विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अभी तक घोषणा नहीं हुई है कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा ? लेकिन मान लें कि कुछ अजूबा हो गया और 2016 की तरह इस बार भी डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बन गए तो भारत को कोई खास चिंता करने की जरुरत नहीं है। ट्रंप और हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई के बीच ऐसी व्यक्तिगत जुगलबंदी बैठ गई है कि ट्रंप के उखाड़-पछाड़ स्वभाव के बावजूद भारत को कोई खास हानि होनेवाली नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संचालन नेताओं के व्यक्तिगत समीकरण पर होता है। उसका कुछ योगदान जरुर रहता है लेकिन राष्ट्रहित ही संबंधों पर मूलाधार होता है। आज अमेरिका और भारत के आपसी संबंधों को कोई खास तनाव नहीं हैं। व्यापार और वीज़ा के सवाल तात्कालिक हैं। वे बातचीत से हल हो सकते हें। लेकिन चीन, अफगानिस्तान, सामरिक सहकार, शस्त्र-खरीद आदि मामलों में दोनों देश लगभग एक ही पटरी पर चल रहे हैं।
लेकिन जोसेफ बाइडन के जीतने की संभावनाएं ज्यादा हैं। वे जीते तो भारत को ज्यादा खुशी होगी, क्योंकि एक तो कमला हैरिस उपराष्ट्रपति बन जाएंगी और लगभग 75-80 प्रतिशत प्रवासी भारतीयों ने उनको अपना समर्थन दिया है। भारत के 40 लाख लोग अमेरिका के सबसे अधिक समृद्ध, सुशिक्षित और सुसभ्य लोग हैं। क्या डेमोक्रेटिक सरकार उनका सम्मान नहीं करेगी ? मैं तो सोचता हूं कि पहली बार ऐसा होगा कि अमेरिकी सरकार में कुछ मंत्री और बड़े अफसर बनने का मौका भारतीय मूल के लेागों को मिलेगा। बाइडन-प्रशासन अपने ओबामा-प्रशासन की भारतीय नीति को तो लागू करेगा ही, वह पेरिस के जलवायु-समझौते और ईरान के परमाणु समझौते को भी पुनर्जीवित कर सकता है। इनका लाभ भारत को मिलेगा ही। इसके अलावा ध्यान देने लायक बात यह है कि ओबामा-प्रशासन में बाइडन उप-राष्ट्रपति की हैसियत में भारत के प्रति सदैव जागरुक रहे हैं। वे कई दशकों से अमेरिकी राजनीति में सक्रिय रहे हैं जबकि ट्रंप तो राजनीति के हिसाब से नौसिखिए राष्ट्रपति बने हैं। बाइडन के रवैए को हम भारत ही नहीं, यूरोपीय राष्ट्रों, चीन, रुस, ईरान और मेक्सिको जैसे राष्ट्रों के प्रति भी काफी संयत पाएंगे। इसका अंदाज हमें ट्रंप और बाइडन के चुनावी भाषणों की भाषा से ही लग जाता है। यह ठीक है कि बाइडन और कमला ने मानव अधिकारों, कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दों पर भारत का विरोध किया था लेकिन उसका मूल कारण यह रहा हो सकता है कि ट्रंप ने इन्हीं मुद्दों पर हमारा समर्थन किया था। सत्ता में आने पर डेमोक्रेट लोगों की राय पहले के मुकाबले अब काफी संतुलित हो जाएगी। दूसरे शब्दों में इनके जीतने से हमें ज्यादा फायदे की उम्मीद है लेकिन इनमें से कोई भी जीते हमें कोई हानि नहीं है। (नया इंडिया की अनुमति से)
मायावती कांशीराम की उत्तराधिकारी थीं और उनके प्रयोग पर सवार हो सत्ता के शिखर पर तो पंहुचीं, पर वह उसे आगे नहीं ले जा सकीं। मायावती में उस दृष्टि का साफ अभाव दिखा। कांशीराम के लिए सत्ता में भागीदारी भी आंदोलन था। मायावती के लिए आंदोलन पीछे रह गया।
आशुतोष
तो मायावती की राजनीति है क्या? यह सवाल अगर आज पूछा जा रहा है तो हैरान नहीं होना चाहिए! मायावती ने तीन दिन में दो बार पलटी मारी है। पहले उन्होंने कहा कि वह समाजवादी पार्टी को हराने के लिए भारतीय जनता पार्टी को भी सपोर्ट कर सकती हैं। उनका यह बयान आया तो लोग भौंचक्के रह गए। आखिर, मायावती ने ऐसा क्यों कहा? अमूमन इस तरह की बात नेता विधानसभा या लोकसभा चुनावों के दौरान चुनावी गठबंधन के समय करते हैं। यहां तो सिर्फ राज्यसभा की कुछ सीटों के लिए ही वोट पड़ने थे। वह कोई बयान नहीं भी देतीं तो भी चलता।
उम्मीद के अनुसार बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता हतप्रभ रह गए। मायावती को फौरन अपनी गलती का एहसास हुआ होगा, लिहाजा उन्होंने बयान दिया कि बीजेपी के साथ वह कभी भी गठबंधन नहीं करेंगी। लोग कह सकते हैं कि मायावती ने भूल सुधार कर लिया है। हकीकत में जब कोई नेता इस तरह की बयानबाजी करता या करती है तो उसे फायदा कम, नुकसान ज्यादा होता है। नेता की छवि बनती है कि वह कनफ्यूज्ड है, समझ साफ नहीं है और दूरदृष्टि का अभाव है।
ऐसा नहीं है कि मायावती पहले कभी बीजेपी के साथ नहीं गईं। वह तीन बार बीजेपी की मदद से सरकार चला चुकी हैं और एक समय वह भी था जब मुरली मनोहर जोशी को वह राखी बांधा करती थीं। यूपी में बीजेपी उनके लिए कभी अछूत नहीं थी। लेकिन 2014 के बाद से बीजेपी को लेकर उनके सुर बदले हुए थे। वह बीजेपी के साथ आरएसएस की भी तीखी आलोचना करती थीं। यहां तक कि 2019 में बीजेपी और नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए उन्होंने अपनी जानी दुश्मन समाजवादी पार्टी से भी गठजोड़ कर लिया था।
यह वही समाजवादी पार्टी थी जिसने 1994 में गेस्ट हाउस कांड किया था और मायावती के साथ समाजवादी पार्टी के गुंडों ने बदसलूकी की थी। तब मुलायम सिंह यादव नेता थे। समाजवादी पार्टी के प्रति तल्ख़ी बीएसपी और मायावती के मन में हमेशा बनी रही। अपमान की आग हमेशा धधकती रही। ऐसे में समाजवादी पार्टी के साथ आना बड़ी राजनीतिक घटना थी। वह उस वक्त वह बीजेपी और मोदी को देश के लिए सबसे खतरनाक मानती थीं। जब वही मायावती अचानक बीजेपी को समर्थन देने की बात करने लगें, और वह भी ऐसे समय में जबकि कोई बडा कारण सामने न हो तो सवाल खड़ा होता है कि मायावती का फ़ैसला राजनीतिक है या परदे के पीछे कुछ अलग तरह का खेल खेला जा रहा है?
मायावती एक आंदोलन से निकली हैं। कांशीराम इस आंदोलन के जनक हैं। यूपी के सामंती माहौल में दलित तबके के स्वाभिमान को जगाना, सदियों से दबी जातियों को जाति प्रथा की जकड़न से निकालना और दबंग जातियों के सामने खड़े होने की हिम्मत देना- किसी चमत्कार से कम नहीं है। आजादी के पहले बाबा साहेब आंबेडकर ने दलित चेतना को नई ऊर्जा दी थी। उसे देश की राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित करने का काम किया था। बाबा साहेब ने 1927 में महादआंदोलन छेड़ अगड़ी जातियों के वर्चस्व को तोड़ने की मुहिम छेड़ी थी और यह सवाल आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के सामने रख दिया था कि बिना दलितों को सम्मान दिए सामाजिक न्याय की बात न केवल अधूरी है बल्कि देश की आजादी का भी कोई मतलब नहीं।
बाबा साहेब का साफ मानना था कि आजादी सही मायनों मे तभी आजादी होगी जब स्वतंत्रता, समानता के साथ बंधुत्व का भी पालन हो। अन्यथा देश तो आजाद हो जाएगा, कानून के मुताबिक सब को समान अधिकार मिल जाएगा और वह अपनी बात को रखने के लिए स्वतंत्र भी होगा, पर सचाई में वह अगड़ी जातियों का ग़ुलाम ही रहेगा। अंग्रेज तो चले जाएंगे, पर दलित आजाद नहीं होगा, वह पहले की ही तरह आजादी में सांस नहीं ले पाएगा। इसलिए बाबा साहेब ने आरक्षण की बात की और यह कहा कि सत्ता में दलितों की भागीदारी हो। आंबेडकर ने जिस चेतना को जगाने का काम किया, इसने दलित चेतना को ऊर्जा तो दी, पर राजनीति की बिसात पर ये लोग कामयाब नहीं हो पाए। यहां तक कि आंबेडकर खुद अपना लोकसभा का चुनाव हार गए और उनकी पार्टी रिपब्लिक पार्टी हमेशा ही हाशिये पर रही। बाबा साहेब जहां कामयाब नहीं हुए, वहां कांशीराम ने कमाल कर दिखाया।
कांशीराम ने बाबा साहेब की दलित चेतना को चुनावी राजनीति से मिला दिया और कामयाबी से यूपी में दलितों को एक बेहद मज़बूत ताक़त के तौर पर स्थापित किया। यूपी में बीएसपी इतनी बड़ी ताकत बन गई कि यूपी की राजनीति बिना बीएसपी के सोची भी नहीं जा सकती थी। मायावती पांच बार मुख्यमंत्री बनीं एक बार समाजवादी पार्टी और तीन बार बीजेपी के साथ तो एक बार अपने बल पर सरकार बनाई। 2007 में मायावती ने सवर्णों को अपने साथ मिलाने का अनोखा प्रयोग किया। इस प्रयोग की वजह से मायावती पहली बार अपने बल पर बहुमत का आंकड़ा जुटा सकीं। यूपी जैसे सामंती समाज में दलितों की सत्ता को अगड़ी दबंग जातियों का समर्थन देना एक अजूबा था क्योंकि सदियों से अगड़ी जातियों की ग़ुलामी करने के लिए दलित अभिशप्त रहे थे। यह करिश्मा था कांशीराम का।
मायावती उनकी उत्तराधिकारी थीं। वह कांशीराम के प्रयोग पर सवार हो सत्ता के शिखर पर तो पंहुचीं, पर वह उसे आगे नहीं ले जा सकीं। मायावती में उस दृष्टि का साफ अभाव दिखा। कांशीराम के लिए बीएसपी, दलित चेतना और आंदोलन को आगे ले जाने का औजार थी। उनके लिए सत्ता में भागीदारी भी आंदोलन था। मायावती के लिए आंदोलन पीछे रह गया। सत्ता में हिस्सेदारी ही मायावती के लिए सब कुछ हो गया। और जब सत्ता, सरकार सर्वोपरि हो जाए तो आंदोलन की धार को तो कुंद होना ही थी।
यूपी में बीजेपी को 300 से अधिक सीटें मिलना और दलितों के एक बड़े तबके का बीजेपी को वोट देना इस बात का प्रमाण है कि दलितों को अब मायावती की राजनीति में ईमानदारी नहीं दिखती, उन्हें लगता है कि मायावती भी दूसरे नेताओं की तरह हो गई हैं। और दलित उनके लिए महज एक वोटर बन कर रह गया है। ऐसा लगता है कि दलितों को सामाजिक सम्मान दिलाना मायावती के एजेंडे से गायब हो गया है।
हाथरस में जब एक दलित लड़की से बलात्कार हुआ, उसकी मौत हुई और यूपी की सरकार उसे बलात्कार मानने से इंकार करती रही, परिवार को ही इलाके के दबंग, लड़की की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे, तब भी मायावती ने हाथरस जाकर लड़की के परिवार से मिलना गंवारा नहीं किया। राहुल गांधी, प्रियंका और दूसरे नेता गए, देश में इस खबर पर काफी हंगामा हुआ, पर मायावती अपने घर से बाहर नहीं निकलीं। जब वह दलित के साथ हो रहे अत्याचार में पीड़ित के साथ खड़ी नहीं होंगी तो दलित उनके साथ क्यों खड़ा होगा? यही कारण है कि भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर रावण एक नई ताकत के तौर पर यूपी में उभर रहे हैं। वह दलितों के हक की लड़ाई में उनके साथ खड़े दिखाई देते हैं। इस कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जो काम मायावती को करना चाहिए, वह चंद्रशेखर कर रहे हैं तो जाहिर है, दलितों में उनका आकर्षण बढ़ेगा और इस वजह से मायावती को तकलीफ होगी।
मायावती के लिए यह सबसे चुनौतीपूर्ण समय है। 2012 से हर चुनाव वह हारती आई हैं। 2014, 2017 और 2019 में उन्हें बुरी हार मिली है। उनका समाजिक आधार सिकुड़ता जा रहा है। बीजेपी की कामयाबी से यह साबित हो गया है कि मायावती दलितों में भी सिर्फ जाटव बिरादरी की ही नेता हैं। बीजेपी बाकी दलित तबके को अपने साथ लाने की कोशिश में लगी है। मायावती को इस बात का अंदाजा है। वह समझ रही हैं कि अब वह पहले की तरह महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं। पर उनके पास कोई नया फार्मूला नहीं है। कोई नई युक्ति नहीं है। इसलिए कभी वह अखिलेश से गठबंधन करती हैं और फिर तोड़ देती हैं, तो कभी बीजेपी के पास जाने की योजना बनाती हैं।
यह वह मायावती नहीं है जिन्हें मैं जानता हूं। यह वह मायावती हैं जो विवश हैं। पर यह विवशता उनकी अपनी बनाई हुई है, उनका अपना किया-धरा है। इससे उन्हें निकलना होगा। सड़क पर दलितों के लिए लाठी-डंडा खाना पड़ेगा। जेल जाना पड़ेगा और अगर वह ऐसा करती नहीं दिखेंगी तो हो सकता है, अगले चुनाव में वह अतीत हो जाएं। (navjivanindia.com)
-आदित्य नारायण शुक्ला 'विनय'
अमेरिका (U.S.A.) में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के लिए प्रत्येक राज्य में जनसंख्या के आधार पर "Electoral college votes" निर्धारित किये गए हैं. जिसमें बहुमत vote 270 होते हैं - 50 राज्यों के मिलाकर. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार व्यक्ति को किसी राज्य की जनता ने यदि अपना बहुमत देकर उसे जिता दिया तो उस राज्य का "इलेक्टोरल कालेज वोट " भी उसे मिल जाता है. पूरे अमेरिका के 50 राज्यों में कुल मिलाकर 538 इलेक्टोरल वोट हैं जिसमें से बहुमत प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार को 270 इलेक्टोरल वोट प्राप्त करने होते हैं. यही कारण है कि कई बार राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार व्यक्ति Popular votes अर्थात देश की जनसंख्या का बहुमत तो पा जाता है लेकिन फिर भी चुनाव हार जाता है क्योंकि उसका प्रतिद्वन्द्वी अन्य राज्यों के इलेक्टोरल वोट में उससे आगे निकल कर 270 इलेक्टोरल वोट प्राप्त कर लेता है और राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाता है. इसके दो उदाहरण हैं. 2000 में एल गोर, जौर्ज बुश से वास्तविक जनता के द्वारा दिए वोटों में आगे थे किंतु जौर्ज बुश इलेक्टोरल वोटों में उनसे आगे निकल गए और राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए थे. ठीक ऐसे ही 2016 में हिलैरी क्लिंटन पापुलर वोटों में याने जनता के द्वारा दिए गए वोटों में जीत गई थीं किंतु ट्रंप ने इलेक्टोरल वोट उनसे ज्यादा प्राप्त करके बहुमत प्राप्त कर लिया और वे राष्ट्रपति का चुनाव जीत गये थे. इस तरह से जनता अमेरिका में अपना राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से चुनती है.
अमेरिका के 50 राज्यों में जनसंख्या के आधार पर इलेक्टोरल वोटों की संख्या निम्नलिखित है -
(राज्यों के नाम alphabetical order में नहीं हैं )
Total Electoral Votes: 538; Majority Needed to Elect U.S.A. President 270
Alabama - 9 votes, Kentucky - 8 votes, North Dakota - 3 votes, Alaska - 3 votes, Louisiana - 8 votes, Ohio - 18 votes, Arizona - 11 votes, Maine - 4 votes, Oklahoma - 7 votes, Arkansas - 6 votes, Maryland - 10 votes, Oregon - 7 votes, California - 55 votes, Massachusetts - 11 votes, Pennsylvania - 20 votes, Colorado - 9 votes, Michigan - 16 votes, Rhode Island - 4 votes, Connecticut - 7 votes, Minnesota - 10 votes, South Carolina - 9 votes, Delaware - 3 votes, Mississippi - 6 votes, South Dakota - 3 votes, District of Columbia - 3 votes, Missouri - 10 votes, Tennessee - 11 votes, Florida - 29 votes, Montana - 3 votes, Texas - 38 votes, Georgia - 16 votes, Nebraska - 5 votes, Utah - 6 votes, Hawaii - 4 votes, Nevada - 6 votes, Vermont - 3 votes, Idaho - 4 votes, New Hampshire - 4 votes, Virginia - 13 votes, Illinois - 20 votes, New Jersey - 14 votes, Washington - 12 votes, Indiana - 11 votes, New Mexico - 5 votes, West Virginia - 5 votes, Iowa - 6 votes, New York - 29 votes, Wisconsin - 10 votes, Kansas - 6 votes, North Carolina - 15 votes, Wyoming - 3 votes
-----------------------
Total 538 Electroral College Votes.
270 needs to win the U.S.A. President election.
(लेखक सेवानिवृत 'कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी' अधिकारी)
असल में ट्रंप ने जब से व्हाईट हाऊस में कदम रखा है, अमरीकियों को एक अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। वे एक ऐसे राष्ट्रपति साबित हुए जो सफेद झूठ बोलता है, फेक न्यूज से फलता-फूलता है, मीडिया का खुलकर मजाक उड़ाता है, और जिसने न्यायपालिका को अगवा कर रखा है।
-ज़फ़र आग़ा
जैसा कि टाइम पत्रिका ने अपने ताजा अंक में लिखा है, अमेरिका का सच से सामना होने वाला है। दुनिया के सबसे पुरानी और सबसे मजबूत लोकतंत्र के लिए राष्ट्रपति का चुनाव आज पूरा हो जाएगा। लेकिन अभी तक जो संकेत मिल रहे हैं या अनुमान लगाए जा रहे हैं उससे तो यही लगता है कि मौजूदा राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की हार निश्चित है।
अभी तक हुए सभी चुनाव पूर्व सर्वे में डेमोक्रेट राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन की जीत के कयास लगाए गए हैं। लेकिन ट्रंप ने ऐलान कर दिया है कि जैसे ही चुनाव खत्म होगा वह वकीलों के पास पहुंच जाएंगे। पेन्सिल्वेनिया में यह ऐलान करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप खुद ही एक तरह से मान बैठे कि चुनाव में उनकी हार तय है। मतों से जीत की उम्मीद छोड़ चुके ट्रंप अब कानूनी विकल्पों पर माथापच्ची कर रहे हैं ताकि वे व्हाईट हाऊस में बने रह सकें। इसके लिए वे सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कई सारे कंजरवेटिव जजों की नियुक्ति कर चुके हैं, उस आस में कि अगर चुनाव को चुनौती दी गई तो फैसला उनके हक में आए।
यही वह लम्हा है जब अमेरिका का सच से सामना होगा। ट्रंप किसी हाल हार मानने को तैयार नहीं दिखते। यह वह बात जो आजतक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने करने के बारे में सोचा तक नहीं। अगर ऐसा होता है तो अमेरिकी लोकतंत्र एक गहरे संकट में होगा और पूरी अमेरिकी व्यवस्था ठप हो जाएगी। आशंका में जी रहे अमरीकियों ने पहले ही अपने राशन पानी के साथ ही हथियारों तक का इंतज़ाम कर लिया है। ऐसे में अमेरिका का चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका पूरी दुनिया सांस रोक कर इंतजार कर रही है।
इस बार के राष्ट्रपति चुनाव को जो बिडेन ने पहले दिन से ही अमेरिका की आत्मा का युद्ध घोषित कर दिया था। ऐसे में कोई अमेरिकी राष्ट्रपति खुद ही जनादेश को मानने से इनकार कर दे, तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था ही खोखली साबित हो जाएगी। अगर अमेरिका लोकतंत्र को ही मानने से इनकार कर देगा तो फिर उस फ्री वर्ल्ड यानी आजाद दुनिया का क्या होगा जो लोकतंत्र के इस प्रतीक को बड़ी उम्मीद और भरोसे से देखती है। फिलहाल किसी को नहीं पता है कि अगर ट्रंप ने जनादेश मानने से इनकार कर दिया और कानूनी रास्ता अपनाया तो क्या होगा।
ऐसे तमाम सवाल हैं जो अमेरिका को चुनाव के दिन परेशान कर रहे हैं जिनका कोई भी सीधा या सधा जवाब नहीं है। असल में ट्रंप ने जुलाई 2016 में जब से व्हाईट हाऊस में कदम रखा है, अमरीकियों को एक अनिश्चितता के माहौल में धकेल दिया है। वे एक ऐसे राष्ट्रपति साबित हुए जो सफेद झूठ बोलता है, फेक न्यूज से फलता-फूलता है, मीडिया का खुलकर मजाक उड़ाता है, न्यायपालिका को अगवा कर रखा है, कांग्रेस (संसद) पर अपने फैसले थोपता है, राजनीतिक विरोधियों के लिए अनाप-शनाप शब्दों का इस्तेमाल करता है, श्वेत रंगभेद को खुलकर बढ़ावा दा है और अश्वेतों की नस्लीय हत्या को जायज ठहराता है, जिसके नतीजे में ब्लैक लाइव्स मैटर जैसे आंदोलन खड़े होते हैं। वह एक ऐसे राष्ट्रपति साबित हुए जिसने बीते 4 साल में हर लोकतांत्रिक नियम की धज्जियां उड़ा दीं। कसम से बहुत बड़ी तादाद में अमेरिकी ट्रंप से बेहद नाराज हैं और चुनावी ट्रेंड की शुरुआत ही ट्रंप को व्हाईट हाउस से उठाकर बाहर फेंकना चाहते हैं।
टाइम पत्रिका ने अमेरिका की भावनाओं और माहौल को कुछ इस तरह सामने रखा है, “यह चुनाव ट्रंप पर केंद्रित है, कायदे कानून को ठेंगे पर रखने वाले उनके शासन पर केंद्रित है, और हमारे देश को नर्वस ब्रेकडाउन की दहलीज पर ले जाने शख्स पर केंद्रित है।” और अगर फिर से बिडेन के शब्दों को दोहराएं तो यह अमेरिका की आत्मा का युद्ध है। लेकिन दुर्भाग्य से संकेत ऐसे मिल रहे हैं कि ट्रंप अमेरिका की आत्मा को भी घायल करने पर आमादा हैं।
स्थिति यह है कि ट्रंप अमेरिका को एक अभूतपूर्व संकट में डालने वाले हैं जिससे हिंसा का माहौल बन सकता है। लोगों ने पहले ही हथियारों का जखीरा जमा कर लिया है, दुकानों ने अपनी सुरक्षा में घेराबंदी कर ली है ताकि उन्मादी भीड़ से इन्हें बचाया जा सके। ऐसे में अगर अमेरिका एक लंबे संकट में घिरता है तो फिर उसका विश्व के लिए क्या अर्थ होगा? इसे समझा जा सकता है।
लेकिन अगर एकमात्र सुपरपॉवर अपने ही संकट में घिरकर एक शून्य पैदा करेगी तो फिर चीन और रूस जैसे जरूर उस जगह पर कब्जा करने की कोशिश करेंगे। स्थापित विश्व व्यवस्था में भूचाल आ जाएगा जो एक अनजाने-अनदेखे संकट को बुलावा देगा। ऐसे में सांस रोक कर इंतजार कीजिए और दुआ कीजिए कि ट्रंप शांति से निपट जाएं। (navjivanindia.com)
विधानसभा चुनाव में पार्टियों ने स्वर्णिम बिहार के निर्माण का सब्जबाग तो दिखाया ही, कोरोना वैक्सीन और रोजगार पर भी दांव लगाया. यह तो दस नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा कि इन मुद्दों का क्या असर रहा.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-
दो दिन बाद बिहार में विधान सभा चुनाव का तीसरा चरण होगा. सभी पार्टियों ने पिछले आम चुनावों की तरह ही कोरोना काल में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भी अपनी योजनाओं के जरिए बेहतर बिहार के निर्माण का रोडमैप मतदाताओं के समक्ष पेश किया. किसी ने इसे ‘बदलाव पत्र' तो किसी ने ‘प्रण हमारा, संकल्प बदलाव का' तो किसी ने ‘आत्मनिर्भर बिहार के सूत्र व संकल्प' की संज्ञा दी. चूंकि पार्टियों ने वोटरों को रिझाने के लिए अपने-अपने मुद्दे गढ़े थे इसलिए जाहिर है उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग रहीं. विपक्षी दलों ने जनता की दुखती रग पर हाथ रखने की कोशिश की तो सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने पांच साल के जनोपयोगी कार्यों को प्रचारित-प्रसारित करने की रणनीति बनाई.
कोरोना वैक्सीन पर रार
केंद्र और राज्य में एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस) की सरकार और फिर कोविड -19 का संकट तो भला इनके घोषणा पत्र से कोरोना गायब कैसे रहता. भाजपा ने एलान कर दिया कि बिहार में सरकार बनने के बाद सभी प्रदेशवासियों को कोरोना की वैक्सीन मुफ्त दी जाएगी. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जारी "1 लक्ष्य, 5 सूत्र व 11 संकल्प" का पहला संकल्प यही था. इस घोषणा की धमक दूर तक सुनाई दी. कुछ घंटे बाद मध्यप्रदेश व तामिलनाडु के मुख्यमंत्रियों ने भी मुफ्त वैक्सीन देने का वादा कर दिया. विपक्षी पार्टियां इसे लेकर हमलावर हो गईं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तो ट्वीट करके कहा, "भारत सरकार ने कोविड वैक्सीन वितरण की घोषणा कर दी है. यह जानने के लिए वैक्सीन और झूठे वादे आपको कहां मिलेंगे, कृपया अपने राज्य की चुनाव तिथि देखें." समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा, "ऐसी ही घोषणा उत्तरप्रदेश और अन्य भाजपा शासित प्रदेशों के लिए क्यों नहीं की जाती." आखिरकार बात चुनाव आयोग तक पहुंची. आयोग ने कहा, मुफ्त वैक्सीन के वादे को आचार संहिता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता.

मुफ्त टीके की घोषणा
‘भाजपा है तो भरोसा है' के सूत्र वाक्य के साथ आत्मनिर्भर बिहार का रोडमैप पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने कहा कि हमने जो कहा उसे पूरा किया. एनडीए सरकार जनता के लिए काम कर रही है और लोगों का भरोसा ही हमारे संकल्प का आधार है. पार्टी ने शिक्षित बिहार-आत्मनिर्भर बिहार, गांव-शहर सबका विकास, स्वस्थ समाज, उद्योग आधार-सबल समाज और सशक्त कृषि, समृद्ध किसान का सूत्र दिया. इसके साथ ही भाजपा ने राज्य में 19 लाख लोगों को रोजगार देने की भी बात कही जिसके तहत चार लाख लोगों को सरकारी नौकरी और 15 लाख लोगों को विभिन्न माध्यमों से रोजी-रोटी के अवसर मुहैया कराए जाएंगे.
नीतीश कुमार के वादे
बिहार में भाजपा के बड़े भाई जदयू ने ‘पूरे होते वादे, अब हैं नए इरादे' के टैगलाइन से अपना निश्चय पत्र जारी किया. इसमें युवा शक्ति-बिहार की प्रगति, सशक्त महिला-सक्षम महिला, हर खेत को पानी, सुलभ संपर्कता, स्वच्छ गांव-समृद्ध गांव, सबके लिए अतिरिक्त सुविधा और स्वच्छ शहर, विकसित शहर की बात कही गई है. जानकार इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सात निश्चय-पार्ट 2 बताते हैं. राजनीतिक विश्लेषक सीके चटर्जी कहते हैं, "दरअसल यह नीतीश कुमार के उसी विजन का एक्सटेंशन है जिसे उन्होंने सात निश्चय के साथ 2015 में शुरू किया था. इनके लिए महिलाएं गेम चेंजर रहीं हैं, इसलिए महिला उद्यमिता व युवाओं को रोजगार पर इनका विशेष जोर है."
जदयू ने सक्षम और स्वावलंबी बिहार बनाने के लिए युवाओं को तीन लाख और महिलाओं को पांच लाख रुपये तक का अनुदान देने की बात कही है. पिछली बार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड व स्वयं सहायता भत्ता की बात कही गई थी. इस बार मेगा स्किल डेवलपमेंट सेंटर को विकसित करने की योजना है ताकि उन्हें इस तरह का प्रशिक्षण उपलब्ध करा दिया जाए जिससे रोजगार मिलने में उन्हें कोई दिक्कत न हो. इसके अलावा पार्टी गांवों में हर घर नल का जल, हरेक घर में बिजली, पक्की गली-नाली व हर गली में सोलर लाइट व कचरा प्रबंधन तथा बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करा गांवों को भी शहरी रंग में रंगना चाह रही है.
राजद ने बेरोजगारी को बनाया मुद्दा
राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव की एक विशेष रणनीति रही है कि जनभावना से जुड़े किसी एक मुद्दे को वे सुनियोजित ढंग से इतनी हवा देते हैं कि चुनाव के चरम पर आते ही वह मुद्दा बन जाता है. 2015 के विधानसभा चुनाव का स्मरण करें तो साफ हो जाएगा उस समय महागठबंधन की ओर आरक्षण एक ऐसा मुद्दा बन गया था जिसने भाजपा की नाक में दम कर दिया. ठीक उसी तर्ज पर अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए इस बार तेजस्वी यादव भी अपनी पार्टी की ओर से बेरोजगारी को मुद्दा बनाने में कामयाब रहे. महागठबंधन के अन्य घटक दलों की मौजदूगी में ‘प्रण हमारा, संकल्प बदलाव का' नाम से उन्होंने 25 सूत्री घोषणा पत्र जारी किया. इसमें तेजस्वी ने कहा कि महागठबंधन की सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में पहली कलम से दस लाख लोगों को सरकारी नौकरी दी जाएगी.

राहुल की महागठबंधन को समर्थन की अपील
इसके साथ ही इस घोषणा पत्र में किसानों का ऋण माफ करने, किसान विरोधी तीन कानूनों को समाप्त करने, कांट्रैक्ट पर नौकरी की व्यवस्था खत्म करने, नियोजित शिक्षकों को समान काम, समान वेतन व बिहार के छात्रों को सरकारी नौकरियों के परीक्षा फॉर्म में आवेदन शुल्क नहीं देने तथा परीक्षा केंद्र तक की मुफ्त यात्रा की बात कही गई है. पार्टी ने रोजगार एवं स्वरोजगार, कृषि, उद्योग,शिक्षा, उच्च शिक्षा व रोजगार, महिला सशक्तिकरण और परिवार कल्याण, स्मार्ट गांव, पंचायती राज, गरीबी उन्मूलन, आधारभूत संरचनात्मक विकास व स्वयं सहायता समूह समेत अन्य कई बिंदुओं के तहत विस्तार से बिहार को उन्नति के रास्ते पर ले जाने का रोडमैप बताया है. राजद के इस घोषणा पत्र पर भाजपा ने व्यंग्य कसते हुए कहा कि यह बदलाव का नहीं ‘प्रण हमारा फिर लूटेंगे' का संकल्प है. जदयू ने कहा, नौकरी का वादा भी एक घोटाला ही है.
कांग्रेस का चुनावी बदलाव पत्र
राजद की सहयोगी कांग्रेस ने अपने "बदलाव पत्र 2020" में कई लोकलुभावन वादे किए हैं. नीतीश सरकार की पूर्ण शराबबंदी पर प्रहार करते हुए पार्टी ने बिहार में मद्य निषेध कानून की समीक्षा करने की बात कही है. इसके अलावा अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने बेरोजगारों को नौकरी मिलने तक हरेक माह 1500 रुपये बेरोजगारी भत्ता देने, साढ़े चार लाख रिक्त पद भरने व रोजगार आयोग का गठन करने, छत्तीसगढ़ की तरह किसानों का कर्ज माफ करने, केजी से पीजी तक बच्चियों को मुफ्त शिक्षा व होनहार बेटियों को मुफ्त में स्कूटी देने का वादा किया है.
इसके अलावा सहयोगी वामपंथी दलों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने "बदलो सरकार, बदलो बिहार" के तहत अपने इरादे जाहिर किए जिनमें भूमिहीन परिवार को दस डिसमिल जमीन देने, समान शिक्षा प्रणाली, भूदान व हदबंदी में चिन्हित 21 लाख एकड़ जमीन के वितरण तथा समान काम, समान वेतन की बात कहते हुए "नई सदी, नई पीढ़ी, नई सोच और नया बिहार" का नारा दिया है. जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बेरोजगारों को प्रतिमाह पांच हजार रुपये देने व किसानों की कर्ज माफी की बात कही है.
सात निश्चय में भ्रष्टाचार बना मुद्दा
बिहार विधानसभा के इस चुनाव में केंद्र में एनडीए सरकार की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने भी "बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट'' के तहत अपना विजन डाक्यूमेंट-2020 जारी किया. ये वही विजन डाक्यूमेंट है, जिसके मुद्दों को लेकर लोजपा प्रमुख व स्वर्गीय रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान चुनाव में एकला चलो का निर्णय लेने के पहले भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भिड़ते रहे हैं. कोरोना से निपटने की राज्य सरकार की व्यवस्था हो या फिर लॉकडाउन में प्रवासियों के लौटने का मुद्दा रहा हो, चिराग अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर नीतीश सरकार की आलोचना कर चुके हैं.
अपने घोषणा पत्र में तो उन्होंने सीधे-सीधे नीतीश कुमार के सात निश्चय को घेरे में लेते हुए उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच कराने तथा दोषियों को जेल भेजने की बात कही है. वे तो यहां तक कहते रहे हैं कि इसमें इतना भ्रष्टाचार है कि इसकी आंच नीतीश कुमार तक आएगी और उन्हें भी जेल भेजा जाएगा. जाहिर है, इतना आक्रामक व व्यक्तिगत हमला तो तेजस्वी यादव ने भी नीतीश कुमार पर नहीं किया है. इसके अलावा लोजपा ने राज्य में अफसरशाही खत्म करने, सीता रसोई के जरिए हर प्रखंड में दस रुपये में भोजन मिलने, छात्रों के लिए कोचिंग सिटी, फिल्मसिटी, स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने, रोजगार पोर्टल बनाने, नहरों से नदियों को जोड़ने, किन्नरों व गरीबों को आवास देने तथा तय सीमा में प्रोजेक्ट पास नहीं करने पर अफसरों पर मुकदमा दर्ज करने की बात कही है.
रोजगार पर तकरार
विधानसभा चुनाव में रोजगार जैसे ही मुद्दा बनने लगा, एनडीए तथा महागठबंधन के घटक दलों के बीच वाणों के तीर चलने लगे. तंज कसने व आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया. यहां तक कि इस जंग में पीएम नरेंद्र मोदी भी कूद पड़े. जमुई से एनडीए प्रत्याशी श्रेयसी सिंह के समर्थन में आयोजित जनसभा में पीएम ने कहा, "बिहार में नए उद्योग लगाए जाएंगे जिससे युवाओं को रोजगार मिल सकेगा और उन्हें काम के लिए दूसरे राज्यों का रूख नहीं करना होगा." महागठबंधन के नेता जहां इन पंद्रह सालों में रोजगार का हिसाब मांग रहे थे वहीं एनडीए व उसके सहयोगी दल नियोजित शिक्षक, जीविका दीदी, विकास मित्र, न्याय मित्र, टोला सेवक व कृषि सलाहकार जैसे पदों पर की गई नियुक्ति का हवाला दे विपक्षियों से उनके द्वारा पंद्रह साल में दिए गए रोजगार का ब्योरा मांग रहे हैं. राजद द्वारा दस लाख लोगों को पहली कलम से नौकरी देने के वादे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं, "पंद्रह साल में नब्बे हजार को नौकरी देने वाले दस लाख नौकरी देने की बात कह रहे हैं."

तेजस्वी ने बनाया रोजगार को मुद्दा
वहीं राजद नेता तेजस्वी यादव कहते हैं, "नीतीश सरकार ने पंद्रह साल में किसी को रोजगार नहीं दिया. लोग रोजी-रोटी, स्वास्थ्य व बेहतर शिक्षा के लिए राज्य से बाहर जा रहे हैं. अरबों रुपया यहां से बाहर जा रहा है. हम मेधा पलायन रोकने की योजना बनाएंगे. बिहार सरकार हर वर्ष बजट का 40 प्रतिशत यानी अस्सी हजार करोड़ रुपया सरेंडर करती है. हम इस राशि का इस्तेमाल विकास के कार्यों व वेतन देने में करेंगे. नहीं होगा तो हम विधायकों के वेतन में कटौती करके वेतन का खर्च जुटाएंगे." इधर, राजद ने भी भाजपा से पूछा है कि चार लाख लोगों को नौकरी और पंद्रह लाख लोगों के रोजगार के लिए वे पैसा कहां से लाएंगे. कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, "भाजपा का घोषणा पत्र भी जुमला ही है. जब हमने दस लाख लोगों को नौकरी की बात कही तब तंज कस रहे थे, अब खुद 19 लाख को रोजगार देने की बात कह रहे."
जानकार बताते हैं कि सभी पार्टियां हवा-हवाई दावे कर रही है. दस लाख लोगों को नौकरी तथा अन्य लाखों सेवकों का मानदेय बढ़ाने की बात का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है. इतने लोगों को नौकरी देने के लिए एक लाख 34 हजार करोड़ रुपये की जरूरत होगी. इसके अतिरिक्त मनरेगा का कार्य दिवस बढ़ाकर दो सौ करने पर 5300 करोड़ तथा आशा कार्यकर्ता समेत अन्य का मानदेय बढ़ाने पर 4150 करोड़ रुपये और जीविका दीदियों के प्रत्येक समूह को दो लाख रुपये का टॉप अप लोन देने पर 77 हजार करोड़ की जरूरत होगी. पहले से ही वित्तीय संकट से जूझ रही बिहार सरकार के लिए आखिरकार इतना पैसा जुटाना महती चुनौती होगी.(dw.com)
आईआईटी, खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने डिस्पोजेबल पेपर कप में गर्म पेय पदार्थ के इस्तेमाल पर स्टडी के बाद चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है
- DTE Staff
ज्यादातर पेय पदार्थ डिस्पोजेबल पेपर कप में पीये जाते हैं, लेकिन क्या ऐसा करना सही है? आईआईटी, खड़गपुर की एक रिसर्च में पाया गया है कि इन डिस्पोजेबल पेपर कप में गर्म पेय पदार्थ पीना सही नहीं है, क्योंकि इन पेपर कप से माइक्रोप्लास्टिक सहित कई हानिकारक तत्व निकलते हैं। दरअसल यह पेपर कप एक महीन हाइड्रोफोबिक फिल्म से तैयार किए जाते हैं, जो अममून प्लास्टिक (पॉलीथिलेन) से बनते हैं। कई दफा पेपर कप में तरल पदार्थ को रोकने के लिए को-पॉलीमर्स का इस्तेमाल किया जाता है।
आईआईटी, खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर सुधा गोयल, रिसर्च स्कॉलर वेद प्रकाश रंजन और अनुजा जोसफ ने यह अध्ययन किया और पाया कि पेपर कप में 15 मिनट तक गर्म पानी रखने से माइक्रोप्लास्टिक की पतली परत क्षीण हो जाती है।
सुधा गोयल ने कहा, हमारा अध्ययन बताता है कि एक पेपर कप में 85 से 90 डिग्री सेल्सियस तापमान वाला 100 मिलीलीटर गर्म तरल पदार्थ अगर 15 मिनट तक रहता है तो उसमें 25 हजार माइक्रोन आकार के माइक्रोप्लास्टिक के कण निकले। इसका मतलब है कि एक औसत व्यक्ति अगर दिन में तीन बार पेपर कप में चाय या कॉफी पीता है तो वह अपने शरीर के भीतर लगभग 75 हजार सूक्ष्म माइक्रोप्लास्टिक के कण पहुंचा रहा है, जो एक व्यक्ति के आंखों को दृष्टिहीन तक कर सकता है।
इन शोधकर्ताओं ने इस स्टडी के लिए दो तरीके आजमाए। एक- 85 से 90 सेल्सियस तापमान वाला गर्म पानी एक डिस्पोजेबल पेपर कप में डाला गया और 15 मिनट तक इंतजार किया गया। इसके बाद पानी की जांच की गई, जिसमें माइक्रोप्लास्टिक्स के कण मिले। दूसरा- 30 से 40 डिग्री सेल्सियस के गर्म पानी में एक पेपर कप डुबोया। इसके बाद पेपर लेयर से सावधानी से हाइड्रोफोबिक फिल्म को अलग किया गया और गर्म पानी को 15 मिनट तक रखा गया। साथ ही, प्लास्टिक फिल्म के फिजीकल, केमिकल और मैकेनिकल बदलावों की जांच की गई।
शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि ये माइक्रोप्लास्टिक के कण विषाक्त पदार्थों के वाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं। इनमें पैलेडियम, क्रोमियम, कैडमियम जैसे जहरीले भारी धातु और कार्बनिक यौगिक शामिल हैं। जब इन विषाक्त पदार्थों को निगला जाता है, तो स्वास्थ्य के लिए काफी गंभीर हो सकते हैं।
आईआईटी, खड़गपुर के निदेशक प्रो. वीरेंद्र के. तिवारी ने कहा, "यह अध्ययन बताता है कि ऐसे उत्पादों के इस्तेमाल से पहले सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। हमें पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को खोजना होगा, लेकिन साथ ही हमें हमारे पारंपरिक व स्थायी जीवन शैली को बढ़ावा देना होगा।”(downtoearth)
मनोरमा सिंह
अर्णब गोस्वामी और उनकी कंपनी से पैसे का भुगतान नहीं होने के कारण अपनी माँ के साथ दो साल पहले आत्महत्या कर चुके अन्वय नायक की पत्नी और बेटी की..
अर्णब की गिरफ्तारी पर जो लोग कह रहे हैं इसको क्यों नहीं पकड़ा, उसको क्यों नहीं, तो उन लोगों को सोचना चाहिए कि इस निजाम में बगैर पुख्ता आधार के भी लोग जेल में हैं, सुधा भारद्वाज से लेकर बरबर राव, फादर स्टेन स्वामी जैसे जाने कितने नाम हैं, सरकार जिसको चाहे जेल में बंद कर दे, फिर भी आपके सुझाए नाम वाले पत्रकारों को जेल में नहीं बंद कर रही तो कुछ सोच समझ कर ही ऐसा कर रही होगी या फिर चाहकर भी उनके खिलाफ ऐसा कुछ मामला नहीं बना पा रही होगी
खैर, केवल पत्रकारों की ही बात करें तो एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में कोविड-19 पर रिपोर्टिंग के लिए ही 55 भारतीय पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, उनके खिलाफ केस किया गया, उनको धमकी दी गई, कश्मीर के लगभग दो दर्जन पत्रकार आर्टिकल 370 हटाने के बाद से सरकार द्वारा प्रताडि़त किए गए हैं और दो जेल में हैं, और अभी हफ्ते दो हफ्ते पहले ही जम्मू-कश्मीर के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक कश्मीर टाईम्स के श्रीनगर कार्यालय को सील कर अनुराधा भसीन को पत्रकारिता करने की सजा दी गई है, उत्तरप्रदेश के प्रशांत कनोजिया का मामला भी कुछ महीने पहले का है , जिन्हें उनके ट्वीट के कारण अगस्त से अब तक जेल में रखा गया था, मिड डे मील के नाम पर यू पी की योगी सरकार द्वारा मिर्जापुर के स्कूल में बच्चों को रोटी-नमक खिलाये जाने की बात उजागर करने वाले पत्रकार पवन बंसल के ही खिलाफ वाला मामला भी ज्यादा पुराना नहीं है! और एक शर्मशार करने वाली कहानी शामली के पत्रकार अमित शर्मा की है जिन्हें स्टोरी कवर करने जाने पर गिरफ्तार कर पुलिस ने टॉर्चर किया और पेशाब पिलाया और गौरी लंकेश तो मार ही डाली गईं।
हाल ही में एक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि 50 से अधिक पत्रकारों को उनके काम के लिए आपराधिक आरोपों, हिंसा और धमकी के के मामले में सूचीबद्ध किया गया है और यूपी का रिकॉर्ड सबसे खराब है ! लिस्ट बहुत लंबी है सच में इन सबकी बात होनी चाहिए, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के लिए आपातकाल या इमरजेंसी के इस दौर की बात होनी चाहिए, ना कि पत्रकारिता के नाम पर धमकी देने वाले और किसी के काम के बदले उसके पैसे का भुगतान नहीं करने वाले और आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले किसी आरोपी अपराधी शख्स की !
बेबाक विचार डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह कॉलम लिखे जाने तक पता नहीं चला है कि अमेरिका में कौन जीता है ? डोनाल्ड ट्रंप या जो बाइडन। वैसे अभी तक जो बाइडन ट्रंप से थोड़ा आगे हैं। उन्हें ‘इलेक्ट्रोरल कालेज’ के अभी तक 238 वोट मिले हैं और ट्रंप को 213 वोट। जीत के लिए 270 वोट जरुरी हैं। लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होने के पहले ही ट्रंप ने पत्रकार परिषद करके अपनी जीत की घोषणा कर दी है।
उन्होंने यह भी कह दिया है कि वहां विभिन्न राज्यों में जो वोटों की गिनती हो रही है, वह अपने आप में बड़ी धांधली है। उन्होंने राज्यों से कहा है कि वे उस गिनती को रुकवा दें। जो हालत इस चुनाव में अमेरिकी लोकतंत्र की हुई है, वैसी दुनिया के किसी लोकतंत्र की नहीं हुई। अमेरिका अपने आप को दुनिया का सबसे महान लोकतंत्र कहता है लेकिन उसकी चुनाव पद्धति इतनी विचित्र है कि किसी उम्मीदवार को जनता के सबसे ज्यादा वोट मिलें, वह भी उस उम्मीदवार से हार जाता है, जिसे ‘इलेक्टोरल वोट’ ज्यादा मिलते हैं।
इसके अलावा इस बार कोरोना की महामारी के कारण लोगों ने घर बैठे ही करोड़ों वोट इंटरनेट के जरिए डाले हैं। इन वोटों में भी धांधली की शंका की जा रही है। इसके अलावा इस चुनाव में गोरे और काले, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग तथा यूरोपीय और लातीनी मूल का भेद इतना ज्यादा हुआ है कि चुनाव परिणाम के बाद भयंकर हिंसा और तोडफ़ोड़ का डर बढ़ गया है।
इसीलिए लगभग सभी बैंकों, बड़े बाजारों और घनी बस्तियों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है। राष्ट्रपति भवन पर सुरक्षाकर्मियों को बड़ी संख्या में तैनात कर दिया गया। अगर ट्रंप की जीत की घोषणा हो गई तो उनके जीवन को भी खतरा हो सकता है और यदि बाइडन जीत गए तो ट्रंप के उग्र समर्थक कितना ही भयंकर उत्पात मचा सकते हैं।
चुनाव-परिणाम की घोषणा में देरी भी दो कारणों से हो सकती है। एक तो डाक से आए वोटों की गिनती में देर लग सकती है और दूसरा, दोनों पार्टियां अदालत की शरण में भी जा सकती हैं। टेक्सास प्रांत में एक लाख 27 हजार वोटों को अवैध घोषित करवाने के लिए ट्रंप के रिपब्लिकनों ने अदालत के दरवाजे खटखटाए थे। इस वक्त ट्रंप और बाइडन के सैकड़ों वकीलों ने अदालतों में जाने की पूरी तैयारी कर रखी है। हो सकता है, इस अमेरिकी चुनाव के फैसले में काफी देर लग जाए और अंतिम निर्णय अदालत का ही हो।
यह असंभव नहीं कि इस चुनाव के बाद अमेरिका में यह मांग जोर पकड़ ले कि उसकी चुनाव-पद्धति में आमूल-चूल सुधार हो और भारत की तरह वहां कोई चुनाव आयोग पूरे देश में एकरुप चुनाव करवाए।
(नया इंडिया की अनुमति से)
तीन साल हो गए, सदफ की अपने पिता के साथ ठीक से बात नहीं हुई है. सदफ के पिता उनसे बात नहीं करना चाहते. वह एक गैर मुस्लिम लड़के से शादी करने की कीमत चुका रही हैं. दिल्ली में रहने वाली सदफ पेशे से वकील हैं. वह लखनऊ में अपने मायके जाती हैं. उन्हें अब भी उम्मीद है कि उनके पिता एक ना एक दिन उनके हिंदू पति को स्वीकार कर लेंगे.
डॉयचे वैले पर आदित्य शर्मा का का लिखा-
भारतीय समाज में अंतरधार्मिक विवाहों को लेकर हमेशा विवाद रहा है, खास तौर से जब वो हिंदू और मुसलमान के बीच हो. पिछले दिनों तनिष्क के विज्ञापन पर बहुत विवाद हुआ. इसमें दिखाया गया कि मुसलमान परिवार में शादी करने वाली एक हिंदू लड़की की धार्मिक रस्मों को कैसे उसका ससुराल मान सम्मान देता है. लेकिन विज्ञापन का इतना विरोध हुआ है कि तनिष्क को इसे वापस लेना पड़ा.
कंपनी ने कहा कि वह "लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचने और अपने कर्मचारियों, साझीदारों और स्टोर्स की सुरक्षा" को ध्यान में रखते हुए विज्ञापन वापस ले रही है. यह इस तरह का पहला विवाद नहीं है. लेकिन इसने अंतरधार्मिक विवाहों की स्वीकार्यता के सवाल को फिर खड़ा किया है, खास कर ऐसे देश में जहां हाल के सालों में धार्मिक तनाव लगातार बढ़ा है.
महिलाओं की मुश्किल
सदफ ने अपने साथी वकील यतिन के साथ फरवरी 2018 में शादी की. लेकिन शादी से पहले कई महीने दोनों में से किसी के लिए भी आसान नहीं थे. सदफ कहती हैं, "मेरी तरफ तो ज्यादा ही मुश्किलें थीं. ऐसे मामलों में लड़की के परिवार को मनाना हमेशा ही मुश्किल होता है." वह बताती हैं कि भारत में बहुत से परिवार अपनी बेटी दूसरे धर्म के लोगों में नहीं देना चाहते.
वहीं यतिन का कहना है कि जब उन्होंने अपने परिवार को सदफ के बारे में बताया तो उन्हें एकदम से धक्का लगा. वह कहते हैं, "मेरी मां तो बातों ही बातों में अक्सर मुझसे कहा करती थी, जिससे चाहे शादी कर लेना, बस लड़की मुसलमान ना हो." लेकिन कई महीनों तक मनाने के बाद यतिन का परिवार मान गया.
यतिन भी इस बात को स्वीकारते हैं कि सदफ के लिए हालात उनसे कहीं ज्यादा मुश्किल थे. वह कहते हैं, "अगर मेरी बहन कहती कि उसे किसी मुसलमान लड़के से शादी करनी है तो मुझे नहीं लगता कि मेरे माता-पिता इस बात के लिए राजी होते. लड़की वाले ऐसी बातों पर आक्रामक हो जाते हैं."
सदफ के पिता ने तो उनकी शादी में आने से भी मना कर दिया. उनकी तरफ से सिर्फ उनकी मां और भाई शादी में शामिल हुए.

तनिष्क के विज्ञापन ने दिखाई समाज की हकीकत
"लव जिहाद"
भारत में अंतरधार्मिक शादी करने वाले बहुत से जोड़ों की तरह सदफ और यतिन को भी काफी कुछ झेलना पड़ा. दोनों ही शिक्षित परिवारों से आते हैं , दोनों के परिवार बड़े शहरों में रहते हैं. साथ ही दोनों वित्तीय रूप से किसी पर निर्भर नहीं हैं.
सदफ कहती हैं, "अगर यतिन मुसलमान होता और मैं हिंदू, तो हमारी शादी लव जिहाद कहलाती." कई हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों का आरोप है कि मुसलमान पुरूष हिंदू महिलाओं का धर्मांतरण कराने के लिए उनसे शादी करते हैं और यह उनकी नजर में "लव जिहाद" है.
सदफ कहती हैं कि मौजूदा राजनीतिक माहौल ने "लव जिहाद" की अवधारणा को मजबूत किया है. आलोचकों का कहना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अंतरधार्मिक शादियों करने वाले लोगों को डराने-धमकाने वाले धुर दक्षिणपंथी गुटों को सहारा देती है.
सदफ कहती हैं कि ऐसे गुटों के डर के कारण उन्होंने अपनी शादी बहुत ही सादे तरीके से की थी. वह बताती हैं, "हम बहुत डरे हुए थे. पता नहीं था कि कौन चला आए और शादी में बाधा डाले. कोई भी आ सकता था जो इस पर राजनीति करना चाहे." वह कहती हैं कि समय के साथ हालात खराब ही हुए हैं. "अगर हम लोग अब शादी कर रहे होते, तो और भी ज्यादा मुश्किलें आतीं."
भारत में हिंदू-मुसलमान शादियों को सामाजिक तौर पर कभी नहीं स्वीकारा गया. लेकिन हाल के समय में यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है. सामाजिक कार्यकर्ता आसिफ इकबाल कहते हैं कि अंतरधार्मिक जोड़े अब ज्यादा सावधान हो गए हैं, ताकि धर्मांतरण के आरोपों से बचा जा सके.
डीडब्ल्यू के साथ बातचीत में इकबाल ने कहा, "पहले जब दो अलग-अलग धर्मों के लोग शादी करते थे तो इसे उनका निजी मामला समझा जाता था. इस मामले में ज्यादा राजनीतिक दखल नहीं दिया जाता था. लेकिन अब सब कुछ बदल गया है."
इकबाल दिल्ली में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन धनक के सह-संस्थापक हैं. यह एनजीओ अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाह करने वाले लोगों को काउंसलिंग के साथ साथ कानूनी और वित्तीय मदद भी देता है. 2010 में स्थापित यह संगठन हर साल लगभग एक हजार जोड़ों की मदद करता है. इनमें से आधे मामले अंतरधार्मिक शादियों के होते हैं.
इकबाल कहते हैं, "हमारे पास आने वाले ज्यादातर लोगों को डर होता है कि उनकी शादी के दौरान हिंसा हो सकती है. हिंसा कई तरह की होती है. कुछ मामलों में जोड़े को पीटा जाता है तो कभी उन्हें घर में बंद कर दिया जाता है. कई बार उन्हें किसी से बात नहीं करने दी जाती."
इकबाल की संस्था ऐसे लोगों को बताती है कि उनके अधिकार क्या हैं. उनके मुताबिक, "हम उन्हें बताते हैं कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं, उसमें नैतिक और कानूनी रूप से कुछ गलत नहीं है. एक बार उनमें आत्मविश्वास आ जाता है तो फिर स्थिति को संभालना उनके लिए आसान हो जाता है."
सामाजिक कलंक
तमाम मुश्किलों और परेशानियों के बावजूद कई जोड़े साथ रहते हैं. लेकिन उन्हें एक तरह से सामाजिक भेदभाव झेलना पड़ता है. इसकी मुख्य वजह हिंदू और मुसलमानों के बीच तनाव है. इकबाल कहते हैं, "वैसे तो लोग शांति से रहते हैं, लेकिन जब एक ही परिवार में दो धर्मों के लोग हों तो मामला विवादित हो जाता है."
इकबाल कहते हैं कि समस्या सिर्फ धुर दक्षिणपंथी हिंदू धार्मिक संगठन नहीं हैं. "हिंदू संगठनों की गतिविधियों पर हमारा ध्यान इसलिए जाता है क्योंकि उनके पास अभी ऐसा करने के लिए एक राजनीतिक जमीन है. लेकिन मुझे लगता है कि अगर मुसलमान समूहों को इस तरह की राजनीतिक जमीन दे दी जाए तो उनकी प्रतिक्रिया भी इसी तरह की होगी."
कोविड मरीजों के घर के बाहर पोस्टर लगाया जाना और आरडब्ल्यूए के जरिए व्हाट्स एप पर मरीज के नाम का प्रसार स्पष्ट तौर पर राइट टू प्राइवेसी का उल्लंघन है।
- Vivek Mishra
दिल्ली में कोविड मरीज के घर के बाहर पोस्टर चिपकाया जाएगा या नहीं। यह पहलू अब बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो गया है। कोविड मरीजों को किसी भी तरह का सामाजिक दंश न झेलने पड़े इसलिए उनकी राइट टू प्राइवेसी बनाए रखनी पड़ेगी। दिल्ली सरकार ने हाल ही में एक आदेश जारी कर कहा है कि घर में आइसोलेट होने वाले किसी भी कोविड मरीज के घर के बाहर कोई पोस्टर नहीं चिपकाया जाएगा। वहीं, ऐसा कोई भी पोस्टर जो घर के बाहर चिपकाया गया है उसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाए।
दिल्ली हाईकोर्ट में एडवोकेट कुश कालरा की ओर से उठाए गए कोविड मरीजों की राइट टू प्राइवेसी मामले (डब्यूपी (सी) नंबर 7250/2020) में 2 नवंबर, 2020 को दिल्ली सरकार की ओर से दिए गए लीगल रिप्लाई में यह बात कही गई है।
लीगल रिप्लाई में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा निदेशालय की ओर से 7 अक्तूबर, 2020 को सभी सीडीएमओ और होम आइसोलेशन से संबंधित नोडल अधिकारियों को कोविड मरीजों की जानकारी साझा या उजागर न करने के लिए आदेश दे दिए गए हैं। साथ ही दिल्ली के अधिकारियों को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया है कि वह कोविड मरीजों की जानकारी आरडब्ल्यूए या किसी अन्य व्यक्तियों को साझा करें।
दिल्ली में आरडब्ल्यूए वाली या अन्य कई आवासीय कॉलोनियों में कोविड मरीजों के होम आइसोलेशन के दौरान सामाजिक बहिष्कार जैसी बातें सामने आती रही हैं।
एडवोकेट कुश कालरा ने डाउन टू अर्थ से बताया कि कोविड मरीजों की राइट टू प्राइवेसी का मामला उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में उठाया था। यह देखने में आ रहा था कि स्वास्थ्य विभाग के द्वारा कई आवासीय कॉलोनियों में आरडब्ल्यूए को जानकारी साझा की जा रही थी, जिससे बाद में आरडब्ल्यूए व्हाट्स एप ग्रुप के जरिए समाज में कोविड मरीजों की जानकारी का व्यापक प्रचार कर दिया जाता था।
इसके चलते संबंधित मरीज और उसके परिवार को सामाजिक दंश झेलना पड़ता था।साथ ही साथ यह बात भी स्पष्ट नहीं थी कि आरडब्ल्यूए या किसी अन्य व्यक्ति को होम आइसोलेशन की जानकारी साझा की जाए या नहीं।
एडवोकेट कालरा ने कहा कि यह रिप्लाई बताता है कि दिल्ली और सभी प्राधिकरणों को होम आइसोलेशन वाले मरीजों की जानकारी को गुप्त ही बनाए रखना होगा, जो कि अंततः किसी भी व्यक्ति के बुनियादी अधिकार राइट टू प्राइवेसी की रक्षा ही है।
एक अक्तूबर, 2020 को यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था। वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस हीमा कोहली और सुब्रमोनियम प्रसाद की पीठ ने पीआईएल पर संज्ञान लेते हुए दिल्ली और केंद्र सरकार को नोटिस दिया था।(downtoearth)
डॉयचे वैले पर कार्ला ब्लाइकर का लिखा-
यह अभी तक साफ नहीं हुआ है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव किसने जीता और शायद कुछ और समय तक साफ नहीं होगा. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लोकतंत्र खतरे में है, भले ही बहुत से अमेरिकियों को ट्रंप के कदम स्वीकार्य हैं.
अमेरिका में चुनावी रात बिल्कुल वैसी ही रही, जैसा बहुत से विश्लेषकों और चुनावी पंडितों ने सोचा था. कम से कम एक मायने में तो जरूर, बुधवार की सुबह तक कोई भी उम्मीदवार स्पष्ट विजेता बनकर नहीं उभरा. बैटलग्राउंड कहे जाने वाले मिशिगन, विस्कोन्सिन और पेन्सिलवेनिया जैसे राज्य परिणाम में अब भी बहुत अहम भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन अंतिम नतीजे आने में समय लगेगा.
कोई हैरानी नहीं हुई जब दोनों ही उम्मीदवारों ने मौजूदा स्थिति को पूरी तरह अनदेखा करते हुए अपने समर्थकों के सामने अपनी जीत का भरोसा जताया. डेमोक्रैटिक पार्टी की तरफ से उम्मीदवार जो बाइडेन स्थानीय समय के अनुसार बुधवार तड़के अपने गृह राज्य डेलावेयर में अपने समर्थकों से मुखातिब हुए.
बाइडेन ने कहा, "हमें पता था कि इसमें समय लगने वाला है." इसके साथ ही उन्होंने जीत के लिए इलेक्टोरल कॉलेज के 270 वोट पाने के लिए वह अभी जहां तक पहुंचे हैं, उस पर उन्होंने संतोष जताया. उन्होंने जोर देकर कहा, "जब तक एक-एक वोट, एक-एक मतपत्र नहीं गिन लिया जाएगा, तब तक काम खत्म नहीं होगा,"
इस बार अमेरिकी चुनाव में तीन तरह के वोट हैं. पहले वोट हैं चुनाव के दिन मतदान केंद्र पर पड़ने वाले वोट. दूसरे, मतदान केंद्र पर पहले जाकर दिए जाने वाले वोट और तीसरे वोट हैं डाक मत पत्र वाले. इसीलिए सभी वोटों को गिनने में कई दिन लग सकते हैं.
यह पूरी तरह से वैध लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. हालांकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नजर में यह "चुनाव में धांधली" के लिए डेमोक्रैट्स की कोशिश है. बुधवार को बिना सबूत उन्होंने ट्वीट कर यह आरोप लगाया. ट्रंप की इस बात पर किसी को हैरानी तो नहीं होनी चाहिए, फिर भी उनका रवैया परेशान तो करता ही है.
बुधवार की सुबह दिए अपने भाषण में ट्रंप ने कई राज्यों में स्पष्ट जीत का दावा किया जबकि वहां अभी इतने वोटों की गितनी नहीं हो पाई थी कि किसी को विजेता घोषित किया जा सके. खास तौर से उन्होंने पेन्सिलवेनिया में अपनी बढ़त का जिक्र किया, इस बात का कोई जिक्र किए बिना कि वहां किस प्रकार के मत पत्रों की गिनती होनी बाकी है.
डाक के जरिए मिले बहुत सारे मत पत्रों को अभी खोला जाना है. विशेषज्ञों का मानना है कि रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में डेमोक्रैटिक समर्थकों ने ज्यादा डाक मतपत्रों का इस्तेमाल किया है. इसीलिए ट्रंप नहीं चाहेंगे कि उन्हें गिना जाए. लेकिन डेमोक्रैट्स को भी अभी मैदान नहीं छोड़ना चाहिए. जिन राज्यों में नतीजे आने बाकी हैं, उनमें से कई में ट्रंप आगे हो सकते हैं, लेकिन बहुत सारे वोटों की गिनती होनी अभी बाकी है जो बाइडेन को मिल सकते हैं.
स्थिति कुछ कुछ 2016 जैसी दिख रही है, लेकिन अभी तक सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. ट्रंप अपनी जीत की भी घोषणा कर रहे हैं और वोटों की गिनती को "बड़ी धांधली" भी बता रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. इन सब बातों से वह लोकतंत्र में वोट पड़ने और उन्हें गिने जाने की प्रक्रिया के प्रति असम्मान प्रकट कर रहे हैं, वह भी महामारी के इस साल 2020 में.
ट्रंप के कदमों की स्वीकार्यता
बहुत से उदारवादी अमेरिकियों ने सोचा था कि बाइडेन स्पष्ट विजेता के तौर पर उभरेंगे और टक्कर इतनी कांटे की नहीं होगी. आखिरकार उनके उम्मीदवार ने एक ऐसे राष्ट्रपति के खिलाफ चुनाव लड़ा है जो अमेरिका में मुसलमानों के आने पर रोक लगाना चाहता है, जिसने महिला अमेरिकी सांसदों पर नस्लीय हमले किए हैं, जिसने अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए यूक्रेन के साथ अमेरिकी सैन्य सहायता की सौदेबाजी करने के लिए महाभियोग का सामना किया और जिसके नेतृत्व में अब तक ढाई लाख लोग कोरोना महामारी से मारे गए हों.. यह फेहरिस्त बहुत लंबी है.
इन सब बातों के बावजूद बड़ी संख्या में अमेरिकी लोगों ने ट्रंप को वोट दिया है. बीते चार साल में ट्रंप के कदमों से साफ है कि अमेरिका में क्या क्या स्वीकार्य है. और यह दुख की बात है भले ही राष्ट्रपति चुनाव का विजेता कोई भी बने.(dw.com)
-चैतन्य नागर
आपसी मतभेद भले ही कितने गहरे क्यों न हों, इसका समाधान एक-दूसरे का गला काटने में नहीं। भले ही कुछ नेकदिल लोग बार-बार दोहराते रहें कि इस्लाम शांति का मजहब है, पर रैडिकल इस्लाम की ताकत और असर को देख कर नहीं लगता कि उनकी बात को कोई महत्व देता भी है। महातीर मोहम्मद, इमरान खान और तुर्की के एर्दोआन समेत कई लोग फ्रांस में हुई घिनौनी आतंकी घटना के समर्थन में फ्रांस के खिलाफ एकजुट हो गये हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनकी बातें हीं इस्लामिक दुनिया में ज़्यादा सुनी जाती हैं। यह पूरी दुनिया के लिए शर्मनाक है। फ्रांस के लिए लैसिते या धर्मनिरपेक्षता उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा है, और 1905 से उसे इसने अपनाया हुआ है। लैसिते की हार आतंकवादियों के साथ ही उन दक्षिणपंथियों की भी जीत है जो इस्लामोफोबिया के नाम पर समाज को कलह की आग में झोंक देना चाहते हैं।
फ्रांस में बाकी यूरोप के तुलना में सबसे अधिक मुस्लिम रहते हैं। उन्हें अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष सब कुछ तो चाहिए ही, साथ ही लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों पर हमला करने और लोगों की गर्दन काटने की आजादी भी चाहिए। उन देशों से भी ये खुश नहीं जहां इन्हें झोला भर-भर आजादी और अलग पहचान मिली हुई है, क्योंकि वहां इनकी बाकी रुग्ण आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पातीं।
मध्ययुगीन सोच, विकृत धार्मिक व्याख्या और पैने हथियारों से लैस इन आतंकियों को मिटाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन्ही के मजहब के समझदार लोगों की है जो अपनी बातों को सामने रखकर लोगों को पूरे विश्वास के साथ बता सकें कि उनकी विचारधारा की हकीकत है क्या। लैसिते जैसे सिद्धांत सैकड़ों वर्षों की सोच का, जद्दोजहद का नतीजा हैं। हम एक ही दुनिया में रहें और एक दूसरे को बर्दाश्त न कर सकें, अपने मतों को लेकर खून बहाएं, तो हमारी प्रगति का अर्थ फिर है क्या!
फ्रांस संस्कृति और कला का केंद्र रहा है। नीस का अर्थ ही है खूबसूरत। वहां लोग अपने पेंट और ब्रश लेकर आते हैं, और ठहर जाते हैं अपनी कला को अभिव्यक्ति देने के लिए।
सीपिया फ्रांस पर खून के छींटे आखिरकार वहां के लोगों को उन ताकतों के हाथों में धकेल देंगे जो उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का सत्यानाश कर डालेंगे। चाहे वे इस्लामी कट्टरपंथी हों, या खून के बदले खून की मांग करने वाले दूसरे धर्म के दक्षिणपंथी।
-सरोज सिंह
भारत में सोशल मीडिया पर सुबह से दो ही ख़बरें छाई रहीं. पहला अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव और दूसरा अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी.
रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी को बुधवार सुबह महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया.
चैनल के मुताबिक़ मुंबई पुलिस की एक टीम सुबह अर्नब गोस्वामी के घर पहुँची और उन्हें पुलिस वैन में बैठाकर अपने साथ ले गई.
पुलिस का कहना है कि अर्नब गोस्वामी को 53 साल के एक इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ अर्नब गोस्वामी ने आरोप लगाया है कि मुंबई पुलिस ने उनके, उनकी पत्नी, बेटे और सास-ससुर के साथ हाथापाई की. रिपब्लिक टीवी चैनल ने इस पूरे मामले पर बयान जारी कर अपना पक्ष भी रखा है.
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
इस पूरे मामले पर भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर की तरफ़ से सबसे पहली प्रतिक्रिया सामने आई.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "हम महाराष्ट्र में प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले की निंदा करते हैं. प्रेस के साथ इस तरह का बर्ताव ठीक नहीं है. ये इमरजेंसी के दिनों की याद दिलाता है, जब प्रेस के साथ ऐसा बर्ताव किया जाता था."
We condemn the attack on press freedom in #Maharashtra. This is not the way to treat the Press. This reminds us of the emergency days when the press was treated like this.@PIB_India @DDNewslive @republic
— Prakash Javadekar (@PrakashJavdekar) November 4, 2020
फिर गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस और महाराष्ट्र की सत्ता में साझीदारों पर निशाना साधा और उसी अंदाज़ में इमरजेंसी को याद किया.
Congress and its allies have shamed democracy once again.
— Amit Shah (@AmitShah) November 4, 2020
Blatant misuse of state power against Republic TV & Arnab Goswami is an attack on individual freedom and the 4th pillar of democracy.
It reminds us of the Emergency. This attack on free press must be and WILL BE OPPOSED.
बस फिर क्या था मंत्रियों की तरफ़ से अर्नब के समर्थन में ट्वीट्स की झड़ी लग गई.
गृह मंत्री के अलावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेश मंत्री एस जयशंकर और महिला विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने भी ट्वीट कर अर्नब की गिरफ़्तारी की निंदा की और इमरजेंसी की याद दिलाई.
महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने पूरे मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा, "इस पूरे मामले में सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. पुलिस अपना काम कर रही है. क़ानून से ऊपर कोई नहीं है. मुंबई पुलिस क़ानून के मुताबिक़ ही काम करेगी."
ग़ौरतलब है कि ख़बर लिखे जाने तक इस पूरे मामले पर ना तो एनसीपी नेता शरद पवार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया आई और ना ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से.
महाराष्ट्र में इस समय सत्ता में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी तीनों ही पार्टियाँ शामिल हैं. केंद्र सरकार की तरफ़ से हुए हमले में निशाना कांग्रेस पर अधिक है.
दिल्ली के पत्रकारों और प्रेस एसोसिएशन की प्रतिक्रिया
पूरे मामले पर एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने अपना बयान जारी कर कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि महाराष्ट्र सरकार अपनी सत्ता का ग़लत इस्तेमाल नहीं करेगी और पूरे मामले में निष्पक्ष सुनवाई होगी.
लेकिन उनके इस बयान से देश के कई पत्रकार इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. राम बहादुर राय भी उन्हीं में से एक हैं.

क्या आज महाराष्ट्र में पत्रकारों पर इमरजेंसी है?
बीबीसी के इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "अर्नब गोस्वामी के बहाने ही सही, सबसे अच्छी बात है कि हमारे मंत्रियों को इमरजेंसी की बात याद आने लगी है. इससे पहले छत्तीसगढ़ के एक पत्रकार थे विनोद वर्मा. उनको छत्तीसगढ़ की पुलिस रात के अंधेरे में इंदिरापुरम के घर से गिरफ़्तार कर रोड के रास्ते छत्तीसगढ़ ले गई थी. उसके बाद प्रशांत कनौजिया एक पत्रकार हैं, जिनको दिल्ली से गिरफ़्तार कर यूपी पुलिस ले गई थी. कुछ दिन पहले हाथरस की घटना की रिपोर्टिंग के लिए जा रहे केरल के पत्रकार को मथुरा के पास गिरफ़्तार किया गया और उन पर देशद्रोह का चार्ज लगाया गया. इन सभी घटनाओं में किसी मंत्री को इमरजेंसी की याद नहीं आई. भीमा कोरेगाँव के नाम पर सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा जैसे तमाम बुद्धिजीवी को इन्होंने गिरफ़्तार किया. ये सभी घटनाएँ जिनका मैंने ज़िक्र किया ये इमरजेंसी से ज़्यादा ख़तरनाक दौर था. इमरजेंसी का दौर तो घोषित रूप से था. लेकिन ऊपर मैंने जो घटनाएँ गिनाईं हैं, उस समय देश में इमरजेंसी घोषित नहीं थी."

राम बहादुर राय मानते हैं कि अर्नब गोस्वामी का मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ नहीं है. ये आत्महत्या के लिए मजबूर करने का मामला है. अगर उनकी किसी लिखी बात को लेकर या किसी रिपोर्ट को लेकर कोई एक्शन होता, तो पत्रकार के तौर पर हम विरोध कर सकते हैं.
उनका मानना है कि अगर मुंबई पुलिस ने कोई ज़्यादती की है, जैसे आधी रात को घर में घुस जाना या फिर मार-पीट करना तो ये अर्नब के लिए भी ग़लत है और ये बात विनोद वर्मा के लिए भी लागू होनी चाहिए, प्रशांत कनौजिया के लिए भी, केरल के पत्रकार के लिए भी और भीमा कोरेगाँव के अभियुक्तों के लिए भी.
"पुलिस की ज़्यादती किसी पत्रकार के साथ हो या नागरिक के साथ हो या फिर किसी बुद्धिजीवी के साथ, किसी भी सूरत में इसका समर्थन नहीं किया जा सकता. सिर्फ़ आप प्रेस से हैं, इसलिए आपको कोई अधिकार नहीं मिल जाता."

राम बहादुर इमरजेंसी के दौरान छात्रसंगठन एबीवीपी से जुड़े थे और बाद में पत्रकारिता से जुड़े. वो इमरजेंसी के दौरान जेल भी गए थे.
इस पूरे मामले में महाराष्ट्र सरकार पर ये भी आरोप लग रहे हैं कि राज्य सरकार ने बदले की कार्रवाई की है.
दरअसल, अप्रैल के महीने में महाराष्ट्र के पालघर से सूरत जा रहे दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. इसी मुद्दे पर अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी को लेकर टिप्पणी की थी.
अर्नब ने अपने शो कहा था, "अगर किसी मौलवी या पादरी की इस तरह से हत्या हुई होती तो क्या मीडिया, सेक्युलर गैंग और राजनीतिक दल आज शांत होते? अगर पादरियों की हत्या होती तो क्या 'इटली वाली सोनिया गांधी' आज चुप रहतीं?"
उसके बाद मुंबई समेत पूरे देश में कई जगह उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई.

महाराष्ट्र सरकार और अर्नब गोस्वामी के बीच इस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा विवाद हुआ था.
दूसरा विवाद सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर भी हुआ, जब रिपब्लिक टीवी ने मुंबई पुलिस पर पूरे मामले की ठीक से जाँच ना करने के आरोप लगाए. मुंबई पुलिस ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज़ किया था.
सुशांत मामले में महाराष्ट्र सरकार पर भी आरोप लगाए गए और विवाद बढ़ता गया. आज की घटना को कई पत्रकार बदले की कार्रवाई और राजनीति से प्रेरित क़दम भी बता रहे हैं.
कई राष्ट्रीय टीवी चैनल के एडिटरों ने ट्विटर पर अपनी प्रतिक्रिया दी है.
इंडिया टीवी के प्रमुख रजत शर्मा, एनडीटीवी की सोनिया सिंह और टाइम्स नाऊ से जुड़े राहुल शिवशंकर भी इनमें शामिल हैं.
रजत शर्मा न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोशिएसन (एनबीए) के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा है, "मैं आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में अर्नब गोस्वामी की अचानक हुई गिरफ़्तारी की निंदा करता हूँ. मैं उनके स्टूडियो ट्रायल वाली पत्रकारिता स्टाइल से सहमत नहीं हूँ, लेकिन एक पत्रकार को सत्ता में बैठे लोग इस तरह से परेशान करें, ये भी उचित नहीं है. एक मीडिया के एडिटर के साथ ऐसा बर्ताव सही नहीं है."
I condemn the sudden arrest of Arnab Goswami in an abetment to suicide case. While I don’t agree with his style of studio trial, I also don’t approve of misuse of state power to harass a journalist. A media Editor cannot be treated in this manner @PrakashJavdekar
— Rajat Sharma (@RajatSharmaLive) November 4, 2020
मुंबई के पत्रकारों और एसोसिएशन की राय अलग
तो क्या वाक़ई में महाराष्ट्र में सरकार के ख़िलाफ़ बोलने और लिखने की आज़ादी नहीं बची है?
ये जानने के लिए हमने मराठी पत्रकारों से भी बात की.
लोकमत अख़बार में काम करने वाले यदु जोशी महाराष्ट्र में 30 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र में इमरजेंसी जैसे हालात है, ऐसा मुझे नहीं लगता. आज भी महाराष्ट्र में पत्रकार सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं, मैं भी लिख रहा हूँ, लेकिन ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि पत्रकारों का दमन चल रहा है. अर्नब का मामला अलग है. उसका सभी पार्टियाँ राजनीतिक मुद्दा बना रही है."
"जिस ढंग से अर्नब ने कुछ महीनों से स्टैंड लिया है, उसको आज की घटना के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है. जबकि अर्नब को गिरफ़्तार 2018 के एक इंटीरियर डिज़ाइनर की आत्महत्या के मामले में किया गया है. इस मामले में उनकी पत्नी ने शिकायत की थी, ये भी एक पहलू है."
"मुबंई पुलिस को अपनी साफ़ छवि बरक़रार रखने के लिए सुबह का घटनाक्रम टालना चाहिए था. अगर मुंबई पुलिस जिस ढंग से पेश आई, वो नहीं आती, तो ये ज़रूर कहा जाता कि अर्नब को अन्वय नाइक की आत्महत्या मामले में गिरफ़्तार किया गया है. उसमें बदले की भावना नहीं है."
इस मुद्दे पर दिल्ली के पत्रकारों और एडिटरों की राय मुंबई और महाराष्ट्र के जर्नलिस्टों की राय से अलग दिख रही है.
निखिल वागले, स्वतंत्र पत्रकार हैं. इसके पहले उन्होंने टीवी और अख़बार दोनों में काम किया है.
ट्विटर पर एडिटर्स गिल्ड का बयान ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि अर्नब की गिरफ़्तारी का पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है. ये एक पुराना मामला है जिसमें देवेंद्र फडणवीस सरकार ने जाँच करने से इनकार कर दिया था. पीड़ित परिवार ने पूरे मामले में जाँच की माँग की है.
Arnab Goswami’s arrest has nothing to do with journalism.This is an old case which Devendra Fadnavis government refused to investigate. Victim’s family had demanded this investigation. https://t.co/XAEc6enJeU
— nikhil wagle (@waglenikhil) November 4, 2020
यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि महाराष्ट्र देश का सबसे अकेला राज्य है, जहाँ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून है. 2017 में बने इस क़ानून को 2019 में राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिली है.
इस क़ानून के मुताबिक़ ड्यूटी पर तैनात किसी पत्रकार या उससे जुड़ी संस्था पर हमला किया जाता है, तो उसे जेल और जुर्माना भरना होगा.
महाराष्ट्र में टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन नाम की एक संस्था भी है. महाराष्ट्र में काम करने वाले पत्रकार इसके सदस्य होते हैं. वर्तमान में इनके 475 सदस्य हैं, जिसमें रिपब्लिक टीवी के कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.
अर्नब की गिरफ़्तारी के बाद इन्होंने अपना बयान जारी कर कहा है, "रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी एक व्यक्तिगत मामले को लेकर हुई है. पत्रकारिता से इसका कोई संबंध नहीं है. क़ानून के सामने सभी समान होते हैं. इसलिए क़ानून को अपना काम करने दीजिए. न्याय व्यवस्था से सत्य जनता के सामने आएगा और हम पत्रकार के नाते सच के साथ हैं."यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि महाराष्ट्र देश का सबसे अकेला राज्य है, जहाँ पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क़ानून है. 2017 में बने इस क़ानून को 2019 में राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिली है.
इस क़ानून के मुताबिक़ ड्यूटी पर तैनात किसी पत्रकार या उससे जुड़ी संस्था पर हमला किया जाता है, तो उसे जेल और जुर्माना भरना होगा.
महाराष्ट्र में टीवी जर्नलिस्ट एसोसिएशन नाम की एक संस्था भी है. महाराष्ट्र में काम करने वाले पत्रकार इसके सदस्य होते हैं. वर्तमान में इनके 475 सदस्य हैं, जिसमें रिपब्लिक टीवी के कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.
अर्नब की गिरफ़्तारी के बाद इन्होंने अपना बयान जारी कर कहा है, "रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी एक व्यक्तिगत मामले को लेकर हुई है. पत्रकारिता से इसका कोई संबंध नहीं है. क़ानून के सामने सभी समान होते हैं. इसलिए क़ानून को अपना काम करने दीजिए. न्याय व्यवस्था से सत्य जनता के सामने आएगा और हम पत्रकार के नाते सच के साथ हैं."
महाराष्ट्र सरकार, मुंबई पुलिस और रिपब्लिक टीवी के बीच विवाद की वजहें?
दरअसल महाराष्ट्र सरकार, मुंबई पुलिस और रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ़ अर्नब गोस्वामी के बीच तनाव बीते कई महीनों से चल रहा था.
पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या के बाद रिपब्लिक टीवी पर एक चर्चा आयोजित की गई थी.
इस चर्चा में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया. कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने अर्नब गोस्वामी की भाषा को लेकर सवाल उठाए थे.
अर्नब के बयान पर उनके ख़िलाफ़ मुंबई के अलावा भी कई जगह एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ से अर्नब गोस्वामी को अंतरिम राहत मिल गई थी.
इसके बाद 22-23 अप्रैल की मध्य रात्रि में उन पर कुछ लोगों ने कथित तौर पर हमला किया.
इस हमले से जुड़ा एक वीडियो पोस्ट करते हुए अर्नब ने कहा था, ''मैं ऑफ़िस से घर लौट रहा था, तभी रास्ते में बाइक सवार दो गुंडों ने हमला किया. मैं अपनी कार में पत्नी के साथ था. हमलावरों ने खिड़की तोड़ने की कोशिश की. ये कांग्रेस के गुंडे थे.''
इसके बाद मुंबई पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार भी कर लिया था.
लेकिन पहले मामले में 28 अप्रैल को मुंबई पुलिस ने अर्नब गोस्वामी से क़रीब 10 घंटे तक पूछताछ की.
इसके बाद फ़िल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में भी रिपब्लिक टीवी पर कई खब़रें दिखाई गईं, जिनमें मुबंई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर मामले को ठीक से हैंडल ना करने का आरोप लगाया गया.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर भी अर्नब ने कई गंभीर आरोप लगाए.
इसके बाद 8 सितंबर को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी के ख़िलाफ़ महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया. उस वक़्त भी इंटीरियर डिज़ाइनर को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले का ज़िक्र विधानसभा में हुआ था.
उसके बाद 8 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने टीआरपी स्कैम का पर्दाफ़ाश करने का दावा किया. दूसरे चैनलों के साथ रिपब्लिक टीवी पर भी पैसे देकर अपने चैनल की टीआरपी (टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट्स) को बढ़ाने के आरोप लगे.
हालाँकि रिपब्लिक टीवी ने इन तमाम आरोपों को ख़ारिज किया.
इसके बाद 23 अक्तूबर को मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की. मुंबई पुलिस को कथित तौर पर बदनाम करने के मामले में चैनल के चार पत्रकारों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई गई.
अपने विरोधियों की आवाज़ दबाने का मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार पर ये इकलौता आरोप नहीं है.
कंगना रनौत ने भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में शिवसेना, महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस पर आरोप लगाए थे.
इसके बाद उनके ऑफ़िस में हुई तोड़फोड़ पर भी सवाल उठे. मामला कोर्ट भी पहुँचा. वहीं सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक तनाव फैलाने के आरोप में कंगना और उनकी बहन को भी नोटिस भेजा गया है.
दूसरी ओर शिवसेना के नेता संजय राउत रिपब्लिक टीवी पर मुंबई पुलिस की कार्रवाई को जायज़ ठहरा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "सर्वोच्च न्यायालय ने इस चैनल के बारे में कहा था कि आप न्यायालय नहीं हो, जाँच एजेंसी नहीं हो, इसलिए आप किसी के ख़िलाफ़ कुछ भी ग़लत-सलत बोलकर लोगों को बहकावे में नहीं ला सकते."
संजय राउत ने उल्टा सवाल किया कि ये हमारा कहना नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय का है, तो क्या आप सर्वोच्च न्यायालय से भी कहेंगे कि ये काला दिन है?(https://www.bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
मथुरा के एक मंदिर में नमाज़ पढऩे के अपराध में पुलिस चार नौजवानों को गिरफ्तार करने में जुटी हुई है। उन चार में से दो मुसलमान हैं और दो हिंदू हैं। ये चारों नौजवान दिल्ली की खुदाई-खिदमतगार संस्था के सदस्य हैं। इस नाम की संस्था आजादी के पहले सीमांत गांधी बादशाह खान ने स्वराज्य लाने के लिए स्थापित की थी। अब इस संस्था को दिल्ली का गांधी शांति प्रतिष्ठान और नेशनल एलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट चलाते हैं।
इस संस्था के प्रमुख फैजल खान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और उसके तीन अन्य साथी अभी फरार हैं। इन चारों नौजवानों के खिलाफ मंदिर के पुजारियों ने पुलिस में यह रपट लिखवाई है कि इन लोगों ने उनसे पूछे बिना मंदिर के प्रांगण में नमाज़ पढ़ी और उसके फोटो इंटरनेट पर प्रसारित कर दिए। इसका उद्देश्य हिंदुओं की भावना को ठेस पहुंचाना और देश में साप्रदायिक तनाव पैदा करना रहा है।
इन चारों नवयुवकों का कहना है कि दोपहर को वे जब मंदिर में थे, नमाज़ का वक्त होने लगा तो उन्होंने पुजारियों से अनुमति लेकर नमाज़ पढ़ ली थी। उस समय वहां कोई भीड़-भाड़ भी नहीं थी। मेरी समझ में नहीं आता कि इन लडक़ें को पुलिस ने गिरफ्तार क्यों किया ? उन्होंने मूर्तियों के सामने जाकर तो नमाज़ नहीं पढ़ी? उन्होंने हिंदू देवताओं के लिए कोई अपमानजनक शब्द नहीं कहे। यदि उन्हें अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने नमाज़ कैसे पढ़ ली ? क्या पुजारी लोग उस वक्त खर्राटे खींच रहे थे ?
सबसे बड़ी बात तो यह कि जिस फैसल खान को गिरफ्तार किया गया है, वह रामचरित मानस की चौपाइयां धाराप्रवाह गा कर सुना रहा था। चारों नौजवान मथुरा-वृदांवन किसलिए गए थे ? चौरासी कोस की ब्रज-परिक्रमा करने गए थे। ऐसे मुसलमान युवकों पर आप हिंदूद्रोह का आरोप लगाएंगे तो अमीर खुसरो, रसखान, ताजबीबी, आलम और नज़ीर जैसे कृष्णभक्तों को आप क्या फांसी पर लटकाना चाहेंगे? कृष्ण के घुंघराले बालों के बारे में देखिए ताजबीबी ने क्या कहा है-
लाम के मानिंद हैं, गेसू मेरे घनश्याम के।
काफिऱ है, वे जो बंदे नहीं इस लाम के।।
यदि आप सच्चे हिंदू हैं, सच्चे मुसलमान हैं और सच्चे ईसाई हैं तो आप सबका भगवान क्या एक नहीं है ? भगवान ने आपको बनाया है या आपने कई भगवानों को बनाया है ? मंदिर में बैठकर कोई मुसलमान अरबी भाषा में वही प्रार्थना कर रहा है, जो हम संस्कृत में करते हैं तो इसमें कौनसा अपराध हो गया है ? मैंने लंदन के एक गिरजे में अब से 51 साल पहले आरएसएस की शाखा लगते हुए देखी है।
एक बार न्यूयार्क में कई पठान उद्योगपतियों ने मेरे साथ मिलकर हवन में आहुतियां दी थीं। बगदाद के पीर गैलानी की दरगाह में बैठकर मैंने वेदमंत्रों का पाठ किया है और 1983 में पेशावर की बड़ी मस्जिद में नमाज़े-तरावी पढ़ते हुए बुरहानुद्दीन रब्बानी (जो बाद में अफगान राष्ट्रपति बने) ने मुझे अपने साथ बिठाकर ‘संध्या’ करने दी थी। लंदन के ‘साइनेगॉग’ (यहूदी मंदिर) में भी सभी यहूदियों ने मेरा स्वागत किया था। किसी ने जाकर थाने में मेरे खिलाफ रपट नहीं लिखवाई थी।
(नया इंडिया की अनुमति से)
एक तरफ जलवायु परिवर्तन को खारिज करने वाले ट्रंप हैं तो दूसरी तरफ बिडेन जिन्होंने जलवायु वैज्ञानिकों को सुनने का वादा किया है।
-विवेक मिश्रा
जैसा कि अमेरिका में चुनाव की रात होता आया है, राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवारों के घोषित रुख पर एक नजर डाला जाता है, जिससे यह भी पता चलता है कि चुनाव बाद वैश्विक जलवायु आंदोलन की क्या स्थिति होगी। वैश्विक जलवायु से संबंधित चुनिंदा मुद्दों पर रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड जॉन ट्रम्प और डेमोक्रेटिक पार्टी के जोसेफ बिडेन में काफी अंतर है। जहां बिडेन एक संतुलित स्वरूप के साथ नजर आते हैं वहीं ट्रंप का दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि वे वैश्विक जलवायु आंदोलन के साथ समझौता नहीं कर रहे हैं।
आइए इन बातों पर एक नजर डालते हैं।
सबसे पहले, जलवायु योजना पर विचार करते हैं। एक तरफ बिडेन ने 2 खरब डॉलर की जलवायु योजना की घोषणा की है, जिसके तहत 2035 तक 100 प्रतिशत स्वच्छ बिजली प्रदान करने का वादा है तो 2050 तक "नेट जीरो" उत्सर्जन परिदृश्य को प्राप्त करने के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। नेट जीरो एक ऐसी स्थिति है जहां कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को संतुलित तरीके से धीरे-धीरे हटाकर या पूरी तरह से खत्म करके शून्य तक पहुंचा दिया जाता है। वहीं, हैरानी है कि ट्रम्प अब तक एक जलवायु योजना के साथ नहीं आए हैं।
अब जीवाश्म ईंधन पर आते हैं। बिडेन चट्टानी गैस निकालने की प्रक्रिया 'फ्रैकिंग' पर प्रतिबंध का समर्थन नहीं करते हैं, जो एक अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली प्रक्रिया है। जमीन में गहरी ड्रिलिंग की जाती है, जिसके बाद जमीन में उच्च दबाव में पानी के मिश्रण को इंजेक्ट किया जाता है। यह चट्टान में फंसी गैस निकालने के लिए किया जाता है। वहीं, ट्रम्प भी सक्रिय रूप से फ्रैकिंग का समर्थन करते हैं।
बिडेन जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी समाप्त करना भी चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि वह सार्वजनिक भूमि पर नए अपतटीय ड्रिलिंग और नए परमिट पर प्रतिबंध लगाएंगे। ये भूमि अमेरिकी संघीय सरकार द्वारा अमेरिकी लोगों के लिए भरोसे पर रखी जाती है और कई संघीय एजेंसियों द्वारा प्रबंधित की जाती है। दूसरी ओर ट्रम्प, अमेरिकी तेल और गैस उत्पादन को बढ़ावा देना चाहते हैं। उन्होंने अपने आसन्न पतन के बावजूद अपने कार्यकाल के दौरान कोयला उद्योग को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों को आगे बढ़ाया है।
दोनों उम्मीदवार अक्षय ऊर्जा पर पर्याप्त रूप से भिन्न हैं। बिडेन ने अमेरिका के लिए 2035 तक स्वच्छ बिजली का वादा किया है। साथ ही घोषणा की है कि वह नवीनीकरण के साथ-साथ नौकरियों पर शोध करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। नवीनीकरण पर ट्रम्प का रुख हालांकि विचित्र है। पवन ऊर्जा उसके अनुसार पक्षियों को मारती है। उन्होंने यह भी कहा है कि सौर ऊर्जा अभी तक काफी नहीं है और कारखानों को बिजली नहीं दे सकते।
फ्रांस की राजधानी में पांच साल पहले हस्ताक्षर किए गए पेरिस समझौते का उद्देश्य विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकना था। बिडेन, जो उस समय बराक ओबामा राष्ट्रपति पद के उपाध्यक्ष थे, ने 2015 में समझौते में शामिल होने में उसका समर्थन किया था। वहीं, ट्रम्प ने अपनी अध्यक्षता के दौरान अमेरिका को पेरिस समझौते से वापस ले लिया। चुनाव के अगले दिन 4 नवंबर, 2020 अमेरिका के लिए आधिकारिक तौर पर पेरिस समझौते से हटने की निर्धारित तिथि है।
वहीं, ट्रंप से उलट बिडेन ने प्रतिज्ञा की है कि यदि वह चुने जाते हैं तो अमेरिका समझौते को फिर से जारी करेगा।
पर्यावरण नियमों के लिए ट्रम्प का कोई सम्मान नहीं है। ट्रंप ने ऐसे 150 नियमों को वापस लिया। वहीं, बिडेन ईंधन दक्षता मानकों को बहाल करना चाहता है, प्रदूषण कानूनों को मजबूत करना चाहता है और कई क्षेत्रों में सुरक्षा को मजबूत करना चाहता है।
जलवायु न्याय पर, बिडेन ने वंचित समुदायों को 40 प्रतिशत जलवायु निवेश देने के लिए प्रतिबद्ध किया था। दूसरी ओर ट्रम्प ने अब तक जलवायु न्याय की अवधारणा को स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने जंगल की आग और अन्य जलवायु आपदाओं से पीड़ित राज्यों को राहत निधि से सक्रिय रूप से वंचित कर दिया है।
ट्रम्प जलवायु विज्ञान में भी विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने सरकारी वेबसाइटों से 'जलवायु परिवर्तन' शब्द हटा दिया और कहा गया कि जलवायु परिवर्तन पर कोई सहमति नहीं थी। बिडेन ने हालांकि जलवायु वैज्ञानिकों को सुनने का वादा किया है।
ट्रम्प यूएस ग्रीन न्यू डील में विश्वास नहीं करते हैं और कहते हैं कि यह लाखों अमेरिकी नौकरियों को मार देगा। जबकि बिडेन ने भी पूरी तरह से इसका समर्थन नहीं किया है, फिर भी, उन्होंने इसके कुछ हिस्सों को निकाला है और उन्हें अपनी जलवायु कार्य योजना में इस्तेमाल किया है।
जलवायु मुद्दे बिडेन ट्रंप
जलवायु योजना (क्लाइमेट प्लान)- 2 ट्रिलियन डॉलर जलवायु योजना की घोषणा की, 2035 तक 100% स्वच्छ बिजली का लक्ष्य और 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन कोई क्लाइमेट प्लान नहीं
जीवाश्म ईंधन- फ्रैकिंग प्रतिबंध का समर्थन नहीं है, जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को समाप्त करने की चाहत, नए अपतटीय ड्रिलिंग और सार्वजनिक भूमि पर नए परमिट पर प्रतिबंध लगाने का वादा अमेरिकी तेल और गैस उत्पादन को बढ़ावा देने की बात, अपनी आसन्न गिरावट के बावजूद कोयला उद्योग को वापस करने के लिए नीतियों को आगे बढ़ाया.
नवीकरणीय ऊर्जा- अक्षय ऊर्जा अनुसंधान और नौकरियों में निवेश करने के लिए प्रतिबद्ध, 2035 तक 100% स्वच्छ बिजली का वादा दावा है कि पवन ऊर्जा पक्षियों को मारती है वहीं सौर ऊर्जा नाकाफी है साथ ही कारखानों को बिजली नहीं दे सकती है.
पेरिस समझौता- 2015 में ओबामा का समझौते से जुड़ने का समर्थन, फिर से जुड़ने का वादा समझौते से अमेरिका को वापस ले लिया, वापसी 4 नवंबर को प्रभावी हो सकती है
पर्यावरण विनिमय (रेग्यूलेशन्स)- ईंधन दक्षता मानकों को बहाल करना, प्रदूषण कानूनों को मजबूत करना, कई क्षेत्रों की सुरक्षा बहाल करना चाहता है, 150 से अधिक जलवायु-अनुकूल नियमों को वापस लिया.
जलवायु न्याय- वंचित समुदायों को 40% जलवायु निवेश देने के लिए प्रतिबद्ध कोई मान्यता नहीं, सक्रिय रूप से जंगल और अन्य जलवायु आपदाओं से पीड़ित राज्यों को राहत राशि से वंचित किया है.
जलवायु परिवर्तन- जलवायु वैज्ञानिकों को सुनने का वादा, जलवायु परिवर्तन को कोई मान्यता नहीं, सरकारी वेबसाइट से हटवाया जलवायु परिवर्तन.
ग्रीन न्यू डील- ग्रीन न्यू डील का समर्थन नहीं किया है, लेकिन अपनी जलवायु योजना में इसके तत्वों को शामिल किया है, ग्रीन न्यू डील का समर्थन नहीं किया है, सोचना है कि यह लाखों नौकरियों को मार देगा.
फ्रैकिंग-
(चट्टान से गैस निकालने की प्रक्रिया)
राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध का समर्थन नहीं करता है, नवीकरण के लिए संक्रमण के लिए इसे महत्वपूर्ण मानता है सक्रिय रूप से फ्रैकिंग का समर्थन. (downtoearth.org.in)
दुनिया में सबसे अधिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करने वाला देश होने के बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जलवायु परिवर्तन की जिम्मेवारी से बचते रहे
-अक्षित संगोमला
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से सुर्खियों में रहे हैं। जबकि अमेरिका ग्रीनहाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा इस बात को नकारते रहे।
उदाहरण के लिए, नवंबर 2018 में जब सरकारी वैज्ञानिकों और अधिकारियों के 13 सदस्यीय एजेंसियों ने नेशनल क्लाइमेट असेसमेंट का एक पूरा वॉल्यूम जारी किया था, तब ही ट्रंप ने उसे पूरी तरह खारिज कर दिया था। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा था, “20वीं सदी के मध्य में ग्लोबल वार्मिंग का जो सिलसिला शुरू हुआ था, इस बात के पर्याप्त प्रमाण है कि इसके लिए मानवीय गतिविधियां और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन जिम्मेवार रहा। इसके अलावा कोई ठोस कारण नहीं दिखते हैं।”
तब ट्रंप ने एक अमेरिकी रिपोर्टर से कहा था, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है। नहीं, नहीं, मुझे इस पर विश्वास नहीं है। ”
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है: "1900 के बाद से वैश्विक औसत समुद्र स्तर लगभग सात-आठ इंच बढ़ चुका है, जो 1993 के बाद से लगभग तीन इंच बढ़ चुका है। इसमें मानवीय गतिविधियों के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन का पर्याप्त योगदान है। यह वृदि्ध पिछले 2800 सालों के मुकाबले काफी अधिक है। समुद्र के स्तर में वृद्धि की वजह से पहले ही अमेरिका काफी प्रभावित रहा है। और यहां की 25 से अधिक अटलांटिक और खाड़ी से सटे शहरों में ज्वारीय बाढ़ आदि की घटनाओं में तेजी हो रही है।”
लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कभी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। हालांकि उन्होंने हाल ही में एक बहस में माना कि पृथ्वी की जलवायु को बदलने में मनुष्यों की कुछ भूमिका है, लेकिन यह कहने में उन्होंने काफी देर कर दी। चार साल के उनके कार्यकाल के दौरान काफी नुकसान हो चुका है।
शुरुआत से ही, ट्रंप प्रशासन ने कई ऐसे कदम उठाए, जो जलवायु विज्ञान के अनुकूल नहीं थे। इनमें से एक बहुत चर्चित रहा, जब उन्होंने एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (ईपीए) के वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के लिए आदेश जारी करते हुए उन्हें किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होने से रोक दिया।
तब से, कई वैज्ञानिकों ने शिकायत की कि ट्रंप प्रशासन उन्हें दरकिनार कर रहा है और यहां तक कि बोलने के लिए भी उन्हें पदावनत तक किया गया। इसके बाद, ट्रंप प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को कई सरकारी वैज्ञानिक और नीति रिपोर्टों से ही हटा दिया।
ट्रंप प्रशासन के इस रवैये के लिए अमेरिका के वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र जलवायु डेटा के प्रति प्रेरित किया, क्योंकि वैज्ञानिकों को लगता था कि ट्रंप शासन की वजह से जलवायु डेटा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
पिछले चार वर्षों के दौरान, जलवायु परिवर्तन पर रिसर्च करने वाले संगठनों को काफी नुकसान पहुंचा। उनमें कई कम प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों का दखल बढ़ा और वरिष्ठ वैज्ञानिकों को हटा दिया गया। इनमें से सबसे विवादास्पद एंड्रयू व्हीलर थे, जिन्हें ट्रंप ने ईपीए का प्रशासक नियुक्त किया था।
एंड्रयू ने रेग्युलेटरी साइंस में पारदर्शिता को मजबूत करने वाले नियमों को कमजोर करने का काम किया।
इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पैनल और समितियों को ट्रंप प्रशासन ने काफी नुकसान पहुंचाया।
5 अक्टूबर, 2020 को जर्नल नेचर ने एक बड़ा कदम उठाते हुए एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें साफ तौर पर ट्रंप द्वारा विज्ञान को पहुंचाए गए नुकसान का पूरा ब्यौरा दिया गया और कहा गया कि विज्ञान को हुई इस नुकसान की भरपाई में कई दशक लग जाएंगे।
मई 2019 में, ट्रम्प ने आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से बर्फ के पिघलने पर एक सांकेतिक हस्ताक्षर करने से तब तक इनकार कर दिया, जब तक कि जलवायु परिवर्तन के संदर्भों को इससे हटा नहीं दिया गया। इससे एक ऐसी स्थिति पैदा हुई, जहां अमेरिका वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की भविष्यवाणियों पर काम नहीं कर पाएगा।
अमेरिका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक रघु मुर्तुगुडे कहते हैं कि रिपब्लिकन पार्टी ने जीवाश्म ईंधन उद्योग के साथ पक्षपात किया है और मतदाताओं के बीच जलवायु कार्रवाई के व्यापक समर्थन की अनदेखी की। डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे को व्यक्तिगत तौर पर ले ले लिया, क्योंकि इस व्यापार से उनके व्यक्तिगत रिश्ते हैं।
रघु कहते हैं कि इसी सोच के चलते ट्रंप ने जलवायु से संबंधित सभी रिसर्च और कार्ययोजनाओं को रोक दिया, बल्कि कई पर्यावरणीय नियमों को भी रद्द कर दिया है, ताकि उद्योगों के लिए काम करना आसान हो सके। बेशक कोविड-19 के प्रति उनकी प्रतिक्रिया भी विज्ञान पर बड़ा हमला ही है, लेकिन जलवायु विज्ञान को ट्रंप ने सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया है।
गैर-लाभकारी संस्था क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क द्वारा जारी जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (सीसीआईपी) 2020 के अनुसार, जलवायु परिवर्तन संबंधी नीतियों के मामले में संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है।
ऐसे में, यदि ट्रम्प 4 नवंबर को राष्ट्रपति चुनाव जीतते हैं, तो यह जलवायु विज्ञान अनुसंधान और मानवता के सभी के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। (downtoearth.org.in)
हाथ की हुनरमंदियाँ -1
-सतीश जायसवाल
दो कोटा हैं। एक पश्चिम रेलवे पर। एक दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे पर। इसके साथ करगीरोड जुड़ा हुआ है। दोनों मिलकर हुए करगीरोड-कोटा। रेलवे स्टेशन करगीरोड और बस्ती हुई - कोटा। टीकाराम चक्रधारी इसी कोटा का है। बस्ती से थोड़ा ऊपर, लेकिन नीचे, ढलवान की तरफ उतरती हुई पहाड़ी पर कुम्हारों का मोहल्ला है। बस्ती से नहीं दिखता, थोड़ा आड़ में पड़ जाता है। इसी मोहल्ले में एक घर टीकाराम चक्रधारी का है।
भगवान विष्णु चक्र धारण करते हैं इसलिए चक्रधारी हुए। टीकाराम चक्र चलाता है, मिट्टी में प्राण जगाता है इसलिए चक्रधारी हुआ। वह कुछ इस मनोयोग से अपना चक्र चलाते हुए मिला जैसे योग साधना कर रहा है। प्राण मंत्र का पाठ कर रहा है। प्राण मंत्र पड़ते ही मिट्टी शरीर धारण करने लगी। चाक पर अपनी परिक्रमा पूरी करते ही, रौंदी हुई मिट्टी दीपावली का दिया बन गई।
टीकाराम ने बताया कि चाक पर चढ़ाने से पहले मिट्टी को पाँवों से खूब रौंदना पड़ता है। तब दीपावली पूजन के दिए बनते हैं, भगवान भी बनते हैं। लेकिन आजकल बाजार में भगवान की मांग नहीं रही। इसलिए वह भगवान नहीं बनाता, बस दिये ही बनाता है।
तब हमारा ध्यान गया कि यह दीपावली के बाजार का मौसम है। टीकाराम उसी की तैयारियों में लगा हुआ था। लेकिन अब दियों का बाजार भी सिमटने लगा है। कोटा का बाजार छोटा है, यहां दाम भी छोटा मिलता है। लागत और मजूरी को पूरा नहीं पड़ता। पास में बिलासपुर बड़ा बाजार है, लेकिन एक अकेले के लिए दूर पड़ता है। सामान लाने-ले जाने का खर्च नहीं निकलेगा। और समूह बनाकर बड़े बाजार में पहुँचने के लिए साथी नहीं जुटते। इस कुम्हार मोहल्ले के लोग धीरे-धीरे अपने इस पैतृक रोजगार से दूर होते जा रहे हैं। इसमें परिवार का गुजारा अब नहीं होता। यह दुखद स्थिति है।
फिर भी हम जैसे शौकिया अन्वेषकों के पास एक, बेहूदा और तैय्यारशुदा सवाल होता है -क्या अपने हाथों की यह हुनरमन्दी अपने बच्चों को सौंपेंगे, और अपने इस पैतृक रोजगार को आगे बढ़ाएंगे?
टीकाराम इस बेहूदा सवाल के सामने असहाय होने से बच गया। उसके कोई बेटा नहीं है। तीन बेटियां हैं। शादी-ब्याह के बाद अपने-अपने घर चली जाएँगी। अभी तीनों पढ़ रही हैं। बड़ी वाली आठवीं में है, मझली वाली छठवीं में और छोटी कक्षा चार में है।
ऐसे में डर होता है कि गुजर-बसर की चिन्ताओं के सामने थका और हारा पिता बेटियों की पढ़ाई बीच में ही छुड़ाकर कहीं कच्ची उम्र में ही उन्हें ना ब्याह दे। लेकिन टीकाराम ने भरोसा दिलाया कि वह ऐसा नहीं करेगा। बच्चियों को उनकी पढ़ाई पूरी करने देगा। उसका तो मन है कि उसकी बेटियां कॉलेज तक तो पढ़ सकें -लेकिन कैसे होगा?
-भगवान कोई न कोई रास्ता बताएंगे। उसने भगवान पर छोड़ दिया।
ऐसे में किसी आस्थावान समाज का एक व्यक्ति जो करता है, टीकाराम ने भी वही किया। उसने भगवान का भरोसा किया। यह उसका अपना भरोसा था। उसका भगवान उसके अपने भरोसे में है। उसका भरोसा अभी जीवित है। इसलिए उसका भगवान भी जीवित है।
एक योरोपीय दार्शनिक, नीत्शे ने तो भगवान की मृत्यु घोषित कर दी थी। कहा था-- भगवान मर गया।
लेकिन टीकाराम चक्रधारी का भगवान अभी जीवित है। उसने अपने भगवान को बचा रखा है। टीकाराम का भगवान उसके चाक में सुरक्षित है।
लेकिन भारत भवन, भोपाल में सिरेमिक्स विभाग के अध्यक्ष देवीलाल पाटीदार को उसके जीवन की चिन्ता है। उसका जीवन रहेगा तभी भगवान रहेगा। अभी थोड़े दिनों पहले, देवीलाल पाटीदार ने उसके लिए चिन्ता जताई थी। और व्यथित होकर कहा था- कुम्हार को जीने दो।
हाथ की हुनरमंदियों को आधुनिक बाजार लील रहा है। बाहर का बाजार घरेलू बाजार को समेट रहा है। कुम्हार से, उसके जीने के हक छीन रहा है। देवीलाल पाटीदार की चिन्ता कुम्हार के जीवन के लिए है। क्योंकि कुम्हार के चाक के साथ हमारी परम्पराओं की पुरातनता का इतिहास शुरू होता है। अपनी पुरातनताओं के अन्वेषण में जुटे हुए पुरा-वैज्ञानिकों के लिए वहाँ मिलने वाले मिटटी के पुराने बर्तन और उनके टुकड़े सबसे बुनियादी ‘टूल’ या उपकरण होते हैं। इनसे पता चलता है कि मिटटी को पकाकर बर्तन बनाने का ज्ञान मनुष्य जाति के पास कब आया? हाथों की हुनरमंदियों की पैतृक परम्परा उतनी ही पुरानी होती है। टीकाराम चक्रधारी उसकी निरंतरता को बनाए हुए हैं।

टीकाराम भी चाक से उतारे हुए मिट्टी के कच्चे दियों को भट्टी में पकाता है। तब लाल रंगों वाले खूबसूरत और चमकदार दिये अपने रूप में आते हैं। और दिवाली के बाजार को गुलजार करते हैं। उसकी भट्ठी में एक साथ एक लाख तक दिए पकाये जा सकते हैं। लेकिन वह अधिक से अधिक 10 हजार दियों की ही भट्ठी लगाता है। उसकी पहुँच के बाजार में इतनी ही खपत हो पाती है। उसकी भट्ठी में तो भगवान भी पकते थे। विष्णु भगवान, लक्ष्मीजी, गणेशजी। सभी। लेकिन बाजार में अब भगवानों की मांग नहीं रही।
बिजली की रंगीन रौशनियों के सामने अब मिट्टी के दियों का बाजार भी सिमटता जा रहा है। कुम्हार भी सिमट रहे हैं। अपने पैतृक रोजगार से दूर हो रहे हैं। यह समय इनके लिए चिन्ता करने का है। इनको वापस लाने का भी, और इनके जीवन को बचाये रखने का भी।
अब यह देवीलाल पाटीदार की अकेली चिन्ता नहीं रही। इस पर छत्तीसगढ़ में एक सक्रिय पहल हुई है। एक आन्दोलन विकसित हो रहा है। दीपावली के बाजार में मिट्टी के दियों की वापसी के लिए एक मजबूत, योजनाबद्ध आंदोलन। इसमें मिट्टी के दिये अकेले नहीं हैं, इसके साथ गाय के गोबर के दिये बनाकर उनको बाजार में पहुँचाने का एक नया प्रयोग भी जुड़ा हुआ है। इस प्रयोग में कुम्हार के साथ मिट्टी पर आश्रित अन्य हुनरमन्द जातियों के भी जीवन की चिन्तायें शामिल हैं। लेकिन टीकाराम इससे अनजान है।
यह आन्दोलन अभी कोटा के टीकाराम और, वहां के कुम्हार मोहल्ले तक नहीं पहुंचा है। ऐसा इसलिए मुमकिन हो सकता है कि यह आन्दोलन समाज से नहीं निकला है। बल्कि एक सरकारी आन्दोलन है। अब सरकार से निकलकर जनता तक पहुंचेगा। फिर भी यह अपने यहाँ के पैतृक कौशल और इनसे जुड़ी हुई हुनरमन्द जातियों का संरक्षण सुनिश्चित करता है। उनके भरोसे की चिन्ता करता है। इसलिए एक जनआंदोलन है।
(लेखक सुपरिचित साहित्यकार हैं, और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बसे हुए हैं। )
-सैम बेकर
अमेरिका में आम तौर पर राष्ट्रपति चुनाव का फैसला मतदान वाले दिन रात तक हो जाता है. अगले दिन तड़के तक पराजित उम्मीदवार हार स्वीकार कर लेता है. लेकिन इस साल परिस्थितियां अलग लग रही हैं. कोविड-19 को देखते हुए बहुत सारे लोगों ने डाक मतपत्रों के जरिए अपना वोट डाला है. इसलिए वोटों की गिनती में लंबा समय लग सकता है. एक रात में होने वाले फैसले को आने में अब कई दिन और यहां तक कि कई हफ्ते भी लग सकते हैं.
इसके अलावा रिपबल्किन पार्टी के कई नेता तो डाक मत पत्रों की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप बार बार यह भी कह चुके हैं कि अगर नतीजा उनके हक में नहीं आया तो जरूरी नहीं कि वे इसे मानें. इन सब हालात को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा बहुत ही अगर-मगर से घिरा है.
डाक मतपत्र
यूएस इलेक्शन प्रोजेक्ट के अनुसार कोरोना महामारी के बीच लगभग छह करोड़ अमेरिकियों ने अपना वोट डाक मतपत्रों के जरिए डाला है. कोलेराडो, ओरेगोन, वॉशिंगटन, उटा और हवाई में डाक मतपत्र कोई मुद्दा नहीं हैं क्योंकि वहां के अधिकारियों को इनकी आदत रही है. वहीं दूसरे राज्यों में भी लोगों की सुविधा को देखते हुए इस बार डाक मतपत्रों से वोट डालने पर जोर दिया गया. मार्च से यह काम चल रहा है. लेकिन चुनाव वाले दिन से पहले मतपत्रों को नहीं खोला जा सकता.
बैटलग्राउंड कहे जाने वाले विस्कोन्सिन और पेंसिल्वेनिया जैसे राज्यों में भी बड़ी संख्या में लोगों ने इस बार डाक मतपत्रों का इस्तेमाल किया है. पेंसिल्वेनिया और नॉर्थ केरोलाइना समेत कई राज्यों में तो चुनाव के दिन तक डाक मतपत्रों को स्वीकार करने की अनुमति दी गई है. इसलिए वोटों की गितनी में काफी समय लगने वाला है.
मिशिगन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर एडी गोल्डनबर्ग कहते हैं, "कुछ भी भविष्यवाणी करना थोड़ा मुश्किल है. कुछ राज्यों में पता चल रहा है कि क्या स्थिति होने जा रही है. बाकी राज्यों में कुछ भी कह पाना मुश्किल है."
मतपत्रों पर संदेह
इस साल चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप और अन्य रिपब्लिकन नेताओं ने डाक मतपत्रों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जबकि इनमें धांधली की संभावना बहुत ही कम है. ऐसा तब है जब खुद राष्ट्रपति डाक मतपत्रों से वोट देते हैं. हालिया मध्यावधि चुनाव और फ्लोरिडा की प्राइमरी में ट्रंप ने डाक मतपत्र से वोट दिया.
President Trump: "I think mail-in voting is horrible, it's corrupt."
— MSNBC (@MSNBC) April 7, 2020
Reporter: "You voted by mail in Florida's election last month, didn't you?"
Trump: "Sure. I can vote by mail"
Reporter: "How do you reconcile with that?"
Trump: "Because I'm allowed to." pic.twitter.com/Es8ZNyB3O1
डाक से आने वाले मतपत्रों में कभी ऐसा नहीं दिखा है कि किसी एक खास पार्टी को ज्यादा समर्थन मिला हो. गोल्डेनबर्ग कहते हैं कि आम तौर पर रिपब्लिकन समर्थक थोड़ा सा ज्यादा डाक मतपत्रों का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन चूंकि इस बार रिपब्लिकन पार्टी ने डाक मतपत्रों के खिलाफ बयान दिए हैं इसलिए हो सकता है कि उन्होंने कम डाक मतपत्र इस्तेमाल किए हों.
कानूनी जंग
चुनावों को लेकर लगभग 400 मुकदमे दायर किए गए हैं. दोनों ही उम्मीदवारों की टीम ने अपनी कानूनी टीमों को इस पर लगाया है. येल लॉ स्कूल में प्रोफेसर और संविधान के विशेषज्ञ ब्रूस एकरमन कहते हैं कि ज्यादातर मुकदमे चुनावी प्रक्रिया को लेकर हैं जिनका फैसला राज्यों की अदालतों में होगा.
एकरमन और दूसरे विशेषज्ञ कहते हैं कि इसकी संभावना नहीं है कि फिर से 2000 जैसी परिस्थितियां होंगी जब जॉर्ज बुश और अल गोर के बीच हुए चुनावी मुकाबले का फैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ था. हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप इसकी पूरी संभावना जता चुके हैं.
.@POTUS: "I think this will end up in the Supreme Court. & I think it's very important that we have 9 Justices. & I think the system is going to go very quickly. I'll be submitting at 5 o'clock on Saturday, the name of the person I chose for this most important of positions." pic.twitter.com/v1veiqU2Mm
— CSPAN (@cspan) September 23, 2020
संवैधानिक सवाल
अगर चुनाव में मुकाबला बराबर रहा या फिर राज्यों के अनसुझले विवादों के बीच किसी भी उम्मीदवार को बहुमत नहीं मिला तो फिर अमेरिकी संविधान के मुताबिक, अमेरिकी कांग्रेस की नवनिर्वाचित प्रतिनिधि सभा 6 जनवरी तक फैसला करेगी कि कौन राष्ट्रपति होगा. पिछली बार ऐसा 19वीं सदी में हुआ था.
लेकिन स्थिति तब और जटिल हो जाएगी जब राज्य शायद लंबित मुकदमों की वजह से 8 दिसंबर तक अपने प्रतिनिधियों को ना चुन पाएं. फिर कांग्रेस राज्यों के चुनाव नतीजों को मानने के लिए बाध्य नहीं होगी.
अगर 20 जनवरी को राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण तक कोई भी विजेता नहीं चुना गया तो फिर जो भी राष्ट्रपति बनेगा वह कार्यवाहक राष्ट्रपति होगा. यह व्यक्ति या तो निर्वाचित उपराष्ट्रपति होगा या फिर प्रतिनिधि सभा का अध्यक्ष. ऐसा तब होगा जब सीनेट 20 जनवरी तक किसी को उप राष्ट्रपति ना चुन पाए.
नतीजों की स्वीकार्यता
एक संभावना यह है कि हारने पर राष्ट्रपति ट्रंप चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार कर दें. सितंबर में ट्रंप ने कहा था, "हम देखते हैं कि हम क्या करेंगे." इसके जवाब में अमेरिकी सीनेटरों ने एकमत से प्रस्ताव पास किया ताकि सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हो सके.
The winner of the November 3rd election will be inaugurated on January 20th. There will be an orderly transition just as there has been every four years since 1792.
— Leader McConnell (@senatemajldr) September 24, 2020
चुनावी प्रक्रिया पर नजर रखने वाले बहुत से लोगों को उम्मीद है कि चुनाव के नतीजे इतने स्पष्ट हों कि ऐसे हालात ही ना पैदा हों. गोल्डनबर्ग कहते हैं, "मैं आमतौर पर आशावादी हूं कि नतीजा स्पष्ट होगा क्योंकि इस चुनाव में बहुत कुछ दांव पर लगा है."(DW.COM)
-चारु कार्तिकेय
पिछले कुछ महीनों में महामारी के बीच कंपनियों द्वारा उनके कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिए जाने के कई खबरें मीडिया में आईं. लेकिन अब एक मीडिया संस्थान द्वारा की गई छंटनी की खबर छापने पर उस संस्थान द्वारा एक और मीडिया संस्थान को ही परेशान करने का मामला सामने आया है.
मार्च में ही न्यूजलॉन्ड्री वेबसाइट ने महाराष्ट्र के सकाल मीडिया समूह द्वारा कई पत्रकारों समेत 15 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देने की खबर छापी थी. यह उस समय की बात है जब पूरे देश में तालाबंदी लागू हुए बस तीन दिन बीते थे. नौकरी से निकाले गए सभी लोग सकाल समूह के दैनिक अखबार सकाल टाइम्स के संपादकीय विभाग में काम करते थे.
इसके ढाई महीने बाद अखबार ने कम से कम 50 और कर्मचारियों को निकाल दिया और अखबार का प्रिंट संस्करण बंद ही कर दिया. 11 जून को यह खबर भी न्यूजलॉन्ड्री ने छापी, लेकिन 16 जून को सकाल ने न्यूजलॉन्ड्री को 65 करोड़ रुपए हर्जाने का मानहानि का नोटिस भेज दिया. नोटिस में सकाल ने आरोप लगाया था कि न्यूजलॉन्ड्री द्वारा छापी गई खबरें झूठी और मानहानिकारक हैं.
Newslaundry correspondent, @tweets_prateekg reported about layoffs at Sakal Times.
— newslaundry (@newslaundry) November 3, 2020
He was slapped with an FIR and Newslaundry with a Rs 65 crore defamation suit.https://t.co/gY6m6WwXKw
न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि सकाल ने नोटिस में यह तक नहीं बताया कि कौन सी जानकारी गलत है और सकाल के हिसाब से सही जानकारी क्या है. लेकिन सकाल ने न्यूजलॉन्ड्री के खिलाफ अपनी कार्रवाई को यहीं तक सीमित नहीं रखा. उसने खबर देने वाले न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार प्रतीक गोयल के खिलाफ पुणे में एक एफआईआर दर्ज करा दी.
पुलिस को की गई शिकायत में सकाल ने प्रतीक पर कंपनी के खिलाफ मानहानिकारक लेख लिखने, लेख छापने से पहले कंपनी की अनुमति ना लेने और कंपनी के लोगो का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया. न्यूजलॉन्ड्री के अनुसार पुलिस ने प्रतीक को गिरफ्तार करने की भी कोशिश की जिसके बाद कंपनी ने पुणे जिला कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अपील की और मुंबई हाई कोर्ट में एफआईआर को ही निरस्त करने की अपील की.
हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि पुलिस अपनी जांच तो जारी रख सकती है लेकिन चार्जशीट दायर करने से पहले उसे अदालत की अनुमति लेनी पड़ेगी. प्रतीक को अग्रिम जमानत भी मिल गई लेकिन न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें जेल में डालने की धमकी थी. न्यूजलॉन्ड्री का कहना है कि पुलिस अब प्रतीक का लैपटॉप जब्त करना चाह रही है. और भी ज्यादा चिंता की बात यह है न्यूजलॉन्ड्री ने इस पूरे मामले में पुलिस पर राजनीतिक दबाव का भी आरोप लगाया है.
सकाल समूह का महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ एनसीपी के प्रमुख शरद पवार से संबंध है. पवार के भाई प्रताप पवार समूह के निदेशकों के बोर्ड के चेयरमैन हैं, उनके बेटे अभिजीत पवार प्रबंधक निदेशक हैं और खुद शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले भी निदेशकों में से एक हैं. उनके भतीजे अजित पवार इस समय महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री हैं.(DW.COM)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
‘लव जिहाद’ के खिलाफ उप्र और हरियाणा सरकार कानून बनाने की घोषणा कर रही है और ‘लव जिहाद’ के नए-नए मामले सामने आते जा रहे हैं। फरीदाबाद में निकिता तोमर की हत्या इसीलिए की गई बताई जाती है कि उसने हिंदू से मुसलमान बनने से मना कर दिया था। उसका मुसलमान प्रेमी उसे शादी के पहले मुसलमान बनने का आग्रह कर रहा था। यह शब्द लव-जिहाद 2009 में सामने आया, जब केरल और कर्नाटक के कैथोलिक ईसाइयों ने शोर मचाया कि उनकी लगभग 4000 बेटियों को प्रलोभन देकर या डराकर मुसलमान बना लिया गया है।
एक-दो मामले उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में भी चले गए। सरकारी जांच एजेंसियों ने भी तगड़ी छान-बीन की लेकिन हर मामले में लालच या डर या इस्लामिक षडय़ंत्र नहीं पाया गया। किंतु जांच एजेन्सियों को ऐसे ठोस प्रमाण जरुर मिले कि कुछ इस्लामी संगठन बाकायदा धर्म-परिवर्तन (तगय्युर) की मुहिम चलाए हुए हैं और उनकी कोशिश होती है कि वे हिंदू, ईसाई, सिख आदि को इस्लामी जमात में शामिल कर लें। इस तरह की कोशिशें सिर्फ यहूदियों और पारसियों में ही कम से कम देखने में आती हैं, वरना कौनसा मजहब है, जो अपना संख्या-बल बढ़ाने की कोशिश नहीं करता ?
वे ऐसा इसीलिए करते हैं, क्योंकि वे समझते है कि ईश्वर, अल्लाह या यहोवा को प्राप्त करने का उनका मार्ग ही एक मात्र मार्ग है और वही सर्वश्रेष्ठ है सिर्फ हिंदू धर्म के अनुयायी ही सारी दुनिया में एक मात्र ऐसे हैं, जो यह मानते हैं कि ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’ याने सत्य एक ही है लेकिन विद्वान उसे कई रुप में जानते हैं। इसीलिए भारत के हिंदू या बौद्ध या जैन या सिख लोगों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी तन, तलवार या तिजोरी का सहारा नहीं लिया।
ईसा मसीह और पैगंबर मोहम्मद के जमाने की बात अदभुत है लेकिन उसके बाद इस्लाम और उससे पहले ईसाई मत का धर्मान्तरण का इतिहास इससे एकदम उल्टा है। यूरोप में लगभग एक हजार साल के इतिहास को अंधकार-युग के नाम से जाना जाता है और यदि आप ईरान, अफगानिस्तान और भारत के मध्ययुगीन इतिहास को ध्यान से पढ़ें तो पता चलेगा कि सूफियों को छोड़ दें तो इस्लाम जिन कारणों से भारत में फैला है, वे उसके श्रेष्ठ सिद्धांतों के कारण नहीं, बल्कि ऐसे कारणों से फैला है, जिन्हें इस्लामी कहना बहुत ही मुश्किल है।
भारत में ईसाइयत और अंग्रेजों की गुलामी एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं। इसका तोड़ आर्यसमाज ने निकाला था- शुद्धि आंदोलन लेकिन वह भी अधर में ही लटक गया, क्योंकि मजहब पर जात हावी हो गई। ‘घर वापसी’ का भी हाल वही हो रहा है। मैं कहता हूं कि यदि दो युवक और युवती में सच्चा प्रेम है तो मजहब या पैसा या जात या वंश- कुछ भी आड़े नहीं आ सकता।
जहां ‘लव’ है, वहां ‘जिहाद’ का ख्याल ही नहीं उठता। जहां ‘लव’ (प्रेम) की जगह लाभ-हानि का गणित होता है, वहीं धर्म-परिवर्तन जरुरी हो जाता है। मेरे छात्र-काल में मैंने ईरान, तुर्की, यूरोप और अमेरिका में ऐसे कई द्विधर्मी जोड़े देखे, जो स्वधर्म में स्थित रहते हुए या उन्हें हाशिए में रखते हुए मजे से गृहस्थ-धर्म निभाते थे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कई लोग अपनी नवजात बच्चियों को अस्पतालों में छोड़ कर जा रहे हैं या फिर ऐसी हालत में घर ले जाते हैं जिनमें उनका ज्यादा दिन बचना मुमकिन नहीं होता. जानकार इसके लिए समाज को जिम्मेदार मानते हैं.
डॉयचे वैले पर अंबरीन फातिमा की रिपोर्ट-
चंद महीने पहले की बात है कि सिर्फ कुछ दिनों की नन्ही सायरा को लाड़काना के शेख जायद चिल्ड्रन अस्पताल में गंभीर हालत में लाया गया. इलाज के बाद वह ठीक हो गई, लेकिन उसके घर वाले उसे अस्पताल में लावारिस छोड़ कर चले गए. अस्पताल प्रशासन को ऐसी कई और बच्चियों के बारे में पता चला.
सायरा इस मामले में खुशकिस्मत रही है कि वह ना सिर्फ पूरी तरह ठीक हो गई, बल्कि उसे अस्पताल की एक नर्स ने गोद भी ले लिया.
पाकिस्तान के दक्षिणी प्रांत सिंध में देहाती इलाकों में रहने वाले लोग अक्सर इलाज के लिए लाड़काना के शेख जायद चिल्ड्रन अस्पताल में ही आते हैं. इसीलिए इस अस्पताल में बच्चियों को छोड़े जाने के सबसे ज्यादा मामले देखने को मिले हैं.
जामिया बेनजीर भुट्टो मेडिकल यूनिवर्सिटी और शेख जायद चिल्ड्रन अस्पातल के प्रमुख प्रोफेसर सैफुल्लाह जामड़ू का कहना है कि इस साल कई माता पिता अपना नाम और पता गलत लिखवा कर नवजात बच्चियों को अस्पताल में छोड़कर लापता हो गए.
वह कहते हैं, "गंभीर हालत के कारण छह में पांच बच्चियां मर गईं, जिन्हें पुलिस और राहत संस्था ईधी सेंटर की मदद से दफना दिया गया. इस साल यहां छोड़ी गईं नवजात बच्चियों में से सिर्फ एक ही बच्ची ऐसी है जिसे ईधी सेंटर की मदद से अस्पताल में एक नर्स ने गोद ले लिया है."
जिम्मेदार कौन
प्रोफेसर सैफुल्लाह कहते हैं कि बच्चियों को लावारिस छोड़ने जाने के दुखद और निदंनीय कदम के पीछे दरअसल समाज में पनपने वाली सोच ही जिम्मेदार है. उनके मुताबिक, "हमारे समाज में लड़कों के मुकाबले लड़कियों को बोझ समझा जाता है. जब लड़की पैदा होती है तो माता पिता सोचते हैं कि इस पर तो हमें खर्चा करना होगा. पहले इसको पालना है, पढ़ाना लिखाना है और फिर उसकी शादी पर खर्च करते हुए उसे दूसरे परिवार को सौंपना है. चूंकि हमारे यहां गरीबी है और स्वास्थ्य सुविधाएं भी महंगी हैं. इसलिए लोग बेटियों पर खर्च करने से बचते हैं."
शेख जायद चिल्ड्रन अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टर अब्दुल्लाह असर चांडियो कहते हैं कि बच्चियों को अस्पताल में सिर्फ लावारिस ही नहीं छोड़ा जाता है, बल्कि ऐसे केस भी सामने आए हैं जिनमें माता पिता यह जानते हैं कि अगर वे बच्ची को अस्पताल से ले गए, तो उसका मरना स्वाभाविक है. फिर भी डॉक्टर की सलाह के खिलाफ जाकर वे उन्हें घर ले जाते हैं.
डॉ अब्दुल्लाह असर कहते हैं कि ऐसे मामले हजारों की तादाद में हैं और ऐसे ज्यादातर मामले बच्चियों से जुड़े होते हैं. वह कहते हैं, "हमारे रिकॉर्ड के मुताबिक 80 फीसदी लड़कियां और 20 फीसदी लड़के होते हैं, जिनके माता पिता डॉक्टर के मना करने के बाजवूद अपने बच्चों को अस्पताल से ले जाते हैं." सिर्फ अगस्त से सितंबर के बीच ऐसे 19 मामले दर्ज किए गए हैं.
डॉक्टर कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को इसलिए अस्पताल लेकर आते हैं ताकि समाज में लोगों को दिखा सकें कि वे अपनी बच्ची को इलाज के लिए लेकर गए थे. हालांकि जल्द ही वे आर्थिक हालात के हाथों मजबूर या फिर कभी परेशान होकर बच्चों को घर ले जाते हैं.

लड़कियों की परवाह नहीं
कभी माता पिता ढंके छुपे शब्दों में तो कभी खुलकर यह कहते हुए अपनी बच्चियों को घर ले जाते है कि "लड़की ही तो है, मर भी जाएगी तो क्या हुआ. खुदा ने बचा लिया तो बचा लिया, वरना क्या कर सकते हैं. परिवार में और भी बेटियां हैं. मर गई तो खुदा की मर्जी."
इस बात की पुष्टि अस्पताल की सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर सुमेरा भी करती हैं. वह बताती हैं कि माता पिता अकसर अपनी बच्चियों को घर ले जाते हैं, जिनके बारे में उनको बता दिया गया होता है कि अगर बच्ची को लगी ऑक्सीजन निकाल दी गई तो वह जिंदा नहीं बचेगी. "लड़कों के बारे में वे फिर भी सोचते हैं लेकिन बच्चियों के मामले में यह बात उनके लिए कोई मायने नहीं रखती."
अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक देहाती इलाकों में बच्चियों को लेकर जो सोच पाई जाती है, उसे बदलने की जरूरत है. इसके अलावा बच्चियों को लावारिस छोड़े जाने के खिलाफ कानून भी सख्त किए जाने की जरूरत है.(dw.com)
वारसॉ, 13 सितंबर 1939. दो बहनें जमीन में आलू तलाश रही हैं. जर्मन लड़ाकू विमान आते हैं. फायरिंग करते हैं. एक लड़की मारी जाती है. उसकी 12 साल की बहन शव पर विलाप करती है. इस पल को एक अमेरिकी फोटोग्राफर ने कैद कर लिया.
डॉयचे वैले पर माग्देलेना गाबुश पैलोकाट की रिपोर्ट-
तस्वीर में विलाप कर रही लड़की का नाम काजीमिरा "काजिया" मिका है. इस घटना को याद करते हुए उन्होंने 2010 में "कॉरेस्पोंडेंट ब्रायन" फिल्म के निर्देशक यूजिनियस स्टार्की को बताया, "वहां पर एक घर था. विमान आ रहे थे, एंडजिया भागकर आई." 13 सितंबर 1939 को जर्मन विमानों ने उस घर पर बम गिराए. एंडजिया कोस्टेविस और अन्य लोग वहां से भाग गए. खतरे के बावजूद वे उन आलूओं को साथ ले जाने की कोशिश कर रहे थे जो उन्होंने जमा किए थे. निश्चित तौर पर वे सब लोग डरे हुए थे, लेकिन इससे कहीं ज्यादा वे भूखे थे.
काजिया मिका ने 2010 में बताया, "जर्मन पायलट बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भर रहे थे और वे आराम से देख सकते थे कि खेत में एक महिला और लड़कियां हैं. फिर भी उन्होंने गोलियां चलाईं. इतने साल बीत जाने के बावजूद मैं उन लोगों को माफ नहीं कर पाई हूं." एंडजिया की गर्दन में गोली लगी, जिसके छर्रे उसके कंधों में भी घुस गए थे. चंद सेकंडों के भीतर उसकी 12 साल की बहन काजिया अपने घुटनों पर बैठ गई और अपनी बहन के क्षत विक्षत शव पर विलाप करने लगी. उसे कुछ पता नहीं चला कि यह क्या हुआ. उसने पहली बार मौत को करीब से देखा था. कुछ लम्हों पहले एंडजिया जीवित थी और अब उसका शरीर ठंडा पड़ गया था.
जूलियन ब्रायन के साथ 12 साल की काजीमिरा मिका
जब विमान चले गए तो अमेरिकी फोटोग्राफर जूलियन ब्रायन वहां पहुंचे. वह पोलैंड में उन दिनों दूसरे विश्व युद्ध के शुरुआती दिनों को दर्ज कर रहे थे. वहां पहुंच कर ब्रायन ने देखा कि जमीन पर एक महिला का शव पड़ा है और उसके पास एक बच्चा बैठा है, बिल्कुल भावशून्य चेहरे के साथ. पास ही उन्होंने काजिया को देखा जो अपनी मरी हुई बहन से बात कर रही थी. ब्रायन ने इस लम्हे को फिल्म और तस्वीरों में दर्ज कर लिया.
बाद में उन्होंने इस घटना के बारे में लिखा, "उसने हमारी तरफ देखा, बिल्कुल हैरान होकर. मैंने उसे अपनी बाहों में ले लिया. वो रो रही थी. मेरे साथ वहां जो पोलिश अधिकारी थे उनकी आंखों में भी आंसू थे. हमारे पास इस लड़की से कहने के लिए कुछ नहीं था, कोई कह भी क्या सकता था." अपनी फिल्म "सीज" में ब्रायन ने उस घटना को उस समय वारसॉ में ऐसी सबसे त्रासद घटना बताया था जिसे उन्होंने महसूस किया.

वारसॉ में अंतिम संवाददाता
अमेरिकी डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर ब्रायन कुछ दिन पहले ही एक ट्रेन पकड़कर संकट में घिरे पोलैंड की राजधानी वारसॉ पहुंचे थे. जूलियन ब्रायन पोलैंड को अच्छी तरह जानते थे. उन्होंने ग्दिनिया के पोर्ट को बनते देखा था. वह साइलेशिया की कोयले की खदानों में भी गए थे. वह लोविस की मशहूर लोककथाओं के भी दीवाने थे. लेकिन अब वह भूख, कष्ट और मौत को दस्तावेजी फिल्मों में समेट रहे थे.
जर्मन नाजियों ने युद्ध को फिल्म फुटेज में दर्ज करने पर काफी ऊर्जा खर्च की. जैसे कि जब जर्मन सैनिक पोलिश सीमा के पार जा रहे थे, जब उन्होंने श्लेषविग होलस्टाइन की गनबोट्स को फायरिंग का निशाना बनाया, उन सब घटनाओं को दर्ज किया गया, ताकि उसका इस्तेमाल प्रोपेगैंडा के लिए हो सके.
जर्मन नजरिए को फिल्माने के लिए विशेष फिल्म क्रू तैनात किए गए. पोलैंड के राष्ट्रीय स्मृति संस्थान के जॉजेक साविकी कहते हैं, "उन्होंने दिखाया कि पोलिश सैनिक कमतर हैं, उनके पास पर्याप्त उपकरण नहीं हैं. फिल्म की तस्वीरों में पोलिश यहूदियों और पांरपरिक बालों और कपड़ों को दर्ज किया गया. इसे नकारात्मक नजरिए से पेश किया गया. उन्होंने दिखाने की कोशिश की कि जर्मन सैनिकों के आने से वहां सभ्यता आई."
लेकिन ब्रायन की तस्वीरों में हालात का दूसरा रुख था. ज्यादातर चीजें उन्होंने फिल्माई, लेकिन फोटो भी लिए. यहां तक कि उनके पास कलर स्लाइड फिल्में भी थीं. ये ऐसी चीजें थीं जिनके बारे में उस समय ज्यादा लोग नहीं जानते थे. उन्होंने युद्ध को नए नजरिए से दिखाया, पीड़ितों के नजरिए से.

"मेरा नाम ब्रायन है, जूलियन ब्रायन, अमेरिकी फोटोग्राफर"
जिन लोगों को ब्रायन ने फिल्माया, वे उन्हें बेहतर दुनिया की जीवनरेखा के तौर पर देखते थे. हर कोई उनके कैमरे में आत्मविश्वास के साथ देखता था. 1940 की फिल्म सीज में ब्रायन कहते हैं, "जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं अमेरिकी फोटोग्राफर हूं, तो उन्हें लगता था कि मैं उन लोगों की मदद करने के लिए इतनी दूर से चलकर पोलैंड आया हूं. लेकिन उनके चेहरे के भावों को कैमरे में कैद करने के अलावा मैं कुछ नहीं कर सकता था."
लेकिन ब्रायन ने बहुत किया. वह पोलिश लोगों के प्रवक्ता बन गए. 15 सितंबर 1939 को उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के लिए एक अपील प्रसारित की. उन्होंने अपने संदेश की शुरुआत इस तरह की, "मेरा नाम ब्रायन है, जूलियन ब्रायन, अमेरिकी फोटोग्राफर."
पोलिश रेडियो पर शांत लेकिन सधी हुई आवाज में उन्होंने कहा, "अमेरिका को कुछ करना चाहिए. उसे मौजूदा दौर के सबसे भयानक नरसंहार को रोकना होगा. 13 करोड़ अमेरिकियों से हम कहते हैं, शिष्टाचार, न्याय और ईसाई मूल्यों की खातिर आइए और पोलैंड के साहसी लोगों की मदद करिए."
वापस अमेरिका लौटने के बाद ब्रायन ने अपनी तस्वीरें रूजवेल्ट को दिखाईं. उनकी फिल्म सीज को करोड़ों लोगों ने अमेरिकी सिनेमा घरों में देखा. इसके लिए उन्हें ऑस्कर नोमिनेशन भी मिला और किताब लिखने का करार भी.
पहले विश्व युद्ध में फोटोग्राफी का इस्तेमाल मुख्य तौर पर सेना और प्रचार के लिए होता था. जर्मनी में 1916 में 400 लोगों की भर्ती हवाई तस्वीरें लेने और उनका विश्लेषण करने के लिए की गई थी. निजी स्तर पर भी कईं तस्वीरें ली गईं.
अपनी बहन की मौत पर विलाप करती जिस लड़की का फोटो उन्होंने लिया, वह कई बरसों बाद भी ब्रायन को लेकर आश्चर्यचकित थी. निर्देशक यूजिनियस स्टार्की के साथ 2010 में अपनी बातचीत में काजिया मिका ने कहा, "अपने काम को लेकर उनमें बहुत जुनून था. वह दुनिया को सच और बुराई दिखाना चाहते थे. वह दिखाना चाहते थे कि जर्मनों ने हमारे साथ क्या किया."

जूलियन ब्रायन 1958 में वारसॉ लौटे और उन्होंने काजिया मिका से मुलाकात की. उस वक्त वह 31 साल की हो गई थीं. इसके 16 साल बाद वह फिर से पोलैंड लौटे, अपने बेटे सैम के साथ.
जब मैंने टेलीफोन पर सैम ब्रायन के साथ न्यूयॉर्क में बात की तो लगा कि मैं उनके पिता से बात कर रहा हूं. उनकी आवाज बेहद शांत और सशक्त थी. ठीक वैसे ही जैसे जूलियन ब्रायन ने रेडियो के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति से अपील की थी.
उन्होंने बताया कि उन्हें भी जीवन भर ऐसा ही लगता रहा है कि जैसे वह खुद काजिया मिका को जानते हैं. सैम सिर्फ छह महीने के थे जब उनके पिता वारसॉ से लौटे थे. वह बताते हैं कि जब तक उनके पिता की याददाश्त रही, बिलखती बच्ची की छवियां उनके साथ रहीं.
वह कहते हैं कि जब उन्होंने अपने पिता के साथ पोलैंड की यात्रा की, तो यह उनके लिए "जीवन की सबसे अहम यात्रा" थी. वह कहते हैं, "जब हमने 45 साल पहले वारसॉ की यात्रा की तो हम उन लोगों से मिले, जिनकी तस्वीरें उन्होंने 1939 में ली थीं. काजीमिरा मिका उन्हीं में से एक थीं." इसके बाद सैम 2019 में पोलैंड में जाकर मिका से मिले.
सैम ब्रायन बताते हैं, "मैं उनके लिए बेटा जैसा था. मैंने उनसे अपने पिता के बारे में बहुत सारी अच्छी बातें सुनीं. वह ऐसे बात करती थीं जैसे वो उन्हीं के पिता थे. उन्हें याद आ रहा था कि कैसे उन्होंने उनकी देखभाल की थी. हम उनकी बहन की कब्र पर भी गए थे. बहुत ही भावुक पल थे."
जूलियन ब्रायन का निधन अक्टूबर 1974 में हुआ, पोलैंड यात्रा से लौटने से कुछ महीनों बाद. काजिया मिका ने कहा, "उन्होंने वादा किया था कि मुझे अमेरिका दिखाएंगे. लेकिन दुख की बात है कि मैंने कभी न्यूयॉर्क नहीं देखा.. लेकिन कोई बात नहीं. मैं अब भी उनकी शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने एंडजिया के साथ मेरी तस्वीर ली."
इस साल 28 अगस्त को काजीमिरा मिका का निधन हो गया. उन्हें वारसॉ के पोवाज्की कब्रिस्तान में दफनाया गया. उसी जगह के करीब जहां 81 साल पहले जूलियन ब्रायन ने उनकी तस्वीर ली थी.(dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चुनाव आयोग ने मध्यप्रदेश के भाजपा और कांग्रेस नेताओं को वाणी-संयम के जो निर्देश दिए हैं, वे बहुत सामयिक हैं लेकिन कांग्रेसी नेता कमलनाथ का ‘मुख्य चुनाव-प्रचारक’ का दर्जा छीनकर उसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि अब अदालत ही उसका फैसला करेगी। अदालत क्या फैसला करेगी और कब करेगी, यह देखना है लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि चुनाव आयोग को क्या इतनी सख्ती बरतनी चाहिए, जितनी वह बरत रहा है?
कमलनाथ को इसलिए दोषी ठहराया जा रहा है कि उन्होंने अपनी एक महिला पूर्व मंत्री और अब भाजपा उम्मीदवार इमरती देवी को ‘आइटम’ कह दिया था। ‘आइटम’ शब्द के कई अर्थ हैं, कुछ बुरे भी हैं लेकिन ‘इमरती’ शब्द के साथ तुकबंदी करते हुए अगर उन्होंने कह दिया कि इमरती क्या ‘चीज’ है तो इसके पीछे उनकी मानहानि की बजाय हंसी-मजाक का मकसद ज्यादा रहा होगा।कमलनाथ ने बाद में इस बात पर खेद भी प्रकट कर दिया लेकिन इस मामले को भाजपा द्वारा इतना ज्यादा तूल इसलिए दिया जा रहा है कि आजकल चुनाव का दौर है। एक-दूसरे के विरुद्ध जितनी गलतफहमी फैलाई जा सके, उतने ज्यादा वोट मिलने की संभावना बनी रहती है। अब कांग्रेस भी पीछे क्यों रहे ? उसने भी वही पैंतरा अपनाया है। उसने भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय के इस कथन को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ‘चुन्नू-मुन्नू’ है। यह व्यंग्य की भाषा है।
चुनाव सभाओं में यदि चिऊंटी न खोड़ी जाए और हंसी-मज़ाक न किया जाए तो उनमें भीड़ टिकेगी कैसे ? इस तरह के बहुत-से किस्से बिहार से भी सुनने में आ रहे हैं। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कहना है कि किसी कांग्रेसी नेता ने उनकी तुलना धोबी के कुत्ते से कर दी है लेकिन इसका बुरा मानने की बजाय सिंधिया ने कुत्ते की स्वामीभक्ति याने जनता के प्रति वफादारी की तारीफ कर दी। उन्होंने नहला पर दहला मार दिया।ऐसे नाजुक वक्तों में चुनाव आयोग यह तो ठीक कर रहा है कि वह नेताओं पर उंगली उठाता है लेकिन उसे सख्त कदम तभी उठाना चाहिए जबकि वाकई कोई नेता बहुत ही आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करे। वरना चुनाव-प्रचार बिल्कुल उबाऊ और नीरस हो जाएगा।
चुनाव आयोग यदि ज्यादा नज़ाकत दिखाएगा तो उसे आपत्तिजनक शब्दों की इतनी बड़ी सूची तैयार करनी पड़ेगी कि वह किसी भी शब्दकोश से टक्कर लेने लगेगी। क्या चुनाव आयोग को यह तथ्य पता नहीं है कि अमर्यादित अपमानजनक और अश्लील शब्दों का प्रयोग करनेवाले नेताओं को जनता खुद सजा दे देती है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
न्यूजीलैंड के लोगों ने यूथेनेसिया यानी इच्छामृत्यु को वैध बनाने के लिए भारी समर्थन दिया है. इस मुद्दे पर 17 अक्टूबर को हुए मतदान के शुरुआती नतीजे बता रहे हैं कि 65 फीसदी से ज्यादा लोग इच्छामृत्यु का अधिकार चाहते हैं.
इच्छामृत्यु के अधिकार का समर्थन करने वाले इसे "इच्छा" और "गरिमा" के साथ जीवन की जीत बता रहे हैं. इच्छामृत्यु पर जनमतसंग्रह देश के आमचुनाव के साथ ही करा लिया गया. इन चुनावों में प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न को भारी जीत मिली. शुक्रवार को वोटों की गिनती से पता चला कि 65.2 फीसदी लोग यूथेनेसिया के पक्ष में हैं, जबकि 33.8 फीसदी लोग इसका विरोध कर रहे हैं. इन नतीजों से साफ है कि न्यूजीलैंड जल्द ही उन मुट्ठी भर देशों में शामिल हो जाएगा जो डॉक्टर की मदद से इच्छामृत्यु की अनुमति देते हैं.
पांच साल से चल रही थी बहस
न्यूजीलैंड के कानून में इस सुधार के लिए अभियान चला रहे डेविड सेमूर ने इसे "जबर्दस्त जीत" बताया और कहा कि यह न्यूजीलैंड को मानवता के लिए ज्यादा दयालु बनाएगा. सेमूर ने कहा, "हजारों न्यूजीलैंडवासी जिन्होंने शायद अति दुखदायी मौत को सहन किया होगा, उनके पास अब इच्छा, गरिमा, नियंत्रण और अपने शरीर पर स्वतंत्रता होगी और कानून का शासन इसकी रक्षा करेगा."
न्यूजीलैंड में इच्छामृत्यु पर बहस लेक्रेटिया सील्स ने शुरू की. 2015 में इस महिला की ब्रेन ट्यूमर के कारण मौत हो गई. मौत उसी दिन हुई जब कोर्ट ने अपनी इच्छा के समय पर मृत्यु की लंबे समय से चली आ रही उसकी मांग को ठुकरा दिया. सील्स के पति मैट विकर्स ने रेडियो न्यूजीलैंड से कहा, "आज मुझे बहुत राहत और कृतज्ञता का अनुभव हो रहा है." हालांकि न्यूजीलैंड में चर्चों के संगठन साल्वेशन आर्मी का कहना है कि कानून में सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं हैं और इसके नतीजे में लोगों को अपनी जीवनलीला खत्म करवाने के लिए बाध्य किया जा सकता है. साल्वेशन आर्मी ने कहा है, "कमजोर लोग जैसे कि बुजुर्ग और ऐसे लोग जो मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं, वो इस कानून के कारण खासतौर से जोखिम में रहेंगे." न्यूजीलैंड के मेडिकल एसोसिएशन ने भी इस सुधार का विरोध किया है और मतदान से पहले ही इसे "अनैतिक" करार दिया.
कई देशों में है इजाजत
इच्छामृत्यु को सबसे पहले नीदरलैंड्स में वैध बनाया गया. यह साल 2002 की बात है. इसके तुरंत बाद उसी साल बेल्जियम में भी इसे कानूनी घोषित कर दिया. 2008 में लग्जमबर्ग, 2015 में कोलंबिया और 2016 में कनाडा ने भी इसे कानूनी रूप दे दिया. यह अमेरिका के भी कई राज्यों में वैध है और साथ ही ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में. इसके अलावा कुछ देशों में "मदद से आत्महत्या" की भी अनुमति है जिसमें मरीज खुद ही किसी घातक दवा का सेवन करता है, बजाय किसी मेडिकल कर्मचारी या फिर किसी तीसरे पक्ष के.
यूथेनेसिया को लेकर पुर्तगाल की संसद में भी बहस चल रही है हालांकि इस हफ्ते जनमतसंग्रह कराने की मांग पिछले हफ्ते संसद ने ठुकरा दी. इसी महीने नीदरलैंड्स में 12 साल से कम उम्र के बच्चों को भी इच्छामृत्यु का अधिकार दे दिया गया. अब तक वहां नाबालिकों के मामले में 12 साल से अधिक उम्र के बच्चों या फिर माता पिता की सहमति से नवजात शिशु को यूथेनेसिया का अधिकार था.
न्यूजीलैंड में पिछले साल मदद से मौत की अनुमति संसद से मिल गई थी लेकिन सांसदों ने इसे लागू करने में जान बूझ कर देरी की ताकि लोगों की राय इस मामले में ली जा सके.
2020 में जर्मनी ने इच्छामृत्यु को ले कर कानून बदला है. लंबे समय से बीमार चल रहे लोग अब डॉक्टर की मदद से अपने जीवन का अंत करने का फैसला खुद ले सकेंगे. हालांकि कानून के अनुसार अगर डॉक्टर इससे सहमत नहीं है तो उसे मरीज का साथ देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
यह कानून 2021 से लागू हो जाएगा. इसके तहत मानसिक रूप से स्वस्थ एक व्यस्क अगर ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिसमें छह महीने के भीतर उसकी मौत होने की आशंका है और वह अगर "असहनीय पीड़ा" झेल रहा है, तो उसे जहरीली दवा दी जा सकती है. इसके लिए अनुरोध पत्र पर मरीज के डॉक्टर, एक अलग स्वतंत्र डॉक्टर के दस्तखत होने चाहिए और अगर किसी भी तरह से मानसिक समस्या का संदेह हो, तो एक मानसिक चिकित्सक की भी सलाह लेना जरूरी होगा.
न्यूजीलैंड के मौजूदा कानून के मुताबिक अगर कोई किसी को मरने में मदद देता है, तो उस पर आत्महत्या में मदद या विवश करने का आरोप लगेगा. इसके लिए उसे अधिकतम 14 साल की जेल या फिर हत्या का आरोप लग सकता है, जिसमें उम्रकैद की सजा होगी.
वास्तविकता में इस तरह के मामलों में जब भी किसी को अपराधी करार दिया गया है, तो अदालतों ने गैर हिरासती सजाएं सुनाई हैं. देश की प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने मृत्यु के अधिकार बिल का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि वे ना चाहते हुए भी जनमतसंग्रह के लिए इसलिए तैयार हुईं क्योंकि विधेयक को आगे बढ़ाने का सिर्फ यही तरीका था.
एनआर/आईबी (एएफपी)(dw.com)
- चिंकी सिन्हा
वारदात के तीसरे दिन, लोगों के बीच से उठ रही आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थी - 'या तो मुल्ज़िम को फांसी दो, या फिर उसका एनकाउंटर कर दो.'
फ़रीदाबाद के नेहरू कॉलेज में पढ़ने वाली कंचन डागर ने कहा कि, 'हत्यारे के साथ वही होना चाहिए, जैसा योगी के राज में होता है.'
कंचन, दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी हुई हैं.
कंचन ने पुरज़ोर आवाज़ में नारा लगाया, 'गोली मारो सा@% को… लव जिहाद मुर्दाबाद.'
कंचन के साथ, हरियाणा के बल्लभगढ़ स्थित अग्रवाल कॉलेज के सामने जमा दूसरे छात्रों ने भी यही नारा दोहराया. वो गुरुवार का दिन था.
सोमवार को इसी अग्रवाल कॉलेज के बाहर 21 बरस की एक छात्रा को सरेआम गोली मार दी गई थी. पुलिस ने हत्या के अभियुक्त को गिरफ़्तार कर लिया था.
लेकिन, कॉलेज के बाहर जमा छात्रों को ना तो पुलिस पर भरोसा है और ना ही न्यायपालिका पर यक़ीन है.
उन्हें इस घटना के इंसाफ़ का एक ही तरीक़ा मंज़ूर है कि दोषी का एनकाउंटर करके ही, मृत छात्रा और उसके परिजनों को इंसाफ़ दिलाया जा सकता था.
कंचन डागर ने सवालिया अंदाज़ में कहा कि, "गोली मारने वाला मुसलमान है. मरने वाली छात्रा हिंदू थी. मुल्ज़िम का परिवार, उस लड़की पर धर्म बदलकर मुसलमान बनने का दबाव बना रहा था. भारत में लव जिहाद के बहुत से मामले सामने आ रहे हैं. अगर कोई लड़की ना कर देती है, तो उसे मार दिया जाता है. अगर वो हाँ करती है, तो फिर उसकी लाश सूटकेस में मिलती है. हमने ऐसे बहुत से मामलों के बारे में पढ़ा है. क्या नियम क़ानून सिर्फ़ हमारे लिए हैं? और उनका क्या?"
'उनका' से कंचन का मतलब था - कांग्रेस पार्टी और मुसलमान.
कंचन के साथ मौजूद एक और छात्रा गायत्री राठौर ने एक और क़दम आगे जाते हुए कहा, "हम चाहते हैं कि उसे दस दिन के अंदर फांसी दे दी जाये. या उसका वैसे ही एनकाउंटर कर दिया जाये, जैसे योगी की सरकार में होता है. भले ही वो ग़ैर-क़ानूनी क्यों ना हो."
पूर्वाग्रहों और ख़ौफ़ का जोड़ जमा
सोमवार की दोपहर को बल्लभगढ़ के अग्रवाल कॉलेज के बाहर जिस छात्रा को गोली मार दी गई थी, उनका नाम निकिता तोमर था.
उस दिन निकिता जैसे ही कॉलेज के बाहर निकलीं, वैसे ही तौसीफ़ नाम के युवक ने उन्हें गोली मार दी.
निकिता, तौसीफ़ को जानती थीं. दोनों फ़रीदाबाद के रावल इंटरेनशनल स्कूल में साथ-साथ पढ़ा करते थे.
उस रोज़, निकिता की माँ उन्हें लेने के लिए कॉलेज जा ही रही थीं कि उनके पिता के पास फ़ोन आया कि उनकी बेटी को गोली मार दी गई है.
इस केस के कुछ तथ्य इस तरह से हैं कि एक युवक ने कॉलेज के बाहर एक छात्रा को देसी कट्टे से गोली मार दी और उसके बाद वो मौक़े से फ़रार हो गया.
इस बात की तस्दीक़, सड़क के उस पार स्थित डीएवी स्कूल में लगे सीसीटीवी कैमरे की तस्वीरों से होती है.
इसके अलावा बाक़ी सभी बातें, लोगों की सोच, उनके पूर्वाग्रहों और ख़ौफ़ का जोड़ जमा हैं जिसमें एक समुदाय के लोग, दूसरे समुदाय के सदस्यों को अपने से अलग बताते हैं. उनके बारे में बुरा भला कहते हैं. उनकी बुरी छवि पेश करते हैं जिससे ये साबित हो कि दूसरा पक्ष, उनसे बिल्कुल अलहदा है.
किसी एक समुदाय को अपने से अलग बताना इस सोच पर आधारित है कि वो समुदाय, दूसरों के अस्तित्व के लिए ख़तरा है. इस सोच को मीडिया और राजनेता ख़ूब बढ़ावा देते हैं.

'लव जिहाद' जिसकी कोई क़ानूनी परिभाषा नहीं
भारत के मौजूदा क़ानूनों में 'लव जिहाद' की कोई परिभाषा नहीं तय की गई है. अब तक किसी भी केंद्रीय एजेंसी ने 'लव जिहाद' जैसी किसी घटना का ज़िक्र भी नहीं किया है.
ये बात ख़ुद केंद्र सरकार ने इस साल फ़रवरी में संसद को बताई थी. और इस बयान के ज़रिए दरअसल, केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर ख़ुद को दक्षिणपंथी संगठनों के 'लव जिहाद' वाले दावों से अलग कर लिया था. जबकि, देश के कई दक्षिणपंथी संगठन, मुस्लिम युवकों और हिंदू लड़कियों के संबंधों को 'लव जिहाद' कहकर निशाना बनाते रहे हैं.
भारत के संविधान की धारा-25, देश के हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, अपनी आस्था के अनुरूप इबादत करने और अपने धर्म का प्रचार-प्रसार करने की आज़ादी देता है.
शर्त बस ये है कि किसी की धार्मिक गतिविधियों से नैतिकता, सामाजिक सौहार्द और किसी की सेहत को नुक़सान ना पहुँचे.
नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) और दूसरी जाँच एजेंसियों ने केरल में दो अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादियों की कई घटनाओं की जाँच की थी. इनमें, साल 2018 में बहुत चर्चित हुआ हादिया के निकाह का मामला भी शामिल था.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि 25 बरस की हादिया, अपने पति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र हैं.
भारतीय मूल के अमित और घाना की मिशेल की प्रेम कहानी.
सर्वोच्च अदालत ने इस मामले में केरल हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को भी रद्द कर दिया था जिसमें हादिया के पिता की अर्ज़ी पर, एक मुस्लिम युवक के साथ उसके निकाह को क़ानूनी तौर पर अमान्य घोषित कर दिया गया था.
लेकिन, करणी सेना के प्रमुख सूरजपाल अमू जो निकिता तोमर के घर भी पहुँचे थे, उनको इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सरकार इस बारे में क्या कहती है, और 'लव जिहाद' को लेकर अदालत ने क्या फ़ैसला सुनाया. उनके लिए तो ये घटना एक मौक़ा थी.
करणी सेना के नेता उत्तर प्रदेश और हरियाणा के साथ-साथ अन्य इलाक़ों से निकिता तोमर के घर फ़रीदाबाद पहुँचे थे. वो 'मुसलमानों को पाकिस्तान भेजो' के नारे लगा रहे थे और वो इस मामले में अपने तरीक़े से इंसाफ़ करना चाहते हैं.
सूरजपाल अमू ने ऐलान किया कि करणी सेना की अपनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) है और ये टीम देशभर में 'लव जिहाद' के मामलों का पता लगाएगी और अपने अंदाज़ में 'इंसाफ़' करेगी.
सूरजपाल अमू ने कहा, "आप किस क़ानून की बात कर रहे हैं? मुसलमानों के लड़के अपना नाम बदलकर मासूम हिन्दू लड़कियों को फंसा रहे हैं. हम ये बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे."

पूरे केस को दिया गया 'लव जिहाद' का एंगल
जहाँ तक निकिता का मामला है, तो कहा जा रहा है कि उन्होंने साल 2018 में तौसीफ़ के ख़िलाफ़ की गई शिक़ायत को वापस ले लिया था. इसमें उन्होंने तौसीफ़ पर निकिता के अपहरण का इल्ज़ाम लगाया था.
बाद में दोनों के परिवारों के बीच एक समझौता हुआ जिसमें तय किया गया कि तौसीफ़ अब निकिता को परेशान नहीं करेगा. मगर, तौसीफ़ की हरकतें बंद नहीं हुईं.
वो निकिता को परेशान करता रहा. इसी वजह से निकिता को कॉलेज छोड़ने के लिए उनकी माँ साथ जाया करती थीं ताकि उनकी बेटी महफ़ूज़ रहे, उसे तौसीफ़ से कोई दिक़्क़त ना हो.
लेकिन, बाद में निकिता की माँ ने बेटी को कॉलेज छोड़ने जाना और वापस ले आना बंद कर दिया. उन्हें लगा कि अब उनकी बेटी को तौसीफ़ तंग नहीं करता.
निकिता के परिजनों ने तौसीफ़ के ख़िलाफ़ की गई शिकायत को वापस ले लिया था.
उसकी एक वजह ये थी कि लड़की वाले होने के कारण उन्हें अपनी बदनामी होने का ज़्यादा डर था. इससे उन्हें बेटी की शादी में अड़चनें आने का अंदेशा था और अब इस केस में छेड़खानी का मामला हटा कर, पूरे केस को 'लव जिहाद' का एंगल दे दिया गया है.
इसी तरह, उत्तर प्रदेश के हाथरस बलात्कार कांड में पीड़ित लड़की के परिवार ने बार-बार ये बात कही थी कि उन्होंने बेटी के साथ बलात्कार की शिक़ायत सिर्फ़ इसलिए नहीं की थी, क्योंकि इससे उन्हें अपनी बेटी की बदनामी का डर था, जिसका दंश उन्हें जीवन भर झेलना पड़ता.
लेकिन, निकिता के मामले पर नाराज़गी जता रही छात्राओं ने सहूलियत के हिसाब से सेलेक्टिव रुख़ अपनाया हुआ था.
उन्होंने पहले ही ये तय कर लिया कि निकिता की हत्या असल में 'लव जिहाद' है. उन्हें ये पता ही नहीं कि इस जुमले का कोई क़ानूनी आधार नहीं है. लेकिन, निकिता के कॉलेज और उसके घर के बाहर ये नारेबाज़ी जारी रही.
हरियाणा के सोहना रोड पर स्थित ये एक मध्यम वर्गीय सोसाइटी है. यहीं पर निकिता, एक छोटे से अपार्टमेंट में अपने परिवार के साथ रहती थीं. उनका मकान ग्राउंड फ़्लोर पर है जिसमें दो कमरे हैं.
घर पर आने-जाने वालों के बैठने के लिए, बाहर एक तंबू लगाकर उसमें गद्दे बिछा दिए गए थे. दूर-दूर से, अलग-अलग संगठनों के लोग निकिता के घर पहुंच रहे थे. निकिता के माँ-बाप से बेटी की हत्या पर अफ़सोस जता रहे थे क्योंकि 'उस लड़की ने अपना मज़हब बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी.'
अब निकिता को उसकी मौत के बाद एक नायिका, एक 'क्षत्राणी' के तौर पर पेश किया जा रहा है जिसके 'क़त्ल का बदला राजपूत लेने वाले हैं.'
लगभग 50 बरस की स्वदेशी, उसी सोसाइटी के पड़ोस वाले ब्लॉक में रहती हैं.
वे निकिता को याद करते हुए कहती हैं, "मैं उसे जानती थी. वो बहुत प्यारी लड़की थी. इंसाफ़ ज़रूर होना चाहिए. अभियुक्त को उसी जगह पर खड़ा करके गोली मार देनी चाहिए. यही इंसाफ़ होगा."
महेंद्र ठाकुर, दिल्ली से निकिता के घर पहुँचे थे. हमदर्दी जताने के लिए महेंद्र ने कहा कि 'वो निकिता की बिरादरी से ही हैं.'
उन्होंने कहा, "अगर क़ानून ने उसे सज़ा नहीं दी, तो हम देंगे. ठाकुरों का कोई भी लड़का उसे मार डालेगा. ये ज़रूर होगा. हम राजपूत हैं. वो ज़िंदा नहीं बचेगा. उसकी मौत होगी."
एक क़ौम से बदला लेने का प्रण
हरी दीवारों वाले उस अपार्टमेंट के लिविंग रूम के भीतर, एक न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर ने निकिता की माँ को पकड़ रखा था. कैमरे लगा दिए गए थे और रिपोर्टर ने निकिता की माँ के बाल ठीक किए.
फिर उनके पिता से कहा कि वो उनके बगल में आकर बैठ जाएं. उसके बाद रिपोर्टर ने कैमरे की तरफ़ रुख़ करके कहा कि क्या एक लड़की का बाप बदला नहीं लेगा. इसके बाद वो 'लव जिहाद' पर काफ़ी देर तक अपनी बात कहती रहीं.
उस रिपोर्टर ने कहा कि समय आ गया है जब महिलाएं अपनी इज़्ज़त के लिए खड़ी हों और 'लव जिहाद' का डटकर मुक़ाबला करें.
ये कमरा अब दूसरे समुदाय को निशाना बनाने का अड्डा बन चुका था. वहीं बाहर का माहौल और भी हिंसक हो गया था.
मुस्लिम समुदाय के बहिष्कार की आवाज़ बुलंद की जा रही थी. उन्हें सबक़ सिखाने के लिए पाकिस्तान भेज देने के नारे लगाए जा रहे थे.
मौक़े पर मौजूद पुलिसवाले, थोड़ी दूरी बनाकर खड़े थे. कुछ लोग युवाओं से पूछ रहे थे कि क्या वो एक हिंदू लड़की के क़त्ल का बदला लेने को तैयार हैं? और पुलिसवाले बस तमाशबीन बने हुए थे.
मेज़ पर उन्होंने निकिता की तस्वीर लगा दी थी. जिस पर फूलों की माला चढ़ा दी गई थी. तस्वीर में निकिता नीले रंग के जम्पर में थीं. तस्वीर में उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट थी.
यहीं पर घूंघट काढ़े आ रही महिलाएं जमा होकर, निकिता को श्रद्धा के फूल अर्पित कर रही थीं.
निकिता की माँ विजयवती अक्सर रोने लगती थीं. वो बार-बार ये दोहरा रही थीं कि उनकी बेटी बहुत बहादुर थी. उनके पास अपनी बेटी जैसा साहस नहीं है. अगर कोई उन्हें बंदूक़ की नोंक पर गाड़ी में बैठने को कहता, तो वो ज़रूर बैठ जातीं.
विजयवती की बहन गीता देवी बार-बार ये कह रही थीं कि, "मेरी भांजी ने हिंदू धर्म के लिए अपनी जान दे दी. अगर वो उस दिन कार में बैठ जाती तो फिर उसकी माँ अपनी बेटी की इस कायरता के साथ कैसे ज़िंदगी बिता पाती."
गीता देवी ने विजयवती को ढांढस बंधाते हुए कहा कि, "बहन अब तुम इस फ़ख़्र के साथ जी सकती हो कि तुम्हारी बेटी बड़ी बहादुर थी."
माँ कह रही थीं कि निकिता नेवी लेफ़्टिनेंट बनना चाहती थी. और उसने 15 दिन पहले ही भर्ती की परीक्षा दी थी. इम्तिहान देने के बाद उसे यक़ीन था कि वो चुन ली जाएगी.
मौसी गीता ने कहा कि, "वो अफ़सर बनकर देश की सेवा करना चाहती थी."
माँ ने कहा कि बेटी को स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता था. वो रुकती ही नहीं थी.

राज्य सरकार और 'लव जिहाद' के एंगल से जाँच
हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज ने कहा कि 2018 में निकिता के परिवार ने तौसीफ़ के ख़िलाफ़ जो FIR कराई थी, उसकी भी जाँच करने की ज़रूरत है. इस मामले की तफ़्तीश के लिए बनी SIT पुरानी FIR की भी जाँच करेगी.
अनिल विज ने ये भी कहा कि इस मामले की जाँच 'लव जिहाद' के एंगल से भी किए जाने की ज़रूरत है.
विज ने संकेत दिया कि 2018 में कांग्रेस ने निकिता के परिवार पर दबाव बनाकर तौसीफ़ के ख़िलाफ़ अपहरण का वो केस वापस कराया था जिसे फ़रीदाबाद में 1860 के इंडियन पीनल कोड के तहत दर्ज किया गया था.
वो एफ़आईआर 2 अगस्त 2018 को दर्ज कराई गई थी जिसमें निकिता के पिता मूलचंद तोमर ने आरोप लगाया था कि उनकी 18 साल की बेटी को अग्रवाल कॉलेज के बाहर से अगवा कर लिया गया था.
मौत के ख़तरे के बीच अंतरजातीय शादी और प्यार की कहानी
मूलचंद ने अपनी एफ़आईआर में तौसीफ़ को अभियुक्त बनाया था. उन्होंने कहा था कि निकिता की माँ को अभिषेक नाम के एक व्यक्ति का फ़ोन आया था जिसने बताया कि निकिता ने उसे कॉल करके बोला कि तौसीफ़ ने उसे अगवा कर लिया और अभिषेक ये बात निकिता के घरवालों को बता दे.
निकिता के घर पहुँचे जो लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे थे, उन्हें याद करते हुए बार-बार धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ उनकी ज़िद को सलाम कर रहे थे, उनमें कोई ये नहीं कह रहा था कि उसे इकतरफ़ा प्यार करने वाला एक युवक लगातार उसका पीछा करता रहा था.
छेड़खानी और पीछा करना एक अपराध है और देश में बहुत सी महिलाओं को किसी के मुहब्बत के प्रस्ताव को ठुकराने की भारी क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है.
प्रेम प्रस्ताव ठुकराने का ख़मियाज़ा भुगतती औरतें
जनवरी 2020 तक के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े कहते हैं कि साल 2018 में हर 55 मिनट में पीछा करने का एक केस देश में कहीं ना कहीं दर्ज होता है.
उस साल छेड़खानी और पीछा करने के 9 हज़ार, 438 मामले दर्ज किये गए थे जो साल 2014 में दर्ज किये गए ऐसे मामलों से दोगुने अधिक थे.
NCRB का डेटा कहता है कि पीछा करने और छेड़खानी के इन 9438 केस में से महज़ 29.6 प्रतिशत केस में ही सज़ा हुई.
पीछा करने की घटनाओं को अक्सर पीड़िता के यौन अपराधों की दूसरी शिकायतों के साथ जोड़कर देखा जाता है. ये बात हाथरस वाले मामले में भी देखी गई थी, जहाँ लड़की के किरदार को सवालों के घेरे में खड़ा किया गया था.
भारत में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जहाँ महिलाओं को किसी इंसान के प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार करने का ख़मियाज़ा एसिड अटैक जैसे निर्मम अपराध के तौर पर भुगतना पड़ा है क्योंकि मर्द किसी महिला द्वारा रिजेक्ट किये जाने को और अपनी सीमाओं का सम्मान कर पाने में असफल रहे.
ख़बरों के मुताबिक़, निकिता की हत्या का अभियुक्त तौसीफ़ दो दिन पहले कॉलेज गया था. लेकिन तब वो निकिता से नहीं मिल पाया था.
निकिता की हत्या के बाद उसके परिवार ने जो एफ़आईआर दर्ज कराई है, उसमें इस बात का ज़िक्र है कि तौसीफ़ उनकी बेटी को परेशान कर रहा था.
पुलिस का कहना है कि तौसीफ़ ने अपना जुर्म क़बूल कर लिया है. उसका कहना है कि वो निकिता से प्यार करता था, लेकिन जब निकिता ने उसका फ़ोन उठाना बंद कर दिया, तो उसने निकिता को 'सबक़ सिखाने' का फ़ैसला किया.
पुलिस अब निकिता के परिवार के उस आरोप की भी जाँच कर रही है कि तौसीफ़ और उसका परिवार निकिता पर धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनने और निकाह करने का दबाव बना रहे थे. गुरुवार को मूलचंद तोमर ने इन आरोपों को दोहराया.
बीबीसी के पास एफ़आईआर की जो कॉपी मौजूद है, उसमें अब तक तो निकिता पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने की बात नहीं दर्ज की गई है.
लेकिन अब जो माहौल बनाया जा रहा है, वो यही है कि निकिता अपने धर्म का बचाव कर रही थी, वो एक हिन्दू लड़की थी और इस्लाम क़ुबूल करने को तैयार नहीं थी.
लड़की की मौसी का कहना था कि "निकिता तो तौसीफ़ की धमकियों के बावजूद, अपना मज़हब बदलने को राज़ी नहीं हुई. उसने अपना धर्म बचा लिया. इसीलिए आज उसकी चौखट पर इतने लोग जमा हो रहे हैं."
निकिता की माँ ने भी अपनी कमज़ोर आवाज़ में यही बात दोहराई और कहा कि 'उन्हें इंसाफ़ चाहिए. तौसीफ़ का एनकाउंटर चाहिए.'
'लव जिहाद' की जाँच का हाल
लव जिहाद के जुमले ने पहली बार साल 2009 में देश भर में सुर्ख़ियाँ बटोरी थीं. तब केरल में ज़बरन धर्म परिवर्तन कराने के आरोप लगे थे और उसके बाद कर्नाटक में भी यही आरोप लगाये गए थे.
हालांकि, क़रीब दो साल की जाँच के बाद साल 2012 में केरल पुलिस ने कहा था कि 'लव जिहाद' का शोर बेवजह ही मचाया जा रहा है, शादी के लिए धर्म परिवर्तन करने के आरोपों में कोई दम नहीं है.
सितंबर 2014 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने भी अपनी जाँच में पाया था कि उससे 'लव जिहाद' यानी शादी के लिए धर्म परिवर्तन के जिन छह मामलों की शिक़ायत की गई थी, उनमें से पाँच में कोई दम नहीं है. पर ये महज़ कुछ तथ्य हैं.
मौजूदा माहौल में धर्म परिवर्तन और 'लव जिहाद' के इल्ज़ाम लगाने की नई ज़मीन तैयार हो गई है.
निकिता के पिता मूलचंद तोमर कहते हैं, "जब हम पर पुराना वाला केस वापस लेने का दबाव बनाया गया था, तो उसके बाद हम यहाँ से चले जाना चाहते थे."
मूलचंद ने ये बोला तो रिपोर्टर ने उनसे कहा कि, "आप क्यों ये जगह छोड़ कर जाएंगे? आपके साथ तो पूरा मीडिया है."
इसके बाद उस रिपोर्टर ने अपने दर्शकों से जज़्बाती अपील करते हुए कहा कि 'वो समझें कि निकिता का परिवार यहाँ किस मुश्किल में रह रहा है. हिंदुओं की बहुसंख्यक आबादी वाले देश मे एक हिंदू परिवार ही ख़तरे में है.'
कौन है तौसीफ़
तौसीफ़ का ताल्लुक़ एक सियासी ख़ानदान से है. तौसीफ़ के दादा चौधरी कबीर अहमद, हरियाणा के नूँह से साल 1975 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे.
1982 में भी तौसीफ़ के दादा, कांग्रेस के टिकट पर हरियाणा की तवाड़ू सीट से विधायक चुने गए थे.
हरियाणा के एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि तब से तौसीफ़ का ख़ानदान कोई भी चुनाव नहीं हारा है. हालांकि, ये आरोप बेबुनियाद है कि कांग्रेस इस मामले में अभियुक्त की मदद कर रही है.
कांग्रेस की हरियाणा प्रदेश की अध्यक्ष कुमारी शैलजा भी मंगलवार को निकिता के परिवार से मिलने पहुँची थीं. उन्होंने कहा था कि 'इस अपराध से कांग्रेस का क्या संबंध है?'
तौसीफ़ के चाचा जावेद अहमद, पिछले साल हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीएसपी के टिकट पर मैदान में उतरे थे, पर वे चुनाव हार गए थे.
तौसीफ़ की बहन हरियाणा पुलिस में DSP तारिक़ हुसैन से ब्याही हैं.
सोहना में जावेद अहमद का लाल पत्थर से बना विशाल बंगला है. दोपहर के वक़्त जब हम वहाँ पहुंचे, तो कुछ मज़दूर काम में लगे हुए थे. कुछ बन रहा था.
बाद में, जब जावेद अहमद वहाँ पहुँचे तो कहा कि तौसीफ़ की अम्मी बीमार हैं और उसके पिता यहाँ हैं नहीं. पास में ही एक और बड़ा सा मकान था जो लाल बलुआ पत्थरों से ही बना था. जावेद अहमद ने बताया कि ये उनके बड़े भाई का मकान है और वे खेती करते हैं.
तौसीफ़ को बल्लभगढ़ पढ़ने के लिए भेजा गया था क्योंकि हरियाणा के मेवात इलाक़े में अच्छे स्कूल नहीं हैं, और उस समय कोई और विकल्प भी नहीं था. वहीं स्कूल में उसकी मुलाक़ात निकिता से हुई और दोनों में परिचय हो गया.

'तौसीफ़ को उसके किये की सज़ा मिले'
जावेद अहमद ने कहा, "मैं अब इस बारे में और बात नहीं करना चाहता क्योंकि हम पर भला कौन यक़ीन करेगा. हम तो मुसलमान ठहरे. दोनों साथ पढ़ते थे और वो उसे मैसेज करने या फ़ोन करने के लिए भला अपना नाम क्यों बदलेगा? हमें इस घटना पर बहुत अफ़सोस है. हम समझ सकते हैं कि लड़की के माँ-बाप पर क्या बीत रही होगी. जब पुलिस ने हमें फ़ोन किया तो हमने तौसीफ़ को उनके सुपुर्द कर दिया था."
चाचा कहते हैं, "तौसीफ़ एक भला लड़का था. वो ना सिगरेट पीता था और ना ही शराब को कभी हाथ लगाया. लेकिन, अब मैं कुछ और नहीं कहना चाहता. उसे उसके किये की सज़ा मिलनी चाहिए."
हालांकि, जावेद अहमद ने ये ज़रूर कहा कि इसे 'लव जिहाद' का मामला बनाया जा रहा है ताकि पूरे मामले को हिन्दू-मुस्लिम विवाद में तब्दील किया जा सके.
जावेद अहमद पूछते हैं, "लव जिहाद क्या है? क्या आप मुझे बता सकती हैं? बहुत से हिन्दू लड़के भी मुस्लिम लड़कियों से ब्याह करते हैं. दोनों समुदायों में बहुत से संबंध ऐसे हैं. आख़िर दोनों समुदायों के लोग आपस में शादी क्यों नहीं कर सकते?"
जब आप निकिता के घर से बाहर निकलते हैं, तो लड़की की तस्वीर पर लटक रही माला नज़र आती है. वो लड़की जिसे स्कूल जाना और पढ़ना बहुत अच्छा लगता था. जो अपनी माँ के लिए खाना पकाया करती थी और जो बहुत सी दूसरी लड़कियों की तरह कपड़े की गुड़िया अपने पास रखती थी.
वो ऐसी लड़की थी जिसके हज़ारों ख़्वाब थे. जो किसी भी आम लड़की के होते हैं. उस लड़की के साथ भी वही छेड़खानी और पीछा किये जाने की घटना हुई थी, जो बहुत सी लड़कियों की ज़िन्दगी में होता है.
लेकिन अब वो ऐसी लड़की बन गई है, जिसकी ज़िंदगी और मौत पर ऐसे लोग क़ाबिज़ हो गए हैं, जिनका उससे कोई वास्ता नहीं था. ठीक वैसे ही, जैसे किसी और आम लड़की के साथ होता है.(bbc)


