पायलट को पार्टी से बाहर कर गांधी परिवार भी गुजरात से लेकर राजस्थान, उत्तरप्रदेश और दिल्ली तक के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव रखने वाले गुर्जर समुदाय को नाराज़ नहीं करना चाहता है. कुछ लोग यह कयास भी लगाते हैं कि इन विपरीत परिस्थितियों में पायलट के ससुराल पक्ष यानी कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार ने उनके और कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व के बीच एक मजबूत कड़ी का काम किया. वहीं कुछ का मानना है कि खास तौर पर प्रियंका गांधी को इस बात का अनुमान लग गया था कि सचिन पायलट की विदाई के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक बार तो बहुमत के मुहाने पर खड़ी अपनी सरकार को बचा लेंगे. लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के इस मामले में खुलकर सक्रिय होने के बाद गहलोत के लिए भी ऐसा लंबे समय तक कर पाना आसान काम नहीं होता. और शायद गहलोत भी इस बात को समझ रहे थे इसीलिए उन्होंने इस विवाद के आख़िरी दिनों में बाग़ी विधायकों को लेकर अपना रुख नर्म कर लिया था.
मुख्यमंत्री गहलोत के राजनीतिक करियर में इससे पहले ऐसा कोई मोड़ नज़र नहीं आता जब वे प्रदेश कांग्रेस में मन की कर पाने या अपने किसी बड़े विरोधी नेता को पूरी तरह पटकनी दे पाने में नाकाम रहे हैं. इस पूरे घटनाक्रम से पायलट का क़द ज़रूर प्रभावित हुआ है, लेकिन उनके तेवर और संतुलन में कोई कमी नहीं आई है. शुक्रवार को भी विधानसभा सत्र के दौरान जब उनके बैठने की व्यवस्था को हमेशा की तरह आगे की बजाय पीछे गैलेरी में कर दिया गया तो प्रतिक्रिया में उन्होंने बहुत प्रभावी ढंग से यह कहकर अपने आलोचकों का भी ध्यान खींच लिया कि - आपने (विधानसभा अध्यक्ष) मेरी सीट में बदलाव किया. पहले जब मैं आगे बैठता था, सुरक्षित और सरकार का हिस्सा था. फिर मैंने सोचा मेरी सीट यहां क्यों रखी है. मैंने देखा कि यह पक्ष और विपक्ष की सरहद (बगल में भाजपा विधायकों की लाइन शुरु होती) है. सरहद पर अपने सबसे मजबूत योद्धा को भेजा जाता है... इस सरहद पर कितनी भी गोलीबारी हो मैं कवच और ढाल, गदा और भाला बनकर इसे सुरक्षित रखुंगा.’
जबकि इसी सत्र के दौरान अशोक गहलोत ने उनकी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी के साथ पायलट पर भी अप्रत्यक्ष रूप से जमकर निशाना साधा था. विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान गहलोत जिस तरह से पेश आए वह उनकी छवि के बिल्कुल विपरीत था. एक-एक शब्द को कई-कई बार सोचकर बोलने के लिए पहचाने जाने वाले मुख्यमंत्री गहलोत ने बीते दिनों मीडिया को दिए बयान में पायलट को नकारा और निकम्मा तक कह दिया था. इसके लिए उन्हें बड़े स्तर पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. इसके अलावा उन्होंने यह साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी कि सचिन पायलट भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में आकर ही उनकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इस सब के बाद भी गांधी परिवार जिस तरह से सचिन पायलट को अपनाने के लिए तैयार दिखा है उससे निश्चित तौर पर गहलोत को झटका लगा होगा.
इसकी ताजा बानगी के तौर पर रविवार देर रात प्रदेश संगठन में हुए बदलाव को देखा जा सकता है. कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान में पार्टी प्रभारी अविनाश पांडे को हटाकर उनकी जगह पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन को ये जिम्मेदारी सौंपी है. ग़ौरतलब है कि पायलट-गहलोत विवाद के बीच अविनाश पांडे का झुकाव शुरुआत से ही गहलोत की तरफ़ देखा गया था. पायलट ने इसकी शिकायत शीर्ष नेतृत्व से कर दी और पांडे को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा. सूत्र बताते हैं कि पांडे को बचाने के लिए मुख्यमंत्री गहलोत ने अपनी तरफ़ से हर ज़रूरी प्रयास किया. लेकिन सफल नहीं हो पाए. वहीं, माकन राहुल गांधी के विश्वस्त नेताओं में शुमार रहे हैं. इसलिए माना जा रहा है कि पार्टी हाईकमान ने उन्हें दोहरी जिम्मेदारी (प्रभारी और कमेटी में सदस्यता) देकर सचिन पायलट को सहज रखने की कोशिश की है. आलाकमान के इस निर्णय ने पायलट के पक्ष में बड़ी हवा बनाने का काम किया है.
इस सब को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि राजस्थान में बहुप्रतिक्षित मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों का सिलसिला कुछ और समय के लिए ठंडे बस्ते में जा सकता है. क्योंकि मुख्यमंत्री गहलोत अपने साथ रुके सौ से ज़्यादा विधायकों के हितों को प्राथमिकता देने की घोषणा सार्वजनिक तौर पर कर चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ़ सचिन पायलट भी अपने करीबी विधायकों को लाभ पहुंचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकने में शायद ही कोई कसर छोड़ेंगे. सूत्र बताते हैं कि इन हालातों के मद्देनज़र मुख्यमंत्री गहलोत जल्द ही कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करने दिल्ली जा सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो देखने वाली बात होगी कि वे वहां सचिन पायलट को लेकर कितना मोल-भाव कर पाते हैं.
हाईकमान द्वारा गठित की गई कमेटी की भूमिका!
कांग्रेस हाईकमान द्वारा गठित की गई उच्चस्तरीय कमेटी में राज्यसभा सांसद अहमद पटेल का शामिल होना इस पूरे मामले के सबसे अहम पहलुओं में से एक साबित हो सकता है. यह तो तय है कि पायलट-गहलोत विवाद को लेकर यह कमेटी जो भी रिपोर्ट तैयार करेगी उस पर पटेल का बड़ा प्रभाव रहेगा. लिहाजा पटेल का झुकाव इन दोनों कद्दावर नेताओं में से जिस किसी की भी तरफ़ रहेगा कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व द्वारा उसी के पक्ष में जाने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में विश्लेषकों की मानें तो सचिन पायलट और मुख्यमंत्री गहलोत के बीच चयन की स्थिति में अहमद पटेल गहलोत को तवज्जो दे सकते हैं. इसके तीन बड़े कारण माने जा रहे हैं.
पहला तो यह कि बीते कुछ वर्षों से कांग्रेस पार्टी बड़े स्तर पर युवा बनाम वरिष्ठ नेताओं की अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है. पार्टी में जब तक राहुल गांधी का वर्चस्व रहता है युवा नेताओं का पलड़ा भारी हो जाता है जो वरिष्ठ नेताओं के अनुभवों को दरकिनार कर नए तौर-तरीकों से संगठन को दोबारा खड़ा करना चाहते हैं. लेकिन संगठन में अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी का दखल बढ़ते ही वे वरिष्ठ नेता मजबूत स्थिति में आ जाते हैं जो इंदिरा गांधी के जमाने से ही पार्टी के विश्वस्त रहे हैं. यह खेमा पार्टी के युवा नेताओं को कम योग्य भी समझता है लेकिन उनसे असुरक्षित भी महसूस करता है. लिहाजा ये दोनों ही गुट एक-दूसरे को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कमतर साबित करने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. ऐसे में इस बात की संभावना जताई जा सकती है कि राजस्थान कांग्रेस की भी युवा बनाम वरिष्ठ की इस लड़ाई में अहमद पटेल का रुख स्वाभाविक तौर पर वरिष्ठ के प्रति ही ज़्यादा नरम रहेगा.
दूसरे, 2017 में गुजरात की तीन सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल को जितवाने में अशोक गहलोत ने बड़ी भूमिका निभाई थी. वे तब कांग्रेस की तरफ़ से गुजरात के चुनाव प्रभारी थे. भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के सीधे दखल वाला यह चुनाव पटेल के लिए नाक का सवाल बन गया था जिसमें उनकी लाज बड़ी मुश्किल से बच पाई थी. ऐसे में माना जा रहा है कि अशोक गहलोत के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने का अहमद पटेल के पास यह एक अच्छा मौका हो सकता है. सूत्र बताते हैं कि 2018 में भी मुख्यमंत्री की रेस में पटेल ने पायलट की बजाय गहलोत को आगे बढ़ाने में अंदरखाने जमकर मदद की थी.
और तीसरे, अहमद पटेल हमेशा से केंद्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं जबकि मुख्यमंत्री गहलोत का ध्यान प्रदेश की राजनीति पर ज़्यादा रहा है. अब यदि किसी कारण से गहलोत को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ता है तो उनके क़द के हिसाब से हाईकमान को उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी देते हुए दिल्ली बुलाना पड़ेगा. और उनके दिल्ली पहुंचने से कांग्रेस के जिस नेता पर सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ सकता है वे अहमद पटेल ही हैं. क्योंकि पटेल की ही तरह गहलोत भी सोनिया गांधी के विश्वस्त हैं. गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में जिस तरह पार्टी ने उनके मार्गदर्शन में बेहतर प्रदर्शन किया उसके चलते वे पटेल से इक्कीस नज़र आने लगे हैं. ऐसे में सामान्य समझ से भी यह बात कही जा सकती है कि पटेल गहलोत को उनके ही नहीं बल्कि अपने फ़ायदे के लिए भी राजस्थान तक ही सीमित रखना चाहेंगे. और ऐसा तभी हो सकता है जब वे मुख्यमंत्री बने रहें. लेकिन यह शायद सचिन पायलट को बर्दाश्त नहीं होगा.
इस सब के मद्देनज़र राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार राकेश गोस्वामी हम से कहते हैं कि ‘पहले भी हाईकमान ने इन दोनों नेताओं (पायलट और गहलोत) के बीच राजीनामे के लिए एक कमेटी का गठन किया था. लेकिन बमुश्किल उसकी एक ही बैठक आयोजित हो पाई थी. लिहाजा ये संभावना कम ही लगती है कि ये नई कमेटी भी इन दोनों नेताओं के बीच विवाद का कोई उचित हल निकाल पाने में कामयाब रहेगी.’ बकौल गोस्वामी, ‘पायलट और गहलोत की अदावत कोई तात्कालिक तो है नहीं जिसे दो-पांच दिन में मिल-बैठकर दूर कर लिया जाए. ये नाराज़गी कई वर्षों की उपज है जिसे दूर करने में भी एक समय लगेगा. हाल-फिलहाल तो इन दोनों कद्दावर नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर हाथ मिला लिए हैं. लेकिन इनके दिल भी कभी मिल पाएंगे, ये कहना मुश्किल है!’
वहीं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजन महान का इस बारे में मानना है कि ‘आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों के मौके पर एक बार फिर राजस्थान कांग्रेस में बड़ी उठापटक देखने को मिल सकती है. क्योंकि दोनों ही खेमे सत्ता में ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी चाहते हैं. ऐसे में दोनों में से किसी एक पक्ष के विधायकों को तो मन मसोस कर रहना पड़ेगा.’ सत्याग्रह से हुई बातचीत में महान आगे जोड़ते हैं, ‘इस सब के चलते राजस्थान कांग्रेस में जो अस्थिरता पैदा हो सकती है उसे भुनाने में भारतीय जनता पार्टी इस बार कोई चूक नहीं करेगी. वो तो वैसे भी किसी भी राज्य में ‘ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम देने के लिए हरदम तैयार रहती है!’(satyagrah)
मनजीत कौर बल
विगत दो दिनों से छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एचआईवी संक्रमित बच्चियों के संरक्षण और ‘आश्रयगृह’ को लेकर ‘विवाद सुखिऱ्यों में आया। मुद्दा बहुत गंभीर लगा और अभी भी है। मुद्दा इसलिए गंभीर नहीं लगा कि वो किस आश्रय गृह में हैं और उन्हें किस आश्रय गृह में ले जाया जा रहा है? (क्योंकि हर सामाजिक कार्यकर्ता का संस्थाएं चाहती ही हैं कि सरकारी व्यवस्थाएं ऐसी स्थिति को संभालें) वरन इसलिए लगा कि उनके सरंक्षण और स्थानांतरण पर असुरक्षित होने का भय पैदा हुआ और गलत तरीके से ले जाए जाने के लिए प्रशासन ने शक्ति का उपयोग किया। इसके कारण बड़ा विवाद होने लगा।
कौन सही और कौन गलत जब तक स्पष्ट हो पाता तब तक दो ही दिनों में विवाद का मुद्दा बच्चियों से हटकर व्यक्ति विशेष की ओर सहानुभूति के साथ जाने लगा और पूरे सोशल मीडिया में मुद्दे का स्वरुप बदलकर पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही के साथ प्रशासन में बैठे लोगों की अनियमितता पर केंद्रित होते-होते सहानुभूति के साथ एक व्यक्ति विशेष पर होने लगी।
इस तरह जब भी कोई किसी सामाजिक मुद्दे को उठाता है, तो एक स्पष्टता हमेशा रहती है या होनी चाहिए कि किस भूमिका में उठाया जा रहा है और उस मुद्दे को हल करने कि रणनीति उस भूमिका के साथ कैसी है या होनी चाहिए? एक राजनीतिज्ञ विरोधी पार्टी के सदस्य के रूप में, एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, एक पत्रकार या एक प्रोफेशनल व्यक्ति के रूप में?
इस घटनाक्रम में मुद्दे को हल करने की शुरुआत हुई एक वकील के रूप में, फिर परिस्थिति की गंभीरता या आवश्यकता या भावनात्मक दबाव या राजनितिक जिम्मेदारी के रूप में भूमिका बदली लेकिन इस में रणनीति व्यवस्था सुधार के बजाए आश्रय गृह संचालित करने वाले दंपत्ति विशेष के साथ खड़े होना आश्चर्य करता रहा हो सकता है चिंता जायज हो कि जितने बेहतर तरीके से उन दंपत्ति ने बच्चियों को रखा था, उतना बेहतर सरकारी व्यवस्था में नहीं रखा जायेगा। लेकिन जब ऐसी चिंता हो तब भी सरकारी व्यवस्था में स्थानांतरित करने के मुद्दे के बजाय सरकारी व्यवस्था को मजबूत करने के मुद्दे पर लड़ाई होती तो इस लड़ाई में सभी आगे आते क्योंकि पूरे राज्य के आश्रय गृहों के संचालन पर मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है और करनी भी चाहिए क्योंकि एक राजनीतिज्ञ या सोशल एक्टिविस्ट की भूमिका में हर कोई सरकारी व्यवस्था को मजबूत करने की और ही लड़ाई लड़ता है।
लेकिन जब लड़ाई किसी स्थान या व्यक्ति विशेष की हो तब यह लड़ाई मुद्दे के लिए नहीं वरन अपने जिद को पूरा करने का दिखाई देता है। ऐसी लड़ाईयों का समाधान इसलिए भी कभी नहीं निकलता क्योंकि यह दो व्यक्तियों के पोजीशन की लड़ाई बनते जाती है, इसमें मुद्दा भटक जाता है।
ऐसी स्थिति को स्पष्ट करके इस लड़ाई को पुन: सही दिशा में ले जाया जाना चाहिए कि यह मुद्दा-
1. बच्चियों के सरकारी व्यवस्था में ले जाए जाने के बाद के असुरक्षा की आशंका को लेकर है?
2. बिलासपुर के महिला बाल विकास विभाग के किसी अधिकारी विशेष के कार्य प्रणाली और भ्रष्टाचार को लेकर है?
3. दंपत्ति के द्वारा संचालित किए जा रहे आश्रय गृह के संचालन की निरंतरता को लेकर है?
4. यह मुद्दा कार्यवाही के दौरान पुलिस और प्रशासन द्वारा किए गए बर्ताव पर है?
5. या उपरोक्त सभी पर है?
इसके स्पस्टता के बाद बहुत से साथी ठीक से मुद्दे के साथ खड़े हो पाएंगे क्योंकि शासन की कार्यवाही पर सवाल उठाते समय एक्टिविस्ट को बेहतर पाता होता है कि आगे कितने जोखिम आएंगे, मुझे नहीं लगता कि कार्यवाहियां मुद्दे बनेंगी वरन बच्चियों के आश्रय गृह को लेकर दोनों पक्षों की रूचि को ठीक से समझकर ही लड़ाई आगे सार्वजानिक रूप से लड़ी जानी चाहिए।
सवाल है कि
1. आखिर एक पक्ष सरकार की व्यवस्था पर विश्वास क्यों नहीं कर पा रहा है और सरकार इसे गंभीरता से क्यों नहीं ले रही है?
2. क्यों कोई अधिकारी दोनों पक्ष के बीच बेहतर समन्वय नहीं करवा पा रहा, जबकि दोनों ही पक्ष बच्चियों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार मानते है स्वयं को।
3. दूसरा पक्ष सरकारी आश्रय गृह में स्थानांतरित करने की जिद क्यों कर रहा? उसके बजाए सरकारी व्यवस्था में सही करवाने के लिए प्रयासरत हो सकता है?
4. अगर यह लड़ाई न्यायालय तक पहुंची थी तो आगे अपील क्यों नहीं की गई?
इस पूरे प्रकरण में किसी भी दुव्र्यवहार और गलत कार्यवाही (जिसकी स्पष्ट जानकारी मुझे नहीं हुई है, अगर ऐसा कुछ हुआ हो तो) का सभी भरपूर विरोध करते हैं लेकिन इस बात की चिंता अभी भी बनी हुई है कि दंपत्ति द्वारा संचालित आश्रय गृह की शुरुआत में बच्चियां वहां कैसे आईं? और अचानक उन्हें सरकारी आश्रय गृह में कैसे ले जाया जाने लगा?
कुछ लेखों से पढऩे से जानकारी हुई कि माननीय न्यायलय के आदेशानुसार किया जा रहा है? तो आदेश का विरोध क्यों? वर्तमान में बच्चियों कि स्थिति कैसी है? क्या आशंकाएं सही हो रही है? अगर हाँ ! तो आगे की रणनीति क्या है? अगर नहीं तो पूरी लड़ाई क्यों हुई? और क्या आगे पुलिस और प्रसाशन की कार्यवाही पर लड़ाई जारी किया जाना है?
ऐसे कुछ सवाल हैं? इसके साथ ही किसी भी तरह से बच्चियों की सुरक्षा या देखभाल में कमी पर नजर रखने के लिए हमेशा साथ खड़े हैं और उस व्यवस्था को मजबूत करने की लड़ाई में मैं भी साथ हूँ अगर यह लड़ाई अनियमितता और गलत नियुक्ति को लेकर है तो कागजों से ही लगातार लड़ी जानी चाहिए और अगर यह लड़ाई मात्र सहानुभूति पाने का प्रयास है तो लडऩे की विधि में बच्चियों को केंद्रित करने पर सोचने की आवश्यकता है? क्योंकि कोई भी लड़ाई मजबूती के साथ लड़ी जानी चाहिए, सहानुभूति के साथ नहीं।
बस अंतिम बार एक प्रयास सभी के लिए कि अभी भी समय है बच्चियों की स्थिति पर सभी नजर रखें और पूरे राज्य में ऐसे व्यवस्था को मजबूत करने आगे आएं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
नगालैंड की समस्या हल होते-होते फिर उलझ गई है। 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद नगा नेताओं से जो समझौता करवाया था, वह आजकल खटाई में पड़ गया है। नगा विद्रोहियों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल सोश्यलिस्ट कौसिंल ऑफ नगालिम’ के नेता टी. मुइवाह आजकल दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और धमकियां दे रहे हैं कि उन्हें भारत के विरुद्ध फिर हथियार उठाने पड़ेंगे। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि नगालैंड के वर्तमान राज्यपाल आर.एन. रवि और मुइवाह के बीच तलवारें खिंच गई हैं।
रवि मूलत: भारत सरकार के अफसर रहे हैं और वे बरसों से नगा-विद्रोहियों से शांति-वार्ता चला रहे हैं। वे सफल वार्ताकार के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन पिछले साल जुलाई में उन्हें नगालैंड का राज्यपाल बना दिया गया। जब से वे राज्यपाल बने हैं, उन्हें नगा-सरकार के अंदरुनी सच्चाइयों का पता चलने लगा है। उन्होंने नगा मुख्यमंत्री एन.रियो को भी साफ-साफ कहा और अपने स्वतंत्रता-दिवस भाषण में भी खुले-आम बोल दिया कि नगा-प्रदेश आपाद-मस्तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। केंद्र से आने वाला धन नगा-जनता के कल्याण के लिए खर्च होना चाहिए लेकिन वह उसके पास पहुंचने के पहले ही साफ हो जाता है।
उन्होंने नगा-संगठन का नाम लिए बिना यह दो-टूक शब्दों में कह दिया कि नगा-प्रदेश में ‘हथियारबंद गिरोह’ एक समानांतर सरकार चला रहे हैं। उधर राज्यपाल रवि के खिलाफ नगा-संगठन ने कटु अभियान छेड़ दिया है। जब 2015 में उस समझौते पर दस्तखत हुए तो उसे उजागर नहीं किया गया था लेकिन मुइवाह का कहना है कि समझौता तभी लागू होगा, जबकि उन तीन मांगों पर अमल होगा। नगालैंड का अपना संविधान होगा, अपना ध्वज होगा और आस-पास के प्रदेशों में फैले नगा इलाकों को जोडक़र वृहद नगालैंड उन्हें दिया जाएगा।
हो सकता है कि वार्ताकार के नाते रवि ने नगा नेताओं को कुछ गोलमाल भरोसा दे दिया हो लेकिन राज्यपाल के नाते पिछले साल भर में इन नेताओं से उनकी अनबन हो गई हो। यों भी वार्ताकार की अनौपचारिक और मैत्रीपूर्ण हैसियत तथा राज्यपाल के औपचारिक रुतबे में काफी फर्क होता है। व्यक्तिगत तालमेल के बिगडऩे से नगा-समझौता भी बट्टेखाते में चला जाए, यह ठीक नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो नगा नेताओं के साथ नए सिरे से वार्ता शुरु कर सकती है और रवि का किसी दूसरे राज्य में तबादला भी कर सकती है।
(नया इंडिया की अनुमति से)


