विचार/लेख
असम में अल्पसंख्यक स्कूली छात्रों के स्कॉलरशिप की रकम में घोटाले का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने 21 लोगों को गिरफ्तार किया है. अब तक 10 करोड़ रुपये के घोटाले का पता चला है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट-
लेकिन पुलिस का कहना है कि अभियुक्तों से पूछताछ के बाद ही असली रकम का पता चलेगा. इससे पहले झारखंड में भी ऐसा घोटाला सामने आ चुका है. सब कुछ डिजीटल तरीके से होने के बावजूद बड़े पैमाने पर चलने वाले इस घोटाले के सामने आने पर हैरत जताई जा रही है. असम में बीते साल भी सरकार ने ऐसे एक घोटाले की बात कबूल की थी. असम में सीआईडी ने इस मामले में राज्य के चार जिलों से कम से कम 21 लोगों को गिरफ्तार किया है. अभियुक्तों में चार हेड मास्टरों के अलावा एक शिक्षक भी शामिल है. यह घोटाला 2018-19 और 2019-20 के दौरान आवंटित रकम के वितरण में हुआ है. असम अल्पसंख्यक कल्याण बोर्ड के निदेशक और उक्त स्कॉलरशिप योजना के नोडल अधिकारी महमूद हसन की शिकायत के आधार पर इस मामले की जांच शुरू की गई और राज्य के विभिन्न जगहों पर छापे मार कर अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है.
सीआईडी की ओर से गुवाहाटी में जारी एक बयान में कहा गया है कि जांच के दौरान मिले सबूतों के आधार पर ग्वालपाड़ा, दरंग, कामरूप और धुबड़ी जिलों से स्थानीय पुलिस के सहयोग से अब तक 21 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी), 406, 409, 419, 420, 468 और 471 के तहत एक मामला दर्ज किया गया है. सीआईडी के आईजी सुरेंद्र कुमार बताते हैं, "छह लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया है जबकि बाकी अभियुक्त चार दिनों की पुलिस रिमांड पर हैं. सीआईडी की टीम ने अभियुक्तों के कब्जे से तीन लैपटॉप के अलावा 217 छात्रों की तस्वीरें, स्कॉलरशिप के लिए 173 आवेदन पत्र और 11 बैंक पासबुक भी जब्त किए गए हैं.”
इस मामले की जांच कर रहे सीआईडी के एक अधिकारी बताते हैं कि गिरफ्तार लोगों में ग्राहक सेवा केंद्र के तीन मालिक, 10 बिचौलिए, स्कूल प्रबंध समिति का एक अध्यक्ष और तीन इलेक्ट्रॉनिक डाटा प्रोसेसरों के शामिल होने से पता चलता है कि यह घोटाला एक संगठित गिरोह के जरिए अंजाम दिया जा रहा था. जांच अधिकारियों का कहना है कि इस योजना के तहत स्कॉलरशिप के लिए छात्रों का दो स्तरों पर सत्यापन किया जाता है. पहला सत्यापन स्कूल के स्तर पर होता है और दूसरा जिले के स्तर पर. लेकिन घोटाले में शामिल लोग हेडमास्टरों के लॉगिन और पासवर्ड में सेंध लगा कर सिस्टम में घुसने और घोटाला करने में कामयाब रहे थे.

असम का स्कूल बिहार में
इस घोटाले में असम के शिवसागर जिले के नाजिरा स्थित एक केंद्रीय विद्यालय को तो बिहार का स्कूल बता दिया गया है. यही नहीं, यह स्कूल बिहार के छह अलग-अलग जिलों की सूची में शामिल है. बीते दिनों दिल्ली से छपने वाले एक अंग्रेजी अखबार ने इस घोटाले की रिपोर्ट की थी. उक्त स्कूल के नाम पर बिहार में 39 लाभार्थियों के नाम पर स्कॉलरशिप की रकम वसूली जा चुकी है. केंद्रीय विद्यालय के प्रिंसिपल अखिलेश्वर झा बताते हैं, "जिन लोगों के नाम इस स्कूल के छात्र के तौर पर दर्ज हैं, वे सब फर्जी हैं. हमारे रजिस्टर में उन छात्रों के नाम ही नहीं हैं. लेकिन दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया और पूर्वी चंपारण जिलों में रहने वाले छात्रों को इस केंद्रीय विद्यालय का छात्र बता कर उनके नाम स्कॉलरशिप की रकम उठाई जा चुकी है.”अखिलेश्वर झा बताते हैं कि इस साल भी असम सरकार के जिला कल्याण अधिकारी ने एक मेल भेज कर छात्रों के नामों की पुष्टि करने को कहा था. लेकिन हमने जांच में पाया कि उनमें से कोई भी कभी इस विद्यालय का छात्र नहीं रहा है. हमने स्कूल के स्तर पर उनके फॉर्म का सत्यापन भी नहीं किया था. उन तमाम फॉर्मों में स्कूल के ही एक कंप्यूटर शिक्षक का नाम कॉन्टैक्ट पर्सन के तौर पर दर्ज था. इसकी गहन जांच की जानी चाहिए.
असम सरकार ने इससे पहले बीते साल फरवरी में भी विधानसभा में माना था कि अल्पसंख्यक छात्रों को दी जाने वाली मैट्रिक-पूर्व स्कॉलरशिप योजना में घोटाला हुआ है और सीआईडी को इस मामले की जांच सौंपी गई है. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक अमीनुल इस्लाम की ओर से पूछे गए एक सवाल के जवाब में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रंजीत दत्त ने कहा था कि इस मामले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. हालांकि मंत्री ने यह नहीं बताया था कि घोटाला कितना बड़ा है. दत्त ने कहा था कि असम के सभी जिलों में जांच चल रही है. मोरीगांव और बरपेटा में दो शिक्षकों के अलावा बैंक ग्राहक सेवा केंद्र के दो कर्मचारियों और एक बिचौलिए को गिरफ्तार किया जा चुका है.
क्या है योजना
प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम नामक यह योजना 2008 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने शुरू की थी. इसके तहत एक लाख से कम सालाना आय वाले मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध परिवारों के छात्रों को सालाना 10,700 रुपये की स्कॉलरशिप दी जानी थी. इसके लिए छात्रों को स्कूली परीक्षा में कम से कम 50 फीसदी नंबर लाना अनिवार्य है. पहली से पांचवीं कक्षा के छात्रों को सालाना एक हजार और छठी से दसवीं तक 5,700 रुपये दिए जाते हैं. लेकिन छठी से दसवीं तक के छात्र अगर हॉस्टल में रहते हों, तो उन्हें सालाना 10,700 रुपये मिलते हैं. सबसे ज्यादा घोटाला इसी वर्ग में हुआ है.
दिलचस्प बात यह है कि योजना में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होती है. छात्रों को ऑनलाइन आवेदन करना होता है और पैसे भी सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर किए जाते हैं. बावजूद इसके यह योजना भ्रष्टाचार के गहरे दलदल में डूबी है. एक शिक्षाविद मनोरंजन गोस्वामी कहते हैं, "इस घोटाले से साफ है कि ऑनलाइन प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं है. इनमें स्कूली शिक्षकों के साथ ही कंप्यूटर विशेषज्ञ भी शामिल हैं. सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए इस पूरी योजना की गहन जांच कर दोषियों को सख्त सजा देनी चाहिए.”
ऊपरी असम के एक स्कूल में पढ़ाने वाले सुजित कुमार कहते हैं, "खासकर अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों में स्थित स्कूलों में केंद्र की ओर से मिलने वाली स्कॉलरशिप की रकम में घोटाले का इतिहास तो दशकों पुराना है. वहां स्कूली शिक्षक स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलीभगत से स्कूलों में फर्जी दाखिला दिखा कर सालाना करोड़ों का घोटाला करते रहे हैं. इलाका बेहद दुर्गम होने की वजह से उन स्कूलों में कभी कोई अधिकारी जांच के लिए नहीं जाता. इसी का फायदा उठा कर दशकों ऐसे घोटाले जारी रहे थे. केंद्र सरकार स्थानीय लोगों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए हर साल करोड़ों रुपये भेजती थी. पहले तो सारी कवायद मैनुअल थी. लेकिन अब डिजिटल तकनीक के बावजूद घोटालेबाजों ने उसकी काट तलाश ली है. यह मुद्दा बेहद गंभीर है.”(dw.com)
हांगकांग का पूरा लोकतंत्र समर्थक विपक्ष एक साथ विधान परिषद से इस्तीफा देने जा रहा है. चीन-समर्थक सरकार द्वारा विपक्ष के चार लोकतंत्र-समर्थक विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद विपक्ष ने ये कदम उठाया है.
हांगकांग के 15 विधायकों ने बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर घोषणा कर दी कि वे सब 70 सीटों वाली विधान परिषद में अपनी सीटें छोड़ देंगे. इस तरह वे हांगकांग सरकार के उस उस फैसले पर विरोध जता रहे हैं जिसमें उसने चार ऐसे विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया है जो लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का साथ देते आए हैं.
इसके ठीक पहले, दो दिनों तक चीन में चली नेशनल पीपुल्स कांग्रेस स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में यह प्रस्ताव पास हुआ कि जो कोई भी हांगकांग की आजादी का समर्थन करेगा, शहर पर चीन के आधिपत्य को नहीं मानेगा, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालेगा या बाहरी शक्तियों से शहर की गतिविधियों में हस्तक्षेप करने की मांग करेगा, उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा. हांगकांग के इन चार विधायकों पर विदेश से मदद मांगने के ऐसे ही आरोप लगाए गए थे.
हांगकांग में लोकतंत्र-समर्थक खेमे के समन्वयक वू ची-वाई ने पत्रकारों से कहा, "हम सब अपने पदों से इस्तीफा देने जा रहे हैं क्योंकि हमारे साथियों, हमारे सहकर्मियों को केंद्र सरकार ने एक निर्मम चाल चलते हुए अयोग्य घोषित कर दिया.'' इसके साथ ही उन्होंने बताया कि आगे आती दिख रही ऐसी तमाम मुश्किलों के बावजूद वे "लोकतंत्र के भविष्य के लिए अपनी लड़ाई कभी भी नहीं छोड़ेंगे.''
वू ने बताया कि सभी प्रो-डेमोक्रेसी सांसद अपना इस्तीफा गुरुवार शाम को सौंपने वाले हैं. हांगकांग सरकार के इस कदम को "असल में बीजिंग का किया धरा" बताते हुए एक अन्य प्रो-डेमोक्रेसी सांसद क्लाउडिया मो ने कहा कि यह हांगकांग में लोकतंत्र की लड़ाई का गला घोंटने की कोशिश है.
हाल के महीनों में चीन ने हांगकांग में विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसमें जून में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लागू करना सबसे अहम कदम माना जा सकता है. इस कानून के विरोध में हांगकांग में पिछले साल से ही युवाओं के आंदोलनों की आग धधक रही थी लेकिन फिर भी चीन ने आगे बढ़कर उसे लागू कर दिया.
कैरी लैम की सरकार द्वारा अयोग्य करार दिए गए चार सांसद.
हांगकांग सरकार द्वारा अयोग्य करार दिए गए चार विधायकों में से एक क्वोक का-की ने कहा, "वैधता और संवैधानिकता के लिहाज से देखें तो यह साफ तौर पर बेसिक लॉ और सार्वजनिक मामलों में हिस्सा लेने के हमारे अधिकार का उल्लंघन है.'' हांगकांग का मिनी संविधान बेसिक लॉ कहलाता है.
हांगकांग की प्रमुख कैरी लैम ने मीडिया से बातचीत में कहा कि विधायकों को उचित तरीके से पेश आना चाहिए और हांगकांग शहर को "देशभक्त विधायकों" की जरूरत है. प्रो-डेमोक्रेसी आंदोलन के समर्थक सभी विधायकों के इस्तीफे के बाद हांगकांग की विधान परिषद में केवल चीन-समर्थक कानून निर्माता ही बचेंगे. पहले से ही वहां चीन-समर्थक सदस्य बहुमत में थे लेकिन भविष्य में विपक्ष के अनुपस्थित होने के कारण कोई भी चीन-समर्थक कानून बिना किसी बहस या विरोध के पास कराया जा सकेगा.
हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों पर बीते साल से ही विश्व भर की नजरें लगी हैं. अमेरिका और जर्मनी समेत कई पश्चिमी देशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को लागू होने के बाद इस पर सख्त प्रतिक्रियाएं भी दीं और कई देशों ने हांगकांग से अपनी प्रत्यर्पण संधियां तोड़ लीं. अमेरिका ने तो कैरी लैम और उनकी सरकार के प्रमुख लोगों के अमेरिका में प्रवेश करने पर भी रोक लगा दी. ऐसे सभी कदमों का चीन ने विरोध किया है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने साफ कहा है कि "हांगकांग चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है'' और हांगकांग पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया को "चीनी राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप" माना जाएगा.
आरपी/एमजे (एपी, रॉयटर्स)(dw.com)
कोरोना संकट के दौरान भारत में पहली बार बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा भले ही नीतीश कुमार का रहा हो, किंतु जीत का मार्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही प्रशस्त किया.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-
बिहार विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर में अंतत: जीत एनडीए को मिल गई. सरकार बनाने के जादुई आंकड़े 122 को पार कर एनडीए ने 125 सीटों पर जीत हासिल की. महागठबंधन को 110 सीट मिली जबकि आठ सीटें असदुद्दीन ओवैसी की एएमआइएमआइएम समेत अन्य के खाते में गई. दलों के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो 75 सीट पाकर राजद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. कांग्रेस को 19 तथा वामदलों को 16 सीटों पर जीत हासिल हुई. इधर एनडीए में भाजपा को 74, जदयू को 43, हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा तथा विकासशील इंसान पार्टी को चार-चार सीटें मिलीं. एनडीए को कुल वोट का 34.8 प्रतिशत तो महागठबंधन को भी इतना ही मत हासिल हुआ. हालांकि मतों की गिनती के बाद राजद ने हेराफेरी का आरोप लगाते हुए पुनर्गणना की मांग चुनाव आयोग से की. राजद ने दस सीटों पर तो जदयू व भाजपा ने एक-एक सीटों पर दोबारा गिनती की मांग की है.
पीएम मोदी के दौरे ने बदला रूख
प्रधानमंत्री मोदी विधानसभा चुनाव के दौरान चार बार बिहार आए और 12 जनसभाओं को संबोधित किया. इन जनसभाओं के जरिए उन्होंने करीब 94 विधानसभा क्षेत्रों के मतदाताओं को कवर किया. जिन 12 विधानसभा क्षेत्रों में उनकी सभाएं हुईं उनमें नौ पर एनडीए को जीत हासिल हुई. पहले चरण के चुनाव के बाद की सभाओं में पीएम मोदी ने छठ पूजा के साथ भारत माता और भगवान श्रीराम की चर्चा की. साथ ही उन्होंने जंगलराज की बात कहते हुए तेजस्वी को जंगलराज का युवराज करार दिया तथा जंगलराज के भविष्य के परिणाम की चर्चा करते हुए विकास के नाम पर वोट मांगे. उन्होंने युवराजों की चर्चा करते हुए कहा था कि जैसे यूपी में दो युवराज (अखिलेश-राहुल) नहीं चले वैसे बिहार में भी दो युवराजों (राहुल-तेजस्वी)की जोड़ी नहीं चलेगी. उन्होंने अपहरण को राजद का कॉपीराइट तक कहा था. उन्होंने चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में राज्य की जनता के नाम एक पत्र भी लिखा और कहा कि बिहार में सुशासन के लिए एनडीए की सरकार का दोबारा बनना जरूरी है.
तेजस्वी यादव ने दी टक्कर
उनकी बातों का असर हुआ और दूसरे चरण के चुनाव में चंपारण में एनडीए ने बेहतर प्रदर्शन किया. वहीं तीसरे चरण के चुनाव में सभी पूर्वानुमानों को उलटते हुए एनडीए ने सीमांचल व कोसी की 78 सीटों में से 52 पर कब्जा जमाया. पीएम मोदी की देशभक्त ईमानदार विकास पुरुष तथा नीतीश कुमार की सुशासन वाले व विकास पुरुष की छवि तेजस्वी के लोकलुभावन वादों पर अंतत: भारी पड़ी. तीसरे चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन अंतिम सभा में नीतीश के आखिरी चुनाव के एलान ने भी हवा का रूख काफी हद तक मोड़ दिया. कहा जाए तो इमोशनल कार्ड चल गया. वहीं राहुल गांधी की बात करें तो उन्होंने आठ विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभा की जिनमें महज तीन पर महागठबंधन को जीत मिल सकी. वहीं पटना में बचपन बिताने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बखूबी चुनाव संचालन किया. तेजस्वी के किए गए वादों पर वे खासे आक्रामक रहे. उन्होंने यहां तक कहा कि चुनाव हार जाना स्वीकार है, लेकिन गलत आश्वासन देना मंजूर नहीं है.
लोजपा ने एनडीए को पहुंचाया करारा नुकसान
चुनाव परिणाम की सबसे अहम बात रही कि जदयू के सीटों की संख्या भाजपा के मुकाबले काफी कम हो गई तथा बड़े-बड़े दावे करने वाली लोजपा बुरी तरह धाराशायी हुई. स्थिति इतनी खराब हुई कि चिराग पासवान अपने चचेरे भाई कृष्ण राज को भी जीत नहीं दिला सके. किंतु लोजपा जदयू को नुकसान पहुंचाने में कामयाब रही. हालांकि लोजपा की करनी का नुकसान भाजपा को भी उठाना पड़ा. लगभग 37 सीटों पर एनडीए की हार लोजपा के द्वारा वोट काटे जाने के कारण हुई. तभी तो सोशल मीडिया में किसी ने ट्रोल किया था, "मोदी के हनुमान ने तो लंका की बजाय अयोध्या को ही फूंक डाला."
वैसे चिराग ने कहा भी था, भाजपा से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं. उन्होंने भाजपा के कुछ प्रत्याशियों के खिलाफ तथा जदयू के सभी प्रत्याशियों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे थे. लोजपा की वजह से ही जदयू के पांच तो भाजपा के दो मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा. चिराग पासवान ने चुनाव परिणाम आने के बाद मंगलवार को कहा भी, "हम अपने उद्देश्य में सफल रहे. हमारा संगठन राज्य में मजबूत हुआ है. मैंने भाजपा को नुकसान नहीं पहुंचाया, जदयू को जरूर नुकसान पहुंचाया है. हमने संघर्ष का रास्ता चुना है. हमारी नजर 2025 के चुनाव पर है. एनडीए के साथ हमारा गठबंधन बना रहेगा."
शराबबंदी की भी रही महत्वपूर्ण भूमिका
2016 में नीतीश सरकार द्वारा बिहार में लागू की गई शराबबंदी ने भी 2020 के चुनाव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. महागठबंधन के प्रमुख घटक कांग्रेस ने अपने बदलाव पत्र में शराबबंदी की समीक्षा की बात कही. चिराग भी शराबबंदी लागू करने में सरकार को विफल बताकर लगातार नीतीश सरकार पर हमला कर रहे थे. यही वजह रही कि शराबबंदी भी चुनाव का साइलेंट मुद्दा बन गई. किंतु पहले चरण में इसका खासा असर नहीं दिखा. इसका असर दूसरे चरण में तब दिखा जब यह बात फैलने लगी कि अगर नीतीश सरकार गई तो शराबबंदी भी समाप्त हो जाएगी. यह संदेश फैलते ही महिलाओं ने दूसरे चरण में बंपर वोटिंग की. इस चरण में पुरुषों ने करीब 53 प्रतिशत तो महिलाओं ने करीब 59 फीसद वोट डाले. तीसरे चरण में तो जहां पुरुषों ने करीब 55 प्रतिशत तो महिलाओं ने करीब 65 फीसद वोटिंग की.
दस प्रतिशत के इस अंतर ने चुनाव की दिशा ही बदल दी. अब यह साफ हो गया है कि मतदान केंद्रों पर महिलाओं की लंबी कतारों का मतलब आखिर क्या था. दरअसल, उन्हें यह भय हो गया कि नीतीश सरकार जाएगी तो उनके पारिवारिक जीवन का सुख-चैन भी छिन जाएगा. इसके अलावा केंद्र सरकार की उज्जवला योजना व लॉकडाउन के दौरान सीधे खाते में पैसा आना तथा नीतीश सरकार द्वारा पंचायत व स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत तथा सरकारी नौकरी 35 फीसद आरक्षण की व्यवस्था ने भी उन्हें एनडीए के पक्ष में बांधे रखा. वाकई, एंटी इन्कमबैंसी की चर्चा के बीच महिलाओं ने सत्ता की बाजी आखिरकार पलट दी.
चुनाव में कई फैक्टर होते हैं जो जीत या हार का कारण बनते हैं. सीमांचल में इस बार ओवैसी की पार्टी एएमआइएमआइएम की धमक भी महसूस की गई. अब तक यहां मुस्लिम-यादव समीकरण वाले राजद की ही चलती थी. किंतु इस बार राजद को ओवैसी के उम्मीदवारों ने नुकसान ही पहुंचाया. मुस्लिम बहुल 32 सीटों में 18 पर महागठबंधन की हार हुई. इन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से भी ज्यादा है. 2015 में भाजपा इन 32 सीटों में से महज सात पर ही जीत हासिल कर सकी थी. वाकई चुनाव के कई रंग अभी सामने आएंगे. इसके बाद ही समझ आ सकेगा कोई जीता तो क्यों और कोई हारा तो क्यों. फिलहाल कांग्रेस मतों के अपहरण का आरोप लगा रही है वहीं एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में एकबार फिर सरकार बनाने की तैयारी में जुटा है.(dw.com)
- तसलीम खान
मंगलवार को जब बिहार में वोटों की गिनती शुरु हुई तो रुझान वैसी ही तस्वीर दिखा रहे थे जैसा कि आखिरी दौर की वोटिंग के बाद एग्जिट पोल के अनुमान में सामने आई थी। यानी तेजस्वी यादव की अगुवाई वाला महागठबंधन आगे था। आरजेडी समर्थक और प्रवक्ता खुश थे और जश्न की तैयारियां शुरु हो गई थीं। लेकिन दोपहर ढलते-ढलते माहौल बदल गया। एनडीए ने बढ़त बना ली, और आगे-पीछे की रेस देर रात तक जारी रहने के बाद आखिरकार नतीजे एनडीए के पक्ष में घोषित कर दिए गए।
लेकिन इस हार के बावजूद अगर बिहार चुनाव का कोई मैन ऑफ द मैच है तो वह वही तेजस्वी यादव हैं जिन्हें एक महीने पहले तक कोई गंभीरता से लेने के तैयार नहीं था। माना जा रहा था कि इस बार का चुनाव तो एनडीए बहुत ही आसानी से जीत जाएगा। बातें केक वॉक जैसी हो रही थीं। लेकिन जैसे-जैसे बिहार में चुनावी पारा चढ़ा, और तेजस्वी की एक दो रैलियों में भीड़ उमड़ी, राजनीतिक समीक्षकों को राय बदलना पड़ी। कहा जाने लगा कि बिहार में जब भी दो या अधिक पार्टियों ने मिलकर चुना लड़ा है, उन्होंने मौजूदा सत्ता को उखाड़ फेंका है।
वैसे बीजेपी-जेडीयू के एक साथ चुनाव लड़ने के कारण यह माना जा रहा था कि आरजेडी की तो कोई संभावना ही नहीं है, क्योंकि उसके पास बिहार में कांग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। वैसे भी इस बार महागठबंधन के साथ लालू यादव नहीं थे, जो बिहार की नब्ज को किसी भी अन्य के मुकाबले बेहतर समझते हैं। ऐसे में महागठबंधन की नैया खेने की जिम्मेदारी 31 साल के तेजस्वी के ही कंधों पर थी।
और, अक्टूबर का दूसरा सप्ताह शुरु होते-होते तेजस्वी ने इस जिम्मेदारी को हकीकत में बदलने की संभावना पैदा कर दी। उनकी रैलियों में जबरदस्त भीड़ उमड़ने लगी और मुख्यधारा का मीडिया भी उन्हें नजरंदाज़ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। उनकी रैलियों में युवाओं के उत्साह से उम्मीद मजबूत होने लगीं। तेजस्वी की रैलियों में उमड़ती भीड़ के साथ ही यह बात भी बड़े पैमाने पर चर्चा का हिस्सा बनने लगी कि बिहार में इस समय जबरदस्त सत्ताविरोधी लहर है।
बात यहीं नहीं रुकी, और बीते करीब 15 साल से बिहार के मतदाताओं ने जिन नीतीश कुमार को सिर आंखों पर बिठा रखा था, उन्हें एनडीए की सबसे कमजोर कड़ी बताया जाने लगा। लोगों में उन्हें लेकर गुस्सा इतना अधिक दिखने लगा कि उनकी रैलियों में कभी विरोधी नारे लगते तो कभी उन पर प्याजा और चप्पलें फेंकी जाने लगीं। नीतीश भी हताश दिखने लगे और ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करने लगे जिसकी कम से कम उनसे तो किसी ने उम्मीद नहीं की थी। एक तरह से नीतीश एनडीए पर बोझ दिखने लगे।
दूसरी तरफ तेजस्वी ने एक नया राजनीतिक सूत्र गढ़ दिया था। उन्होंने एक तरह से एनडीए के लिए चुनावी एजेंडा तय कर दिया, नतीजतन एनडीए नेता, वह बीजेपी के हों या जेडीयू के, परेशान ही नहीं बल्कि रक्षात्मक भी दिखने लगे। यही कारण था कि जब तेजस्वी यादव ने ऐलान किया कि सत्ता संभालते ही पहली बैठक में वह 10 लाख नौकरियां देगें, तो पूरे बिहार में यह चर्चा का विषय बना और एनडीए नेताओं के पास इसकी काट ही नहीं दिखी। कशमकश में पड़े एनडीए की तरफ से उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इस घोषणा का मजाक तक उड़ाया।। लेकिन तेजस्वी की इस घोषणा के राजनीतिक अर्थों को समझते हुए बीजेपी को अगले ही दिन 19 लाख रोजगार का वादा करना पड़ा।
कमाई, पढ़ाई, दवाई और सिंचाई के तेजस्वी के नारे ने बिहार के लोगों के बीच एक तरह का रिश्ता बना दिया, जिससे हमेशा जातीय समीकरणों का शिकार रहे बिहार का राजनीतिक विमर्श ही बदल गया। इतना ही नहीं तेजस्वी ने पूरे चुनाव में अपने पिता लालू यादव और मां राबड़ी देवी को एक तरह से किनारे ही रखा, यह हिम्मत वाला काम था। हालांकि तेजस्वी जानते थे कि मंडल की राजनीति के प्रमुख नायकों में से एक लालू यादव ने बिहार के दबे-कुचले तबके को सम्मान से जीना सिखाया था। यह एक बड़ा दांव था, इससे आरजेडी का अपना जनाधार खिसक सकता था, लेकिन तेजस्वी ने यह दांव खेला। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी तेजस्वी को जंगलराज का युवराज कहकर चिढ़ाते रहे, लेकिन तेजस्वी विचलित हुए बिना ही रोजगार, नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर डटे रहे।

तेजस्वी भले ही चुनाव हार गए और अपनी संभावनाओं के लिए उन्हें अब अगले पांच साल इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन उन्होंने एक लकीर जरूर खींच दी है। यही कारण था कि संघ की मजबूत मदद, एलजेपी के खुलकर नीतीश का विरोध कर बीजेपी को फायदा पहुंचाने की कोशिशों और धनबल के बाद भी तेजस्वी यादव की अगुवाई वाले महागठबंधन में अनुशासन और गंभीरता नजर आई।
बीते कुछेक सालों में होता यही रहा है कि हर चुनाव का एजेंडा पीएम मोदी ही तय करते रहे हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव से लेकर इस दौरान हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों तक यह बात साफ रही है। लेकिन इस बार बिहार में चुनाव का एजेंडे तेजस्वी ने तय किया और जेडीयू-बीजेपी नेता ही नहीं खुद पीएम मोदी भी महज तेजस्वी के एजेंडे का जवाब दीही देते नजर आए।
यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि तेजस्वी के मुकाबले में दो कद्दावर नेता खड़े थे, एक तरफ नीतीश कुमार थे तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी। लेकिन तेजस्वी नर्भसाए नहीं, उनसे घबराए नहीं, वे मजबूती से डटे रहे। अपने भाषणों और प्रचार में आक्रामकता तो दिखाई उन्होंने लेकिन हमेशा ध्यान रखा कि उनके एक-एक कदम पर, एक-एक शब्द पर गहरी नजर है। यहां तक कि जब उन पर निजी आक्षेप लगाए गए, तेजस्वी ने धैर्य नही खोया।
एक और रोचक और तेजस्वी की राजनीतिक परिपक्वता का संकेत देती बात सामने आई। तेजस्वीय यादव को एहसास था कि उन्हें अपनी पार्टी आरजेडी का जनाधार यादव-मुस्लिम वोटों से आगे बढ़ाना है, इसीलिए उन्होंने नारा दिया कि उनकी पार्टी ए टू जेड की पार्टी है सिर्फ एम-वाई की नहीं। एक तरह से तेजस्वी ने इस चुनाव में आरजेडी को लालू यादव की पार्टी के बजाए तेजस्वी यादव की पार्टी बना दिया।
तेजस्वी के इस नए रूप से आरजेडी में नई ऊर्जा भरी है, और वह बीते कल को भुलाकर आगे बढ़ने को तैयार दिखती है। आरजेडी पर कभी गुंडों-बदमाशों की पार्टी होने का दाग था, जिसे विरोधी दल जंगलराज कहते रहे हैं, लेकिन पार्टी इससे आगे बढ़ गई है, जो अपना जनाधार बढ़ा रही है, आर्थिक न्याय की बात कर रही है, रोजगार की बात कर रही है।
ये सबकुछ शायद चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो पाया। लेकिन तेजस्वी यादव ने जो संभावनाएं सामने रखी हैं, उससे राजनीतिक विश्लेषक भी मुस्कुरा रहे हैं। वह हारे जरूर हैं, लेकिन आखिर तक लड़कर हारे हैं। सुपर ओवर तक पहुंचा चुनावी मैच भले ही एनडीए ने जीता हो, और सीएम की कुर्सी पर नीतीश फिर से बैठें, लेकिन मैन ऑफ दि मैच ही नहीं मैन ऑफ दि मोमेंट भी तेजस्वी यादव ही हैं।(navjivan)
कमला हैरिस जब पहली महिला उप राष्ट्रपति का पद संभालेंगी, तब उनके पति डग एमहॉफ अमेरिका के पहले 'सेकंड जेंटलमैन' बन जाएंगे. जिस अमेरिका को आज तक कोई महिला राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति नहीं मिली है, वहां यह एक नयी बात होगी.
जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी पत्नी एक कॉलेज में शिक्षिका के तौर पर अपनी नौकरी जारी रखना चाहती हैं. वहीं कमला हैरिस के उप राष्ट्रपति बनने के बाद उनके पति डग एमहॉफ एक निजी लॉ फर्म का काम छोड़ कर अपनी पत्नी के करियर में मदद करना चाहते हैं. इतने ऊंचे राजनीतिक पदों पर पहुंचने वाले लोगों के पति-पत्नी का ऐसा रवैया बिल्कुल नया है. हैरिस के 56-वर्षीय पति डग एमहॉफ ने पत्नी के पद संभालने के दिन से लॉ फर्म का काम छोड़ कर पूरी तरह उप राष्ट्रपति के पति के तौर पर सक्रिय रहने का निर्णय लिया है. फिलहाल वह सेकंड जेंटलमैन की भूमिका को लेकर चर्चा कर रहे हैं.

कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी-सैक्रामेंटो में राजनीतिक शास्त्र की प्रोफेसर किम नाल्डेर बताती हैं कि "इस तरह के जेंडर स्विच का इंतजार हमें कई दशकों से था." पहले 'सेकंड जेंटलमैन' की ऐसी भूमिका को वह "बहुत बड़ा सांकेतिक कदम" बताती हैं, जिसमें "एक आदमी अपने बेहद सफल करियर से पीछे हट कर अपनी पत्नी के करियर में उसका सहारा बनने जा रहा है."
एमहॉफ की अपनी निजी लॉ फर्म 'डीएलए पाइपर' को छोड़ना यह भी दिखाता है कि राष्ट्रपति के रूप में बाइडेन के शासन में ऐसे नैतिक मामलों की कितनी एहमियत होगी. एमहॉफ खुद तो लॉबिस्ट नहीं रहे हैं लेकिन उनकी कंपनी की ओर से केंद्र सरकार के अलग अलग विभागों में लॉबी बनाने का काम होता रहा है. एमहॉफ के ग्राहकों में कॉमकास्ट, रेथियॉन और प्यूएर्तो रिको की सरकार भी शामिल हैं, जिनके पक्ष में सरकार का रुख मोड़ने की कोशिश उनकी कंपनी करती रही है. इन्हीं नैतिक कारणों से अगस्त में जैसे ही जो बाइडेन ने कैलिफोर्निया की सीनेटर कमला हैरिस को अपनी रनिंग मेट के रूप में चुना, तभी एमहॉफ ने कंपनी से छुट्टी से ली थी.

पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान एमहॉफ की छवि एक बेहद मददगार पति के रूप में बनी. डेमोक्रैट पार्टी की ओर से प्रारंभिक दौर में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में शामिल पीट बटगीग के पति चैस्टन बटगीग के साथ भी उनकी दोस्ती चर्चा में रही. चैस्टन बटगीग ने बताया कि कैसे दोनों नेताओं के पार्टनर के तौर पर आपस में अनुभव बांट रहे थे और कैसे उनसे मिलने वाले लोग बिल्कुल अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे थे. चैस्टन ने बताया कि कैसे एमहॉफ ने कई बार उन्हें अच्छा भाषण देने पर बधाई दी और कभी उन्हें प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नहीं देखा.
चैस्टन खुद भी पुरुष हैं और पीट बटगीग के पति भी. वहीं एमहॉफ एक महिला नेता के पति, जो कि अमेरिका के लिए बहुत आम बात नहीं है. इससे पहले अमेरिका ने केवल डेमोक्रैट नेता हिलेरी क्लिंटन के पति के रूप में बिल क्लिंटन को देखा था, लेकिन वे खुद भी पूर्व राष्ट्रपति रहने के कारण कहीं ज्यादा मशहूर शख्सियत थे. अक्टूबर में एक डिजिटल साइट 'नाउदिस न्यूज' से बात करते हुए एमहॉफ ने कहा था, "मैं चाहता हूं कि और महिलाएं ऑफिस में आएं, मैं चाहता हूं कि और पार्टनर उनकी मदद करें, उन्हें सहारा दें और उन्हें सफल होने के मौके और माहौल दें, चाहें वे पार्टनर कोई भी हों."

अमेरिका के किसी राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के पार्टनर के रूप में पहली बार एक यहूदी समुदाय का व्यक्ति आएगा. अपने यहूदी समुदाय में गहरी पहुंच का फायदा एमहॉफ ने कमला हैरिस के चुनाव अभियान में भी पहुंचाया. इसके अलावा जो बाइडेन की पत्नी जिल बाइडेन से भी उनकी अच्छी दोस्ती हो गई, जो पहले खुद भी सेंकड लेडी के रूप में बाइडेन का साथ दे चुकी हैं. अब राष्ट्रपति बनने जा रहे जो बाइडेन की पत्नी के रूप में अमेरिका की फर्स्ट लेडी जिल बाइडेन ने इच्छा जताई है कि वह कम्युनिटी कॉलेज में पढ़ाने का अपना काम जारी रखेंगी, जैसा उन्होंने सेंकड लेडी के तौर पर भी किया था.
हैरिस और एमहॉफ 2013 में मिले थे और एक साल बाद दोनों ने शादी रचा ली थी. यह हैरिस की पहली और एमहॉफ की दूसरी शादी थी. एमहॉफ के पहली शादी से दो बच्चे हैं जिनकी उम्र 20 साल के आसपास है और वे हैरिस को यिद्दिश शब्द "मोमाला" यानि "छोटी मां" बुलाते हैं.
-कनुप्रिया
सच कहूँ तो मुझे 2024 से भी सत्ता परिवर्तन की कोई उम्मीद नहीं दिख रही, कांग्रेस का पाँव हाथी का पाँव नही रहा। विपक्ष में एकमात्र बड़ी राष्ट्रीय पार्टी कॉंग्रेस मानो कहीं की नहीं रही, उसके पुराने पक्के वोटों के सिवा जनाधार किस धर्म और जाति में है? लगातार हार से उसकी छवि भी कमजोर होती जा रही है। 2024 में क्या विपक्ष उसके किसी चेहरे के पीछे एकजुट होगा?
जबकि हिंदूवादी वोट एक झंडे तले एकजुट है मगर विरोधी वोट अलग अलग खेमो में बंटा हुआ है। यही राजद और वाम जो आज महागठबंधन में साथ जुड़े हुए थे, लोकसभा में मुझे याद है राजद और उसके समर्थकों ने पूरा जोर कन्हैया कुमार के खिलाफ ही लगाया हुआ था, जितनी पोस्ट्स कन्हैया कुमार के खिलाफ लिखी गईं थी उतनी कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ नहीं, नतीजा स्पष्ट ही था। अबकि यह आरोप ओवैसी की पार्टी पर है।
बंगाल में अमित शाह कह रहे हैं कि 200 से ऊपर सीटें ले जाएँगे और उनके दावे पर शंका का कोई कारण मुझे नही लगता, ध्रुवीकरण की उनकी राजनीति लगातार कामयाब है और विपक्ष एक दूसरे के ही खिलाफ है, सबका अपना निजी हित, निजी महत्वाकांक्षा और अस्तित्व का सवाल है।
अमेरिका में ट्रंप के हारने के एक बड़ा कारण ये भी था कि वहाँ मुख्य तौर पर दो पार्टी हैं। हालाँकि जो लोग दोनों ही पार्टियों को पसंद नहीं करते वो इस दो पार्टी सिस्टम से बहुत ख़ुश नहीं थे, यह बहस सुनने को मिली कि लोकतंत्र में और विकल्प होने चाहिए। फिर भी जो ट्रम्प के खि़लाफ़ थे वो डेमोक्रेट्स को पसंद करते थे या नही मगर उनका वोट बाइडेन को ही गया तब सत्ता परिवर्तन हुआ। और ऊपर से तुर्रा ये कि सत्ता परिवर्तन भी महज सत्ता परिवर्तन ही है, व्यवस्था परिवर्तन नही बनता।
यहाँ भी कमोबेश यही हाल है, वर्तमान सत्ता के विरोधी किसी विशेष पार्टी के समर्थक न भी हों तब भी सत्ता परिवर्तन की उम्मीद में समर्थन में चले जाते हैं।
मगर विपक्ष बंटा हुआ हो तो फिर अपनी अपनी प्राथमिकता चुनते हैं। हमारे बीकानेर में ही कॉंग्रेस और वाम एक दूसरे के विरुद्ध खड़े थे लोकसभा में, वोट बंटने ही थे और एनडीए को फायदा होना ही था।
तब मन मे यही सवाल आता है कि कॉंग्रेस के कमजोर होते जाने के बाद वो कौनसी नेतृत्व कारी पार्टी है, वो कौनसा चेहरा है जिसके पीछे विपक्ष लामबंद होगा?
2024 के परिणाम चकित करने वाले होंगे ऐसा नही लगता, चमत्कार महज काल्पनिक दुनिया में होते हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार के चुनाव और मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और कर्नाटक में हुए उप-चुनावों के स्पष्ट नतीजे अभी तक सामने नहीं आए हैं लेकिन वोटों की गिनती से जो लहरें पैदा हो रही हैं, उनकी ध्वनि यह है कि भाजपा का सितारा अभी भी बुलंद है। भारत के लोगों में मोदी-प्रशासन के प्रति अभी तक थकान पैदा नहीं हुई है। लोगों ने नोटबंदी की विभीषिका, जीएसटी के कुलांचे, कोरोना की महामारी और बेरोजगारी आदि कई समस्याओं का सामना किया लेकिन इसके बावजूद मोदी-सरकार के प्रति उसका विश्वास डिगा नहीं।
यह हो सकता है कि बिहार में विपक्ष की सरकार बन जाए, हालांकि उसकी संभावना कम ही है, फिर भी भाजपा को मिल रही बढ़त किस बात का संकेत कर रही है ? यह बढ़त इसलिए ज्यादा ध्यातव्य है कि नीतीश की सीटें घट रही हैं, जबकि दोनों पार्टियों ने लगभग बराबर संख्या में अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। इस वक्त टीवी चैनलों पर वोटों की गिनती से जो अंदाज लगाए जा रहे हैं, यदि वे खरे भी उतरे तो बिहार में सरकार भाजपा और जदयू (नीतीश) की ही बनेगी लेकिन वहां सवाल यह उठेगा कि अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा ? क्या नीतीश बनेंगे ? शायद वे खुद न बनें। वे केंद्र में मंत्री बन सकते हैं। वे किसी भी वक्त लोकसभा या राज्यसभा में पहुंच सकते हैं।
भाजपा ने वायदा किया था कि इस बार नीतीश ही मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन हो सकता है कि भाजपा में ही मुख्यमंत्री पद के कुछ दावेदार उठ खड़े हों। जो भी बिहार का मुख्यमंत्री बनेगा, इस बार उसके सामने चुनौतियां काफी भयंकर होंगी। तेजस्वी की जन-सभाओं में आए लाखों जवान अब चुप नहीं बैठेंगे। हिंदी राज्यों में बिहार का पिछड़ापन सर्वज्ञात है। यदि राजग की सरकार बनती है तो उस महागठबंधन में जमकर व्यक्तिगत, दलीय, जातीय और वैचारिक खींचतान तो होगी ही, उस सरकार को सबल विपक्ष का भी सामना करना होगा। नीतीशकुमार पिछले 15 साल में जितने अच्छे और उल्लेखनीय काम कर पाए हैं, उतने भी काम राजग सरकार कर पाएगी या नहीं, यह देखना होगा। सरकार किसी की भी बने, भाजपा सत्ता में रहे या विपक्ष में, बिहार में वह सबसे मजबूत शक्ति बन गईं है। (नया इंडिया की अनुमति से)
-ऐश्वर्या राज
ऐश्वर्या रेड्डी लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक कर रही थी। वह सेकंड ईयर की छात्रा थी। 8 नंवबर 2020 की रात एक चिट्ठी अपने पीछे छोडक़र वह इस दुनिया से चली गईं। तेलुगु में लिखी गई अपनी आखिरी चि_ी में उन्होंने लिखा, ‘मेरे मां-बाप मुझ पर बहुत पैसे खर्च कर चुके हैं। मैं उन पर बोझ हूं। मेरी पढ़ाई एक बोझ बन चुकी है, लेकिन मैं पढ़े बिना नहीं रह सकती। बहुत सोचने के बाद मुझे लगा कि आत्महत्या ही एक रास्ता है।’ ऐश्वर्या की मां सुनीता रेड्डी पेशे से एक टेलर हैं और पिता श्रीनिवास रेड्डी एक मोटर मैकेनिक। उन्होंने अपने बच्चों को परिवार की आर्थिक हालात के बारे में बताते हुए कहा कि शायद उन्हें हैदराबाद के उस दो कमरे के मकान को बेचना पड़े और सुनीता के गहनों को गिरवी रखकर वे अपना घर चला पाएं। तेलंगाना बोर्ड से बारहवीं में 98.5 फीसदी प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाली विद्यार्थी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में पढ़ती थी। ‘स्कॉलरशिप फ़ॉर हाइयर एजुकेशन’ के तहत 10,000 छात्रों में अपनी जगह बनाते हुए अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिलती थी।
क्या ‘ऑनलाइन क्लास’ शिक्षा के लिए पर्याप्त ढांचा है?
लॉकडाउन के वक्त मार्च में ऐश्वर्या लेडी श्रीराम कॉलेज के हॉस्टल से हैदराबाद के शादनगर स्थित अपने घर पहुंची। कोविड-19 के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय में इस अकादमिक सत्र की स्नातक की पढ़ाई ऑनलाइन हो रही है। उनके कॉलेज यूनियन द्वारा करवाए गए एक सर्वे के जवाब में उन्होंने लिखा था कि उनके पास निश्चित और बेहतर रूप से काम करने वाला इंटरनेट कनेक्शन नहीं है और लैपटॉप भी नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक उनके पिता बताते हैं कि ऐश्वर्या को पढ़ाई के लिए लैपटॉप की जरूरत थी। ऐश्वर्या ने एक बार उनसे कहा था कि पुराना लैपटॉप भी मिल जाता तो वह अपनी पढ़ाई कर पाएंगी। पिता ने उनसे कुछ दिन इंतजार करने को कहा चूंकि उनकी कमाई लॉकडाउन से प्रभावित होकर न्यूनतम हो चुकी थी। ऐश्वर्या ने इससे जुड़ी कोई बात दोबारा श्रीनिवासन से नहीं की। 14 सितंबर को अभिनेता सोनू सूद द्वारा शुरू किए एक स्कॉलरशिप व्यवस्था के जवाबी ईमेल में ऐश्वर्या लिखती हैं, ‘मेरे पास लैपटॉप नहीं है, मैं प्रैक्टिकल पेपर नहीं दे पा रही हूं। मुझे डर है मैं इनमें फेल न हो जाऊं। हमारा परिवार कजऱ् में डूबा है इसलिए हम लैपटॉप खरीदने में असमर्थ हैं मुझे नहीं पता मैं अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर पाऊंगी या नहीं।’
जानकारी के लिए बता दें दिल्ली विश्वविद्यालय में अभी भी विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों की क्लासेज ऑनलाइन चल रही हैं। एक सार्वजनिक वित्त पोषित विश्वविद्यालय में पढऩे आए दूरदराज के छात्र के पास या तो निजी यानी प्राइवेट कॉलेज में दाखिला लेने का आर्थिक सामर्थ्य नहीं होता या उनके अपने राज्य में शिक्षा की हालत खस्ता होती है। ऐसे में राजधानी दिल्ली के विश्वविद्यालयों में कश्मीर से लेकर बिहार, उत्तर पूर्वी राज्यों से लेकर दक्षिण भारत के हर आर्थिक वर्ग, जातीय, जन-,जातीय धार्मिक अस्मिता से संबंध रखने वाले विद्यार्थी होते हैं। उनके ऊपर ‘अच्छा प्रदर्शन’ करने और पारिवारिक जिम्मेदारियों और उम्मीदों का भारी बोझ होता है। ऐसा ही ऐश्वर्या के मन में चल रहा होगा जब उन्होंने उस नोट में लिखा, ‘मुझे माफ़ कीजिएगा मैं एक अच्छी बेटी नहीं बन पाई।’
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के लिए उनके पिता बताते हैं कि ऐश्वर्या को पढ़ाई के लिए लैपटॉप की जरूरत थी। ऐश्वर्या ने एक बार उनसे कहा था कि पुराना लैपटॉप भी मिल जाता तो वह अपनी पढ़ाई कर जाएगी। पिता ने उनसे कुछ दिन इंतजार करने को कहा चूंकि उनकी कमाई लॉकडाउन से प्रभावित होकर न्यूनतम हो चुकी थी।
हफिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्राओं का कहना है कि देश के प्रतिष्ठित कॉलेज ने अपने एक विद्यार्थी को उसके कमज़ोर समय में निराश किया है। पिछले साल घोषित की गई कॉलेज की नई होस्टल पॉलिसी से ऐश्वर्या और अन्य कई बच्चे बहुत परेशान चल थे। यह नई पॉलिसी केवल फस्र्ट ईयर के छात्रों को हॉस्टल में रहने की अनुमति देती है। ऐश्वर्या की एक साथी कहती हैं, ‘वह डटी थी, एक महीने से चल रही ऑनलाइन क्लासेज़ भी लेने की कोशिश करती रही। जब होस्टल प्रशासन ने सेकंड ईयर के छात्रों को हॉस्टल खाली करने को कहा तब समस्या और गंभीर हो गई। होस्टल से बाहर रहने में महीने का 12000-14000 खर्च आता है, ऐश्वर्या का परिवार इतने पैसे देने में सक्षम नहीं होता।’ ऐश्वर्या अपने स्कॉलरशिप को लेकर भी परेशान थीं। ‘स्कॉलरशिप फॉर हाइयर एजुकेशन’ (एसएचई) की घोषणा 2019 में कर दी गई थी। डिपार्टमेंट के एक कर्मचारी के मुताबिक, ‘इसकी राशि एक साल देरी से दी जाती है ताकि पहले साल के बाद कॉलेज छोडऩे वाले विद्यार्थियों तक ना पहुंच पाए।’ इस देरी के कारण ऐश्वर्या चिंतित थी, ऐश्वर्या ने अपने आखिरी नोट में यह भी लिखा कि स्कॉलरशिप राशि उनके परिवार तक पहुंचा दी जाए। ऐश्वर्या की बहन वैष्णवी कक्षा सातवीं में है और फिलहाल पैसे न होने के कारण स्कूल से उसका नाम कट चुका है।
शिक्षण संस्थाओं का समावेशी न होना कितना असर डालता है विद्यार्थियों पर?
लेडी श्रीराम कॉलेज के कुछ विद्यार्थी समूहों द्वारा चलाए जा रहे सोशल मीडिया हैंडलस ने इस घटना को अकादमिक जगत और महाविद्यालयों के समावेशी नहीं बन पाने का दुखद नतीज़ा बताया है। ऐश्वर्या रेड्डी जिस मानसिक यातना से गुजरी वह विश्वविद्यालयों में होता आया है। ऑनलाइन क्लासेज का ढांचा जो केवल समृद्ध परिवार के विद्यार्थियों के लिए उपाय की तरह था वह सभी पर थोप दिया गया। ऐश्वर्या का नोट उस मनोस्थिति को दर्शाता है जो इस संस्थागत भेदभाव और अपने भविष्य के सपनों के बीच जूझ रहा है। कॉलेज की प्रिंसिपल ने कहा है कि ऐश्वर्या का जाना एक बड़ी क्षति है। हालांकि उसने कभी होस्टल प्रशासन या शिक्षकों से मदद नहीं मांगी। हमारे पास मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसिल हैं, वह उनसे मदद नहीं ले पाई। एलएसआर के छात्रों ने प्रिसिंपल के इस बयान की निंदी की है और इसे असंवेदनशील भी बताया है।
उन्नीमया, लेडी श्रीराम कॉलेज की विद्यार्थी प्रतिनिधि और एसएफआई की सदस्य के मुताबिक ओबीसी आरक्षण पर काम करना एक अच्छा कदम था लेकिन होस्टल से दूसरे साल के विद्यार्थियों को हटा दिया जाना एक ग़लत तरीका है। उपाय होस्टल बेड की संख्या बढ़ा कर किया जा सकता था। मिरांडा हॉउस कॉलेज में अंग्रेजी विभाग की शिक्षक देवजानी रॉय ने 8 अप्रैल 2020 को ‘स्क्रॉल’ में प्रकाशित एक लेख में बताता था कि कैसे हेल्पलाइन नंबर्स मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतें उठा रहे विद्यार्थियों के लिए एक हल नहीं बन सकता। वह लिखती हैं, ‘कॉलेज के काउंसिलर को विद्यार्थियों से बात करने कहा जा रहा है, फोन या मेल पर। अप्रैल 6 को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने विद्यार्थी समुदाय के मानसिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन नंबर्स की सुविधा देने की बात की। इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह काफ़ी नहीं है। कई विद्यार्थी बिना किताब के घर पर हैं, कइयों ने मज़बूरी में होस्टल खाली किया है।’
वीमेंस डेवलपमेंट सेल, एलएसआर का बयान
ऑनलाइन क्लासेज तो चल रही हैं लेकिन इस दौरान किसी के पास स्मार्टफोन नहीं हो तो किसी के पास लैपटॉप, किसी के पास इंटरनेट नहीं है तो किसी का पास नेटवर्क। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ी ऐसी पहली घटना नहीं हुई है। ऐसे में सवाल उठना चाहिए हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कि वह कितनी समावेशी है, समाज के कितने छात्रों की पहुंच इस शिक्षा व्यवस्था तक है क्योंकि समस्या की असली जड़ यही है। (feminisminindia.com)
(यह लेख पहले फेमिनिज्मइनइंडियाडॉटकॉम पर प्रकाशित हुआ है।)
-डॉ राजू पाण्डेय
महाराष्ट्र सरकार ऐसा लगता है कि अर्नब गोस्वामी को नायक बनाकर ही दम लेगी। न्यू इंडिया की आक्रामक, हिंसक तथा विभाजनकारी विचारधारा की लाक्षणिक विशेषताओं से परिपूर्ण, किंचित असमायोजित व्यक्तित्वधारी अतिमहत्वाकांक्षी अर्नब को महाराष्ट्र सरकार ने अपनी कोशिशों से निरंतर चर्चा में बनाए रखा है। इसके पूर्व भी महाराष्ट्र सरकार कंगना को महाराष्ट्र की राजनीति में धमाकेदार एंट्री दिलाने में अपना योगदान दे चुकी है। पहले महाराष्ट्र सरकार ने कंगना के ऑफिस का अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की, बाद में कंगना और उनकी बहन के विरुद्ध पुलिस ने राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया। इनसे कंगना को खूब पब्लिसिटी मिली। इस आक्रामक और प्रतिशोधात्मक कार्यशैली को महाराष्ट्र सरकार यदि अपनी रणनीतिक चूक मानती तो अर्नब प्रकरण में इसकी पुनरावृत्ति न होती और महाराष्ट्र सरकार का रवैया अधिक संयत दिखाई देता। अर्नब प्रकरण में महाराष्ट्र सरकार के आक्रामक व्यवहार की एक ही व्याख्या हो सकती है- शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन में आने के बाद प्रगतिशील और समावेशी बनने की कोशिश जरूर कर रही है किंतु अपनी पुरानी फ़ासिस्ट सोच और कार्यशैली से छुटकारा शायद उसे अभी नहीं मिल पाया है। कांग्रेस और एनसीपी भी हाल के इन वर्षों में उस भाषा की तलाश करते रहे हैं जिसमें उग्र,संकीर्ण और हिंसक हिंदुत्व के हिमायतियों को माकूल जवाब दिया जा सके, शायद उन्हें प्रतिशोध और बदले की भाषा ही ठीक लगी होगी।
अर्नब और कंगना के साथ यदि हम बहुत ज्यादा रियायत बरतें तो ये भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श के प्रॉब्लम चिल्ड्रन कहे जा सकते हैं- ऐसे बच्चे जिनमें आत्म नियंत्रण का अभाव होता है, जिनका व्यवहार असामाजिक होता है, जो विध्वंसक प्रकृति के होते हैं और जिन्हें शिक्षित करना कठिन होता है। किंतु शायद ऐसी उदारता बरत कर हम उस रणनीति को अनदेखा कर देंगे जिसे नव फ़ासिस्ट शक्तियों ने ईजाद किया है। सामाजिक समरसता हमारे लोक जीवन का स्थायी भाव है। सामासिक संस्कृति तथा अनेकता में एकता हमारे देश की मूल एवं अंतर्जात विशेषताएं हैं। देश के शांतिप्रिय नागरिक दैनंदिन जीवन के संचालन और अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में लीन हैं। उनके अपने छोटे छोटे सुख-दुःख हैं, अभाव हैं, आवश्यकताएं हैं, कामनाएं और महत्वाकांक्षाएं हैं। घृणा, हिंसा,प्रतिशोध और वैमनस्य के विमर्श के लिए उनके पास अवकाश नहीं है, न ही उनकी इसमें कोई रुचि ही है। ऐसे सृजन धर्मी,रचनात्मक और शांत जनसमुदाय को हिंसा प्रिय एवं विध्वंसक बनाना आसान नहीं है। यही कारण है कि अर्नब और कंगना जैसे लोगों को चीखना-चिल्लाना पड़ता है, बेसिरपैर की हरकतें करनी पड़तीं हैं, डुगडुगी बजानी पड़ती है, तमाशा खड़ा करना पड़ता है ताकि अपनी धुन में मग्न समाज का ध्यान इनकी ओर जाए। महाराष्ट्र सरकार न केवल इनकी चीख-चिल्लाहट पर तवज्जोह देने वाली भीड़ का हिस्सा बन रही है बल्कि अपनी अतिरंजनापूर्ण प्रतिक्रियाओं के द्वारा इन महत्वहीन व्यक्तियों और इनकी विकृत सोच को चर्चा के काबिल भी बना रही है। अर्नब अपने चैनल से महीनों तक शोर मचाने के बाद भी जितना ध्यान नहीं खींच पाते वह उन्हें इन चंद दिनों में हासिल हुआ है।
घृणा, हिंसा, प्रतिशोध और विभाजन के नैरेटिव पर किसी तरह की प्रतिक्रिया करना ही नफरतजीवियों के उद्देश्य को कामयाब बनाना है क्योंकि तब हम भूख, गरीबी, बेकारी,बीमारी,अशिक्षा जैसे सारे बुनियादी मुद्दों को दरकिनार कर थोपे गए कृत्रिम,गैरजरूरी और आभासी मुद्दों पर अपनी ऊर्जा जाया करने लगते हैं। किंतु महाराष्ट्र सरकार तो एक कदम आगे बढ़कर उसी नफरत और बदले की जबान में इन्हें उत्तर देने की कोशिश कर रही है जिसमें इन्हें महारत हासिल है।
चाहे वे अर्नब हों या कंगना इनके जरिए जो नैरेटिव तैयार किया जा रहा है वह भयावह और घातक है। कंगना हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के अब तक के स्वाभाविक विकास को एक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। कंगना की प्रस्तुति का तरीका कुछ परिमार्जित है, वे अपनी बातों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए उनमें निजी अनुभवों का तड़का लगाती हैं और उन्हें स्वीकार्य बनाने के लिए नारीवाद तथा नशे से लड़ाई जैसे व्यापक मुद्दों का समावेश भी करती हैं किंतु उनकी मूल प्रेरणा को आक्रामक और हिंसक हिंदुत्व के बुनियादी पाठ्यक्रम में आसानी से तलाशा जा सकता है।

कार्टूनिस्ट रेमी फर्नांडीज, रीमिक्स कॉमिक्स
भारत के सांस्कृतिक-साहित्यिक-बौद्धिक परिदृश्य पर वामपंथियों और मुसलमानों के जबरिया, षड्यंत्रपूर्ण एकक्षत्र आधिपत्य की झूठी कहानियाँ लंबे समय से सोशल मीडिया पर तैरती रही हैं। यह कहानियाँ मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री को सांप्रदायिक रंग में रंग देती हैं। इन जहरीली कहानियों में हिन्दू नाम रखकर देश की जनता से धोखा करने वाले मुसलमान सुपरस्टारों का जिक्र होता है जिन पर यह बेबुनियाद आरोप लगाया जाता है कि हिन्दू जनता इनकी फिल्में देखकर इन्हें दौलत और शोहरत देती है लेकिन इनका लगाव पाकिस्तान के प्रति अधिक होता है। कहा जाता है कि यह मुसलमान नायक हिन्दू स्त्रियों से विवाह कर उनका धर्म भ्रष्ट कर देते हैं। इस विमर्श के अनुसार ऐसे अनेक नामचीन पटकथा लेखक हैं जो अपनी स्क्रिप्ट में हिंदुओं को संकीर्ण और दकियानूसी सोच वाला और मुसलमानों को उदार बताते हैं। इनकी लिखी फिल्मों में शुद्ध हिंदी बोलने वाले पात्रों का उपहास उड़ाया जाता है और मुसलमान नायक हिन्दू नायिकाओं से प्रेम कर उनसे विवाह करते हैं। यह अपनी पटकथाओं में सिखों का भी मखौल बनाते हैं। इस घृणा और विभाजन के विमर्श के अनुसार हमारे फ़िल्म जगत में ऐसे संवाद लेखक भी हैं जो शुद्ध हिंदी से नफ़रत करते हैं और अपने संवादों के जरिये उर्दू का प्रचार करते हैं। यही हाल गीतकारों का है जो यह मानते हैं कि मुहब्बत सिर्फ उर्दू में ही बयान की जा सकती है। यह विमर्श मानता है कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री का एक प्रबुद्ध लगने वाला और तटस्थता का ढोंग रचने वाला तबका वामपंथी विचारधारा से प्रभावित फ़िल्म समीक्षकों का है जो मुसलमानों को महिमामंडित करने वाली फिल्मों को देश की गंगा-जमनी तहजीब का आदर्श उदाहरण मानता है और ऐसी फिल्मों एवं इनके कलाकारों को पुरस्कृत कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देता है। कंगना जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं उसके पैरोकारों के साथ समस्या यह है कि चाहे वह फिल्मी दुनिया में नारियों के शोषण का विषय हो या ड्रग्स के दुरुपयोग का मामला हो या ताकतवर फिल्मी घरानों द्वारा युवा कलाकारों को पीड़ित करने का मुद्दा हो या माफिया गिरोहों के हस्तक्षेप की घटना हो यदि उसकी परिणति हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली नहीं है तो फिर इनकी रुचि इन प्रकरणों में नहीं रह जाती है। ऐसा नहीं है कि यह मुद्दे महत्वहीन हैं किंतु इन मुद्दों की ओट में बड़ी चालाकी से सांप्रदायिकता के विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है।
अर्नब सोशल मीडिया की निरंकुशता एवं विषाक्तता को पारंपरिक और औपचारिक मीडिया में प्रवेश दिलाने में लगे हैं। वे भारतीय मीडिया की सहज बनावट में एक षड्यंत्र देखते हैं। टुकड़े टुकड़े गैंग और लुटियंस मीडिया जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रधानमंत्री जी की भांति उन्हें भी प्रिय हैं। अर्नब मीडिया में तो हैं लेकिन मीडिया का अनुशासन और आत्मनियंत्रण उन्हें मंजूर नहीं है। कोई व्यक्ति केवल इस कारण से पत्रकार नहीं माना जा सकता कि पत्रकारिता उसकी आजीविका का जरिया है। अर्नब अपने चैनल के माध्यम से जो कुछ परोस रहे हैं वह समाचार तो कतई नहीं है- उनकी भाषा अशालीन है, तथ्यों से उन्हें परहेज है, वे पहले अपने मनचाहे नतीजे पर पहुंचते हैं और फिर इन्वेस्टिगेशन प्रारंभ करते हैं, चर्चा और विमर्श पर उनका विश्वास नहीं है, विचारधारा का प्रसार और एजेंडा परोसना न कि घटना का वस्तुनिष्ठ आकलन करना उनकी आदत है। वे घमंडी और बददिमाग नजर आते हैं और संभवतः वे ऐसे नजर आना भी चाहते हैं। जिन बातों पर आदर्श पत्रकार लज्जित हुआ करते हैं उन पर अर्नब गर्व करते हैं। वे हर घटना को सांप्रदायिक नजरिए से देखते हैं और बड़ी निर्लज्ज बेबाकी से यह स्वीकार करते हैं कि वे दबे कुचले बहुसंख्यक वर्ग की आवाज़ हैं। उनकी ऊर्जा अपरिमित है। वे स्वाभाविक को अस्वाभाविक, प्राकृतिक को अप्राकृतिक तथा सत्य को असत्य सिद्ध करने का दुस्साहसिक और शरारतपूर्ण अभियान दिन रात चला सकते हैं।
उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले महत्वाकांक्षी युवाओं की मानवीय दुर्बलताओं को उजागर करने वाली एक असफल प्रेम कहानी से कई राजनीतिक लक्ष्य साधने की असंभव चेष्टा की। उनकी कल्पना यह थी कि सुशांत मामले के रूप में बिहार चुनावों में प्रांतवाद और जातिवाद के जहर को एंट्री मिलेगी और बुनियादी मुद्दों से मतदाता का ध्यान हटाने का एक अवसर उत्पन्न होगा। उनका स्वप्न यह भी था कि यही मामला फ़िल्म इंडस्ट्री के हिंदूकरण में भी सहायक होगा। फ़िल्म इंडस्ट्री की अपार दौलत और फ़िल्म कलाकारों की बेहिसाब लोकप्रियता का लाभ उठाने की इच्छा राजनीतिक दलों के लिए नई नहीं है। अर्नब के अभियान में अगर कुछ नया था तो वह फ़िल्म उद्योग को संघ-भाजपा से राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए बाध्य करने का पुरजोर प्रयास ही था। अर्नब ने अपने सपने को साकार करने के लिए बड़ी नृशंसता से सुशांत, रिया और बहुत सारे दूसरे लोगों की निजी जिंदगी के बखिये उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। केंद्र सरकार ने अर्नब की कल्पना को यथार्थ के धरातल पर साकार करने के लिए देश की शीर्षस्थ जांच एजेंसियों को झोंक दिया। जांच एजेंसियां अपनी बेहतरीन कोशिशों के बावजूद वह असंभव नतीजा नहीं ला पाईं जो अर्नब को प्रसन्न कर पाता। अर्नब स्वयं को एक अटपटी स्थिति में पा रहे थे - उनका पाखंड उजागर हो गया था। मीडिया के अपने हमपेशा साथियों में उनके मित्र बहुत कम हैं और जो हैं भी वे शायद इतने निर्लज्ज नहीं बन पाए हैं कि अर्नब के पक्ष में खुलकर आ सकें। अर्नब उस सबसे बड़ी सजा की ओर बड़ी तेजी बढ़ रहे थे जो उन्हें सर्वाधिक पीड़ा देती- लोग उनके अनर्गल प्रलाप पर ध्यान देना बंद कर रहे थे। रिया-सुशांत प्रकरण में अर्नब का अनुसरण करने वाले मीडिया हाउसेस को भी यह समझ में आ गया था कि अर्नब की बराबरी करना असंभव है- अर्नब की तरह नीचे गिरने का साहस हर किसी में नहीं होता। धीरे धीरे अन्य टीवी चैनल अर्नब द्वारा परोसे गए मुद्दों को त्यागकर अपने मौलिक निरर्थक मुद्दों की ओर लौट रहे थे। ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब को पुनर्जीवित कर दिया है।
लगभग पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल, देश के सारे भाजपा शासित राज्यों के मुख्य मंत्री, भाजपा एवं कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले संगठनों के शीर्ष नेता और अनेक धर्म गुरु - सभी के सभी अर्नब के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। सोशल मीडिया पर अनेक अभियान चल रहे हैं जिनमें अर्नब को नायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि अर्नब को बहुसंख्यक हिंदुओं के हितों के लिए आवाज़ उठाने की सजा मिली है। पालघर हत्याकांड को सांप्रदायिक रंग देने वाले अर्नब को संतों की रक्षा के लिए समर्पित सेनानी का दर्जा मिल रहा है। उद्धव ठाकरे की अपने खेमे में वापसी की उम्मीदें इन साम्प्रदायिक शक्तियों को अभी भी हैं इसलिए उन्हें नासमझ बताया जा रहा है। असली निशाना कांग्रेस और वामदलों पर है।
इन साम्प्रदायिक ताकतों को बहुत कुछ अस्वीकार्य है। अहिंसक गाँधी और उनके नेतृत्व में चला सर्वसमावेशी स्वाधीनता आंदोलन, देश का संविधान, वैज्ञानिक चेतना संपन्न नेहरू और उनकी प्रखर बौद्धिकता- साम्प्रदायिक शक्तियों की इनसे सिर्फ असहमति ही नहीं है बल्कि शत्रुता है। यदि कोई टाइम मशीन होती तो वे पीछे लौटकर अपनी पसंद का हिंसा, वैमनस्य और विभाजन से परिपूर्ण इतिहास गढ़ लेते किंतु सौभाग्य से ऐसा संभव नहीं है। अहिंसा, प्रेम,शांति, सहिष्णुता और सद्भाव की गौरवशाली विरासत अब हमारे स्वभाव और जीवनचर्या का सहज अंग बन चुकी है।
अर्नब और कंगना जैसे लोग हमें बार बार ललकारेंगे – आओ! मुझ पर प्रहार करो। आओ! मुझसे संघर्ष करो! यह उनकी बुनियादी रणनीति है। प्रतिशोध, हिंसा और घृणा का विमर्श उनका होम ग्राउंड है। उनकी चुनौती स्वीकार कर ही हम उन्हें विजयी बना देते हैं। यदि हम इनका प्रतिकार न करें तो ये स्वतः ही अपने क्रोध और घृणा की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएंगे। यदि इनके आरोपों, आक्षेपों और अनर्गल प्रलाप से हम दुविधाग्रस्त और आक्रोशित होते हैं तो इसका अर्थ यही है कि इस मुल्क की प्यार,अमन और भाईचारे की साझा विरासत पर हमारे विश्वास में कहीं कोई कमी है।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
मंगलवार को बिहार के साथ-साथ कई राज्यों में हुए उपचुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है. 11 राज्यों की 58 विधानसभा सीटों पर हुए चुनाव के नतीजे आ गए हैं.
इनमें से सबसे अहम मध्य प्रदेश को माना जा रहा था जहां इस उपचुनाव के नतीजों पर शिवराज सिंह चौहान सरकार का भविष्य टिका था. पर वहाँ बीजेपी ने 28 सीटों में से 19 सीटों पर जीत हासिल कर आसानी से बहुमत हासिल कर लिया है. कांग्रेस ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की है.
राज्य में इस साल मार्च में कांग्रेस के विधायकों ने त्यागपत्र दे दिया था जिससे अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार गिर गई थी.

अधिकांश विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक थे, जो बाद में सिंधिया के साथ बीजेपी में शामिल हो गए.
230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में बहुमत के लिए 116 सदस्यों का समर्थन ज़रूरी है. उपचुनाव से पहले बीजेपी के पास 107 विधायक थे, जबकि कांग्रेस के पास 87 विधायक थे.

शिवराज सिंह चौहान
कमलनाथ, सिंधिया और शिवराज तीनों के लिए बहुत अहम हैं मध्य प्रदेश विधानसभा के उप-चुनाव
इस जीत पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट किया, '' यह कांग्रेस के झूठ, फ़रेब, दम्भ और अहंकार की पराजय है. सत्य परेशान हो सकता है, किंतु पराजित नहीं. कांग्रेस के नेताओं ने समाज के प्रत्येक वर्ग का अपमान किया. प्रदेश के लोगों का विश्वास कांग्रेस ने तोड़ा, उनके मान-सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुँचाई, लोगों ने उनसे बदला ले लिया. ''
यह जीत है विकास की!
— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) November 10, 2020
यह जीत है विश्वास की!
यह जीत है सामाजिक न्याय की!
यह जीत है लोकतंत्र की!
यह जीत है मध्यप्रदेश की जनता की!
जनता ने @BJP4MP को अपना आशीर्वाद और स्नेह दिया, हम पर विश्वास जताया, मैं प्रण लेता हूँ कि राज्य के कल्याण में कोई भी कमी नहीं आने दूंगा! #BJP4MP
गृहमंत्री अमित शाह ने बधाई देते हुए ट्वीट किया, '' मध्य प्रदेश उपचुनावों में भाजपा की शानदार जीत पर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान , प्रदेश अध्यक्ष श्री वीडी शर्मा और मध्यप्रदेश के कर्मठ कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई. प्रदेश की जनता का भाजपा की विकास-नीति और मोदी जी व शिवराज जी की जोड़ी में विश्वास व्यक्त के लिए धन्यवाद देता हूं. ''
मध्य प्रदेश उपचुनावों में भाजपा की शानदार जीत पर मुख्यमंत्री श्री @ChouhanShivraj, प्रदेश अध्यक्ष श्री @vdsharmabjp और @BJP4MP के कर्मठ कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई।
— Amit Shah (@AmitShah) November 10, 2020
प्रदेश की जनता का भाजपा की विकास-नीति और मोदी जी व शिवराज जी की जोड़ी में विश्वास व्यक्त के लिए धन्यवाद देता हूं।

यूपी में भी बीजेपी की बड़ी जीत
उत्तर प्रदेश में सात विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी ने छह सीटें जीत ली हैं. एक सीट समाजवादी पार्टी के खाते में गई है.
उ.प्र. की 07 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में @BJP4UP का प्रदर्शन आदरणीय प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन व प्रेरणा से सम्पन्न हुए सेवा कार्यों का सुफल है।
— Yogi Adityanath (@myogiadityanath) November 10, 2020
मैं इस उपलब्धि के लिए संगठन व समस्त कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन करता हूं।
उत्तर प्रदेश की जनता को हार्दिक धन्यवाद!
बीजेपी ने बांगरमऊ, देवरिया, बुलंदशहर, नौगांवा सादत, टूंडला और घाटमपुर में जीत दर्ज की है.
मल्हनी सीट सपा के लकी यादव ने जीती है.
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हुए ट्वीट किया, '' उ.प्र. की 07 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन आदरणीय प्रधानमंत्री जी के मार्गदर्शन व प्रेरणा से सम्पन्न हुए सेवा कार्यों का सुफल है. मैं इस उपलब्धि के लिए संगठन व समस्त कार्यकर्ताओं का हार्दिक अभिनंदन करता हूंउत्तर प्रदेश की जनता को हार्दिक धन्यवाद.''
तेलंगाना में बीजेपी ने टीआरएस से छीनी सीट
बीजेपी ने तेलंगाना की दुब्बाक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी जीत हासिल की है.
वहाँ बीजेपी उम्मीदवार माधवानेनी रघुनंदन राव की जीत की खूब चर्चा हो रही है क्योंकि ये सीट सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति यानी टीआरएस का गढ़ मानी जाती रही है.
The @BJP4Karnataka’s victories in Rajarajeshwarinagar and Sira are extremely special. It reaffirms the people’s unwavering faith in the reform agenda of the Centre and State Government under @BSYBJP Ji. I thank the people for their support and laud the efforts of our Karyakartas.
— Narendra Modi (@narendramodi) November 10, 2020
ये सीट टीआरएस के विधायक रामलिंगा रेड्डी की मृत्यु की वजह से खाली हुई थी.
दुब्बाक का चुनाव सत्ताधारी टीआरएस के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया था क्योंकि इसकी सीमा तीन महत्वपूर्ण विधान सभा सीटों से लगती है.
एक ओर गजवेल है जो मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की सीट है, दूसरी ओर सिरसिल्ला है जो मुख्यमंत्री के बेटे और आईटी मंत्री केटी राव की सीट है और तीसरी ओर सिद्धिपेट है जो मुख्यमंत्री के भतीजे हरीश राव की सीट है.
इस सीट पर जीत के साथ बीजेपी की राज्य में 2 सीटें हो गई हैं. 2019 के चुनाव में बीजेपी को महज एक सीट पर जीत मिल सकी थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस जीत को एतिहासिक बताते हुए ट्वीट कर कहा - ''मैं दुब्बाक के लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने बीजेपी को आशीर्वाद दिया. यह एक एतिहासिक जीत है और राज्य की सेवा के लिए हमारी प्रेरणा को ज्यादा मजबूत करती है. हमारे कार्यकर्ताओं ने कड़ी मेहनत की और बीजेपी के विकास के एजेंडे को मजबूत बनाया. ''
I thank the people of Dubbak for blessing BJP Telangana. This is a historic win & gives us strength to serve the state with greater vigour. Our Karyakartas worked very hard and I laud their noteworthy efforts in furthering BJP’s development agenda: PM Modi pic.twitter.com/T7vCgpy9T7
— ANI (@ANI) November 10, 2020
गुजरात - आठों सीटों पर बीजेपी की जीत
बीजेपी ने गुजरात में भी अच्छा प्रदर्शन करते हुए आठ सीटों पर हुए उपचुनाव में सभी सीटें जीत लीं.
गुजरात के मुख्मयंत्री विजय रूपाणी ने कहा है कि ये प्रदर्शन राज्य में होनेवाले विधान सभा चुनावों का ट्रेलर है.
प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी एवं आपके मार्गदर्शन और मज़बूत नेतृत्व के लिए धन्यवाद । https://t.co/bC1CoBjQJ5
— Vijay Rupani (@vijayrupanibjp) November 10, 2020
कर्नाटक: दोनों सीटों पर बीजेपी की जीत
कर्नाटक विधानसभा के उपचुनाव में सत्तारूढ़ बीजेपी ने दोनों सीटें अपने नाम कर ली हैं.
सीरा और आरआर नगर विधानसभा सीट पर तीन नवंबर को उपचुनाव के लिए वोट डाले गए थे.
मणिपुरः बीजेपी को पाँच में से चार सीटें
मणिपुर में पाँच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे जिनमें चार भाजपा के खाते में गईं. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई है
हरियाणाः बीजेपी को एक बार फिर निराशा
हरियाणा एकमात्र राज्य रहा जहाँ का उपचुनाव बीजेपी के लिए निराशाजनक रहा.
वहाँ बरोदा विधानसभा सीट पर बीजेपी उम्मीदवार योगेश्वर दत्त को कांग्रेस उम्मीदवार इंदु राज नरवाल ने 10 हज़ार मतों से ज़्यादा के अंतर से हराकर इस सीट पर कब्ज़ा बरकार रखा.
ओलंपियन योगेश्वर दत्त बरोदा को राजनीतिक अखाड़े में दूसरी बार चुनावी मात खानी पड़ी.
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में योगेश्वर दत्त बरोदा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार कृष्णा हुडा से 4800 मतों से हार गए थे.
ये सीट इस साल अप्रैल में कृष्णा हुडा की मौत के बाद खाली हो गई थी.
छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी कांग्रेस ने जीती एकमात्र सीट
छत्तीसगढ़ की मरवाही सीट कांग्रेस के डॉक्टर केके ध्रुव ने जीत ली है.
ये सीट प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) प्रमुख अजित जोगी के निधन से खाली हुई थी.
झारखंड में दो सीटों पर उपचुनाव
झारखंड में दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे जिनमें एक सीट कांग्रेस ने तो दूसरी झारखंड मुक्ति मोर्चा ने जीती है.
नगालैंड में दो सीटों पर उपचुनाव
नगालैंड की दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे. इनमें एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत हुई है जबकि दूसरी सीट पर नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की जीत हुई है.
ओडिशा में दो सीटों पर उपचुनाव
ओडिशा में दो सीटों पर उपचुनाव हुए. दोनों ही सीटें सत्ताधारी बीजू जनता दल के खाते में गईं.
बिहार में एकमात्र लोकसभा सीट के उपचुनाव में जेडी(यू) जीता
बिहार में विधान सभा चुनाव के साथ-साथ वाल्मीकि नगर लोकसभा सीट के लिए भी उपचुनाव हुआ था जहाँ जनता दल (यूनाईटेड) की जीत हुई.
ये सीट जेडी (यू) सांसद वैद्यनाथ महतो के निधन से खाली हुई थी. पार्टी ने उन्हीं के बेटे सुनील कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था.
उन्होंने अपने निकटतम कांग्रेस प्रत्याशी को लगभग साढ़े 22 हज़ार मतों से हराया. (bbc.com/hind)
नए शोध से पता चला है कि इलाज के 90 दिनों के भीतर करीब 18.1 फीसदी मरीज किसी एक मानसिक विकार से ग्रस्त पाए गए थे
- Lalit Maurya
हाल ही में किए एक नए शोध से पता चला है कि इलाज के 90 दिनों के भीतर करीब 18.1 फीसदी मरीज किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रस्त पाए गए थे| शोध के अनुसार कोरोनावायरस से ग्रस्त लोगों में कई तरह के मनोविकारों जैसे अनिद्रा, चिंता या अवसाद का खतरा कहीं अधिक रहता है| साथ ही अध्ययन के अनुसार इन रोगियों में आगे चलकर मनोभ्रंश का खतरा कहीं अधिक बढ़ जाता है| मनोभ्रंश एक ऐसी स्थिति है जिसमें मस्तिष्क दुर्बल हो जाता है, और पागलपन की स्थिति बन जाती है| यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड द्वारा किया गया है, जोकि जर्नल लैंसेट साइकेट्री में प्रकाशित हुआ है|
अध्ययन के अनुसार कोविड-19 से ग्रस्त 5.8 फीसदी मरीजों में 14 से 90 दिनों में पहली बार मानसिक विकार के लक्षण पाए गए थे| जबकि इन्फ्लुएंजा के 2.8, सांस से जुड़े संक्रमण के 3.4, त्वचा के संक्रमण से ग्रस्त 3.3, पित्त की पथरी से ग्रस्त 3.2 और फ्रैक्चर से ग्रस्त 2.5 फीसदी मरीजों में किसी मानसिक रोग के लक्षण पहली बार देखे गए थे|
इस शोध में अमेरिका के स्वास्थ्य सम्बन्धी 6.9 करोड़ इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया है, जिसमें से 62,000 से अधिक मामले कोविड-19 से जुड़े थे| दुनिया भर में कोविड-19 के चलते बड़ी संख्या में लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा रहा है| इसके साथ ही लोगों का मानना है कि यह बीमारी मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल रही है|
मानसिक रूप से ग्रस्त लोगों में 65 फीसदी ज्यादा है कोरोना के संक्रमण का खतरा
इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर पॉल हैरिसन ने बताया कि लोगों की यह चिंता जायज है| इस शोध से पता चला है कि कोविड-19 मानसिक विकारों के खतरे को और बढ़ा रहा है| अध्ययन से यह भी पता चला है कि पहले से मानसिक रूप से बीमार लोगों में कोविड-19 के पाए जाने की संभावना 65 फीसदी ज्यादा थी।
इस शोध में शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के मरीजों के साथ इन्फ्लूएंजा, सांस की बीमारी, त्वचा के संक्रमण, हड्डी के फ्रैक्चर, पित्त और गुर्दे की पथरी जैसे रोगों से ग्रस्त मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य का विश्लेषण किया है| विश्लेषण के मुताबिक कोरोना के 18 फीसदी, इन्फ्लूएंजा के 13 फीसदी और फ्रैक्चर के करीब 12.7 फीसदी मरीजों में मानसिक विकारों के होने का खतरा होता है|
गौरतलब है कि दुनिया भर में 5 करोड़ से ज्यादा लोग इस वायरस की चपेट में आ चुके हैं। जबकि यह अब तक 12,70,494 लोगों की जान ले चुका है। भारत में भी इस वायरस के चलते अब तक 127,059 लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि यह करीब 86 लाख से भी ज्यादा लोगों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। यह वायरस कितना गंभीर रूप ले चुका है इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि यह दुनिया के 216 देशों में फैल चुका है और शायद ही इस धरती पर कोई ऐसा होगा जिसे इस वायरस ने प्रभावित न किया हो। (downtoearth)
नए अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के उपयोग में कमी आ सकती है। इसका कारण उनका इस बात पर विश्वास करना है कि जलाऊ लकड़ी (फायरवुड) का उपयोग उनके परिवारों के सेहत के लिए एलपीजी से बेहतर है।
- Dayanidhi
आमतौर पर स्वच्छ ईधन को ठोस ईंधन (जलाऊ लकड़ी) की तुलना में स्वास्थ्य और अन्य लाभ पहुंचाने वाला माना जाता है, इसलिए स्वच्छ ईधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि खाना पकाने वाले स्वच्छ ईंधन, जैसे एलपीजी की उपलब्धता के बावजूद भी ग्रामीण भारत में ठोस ईंधन का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। ग्रामीण भारत में स्वच्छ ईंधन अपनाने की गति कम क्यों है, इसको अपनाने में किस तरह की बाधाएं सामने आ रही हैं इसी को लेकर एक अध्ययन किया गया है।
नए अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन के उपयोग में कमी आ सकती है। इसका कारण उनका इस बात पर विश्वास करना है कि जलाऊ लकड़ी (फायरवुड) का उपयोग उनके परिवारों के सेहत के लिए एलपीजी से बेहतर है।
ग्रामीण भारत में महिलाओं को मुख्यत: पारिवारिक रसोइया माना जाता है। अध्ययन में शामिल लोगों को लगता है कि दोनों ईंधन सेहत के लिए ठीक हैं। इन दृष्टिकोणों को समझने से यह समझाने में मदद मिलती है कि भारत का पारंपरिक ईंधन से स्वच्छ ईंधन अपनाने की संभावना धीमी क्यों है।
जलाऊ लकड़ी से खाना पकाने वाले रसोइया जानते हैं कि इससे स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं, लेकिन उनका मानना है कि एलपीजी के उपयोग से खाना पकाने की तुलना में यह सेहतमंद है। हालांकि एलपीजी उपयोगकर्ता जो पहले लकड़ी के उपयोग से खाना बनाते थे, उनका दावा है कि उनके लिए नया ईंधन अधिक अच्छा है।
भारत में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में लोग खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन पर अधिक निर्भर हैं। स्वच्छ ईंधन से खाना पकाने के लिए सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करना संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में से एक है, जिसके लिए भारत ने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ बर्मिंघम (यूके) और क्वींसलैंड (ऑस्ट्रेलिया) के शोधकर्ताओं ने आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के चार गांवों में महिलाओं के साथ समूह चर्चा की। दो गांव ऐसे हैं जहां ज्यादातर जलाऊ लकड़ी का उपयोग किया जाता था जबकि अन्य दो में ज्यादातर एलपीजी उपयोगकर्ता शामिल थे, जिन्होंने जलाऊ लकड़ी के उपयोग को छोड़कर स्वच्छ ईंधन को अपनाया था। यह अध्ययन नेचर एनर्जी में प्रकाशित हुआ है।
जलाऊ लकड़ी उपयोगकर्ताओं का मानना था कि इस ईंधन से खाना पकाने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है क्योंकि जलाऊ लकड़ी की बिक्री से आय होती है, जबकि ईंधन इकट्ठा करने से उन्हें आपस मे मेल-जोल बढ़ाने का अवसर मिलता है और यह एक परंपरा है जिसे वे जारी रखना चाहते हैं। उन्होंने एलपीजी को एक आर्थिक बोझ के रूप में देखा जो भोजन को अच्छा स्वाद नहीं देता है और एलपीजी सिलेंडर के फटने की आशंका बनी रहती है।
एलपीजी उपयोगकर्ताओं ने शोधकर्ताओं को बताया कि उनके ईंधन ने उन्हें सामाजिक स्थिति को सुधारने में मदद की, साथ ही बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करना आसान बना दिया। रसोई गैस से खाना पकाने से समय की बचत होती है जिसका उपयोग वे घर के बाहर काम करने और पैसा कमाने के लिए कर सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के साथ अतिरिक्त ख़ाली समय बिताकर आनंद लिया।
बर्मिंघम विश्वविद्यालय में पर्यावरण और समाज में वरिष्ठ व्याख्याता और सह-अध्ययनकर्ता डॉ. रोजी डे, ने कहा कि भारत के स्वच्छ ईंधन को अपनाने के उद्देश्य के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में ठोस ईंधन का उपयोग इस बात का संकेत देता है कि स्वच्छ ईंधन का व्यापक और निरंतर उपयोग अभी एक दूर की वास्तविकता है।
डे, ने कहा जबकि खाना बनाना केवल एक महिला का काम नहीं है, वास्तविकता यह है कि, ग्रामीण भारत में, महिलाओं को प्राथमिक रसोइया माना जाता है। इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि अगर भारत को प्रगति करना है तो महिलाओं की भलाई और खाना पकाने के ईंधन में बदलाव कर स्वच्छ ईंधन को अपनाना ही होगा।
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के लिए भविष्य में हस्तक्षेप कर इसमें महिलाओं को सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए जिन्होंने ठोस ईंधन और स्वच्छ ईंधन का उपयोग किया है। प्रत्येक के लाभों के बारे में चर्चा करना और अलग-अलग तरीकों से खाना पकाने में मदद करना आदि शामिल है। साथ मिलकर किए जाने वाले कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, एलपीजी के सकारात्मक अच्छे पहलुओं के बारे में जानकारी देना, इससे जुड़ी चिंताओं को दूर करना और एक-दूसरे से सीखने को बढ़ावा देकर जलाऊ लकड़ी के उपयोगकर्ताओं को समझाया जा सकता है।
अध्ययन में तीन प्रमुख चीजों की पहचान की गई है, जिन पर नीति निर्माताओं द्वारा विचार किया जा सकता हैं:
उपयोगकर्ताओं को लगता है कि दोनों ईंधन में कम से कम कुछ महत्वपूर्ण अच्छाइयां हैं
इसे समझने से यह समझाने में मदद मिलती है कि लोगों को केवल स्पष्ट स्वास्थ्य लाभ के आधार पर स्वच्छ ईंधन अपनाने के लिए राजी क्यों नहीं किया जा सकता है।
खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन को अपनाने के बाद हुए अच्छे बदलावों पर महिलाओं के विचारों को जानना।
एलपीजी और जलाऊ लकड़ी उपयोगकर्ताओं ने बताया जैसे कि जलाऊ लकड़ी पर खाना बनाने से स्वाद बेहतर होता है, लेकिन एलपीजी उपयोगकर्ताओं को जो इसका उपयोग नही़ करते उनकी तुलना में स्वच्छ ईंधन में अधिक फायदे मिलते हैं।
अध्ययन से पता चला कि गांवों में महिलाएं अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने, अच्छी शिक्षा का समर्थन करती हैं। वे एलपीजी से खाना बना कर बचे समय में कमाई के संसाधन चुन सकती हैं, अपने दोस्तों और पड़ोसियों के साथ समय बिता सकती हैं।
डॉ डे ने कहा हमने महिलाओं के विचारों से महत्वपूर्ण समझ हासिल की है, लेकिन महिलाओं के ईंधन के उपयोग और अन्य व्यवस्थाओं में लाभ के बीच संबंध का विश्लेषण करने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है। यह हमारी समझ को बढ़ाने में मदद करेगा कि सामाजिक और सांस्कृतिक कारक किस तरह स्वच्छ ईंधन को अपनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।(downtoearth)
बिहार विधानसभा के लिए तीन चरणों में हुए चुनाव में बिहार में एनडीए सरकार की वापसी का रास्ता साफ हो गया है. मंगलवार को हुई मतगणना में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) को 126 तो प्रतिद्वंदी महागठबंधन को 109 सीटें मिली हैं.
डॉयचे वैले पर मनीष कुमार की रिपोर्ट-
तीन चरणों में 28 अक्टूबर, तीन व सात नवंबर को हुए बिहार चुनाव के परिणामों ने पिछली विधानसभा चुनाव की तरह ही एक बार फिर एक्जिट पोल के नतीजे को नकार दिया है. 2020 के इस विधानसभा चुनाव में 74 सीटों पर विजयी होकर भारतीय जनता पार्टी तेजस्वी यादव के आरजेडी के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. कांटे की टक्कर में कभी कोई आगे जाता दिखा तो कभी कोई पीछे. बिहार में एकबार फिर नीतीश कुमार सरकार के मुखिया बनेंगे. एनडीए ने यह चुनाव ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा था. पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर व जयप्रकाश नारायण के शिष्य रहे 69 वर्षीय नीतीश कुमार ने अपना पहला चुनाव जनता पार्टी के टिकट पर 1977 में लड़ा था. करीब 32 फीसद वोट हासिल करने के बाद भी वे निर्दलीय प्रत्याशी भोला सिंह से चुनाव हार गए थे. दूसरी बार उन्होंने 1980 में चुनाव लड़ा लेकिन वे फिर हार गए.
बीजेपी समर्थकों में जीत की खुशी
दो बार की हार से विचलित हुए बिना नीतीश 1985 में लोकदल के उम्मीदवार बने और भारी मतों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे. उन्हें करीब 54 प्रतिशत वोट मिले थे. इसके बाद नीतीश कुमार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. यह जरूर है कि साल 1989 में उनके राजनीतिक जीवन में खासा उछाल आया. 1989 में बाढ़ (पटना) लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर अप्रैल 1990 से नवंबर, 1991 तक वे केंद्रीय कृषि मंत्री रहे. 1991 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए. 1995 में जार्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर उन्होंने समता पार्टी बनाई. फिर 1996 में भी वे सांसद चुने गए. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वे रेल मंत्री बने. 1999 में फिर 13वीं लोकसभा के लिए चुने गए और फिर केंद्रीय मंत्री बने.
सात दिन के मुख्यमंत्री
नीतीश कुमार पहली बार तीन मार्च, 2000 को बिहार के मुख्यमंत्री बने किंतु उनका यह कार्यकाल महज सात दिनों का यानी दस मार्च तक रहा. 2004 में वे छठी बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. इसके बाद वे फिर 24 नवंबर, 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने. 2010 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर बिहार सरकार के मुखिया बने किंतु लोकसभा चुनाव में हुई हार की वजह से उन्होंने इस्तीफा देकर 20 मई, 2014 को जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. मांझी 20 फरवरी, 2015 तक मुख्यमंत्री रहे.
तेजस्वी ने दी कड़ी टक्कर
नीतीश कुमार ने 2015 में एनडीए से नाता तोड़ लिया और उसके बाद अपने विरोधी राजद व कांग्रेस के साथ मिलकर उन्होंने महागठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा और 22 फरवरी, 2015 को पुन: उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. हालांकि 18 महीने तक सरकार चलाने के बाद 2017 में महागठबंधन से अलग होकर वे एक बार फिर अपने पुराने सहयोगी एनडीए के साथ आ गए और बीजेपी तथा अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई.
कोरोना सुरक्षा में वोटों की गिनती
2020 के चुनाव परिणाम में जो एक खास बात सामने आई है, वह है जदयू के सीटों की संख्या में कमी आना. एनडीए में जदयू अब तक बड़े भाई की भूमिका में था जबकि भाजपा छोटे भाई की. इस बार जदयू के सीटों की संख्या में खासी कमी आ गई. इस चुनाव में भाजपा को 74 तथा जदयू को 44 सीटें मिलीं. 2015 में जदयू को 71 तथा भाजपा को 53 सीटें मिलीं थीं. इसकी सबसे बड़ी वजह लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) रही. लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की घटक है किंतु बिहार विधानसभा चुनाव में उसने एनडीए के साथ दोस्ताना लड़ाई लड़ी.
लोजपा प्रमुख ने उन सभी जगहों पर अपने उम्मीदवार दिए जहां से जदयू के प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे. चुनाव प्रचार में भी उन्होंने नीतीश कुमार पर तीखा हमला किया. यहां तक की उन्हें जांच के बाद जेल भेजने की बात कही. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि लोजपा की वजह से वोटों का बिखराव हुआ. जिन जगहों पर भाजपा थी वहां तो जदयू का वोट भाजपा को ट्रांसफर हुआ किंतु उन जगहों पर जहां जदयू के उम्मीदवार थे वहां भाजपा के वोटों का बिखराव हुआ.
नीतीश मुख्यमंत्री रहेंगे या नहीं
अब जब नीतीश कुमार की पार्टी जदयू व भाजपा की सीटों का फासला काफी है इसलिए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे या कोई और? पत्रकार सुमन शिशिर कहते हैं, "यही तो भाजपा की रणनीति थी और वह नीतीश कुमार का कद छोटा करने में सफल भी रही. इसलिए लोजपा को एक मायने में छूट ही दी गई थी." वाकई राजनीतिक गलियारे से अब यह चर्चा जोर पकड़ रही कि क्या मुख्यमंत्री भाजपा का होगा या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे. ऐसे भाजपा के बड़े से बड़े नेता कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार ही हमारे मुख्यमंत्री होंगे और भाजपा जैसी बड़ी पार्टी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि मुख्यमंत्री के नाम पर वह किसी भी रूप में पुनर्विचार करेगी. जहां तक नीतीश कुमार को जानने वाले लोगों का कहना है कि भाजपा तो अपनी ओर से ऐसा कुछ नहीं कहने जा रही किंतु सीटों के फासले को देखते हुए संभव है कि नीतीश कुमार खुद ही कोई फैसला ले सकते हैं.
आरजेडी समर्थकों का जश्न
वाकई, कोरोना संकट के दौरान हुआ यह विधानसभा चुनाव सत्तारूढ़ दल के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था. कोरोना के कारण लॉकडाउन के कारण प्रवासियों की स्थिति को लेकर भी बिहार सरकार की किरकिरी हुई थी और प्रदेश में आई बाढ़ ने भी कोढ़ में खाज का काम किया. फिर तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नौकरी देने, कांट्रैक्ट पर नियुक्त विभिन्न सेवा संवर्ग के लोगों के मानदेय में इजाफा करने तथा समान काम के लिए समान वेतन जैसी लोकलुभावन घोषणाओं ने एनडीए को काफी मुश्किल में डाला. किंतु, परिणामों ने यह साबित कर दिया कि लोग नीतीश कुमार को एक और मौका देना चाहते हैं और शायद इसलिए कांटे की टक्कर होते हुए भी एनडीए को विजयश्री हासिल भी हुई.(dw.com)
- अनंत प्रकाश
चिराग पासवान को इस चुनाव से क्या मिला? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब देना थोड़ा मुश्किल है. विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को सिर्फ़ एक सीट ही नसीब हुई है.
दिवंगत पिता रामविलास पासवान की बनाई लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) ने 147 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. लेकिन जीत उन्हें एक ही सीट पर मिली है. सियासी उठापटक में इस बार चिराग पासवान नाकाम नज़र आ रहे हैं.
चुनाव से पहले तक एनडीए में शामिल रही एलजेपी ने नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था लेकिन अब एनडीए के पास स्पष्ट बहुमत है और नीतीश उनके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार.
चिराग ने भले ही बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ ज़्यादा कुछ न कहा हो लेकिन राघोपुर जैसी वीवीआईपी सीट पर बीजेपी ने तेजस्वी यादव की टक्कर में सतीश कुमार को चुनाव मैदान में उतारा लेकिन लोजपा ने भी एक ठाकुर उम्मीदवार राकेश रोशन को टिकट दिया.
हालांकि राघोपुर से तेजस्वी विजेता हैं.
लेकिन क्या इन नतीज़ों को चिराग पासवान के लिए भला कहा जा सकता है? क्या चिराग अपने पिता रामविलास पासवान की सौंपी हुई विरासत को आगे ले जा पाए हैं?
रील से रियल लाइफ़ तक चिराग
उनकी ज़िंदगी का पहला सपना बिहार और राजनीति से बहुत दूर फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाना था. बकौल चिराग, उन्होंने मुंबई में कई डांस और एक्टिंग की ट्रेनिंग भी ली थी. चिराग ने एमिटी यूनिवर्सिटी से बीटेक कोर्स में दाखिला ले लिया लेकिन सिनेमा के पर्दे का आकर्षण इतना मजबूत था कि चिराग ने बीटेक की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी.
4 जुलाई 2011 को उनकी एक फ़िल्म रिलीज़ भी हुई जिसका नाम था 'मिले न मिलें हम', फ़िल्म में उनकी हीरोइन कंगना रनौत थीं. फ़िल्म को स्टार कास्ट के लिहाज से मजबूत माना जा रहा था, क्योंकि कंगना तब तक तनु वेड्स मनु से ख़ासी मशहूर हो चुकी थीं.
पिता राम विलास पासवान और माँ रीना शर्मा पासवान भी फ़िल्म के प्रमोशन में शामिल थे. उस दौर की एक तस्वीर काफ़ी लोकप्रिय है जिसमें चिराग पासवान के पिता राम विलास पासवान, माँ रीना पासवान और कंगना रनौत एक ही फ्रेम में खड़े दिखाई देते हैं लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद ये फ़िल्म बुरी तरह फ़्लॉप हुई.
लेकिन कहा जाता है कि ग़लती करने के बाद कुछ लोग ज़्यादा समझदार हो जाते हैं. संभवत: चिराग ने एक फ़्लॉप फिल्म से ही सीख ले ली कि फ़िल्म इंडस्ट्री उनके लिए नहीं है. संभव है कि एक फ़्लॉप फ़िल्म के अनुभव ने एक राजनेता के रूप में उन्हें अंदर से मजबूत किया.
इसके संकेत उनके एक इंटरव्यू में मिलते हैं. इस इंटरव्यू में जब उन्हें बताया जाता है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी उनकी फ़िल्म के प्रीमियर में पहुँचे थे. इस पर चिराग हंसते हुए जवाब देते हैं, "ये उनकी हिम्मत थी कि वे गए."

पहला दाँव ही सुपरहिट
2014 में चिराग ने अपने राजनीतिक जीवन का ऐसा दाँव खेला जिसने उन्हें राजनीतिक जीवन में बेहतरीन शुरुआत दी. ये फ़ैसला था अपने पिता यानी राम विलास पासवान को एक बार फिर एनडीए में शामिल होने के लिए मनाना.
ये एक ऐसा काम था जो कि राजनीतिक और व्यक्तिगत रूप से भी काफ़ी मुश्किल था क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में दलितों के लोकप्रिय नेता कहे जाने वाले राम विलास पासवान ने साल 2002 में गुजरात दंगों के बाद एनडीए को छोड़ने का फ़ैसला किया था.
और राम विलास पासवान की तत्कालीन गुजरात सीएम यानी नरेंद्र मोदी को लेकर राय स्पष्ट थी. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2012 में राम विलास पासवान ने कहा था कि 'गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका स्पष्ट है.'
लेकिन राम विलास पासवान के इतने मजबूत स्टैंड के बावजूद चिराग अपनी पार्टी को एनडीए की ओर मोड़ने में कामयाब हो गए. इसके बाद एनडीए ने पूरी ताक़त के साथ सत्ता में वापसी की. चिराग पासवान पहली बार बिहार की जमुई सीट से सांसद बने.
राम विलास पासवान केंद्रीय मंत्री बने और एलजेपी के छह नेता सांसद बनकर संसद भवन पहुँचे. एनडीए के साथ जाने की बात मानकर एलजेपी को जो कुछ हासिल हुआ उससे चिराग का धाक जम गई.
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा रामविलास पासवान के अंतिम वर्षों की राजनीति पर चिराग के असर को रेखांकित करते हुए एक किस्सा सुनाते हैं. लव कुमार कहते हैं, "साल 2014 में रामविलास पासवान जी ने एक दिन अपने श्रीकृष्णापुरी वाले आवास पर नाश्ते के लिए बुलाया. उस वक़्त रामविलास जी एनडीए में पावरफुल नहीं हुए थे क्योंकि कांग्रेस छोड़कर इधर आए ही थे. इस मुलाक़ात पर मैंने उनसे पूछा कि आप क्यों अलग हो गए कांग्रेस से. सोनिया गाँधी जी तो पैदल चलकर भी गईं थीं, आपको मनाने के लिए."
"इस पर रामविलास जी बोले कि 'वो मेरा डिसिज़न नहीं था, चिराग का फ़ैसला था. चिराग ने राहुल गाँधी को दस बार फ़ोन किया कि हमको कितना सीट दीजिएगा, इस पर बैठकर बात करना है लेकिन राहुल गाँधी ने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया. तो एक दिन उसने रात में मुझको बताया कि ये अभी हमें इतना नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, बाद में क्या करेंगे."

महानगरीय नेता की छवि
चिराग पासवान को पहली नज़र में देखें तो ऐसा लगता है कि दिल्ली और बेंगलुरु जैसे किसी शहर का युवा नेता आपके सामने आ गया हो. कुर्ते के साथ जींस पहनने का अंदाज़, दिन में कई-कई बार कपड़े बदलने की आदत और दिल्ली वाले अंदाज़ में बातचीत करना.
ये सब वो बाते हैं जो दिल्ली के टीवी स्टूडियो में बैठकर बात करने वाले किसी प्रवक्ता को आगे बढ़ा सकती हैं लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में सफल होने के लिए खांटी देसी अंदाज़ की ज़रूरत पड़ती है.
चिराग की राजनीति को क़रीब से देखने वाले कहते हैं कि उनकी भाषा में बिहारी महक, संवेदनशीलता और अपनापन नहीं है, वे दिल्ली मुंबई की राजनीति करने वाले किसी नेता जैसे सुनाई पड़ते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिहार के समाज में वे अपने पिता की तरह मजबूत जगह बना पाएंगे.
लव कुमार मिश्रा इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं, "आप चिराग को देखें तो नीचे रहेगी जींस और ऊपर होगा कुर्ता, इसके ठीक उलट हैं तेजस्वी यादव. वह कुर्ता पायजामा और गमछे के साथ नज़र आते हैं. चिराग जहां जाएंगे, वहां लोगों से दूरी बनाकर बैठते हैं. वहीं, तेजस्वी में ये बात नहीं है. पब्लिक मीटिंग में भी वह लोगों को अपने मंच के पास बुला लेते हैं. और देर से सोकर उठने की आदत है. जो पहले तेजस्वी की भी थी लेकिन अब वे 9 बजे उठकर चले जाते हैं, चुनाव प्रचार पर. एक और बात ये है कि तेजस्वी कई लोगों को पहचानते हैं. वहीं चिराग ज़्यादा लोगों को जानते नहीं हैं. यही नहीं, अपने परिवार में भी सभी से इनके संबंध मधुर नहीं हैं. इनके चाचा पशुपति नाथ पारस रामविलास जी के श्राद्ध के बाद से घर नहीं गए हैं. इस मामले में चिराग अपने पिता से भी अलग हैं क्योंकि राम विलास जी भी सभी को साथ लेकर चलते थे."
"इसके साथ ही चिराग में अनुभव और मेच्योरिटी की कमी है और सबसे अहम बात है कि बिहारी अंदाज़ नहीं है उनमें. और बिहार की राजनीति के लिए स्थानीय भाषा में बात करना बेहद ज़रूरी है. ये दिल्ली की राजनीति नहीं है, टाउन की. यहां गाँव देहात में जाएंगे तो दादा दादी, चाचा चाची करना ही पड़ेगा. उन्हीं की भाषा में बोलना पड़ेगा, उन्हीं की खटिया पर बैठकर खाना पड़ेगा. चिराग ये सब नहीं कर पाते हैं. रामविलास जी ठीक इसके उलट थे. उन्हें अगर कोई पत्रकार अपने यहां छठी में भी बुला लेता था तो चले जाते थे. कोई शिकायत करता था कि आप हमारे यहां तिलक में नहीं आए तो वह अगले दिन ही पहुंच जाते थे. ऐसे में व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने को लेकर चिराग में अनुभव की कमी है."
रामविलास पासवान के संबंधों की बात करें तो उनके हर पार्टी में दोस्त हुआ करते थे. राजनीतिक दल ही नहीं, उनके कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी में हर जगह उनको जानने वाले लोग हुआ करते थे. खाट पर बैठकर दलितों की राजनीति करने से लेकर वे अपने स्टाइल के लिए जाने जाते थे.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अपनी स्टाइल के लिए चर्चा में आने वाले चिराग पासवान संवेदनशील होकर बिहार और भारत के दलित समाज के नेता बन पाएंगे. या सरल शब्दों में कहें तो क्या चिराग पासवान अपने पिता की दी हुई विरासत को और समृद्ध कर पाएंगे?
बिहार के दोनों राजनीतिक परिवारों से निकले तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के सामने अपनी विरासत को समृद्ध करने की चुनौती है. लेकिन चिराग पासवान के सामने एक बड़ी चुनौती तेज़ी से बदलती ज़मीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने पिता की छोड़ी हुई राजनीतिक पूँजी को आगे बढ़ाना है.
राजनीतिक विरासत का बोझ
राम विलास पासवान भले ही 1996 के बाद से लेकर 2020 तक किसी न किसी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हों लेकिन बिहार की राजनीति में वे हमेशा लालू और नीतीश के बाद तीसरे नंबर पर ही गिने गए. इसकी वजह उनकी पार्टी का राजनीतिक कद और वोट शेयर रहा है.
साल 2005 में भले ही रामविलास पासवान ने लालू को सत्ता से बाहर कर दिया हो लेकिन वे कभी भी खुद अपने दम पर सत्ता में आने जितना समर्थन नहीं जुटा सके. अब रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान जात की जगह जमात की बात करते नज़र आते हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उनका ये दाँव एलजेपी का जनाधार बढ़ाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद बताते हैं, "बिहार में दलितों की डेमोग्राफ़ी थोड़ी अलग है. उत्तर प्रदेश में मायावती को एक फायदा मिल गया तो उनकी राजनीति हो गई. वहां 21.3 फ़ीसद दलित हैं. इसमें से 14 फ़ीसद रविदासी हैं जो कि बहुत बड़ा तबका है. ऐसे में वह कभी ब्राह्मणों से तो कभी मुसलमानों से समर्थन लेकर सत्ता में आ गईं. राम विलास के साथ में 15 से 16 फ़ीसद दलित हैं. इसमें से पासवान मात्र 5 से 6 फ़ीसद हैं. और यहां बिहार में रविदास जाति सामान्यत: इनके साथ नहीं आते हैं. मुसहर जाति जीतन राम माँझी के साथ जाती है. ऐसे में दलित उपजातियों में लोजपा की पकड़ नहीं है. ऐसे में अन्य जातियों पर पकड़ रामविलास भी नहीं बना पाए थे और संभवत: ये भी नहीं बना पाएंगे."

राजनीतिक समझ
चिराग पासवान किसी समझदार और अनुभवी नेताओं की तरह भविष्य की संभावनाओं से इनकार करते हुए नज़र नहीं आते हैं.
राहुल गाँधी से लेकर तेजस्वी यादव और बीजेपी के शीर्ष नेताओं मोदी, शाह और नड्डा के प्रति किसी तरह का द्वैष नहीं ज़ाहिर करते हैं लेकिन जब ज़मीनी राजनीति की बात आती है तो चिराग पासवान अपनी ही पार्टी से बीजेपी के बाग़ी नेताओं को एलजेपी का टिकट सौंप देते हैं.
सुरूर अहमद बताते हैं, "बिहार में बीजेपी तीन भागों में बंटती दिख रही है. एक धड़ा सुशील मोदी के नेतृत्व में काम कर रहा है, ये चाहता है कि कह रहे हैं कि नीतीश सत्ता से चिपके हुए हैं, पार्टी को बर्बाद कर दिया है. दूसरा धड़ा है-गिरिराज़ सिंह और अश्विनी चौबे जैसे लोगों का जो केंद्र में हैं. ये तबका भी नीतीश को अब बर्दाश्त नहीं करना चाहता. अब बात आती है तीसरे धड़े की. ये वो धड़ा है जिसे टिकट ही नहीं मिल पाए, और इनमें काफ़ी सम्मानित लोग जैसे राजेंद्र सिंह, रामेश्वर चौरसिया. ये वो बड़े बड़े लोग थे जो आरएसएस में तीस-तीस पैंतीस-पैंतीस साल रहे. पिछले बार उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना दिया गया. अब ये जो आख़िरी धड़ा था, ये लोजपा में चला गया."
चिराग जहां वे अपने मंचों से नीतीश पर निशाना साध रहे थे, वहीं इंटरव्यू में पीएम मोदी की तारीफ़ कर रहे थे.
दस नवंबर को मिलेंगे कितने अंक
चिराग पासवान बार-बार हर इंटरव्यू में दावा कर रहे हैं कि इस चुनाव में अकेले लड़ने का सपना उनके पिता ने देखने को कहा था. वे कहते हैं कि राम विलास जी कहा करते थे कि जब वो 2005 में ये कर सकते थे तो वह 2020 में क्यों नहीं करते, वे तो अभी काफ़ी युवा हैं.
वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर मानते हैं कि इस चुनाव के रास्ते चिराग एलजेपी के जनाधार को दलित से आगे बढ़कर दूसरे तबकों तक पहुंचाना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "चिराग पासवान का जो रुख दिख रहा है, उससे ऐसा लगता है कि वह अपनी पार्टी का जनाधार सभी जातियों, समाजों में बढ़ाना चाहते हैं. वह एक युवा नेता के रूप में अपनी संभावना देख रहे हैं क्योंकि बिहार में उभरते हुए युवा नेता अभी सिर्फ तेजस्वी यादव हैं. तेजस्वी लालू यादव परिवार से आते हैं तो चिराग पासवान परिवार से आते हैं. और बिहार की जनता को लग रहा है कि ये दोनों युवा नेता बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के लिए जो खाली जगह है, उसे भरना चाहते हैं. इन दोनों नेताओं को भी बिहार में अपना एक राजनीतिक भविष्य दिख रहा है. और इस चुनाव ने एक कैटेलिस्ट की भूमिका निभाई है."
चिराग का दावा था कि जब दस नवंबर को चुनाव नतीजे आएंगे तो उनकी पार्टी सामान्य से ज़्यादा वोट प्रतिशत हासिल करेगी. लेकिन इन चुनावों में भी लोक जनशक्ति पार्टी छह फ़ीसद वोट शेयर पर सिमटती दिख रही है.
मगर लव कुमार की मानें तो चिराग भले ही अपने पिता की दी हुई विरासत को आगे न बढ़ा पाए हों लेकिन उन्होंने पिता की विरासत को संभाल ज़रूर लिया है. वे कहते हैं, "समझने की बात ये है कि चिराग ने नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचाने की बात कही थी. और वह ये करने में सक्षम हो गए हैं."
साल 2015 में महागठबंधन के साथ लड़ने वाली जदयू ने 71 सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन इस बार एनडीए के साथ लड़ने वाली जदयू 71 का आँकड़ा छूती नहीं दिख रही है. लेकिन एक सवाल रह जाता है कि इक्का-दुक्का सीटें हासिल करके चिराग पासवान अगले पाँच साल तक अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को कैसे बचाकर रख पाएंगे.
इस सवाल के जवाब में लव कुमार बताते हैं कि "चिराग ने ये कभी नहीं कहा है कि उन्होंने दिल्ली में एनडीए छोड़ी है, ऐसे में वह दिल्ली में अपनी संभावनाएँ तलाश सकते हैं."
लेकिन इन चुनावी नतीजों से इतना साफ़ है कि अब वो सिर्फ राम विलास पासवान के बेटे नहीं हैं बल्कि बिहार में खड़े होकर नीतीश कुमार को सीधे निशाने पर लेने वाले युवा नेता की छवि बना चुके हैं.(bbc)
- दिलनवाज़ पाशा
बिहार के सीमांचल इलाक़े में 24 सीटे हैं जिनमें से आधी से ज़्यादा सीटों पर मुसलमानों की आबादी आधी से ज़्यादा है. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम इनमें से पांच सीटों जीत हासिल की है.
चुनाव नतीजे आने से पहले राजनीतिक विश्लेषक ये मान रहे थे कि सीमांचल के मुसलमान मतदाता ओवैसी की पार्टी के बजाए धर्मनिरपेक्ष छवि रखने वाली महागठबंधन की पार्टियों को तरजीह देंगे.
लेकिन, अब ये साफ़ हो गया है कि सीमांचल के मतदाताओं ने बदलाव के लिए वोट किया है.
36 और 16 सालों से मौजूद विधायक हारे
पूर्णिया की अमौर सीट पर अब तक कांग्रेस के अब्दुल जलील मस्तान पिछले 36 सालों से विधायक थे. इस बार उन्हें सिर्फ़ 11 फ़ीसद वोट मिले हैं जबकि एआईएमआईएम के अख़्तर-उल-ईमान ने 55 फ़ीसद से अधिक मत हासिल कर सीट अपने नाम की है.
बहादुरगंज सीट पर कांग्रेस के तौसीफ़ आलम पिछले सोलह सालों से विधायक हैं. इस बार उन्हें दस फ़ीसद मत ही मिले हैं जबकि एआईएमआईएम के अंज़ार नईमी ने 47 फ़ीसद से अधिक मत हासिल कर ये सीट जीती है.
हसन जावेद कहते हैं, "महागठबंधन को लग रहा था कि सीमांचल से आसानी से सीटें निकल जाएंगी और वो राज्य में सरकार बना लेंगे. लेकिन यहां नतीजे इसके उलट रहे हैं."

'अलग पहचान चाहते हैं मुसलमान'
चुनाव अभियान के दौरान सीमांचल का दौरा करने वाले स्वतंत्र पत्रकार पुष्य मित्र कहते हैं, "मुसलमान वोटर अपनी अलग पहचान चाह रहे हैं. वो नहीं चाहते कि उन्हें सिर्फ़ बीजेपी को हराने वाले वोट बैंक के तौर पर देखा जाए. वो अपने इलाक़े में बदलाव चाहते हैं, विकास चाहते हैं."
पुष्य मित्र कहते हैं, "सीमांचल इलाक़े में विकास अवरुद्ध रहा है. यहां पुल-पुलिया टूटे हुए नज़र आते हैं. लोग अभी भी कच्चे पुलों पर यात्रा करते हैं. यहां धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जीतते रहे उम्मीदवार विकास कार्यों में दिलचस्पी नहीं लेते हैं."
वहीं, हसन जावेद कहते हैं कि इस बार इस इलाक़े के मुसलमानों की मांग थी कि कांग्रेस और राजद अपने पुराने उम्मीदवारों को बदल दें लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसकी वजह से एआईएमआईएम को अपनी ज़मीन मज़बूत करने का मौका मिल गया.
हसन जावेद कहते हैं, "कांग्रेस यहां के मुसलमानों को अपने बंधुआ वोटर जैसा समझ रही थी जबकि लोग बदलाव चाह रहे थे. यही वजह है कि कई सीटों पर लंबे समय से जीतते आ रहे उम्मीदवारों को इस बार जनता ने पूरी तरह नकार दिया है."
पुष्य मित्र कहते हैं, "सीमांचल में राजनीति में नई पीढ़ी को जगह नहीं मिल पा रही थी. पुराने लोग ही खूंटा गाड़कर बैठे थे. जबकि नई उम्र के मुसलमान वोटर अपने लिए नए चेहरे चाहते हैं."
एआईएमआईएम ने नहीं काटे वोट
एआईएमआईएम के मैदान में आने की वजह से आरजेडी और कांग्रेस को सीटों का नुकसान तो हुआ है लेकिन ऐसा नहीं कि एमआईएमआईएम ने वोट काट लिए हों.
ओवैसी की पार्टी ने इस बार बीस सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच पांच सीटों पर जीत हासिल की है. उनके अलावा दूसरी सीटों पर उसे बहुत ज़्यादा वोट नहीं मिले (bbc)
-महेश झा
जर्मन इस्लाम कॉन्फ्रेंस की स्थापना 2006 में इस उद्देश्य से की गई थी कि देश के मुस्लिम समुदायों के साथ नियमित संवाद हो सके. जर्मनी में करीब 40 लाख मुसलमान रहते हैं, जो विभिन्न देशों से आते हैं. अलग अलग आबादी का होने के कारण सबकी अपनी मस्जिदें भी नहीं हैं और जो मस्जिदें हैं भी उनमें काम करने वाले इमामों की ट्रेनिंग पहले दूसरे देशों में होती रही है.
मुस्लिम परिवारों के बच्चों को धार्मिक शिक्षा देने का मसला भी लंबे समय से बहस में था, और कोई केंद्रीय संगठन नहीं होने के कारण सरकार के साथ बात करने वाली कोई प्रतिनिधि संस्था नहीं थी. जर्मनी के प्राथमिक स्कूलों में ईसाई धार्मिक शिक्षा दी जाती है, लेकिन इसका आधार कैथोलिक और इवांजेलिक संगठनों के साथ सरकार का समझौता है.
जर्मन इस्लाम कॉन्फ्रेंस की स्थापना के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम प्रतिनिधियों के साथ सरकारी प्रतिनिधियों की बैठक के अलावा जरूरी मुद्दों पर चर्चा भी होती रही है. इनमें स्कूलों में धार्मिक शिक्षा के अलावा इस्लामी धर्मशास्त्र की पढ़ाई और इमामों की ट्रेनिंग भी शामिल है. इस्लाम कॉन्फ्रेंस ने मुस्लिम समुदाय को धार्मिक मामलों में सलाह देने वाले मौलवियों के प्रशिक्षण का बीड़ा उठाया है.
भारत के जफर खान जर्मन इस्लाम कॉन्फ्रेंस के इस कदम को बहुत महत्वपूर्ण कदम मानते हैं. जर्मनी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद एक बिजली कंपनी में काम करने वाले जफर खान का कहना है कि बच्चों के लिए उनके पुरखों के धर्म के बारे जानना जरूरी है. यह उन्हें नैतिक संबल भी देता है. भारतीय मुसलमानों की पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण मुस्लिम परिवारों को अपने बच्चों को अब तक तुर्क मौलवियों के पास भेजना होता था. लेकिन पढ़ाई की भाषा तुर्की होने के कारण बच्चों को काफी दिक्कत होती है. जफर खान कहते हैं, "चूंकि जर्मनी में पैदा होने वाले बच्चों की भाषा जर्मन है, इसलिए जर्मन में प्रशिक्षित इमाम उन्हें बेहतर शिक्षा दे पाएंगे."
जफर खान इसके एक और फायदे की ओर भी इशारा करते हैं. वे कहते हैं कि जर्मनी में प्रशिक्षित इमाम बच्चों को मॉडरेट इस्लाम की शिक्षा देंगे. मुस्लिम देशों से आने वाले मौलवी इस्लाम की अपने अपने देशों में चलने वाली परिभाषा सिखाते हैं, जिसकी वजह से बच्चों में उलझन पैदा होती है. ये समस्या यूरोपीय समाज भी झेल रहा है. अपने यहां पैदा हुए बच्चों में बढ़ते कट्टरपंथ से वह परेशान है. देश के अंदर मौलवियों की शिक्षा से भविष्य में धार्मिक शिक्षा की जिम्मेदारी ऐसे लोगों के कंधों पर होगी जो खुद भी पश्चिमी समाजों में पले बढ़े हैं और यहां के बच्चों और किशोरों की जरूरतों से वाकिफ हैं.
जर्मन गृह मंत्रालय में राज्य सचिव मार्कुस कैर्बर का कहना है कि विदेशों से स्वतंत्र इमाम ट्रेनिंग का कट्टरपंथ पर काबू पाने की कोशिशों में अहम स्थान होगा. उन्होंने कहा है, "जर्मनी में रहने वाले मुस्लिम समुदाय द्वारा जर्मन भाषा में इमाम प्रशिक्षण विदेशों से गलत असर डालने की कोशिशों के खिलाफ हमारी रणनीति है." कैर्बर का कहना है कि कट्टरपंथ का आकर्षण बहुत मुश्किल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है और अक्सर इंटरनेट पर हो रहा है.
ओसनाब्रुक शहर में इमामों के प्रशिक्षण के लिए इस्लाम कॉलेज की शुरुआत की गई है. वहां मुस्लिम संगठनों से स्वतंत्र इमाम प्रशिक्षण का एक प्रोजेक्ट शुरू किया गया है. राज्य सचिव कैर्बर का कहना है कि जर्मनी में रहने वाले मुस्लिम नागरिकों में धार्मिक मामले अपने हाथों में लेने की ललक है. ओसनाब्रुक के इस्लाम कॉलेज के जरिए सकारात्मक पहचान वाले एक संस्थान की स्थापना हुई है. अप्रैल 2021 से इस कॉलेज में इमाम, मौलवियों और समुदायिक सलाहकारों को प्रशिक्षण दिया जाएगा. इमाम का प्रशिक्षण पाने के लिए न्यूनतम योग्यता इस्लामिक धर्मशास्र में बैचलर की डिग्री है. (DW.COM)
-समीरात्मज मिश्र
शनिवार को बलिया जिले में एक युवती को उसके पड़ोसी युवक ने ही इसलिए आग के हवाले कर दिया क्योंकि लड़की ने उस युवक के साथ कथित तौर पर संबंध बनाने से इनकार कर दिया. लड़की गंभीर हालत में वाराणसी के बीएचयू हॉस्पिटल में जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही है.
दो दिन पहले देवरिया जिले के एकौना थाना क्षेत्र में कथित तौर पर बेटी के साथ छेड़छाड़ का विरोध करने पर 50 वर्षीय एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. पुलिस ने इस मामले में 8 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है, जिनमें से सात अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा चुका है.
नवंबर महीने के पहले दिन ही फिरोजाबाद में छेड़छाड़ का विरोध करने पर कुछ लोगों ने एक महिला के ऊपर तेजाब फेंक दिया. पीड़ित महिला का इलाज सरकारी अस्पताल में चल रहा है.
इस घटना के कुछ दिन बाद ही फिरोजाबाद में एक युवक ने घर में घुसकर युवती से छेड़छाड़ करने की कोशिश की. युवती के विरोध करने पर उसने ब्लेड से युवती के हाथ की नस काट दी. युवती का इलाज चल रहा है.
झांसी में छेड़छाड़ से परेशान एक छात्रा ने आत्महत्या कर ली, तो सोनभद्र में एक बच्ची की रेप के बाद बेरहमी से हत्या कर दी गई. इसके अलावा पीलीभीत, लखीमपुर, बस्ती में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं.
ये कुछ घटनाएं पिछले एक हफ्ते के दौरान हुई हैं, जबकि इससे पहले भी हाथरस, बलरामपुर, आजमगढ़ में इसी निर्दयता के साथ रेप के बाद हुई हत्या को लेकर न सिर्फ यूपी में, बल्कि देश भर में लोग गुस्से में सड़कों पर उतर आए थे.
एंटी रोमियो अभियान का क्या हुआ?
ये सब घटनाएं तब हो रही हैं जब महज एक महीने पहले राज्य सरकार ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए जोर-शोर से एक नए कार्यक्रम "मिशन शक्ति अभियान" की शुरुआत की थी. अभियान की शुरुआत से पहले बलरामपुर में युवती के साथ कथित तौर पर गैंगरेप और फिर हत्या के बाद यूपी सरकार कानून व्यवस्था को लेकर लोगों के निशाने पर थी लेकिन अभियान के एक महीने बाद भी जमीन पर उसका असर शायद ही दिख रहा हो.
हालांकि अभियान की शुरुआत में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामले में सरकार ने अपराधियों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू कर दी और एक आंकड़ा भी जारी किया कि नवरात्र से शुरू किए गए इस अभियान के तहत सरकार ने बेहतर तरीके से अदालत में पैरवी करके 14 दोषियों को फांसी की सजा सुनवाई. लेकिन जहां तक अपराधों की बात है, तो न तो उनकी संख्या में कमी दिख रही है और न ही अपराधों की जघन्यता में.
साल 2017 में यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनने के बाद ही सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण के अपने चुनावी वादों के मुताबिक जोर-शोर से एंटी रोमियो अभियान शुरू किया था. लेकिन एंटी रोमियो स्क्वैड कार्यक्रम महिला सुरक्षा में भूमिका निभाने की बजाय विवादों में ज्यादा आ गया और अब उसका शोर बिल्कुल थम गया है.
इस दौरान सरकार ने एंटी रोमियो अभियान को भी कई बार नए सिरे से शुरू करने और इस अभियान में लगे पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित करने की घोषणा की. कुछ कार्रवाई भी हुई लेकिन आज तक इस अभियान का कोई एक केंद्रीय तंत्र विकसित नहीं हो पाया. अब हाल ही में हाथरस, बलरामपुर और अन्य जगहों पर बलात्कार और हत्या की घटनाओं के बाद राज्य सरकार ने मिशन शक्ति अभियान की शुरुआत की है.
हालांकि राज्य सरकार के अपर मुख्य सचिव अवनीश कुमार अवस्थी कहते हैं कि अभियान के तहत ही कई मामलों में तेजी के साथ पैरवी करते हुए कई अभियुक्तों को जेल पहुंचाया गया और कई मामलों में फांसी की सजा भी सुनाई गई है. उनके मुताबिक, इस अभियान के तहत महिलाओं को अपने अधिकारों और सुरक्षा को लेकर खुद भी सतर्क रहने के लिए जागरूक किया जा रहा है और कई जगहों पर डीएम और एसपी के नेतृत्व में इसके लिए विशेष कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं.
सिर्फ नाम बदलने से क्या होगा?
मिशन शक्ति अभियान के तहत 1,535 पुलिस थानों में एक अलग कमरे का प्रावधान किया गया है जिसमें पीड़ित महिला किसी महिला पुलिसकर्मी के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकती है. अभियान के तहत पुलिस विभाग में बीस प्रतिशत अतिरिक्त महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की भी घोषणा की गई है. मिशन शक्ति अभियान अगले छह महीने तक जारी रहेगा.
लेकिन सवाल उठता है कि इन सब योजनाओं और कार्यक्रमों के बावजूद आखिर अपराध रुक क्यों नहीं रहे हैं और क्या कई नामों से योजनाएं चलाने का कोई असर भी होता है या नहीं?
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, ''यूपी के थानों में अभी भी पर्याप्त संख्या में न तो महिला पुलिसकर्मी हैं और न ही इसके लिए वे बहुत ज्यादा प्रशिक्षित हैं. बदल-बदल कर योजनाएं चलाने की बजाय एक ही योजना के सार्थक तरीके से क्रियान्वयन की जरूरत है. एंटी रोमियो को ही देखिए, शुरू में लगा कि पुलिस वाले बहुत सक्रिय हैं लेकिन उन्हें जो काम करना था, वो नहीं कर सके और मॉरल पुलिसिंग के जरिए लोगों को परेशान करने लगे.”
सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर कहती हैं कि पुलिस वाले जानबूझकर ऐसे मामले दर्ज नहीं करते हैं. वे बताती हैं, "अपराध के मामले दर्ज करने से पुलिस वाले बचते हैं क्योंकि मामले बढ़ने पर उनके खिलाफ कार्रवाई का डर रहता है. सरकार जब तक मामलों को दर्ज कराने में सख्त नहीं होगी, तब तक इसका कोई असर नहीं होगा. अभी भी थानों में इतना भय पैदा किया जाता है कि लोग एफआईआर दर्ज कराने में डरते हैं. ऐसे में आप चाहे जितनी योजनाएं ले आइए, कुछ फायदा नहीं होने वाला है. हाथरस में ही देख लीजिए, पीड़ित लड़की और उसके परिजनों को रेप की रिपोर्ट दर्ज कराने में दो हफ्ते से ज्यादा लग गए.”(DW.COM)
-नीलांजन बनिक
सुनने में आ रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि देश में सभी लोगों को कोविड-19 की वैक्सीन मुफ्त में दी जाए, लेकिन इसी बीच बिहार, मध्यप्रदेश और तमिलनाडु जैसे तमाम राज्यों ने लोगों को वादा कर दिया कि वे लोगों को मुफ्त में वैक्सीन उपलब्ध कराएंगे।
कोविड-19 के लिए वैक्सीन तैयार करने के लिए जरूरी परीक्षण तीसरे चरण में पहुंच चुका है। तीसरा चरण मतलब इंसानों पर इसका परीक्षण। हालांकि वैक्सीन विकसित करने वाली निजी कंपनियों को सरकार की ओर से अनुदान मिल रहा है, लेकिन अलग-अलग दवा निर्माताओं की वैक्सीन की कीमत 3 से 30 डॉलर प्रति डोज रहने की संभावना है। यानी रुपये में प्रति खुराक मूल्य दो सौ से दो हजार के बीच बैठेगा।
उदाहरण के लिए एस्ट्राजेनेका ने यूरोपीय आयोग के साथ समझौता किया है जिसके मुताबिक वैक्सीन को 3-4 डॉलर प्रति खुराक के दाम पर बेचा जाएगा। मॉडर्ना 37 डॉलर प्रति डोज के मूल्य पर वैक्सीन उपलब्ध कराने का वादा कर रही है। चीनी वैक्सीन निर्माता सिनोवैक चीन के चुनिंदा शहरों में अपने आपातकालीन कार्यक्रम के तहत वैक्सीन की दो खुराक 60 डॉलर (5,400 रुपये) में बेच रही है।
भारतीयों के लिए सबसे अच्छा विकल्प पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित वैक्सीन है, जिसकी कीमत 3 डॉलर प्रति खुराक है। लेकिन अगर वैक्सीन आयात की जाती है तो जाहिर है कि इसकी कीमत अधिक हो जाएगी।
भारत की आबादी 1.3 अरब डॉलर मानते हुए बात की जाए तो सरकार को केवल वैक्सीन की कीमत वहन करने के लिए 3.9 अरब डॉलर या लगभग 30,000 करोड़ रुपये खर्चने होंगे। इसके अलावा, वैक्सीन को वितरित करने, लाने-ले जाने और लोगों को टीका लगाने में जो पैसे खर्च होंगे, वो अलग। दवाओं के लिहाज से यह लागत 10-14% है। हालांकि टीकों के संदर्भ में यह लागत बढ़ जाती है क्योंकि इन्हें रेफ्रिजरेटेड कंटेनरों में रखकर लाना-ले जाना पड़ता है। इसी वजह से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया सरकार से 80,000 करोड़ रुपये मांग रहा है।
पिछले कुछ वर्षों के बजट दस्तावेजों पर सरसरी नजर डालने से पता चलता है कि 2019-2020 के वित्तीय वर्षके लिए केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य के मद में 61398 करोड़ रु. आवंटित किए। पिछले वित्त वर्ष के दौरान स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का 1.29% था। इससे पहले के चार साल के दौरान यह खर्च औसतन जीडीपी का 1.15% रहा था और इस लिहाज से पिछले साल आवंटन बढ़ा ही था।
बहरहाल, ऐसे कई तरह के सुधार हैं जो इस संदर्भ में समस्याओं को काफी हद तक दूर कर सकते हैं। इनका दीर्घकालिक असर होगा और महामारी के बाद भी दवाओं तक आम लोगों की पहुंच को बढ़ाएगा और इसके दायरे में कोविड-19 के लिए तैयार की जा रही वैक्सीन भी आ जाएगी। भारत समेत तमाम देश दवाओं और वैक्सीन पर आयात शुल्क, बिक्री कर और कई दूसरे तरह के शुल्क लगाते हैं जिससे दवाओं और टीकोंकी कीमत बढ़ जाती है और इनकी उपलब्धता भी घट जाती है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, भारत में दवाओं पर लगने वाला शुल्कऔसतन 10% है जो दुनिया में सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देशों में आता है। भारत से ज्यादा शुल्क केवल पाकिस्तान (14.7%) और नेपाल (11.3%) में है।
कुल मिलाकर दवाओं पर तरह-तरह के इन शुल्कों के कारण भारत में रोगियोंपर हर साल 73.7 करोड़ डॉलर का बोझ पड़ता है और लोगों के हाथ तक पहुंचते-पहुंचते दवा की कीमत लागत से औसतन 80% अधिक हो जाती है। भारत को स्थायी रूप से और कानूनी रूप से बाध्यकारी शुल्क- मुक्त दवाओं के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। बेहतर तो यह हो कि भारत डब्ल्यूटीओ के फार्मास्युटिकल जीरो टैरिफ समझौते पर दस्तखत कर ले। इसमें 34 देश हैं जिनके बीच दवाओं के आयात-निर्यात पर शुल्क नहीं लगता। इसके अलावा मरीजों को अन्य घरेलू कर भी चुकाना पड़ता है, जैसे- जीएसटी। भारत में ज्यादातर दवाओं पर 12% जीएसटी लगाया जाता है। अगर राजस्व की दृष्टि से बात करें तो दवाओं पर लगे जीएसटी से सरकार को बहुत ही कम आय होती है लेकिन इससे रोगियों पर काफी असर पड़ता है क्योंकि ज्यादातर लोगों को अपनी जेब से इनका खर्च उठाना पड़ता है।
भारत में सीमा शुल्क से जुड़ी लालफीताशा ही दवाओं तक पहुंच और इनके भंडारण के मामले में सबसे बड़ी बाधा है। इसके कारण दवाओं की लागत भी बढ़ जाती है। सीमा शुल्क और आयात-निर्यात की जटिल प्रक्रियाओं, लालफीताशाही, छिपे हुए कर, कंजेशन टैक्स वगैरह के उदाहरण से मुश्किलों को समझा जा सकता है। कोविड-19 के इलाज से जुड़े साजो-सामान और वैक्सीन में से कई का उत्पादन बाहर होगा और इनकी जरूरत तेजी से बढ़ने जा रही है। इसलिए राज्य सरकारों को उन मौजूदा नियमों को खत्म करना चाहिए जो दवाओं के आसान आयात को बाधित करते हैं।
एक अन्य कारक जो भारत में रोगियों तक नई दवाओं के पहुंचने में ज्यादा समय लगाता है, वह है नियम-कानून। खास तौर पर यह तथ्य कि सेंट्रल ड्रग्सस्टैंडर्डकंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ) चरण-1 के अध्ययन के डाटा को साक्ष्य के रूप में स्वीकार ही नहीं करता। इसका नतीजा यह होता है कि जो दवा दूसरे देशों में पहले से ही स्वीकृत है, उसे भी भारत के मरीजों तक पहुंचने में औसतन 500 दिन का समय लग जाता है। सरकार बड़ी आसानी से इस प्रक्रिया को आसान कर सकती है अगर वह विदेशों में क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों को स्वीकार करने की व्यवस्था कर दे।
भारत में खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद भी एक बड़ी समस्या हैं। उदाहरण के लिए, भारत में निर्मित वेंटिलेटर। चूंकि इसके लिए ड्रग कंट्रोलर्ससे अनुमति लेने या फिर तमाम तरह के अन्य गुणवत्ता प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है, बाजार में नकली और घटिया वेंटिलेटर धड़ल्ले से बिक रहे हैं। यहां तक कि पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट (पीपीई) के मामले में भी स्थिति ऐसी ही है। ये घरेलू कंपनियों द्वारा बनाए जा रहे हैं और इनकी गुणवत्ता के लिए किसी भी तरह के प्रमाणन की जरूरत नहीं पड़ती। अब जब कोविड-19 के लिए उपचार और वैक्सीन तैयार करने का काम अंतिम चरणों में है, जरूरी है किये जल्दी से जल्दी दुनिया भर में उपलब्ध हों।
भारत में अभी व्यवस्था यह है कि विदेशी उत्पादक अपनी दवाओं का उत्पादन भारत में ही करेंगे, इसका नतीजा यह होगा कि भारत में वही दवा लोगों को मिलने में काफी देर लगेगी। भारत सहित ऐसे तमाम देश हैं जहां व्यापार और नियामक संबंधी बाधाएं हैं। अच्छीबात यह है कि इन बाधाओं को दूर करना कोई बहुत बड़ा काम नहीं, बस इच्छा शक्ति होनी चाहिए।(https://www.navjivanindia.com/)
रेखा सिंह
बिहार-खरखण्ड के चुनावी कार्यक्रम के दौरान मुझे बिहार, अपने राज्य को देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ!
बिहार वह नहीं है जो प्रतिदिन अखबारों के पन्नों में छपा होता है या टेलीविजनों के चैनलों के माध्यम से दिखाया जाता है। बिहार वह भी नहीं है जो राजनेताओं के जुमले या राजनैतिक दांव-पेंचों का केंद्र बना हुआ है! असल में बिहार वह है जो प्राकृतिक आपदा से तो तबाह है ही और राजनेताओं से लेकर छोटभैयन एवं सरकारी नौकरों के बुने हुए मकडज़ाल में फंसा हुआ तड़पता हुआ बिहार है। जहाँ भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, अशिक्षा, लाचारी, बदहाली है, जिसे यहां की जनता अपनी किस्मत मान बैठी है!
जब शहर से दूर सुदूर गांव में जाएंगे तो असली बिहार नजऱ आता है। आज 2020 विधानसभा चुनाव का अंतिम चरण है, फिर से जनता एक बार अपने सपने को पूरा करने के लिए किसी योग्य उम्मीदवार को अपना मतदान करेगी लेकिन क्या सच में इस राजनीतिक तंत्र में कोई योग्य या जनता के लिए जीने-मरने वाला कोई नेता है?
सच तो यह है कि एक बार जीत हासिल कर लेने के बाद कभी कोई प्रतितिनिधि सुधि लेने नहीं आते हैं। आते हैं तब जब दूसरे चुनाव का बिगुल बज उठता है!
कमाल है, आज़ादी के 70 साल बाद भी यहां की जनता पेट के लिए ही लड़ाई लड़ रही है। पेट के लिए मजबूरन अपना राज्य छोडऩे को मजबूर है! यहां देखने वाली बात यह है कि जब हम पेट से उबर नहीं पाएं हैं तो आगे क्या सोंच पाएंगे?
शो के दौरान हम अपनी टीम के साथ सुपौल और पूर्णिया विधानसभा गए थे। पूर्णिया शहर से जैसे ही निकल कर पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्रीजी के गांव पहुंची, वहां की स्थिति देखने लायक थी!
मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था जैसे फणीश्वरनाथ रेणु जी की कालजयी रचना ‘मैला आँचल’ का सारा दृश्य मेरे आखों के सामने जीवंत हो रहें हों! वही गरीबी, वही अशिक्षा.. वहाँ स्थानीय लोगों से बात करने पर पता चला कि अभी भी यहां के लोग भूख से मरते हैं! अस्पताल और स्कूल दोनों मात्र कहने के लिए हैं। वहां कई ऐसे घर हैं जहां अभी भी कई-कई दिनों तक चूल्हे नहीं जलते! कारण गरीबी! कोई रोजगार नहीं, खेती भी वैसी नहीं कि उसके भरोसे जीवन जिया जाय। महंगाई ऐसी की प्रतिदिन 300 रुपये मात्र कमाने वाला श्रमिक कैसे अपना परिवार चला पाएगा?
कोरोना काल में भूख से मरने वाले मजदूरों की संख्या बहुत थी लेकिन इसकी चर्चा कहीं नहीं की गई और न ही ये किसी नेता को ये खास मुद्दा ही लगा। जो मजदूर, दूर देश से अपना रोजी-रोटी छोडक़र,जान बचाने अपने गांव पहुंचे थे कि गांव में महामारी से वे बच जाएंगे लेकिन उनके साथ एकदम उल्टा हुआ, महामारी तो उन्हें छूने से रही लेकिन भूख और गरीबी ने उन्हें लील लिया।
पता नहीं सरकारी सहयोग अगर मिला तो इन गरीबों तक क्यों नहीं पहुँच पाया?
हालांकि इस मुद्दे पर किसी नेता ने अपना शांति भंग नहीं किया, उन सब के लिए तो वही बात थी ‘सब धन बाइसे पसेरी’ और तो और स्वर्गीय मुख्यमंत्री भोला पासवान जी के परिजनों की भी स्थिति उस दृश्य से अलग न थी।
जहाँ, भोला पासवान जी का जन्म हुआ था वहां भी घास और बांस से बनी एक मात्र झोपड़ी थी और वर्षों पहले मिला एक इंदिरा आवास भी था जिसमें न दरवाजा दिखा न खिड़कियां ही थी।
कितनी दु:ख की बात है, जो आदमी अपनी पूरी जि़ंदगी देश सेवा में झोंक दिया हो, अखण्ड बिहार का तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रह चुका हो, आज उसके घर पर एक छप्पड़ तक नहीं। गांव में एक ढंग का स्कूल नहीं, जहां जाकर बच्चे शिक्षा ग्रहण कर सके!
आज नेताओं के पास एक-दूसरे को नीचा दिखाकर वोट बटोरने के अलावे कोई मुद्दा नहीं है। राम-रहीम के नारा लगाकर, भाई-भाई को आपस में लड़वाकर कैसे भी कुर्सी पर डटे रहने या छिनने के प्रयास में लगे रहतें हैं। वादे तो ऐसे किए जा रहें हैं, जैसे इस विधानसभा चुनाव से पहले न कोई चुनाव हुआ था ना ही होगा!
आज के समय में नेता शब्द का मतलब ही बदल गया है! आज नेता का मतलब बड़बोला, दागी, धन्नासेठ,और हर हाल में कुर्सी को हथियाने वाला एक दोहरे चरित्र का व्यक्ति! समाजसेवा जैसा शब्द अब इनके शब्दावली में नहीं होता।
(न्यूज़ 18 में ‘भाभी जी मैदान में हैं’ कार्यक्रम की वजह से पूरा बिहार घूमने वाली अभिनेत्री रेखा की टिप्पणी)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
बिहार में हुआ चुनाव सिर्फ एक प्रांत का चुनाव बनकर नहीं रहने वाला है। यह अगले संसदीय चुनाव (2024) का आईना बनने वाला है। कोरोना की महामारी के दौरान होनेवा ला यह पहला चुनाव है। बिहार में इस बार पिछले चुनाव से ज्यादा मतदान हुआ है याने कोरोना के बावजूद अब अगले कुछ माह में कई प्रांतीय चुनाव बेहिचक करवाए जा सकते हैं।
प. बंगाल, असम, तमिलनाडु, पांडिचेरी और केरल के चुनावों की झांकी, हम चाहें तो बिहार के चुनाव में अभी से देख सकते हैं। यदि बिहार में भाजपा गठबंधन स्पष्ट बहुमत से जीतता है तो माना जा सकता है कि उक्त राज्यों (केरल के सिवाय) में भी भाजपा का दिखावा ठीक-ठाक ही होगा लेकिन जैसा कि सभी एक्जिट पोल दिखा रहे हैं, बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन का जीतना काफी मुश्किल है।
भाजपा के मुकाबले राजद की बढ़ोतरी जबर्दस्त बताई जा रही है लेकिन भाजपा के शीर्ष नेताओं का मानना है कि इस बार टक्कर कांटे की है। इसी डर के मारे कांग्रेस अपने संभावित विधायकों को पटना से कहीं दूर ले जाकर टिका रही है ताकि भाजपा वाले उन्हें पैसे देकर खरीद न लें। इस बार बिहार के चुनाव में जातिवाद का बोलबाला वैसा नहीं रहा, जैसा प्राय: रहता है।
राजद के नेता तेजस्वी यादव की सभाओं ने नीतीश और मोदी की सभाओं को भी मात कर दिया। तेजस्वी ने बेरोजगारी के मुद्दे को हर सभा में तूल दे दिया। 10 लाख नौकरियों की चूसनी नौजवानों के आगे लटका दी, जैसे कि मोदी ने 15 लाख रु. प्रति व्यक्ति की चूसनी 2014 में लटकाई थी। तालाबंदी से उजड़े हुए सभी जातियों के मजदूरों पर तेजस्वी ने ठंडा मरहम लगा दिया।
नीतीश के कई लोक-कल्याणकारी काम दरी के नीचे सरक गए। लोगों को हुए सीधे फायदों का श्रेय मोदी को मिल रहा है लेकिन बिहार के इस चुनाव ने मोदी को भी इशारा कर दिया है कि लोग नीतीश से ही नहीं थक गए हैं, उन्हें मोदी की बातें भी चिकनी-चुपड़ी भर लगने लगी हैं। यह असंभव नहीं कि जदयू के मुकाबले भाजपा को ज्यादा सीटें मिलें लेकिन राजद को बहुमत मिलने की संभावना ज्यादा लग रही है।
तेजस्वी ने अपने ‘पूज्य पिताजी और माताजी’ को पूरे अभियान में ताक पर बिठाए रखा और एक स्वच्छ नौजवान और प्रभावशाली वक्ता के तौर पर खुद को पेश किया। यदि बिहार में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो भी कोई बात नहीं। बिहार के नेता छुआछूत से घृणा करते हैं। कोई भी पार्टी किसी से भी मिलकर सरकार बना सकती है। भाजपा के लिए यह चुनाव अगले प्रांतीय चुनावों के लिए महत्वपूर्ण संदेश छोड़ेगा। (नया इंडिया की अनुमति से)
जर्मनी 82 साल पहले 1938 में नाजी जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ हिंसा की रात की वर्षगांठ मना रहा है. इस मौके पर दुनिया भर में कई समारोहों का आयोजन किया गया है.
डॉयचे वैले पर महेश झा की रिपोर्ट-
जर्मन राष्ट्रपति फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर ने यहूदियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुई हिंसा पोग्रोम की वर्षगांठ के मौके पर जर्मनी में यहूदी विद्वेष के खिलाफ दृढ़ता से कार्रवाई करने की अपील की है. उन्होंने कहा कि उनके लिए शर्म की बात है कि देश में किप्पा यानी छोटी गोल टोपी पहने यहूदी सड़कों पर सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं और यहूदी प्रार्थनागृहों को सुरक्षा देने की जरूरत है. उन्होंने इस्राएल के राष्ट्रपति रोएवेन रिवलिन को लिए एक पत्र में कहा है, "मेरे लिए शर्मनाक है कि एक साल पहले जोम किप्पुर के मौके पर हाले के सिनागोग पर हुआ घातक हमला सिर्फ लकड़ी के दरवाजे के कारण रोका जा सका." उनका वीडियो संदेश इस्राएल में इस मौके पर होने वाले एक समारोह में दिखाया गया.
1938 में पोग्रोमनाख्त के रूप में कुख्यात 9 नवंबर की रात नाजी समर्थकों ने पूरी जर्मनी में यहूदी सिनागोगों, यहूदी नागरिकों की दुकानों और घरों में आग लगा दी और यहूदियों से मारपीट की, उन्हें उठा ले गए और बहुतों की जान ले ली. जर्मन राष्ट्रपति ने अपने संदेश में कहा कि नवंबर की वो रात सालों के भेदभाव, डराने धमकाने और दुश्मनी के बाद हिंसा का घृणित कांड था. वह नाजी जनसंहार की पूर्व घोषणा थी, जो मेरे देश के लोगों ने कुछ साल बाद किया. राष्ट्रपति ने कहा कि ये आज हमारे लिए बार बार आने वाली चेतावनी है.
दो साल पहले एक स्मृति समारोह में चांसलर
चांसलर अंगेला मैर्केल ने 9 नवंबर को हुई यहूदी विरोधी हिंसा को शर्मनाक की संज्ञा देते हुए कहा, "हम जर्मनी में शुरू हुए मानवता के खिलाफ अपराधों के शिकारों की याद शर्म के साथ कर रहे हैं." इस मौके पर देश के राजनीतिज्ञों ने इस घटना को नैतिक विफलता बताया है. एसपीडी नेता और जर्मन विदेश मंत्री हाइको मास ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि किसी को कंधे नहीं उचकाने चाहिए, यदि आज भी इंटरनेट में या सड़क पर यहूदी विरोधी नफरत और हिंसा की घटना होती है. संयुक्त राष्ट्र के एक समारोह के लिए भेजे गए संदेश में जर्मनी विदेश मंत्री ने कहा, "याद करने का मतलब होता है आज और कल के लिए, कल से सही सबक सीखना." उन्होंने कहा कि कोरोना से जुड़ी बहुत सारी साजिशी कहानियां दिखाती हैं कि यहूदीविरोध आज भी सिर्फ उग्रदक्षिणपंथ का मामला नहीं है, वह हमारे समाज के मध्य तक पहुंच चुका है.
जर्मनी में इवांजेलिक गिरजे के प्रमुख हाइनरिष बेडफोर्ड स्ट्रोम ने कहा, "ये साफ होना चाहिए कि यहूदीविरोध पाप है, और उस सब के खिलाफ है जो ईसाईयत का आधार है." अंतरराष्ट्रीय आउशवित्स समिति ने एक बयान में कहा है कि आज तक यहूदी जनसंहार में बचे लोगों के लिए इस भयावह रात में अपने पड़ोसियों की उदासीनता की यादें इतनी डरावनी हैं कि वे भुला नहीं पाए हैं. आउशवित्स में नाजियों ने यहूदियों के लिए यातना शिविर बना रखा था.
जर्मन सरकार में यहूदी विरोधी मामलों के आयुक्त फेलिक्स क्लाइन ने कहा कि उस समय की नाकामी, आम उदासीनता और चापलूसी से आज के लिए सबक सीखी जानी चाहिए. क्लाइन ने इस पर जोर दिया कि 82 साल पहले की उस रात की याद बहुत जरूरी है. वो तारीख स्पष्ट करती है कि देश उस समय नैतिक रूप से विफल हो गया था. उस अनुभव की वजह से ये जरूरी है कि आद भेदभाव और बहिष्कार से अलग तरह से पेश आया जाए.
शुरैह नियाज़ी
घटना शुक्रवार रात को गुना ज़िले के बमोरी तहसील के छोटी उखावाद खुर्द में हुई.
बंधुआ मुक्ति मोर्चा, गुना के ज़िला संयोजक नरेंद्र भदौरिया ने बताया कि 26 साल के विजय सहारिया पिछले तीन साल से राधेश्याम लोधा के खेत में बंधुआ मज़दूर के तौर पर काम कर रहे थे, दोनों एक ही गांव में रहते थे.
नरेंद्र भदौरिया ने कहा, "विजय से लगातार काम करवाया जाता था. उसने उस रात राधेश्याम से कहा कि वो कहीं और मज़दूरी करके उसके पैसे चुका देगा. उसके बाद विजय ने उससे मज़दूरी मांगी. लेकिन इस बात से राधेश्याम उस पर बहुत गुस्सा हो गया और उसने उस पर केरोसिन डाल कर आग लगा दी."
विजय सहारिया ने अगले दिन 7 नवंबर को अस्पताल में दम तोड़ दिया. राधेश्याम को दूसरे दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.
लेकिन आग लगाने के बाद झुलसे हुए विजय का एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें वो बता रहा है कि उनके साथ क्या हुआ और कैसे उन पर राधेश्याम ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी.
विजय अपने माता-पिता, छोटे भाई, पत्नी रामसुखी और दो बच्चों के साथ गांव में रहते थे. विजय के पिता कल्लूराम ने बताया कि उनके बेटे विजय ने पांच हज़ार रुपये की उधारी ली थी.
कल्लूराम ने कहा, "तीन साल तक काम करने के बाद भी न तो उसका कर्ज़ चुका और न ही उसे कोई पैसे मिले. इसलिए कुछ दिन से उसने काम पर जाना बंद कर दिया था.
"उस दिन राधेश्याम ने उसे बुलाया और उसके बाद उस पर केरोसिन डालकर उस पर आग लगा दी."
पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार सिंह ने बताया, "इस मामले में फ़ौरन कारवाई करते हुए अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया है. मृतक के परिवार को भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जा चुकी है."
वहीं, गुना के ज़िलाधिकारी कुमार पुरुषोत्तम का कहना है, "इस मामले में मृतक ने अभियुक्त से उधार लिया था और उसी वजह से यह घटना घटी है."
हालांकि प्रशासन ने अब फ़ैसला लिया है कि वो सहरिया समुदाय से जुड़े लोगों की आर्थिक स्थिति का डेटा तैयार कराएँगे ताकि उन्हें मदद उपलब्ध कराई जा सके.

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विजय की मौत से नाराज़ ग्रामीण
सबसे पिछड़ी जनजातियों में से एक सहरिया
सहरिया जनजाति राज्य की सबसे पिछड़ी जनजातियों में आती है. हर चुनाव से पहले सरकार और राजनीतिक दल इस समुदाय के लिए तरह-तरह के वादे करते हैं लेकिन इनकी स्थिति में बहुत अंतर नहीं आया है.
मध्यप्रदेश का गुना ज़िला बंधुआ मज़दूरी के लिए जाना जाता है. पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जब कई जगहों से मज़दूरों को छुड़वाया गया है.
नरेंद्र भदौरिया ने आरोप लगाया, "इस क्षेत्र में दबंगों का दबदबा है और वो आदिवासियों और सहरिया समुदाय के लोगों पर दबंगई करते हैं. राजनीतिकरण के कारण उन पर कारवाई नहीं हो पाती है. "
बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने मांग की है कि सरकार और प्रशासन जल्द से जल्द तत्काल मुक्ति प्रमाण पत्र जारी करे ताकि विजय के परिवार को वो सभी सुविधाएँ और मुआवज़ा मिल सके जो एक बंधुआ मज़दूर को मिलती हैं.
1976 में इंदिरा गांधी ने बंधुआ मज़दूर प्रथा ख़त्म करने के लिए एक क़ानून बनाया था जिसके तहत बंधुआ मज़दूरी से मुक्त कराए गए लोगों को आवास और पुनर्वास की बात कही गई थी. इसके लिये यह ज़रूरी है कि मुक्ति प्रमाण पत्र जारी किया जाए.
लेकिन अब इस मामले को लेकर राजनीति भी तेज़ हो गई है.
कांग्रेस ने लगाया आरोपी को बचाने का आरोप
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने परिवार से मुलाक़ात करने के बाद कहा, "सरकार ने यह फ़ैसला किया है कि पीड़ित परिवार विजय की पत्नी को पूरा संरक्षण दिया जाएगा. पत्नी को शासकीय सेवा में अगर परिवार चाहेगा तो स्थान देंगे, नए मकान का निर्माण होगा."
मुख्यमंत्री ने बताया कि अभी 8.25 लाख रुपये की राशि जो अधिनियम के तहत मिलेगी उसमें से आधी दे दी गई है और आधी और दी जाएगी.
शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "संबल योजना के तहत चार लाख रुपये और विजय की पत्नी को दिए जाएंगे साथ ही दोनों बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम किया भी जाएगा."

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विजय के परिवार से मुलाक़ात करने पहुंचे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
सरकार ने परिवार के लिए छह महीने तक गुज़ारे भत्ते की व्यवस्था भी की है. वहीं, विपक्षी कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि शिवराज सरकार दबंग अभियुक्त को बचाने में लग गई है.
कांग्रेस मीडिया समन्वयक नरेंद्र सलूजा ने कहा, "भाजपा सरकार के पिछले 15 साल की बात करें या वर्तमान 7 माह की ग़रीब, दलित, आदिवासियों पर अत्याचार और उत्पीड़न की घटनाओं में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. उन्हें किस प्रकार से कर्ज़ के दलदल में फंसाकर उनका शोषण किया जाता है यह घटना भी उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है."
बंधुआ मुक्ति मोर्चा के नरेंद्र भदौरिया का आरोप है कि गुना जिले में बड़ी तादाद में बंधुआ मज़दूर काम कर रहे हैं लेकिन प्रशासन यहां पर एक भी बंधुआ मज़दूर नहीं होने की बात करता रहा है. इसलिए इस प्रथा से मुक्त होने के बाद भी इन लोगों को मदद नही मिल पाती है.
-कमलेश मठेनी
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे मंगलवार को आ रहे हैं. नतीज़े आने के बाद ही पता चलेगा कि बिहार में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी. इन नतीज़ों से पहले चलिए हम जानते हैं कि बिहार में पिछले चुनावों का इतिहास क्या रहा है. बिहार की जनता ने कब, कौन-सी पार्टी को राज्य की ज़िम्मेदारी सौंपी है.
1951 से बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी. इसके बाद से 2020 तक बिहार में 17 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. साल 2005 की फ़रवरी में हुए चुनाव में सरकार नहीं बन पाने के कारण अक्टूबर में फिर से चुनाव आयोजित करने पड़े थे.
2015 विधानसभा चुनाव
पहले बात करते हैं अक्टूबर-नवंबर 2015 में हुए पिछले विधानसभा चुनावों की. ये चुनाव पांच चरणों में पूरा हुआ था.
इन चुनावों में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जदयू), राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, इंडियन नेशनल लोक दल और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) ने महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा था.
वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा के साथ चुनावी मैदान में क़दम रखा था.
2015 का चुनाव कुल 243 सीटों पर हुआ था जिसमें जीतने के लिए 122 सीटों की ज़रूरत थी.
इन चुनावों में लालू यादव की राजद और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडी(यू) ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था. कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे.
चुनाव के नतीजे आने पर राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. इसके बाद जदयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थीं. इन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली थीं.
इन चुनाव में महागठबंधन की सरकार बनी और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया. हालांकि, 2017 में जेडी(यू) महागठबंधन से अलग हो गई और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई.
2010 विधानसभा चुनाव
साल 2010 में हुआ विधानसभा चुनाव को छह चरणों में बांटा गया था. 243 सीटों पर हुए इन चुनावों में नीतीश कुमार की जदयू सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
इन चुनावों में एनडीए गठबंधन में जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था और उनके सामने राजद और लोक जनशक्ति पार्टी का गठबंधन था.
इन चुनावों में जनता दल यूनाइटेड ने 141 में से 115 सीटें और बीजेपी ने 102 में से 91 सीटें जीती थीं.
वहीं, राजद ने 168 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें जीती थीं. लोजपा 75 सीटों में से तीन सीटें लेकर आई थीं. कांग्रेस ने पूरी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन उसे सिर्फ़ चार सीटें ही मिली थीं. इसके बाद से कांग्रेस ने महागठबंधन में ही चुनाव लड़ा है.
इन चुनाव में बिहार की बड़ी पार्टी माने जाने वाली राजद का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था जो फरवरी 2005 के चुनावों की 75 सीटों के मुक़ाबले सिमटकर 22 सीटों पर आ गई थी. 2010 में एनडीए की सरकार बनी और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनाए गए.

2005 में हुए दो बार चुनाव
साल 2005 में ऐसा पहली बार हुआ था जब बिहार में एक ही साल के अंदर दो बार विधानसभा चुनाव कराने पड़े.
साल 2003 में जनता दल के शरद यादव गुट, लोक शक्ति पार्टी और जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार की समता पार्टी ने मिलकर जनता दल (यूनाइटेड) का गठन किया था.
तब लालू यादव के करीबी रहे नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा चुनावों में बड़ी चुनौती दी.
फरवरी 2005 में हुए इन चुनावों में राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद ने 215 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से उसे 75 सीटें मिल पाईं.
वहीं, जदयू ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ 55 सीटें जीतीं और भाजपा 103 में से 37 सीटें लेकर आई. कभी बिहार में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस इन चुनावों में 84 में से 10 सीटें ही जीत पाई थी.
इन चुनावों में 122 सीटों का स्पष्ट बहुमत ना मिल पाने के कारण कोई भी सरकार नहीं बन पाई और कुछ महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद अक्टूबर-नवंबर में फिर से विधानसभा चुनाव हुए.
दूसरे विधानसभा चुनावों में जदयू 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. जदयू ने 139 सीटों पर चुनाव लड़ा था. भाजपा ने 102 में से 55 सीटें हासिल की थीं.
वहीं, राजद ने 175 सीटों पर चुनाव लड़कर 54 सीटें जीतीं, लोजपा को 203 में से 10 सीटें मिलीं और कांग्रेस 51 में से नौ सीटें ही जीत पाई. साल 2000 में ही लोजपा का गठन हुआ था.
इन चुनावों में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी.

साल 2000 में एकीकृत बिहार में चुनाव
इन चुनावों से पहले बिहार में काफ़ी उथल-पुथल हुई थी. लालू यादव ने राबड़ी देवी को अपनी जगह बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था और 1997 में लगभग तीन हफ़्तों का राष्ट्रपति शासन भी लगा था.
इसके बाद मार्च 2000 में विधानसभा चुनाव हुए.
ये वो समय जब बिहार से अलग करके झारखंड राज्य नहीं बनाया गया था. साल 2000 के नवंबर में झारखंड का गठन हुआ था.
तब बिहार में 324 सीटें हुआ करती थीं और जीतने के लिए 162 सीटों की ज़रूरत होती थी.
इन चुनावों में राजद ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 124 सीटें मिली थीं.
वहीं, भाजपा को 168 में से 67 सीटें हासिल हुई थीं. इसके अलावा समता पार्टी को 120 में से 34 और कांग्रेस को 324 में से 23 सीटें हासिल हुई थीं.
2000 के चुनाव में राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी थीं.

1995 का विधानसभा चुनाव
ये वो चुनाव थे जब ना तो बिहार में आरजेडी थी और ना जेडीयू. हालांकि, 1994 में नीतीश कुमार ज़रूर समता पार्टी बनाकर लालू यादव से अलग हो गए थे.
तब लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 264 सीटों पर बिहार चुनाव लड़ा और वो 167 सीटें जीतने में सफल हुई.
भाजपा ने 315 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन सिर्फ़ 41 सीटें ही जीत पाई. कांग्रेस 320 सीटों पर चुनाव लड़कर 29 सीटें ही जीत पाई.
उस समय भी बिहार में 324 सीटों के लिए चुनाव लड़ा गया था. तब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) भी बिहार से ही चुनाव लड़ती थी.
जेएमएम ने चुनावों में 63 में से 10 सीटें जीती थीं और समता पार्टी को 310 में से सात सीटें मिली थीं.
इन चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के साथ लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने.
लेकिन, साल 1997 में चारा घोटाले में फंसने के कारण लालू यादव को बिहार के मुख्यमंत्री के पद से हटना पड़ा और उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया.
उनके इस फैसले की काफ़ी आलोचना हुई और पार्टी में फूट भी पड़ गई. 1997 में ही राष्ट्रीय जनता दल का भी गठन हुआ.
1990 विधानसभा चुनाव
इन चुनावों में 1988 में बनी कई दलों के विलय से बने जनता दल ने पहली बार बिहार चुनाव लड़ा था.
जनता पार्टी 276 सीटों पर चुनाव लड़कर 122 सीटें जीतें और सबसे बड़ी पार्टी बनकर खड़ी हुई. हालांकि, बहुमत का आँकड़ा 162 सीटें था.
वही, कांग्रेस को 323 सीटों में से 71 सीटें और भाजपा को 237 सीटों में से 39 सीटों हासिल हुईं.
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 109 सीटों पर चुनाव लड़कर 23 सीटें जीती थीं. जेएमएम 82 में से 19 सीटें जीत पाई थी.
तब बिहार में लालू यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी थी. इन चुनावों के बाद ही बिहार में एक ही कार्यकाल में कई मुख्यमंत्री बनने का दौर ख़त्म हुआ.
1985 विधानसभा चुनाव
इन चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. उसे 323 में से 196 सीटें मिली थीं जो बहुमत से कहीं ज़्यादा थीं.
इन्हीं चुनावों के बाद बिहार में एक ही कार्यकाल में चार मुख्यमंत्री बने थे.
इन चुनावों में लोक दल को 261 में से 46 और भाजपा को 234 में से 16 सीटें मिली थीं.
उस समय जनता पार्टी भी चुनावी मैदान में थी जो बाद में जनता दल में शामिल हो गई. जनता पार्टी को 229 में से 13 सीटें मिली थीं.
इन चुनावों में 1985 से 1988 तक बिंदेश्वरी दुबे बिहार के मुख्यमंत्री रहे. उनके बाद लगभग एक साल भागवत झा आज़ाद, फिर कुछ महीनों के लिए सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.
1980 का विधानसभा चुनाव
इन चुनावों में कांग्रेस (इंदिरा) को 311 में से 169 सीटें मिली थीं और कांग्रेस (यू) को 185 में से 14 सीटें मिली थीं.
तब भाजपा ने 246 में से 21 सीटें जीती थीं और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 135 में से 23 सीटें हासिल की थीं.
जनता पार्टी (एससी) को तब 254 में से 42 सीटें मिली थीं.
इस कार्यकाल में भी लगभग चार महीने राष्ट्रपति शासन लागू रहा है. उसके बाद करीब तीन साल के लिए जगन्नाथ मिश्र और एक साल के लिए चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.
1977 विधानसभा चुनाव
इन चुनावों में जनता पार्टी ने बिहार की 311 सीटों पर चुनाव लड़ा और 214 सीटों पर जीत हासिल की.
कांग्रेस को इन चुनावों में 286 में से 57 सीटें ही मिली थीं. वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने 73 में से 21 सीटें हासिल की थीं.
बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी. पहले लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लागू रहा.
उसके बाद लगभग एक साल के लिए 1979 तक कर्पूरी ठाकुर और फिर 1980 तक रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने.
जगन्नाथ मिश्रा तीन बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. तीनों बार जब भी वे मुख्यमंत्री बने, उस समय कांग्रेस पार्टी कड़ी चुनौतियों का सामना कर रही थी
1972 विधानसभा चुनाव
इन चुनावों में कांग्रेस की जीत हुई थी और उसे 259 में से 167 सीटें मिली थीं. वहीं, कांग्रेस (ओ) 272 में से 30 सीटें ही मिल पाई थीं.
इसके अलावा भारतीय जन संघ को 270 में से 25 सीटें हासिल हुई थीं. तब समयुक्ता सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 33 सीटें मिली थीं.
इस कार्यकाल में भी लगभग दो महीने राष्ट्रपति शासन लगा रहा और उसके बाद एक या दो साल के लिए केदार पांडे, अब्दुल गफ़ूर और जगन्नाथ मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री रहे.
भोला पासवान शास्त्री को आग देने वाले उनके भतीजे विरंची पासवान अब बूढ़े हो चुके हैं
1969 विधानसभा चुनाव
इस चुनाव में भी इंडियन नेशनल कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि, उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला था.
उस समय बिहार में 318 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव हुआ था और जीत के लिए 160 सीटों की ज़रूरत थी.
कांग्रेस को 318 में से 118 सीटें मिलीं और भारतीय जनसंघ को 303 में से 34 सीटें हासिल हुईं.
इस चुनाव में एसएसपी को 191 में से 52 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया को 162 में से 25 सीटें मिली हैं.
इस कार्यकाल में भी राष्ट्रपति शासन के बाद दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर और भोला पासवान शास्त्री कुछ-कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने.
1967 विधानसभा चुनाव
कांग्रेस को 318 में से 128, एसएसपी को 199 में से 68 और जन क्रांति दल को 60 में से 13 सीटें मिली थीं.
इन तीनों से थोड़े-थोड़े समय तक कुल चार मुख्यमंत्री रहे थे.
इन चुनावों में भारतीय जनसंघ ने 271 में से 26 सीटें हासिल की थीं.
2008 की इस तस्वीर में भारतीय जनसंघ से जुड़ी पुस्तक का विमोचन करते बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और वैंकैया नायडु
1951, 1957 और 1962 के चुनाव
आज़ादी के बाद पहली बार हुए 1951 के चुनाव में कई पार्टियों ने भाग लिया लेकिन कांग्रेस ही उस समय सबसे बड़ी पार्टी थी.
इन चुनाव में कांग्रेस को 322 में से 239 सीटें मिली थीं.
1957 के चुनाव में भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी बनी. उसे 312 में से 210 सीटें मिली थीं.
1962 के चुनाव में कांग्रेस को 318 में से 185 सीटों के साथ बहुमत हासिल हुआ था. उसके बाद स्वतंत्र पार्टी को सबसे ज़्यादा 259 में से 50 सीटें मिली थीं.
श्री कृष्ण सिन्हा बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने थे.
साल 2016 में भारत सरकार ने बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा की याद में एक डाक टिकट रिलीज़ किया था. (bbc.com/hindi)
अर्नब गोस्वामी क्या हिरासत से आज़ाद होने के बाद किसी भी तरह से बदल जाएंगे ? क्या वे अपने सभी तरह के विरोधियों के प्रति ,जिनमें कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी अब शामिल हो गया है ,पहले की अपेक्षा कुछ उदार और विनम्र हो जाएँगे ? जिस तरह की बुलंद और आक्रामक आवाज़ को वे अपनी पहचान बना चुके हैं क्या उसकी धार हिरासत की अवधि के दौरान किसी भी कोने से थोड़ी बोथरी हुई होगी ? कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है ?आशंकाएँ इसी बात की ज़्यादा हैं कि हिरासत के (पहले ?)एपिसोड के ख़त्म होते ही अर्नब अपने विरोधियों के प्रति और ज़्यादा असहिष्णु और आक्रामक हो जाएँगे।जो लोग उन्हें नज़दीक से जानते-समझते हैं उनके पास ऐसा मानने के पुख़्ता कारण भी हैं।
आमतौर पर हिरासतों के कटु और पीड़ादायक अनुभव किसी भी सामान्य नागरिक को एक लम्बे समय के लिए भीतर से तोड़ कर रख देते हैं।उन परिस्थितियों में और भी ज़्यादा जब व्यक्ति तो अपने आपको निर्दोष मानता ही हो ,बाद में अदालतें अथवा जांच एजेंसियाँ भी दोषी न मानते हुए हिरासत से आज़ाद कर देती है ।पर इतना सब कुछ होने के बीच हिरासत उस नागरिक को गहरे अवसाद में धकेलने अथवा व्यवस्था के प्रति विद्रोही बना देने की काफ़ी गुंजाइश पैदा कर देती है।अगर अर्नब हिरासत में अपनी जान को ख़तरा बताते हैं तो हिरासत के अनुभव से गुजरने के बाद रिया चक्रवर्ती के पूरी तरह या आंशिक रूप से अवसादग्रस्त हो जाने की चिकित्सकीय आशंकाओं को भी निरस्त नहीं किया जा सकता ।
कहा जाता है कि सिने तारिका दीपिका पादुकोण को जब सितम्बर माह के अंतिम सप्ताह में पूछताछ के लिए बुलाया गया था तब वे काफ़ी घबराई हुईं थीं। वे पूछताछ के दौरान अपने अभिनेता पति को भी मौजूद देखना चाहती थीं पर कथित तौर पर उसकी इजाज़त नहीं मिली।उन्होंने अकेले ही सारे सवालों का सामना किया।दीपिका जानती थीं कि अवसाद क्या होता है ।वे उसके अनुभव से पहले गुज़र चुकी थीं ।रिया और उनका परिवार भी अब जान गया है।ये लोग सब समाज के सामान्य नागरिक हैं ,अपनी सिनेमाई सम्पन्नता के बावजूद। पर समान परिस्थितियों में एक प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता (और अब पत्रकार भी !) की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है।वे ऐसी पीड़ाओं को भी एक बड़े अवसर और चुनौती में परिवर्तित करने की क्षमता रखते हैं।अतः एक फ़ौजी परिवार से सम्बंध रखने वाले अर्नब की अपने ‘विरोधियों’ का प्रतिकार करने की दृढ़ इच्छा-शक्ति को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।ख़ासकर ऐसी परिस्थिति में जब कि केंद्र का सत्ता प्रतिष्ठान समस्त स्वस्थ परम्पराओं और मर्यादाओं को धता बताते हुए अपने पूरे समर्थन के साथ अर्नब के पीछे नहीं बल्कि साथ में खड़ा हो गया हो !
वे तमाम लोग जो अर्नब को एक आपराधिक पर ग़ैर-पत्रकारिक प्रकरण में हिरासत में भेजे जाने पर संतोष ज़ाहिर कर रहे हैं उन्हें शायद दूर का दृश्य अभी दिखाई नहीं पड़ रहा है ।उन्हें उस दृश्य को लेकर भय और चिंता व्यक्त करना चाहिए।वह इसलिए कि अर्नब की हिरासत का अध्याय प्रारम्भ होने के पहले तक देश के मीडिया और राजनीतिक संसार को पता नहीं था कि उनके(अर्नब के) समर्थकों की संख्या उनके अनुमानों से इतनी अधिक भी हो सकती है और कोई भी सरकार इतने सारे लोगों के लिए तो हिरासत का इंतज़ाम कभी नहीं कर पाएगी (क्या किसी को कल्पना भी रही होगी कि अमेरिका में इतना सब हो जाने के बाद भी ट्रम्प को इतने वोट और समर्थक मिल जाएँगे ?)।
दूसरे यह कि इस सवाल के जवाब की तलाश अर्नब के हिरासत से बाहर आने के बाद ही प्रारम्भ हो सकेगी कि समूचे घटनाक्रम को लेकर महाराष्ट्र सरकार और वहाँ की पुलिस को राज्य की जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त है या नहीं ! अर्नब के पक्ष में पत्रकारों के जो छोटे-बड़े समूह सड़कों पर उतर कर मुंबई पुलिस की कार्रवाई को प्रेस की आज़ादी पर हमला बता रहे हैं वे अगर उस समय चुप थे जब रिपब्लिक और अन्य तमाम चैनल रिया की गिरफ़्तारी की चिल्ला-चिल्लाकर मांग कर रहे थे तो उसके पीछे के कारण को भी अब समझा जा सकता है।क्या ऐसा मानने के पर्याप्त कारण नहीं बन गए हैं कि आने वाले समय में सरकारें अपने आनुशांगिक संगठनों में एक समानांतर मीडिया के गठन को सार्वजनिक रूप से भी खड़ा करने पर विचार प्रारम्भ कर दे ? छद्म रूप में सक्रिय ऐसी प्रतिबद्धताओं का उल्लेख अर्नब कांड के बाद ज़रूरी नहीं रह गया है।
केवल एक व्यक्ति और उसके मीडिया प्रतिष्ठान के पक्ष में एक सौ पैंतीस करोड़ के देश के गृह मंत्री और प्रसारण मंत्री द्वारा सार्वजनिक तौर पर सहानुभूति व्यक्त करना क्या उस मीडिया की आज़ादी के लिए ज़्यादा बड़ा ख़तरा नहीं माना जाना चाहिए जो अर्नब के साथ नहीं खड़ा है ? अर्नब एपिसोड के बाद मीडिया के निष्पक्ष वर्ग का ख़ौफ़ खाना इसलिए ज़रूरी है कि सरकारों द्वारा उन्हें फ़र्ज़ी मामलों में अपराधी बनाने के दौरान कोई राजनीतिक दल उनके पक्ष में उस तरह खड़ा नहीं होगा जैसा अपने किसी साधारण कार्यकर्ता (या पत्रकार ) द्वारा संज्ञेय अपराध करने के बाद भी उसे बचाने में जुट जाता है।
मीडिया की आज़ादी को केवल सरकारों से ही ख़तरा रहता है यह अवधारणा आपातकाल के दौरान उस समय ध्वस्त हो गई थी जब दिल्ली में कुलदीप नय्यर सहित कई पत्रकारों को जेलों में भरा जा रहा था, कुछ अन्य सम्पादकों और साहित्यकारों के समूह इंदिरा गांधी के बीस-सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करने जुलूस बनाकर एक सफ़दरजंग रोड पहुँच रहे थे।वक्त के साथ केवल उन जत्थों के चेहरे और समर्थन व्यक्त करने के ठिकाने ही बदले हैं।अतः मीडिया को ख़तरा ,सरकारों और उनकी पुलिस से तो है ही अपने भीतर से भी है।अर्नब प्रकरण ने उस ख़तरे की चमड़ी को केवल फिर से उघाड़कर नंगा और सार्वजनिक कर दिया है।अब हमें अर्नब के रिहा होकर उनकी पहली आवाज़ सुनने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।क्या पता हम उसके बाद उनसे और ज़्यादा डरने लगें ! ट्रम्प और अर्नब दोनों ही कभी अपनी गलती और हार मानने वाले लोगों में नहीं हैं और सत्ताओं में दोनों के ही समर्थकों की भी सबको जानकारी है। वाक़ई में आज़ाद मीडिया और उसके पत्रकार कैसे होते हैं जानने के लिए अमेरिकी चुनावों का अध्ययन करना पड़ेगा।
- -श्रवण गर्ग
-पुष्य मित्र
हम जिस विचारधारा के विरोध में हैं, उनसे संबंधित कुछ मित्र आजकल परेशान हैं। उनका दुख है कि भाजपा अपने समर्थकों की कद्र नहीं करती। जो विचारक या पत्रकार उनके पक्ष में लगातार काम करते हैं, उन पर संकट आने पर वह उन्हें मंझधार में छोड़ देती है।
ऐसे मित्र लगातार लिख रहे हैं कि वामपंथ और कांग्रेस अपने समर्थक का ठीक से ख्याल रखती है। उन्हें हर मौके पर सपोर्ट करती है। एक पत्रकार जिन्हें इसी सरकार के कार्यकाल में फिल्म समीक्षा के लिए देश का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुका है वे भी दुखी हैं। उन्होने एक सरकार समर्थक अखबार में लंबा आलेख भी लिखा है।
तात्कालिक वजह यह है कि भाजपा समर्थकों को लगता है अर्नब गोस्वामी के मामले में केन्द्र सरकार को बड़ा स्टैंड लेकर महाराष्ट्र में मार्शल लॉ लागू कर देना चाहिये। महाराष्ट्र सरकार को उठाकर अरब सागर में फेंक देना चाहिये। अर्नब ने चूंकि भाजपा सरकार के लिए खूब बैटिंग की है, ऐसे में भाजपा केवल ट्वीट कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यह आक्रोश भाजपा, मोदी और हिन्दू ब्रिगेड में टॉप से बॉटम तक नजर आ रहा है।
आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। मुझे लगता है इसकी वजह यह है कि भाजपा, मोदी और हिन्दुत्ववादियों ने विचारधारा के बारे में एक गलतफहमी पाल ली है। वे सोचते हैं कि विचारधारा का अर्थ सरकार को उसके हर सही गलत काम में सपोर्ट करना और बदले में सरकार से हर तरह की जायज नाजायज मदद हासिल करना है। उनकी एक गलतफहमी यह भी है कि कांग्रेस अपने समर्थकों, खासकर वामपंथियों को इस तरह की मदद करती रहती है। यही मूल वजह उनके दुख की है। सच में ऐसा कुछ नहीं है। जहां तक वामपंथियों का सवाल है, वे कांग्रेस के राज में भी जेल भोगते थे, अभी भी जेल में हैं। अभी इस वक़्त कम से कम आधा दर्जन ऐसे लिबरल विचारक और कार्यकर्ता जेल में हैं, जिनका पूरा जीवन मानवता की सेवा में गुजरा है। वे अर्नब की तरह नफरत और हिंसा को खुलेआम टीवी पर बढ़ावा नहीं देते। वे चुपचाप आदिवासी इलाकों में गांधीवादी तरीके से लोगों की मदद करते हैं। मगर उनकी लम्बी गिरफ्तारी के बावजूद कोई शोर नहीं है। कांग्रेस की तरफ से एक बार भी उनके पक्ष में ढंग की आवाज नहीं उठी।
जिसे आजकल लिबरल विचार कहा जाता है उसका मकसद कहीं से भी सत्ता की मलाई खाना नहीं है। उसका मकसद सिर्फ देश में फैले नफरत और हिंसा के माहौल को खत्म करना है। वे मोदी के खिलाफ इसलिये हैं क्योंकि उनकी राजनीति के मूल में लोगों को धर्म के आधार पर बांटना, उनके बीच नफरत फैला कर सत्ता हासिल करना है और उस सत्ता का इस्तेमाल पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने में करना है। भले गरीबों का नामो-निशान मिट जाये। यह कहीं से मोदी को हटा कर राहुल को लाने की कोशिश नहीं है। अब चुकी विकल्प के तौर पर राहुल हैं तो लोग उन्हें सपोर्ट करने लगते हैं। मूल बात इस हिंसक और जनविरोधी विचार को खत्म करना है।
यहां सत्ता के पीछे विचार नहीं भाग रहा। यहां विचार आगे है, राजनीति उसके पीछे। यही वजह है कि आज राजनीतिक रूप में मजबूत मोदी के सामने सबसे बड़ा विपक्ष यही लिबरल विचार है, जो किसी भी राजनीतिक दल से मजबूत है। इसी ने राजनीतिक रूप से बेलगाम मोदी को नियन्त्रित किया हुआ है, उसकी मनमानी पर ब्रेक लगाया है। उसे हर गलत कदम का जवाब देने पर मजबूर यही विचार कर रहा है। उसे खुलेआम कट्टरपंथी होने से यही रोकता है और उसके जनविरोधी फैसलों पर यही लगाम लगाता है। आज अगर मोदी सरकार अर्नब का बदला महाराष्ट्र सरकार से नहीं ले पा रही तो उसके पीछे भी इसी विचार का डर है। यह विचार किसी राहुल गान्धी या किसी तेजस्वी के पीछे नहीं खड़ा है। बल्कि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव जैसे नेता खुद को मजबूत करने के लिए इस विचार की छत्रछाया में आते हैं।
यह मूल फर्क है। एक तरफ अन्धभक्ति पर आधारित सोच है जो लोगों को बांटने और उनसे नफरत करने में जुटी है। तो दूसरी तरफ देश को जोडऩे और गरीबों को बेहतर जीवन जीने का अधिकार देने वाली सोच है, वहां भक्ति नहीं, व्यक्ति नहीं, विचार प्रमुख है।
जब लोभ-लालच के फेर में या नफरत के वशीभूत होकर आप किसी सत्ता का समर्थन करेंगे तो आपको पछ्ताना ही पड़ेगा। वैसे भी जो लोग गलत राह पर चलते हैं वे अपने साथियों का खुलकर समर्थन नहीं कर पाते। जिस विचार ने आडवाणी को जीते जी हाशिये पर डाल दिया, उससे अर्नब के समर्थन की उम्मीद ही गलत है। वहां यूज ऐण्ड थ्रो की परम्परा है। यह विचार नाथूराम से हत्या करवाती है, मगर इस विचार के शीर्ष पुरुष उसका नाम भी लेने में हिचकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान कसाब को अपना मानने में हिचकता है। दूसरे पक्ष में आपको यह गड़बडिय़ां नहीं मिलेगी।
इसलिए अगर आपको सत्ता सुख या कोई सम्मान चाहिये तो जरूर मोदीवादी विचार का समर्थन कीजिये, वरना अगर आपको कुछ और उम्मीदें हैं तो निराशा ही मिलेगी।


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